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Saturday, March 7, 2015

"हैंगोवर तेरी यादों का..." - क्यों सोनू निगम नहीं गा सके इस गीत को?


एक गीत सौ कहानियाँ - 54
 

हैंगओवर  तेरी यादों का...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तंभ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 54 वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'किक' के मशहूर गीत "हैंगओवर तेरी यादों का" से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें। 



"चांदी की डाल पर सोने का मोर..."
किसी फ़िल्मी गीत की सफलता में केवल गायक, गीतकार और संगीतकार की सफलता ही छुपी नहीं होती, बल्कि उस अभिनेता की सफलता भी छुपी होती है जिन पर वह गीत फ़िल्माया गया होता है। और यही कारण है कि कई अभिनेता अपने उपर फ़िल्माये जाने वाले गीतों को लेकर बहुत सचेतन होते हैं। गुज़रे ज़माने के नायकों में दो नाम हैं शम्मी कपूर और राजेश खन्ना, जो अपने फ़िल्मों के गीतों को लेकर बहुत सीरियस हुआ करते थे। सुनने में आता है कि ये दोनों अभिनेता गीतों के सिटिंग्पर पहुँच जाया करते थे और गीत की रचना प्रक्रिया में पूर्ण रूप से भाग भी लेते थे, अपने सुझाव देते थे। और यही वजह है कि शम्मी कपूर और राजेश खन्ना की फ़िल्मों के गाने सदा हिट हो जाया करते। फ़िल्म भले चले न चले, गानें ज़रूर चल पड़ते थे। नए ज़माने में एक नाम है सलमान ख़ान का जो अपनी फ़िल्मों के गीत-संगीत में गहन रुचि रखते हैं। 1990 और 2000 के दशकों में उनकी फ़िल्मों के गानें अपनी मेलडी के लिए लोगों में बेहद पॉपुलर हुआ करते थे, पर इस नए दशक में उनकी जितनी फ़िल्में आईं, उनके गीतों में मेलडी से ज़्यादा मसाला पाया जाने लगा है। इससे यह अहसास होता है कि अब सलमान ख़ान चाहते हैं कि ये गानें पब्लिक और यंग्जेनरेशन की ज़ुबाँ पर तुरन्त चढ़ जाये और डान्स पार्टियों की शान बनें। इस होड़ में मेलडी को शायद कम महत्व दिया जाने लगा है उनकी फ़िल्मों के गीतों में आजकल। ख़ैर, हाल में उनकी फ़िल्म आई 'किक' जिसके गाने इन दिनों धूम मचा रहे हैं उनकी पिछली फ़िल्मों ही की तरह। मिका सिंह का गाया "जुम्मे की रात है" नंबर वन पर है तो सलमान ख़ान का गाया "हैंगोवर तेरी यादों का" भी अपना जादू चला रहा है। यह सलमान ख़ान का गाया पहला गाना नहीं है। उन्होंने इससे पहले साल 1999 में फ़िल्म 'हेलो ब्रदर' में "चांदी की डाल पर सोने का मोर" गाया था। उस बार भले उनका उस गीत को गाना पूर्वनिर्धारित था, पर 'किक' का यह गीत उनकी झोली में अचानक ही आ गया।

बात कुछ इस तरह की थी कि "हैंगोवर" गीत के लिए सबसे पहले सोनू निगम को मौका दिया गया था। संगीतकार मीत ब्रदर्स अनजान और गीतकार कुमार ने निर्माता निर्देशक साजिद नडियाडवाला को सोनू निगम और श्रेया घोषाल का नाम सुझाया। साजिद ने हामी भी भर दी। गाना रिहर्स होकर सोनू की आवाज़ में रेकॉर्ड भी हो गया। पर होनी को कुछ और ही मंज़ूर था। साजिद ने किस वजह से सोनू के गाये गीत को रद्द करने का फ़ैसला लिया यह स्पष्ट होता है सोनू निगम के Times of India' दिए हुए एक साक्षात्कार में। सोनू कहते हैं, "amendment के महीनों बीत जाने के बाद भी लोग अब तक यह नहीं समझ पाए हैं कि Copyright Act में हम किस चीज़ के लिए लड़ाई लड़ रहे थे। सब मुझसे पूछते हैं, "तो आप म्युज़िक डिरेक्टर्स से रॉयल्टी ले रहे हैं?" जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था। कोई भी गायक किसी प्रोड्युसर या कम्पोज़र से रॉयल्टी नहीं ले सकता। 2012 में जो नया अमेन्डमेन्ट आया उसके अनुसार अगर किसी गायक का गाया गीत किसी सार्वजनिक स्थान पर बजाया जाता है जैसे कि रेस्तोराँ, लिफ़्ट, प्लेन आदि, तो उस गायक को 'पर्फ़ॉर्मैन्स रॉयल्टी' मिलनी चाहिए। यह रॉयल्टी गायक को सीधे नहीं बल्कि India Singers Rights Association (ISRA) को दी जायेगी, जो गायक तक पहुँचायेगी। अगर म्युज़िक कम्पोज़र का पैसा है, उसे रखो तुम अपने पास। मैं किसी और से ले रहा हूँ और कम्पोज़र को उससे भी प्रॉबलेम है। अब यह मेरी समझ नहीं आती। यह बस एक ईगो इश्यु बन गया है। हर कोई कॉनट्रैक्ट के नियमों और कानूनी मसलों से डरते हैं। कोई न कोई क्लॉज़ डाल देंगे जिसकी वजह से हम सिंगर्स, कम्पोज़र्स और लिरिसिस्ट्स जाल में फँस जाते हैं। इस बात पर बहस हर किसी ने किया पर मैं टारगेट बना क्योंकि मैं चुप नहीं रहा। और इस वजह से मेरे गाने डब होने शुरु हो गए। मेरे गाये हुए गाने दूसरे गायकों से दोबारा डब करवाये जाने लगे। ये "हैंगोवर" जो सलमान ने गाया है, वह पहले मैंने गाया था। मुझे इससे कोई प्रॉब्लेम नहीं, पर मैं ऐसा कोई कॉनट्रैक्ट साइन नहीं करना चाहता जो ग़ैर-कानूनी हो और जिसका कोई मतलब न बनता हो। पर एक कॉनट्रैक्ट्स बदल रहे हैं, और हाल में मैंने दो गीत गाये हैं।" इस तरह से सोनू का गाया "हैंगोवर" दोबारा सलमान की आवाज़ में रेकॉर्ड हुआ, और इसी तरह से फ़िल्म 'मैं तेरा हीरो' में भी सोनू का गाया "ग़लत बात है" री-डब किया गया जावेद अली की आवाज़ में।

