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Sunday, November 15, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और अमिताभ की पसंद के गीत (२१)

अभी हाल ही ही में अमिताभ बच्चन की नयी फिल्म "पा" का ट्रेलर जारी हुआ, और जिसने भी देखा वो दंग रह गया...जानते हैं इस फिल्म में उनका जो मेक अप है उसे पहनने में अमिताभ को चार घंटे का समय लगता था और उतारने में दो घंटे, और प्रतिदिन ४ घंटे का शूट होता था क्योंकि इससे अधिक समय तक उस मेक अप को पहना नहीं जा सकता था. इस उम्र में भी अपने काम के प्रति इतनी तन्मयता अद्भुत ही है. आज से ठीक ४० साल पहले प्रर्दशित "सात हिन्दुस्तानी" जिसमें अमिताभ सबसे पहले परदे पर नज़र आये थे, उसका जिक्र हमने पिछले रविवार को किया था....चलिए अब इसी सफ़र को आगे बढाते हैं एक बार फिर दीपाली जी के साथ, सदी के सबसे बड़े महानायक की पसंद के ३ और गीत और उनके बनने से जुडी उनकी यादों को लेकर....


दोस्तों हमने आपसे वादा किया था कि अगले अंक में भी हम अपना सफर जारी रखेंगे. तो लीजिये हम हाजिर हैं फिर से अपना यादों का काफिला लेकर जिसके मुखिया अमिताभ बच्चन सफर को यादगार बनाने के लिये कुछ अनोखे पल बयाँ कर रहे हैं. आइये इन यादों में से हम भी अपने लिये कुछ पल चुरा लें.

नदिया किनारे....(अभिमान)बेलगाम

यह फ़िल्म मेरे और जया के लिये बहुत खास है क्योंकि हमने इसे प्रोड्यूस किया था. ह्रिशीदा हमारे गाडफादर थे. इस फिल्म में एस.डी. बर्मन ने संगीत दिया और इस संगीत की महफिलों के दौरान हमने जो समय उनके साथ बिताया वो कभी भूलने वाला नहीं है. जिस तरह से वह गाते थे उस तरह का प्रयास हमारी गायिकी में नहीं आ पाता था. मुझे हमेशा लगता थी कि कहीं कुछ कमी है. वो बहुत ही सुन्दरता से गाते थे. यह गाना बेलगाम के पास एक गाँव में फिल्माया गया था. ह्रिशीदा एक ऐसे गाँव का माहौल चाहते थे जिसमें एक छोटा सा मंदिर, नदी और एक छोटा सा तालाब हो जो दो प्रेमियों के लिये प्यार का वातावरण तैयार करे. हमें ऐसा ही तालाब मिला. तब तक मेरी और जया के शादी नहीं हुई थी और यह समय हम दोनों के लियी ही स्पेशल था. उस समय जया के लम्बे बाल थे.



देखा ना हाय रे...(बाम्बे टू गोआ), मद्रास

मुझे याद है कि इस गाने पर बहुत मेहनत के गयी थी और यह गाना बस के अन्दर फिल्माया गया था. पी. एल. राजमास्टर हमारे कोरियोग्राफर थे और बड़े ही कड़क थे. अगर आप अपने स्टेप्स सही से नही करते तो वह बहुत डाँटते और मारते भी थे. हमें एक बस को मुम्बई से गोआ ले जाना था और गाने को बीच में ही शूट करना था. पर जैसे ही हम अंधेरी पहुँचे बस खराब हो गयी. तब मद्रास में हमने नागी रेड्डी स्टूडियो में सेट लगाया और गाना शूट किया. क्योंकि मैं इन्डस्ट्री में नया था इसलिये महमूद भाईजान के साथ समय बिताता था जो शूटिंग के समय "कमाआन टाईगर, यू कैन डू इट" कहकर बहुत ही ज्यादा प्रोत्साहित करते थे. चालीस मेम्बरों की पूरी स्टार कास्ट बस के बाहर खड़ी रहती और मुझे प्रोत्साहित करती थी. प्रत्येक शाट के बाद महमूद भाई मेरे लिये जूस बनाते और कहते जाओ नाचो.



माई नेम इज एन्थनी....(अमर अकबर एन्थनी), मुम्बई

मनमोहन देसाई अजब गाने और अजब सिचुएसन सोचते थे. जब वह गाने को बताते थे तब हमारा पहला रियेक्शन उस पर हँसना होता था. वे पहले गाने को सोचते थे फिर उसके चारों और के सीन पर काम करते थे. किसी को भी उन पर विश्वास नहीं था. हम सोचते थे कि ऐसा कैसे हो सकता है कि एक आदमी सोला टोपी पहने अंडे से निकले और गाये कि "माई नेम इस एन्थनी गान्साल्वेस".यह गाना जुहू के ’होलीडे इन लोबी’ में फिल्माया गया था. इस गाने की रिकार्डिंग के लिये वो चाहते थे कि मैं कुछ "अगड़म बगड़म" जैसे शब्द डाँलू. मैने सोचा कि जब हम पागल हो ही गये हैं तो क्यों ना इसमें कुछ पागलपन डाला जाये. जब मैं रिकार्डिंग में था तो लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल जी ने मुझसे पूछा कि मैं क्या गाने वाला हूँ. मैने कहा कि मुझे याद नहीं है कुछ कर लेंगे. यह गाना फेमस स्टूडियो ’तारादेव’ में रिकार्ड किया गया जहाँ सभी बड़े-बड़े संगीतकार आये थे. जब मैं इन्डस्ट्री में नया था तब मुझे कहा गया था कि यहाँ हर दिन गाने रिकार्ड होते है और मुझे किसी बड़े आदमी से मिलने की कोशिश करनी चाहिये. मैं सड़क पर रफीसाहब, लताजी और दूसरे लोगों का अन्दर जाने के लिये इंतजार करता था लेकिन मेरी कभी भी उन तक पहुँचने की हिम्मत नही हुई. खैर गाना एक ही बार में रिकार्ड हो गया. अगर कोइ भी एक गलती करता तो पूरा गाना दुबारा से गाना पड़ता. मुझे बड़े-बड़े गायकों के बीच में बैठना था मैने किसी तरह गाने को एक टेक में किया और सोचा कि ’बच गये’.



उम्मींद है कि आपको इस यादों के सफर में आनंद आया होगा. तो दोस्तों देखा आपने जो दिखता है जरूरी नहीं कि सच्चाई भी वही हो. परदे के पीछे बहुत कुछ अलग होता है. किसी काम को सफल बनाने व पूरा करने में तरह-तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है. लेकिन कहते हैं कि ’अंत भला तो सब भला’. हमारा अमिताभ जी के साथ यहीं तक का सफर था. तो चलिए आपसे और अमिताभ जी से अब हम विदा लेते है. अगली मुलाकात तक खुश रहिये, स्वस्थ रहिये और हाँ हिन्दयुग्म पर हमसे मिलते रहिये.

साभार -टाईम्स ऑफ़ इंडिया
प्रस्तुति-दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Sunday, November 8, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और अमिताभ बच्चन की पसंद के गीत (२०)

आज से ठीक ४० साल पहले एक फिल्म प्रर्दशित हुई थी जिसक नाम था -"सात हिन्दुस्तानी". बेशक ये फिल्म व्यवसायिक मापदंडों पर विफल रही थी, पर इसे आज भी याद किया जाता है और शायद हमेशा याद किया जायेगा सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म के रूप में. अमिताभ ने इस फिल्म में एक मुस्लिम शायर की भूमिका निभाई थी. फिल्म का निर्देशन किया विख्यात ख्वाजा अहमद अब्बास ने (इनके बारे फिर कभी विस्तार से), संगीत जे पी कौशिक का था, जो लीक से हट कर बनने वाली फिल्मों में संगीत देने के लिए जाने जाते हैं. शशि कपूर की जूनून में भी इन्हीं का संगीत था, गीत लिखे कैफी आज़मी ने जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का राष्ट्रीय सम्मान भी हासिल हुआ, गीत था महेंद्र कपूर का गाया "आंधी आये कि तूफ़ान कोई....". अमिताभ ने भी इस फिल्म के के लिए "सर्वश्रेष्ठ युवा (पहली फिल्म) का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता. मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ कि आज भी बच्चन साहब ने (जो अब तक शायद सैकडों सम्मान प्राप्त कर चुके होंगें) इस सम्मान को बेहद सहेज कर रखा होगा....इस फिल्म "सात हिन्दुस्तानी" के बारे में कुछ और बातें करेंगे अगले रविवार... फिलहाल आपके कानों को सुपुर्द करते हैं एक बार फिर दीपाली जी के हाथों में, जो आपको महानायक के 7 पसंदीदा गीतों के सफ़र पर उन्हीं के अनुभवों को आपके साथ बाँट रही हैं. आज सुनिए 4 गीत, बाकी 3 अगले रविवार....


सदी का महानायक कहें या शहंशाह, एंथानी गोन्सालविस या फिर बिग बी कुछ भी कहिये, लेकिन एक ही चेहरा और एक ही आवाज दिखाई-सुनाई देती है और वो नाम है अमिताभ बच्चन का. कहते है कि कोइ-कोइ विरले ही होते है जो इतना मान तथा सम्मान पाते हैं, अमिताभ बच्चन उन्हीं विरलों में से एक हैं जिन्होंने हिन्दी सिनेमा के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में अपना नाम अंकित किया है. प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन के पुत्र अमिताभ ने अपने नाम को सही मायनों में चरित्रार्थ किया है. अमिताभ ने फिल्म जगत में जब कदम रखा था तो कभी सोचा भी न होगा कि उनका ये सफर इतना लम्बा, यादगार तथा कभी खत्म ना होने वाला सफर होगा. आज हम आपके लिये उनके इस यादगार सफर के कुछ जाने-अनजाने पहलू लेकर आये है उम्मींद है आपको ये लम्हे पसंद आयेंगे. तो चलिये हम ले चलते है आपको अमिताभ बच्चन के साथ यादों के सफर पर ...........बकौल अमिताभ

नीला आसमां सो गया-दिल्ली

यश जी को यह गाना मैने ही सुझाया था.उन्हे फिल्म के लिये एक साफ्ट और मेलोडियस गाना चाहिये था. मैं आपको इस गाने से जुडी बात बताता हूँ. मैने शम्मी कपूर जी के साथ कई फिल्में की इसलिये वो मेरे करीबी हैं. उन्हें संगीत का बहुत शौक है मैं जब भी उनके घर जाता तो वो अक्सर एक पहाडी धुन गुनगुनाते थे. बाद में उस धुन को इस गाने का रूप दिया था. मैने इस गाने को यश जी को बताया तो वो राजी हो गये. हमने इस गाने के लिये शम्मी जी की इजाजत ली. संगीतकार हरिजी व शिवजी को ये गाना पसंद आया. उन्होंने मुझसे गाने को कहा लेकिन मैं कोइ गायक नही था फिर भी मैने इस गीत को गाया. मेरे परिवार तथा दोस्तों ने मुझसे कहा कि मैं फिर कभी दुबारा न गाऊँ. फिल्म की ज्यादातर शूटिंग दिल्ली और कश्मीर में की गयी. यह गाना रात में दिल्ली के एक फार्म हाउस में शूट किया गया.



कभी-कभी मेरे दिल में-श्रीनगर

हम यश जी और पूरी स्टार टीम के साथ एक महीना श्रीनगर में रुके थे. जब मन किया तो शूट किया और जब मन किया तो बोटिंग और पिकनिक की. सभी स्टारकास्ट अपनी फैमिली के साथ आयी थी. हर दिन किसी ना किसी परिवार का सदस्य कोइ ना कोइ खाना बनाता. हमने पूरी फिल्म एक पारिवारिक माहौल में शूट की जो कि फिल्म में भी दिखाई देता है. गाने के बोल शाहिर लुधियानवी जी ने लिखे थे. मुझे और यश जी को शक था कि फिल्म लोगों द्वारा स्वीकार की जायेगी भी या नहीं. उन्हीं दिनों मैंने दीवार.शोले और जंजीर जैसी फिल्मों में एन्ग्रीयंगमैन की भूमिकायें निभायी थी. जनता भी ताज्जुब में थी कि एन्ग्रीयंगमैन ने रोमांटिक किरदार कैसे निभाया. लेकिन यशजी फिल्म में और मारधाड़ नहीं चाहते थे, उन्हें केवल रोमांस चाहिये था. उनका विश्वास सही निकला सभी ने फिल्म को पसंद किया.



ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे-रामनगरम.

फिल्म का ज्यादातर भाग बैंगलौर के निकट रामनगरम में फिल्माया गया है. यह गीत बाइक और साइड कार में फिल्माया गया है. बाइक के साथ साइड कार में यह दृश्य फिल्माना कठिन था.रमेश सिप्पी जी एक सीन में चाहते थे कि धर्मेंद्र मेरे कंधे पर बैठे और साइड कार को अलग करके बाद में दुबारा बाइक से मिलाना था. कैमरा कार में लोड किया गया और उसी के साथ घूमते हुए हमें बाइक चलानी थी. यह भी आइडिया नहीं था कि हम कैसे निश्चित जगह पर एक साथ मिलेगे. हम नहीं जानते थे कि ये कैसे होगा लेकिन हमने ये एक ही टेक में किया.



सारा जमाना.....याराना-कोलकाता

फिल्म के प्रड्यूसर हबीब नाडियावाला को इस गाने का आइडिया मैने दिया. मैने पहले भी कोलकाता में कई फिल्में जैसे- 'दो अन्जाने' की थी. मुझे लगा कि अगर हम कोलकाता में शूट करेंगे तो बहुत लोग शूटिंग देखने आयेंगे. इस तरह नेचुरल भीड़ का इन्तजाम हो जायेगा. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस स्टेडियम तभी बना था और फिल्म के गाने के लिये वो जगह अच्छी थी. इसी बीच मुझे राबर्ट रेडफोर्ड की फिल्म का पोस्टर देखने को मिला जिसमें वो एक चमकीला आउटफिट पहनकर घोड़े पर राइड कर रहे थे. तब मैने सोचा क्यों ना एक ऐसी ड्रेस पहनी जाये जिसमें बल्ब लगे हों. हमने ये काम मेरे कपड़े सिलने वाले अकबर मियां को बताया और उन्होंने इस गीत के किये यह ड्रेस तैयार की. उन दिनों बैटरी का सिस्टम नही था. टेलर ने कपडो में ही इलेक्ट्रिक वायर फिट करके ड्रेस तैयार की. जब मैने उसे ऐसे ही चलाना शुरु किया तो वायर में कुछ प्राब्लम हो गयी और मुझे करंट लग गया.

इसके अलावा दूसरा चेलेंज जनता को कंट्रोल करना था. पुलिस आयी मारपीट हुए जिस वजह से हमें सब कुछ लपेटना पड़ा.हमने बाकी का पार्ट रात में शूट करने का फैसला किया. लोगों को दिखाने के बजाय किसी को रात में १२०००-१३००० मोमबत्ती जलाने को कहा गया. फिर हमने शाम की फ्लाइट पकड़ी और गाने को पूरा किया.



कहते हैं की परदे के पीछे की कहानी कुछ और ही होती है. अमिताभ जी ने जिन बातों को हमें बताया उससे हमें परदे के पीछे की कई दिलचस्प बातों का पता चलता है. ये बातें एक तरफ हमें नई चीजों से रुबरु कराती हैं वहीं घटनाओं की सच्चाई रोंगटे भी खड़े कर देती है. खैर बातचीत का ये सफर हम अपने अगले अंक में भी जारी रखेंगे. तब तक के लिये दीजिये इजाजत.

साभार -टाईम्स ऑफ़ इंडिया
दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Sunday, October 18, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और फीचर्ड एल्बम "जूनून" पर बात, दीपाली दिशा के साथ (१८)

कहते हैं कि संगीत एक नशा है, जादू है, जो सर चढ़ के बोलता है. यही नहीं संगीत आत्मा की आवाज है जो इंसान में जोश और जूनून पैदा कर देता है और लोगों तक शान्ति तथा सदभाव पहुँचाने का जरिया भी है. शायद कुछ इसी मकसद से पाकिस्तानी गायकों ने अपने बैंड का नाम ’जूनून’ रखा होगा. खैर उनका मकसद जो भी रहा हो लेकिन उनके संगीत में जूनून नजर आता है जो लोगों में भी एक भाव पैदा कर देता है. ’जूनून’ पाकिस्तान का एक प्रसिद्ध बैंड है. यूं तो पाकिस्तान के कई बैंड यहाँ हिन्दुस्तान में आये हैं लेकिन ’जूनून’ ने काफी ख्याति पायी है. पिछले दस सालों में जूनून बैंड की पाँच एल्बम आयीं हैं जिनमें से सभी ने धूम मचायी है. यह पाकिस्तान के इतिहास का सबसे प्रसिद्ध बैंड है.

’जूनून’ बैंड के सदस्यों में सलमान अहमद, अली अज़मत और ब्रायन ओ शामिल हैं. ’तलाश’, ’इंकलाब’, आज़ादी, ’परवाज़’ और ’दीवार’ इनकी अब तक की एल्बमें है. जूनून ग्रुप की ’आज़ादी’ एल्बम ने सबसे ज्यादा धूम मचायी थी. इसके प्रसिद्ध होने का मुख्य कारण जूनून बैंड का सूफी के साथ रॉक का संगम होना है. ’आजादी’ का संगीत व गानों को सुनकर लगता है कि जूनून बैंड पूर्वी संगीत से प्रभावित है. इस एल्बम में तबला मुख्य रूप से प्रयुक्त हुआ है. इस एल्बम में जूनून बैंड ने अमेरिका के रिकार्डिंग एवं मिक्सिंग इंजीनियर जोन एली रॊबन्सन की सहायता से स्पेशल इफैक्ट डलवाये. जोन ही इस एल्बम के को-प्रड्यूसर भी हैं.

अल्बम के प्रसिद्ध गीतों में से एक "खुदी को कर" इकबाल की शायरी को रॉक स्टायल में पेश किया गया है. सभी शेरों को अच्छे अन्दाज में पिरोया गया है. शेरों को अपने हिसाब से फेर-बदल करने की वजह से उनकी संवेदना घट गयी है.अन्यथा संगीत अच्छा है. दिल में जोशो-जूनून भरने में बेहद असरदार है ये गीत.



’मेरी आवाज सुनो’ एक कव्वाली है. इसमें तम्बूरे के साथ गिटार का प्रयोग किया गया है यह गाने को कर्णप्रिय बना देता है. संगीत संयोजन गजब का है, और बोल ख़ास ध्यान आकर्षित करते हैं. "तेरे संग ज़माना सारा, खुदा है मेरे संग जालिम....". बेस गिटार का सुन्दर इस्तेमाल अंत में बेहद प्रभावित करता है.



’यार बिना’ भी एक कव्वाली ही है.तबले का जोरदार प्रयोग इस गीत को उत्साही बना देता है. इस गीत को सुनकर मजा आता है. गायकों ने पूरी उर्जा के साथ गीत को निभाया है, कुछ गीत कुछ धुन ऐसी होती है जिनकी प्रतिलिपियाँ आप बरसों से सुनते आ रहे हों, पर फिर भी उनका नशा कभी कम नहीं होता, ये भी कुछ उसी तरह का गीत है.



’सैयो नी’ इस एल्बम का सबसे प्रसिद्ध गीत है जो लोगों द्वारा बहुत पसंद किया गया. इस गीत का सूफीयाना अन्दाज बहुत आकर्षित करता है. एक शेर में एक अलग और उंडा बात कही गयी है, सूफी रॉक में ऐसा परफेक्ट संयोग जहाँ शब्द संगीत और गायिका तीनों का उत्कृष्ट मिलन हुआ हो बहुत कम सुना गया है. बेहतरीन गीत.

"क्या बशर की बिसात,
आज है कल नहीं..."
और

"छोड़ मेरी खता,
तू तो पागल नहीं..."

सुनिए -



’मुक गये’ गीत औसत है. कई जगह संगीत आवाज पर हावी हो जाता है जिससे बोल समझने में मशक्कत करनी पड़ती है. शब्द और गायिकी से विरह की पीडा जो सूफी गीतों का एक अहम् घटक भी है, को उभरने की अच्छी कोशिश की गयी है.