मीत ब्रदर्स अनजान
अब सवाल यह उठता है कि "हैंगोवर" के लिए अगर सोनू नहीं तो फिर सलमान ही क्यों? क्यों नहीं किसी और प्रतिष्ठित गायक से गवाया गया यह गीत? बात दरसल ऐसी हुई कि सोनू के गाये गीत को शामिल ना किए जाने के बाद नए गायक की तलाश शुरू हुई, ऐसे में एक दिन सलमान ख़ान युंही इस गीत को गा रहे थे। उन्हें यह गीत गाता देख साजिद नडियाडवाला के मन में यह विचार आया कि क्यों न इसे सल्लु मियाँ से ही गवा लिया जाए। जैसे ही जनता को यह पता चलेगा कि सलमान ने इस गीत को गाया है, तो वह गीत तो वैसे ही हिट हो जाएगा। साजिद ने जब यह बात संगीतकार मीत ब्रदर्स अनजान को बताई तो मीत ब्रदर्स को भी सुझाव सही लगा। फिर शुरू हुआ सलमान को मनाने का काम। सलमान ने साफ़ कह दिया कि उन्हें कोई गाना-वाना नहीं आता और अगर सोनू नहीं तो किसी और गायक से इसे गवा लिया जाए। पर सब के समझाने पर और यह विश्वास दिलाने पर कि Melodyn और Antares जैसे सॉफ़्टवेर के द्वारा उनके गाए गीत को बिल्कुल सुरीला बनाया जा सकता है, सलमान मान गए। श्रेया घोषाल तो अपना हिस्सा पहले गा ही चुकी थीं, सलमान ख़ान ने भी गाया, और जब पूरा गाना बन कर मार्केट में आया तो तुरन्त हिट हो गया। Melodyn और Antares के ज़रिए अब कोई भी गाना गा सकता है। यहाँ तक कि गायक सिर्फ़ बोलों को पढ़ भी दे तो भी वो इनके ज़रिए सुरों में ढाल दिया जा सकता है। अत: अब प्रश्न यह उठता है कि क्या भविष्य में फ़िल्मी पार्श्वगायन के लिए गायकों की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी? अगर आवाज़ अच्छी है तो कोई भी पार्श्वगायक बन सकता है। पता नहीं यह अच्छा हो रहा है या ग़लत! पर सोनू निगम के साथ जो हुआ वह अच्छा नहीं था, इतना हम ज़रूर कह सकते हैं। बस इतनी सी है इस गीत के पीछे की दास्तान। लीजिए, अब आप वही गीत सुनिए।

फिल्म किक : 'हैंगओवर तेरी यादों का...' : सलमान खाँ और श्रेया घोषाल : गीतकार - कुमार 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Thursday, May 9, 2013

समाज-सुधार का दायित्व निभाती दो फिल्में


भारतीय सिनेमा के सौ साल – 44

कारवाँ सिने-संगीत का
1934 की दो फिल्में : ‘चण्डीदास’ और ‘अमृत मन्थन’


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘कारवाँ सिने संगीत का’ में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का दूसरा गुरुवार है और इस दिन हम ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ स्तम्भ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख करते हैं। आज के अंक में सुजॉय जी 1934 में ‘न्यू थिएटर्स’ की फिल्म ‘चण्डीदास’ और ‘प्रभात’ द्वारा निर्मित फिल्म ‘अमृत मन्थन’ का ज़िक्र कर रहे हैं। इन फिल्मों ने समाज में व्याप्त रूढ़ियों के विरुद्ध जनमानस को प्रेरित करने में अग्रणी भूमिका का निर्वहन किया था। 