अंत में यही कहेंगे के एल्बम सुनने लायक है. बार-बार तो नहीं लेकिन परिवर्तन के लिये अच्छी है. ज्यादातर गीतों का संगीत व लय एक सा लगता है. संगीत कई-कई जगह हावी हो जाता है जिससे गायकों की आवाज दब जाती है. ’सैयो नी’ गीत के लिये इस एल्बम को जरूर सुनना चाहिए.

प्रस्तुति - दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Sunday, October 4, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (17)

दोस्तों कुछ चीजें ऐसी होती है जो हमारी जिन्दगी में धीरे-धीरे कब शामिल हो जाती है हमें पता ही नहीं चलता. एक तरह से इन चीजों का न होना हमें बेचैन कर देता है. जैसे सुबह एक प्याली चाय हो पर इन चाय की चुसकियों के साथ अखबार न मिले, फिर देखिए हम कितना असहज महसूस करते है. देखिए ना, आपका और हमारा रिश्ता भी तो रविवार सुबह की काँफी के साथ ऐसा ही बन गया है. अगर रविवार की सुबह हो लेकिन हमें हिन्दयुग्म पर काँफी के साथ गीत-संगीत सुनने को न मिले तो पूरा दिन अधूरा सा रहता है पता ही नहीं लगता कि आज रविवार है. यही नहीं काँफी का जिक्र भर ही हमारे दिल के तार हिन्दयुग्म से जोड़ देता है. इसीलिये हम भी अपने पाठकों और श्रोताओं के प्यार में बँधकर खिंचे चले आते हैं कुछ ना कुछ नया लेकर. आज मै आपके साथ अपनी कुछ यादें बाँटती हूँ. मेरी इन यादों में गीत-संगीत के प्रति मेरा लगाव भी छिपा है और गीतों को गुनगुनाने का एक अनोखा तरीका भी. अक्सर मै और मेरी बहनें रात के खाने के बाद छ्त पर टहलते थे. हम कभी पुराने गीतों की टोकरी उड़ेलते तो कभी एक ही शब्द को पकड़कर उससे शुरु होने वाले गानों की झड़ी लगा देते थे. बहुत दिनों बाद आज फिर मेरा मन वही खेल खेलने का कर रहा है इसलिए मै आपके साथ अपनी जिन्दगी के उन पलों को फिर से जीना चाहती हूँ. तो शुरु करें? चलिए अब तो आपकी इजाजत भी मिल गयी है. क्योंकि मैं आपसे अपनी जिन्दगी के पल बाँट रही हूँ तो "जिन्दगी" से बेहतर कोई और शब्द हो ही नहीं सकता. जिन्दगी के ऊपर फिल्मों में बहुत सारे गाने लिखे गये है. इन सभी गानों में जिन्दगी को बहुत ही खूबसूरती से दर्शाया गया है. गीतों के जरिए जिन्दगी के इतने रंगों को बिखेरा गया है कि हर किसी को कोई न कोई रंग अपना सा लगता है.

कहीं जिन्दगी प्यार का गीत बन जाती है तो कहीं एक पहेली. किसी के लिये यह एक खेल है, जुआ है तो किसी के लिये एक सुहाना सफर. ऐसे लोगों की भी कमी नही है जो जिन्दगी को एक लतीफे की तरह मानते हैं और कहते है कि सुख-दुख जिन्दगी के ही दो पहलू हैं. देखा आपने, इस एक जिन्दगी के कितने रुप है. हर शायर ने अपने-अपने नजरिये से जिन्दगी को उकेरा है. आइये हम मिलकर जिन्दगी के संगीत को अपनी साँसों में भर लें.

चलिए शुरुआत करते हैं एक कव्वाली से जहाँ आदमी और औरत के नज़रिए से जिदगी पर चर्चा हो रही है, बहुत दुर्लभ है ये गीत. इस गीत में जो विचार रखे गए हैं आदमी और औरत की सोच पर, वो शायद आज के दौर में तो किसी को कबूल नहीं होगी, पर शायद कुछ शाश्वत सत्यों पर आधारित मूल्यों पर इसकी बुनियाद रखी गयी होगी...सुनिए -

आदमी की जिंदगी का औरत नशा है ...


दोस्तों वैसे तो ये जिंदगी बहुत ही खूबसूरत है, और जो मेरी इस बात से इनकार करें उनके लिए बस इतना ही कहूंगी कि यदि इसमें किसी ख़ास शख्स की अगर कमी है तो उस कमी को दूर कर देखिये....फिर आप भी हेमंत दा की तरह यही गीत गुनगुनायेंगें.

जिंदगी कितनी खूबसूरत है ....


कुछ गम जिंदगी से ऐसे जुड़ जाते हैं, कि वो बस जिंदगी के साथ ही जाते हैं, धीरे धीरे हमें इस गम की कुछ ऐसी आदत हो जाती है, कि ये गम न जीनें देता है न मरने...दोस्तों यही तो इस जिंदगी की खासियत है कि ये हर हाल में जीना सिखा ही देती है, किशोर दा ने अपनी सहमी सहमी आवाज़ में कुछ ऐसे ही उदगार व्यक्त किये थे फिल्म "दो और दो पांच" के इस भुला से दिए गए गीत में, बहुत खूबसूरत है, सुनिए -

मेरी जिंदगी ने मुझपर....


कई गीत ऐसे बने हैं जहाँ फिल्म के अलग अलग किरदार एक ही गीत में अपने अपने विचार रखते हैं, संगम का "हर दिल जो प्यार करेगा..." आपको याद होगा, दिल ने फिर याद किया का शीर्षक गीत भी कुछ ऐसा ही था, फिल्म नसीब ने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने अपने संगीत निर्देशन में एक बार फिर वही करिश्मा किया जो अमर अकबर अन्थोनी में रफी लता किशोर और मुकेश को लेकर उन्होंने किया था, बस इस बार गायक कलाकार सभी ज़रा अलग थे. कमलेश अवस्थी, अनवर, और सुमन कल्यानपुर की आवाजों में जिंदगी के इम्तेहान पर एक लम्बी चर्चा है ये गीत, सुनिए -

जिंदगी इम्तेहान लेती है....


और चलते चलते एक ऐसा गीत जिसमें छुपी है जिंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई, दोस्तों प्यार बिना जिंदगी कुछ भी नहीं, तभी तो कहा गया है, "सौ बरस की जिंदगी से अच्छे हैं प्यार के दो चार दिन.....". तो बस प्यार बाँटिये, और प्यार पाईये, मधुर मधुर गीतों को सुनिए और झूमते जाईये -

सौ बरस की जिंदगी से अच्छे हैं....



प्रस्तुति - दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Sunday, September 20, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और एक फीचर्ड एल्बम पर बात, दीपाली दिशा के साथ (१६)

"क्या लिखूं क्या छोडूं, सवाल कई उठते हैं, उस व्यक्तित्व के आगे मैं स्वयं को बौना पाती हूँ" लताजी का व्यक्तित्व ऐसा है कि उनके बारे में लिखने-कहने से पहले यही लगता है कि क्या लिखें और क्या छोडें. वो शब्द ही नहीं मिलते जो उनके व्यक्तित्व की गरिमा और उनके होने के महत्त्व को जता सकें. 'सुर सम्राज्ञी' कहें, 'भारत कोकिला' कहें या फिर संगीत की आत्मा, सब कम ही लगता है. लेकिन मुझे इस बात पर गर्व है कि लता जी जैसा रत्न भारत में उत्पन्न हुआ है. लता जी को 'भारत रत्न' पुरूस्कार का मिलना इस पुरूस्कार के नाम को सत्य सिद्ध करता है. उनकी प्रतिभा के आगे उम्र ने भी अपने हथियार डाल दिए हैं. लता जी की उम्र का बढ़ना ऐसा लगता है जैसे कि उनके गायन क्षमता की बेल दिन-प्रतिदिन बढती ही जा रही है. और हम सब भी यही चाहते हैं कि यह अमरबेल कभी समाप्त न हो, इसी तरह पीढी दर पीढी बढती ही रहे-चलती ही रहे.

वर्षों से लताजी फिल्म संगीत को अपनी मधुर व जादुई आवाज से सजाती आ रही हैं. कोई फिल्म चली हो या न चली हो परन्तु ऐसा कोई गीत न होगा जिसमें लताजी कि आवाज हो और लोगों ने उसे न सराहा हो. लता, एक ऐसा नाम और प्रतिभा है जो बीते ज़माने में भी मशहूर था, आज भी है और आने वाले समय में भी वर्षों तक इस नाम कि धूम मची रहेगी. उनके गाये गीतों को गाकर तथा उन्हीं को अपना आदर्श मानकर न जाने कितने ही लोगों ने गायन क्षेत्र में अपना सिक्का जमाया है और आज भी सैकडों बच्चे बचपन से ही उनके गाये गीतों का रियाज करते हैं तथा अपने कैरियर को एक दिशा प्रदान करने की कोशिश में लगे हैं.

लताजी ने अपनी जिंदगी में इतना मान सम्मान पाया है कि उसको तोला नहीं जा सकता. कितनी ही उपाधियाँ और कितने ही पुरुस्कारों से उनकी झोली भरी हुई है. लेकिन अब तो लगता है कोई पुरुस्कार, कोई सम्मान उनकी प्रतिभा का मापन नहीं कर सकता. लता जी इन सब से बहुत आगे हैं. पुरूस्कार देना या उनकी प्रतिभा को आंकना 'सूरज को दिया दिखाने' जैसा है. शोहरत की बुलंदियों पर विराजित होने के बावजूद भी घमंड और अकड़ ने उन्हें छुआ तक नहीं है. कहते हैं की 'फलदार वृक्ष झुक जाता है' यह कहावत लताजी पर एकदम सटीक बैठती है. उन्होंने जितनी सफलता पायी है उतनी ही विनम्रता और शालीनता उनके व्यक्तित्व में झलकती है. वह सादगी की मूरत हैं तथा उनकी आवाज के सादेपन को हमेशा से लोगों ने पसंद किया है.