सहगल
1934 की सबसे चर्चित फ़िल्म थी ‘न्यू थिएटर्स’ की ‘चण्डीदास’। उमा शशि के साथ सहगल की जोड़ी बनी और इस फ़िल्म ने चारों तरफ़ कामयाबी के परचम लहरा दिए। भले ही सहगल के पहले के गीत भी काफ़ी लोकप्रिय हुए थे, पर सही मायने में सहगल को स्टार ‘चण्डीदास’ ने ही बनाया। इस फ़िल्म को इससे पहले बांगला में 1932 में न्यू थिएटर्स ने ही बनाया था। ‘चण्डीदास’ कहानी है एक वैष्णव पुजारी-कवि की जो एक निम्न जाति की धोबन से प्रेम कर बैठता है। संगीतकार आर. सी. बोराल ने “प्रेम नगर में बनाऊँगी घर मैं” मुखड़े वाला सहगल और उमा शशि से जो युगल गीत गवाया था, वह मेरे ख़याल से फ़िल्म-संगीत के इतिहास का पहला सुपरहिट डुएट था। फ़िल्म के अन्य उल्लेखनीय गीतों में सहगल का “तड़पत बीते दिन रैन” और उमा शशि का “बसंत ऋतु आई आली फूल खिले डाले डाली” थे। पहाड़ी सान्याल ने भी इस फ़िल्म में गीत गाया था “छाई बसंत आई बसंत”। वैसे तो फ़िल्म के अधिकांश गीत भक्ति रस के थे, पर इन गीतों को सुन कर स्पष्ट पता लगता है कि फ़िल्मी गीत की शक्ल बदल रही थी। अब तक के गीत मूलत: शुद्ध शास्त्रीय संगीत या थिएटर संगीत पर आधारित हुआ करते थे, पर ‘चण्डीदास’ का संगीत आधुनिक फ़िल्म संगीत का ऐलान करता सुनाई दिया। ‘चण्डीदास’ के गीतों की ख़ासियत थी मंजीरा, खोल और मृदंग जैसे साज़ों का प्रयोग, जबकि अब तक केवल हारमोनियम और तबला ही सुनाई देते आ रहे थे। आग़ा हश्र कश्मीरी ने फ़िल्म के गीत लिखे। इसी वर्ष बोराल के संगीत में पहाड़ी सान्याल, पृथ्वीराज कपूर, सहगल, हुस्नबानो और उमा शशि अभिनीत ‘न्यू थिएटर्स’ की एक और फ़िल्म आई ‘डाकू मनसूर’। यह फ़िल्म उतनी नहीं चली और ना ही इसके गीत चले जो ज़्यादातर शायराना अंदाज़ के थे। बोराल ने प्रमथेश बरुआ निर्देशित फ़िल्म ‘रूपलेखा’ में भी संगीत दिया जिसमें सहगल का गाया “सब दिन होत न एक समान” बहुत लोकप्रिय हुआ था। लेकिन ‘डाकू मनसूर’ और ‘रूपलेखा’ के गीत ‘चण्डीदास’ के गीतों के आगे टिक न सके। आइए, अब हम आपको फिल्म ‘चण्डीदास’ का सहगल और उमा शशि का गाया सर्वाधिक लोकप्रिय गीत ‘प्रेम नगर में बनाऊँगी घर मैं...’ सुनवाते हैं।