फ़िल्मी गीतों के अलावा लता जी ने बीच बीच में कुछ ग़ज़लों की एल्बम पर भी काम किया है, "सादगी" इस श्रेणी में सबसे ताजा प्रस्तुति है. लताजी का मानना है कि जिंदगी में सरल व सादी चीजें ही सभी के दिल को छूती हैं, और इस एल्बम में उन्हीं लम्हों के बारे में बात कही गयी है, इसीलिए इस एल्बम का नाम 'सादगी' रखा गया है. यह एल्बम 'वर्ल्ड म्यूजिक डे' पर प्रख्यात गायक जगजीत सिंह द्वारा जारी किया गया. पूरे १७ वर्षों बाद लता जी का कोई एल्बम आया है. इस एल्बम के संगीत निर्देशक मयूरेश हैं तथा ज्यादातर ग़ज़लें लिखी हैं जावेद अख्तर, मेराज फैजाबादी, फरहत शहजाद, के साथ चंद्रशेखर सानेकर ने. एल्बम में शास्त्रीय संगीत तथा लाईट म्यूजिक के बीच संतुलन बिठाने की कोशिश की गयी है. इसमें कुल आठ गजलें हैं. 'मुझे खबर थी' और 'वो इतने करीब हैं दिल के' गजल पहली बार सुनने पर ही असर करती हैं. दिल को छूती हुई रचनायें है. बाकी की गजलों का भी अपना एक मजा है लेकिन उन्हें दिल तक पहुंचने में दो तीन बार सुनने तक का समय लगेगा. एल्बम में ज्यादातर परंपरागत संगीत वाद्य यंत्रों का प्रयोग हुआ है तथा सेक्सोफोन, गिटार और पश्चिमी धुन का भी प्रयोग सुनाई पड़ता है.

चलते-चलते यही कहेंगे कि लता जी की आवाज में नदी की तरह ठहराव और शांति का भाव समाहित है. एक मधुर और भावपूर्ण संगीतमय तोहफे के लिए हम उनके आभारी है. ईश्वर करे वो आने वाले दशकों तक हमें संगीत की सौगातें देती रहे और हम इस सरिता में यूं ही डुबकी लगाते रहे.

मुझे खबर थी - फरहत शहजाद


इश्क की बातें - जावेद अख्तर


रात है - जावेद अख्तर


चाँद के प्याले से - जावेद अख्तर


अंधे ख्वाबों को - मेराज फैजाबादी


जो इतने करीब हैं - जावेद अख्तर


मैं कहाँ अब जिस्म हूँ - चंद्रशेखर सानेकर


फिर कहीं दूर से - मेराज फैजाबादी


ये ऑंखें ये नम् ऑंखें - गुलज़ार


प्रस्तुति - दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Sunday, September 6, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और यादें गीतकार गुलशन बावरा की (१५)

सच कहा गया है कि कल्पना की उडान को कोई नहीं रोक सकता. कल्पनाएँ इंसान को सारे जहान की सैर करा देती हैं. ये इंसान की कल्पना ही तो है की वो धरती को माँ कहता है, तो कभी चाँद को नारी सोंदर्य का प्रतीक बना देता है. आसमान को खेल का मैदान, तो तारों को खिलाड़ियों की संज्ञा दे देता है. तभी तो कहते है कल्पना और साहित्य का गहरा सम्बन्ध है. जिस व्यक्ति की सोच साहित्यिक हो वो कहीं भी कोई भी काम करे, पर उसकी रचनात्मकता उसे बार-बार साहित्य के क्षेत्र की और मोड़ने की कोशिश करती है. गुलशन बावरा एक ऐसा ही व्यक्तित्व है जो अपनी साहित्यिक सोच के कारण ही फिल्म संगीत से जुड़े. हालांकि पहले वो रेलवे में कार्यरत थे, लेकिन उनकी कल्पना कि उड़ान ने उन्हें फिल्म उद्योग के आसमान पर स्थापित कर दिया, जहाँ उनका योगदान ध्रुव तारे की तरह अटल और अविस्मर्णीय है.

१२ अप्रैल १९३८ पकिस्तान(अविभाजित भारत के शेखुपुरा) में जन्मे गुलशन बावरा जी का असली नाम गुलशन मेहता है. उनको बावरा उपनाम फिल्म वितरक शांति भाई पटेल ने दिया था. उसके बाद सभी उन्हें इसी नाम से पुकारने लगे. हिंदी फिल्म उद्योग के ४९ वर्ष के सेवाकाल में बावरा जी ने २५० गीत लिखे. गुलशन बावरा ने अपना पहला गीत १९५९ में फिल्म 'चंद्रसेना' के लिए लिखा था. फिल्म 'सट्टा बाजार' के लिए लिखा गीत 'चांदी'के चंद टुकडे के लिए 'उनका हिट गीत था. उन्होनें 'सनम तेरी कसम', 'अगर तुम न होते', सत्ते पे सत्ता' ,'ये वादा रहा', हाथ की सफाई' और 'रफूचक्कर' आदि फिल्मों को अपने गीतों से सजाया है. फिल्म उपकार के गीत 'मेरे देश की धरती सोना उगले' को कौन भूल सकता है. यह गीत भी बावरा जी की ही कलम और कल्पना का अनूठा संगम है. फिल्म 'उपकार' के इस गीत ने उनके कैरियर को नई ऊँचाई दी. अपनी सादी शैली के लिए पहचाने जाने वाले बावरा जी का यह शायद सबसे चर्चित गीत रहा . अगर आज की तारीख में भारतवासी 'जय हो' गीत गाकर अपनी देशभक्ति को अभिव्यक्त करते हैं तो ६० के दशक में ये सम्मान 'मेरे देश की धरती सोना उगले'को प्राप्त था. हम इसे था नहीं कह सकते. देश प्रेम से ओतप्रोत यह गीत आज भी स्वतंत्रता दिवस जैसे आयोजनों पर मुख्य रूप से रेडियो तथा टी.वी. स्टेशनों पर बजाया जाता है. 'मेरे देश की धरती' गीत तथा 'यारी है ईमान मेरा' गीत के लिए उन्हें 'फिल्म फेयर पुरूस्कार' से नवाजा गया था.

बावरा ने जीवन के हर रंग के गीतों को अल्फाज दिए. उनके लिखे गीतों में 'दोस्ती, रोमांस, मस्ती, गम' आदि विभिन्न पहलू देखने को मिलते हैं. 'जंजीर' फिल्म का गीत 'यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिन्दगी' दोस्ती की दास्तान बयां करता है, तो 'दुग्गी पे दुग्गी हो या सत्ते पे सत्ता' गीत मस्ती के आलम में डूबा हुआ है. उन्होंने बिंदास प्यार करने वाले जबाँ दिलों के लिए भी 'खुल्ल्म खुल्ला प्यार करेंगे', 'कसमें वादे निभाएंगे हम', आदि गीत लिखे हैं. बावरा के पास हर मौके के लिए गीत था. पाकिस्तान से आकर बसे बावरा ने अपने फ़िल्मी कैरियर की तुलना में यूं तो कम गीत लिखे लेकिन उनके द्वारा लिखे सादे व अर्थपूर्ण गीतों को हमेशा पसंद किया गया. उन्होंने संगीतकार 'कल्याण जी आनंद जी' के संगीत निर्देशन में ६९ गीत लिखे और आर.डी. बर्मन के साथ १५० गीत लिखे. पंचम दा गुलशन बावरा जी के पडोसी थे. पंचम दा के साथ उनकी कई यादें जुडी हुई थीं. इन यादों को गुलशन बावरा जी ने 'अनटोल्ड स्टोरीज' नाम की एक सीडी में संजोया था. इसमें उन्होंने पंचम दा की आवाज रिकार्ड की थी और कुछ गीतों के साथ जुड़े किस्से-कहानियां भी प्रस्तुत किये.

गुलशन बावरा दिखने में दुबले -पतले शरीर के थे. उनका व्यक्तित्व हंसमुख था. हांलाकि बचपन में विभाजन के समय, उन्होंने जो त्रासदी झेली थी, वो अविस्मर्णीय है लेकिन उनके व्यक्तित्व में उसकी छाप कहीं दिखाई नहीं देती थी. वो कवि से ज्यादा कॉमेडियन दिखाई देते थे. इस गुण के कारण कई निर्माताओं ने उनसे अपनी फिल्मों में छोटी-छोटी भूमिकाएं भी अभिनीत करवायीं. विभाजन का दर्द उन्होंने कभी जाहिर नहीं होने दिया. राहुल देव बर्मन उनके करीबी मित्र थे. राहुल जी के संगीत कक्ष में प्राय: सभी मित्रों की बैठक होती थी और खूब ठहाके लगाये जाते थे. गुलशन बावरा उस सर्कस के स्थायी 'जोकर' थे. यहीं से उनकी मित्रता किशोर कुमार जी से हुई.फिर क्या था अब तो दोनों लोग मिलकर हास्य की नई-नई स्तिथियाँ गढ़ते थे. गुलशन बावरा को उनके अंतिम दिनों में जब 'किशोर कुमार' सम्मान के लिए चुना गया तो उनके चहरे पर अद्भुद संतोष के भाव उभरते दिखाई दिए. उनके लिए यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण क्षण था. एक तरफ यह पुरूस्कार उनके लिए विभाजन की त्रासदी से लेकर जीवन पर्यंत किये गए संघर्ष का इनाम था. दूसरी ओर अपने पुराने मित्र की स्मृति में मिलने वाला पुरुस्कार एक अनमोल तोहफे से कम नहीं था. पिछले सात वर्षों से वह 'बोर्ड ऑफ परफार्मिंग राइट सोसायटी' के निदेशक पद पर कार्यरत थे.

विगत ७ अगस्त २००९ को लम्बी बीमारी के चलते गुलशन बावरा जी का देहांत हो गया और गुलशन जी की इच्छानुसार उनके मृतशरीर को जे.जे. अस्पताल को दान कर दिया गया. हिंदी सिनेमा ही नहीं हिंदी साहित्य भी गुलशन बावरा जी के अद्भुद योगदान को कभी नहीं भूल पायेगा. आज गुलशन जी शारीरिक रूप से हमारे बीच उपस्थित नहीं हैं तो क्या हुआ उनके लिखे अनमोल गीत हमेशा फिजाओं में गूँजकर उनके होने का एहसास कराते रहेंगे. एक गीतकार कभी नहीं मरता उसकी कल्पना उसके विचार धरोहर के रूप में लोगों को आनंदित करने के साथ-साथ एक दिशा भी प्रदान करते रहते हैं. आइये हम सभी एक उत्कृष्ट और उम्दा कल्पना के सृजनकार को श्रद्धांजलि दें. आज रविवार सुबह की कॉफी में सुनते हैं गुलशन बावरा के लिखे और किशोर दा के गाये कुछ मस्ती भरे तो कुछ दर्द भरे गीत -

हमें और जीने की चाहत न होती (अगर तुम न होते)


प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया (सत्ते पे सत्ता)


दिल में जो मेरे (झूठा कहीं का)


तू मइके मत जईयो (पुकार)


लहरों की तरह यादें (निशाँ)


प्रस्तुति - दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Tuesday, August 25, 2009

खुद-बखुद नींद आ जाएगी, तू मुझे सोचना छोड़ दे...... तलत अज़ीज़ साहब की एक और फ़रियाद

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३९

ज का अंक शुरू करने से पहले हम पिछले अंक में की गई एक गलती के लिए माफ़ी माँगना चाहेंगे। यह माफ़ी सिर्फ़ एक इंसान से है और उस इंसान का नाम है "शरद जी"। दर-असल पिछले अंक में हमने आपको जनाब अतर नफ़ीस की लिखी जो नज़्म सुनाई थी, वह है तो यूँ बड़ी हीं खुबसूरत, लेकिन उसकी फ़रमाईश शरद जी ने नहीं की थी। हुआ यूँ कि शरद जी की पसंद की तीन गज़लें/नज़्में और "आज जाने की ज़िद न करो" एक हीं जगह संजो कर रखी हुई थी, अब उस फ़ेहरिश्त से दो गज़लें हम आपको पहले हीं सुना चुके थे तो तीसरे के रूप में हमारी नज़र "आज जाने की ज़िद न करो" पर पड़ी और जल्दीबाजी में आलेख उसी पर तैयार हो गया। चलिए माना कि हमने इस नाम से नज़्म पोस्ट कर दी कि यह शरद जी की पसंद की है, लेकिन आश्चर्य तो इस बात का है कि खुद शरद जी ने इस गलती की शिकायत नहीं की। शायद वो कहीं अन्यत्र व्यस्त थे या फिर वो खुद हीं भूल चुके थे कि उन्होंने किन गज़लों की फ़रमाईश की थी। जो भी हो, लेकिन यह गलती हमारी नज़र से छिप नहीं सकी और इसलिए हमने यह फ़ैसला किया है कि महफ़िल-ए-गज़ल की ४०वीं कड़ी (जो यूँ भी फ़रमाईश की गज़लों की अंतिम कड़ी होनी थी) में हम शरद जी की पसंद की अंतिम गज़ल/नज़्म पेश करेंगे। तो यह तो हुई पिछली और अगली कड़ी की बात, अब हम आज की कड़ी की ओर रूख करते हैं। आज की कड़ी सुपूर्द है दिशा जी की पसंद की आखिरी गज़ल के। आज हम जो गज़ल लेकर यहाँ पेश हुए हैं,उसे इस गज़ल के फ़नकार अपनी श्रेष्ठ १६ गज़लों में स्थान देते हैं। उस गज़ल की बात करने से पहले हम उस एलबम की बात करते हैं जिसमें "तलत अज़ीज़" साहब(जी हाँ, आज की गज़ल को अपनी सुमधुर आवाज़ और दिलकश संगीत से इन्होंने हीं सजाया है) की श्रेष्ठ १६ गज़लों का समावेश किया गया है। उस एलबम का नाम है "इरशाद" । हम यहाँ इस एलबम की सारी गज़लों के नाम तो पेश नहीं कर सकते लेकिन दो गज़लें ऐसी हैं, जिसके साथ तलत साहब की कुछ विशे्ष यादें जुड़ी हीं, वो बातें हम आपके साथ जरूर शेयर करना चाहेंगे।

उसमें से पहली गज़ल है क़तील शिफ़ाई साहब की लिखी हुई "बरसात की भींगी रातों में"। खुद तलत साहब के शब्दों में: १९८३ की बात है, मैं एक प्राईवेट पार्टी में यह गज़ल गा रहा था। जब मेरा गाना खत्म हुआ तो एक शख्स मेरे पास आए और मुझसे लिपट कर रोने लगे। इस गाने ने उनके अंदर छुपे शायद किसी दर्द को छु लिया था। जब वो चले गए तो मैने किसी से उनके बारे में पूछा तो पता चला कि वो चर्चित फिल्म निर्देशक महेश भट्ट थे। उस घटना के कुछ दिनों बाद हम एक फ़्लाईट में मिलें तो उन्होंने बताया कि यह उनकी बेहद पसंदीदा गज़ल है। उसके बाद हमारा रिश्ता कुछ ऐसा बन गया कि उन्होंने हीं मेरी होम प्रोडक्शन फिल्म "धुन" डाइरेक्ट की और उनकी फिल्म "डैडी" का मैं एकमात्र मेल सिंगर था। मैने उनके लिए "गुमराह" में भी गाया है। इस गज़ल के बाद चलिए अब बात करते हैं आज की गज़ल की। आज की गज़ल के बारे में तलत साहब की राय इसलिए भी लाजिमी हो जाती है क्योंकि उनके कुछ वाक्यों के अलावा इस गज़ल के गज़लगो के बारे में कहीं भी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। तलत साहब अपने इन वाक्यों के सहारे हमें उस शख्स से रूबरू कराते हैं जो उनका फ़ैन भी है तो एक शायर भी, फ़ैन शायद बहुत बड़ा है, लेकिन शायर छोटा-मोटा। आप खुद देखिए कि तलत साहब क्या कहते हैं। यह गज़ल "खुबसूरत हैं आँखें तेरी" मेरी एलबम "शाहकार" के माध्यम से लोगों के सामने पहली मर्तबा हाज़िर हुई थी। अदब, अदीबों और नवाबों के शहर लखनऊ का एक बांका छोरा था, जिसका नाम था "हसन काज़मी" और जो अपने आप को मेरा बहुत बड़ा फ़ैन कहता था, शौकिया शायरी भी किया करता था। जब भी मैं लखनऊ किसी मुशायरे के लिए जाता तो वह वहाँ जरूर मौजूद होता था, मुझसे मिलता भी था और कभी-कभार अपनी लिखी नज़्मों और गज़लों को मुझे सुना जाता। मैने उसकी गज़ल "खुबसूरत हैं आँखें तेरी" के लिए एक धुन भी तैयार की थी लेकिन आगे चलकर यह बात मेरे जहन से उतर गई थी। कई साल बाद जब हम "शाहकार" पर काम कर रहे थे तो मैने "वीनस" के "चंपक जी" से इस गज़ल का जिक्र किया। "चंपक जी" को यह गज़ल बेहद पसंद आई और उन्होंने इस गज़ल को न सिर्फ़ लीड में रखने का फ़ैसला किया बल्कि इस गज़ल का विडियो भी तैयार किया गया। इस तरह यह गज़ल मेरे पसंदीदा गज़लों में शुमार हो गई।

वैसे तो हमने आपसे यह कहा था कि "इरशाद" एलबम से ली गई दो गज़लों से जुड़ी मजेदार बातें आपसे शेयर करेंगे लेकिन अगर तीसरी की भी बात हो जाए तो क्या बुरा है। हाँ तो जिस तीसरी गज़ल की हम बात कर रहे हैं उसे संगीत से सजाया है खैय्याम साहब ने। गज़ल के बोल हैं "ज़िंदगी जब भी"। इस गज़ल के बारे में तलत साहब कहते हैं: खैय्याम साहब एक पर्फ़ेंक्शनिस्ट हैं। यह गज़ल जिसकी मैं बात कर रहा हूँ, वह उमराव जान फिल्म की बड़ी हीं मासूम गज़ल है। इस गाने की एक पंक्ति "सुर्ख फूलों से महक उठती हुई" में खैय्याम साहब खालिस लखनवी अंदाज की तलब रखते थे और मैं ठहरा हैदराबादी। नहीं चाहते हुए भी हर बार "फूलों" हैदराबादी अंदाज़ में ही आ रहा था। बड़ी कोशिशों के बाद मैं लखनवी अंदाज हासिल कर पाया। फिर भी आज तक मुझे इस गज़ल में अपनी गायकी अपने स्तर से कम की लगती है, जबकि खैय्याम साहब कहते हैं कि कोई गड़बड़ नहीं है। खैय्याम साहब यूँ हीं तो यकीं नहीं रखते, कुछ तो है इस गज़ल में कि आज भी यह गज़ल बड़ी हीं प्रचलित है और लोगों के जुबान पर ठहरी हुई है। जानकारी के लिए बता दूँ कि खैय्याम साहब का १९९० में निधन हो चला है। और इससे यह भी जाहिर होता है जो भी बातें हमने यहाँ पेश की है, वो सब बीसियों साल पुरानी है। चूँकि हमारे पास आज की गज़ल के गज़लगो के बारे में कोई भी खास जानकारी उपलब्ध नहीं है, इसलिए उनका लिखा कोई दूसरा शेर (जो इस गज़ल में मौजूद न हो) हम पेश नहीं कर सकते। इसलिए अच्छा यह होगा कि हम सीधे आपको आज की गज़ल से मुखातिब करा दें। तो लीजिए पेश है आज की गज़ल.....सुनिए और डूब जाईये शब्दों की मदहोशी में। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

खुबसूरत हैं आँखें तेरी, रात को जागना छोड़ दे,
खुद-बखुद नींद आ जाएगी, तू मुझे सोचना छोड़ दे।

तेरी आँखों से कलियाँ खिलीं, तेरी आँचल से बादल उड़ें,
देख ले जो तेरी चाल को, मोर भी नाचना छोड़ दे।

तेरी अंगड़ाईयों से मिलीं जहन-ओ-दिल को नई रोशनी,
तेरे जलवों से मेरी नज़र किस तरह खेलना छोड़ दे?