फिल्म ‘चण्डीदास’ : ‘प्रेम नगर में बनाऊँगी घर मैं...’ : कुन्दनलाल सहगल और उमा शशि 



बसन्त देसाई
कोल्हापुर से पूना स्थानांतरित होने के बाद ‘प्रभात’ ने अपना नया ‘साउण्ड-प्रूफ़ स्टुडिओ’ बनाया और 1934 में बनाई ‘अमृत मंथन’। यही वह फ़िल्म थी जिसके संगीत ने गायिका-अभिनेत्री शांता आप्टे और संगीतकार केशवराव भोले को रातों रात कामयाबी के शिखर पर बिठा दिया। हिंदू धर्म के अनैतिक क्रूरता के विरुद्ध आवाज़ उठाती इस फ़िल्म ने बम्बई के ‘कृष्णा टॉकीज़’ में ‘सिलवर जुबिली’ मनाई और लगातार 29 सप्ताह चली। शांता आप्टे की आवाज़ में फ़िल्म के दो यादगार गीत हैं “रात आई है नया रंग जमाने के लिए, लेके आराम का पैग़ाम ज़माने के लिए” और “कमसीनी में दिल पे ग़म का बाढ़ है”। केशवराव का संगीत इस फ़िल्म में प्रयोगधर्मी था। वसंत देसाई, जो आगे चलकर शांताराम के मुख्य संगीतकार बने, इस फ़िल्म में एक गीत गाया था “सखी री श्याम बड़ो ढिठियारो”। वसंत देसाई नायक बनने ‘प्रभात’ में शांताराम के पास आये थे, तो उन्हें फ़िल्म-निर्माण के हर पहलू को जानने और परखने का सुझाव शांताराम ने दिया। उस प्रथम मुलाक़ात के बारे में वसंत देसाई ने एक मशहूर रेडिओ ब्रॉडकास्टर को कुछ इन शब्दों में बताया था– “अजी बस एक दिन यूंही सामने जाके खड़ा हो गया कि मुझे ऐक्टर बनना है। म्युज़िक तब कहाँ आता था? और वैसे भी फ़िल्मों में हर कोई पहले ऐक्टर बनने आता है। फिर बन जाता है टेक्निशियन, तो मैं भी बाल बढ़ाकर पहुँच गया ऐक्टर बनने। मगर एक कमी थी मुझमें, मैं दुबला पतला और छोटे कद का था जब कि वह स्टण्ट का ज़माना था। सब ऊँचे कद के पहलवान जैसे हुआ करते थे, छोटे कद के आदमी का काम नहीं था। शांताराम जी ने पूछा, 'क्या करना चाहते हो?' मैंने गर्दन हिलाकर बल दिखाये और कहा कि ऐक्टर बनना चाहता हूँ। उन्होंने मुझे सर से पाँव तक देखा और सोचा होगा कि लड़का पागल है। फिर मुझ पर तरस आ गया और बोले कि मैं तुम्हे रख लेता हूँ, मगर सब काम करना पड़ेगा, कल से आ जाओ स्टुडिओ में। मैं ऑफ़िस बॉय बन गया, नो पगार, मुफ़्त में 18-18 घंटे का काम। अरे, मालिक ख़ुद काम करते थे हमारे साथ, ॠषी आश्रम के जैसा था 'प्रभात'। उनका हमेशा से ऐसा है कि जैसा कहें वैसा फ़ौरन कर दो। और मैं भी उनकी हर बात मानता था, इसलिए मुझसे वो हमेशा ख़ुश रहते थे। जिस सेक्शन में कमी हो, अन्ना साहब मुझे फ़ौरन भेज देते, चाहे वह कैमरा सेक्शन हो या म्युज़िक डिपार्टमेण्ट। इसलिए आज मैं हर डिपार्टमेण्ट का काम जानता हूँ। मैं उनका ऐसिस्टैण्ट डिरेक्टर तक रहा हूँ। सिनेमा तकनीक में मैं उन्हें गुरु मानता हूँ। एक साल के बाद उन्होंने मेरी तनख्वाह सात रुपये से बढ़ाकर 45 रुपये कर दी, और बाद में तो यह समझ लीजिए, 'प्रभात' में सबसे ज़्यादा तनख्वाह हीरो चंद्रमोहन को और मुझे मिलती थी।" वापस आते हैं ‘अमृत मंथन’ पर, इस फ़िल्म ने व्ही. शांताराम को एक ऐसे सामाजिक फ़िल्मकार का दर्जा दिलवा दिया जो मनोरंजन के साथ साथ समाज की कुप्रथाओं के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है। इसके बाद शांताराम ने अपनी हर फ़िल्म में समाज को कोई न कोई सीख दी है। इस फ़िल्म में शांता आप्टे की उत्कृष्ट अभिनय के चलते फ़िल्म के विज्ञापन में लिखा गया- “Shanta Apte made 200000 persons shed tears at Krishna Talkies”. ‘अमृत मंथन’ का मराठी संस्करण महाराष्ट्र में ख़ूब चला तो इसके हिंदी संस्करण ने उत्तर भारत, पंजाब और लाहौर में धूम मचाई। आइए, अब इसी फिल्म का एक गीत “सखी री श्याम बड़ो ढिठियारो...” बसन्त देसाई के स्वर में सुनते हैं।


फिल्म ‘अमृत मन्थन’ : ‘सखी री श्याम बड़ो ढिठियारो...’ : बसन्त देसाई



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के अन्तर्गत आज हमने सुजॉय चटर्जी की इसी शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक के कुछ पृष्ठ उद्धरित किये हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के आगामी अंक में आपके लिए हम इस पुस्तक के कुछ और रोचक पृष्ठ लेकर उपस्थित होंगे। सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव के लिए radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Friday, May 3, 2013

भारतीय सिनेमा के सौ साल : विशेषांक


एक शताब्दी का हुआ भारतीय सिनेमा

‘राजा हरिश्चन्द्र’ से शुरू हुआ भारतीय सिनेमा का इतिहास



आज से ठीक एक शताब्दी पहले, आज के ही दिन अर्थात 3 मई, 1913 को विदेशी उपकरणों से बनी किन्तु भारतीय चिन्तन और संस्कृति के अनुकूल पहली भारतीय फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ का प्रदर्शन हुआ था। भारतीय सिनेमा के इतिहास में ढुंडिराज गोविन्द फालके, उपाख्य दादा साहेब फालके द्वारा निर्मित मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ को भारत के प्रथम कथा-चलचित्र का सम्मान प्राप्त है। इस चलचित्र का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन 3 मई, 1913 को गिरगाँव, मुम्बई स्थित तत्कालीन कोरोनेशन सिनेमा में किया गया था। इस ऐतिहासिक अवसर पर ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से सभी पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन है। आज के इस विशेष अंक में हम आपके लिए लेकर आए हैं, प्रथम भारतीय फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ का एक ऐतिहासिक और दुर्लभ वीडियो अंश। 

दादा साहेब फालके
पिछली एक शताब्दी में भारतीय जनजीवन पर सिनेमा का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा है। सामान्य जीवन के हर क्षेत्र को सिनेमा ने सर्वाधिक प्रभावित किया है। यहाँ तक कि सिनेमा ने हमारे खान-पान, रहन-सहन, रीति-रिवाजों, पहनावे आदि पर भी गहरा प्रभाव डाला है। परम्परागत भारतीय कला-विधाएँ प्रत्येक युग में अभिव्यक्ति की सशक्त माध्यम रही हैं। इन पारम्परिक कला-विधाओं में नए-नए प्रयोग होते रहे और इनका परिमार्जन भी होता रहा। कुछ विधाएँ कला और तकनीक के साथ संयुक्त होकर विकसित होती है। ऐसी ही एक कला-विधा है- सिनेमा, जिसमें नाट्य, संगीत और अन्यान्य ललित कलाओं के साथ-साथ यान्त्रिक कौशल का भी योगदान होता है। यह सुखद आश्चर्य का विषय है कि भारत में सिनेमा का विकास, विश्व-सिनेमा के लगभग साथ-साथ हुआ। बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में जब परदे पर चलती-फिरती तस्वीरों को देख पाना सम्भव हुआ तब भारत में भी इस नई विधा में प्रयोग आरम्भ हुआ। यन्त्र विदेशी, किन्तु कथानक, वेषभूषा और चरित्र विशुद्ध भारतीय, जनमानस के सुपरिचित थे। आवाज़ रहित सिनेमा के बावजूद दर्शक, सदियों से जनमानस में बसे पौराणिक चरित्रों को परदे पर देखते ही पहचान लेते थे।

कार्यरत फालके 
भारतीय सिनेमा के इतिहास में ढुंडिराज गोविन्द फालके, उपाख्य दादा साहेब फालके द्वारा निर्मित मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ को भारत के प्रथम कथा-चलचित्र का सम्मान प्राप्त है। इस चलचित्र का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन 3 मई, 1913 को गिरगाँव, मुम्बई स्थित तत्कालीन कोरोनेशन सिनेमा में किया गया था। इस प्रदर्शन तिथि के अनुसार आज के दिन अर्थात 3 मई, 2013 भारतीय सिनेमा का शताब्दी वर्ष पूर्ण हो चुका है। ‘राजा हरिश्चन्द्र’ भारत में और भारतीयों द्वारा निर्मित प्रथम मूक, पूर्णकालिक कथा-फिल्म थी। इस फिल्म के निर्माता, निर्देशक, पटकथा लेखक आदि सब कुछ दादा साहब फालके ही थे। अयोध्या के राजा सत्यवादी हरिश्चन्द्र की लोकप्रिय पौराणिक कथा पर आधारित तत्कालीन गुजराती नाटककार रणछोड़ भाई उदयराम का नाटक उन दिनों रंगमंच पर बेहद सफल हुआ था। फालके ने इसी नाटक को अपनी फिल्म की पटकथा के रूप में विकसित किया था। चालीस मिनट की इस फिल्म में राजा हरिश्चन्द्र की भूमिका दत्तात्रेय दामोदर दुबके, महारानी तारामती की भूमिका पुरुष अभिनेता सालुके और विश्वामित्र की भूमिका जी.वी. साने ने निभाई थी। उन दिनों नाटकों में नारी चरित्रों का निर्वहन पुरुष कलाकार ही किया करते थे। जब नाटकों में महिला कलाकारों का पदार्पण सामाजिक दृष्टि से अच्छा नहीं माना जाता था, तो भला फिल्मों के लिए महिला कलाकार कहाँ से उपलब्ध होतीं।

फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ के चरित्रों की वेषभूषा और भंगिमाओं पर तत्कालीन विश्वविख्यात चित्रकार राजा रवि वर्मा द्वारा सृजित पौराणिक चरित्रों के चित्रांकन का गहरा प्रभाव था। 40 मिनट की इस फिल्म की कुल लम्बाई लगभग 3700 फीट थी। फिल्म तैयार हो जाने के बाद 21अप्रैल, 1913 को मुम्बई (तत्कालीन बम्बई) के ग्राण्टरोड स्थित ओलम्पिया थियेटर में इसका प्रीमियर शो हुआ। फिल्म का प्रथम सार्वजनिक प्रदर्शन 3 मई, 1913 को गिरगाँव स्थित कोरोनेशन सिनेमा में किया गया था। परदे पर चलती-फिरती तस्वीरों को देखना दर्शकों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। ‘राजा हरिश्चन्द्र’ के इस प्रदर्शन से भारत में फिल्म निर्माण के द्वार खुल गए। आज इस ऐतिहासिक अवसर पर हम आपके लिए ‘यू-ट्यूब’ के सौजन्य से फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ का एक वीडियो प्रस्तुत कर रहे हैं। फिल्म के आरम्भिक भाग में दादा साहब फालके के व्यक्तित्व, तत्कालीन फिल्म निर्माण की विधि और कुछ मूक फिल्मों के दृश्य भी शामिल किए गए हैं।


वीडियो : प्रथम भारतीय फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ के कुछ सजीव दृश्य 