तेरी आँखों से छलकी हुई जो भी एक बार पी ले अगर,
फिर वो मैखार ऐ साकिया, जाम हीं माँगना छोड़ दे।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

क्यों डरें ज़िंदगी में क्या होगा,
कुछ न होगा तो ______ होगा....


आपके विकल्प हैं -
a) करिश्मा, b) तजुर्बा, c) क्या मज़ा, d) बेमज़ा

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "गिलास" और शेर कुछ यूं था -

मुझे पिला रहे थे वो कि खुद ही शम्मा बुझ गयी,
गिलास गुम, शराब गुम, बड़ी हसीन रात थी....

इस शेर को सबसे पहले सही पहचना सीमा जी ने और उन्होंने कुछ शेर भी पेश किए:

जो रंग भरदो उसी रंग मे नज़र आए
ये ज़िंदगी न हुई काँच का गिलास हुआ

ऐसा न हो कि उँगलियाँ घायल पड़ी मिलें
चटके हुए गिलास को ज्यादा न दाबिए।

यहाँ लिबास की कीमत है आदमी की नहीं
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम करे दे

छिलेगा हाथ तुम्हारा ज़रा-सी ग़फ़लत पर
कि घर में काँच का टूटा गिलास मत रखना.

शामिख साहब हर बार की तरह उस गज़ल को ढूँढ लाए जिससे यह शेर लिया हुआ था। उसके बाद उन्होंने "गिलास" शब्द से जुड़े कई सारे शेर पेश किए। बानगी देखिए:

जो रंग भरदो उसी रंग मे नज़र आए
ये ज़िंदगी न हुई काँच का गिलास हुआ

यहाँ लिबास, की क़मीत है आदमी की नहीं
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे

मैखाने की मस्ती में हम डूबते कैसे
नज़रों के नशे से भरा गिलास नहीं था

एक त्रिवेणी भी:
धौंकते सीनो से, पेशानी के पसीनो से
लड़ -लड़कर सूरज से जो जमा किया था

एक गिलास मे भरकर पी गया पूरा दिन।

मंजु जी स्वरचित दो शेरों के साथ महफ़िल में हाज़िर हुईं। उनके शेर कुछ यूँ थे:

१-मधुशाला में जब टकराते गिलास .
सारा जमाना होता कदमों के पास .
२-जब पिए थे गिलास भुला दिया था तुझे .
झूम रहा था मयखाना अफसाना बने .

नीलम जी ने जहाँ शामिख साहब की टिप्पणी से उठाकर शेर पेश किया तो वहीं सुमित जी थोड़े पशोपेश में नज़र आए। कोई बात नहीं महफ़िल में आप दोनों की उपस्थिति हीं पर्याप्त है।
चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Sunday, August 23, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और एक फीचर्ड एल्बम पर बात दीपाली "दिशा" के साथ

सफलता और शोहरत किसी उम्र की मोहताज नहीं होती. अगर हमारी मेहनत और प्रयास सच्चे व सही दिशा में हों तो व्यक्ति किसी भी उम्र में सफलता और शोहरत की बुलंदियों को छू सकता है. सोनू निगम एक ऐसी शख्सियत है जिन्होंने सफलता के कई पायदान पार किये हैं. उन्होंने अपने बहुमुखी व्यक्तित्व को प्रर्दशित किया है. गायन के साथ-साथ सोनू निगम ने अभिनय व माडलिंग भी की है. यद्यपि अभिनय में उन्हें अधिक सफलता नहीं मिली, किन्तु गायन के क्षेत्र में वह शिखर पर विराजित हैं. उन्होंने गायकी छोड़ी नहीं है. वो आज भी संगीतकारों की पहली पसंद हैं. उनकी आवाज में कशिश व गहराई है. वह कई बार गाने के मूड के हिसाब से अपनी आवाज में बदलाव भी लाते हैं जो उनके हरफनमौला गायक होने का परिचय देता है. अपनी पहली एल्बम 'तू' के जरिये वो युवा दिलों के सरताज बन गए थे. उसके बाद उनकी एल्बम 'दीवाना' और 'यादें' आयीं, जिनके गीतों और गायकी की छाप आज भी हमारे जहन में है. अगर सोनू निगम द्वारा गाये गीतों की सूची बनाएं तो पायेंगे कि उन्होंने अपने बेहतरीन अंदाज से सभी गीतों में जान डाल दी है. ऐसा लगता है कि वो गीत सोनू की आवाज के लिए ही बने थे. एक-एक गीत उनकी गायन प्रतिभा को दर्शाता है, और सफलतम गीतों की श्रेणी में अंकित हैं. सोनू की आवाज में 'दर्द, रोमांस, जोश' आदि सभी तत्व मिलते हैं. उनकी आवाज में शास्त्रीय शैली की झलक भी मिलती है. उनकी शास्त्रीय गायन की प्रतिभा को प्रदर्शित करती एक नयी एल्बम आ रही है जिसका नाम है "क्लासिकली माइल्ड" . क्लासिकली माइल्ड रागों पर आधारित एल्बम है. हालांकि सोनू जी का कहना है कि उन्होंने शास्त्रीय संगीत में कोई विधिवत शिक्षा नहीं ली है. अगर हम इस बात को ध्यान में रखें तो यह बहुत ही बढ़िया और मधुर एल्बम है जो सोनू की प्रतिभा को बखूबी दर्शाती है. इस एल्बम में आठ गीत है और सभी के बोल बहुत अच्छे हैं. अजय जिन्गारान हैं एल्बम के गीतकार और संगीत तैयार किया है दीपक पंडित ने.

सोचता हूँ मैं
यह एल्बम का पहला गीत है और राग सिंध भैरवी पर आधारित है. इस गाने में फिलोसिफी नजर आती है. बहुत ही सरल शब्दों में गायक ने जीवन से जुड़े प्रश्नों को कहा है 'तन पर उम्र का घेरा क्यों है? सदियों से यह राज छुपा है.' जो सभी को सोचने के लिए विवश करते हैं. ड्रम्स, गिटार तथा पियानो का प्रयोग शास्त्रीय संगीत को आधुनिक ढंग से प्रस्तुत करते है.


भीगे भीगे
यह गाना बहुत ही परम्परागत लगता है. इसमें सोनू निगम ने कई स्थान पर आलाप लिए है जो बहुत ही अच्छे सुनाई देते है. यह एक सुन्दर रोमांटिक गाना है जो राग अहीर भैरव, पुरिया धनश्री और ललित पर आधारित है. पूरे गीत में गिटार और पियानो का प्रयोग है बीच में हारमोनियम का प्रयोग इसे और आकर्षक बना देता है.


सूना सूना
एक बहुत ही भावपूर्ण गीत जो देश से दूर गए व्यक्ति को लौट आने का सन्देश देता है. कहता है की देश की हवाएं, मिटटी सब तुझे बुला रही है तेरे बिना सब कुछ सूना है. पहली बार सुनने में शायद यह गीत किसी को न भाये लेकिन दो या तीन बार में जब भाव समझ आने लगता है तो गीत दिल के करीब लगता है. यह गीत राग देश, जैजैवंती और मिश्र पटदीप के मिश्रित रूप पर आधारित है. इस गीत में ड्रम के साथ मृदंग का प्रयोग भी किया गया है. अपने आप में जिंदगी से भरा हुआ गीत लगता है.


सुरतिया मतवाली
यह गीत राग काफी पर आधारित है. इस गीत में गायकी, संगीत, बोल आदि सभी कुछ बहुत बढ़िया है. यह गाना एक भाव उत्पन्न करता है. सभी वाद्य यंत्रों का बहुत सुन्दरता से प्रयोग किया गया है. पियानो और बांसुरी की जुगलबंदी मधुर सुनाई देती है.


छलकी छलकी
यह एक बहुत ही रोमांटिक गीत है साथ ही एक सुन्दर कल्पना को जन्म देता हुआ प्रतीत होता है. बेमिसाल गायकी का प्रदर्शन है. सोनू निगम ने एक ही लाइन को अलग जगह पर अलग तरह से गाया है जो उनके प्रतिभाशाली होने का सबूत है. गीत के बोल 'छलकी छलकी चांदनी में, गाती है दीवानगी. बीते जो बाँहों में तेरे, वोह पल है जिंदगी' मन के तारों को छेड़ जाते हैं उस पर सोनू की गायकी का अंदाज गीत की कल्पना और रोमांस को और बड़ा देता है. यह गीत राग मिश्र सारंग, मिश्र खमाज और बिहाग पर आधारित है. गीत के बोल परंपरागत होते हुए भी आधुनिक संगीत और संसार से जुड़े दिखते हैं.


धन्य धन्य
यह एक बहुत ही मधुर और भावपूर्ण गीत है. इस गीत द्वारा नारी के विभिन्न रूपों को को तथा उसके त्याग को प्रस्तुत किया गया है. बोल और संगीत दोनों ही बेजोड़ हैं. इस गीत को सुन शायद सभी नारियां भावुक हो जाएँ. यह गीत राग मांड पर आधारित है. गाने की शुरुवात और अंत में शहनाई का प्रयोग बेमिसाल है.


लम्हा लम्हा
इस गीत को भी हम मधुर और मन को छूने वाले गीतों में शामिल कर सकते हैं. गीत सन्देश पूर्ण है जो जीने की राह दिखाता है. इसके बोल 'आओ यह पल महकाएं और जीवन को जीना सिखलाएँ' उपदेशात्मक से लगते हैं. यह गीत राग बिलावल पर पर आधारित है और इसमें हिन्दुस्तानी तथा कर्नाटक शैली की मिश्रित झलक दिखती है.


ऐ दिल मत रो
इस गीत के बोल से ही पता लगता है की यह एक दुख भरा गीत है. सोनू की आवाज में दर्द साफ झलकता है. यह गीत राग लोग कौंस पर आधारित है और ग़ज़ल का एहसास भी देता है. सोनू की गायकी बढ़िया है.


सोनू निगम की यह खासियत है की वो अपनी आवाज के साथ प्रयोग करते है और सफल भी होते है. हो सकता है 'क्लासिकली माइल्ड' एल्बम उन लोगों को कम समझ आये जिन्हें शास्त्रीय संगीत का ज्ञान नहीं या जिन्होनें सोनू को सिर्फ रोमांटिक और लाइट गीत गाते सुना है. वैसे यह एल्बम पूरी तरह शास्त्रीय संगीत पर आधारित नहीं है. इसमें हम शास्त्रीय और आधुनिक दोनों संगीतों का सुन्दर समायोजन पायेंगे. यह एल्बम पहली बार सुनने में आपको न छू पाए लेकिन दो बार, तीन बार सुनने पर इसका असर शुरू होता है जो गहरा है.

प्रस्तुति - दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Sunday, August 2, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (११)

नोट - आज से रविवार सुबह की कॉफी में आपकी होस्ट होंगी - दीपाली तिवारी "दिशा"

रविवार सुबह की कॉफी का एक और नया अंक लेकर आज हम उपस्तिथ हुए हैं. वैसे तो मन था कि आपकी पसंद के रक्षा बंधन गीत और उनसे जुडी आपकी यादों को ही आज के अंक में संगृहीत करें पर पिछले सप्ताह हुई एक दुखद घटना ने हमें मजबूर किया कि हम शुरुआत करें उस दिवंगत अभिनेत्री की कुछ बातें आपके साथ बांटकर.

फिल्म जगत में अपने अभिनय और सौन्दर्य का जादू बिखेर एक मुकाम बनाने वाली अभिनेत्री लीला नायडू को कौन नहीं जानता. उनका फिल्मी सफर बहुत लम्बा तो नहीं था लेकिन उनके अभिनय की धार को "गागर में सागर" की तरह सराहा गया. लीला नायडू ने सन १९५४ में फेमिना मिस इंडिया का खिताब जीता था और "वोग" मैग्जीन ने उन्हें विश्व की सर्वश्रेष्ठ दस सुन्दरियों में स्थान दिया था.

लीला नायडू ने अपना फिल्मी सफर मशहूर फिल्मकार ह्रशिकेश मुखर्जी की फिल्म "अनुराधा" से शुरु किया. इस फिल्म में उन्होंने अभिनेता बलराज साहनी की पत्नि की भूमिका निभायी थी. अनुराधा फिल्म के द्वारा लीला नायडू के अभिनय को सराहा गया और फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिये राष्ट्रीय पुरुस्कार भी मिला. अपने छोटे से फिल्मी सफर में लीला नायडू ने उम्मींद, ये रास्ते हैं प्यार के, द गुरु, बागी और त्रिकाल जैसी फिल्मों में अभिनय किया. सन १९६३ में प्रदर्शित फिल्म "ये रास्ते हैं प्यार के" ने लीला नायडू को एक अलग पहचान दी. इस फिल्म में अभिनय के बाद वो नारी स्वतंत्रता की प्रतीक बन गयीं. सन १९६३ में ही उन्होंने आइवरी प्रोडक्शन की फिल्म "हाउसहोल्डर" में भी काम किया.

उनके व्यक्तिगत जीवन पर नजर डालें तो कहा जाता है कि वह अपने निजी जीवन में भी उन्मुक्त विचारों की थी. उनके पिता रमैया नायडू आन्ध्रप्रदेश के थे और न्यूक्लियर विभाग में फिजिसिस्ट थे. उनकी माँ फ्रांसिसी मूल की थीं. अपने फिल्मी कैरियर के दौरान ही लीला नायडू ने ओबेरॉय होटल के मालिक मोहन सिंह के बेटे विक्की ओबेरॉय से विवाह कर लिया. उनसे उनकी दो बेटियाँ हैं. बाद में विक्की ओबेरॉय से तलाक हो जाने के बाद लीला नायडू ने अंग्रेजी कवि डॉम मॉरेस से विवाह किया और उनके साथ लगभग दस वर्ष फ्रांस में रहीं. जब कोर्ट ने उनकी दोनों बेटियों का जिम्मा उनसे लेकर विक्की ओबेरॉय को दे दिया तो वह भारत चलीं आयीं. यहाँ लीला नायडू की मुलाकात दार्शनिक जे.कृष्णमूर्ति से हुई. उसके बाद वह आजीवन उन्हीं के साथ रहीं.

लंबे समय तक फिल्मों से दूर रहने के बाद सन १९८५ में श्याम बेनेगल की फिल्म "त्रिकाल" से उनकी बॉलीवुड में वापिसी हुई थी. इसके बाद सन १९९२ में वह निर्देशक प्रदीप कृष्ण की फिल्म "इलैक्ट्रिक मून" में नजर आयीं थीं. यह उनकी आंखिरी फिल्म थी.

कवि बिहारीलाल का एक दोहा है कि "सतसैया कए दोहरे ज्यों नाविक के तीर, देखन में छोटे लगें घाव करं गंभीर" यह दोहा लीला नायडू के छोटे फिल्मी सफर पर भी लागू होता है.लीला नायडू ने छोटे फिल्मी सफर में अपने अभिनय की जो छाप छोडी़ है वो न तो बॉलीवुड भुला सकता है और न ही उनके चाहने वाले. आइये हम सभी सौन्दर्य और अभिनय की देवी को श्रद्धांजंली दें.

अब ऐसा कैसे हो सकता है कि हम आपको लीला जी पर फिमाये गए कुछ नायाब और कुछ दुर्लभ गीत ना सुनाएँ, फिल्म "अनुराधा" (इस फिल्म में बेमिसाल संगीत दिया था पंडित रवि शंकर ने ) और "ये राते हैं प्यार के", दो ऐसी फिल्में हैं जिसमें लीला जी पर फिल्माए गीतों को हम कभी नहीं भूल सकते. चलिए सुनते हैं इन्हीं दो फिल्मों से कुछ नायाब गीत -

जाने जाँ पास आओ न (सुनील दत्त, आशा भोंसले, ये रास्ते हैं प्यार के )


ये रास्ते हैं प्यार के (आशा भोंसले, शीर्षक)


आज ये मेरी जिन्दगी (आशा भोंसले, ये रास्ते हैं प्यार के)


ये खामोशियाँ (रफी- आशा, ये रास्ते हैं प्यार के, एक बेहद खूबसूरत प्रेम गीत)


सांवरे सांवरे (लता, अनुराधा)


कैसे दिन बीते (लता, अनुराधा)


और एक ये बेहद दुर्लभ सा गीत भी सुनिए -
गुनाहों का दिया हक (ये रास्ते हैं प्यार के)


रक्षा बंधन पर हमने चाहा था कि आप अपने कुछ संस्मरण बांटे पर अधिकतर श्रोता शायद इस परिस्तिथि के लिए तैयार नहीं लगे, स्वप्न जी ने कुछ लिखा तो नहीं पर अपने भाई जो अब इस दुनिया में नहीं हैं उन्हें याद करते हुए उनके सबसे पसंदीदा गीत को सुनवाने की फरमाईश की है. हमें यकीन है कि उनके आज जहाँ कहीं भी होंगे अपनी बहन की श्रद्धाजंली को ज़रूर स्वीकार करेंगें -

कोई होता जिसको अपना (किशोर कुमार, मेरे अपने)


हमलोग शुरु से ही संयुक्त परिवार में रहे. परिवार में सगे रिश्तों के अलावा ऐसे रिश्तों की भी भीड़ रही जिनसे हमारा सीधा-सीधा कोई नाता न था. यानी कि हमारा एक भरा-भरा परिवार था. हमारे यहाँ सभी तीज-त्यौहार बहुत ही विधि विधान से मनाये जाते थे. रक्षाबंधन भी इन्हीं में से एक है. मुझे आज भी याद है क मेरे ताऊजी, पापाजी तथा चाचाजी किस तरह सुबह से ही एक लम्बी पूजा में शामिल होते थे और उस दौरान नया जनेऊ पहनना आदि रस्में की जाती थीं. तरह-तरह के पकवान बनते थे. लेकिन हम बच्चे सिर्फ उनकी खुशबू से अपना काम चलाते थे क्योंकि माँ बार-बार यह कहकर टाल देती थी कि अभी पूजा खत्म नही हुई है. पूजा के बाद राखी बाँधकर खाना खाया जायेगा. उस समय तो अपने क्या दूर-दूर के रिश्तेदार भी राखी बँधवाने आते थे. आज बहुत कुछ बदल गया है. अब तो सगे भाई को भी राखी बाँधने का मौका नहीं मिलता है. खैर चलिए चलते चलते सुनते चलें रंजना भाटिया जी की पसंद का ये गीत जो इस रक्षा बंधन पर आप सब की नज़र है-

चंदा रे मेरे भैया से कहना (लता, चम्बल की कसम)


सभी भाई -बहनों के लिए ये रक्षा बंधन का पर्व मंगलमय हो इसी उम्मीद के साथ मैं दिशा आप सब से लेती हूँ इजाज़त.