Raja Harishchandra is a 1913 silent Indian film directed and produced by Dadasaheb Phalke, and is the first full-length Indian feature film


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘भारतीय सिनेमा के सौ साल’ के अन्तर्गत आज हमने आपके लिए पहली भारतीय फिल्म 'राजा हरिश्चन्द्र' के साथ-साथ मूक युग की कुछ अन्य गतिविधियों के दृश्य प्रस्तुत किये। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। अपनी प्रतिक्रिया, समालोचना और सुझाव के लिए radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Thursday, April 25, 2013

कारवाँ सिने-संगीत का : 1933 की दो उल्लेखनीय फिल्में



भारतीय सिनेमा के सौ साल – 42

कारवाँ सिने-संगीत का

वाडिया मूवीटोन की फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ और हिमांशु राय की ‘कर्म’



भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘कारवाँ सिने संगीत का’ में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का चौथा गुरुवार है और इस दिन हम ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ स्तम्भ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख करते हैं। आज के अंक में सुजॉय जी 1933 में ‘वाडिया मूवीटोन’ के गठन और इसी संस्था द्वारा निर्मित फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ का ज़िक्र कर रहे हैं। इसके साथ ही देविका रानी और हिमांशु राय अभिनीत पहली ‘ऐंग्लो-इण्डियन’ को-प्रोडक्शन फ़िल्म ‘कर्म’ की चर्चा भी कर रहे हैं।

1933 की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही ‘वाडिया मूवीटोन’ का गठन। वाडिया भाइयों, जे. बी. एच. वाडिया और होमी वाडिया, ने इस कंपनी के ज़रिए स्टण्ट और ऐक्शन फ़िल्मों का दौर शुरु किया। दरअसल वाडिया भाइयों ने मूक फ़िल्मों के जौनर में ‘तूफ़ान मेल’ शीर्षक से एक लो-बजट थ्रिलर फ़िल्म बनाई थी, जिसे ख़ूब लोकप्रियता मिली थी। इसी सफलता से प्रेरित होकर इन दो भाइयों ने ‘वाडिया मूवीटोन’ का गठन किया और इस बैनर तले पहली सवाक फ़िल्म ‘लाल-ए-यमन’ 1933 में प्रदर्शित की। ऐक्शन फ़िल्मों में ज़्यादा गीतों की गुंजाइश नहीं होती है और इसी वजह से ‘वाडिया’ की फ़िल्मों में गीत-संगीत का पक्ष अन्य फ़िल्मों के मुक़ाबले कमज़ोर हुआ करता था। ज़बरदस्ती गीत डालने से थ्रिलर फ़िल्मों की रोचकता में कमी आती है, इस बात का वाडिया भाइयों को पूरा अहसास था, इसीलिए इस कंपनी ने बाद के वर्षों में संगीत-प्रधान लघु फ़िल्मों का अलग से निर्माण किया।
फिरोज दस्तूर 

इन लघु फ़िल्मों के ज़रिए कई संगीतज्ञों ने लोकप्रियता भी हासिल की, जिनमें शामिल थे अहमद जान थिरकवा, सखावत हुसैन ख़ान, हबीब ख़ान, मलिका पुखराज, बाल गंधर्व, ज़ोहराबाई अम्बालेवाली और फ़िरोज़ दस्तूर। दस्तूर ने पहली बार ‘लाल-ए-यमन’ में संगीतकार जोसेफ़ डेविड के निर्देशन में गीत गाये जिनमें शामिल थे “अब नहीं धरत धीर”, “जाओ सिधारो फ़तेह पाओ”, “खालिक तोरी नजरिया”, “मशहूर थे जहाँ में जो”, “तसवीर-ए-ग़म बना हूँ” और “तोरी हरदम परवर आस” आदि। फ़िल्म के संगीतकार मास्टर मोहम्मद ने इस फ़िल्म में एक सूफ़ी फ़कीर की भूमिका निभाने के अतिरिक्त “गाफ़िल बंदे कुछ सोच ज़रा” गीत भी गाया। अब हम आपको फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ से फिरोज दस्तूर का गाया गीत- ‘मशहूर थे जहाँ में...’ सुनवाते हैं।


फिल्म लाल-ए-यमन : ‘मशहूर थे जहाँ में...’ : फिरोज दस्तूर



अभिनेत्री सरदार अख़्तर अभिनीत पहली फ़िल्म 1933 में बनी, ‘ईद का चांद’ शीर्षक से ‘सरोज मूवीटोन’ के बैनर तले। पिछले वर्ष की तरह सुंदर दास भाटिया का संगीत ‘सरोज’ की फ़िल्मों में सुनने को मिला। संवाद व गीतकार के रूप में अब्बास अली और एम. एस. शम्स ने इस फ़िल्म में काम किया था। हरिश्चन्द्र बाली, जो ख़ुद एक संगीतकार थे, सरदार अख़्तर के साथ फ़िल्म ‘नक्श-ए-सुलेमानी’ में अभिनय किया। सुंदर दास के ही संगीत में ‘सरोज’ की एक और उल्लेखनीय फ़िल्में रही ‘रूप बसंत’ जिसके गीतकार थे मुन्शी ‘शम्स’। इन सभी फ़िल्मों में गुजराती नाट्य जगत से आये गायक अशरफ़ ख़ान ने कई गीत गाये जो लोगों को ख़ूब भाये।

देविका रानी और हिमांशु रॉय 
‘कर्म’ पहली भारतीय बोलती फ़िल्म थी जिसका प्रदर्शन इंग्लैण्ड में हुआ था। इसके अंग्रेज़ी संस्करण का शीर्षक था ‘फ़ेट’। देविका रानी और हिमांशु राय अभिनीत यह फ़िल्म एक ‘ऐंग्लो-इण्डियन’ को-प्रोडक्शन फ़िल्म थी जिसका प्रीमियर लंदन में 1933 के मई के महीने में हुआ था। इसका हिन्दी संस्करण 27 जनवरी, 1934 को बम्बई में रिलीज़ हुआ था। ‘कर्म’ के संगीतकार थे अर्नेस्ट ब्रॉदहर्स्ट, जिन्होंने देविका रानी से एक अंग्रेज़ी गीत “now the moon her light has shed” भी गवाया था। टैगोर ख़ानदान से ताल्लुक रखने वाली देविका रानी, जिन्हें ‘फ़र्स्ट लेडी ऑफ़ इण्डियन स्क्रीन’ की उपाधि दी जाती है, लंदन के ‘रॉयल अकादमी ऑफ़ आर्ट ऐण्ड म्युज़िक’ गई थीं पढ़ाई के सिलसिले में। वहाँ उनकी मुलाक़ात हिमांशु राय से हुई और उनसे शादी कर ली। 1929 की मूक फ़िल्म ‘प्रपांच पाश’ में देविका रानी एक ‘फ़ैशन डिज़ाइनर’ के रूप में काम किया, जिसके लिए दुनिया भर में उनके काम को सराहा गया। ‘प्रपांच पाश’ और ‘कर्म’ के बाद देविका और हिमांशु भारत चले आये और 1934 में गठन किया ‘बॉम्बे टॉकीज़’ का। इस बैनर तले बहुत सारी कामयाब फ़िल्मों का निर्माण हुआ, बहुत से कलाकारों (जिनमें अभिनेता, निर्देशक, गीतकार, संगीतकार शामिल हैं) को ब्रेक दिया जो आगे चलकर भारतीय सिनेमा के स्तंभ कलाकार बने। फ़िल्म-संगीत को भी एक नया आयाम देने का श्रेय ‘बॉम्बे टॉकीज़’ को दिया जा सकता है। ‘बॉम्बे टॉकीज़’ को पहली भारतीय ‘पब्लिक लिमिटेड “फ़िल्म” कंपनी’ होने का गौरव प्राप्त है। लीजिए, अब आप फिल्म ‘कर्म’ का एक दुर्लभ गीत सुनिए।


फिल्म कर्म : ‘मेरे हाथ में तेरा हाथ रहे...’ : संगीतकार - अर्नेस्ट ब्रॉदहर्स्ट




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के अन्तर्गत आज हमने सुजॉय चटर्जी की इसी शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक के कुछ पृष्ठ उद्धरित किये हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के आगामी अंक में आपके लिए हम इस पुस्तक के कुछ और रोचक पृष्ठ लेकर उपस्थित होंगे। सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव के लिए radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें। 


शोध व आलेख सुजॉय चटर्जी

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Thursday, March 28, 2013

तन रंग लो जी आज मन रंग लो... होली के गीतों से तन मन भीगोने वाला गीतकार




भारतीय सिनेमा के सौ साल – 40
कारवाँ सिने-संगीत का 

होली के हजारों रंग भरने वाले गीतकार शकील बदायूनी के सुपुत्र जावेद बदायूनी से बातचीत

‘लाई है हज़ारों रंग होली...’


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘कारवाँ सिने संगीत का’ में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का रस-रंग के उल्लासपूर्ण परिवेश में हार्दिक स्वागत है। आज माह का चौथा गुरुवार है और इस दिन हम ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ स्तम्भ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख करते हैं। परन्तु आज होली पर्व के विशेष अवसर के कारण हम दो वर्ष पूर्व सुजॉय चटर्जी द्वारा सुप्रसिद्ध गीतकार शकील बदायूनी के बेटे जावेद बदायूनी से की गई बातचीत का पुनर्प्रकाशन कर रहे हैं। आप जानते ही हैं कि शकील बदायूनी ने फिल्मों में कई लोकप्रिय होली गीत रचे थे, जो आज भी गाये-गुनगुनाए जाते हैं। 

होली है!!! 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के दोस्तों, नमस्कार, और आप सभी को रंगीन पर्व होली पर हमारी ढेर सारी शुभकामनाएँ। तो कैसा रहा होली का दिन? ख़ूब मस्ती की न? हमनें भी की। हमारी टोली दिन भर रंग उड़ेलते हुए, मौज-मस्ती करते हुए, लोगों को शुभकामनाएँ देते हुए, अब दिन ढलने पर आ पहुँचे हैं एक मशहूर शायर व गीतकार के बेटे के दर पर। ये उस अज़ीम शायर के बेटे हैं, जिस शायर नें अदबी शायरी के साथ-साथ फिल्म-संगीत में भी अपना अमूल्य योगदान दिया। हम आये हैं, शक़ील बदायूनी के साहबज़ादे जावेद बदायूनी के पास, उनके पिता के बारे में थोड़ा और क़रीब से जानने के लिए। इस बातचीत के साथ ही हम शक़ील साहब के लिखे कुछ बेमिसाल होली गीत भी आपको सुनवायेंगे।