प्रस्तुति - दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Monday, July 27, 2009

जुलाई का पॉडकास्ट कवि सम्मेलन और बारिश की फुहारें

सुनिए ऑनलाइन कवि सम्मेलन का बारिश अंक

Rashmi Prabha
रश्मि प्रभा
Khushboo
खुश्बू
एक समय था जब हम महीने के नाम से मौसम का मिज़ाज बता सकते थे। उत्तर भारत में सावन का महीना झूलों का, छोटी-बड़ी नदियों में आई उफानों का, धान की रोपाई का महीना होता था- जैसे धरती हरे रंग का छाता लगा लेती थी। लेकिन मनुष्य के प्रकृति को जीतने की उत्कंठा और होड़ ने पूरी तस्वीर ही बदल दी। आलम यह कि जहाँ 20 मिलि॰ वर्षा होती थी वहाँ 500 मिलि॰ बारिश हो रही है और जहाँ बरसात न हो तो किसना खाना नहीं खाता, वहाँ सूखा पड़ा है। सूरत यह कि गुजरात के सौराष्ट्र में बाढ़ और जल-प्लावन का संकट है तो वहीं उत्तर प्रदेश के 20 जिलों को वहाँ की सरकार सूखा घोषित कर चुकी है। मौसम विज्ञानियों कि मानें तो मौसम के इस नये मिजाज़ को समझने की ज़रूरत है और यह मान लेने की ज़रूरत है कि जलवायु में 180 डिग्री का बदलाव आ चुका है। जितनी जल्दी समझेंगे, उतनी जल्दी शायद हम इस संकट से उबर पायेंगे।

इसीलिए हमने भी मौसम के जानकारों की मानने की सोची और इतनी विडम्बनाओं के बावज़ूद भी पॉडकास्ट कवि सम्मेलन का बारिश अंक लेकर हम आपके सामने उपस्थित हैं, जिसमें बारिश, सूखा और इससे जुड़ीं संवेदनाओं की 22 फुहारें हैं। इस बार के कवि सम्मेलन को हमारी इंजीनियर और इस कार्यक्रम की डेवलपर खुश्बू ने इसमें वीडियो का रंग भरा है। पूरे कार्यक्रम का स्लाइड शो बनाया है ताकि इसे केवल सुना ही नहीं, देखा भी जा सके। दृश्य-श्रव्य के इस युग में आवाज़ बिना चेहरे के अधूरी है। यह एक प्रयोग है जिसमें सजीव वीडियो का सुख तो नहीं है, फिर भी शुरूआत हो जाने का सुख है, संतोष है।

जब संचालिका रश्मि प्रभा ने हमें वीडियो बनाने का प्रस्ताव दिया तब हमें यह बहुत मुश्किल लगा। वो शायद इसलिए कि भारत में अधिकतर इंटरनेट प्रयोक्ताओं की नेट स्पीड इतनी कम होती है कि 10 मिनट का ऑडियो सुनना भी मुश्किल होता है, ऐसे में 60 मिनिट का वीडियो देखना खासा मुश्किल है। लेकिन उन्होंने कहा कि जमाना तकनीक का है और खुश्बू नये तकनीकी औज़ारों से फाइल साइज़ को इतना छोटा रखेंगी कि श्रोताओं को कोई परेशानी नहीं होगी। अब तो यह आप ही बतायेंगे कि हमारे इस प्रयोग से आप कितने खुश हैं। अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर दें कि हम इसमें किस तरह का बदलाव लायें।

वीडियो-


(कृपया इसे 10-15 मिनिट तक बफर हो जाने दें, फिर दुबारा प्ले करें)

यदि वीडियो देखने में परेशानी महसूस कर रहे हैं तो कृपया नीचे के प्लेयर से ऑडियो सुनें



प्रतिभागी कवि-सरस्वती प्रसाद, दीपाली पन्त तिवारी, रेणु सिन्हा, मंजुश्री, नीलम प्रभा, शेफाली पाण्डेय, कविता राठी, प्रीती मेहता, विनीता श्रीवास्तव, संगीता स्वरुप, कुसुम शर्मा, दिपाली 'आब' (कृति), कुलदीप अंजुम, संत शर्मा, शिखा वार्ष्णेय, ललित मोहन त्रिवेदी, रजिया अकबर मिर्जा, मुकेश कुमार पाण्डेय, शन्नो अग्रवाल, अम्बरीश श्रीवास्तव, महेंद्र भटनागर और नित्या शेफाली

संचालन- रश्मि प्रभा

तकनीक- खुश्बू


यदि आप इसे सुविधानुसार देखना-सुनना चाहते हैं तो कृपया नीचे के लिंकों से डाउनलोड करें-
वीडियोOGG क्वालिटीwmv मूल क्वालिटीMPEG 512kbps
ऑडियोWMAMP3




आप भी इस कवि सम्मेलन का हिस्सा बनें

1॰ अपनी साफ आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके भेजें।
2॰ जिस कविता की रिकॉर्डिंग आप भेज रहे हैं, उसे लिखित रूप में भी भेजें।
3॰ अधिकतम 10 वाक्यों का अपना परिचय भेजें, जिसमें पेशा, स्थान, अभिरूचियाँ ज़रूर अंकित करें।
4॰ अपना फोन नं॰ भी भेजें ताकि आवश्यकता पड़ने पर हम तुरंत संपर्क कर सकें।
5॰ कवितायें भेजते समय कृपया ध्यान रखें कि वे 128 kbps स्टीरेओ mp3 फॉर्मेट में हों और पृष्ठभूमि में कोई संगीत न हो।
6॰ उपर्युक्त सामग्री भेजने के लिए ईमेल पता- podcast.hindyugm@gmail.com
7.अगस्त अंक के लिए कविता की रिकॉर्डिंग भेजने की आखिरी तिथि- 20 अगस्त 2009
8. अगस्त अंक का पॉडकास्ट सम्मेलन रविवार, 30 अगस्त 2009 को प्रसारित होगा।


रिकॉर्डिंग करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। हमारे ऑनलाइन ट्यूटोरियल की मदद से आप सहज ही रिकॉर्डिंग कर सकेंगे। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

# Podcast Kavi Sammelan. Part 13. Month: July 2009.
कॉपीराइट सूचना: हिंद-युग्म और उसके सभी सह-संस्थानों पर प्रकाशित और प्रसारित रचनाओं, सामग्रियों पर रचनाकार और हिन्द-युग्म का सर्वाधिकार सुरक्षित है।

Sunday, June 28, 2009

नव पॉडकास्ट कवि सम्मेलन में 20 काव्य-रश्मियों की प्रभा

सुनिए ऑनलाइन कवि सम्मेलन का वार्षिक अंक

Rashmi Prabha
रश्मि प्रभा
पूरे भारत में गरमी अपना तांडव कर रही है। हर तरफ बस एक ही पुकार है कि अल्लाह मेघ दे, पानी दे। कभी-कभी हम जैसे भावुक हृदयवालों का मन होता है कि कहीं से खुदा को खोज निकालें और उससे विनती करें कि कृपया पानी दे दें। खैर फिलहाल हम तो आपके लिए एक ऐसी बारिश लाये हैं जिसमें आप अनुभूतियों की तरह-तरह की बूँदों से भीगेंगे। जी हाँ, आप सही समझे, गर्मी की मार से अल्पकालिक ही सही, एक राहत देने के लिए, हम लेकर हाज़िर हैं जून 2009 का पॉडकास्ट कवि सम्मेलन लेकर।

इस बार के इस कवि सम्मेलन में उचित मेघ का उचित समय पर बरसने का आह्वान किया है रश्मि प्रभा ने और इस बरसात की निरंतरता का प्रयोजन किया है खुश्बू ने। खुशी की बात है कि रश्मि प्रभा के प्रयास से इस कवि सम्मेलन में हर माह नये कवि जुड़ते जा रहे हैं। इस बार भी 9 प्रतिभागी पहली पार इस ऑनलाइन कवि सम्मेलन का हिस्सा बन रहे हैं।

पॉडकास्ट कवि सम्मेलन का यह 12वाँ अंक है। मतलब हिन्द-युग्म के इस आयोजन ने अपना एक वर्ष पूरा कर लिया है। इसमें हमारे श्रोताओं के प्रोत्साहन का बहुत योगदान रहा है।

बगैर लम्बी भूमिका के आपको सुनवाते हैं अपना वार्षिकांक कवि सम्मेलन-



प्रतिभागी कवि-सरस्वती प्रसाद, किरण सिन्धु, गौरव शर्मा, स्वप्न मंजूषा 'शैल', प्रीति मेहता, दीपाली आब, मनोज भावुक, अनिल मासूम शायर, संत कुमार शर्मा, अक्षय मन, दीपाली पन्त तिवारी, पारुल, ललित मोहन त्रिवेदी, नीरज गोस्वामी, प्रिया, संगीता स्वरुप, शिखा वार्ष्णेय, श्यामल सुमन, यायावर।

संचालन- रश्मि प्रभा

तकनीक- खुश्बू


यदि आप इस अंक को डाउनलोड करना चाहते हैं तो नीचे का लिंक इस्तेमाल करें
उच्च क्वालिटी का mp3 (90 kbps)निम्न क्वालिटी का wma (60 kbps)




आगामी कवि सम्मेलन 'बारिश' पर केंद्रित होगा

हम उम्मीद करते हैं कि जुलाई महीने की शुरूआत समूचे भारत में मानसून के आगत से होगी और आनेवाला सावन झूम-झूम बरसेगा। इसलिए हमने यह तय किया है कि जुलाई माह का पॉडकास्ट सम्मेलन 'बारिश' को ही समर्पित होगा। कृपया इस अंक में ज़रूर भाग लें। वर्षा, बरसात, बारिश आपके कवि-मन के किस तरह से छूती है, हम सुनना चाहते हैं।

1॰ अपनी आवाज़ में 'बारिश' विषय पर केंद्रित अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके भेजें।
2॰ जिस कविता की रिकॉर्डिंग आप भेज रहे हैं, उसे लिखित रूप में भी भेजें।
3॰ अधिकतम 10 वाक्यों का अपना परिचय भेजें, जिसमें पेशा, स्थान, अभिरूचियाँ ज़रूर अंकित करें।
4॰ अपना फोन नं॰ भी भेजें ताकि आवश्यकता पड़ने पर हम तुरंत संपर्क कर सकें।
5॰ कवितायें भेजते समय कृपया ध्यान रखें कि वे 128 kbps स्टीरेओ mp3 फॉर्मेट में हों और पृष्ठभूमि में कोई संगीत न हो।
6॰ उपर्युक्त सामग्री भेजने के लिए ईमेल पता- podcast.hindyugm@gmail.com
7.जुलाई अंक के लिए कविता की रिकॉर्डिंग भेजने की आखिरी तिथि- 18 जुलाई 2009
8. जुलाई अंक का पॉडकास्ट सम्मेलन रविवार, 26 जुलाई 2009 को प्रसारित होगा।


रिकॉर्डिंग करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। हमारे ऑनलाइन ट्यूटोरियल की मदद से आप सहज ही रिकॉर्डिंग कर सकेंगे। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

# Podcast Kavi Sammelan. Part 12. Month: June 2009.
कॉपीराइट सूचना: हिंद-युग्म और उसके सभी सह-संस्थानों पर प्रकाशित और प्रसारित रचनाओं, सामग्रियों पर रचनाकार और हिन्द-युग्म का सर्वाधिकार सुरक्षित है।

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