सुजॊय- जावेद बदायूनी साहब, नमस्कार, और 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' परिवार की तरफ़ से आपको और आपके परिवार को होली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।

जावेद- बहुत-बहुत शुक्रिया, और आपको भी होली की शुभकामनाएँ।

सुजॊय- आज का दिन बड़ा ही रंगीन है और हमें बेहद ख़ुशी है कि आज के दिन आप हमारे पाठकों से रू-ब-रू हो रहे हैं।

जावेद- मुझे भी बेहद खुशी है, अपने पिता के बारे में कुछ बताने का मौका पाकर। 
 
सुजॊय- जावेद साहब, इससे पहले कि मैं आप से शक़ील साहब के बारे में कुछ पूछूँ, मैं यह बताना चाहूँगा कि उन्होंने कुछ शानदार होली गीत लिखे हैं, जिनका शुमार सर्वश्रेष्ठ होली गीतों में होता है। ऐसा ही एक होली गीत है फ़िल्म 'मदर इण्डिया' का, "होली आई रे कन्हाई, रंग छलके, सुना दे जरा बाँसुरी...”। आइए, शमशाद बेगम की आवाज़ में इस गीत को पहले सुनते हैं, फिर बातचीत को आगे बढ़ाते हैं।

जावेद- जरूर साहब, सुनवाइए। 


फिल्म मदर इण्डिया : ‘होली आई रे कन्हाई रंग बरसे...' : शमशाद बेगम और साथी



सुजॊय- जावेद साहब, यह बताइए कि जब आप छोटे थे, तब पिता के रूप में शक़ील साहब का बरताव कैसा हुआ करता था? घर-परिवार का माहौल कैसा था?

जावेद- एक पिता के रूप में उनका व्यवहार दोस्ताना हुआ करता था और सिर्फ मेरे साथ ही नहीं, अपने सभी बच्चों को बहुत प्यार करते थे और सबसे हँस-खेल कर बातें करते थे। यानी कि घर का माहौल बड़ा ही ख़ुशनुमा हुआ करता था।

सुजॊय- जावेद जी, घर पर शायरों का आना जाना लगा रहता होगा?

जावेद- जी हाँ, बिलकुल। शक़ील साहब के दोस्त लोगों का आना-जाना लगा ही रहता था, जिनमें बहुत से शायर भी होते थे। घर पर ही शेर-ओ-शायरी की बैठकें हुआ करती थीं।

सुजॊय- जावेद साहब, शक़ील साहब के अपने एक पुराने इंटरव्यु में ऐसा कहा था कि उनके करीयर को चार पड़ावों में विभाजित किया जा सकता है। पहले भाग में 1916 से 1936 का समय जब वे बदायूँ में रहा करते थे। फिर 1936 से 1942 का समय अलीगढ़ का और फिर 1942 से 1946 तक दिल्ली का उनका समय। और अन्त में 1946 के बाद बम्बई का सफ़र। हमें उनकी फ़िल्मी करीयर, यानी कि बम्बई के जीवन के बारे में तो फिर भी पता है, क्या आप पहले तीन के बारे में कुछ बता सकते हैं?

जावेद- बदायूँ में जन्म और बचपन की दहलीज़ पार करने के बाद शकील साहब ने अलीगढ़ से अपनी ग्रैजुएशन पूरी की और दिल्ली चले गये, और वहाँ पर एक सरकारी नौकरी कर ली। साथ ही साथ अपने अंदर शेर-ओ-शायरी के जज्बे को कायम रखा और मुशायरों में भाग लेते रहे। ऐसे ही किसी एक मुशायरे में नौशाद साहब और ए.आर. कारदार साहब भी गए थे। उन्होने शकील साहब को नज़्म पढ़ते हुए सुना। उन पर शक़ील साहब की शायरी का इतना असर हुआ कि उसी वक़्त उन्हें फ़िल्म 'दर्द' के सभी गानें लिखने का ऒफ़र दे दिया।

सुजॊय- 'दर्द' का कौन सा गीत सबसे पहले उन्होंने लिखा होगा, इसके बारे में कुछ बता सकते हैं?

जावेद- उनका लिखा ‘हम दर्द का फसाना...’ पहला गीत था, और दूसरा गाना था ‘अफसाना लिख रही हूँ...’, उमा देवी का गाया हुआ।

सुजॊय- इस दूसरे गीत को हम अपने श्रोताओं को सुनवा चुके हैं। क्योंकि आज होली का अवसर है, आइए यहाँ पर शक़ील साहब का लिखा हुआ एक और शानदार होली गीत सुनते हैं। फ़िल्म 'कोहिनूर' से जिसका संगीत नौशाद साहब ने तैयार किया था।

जावेद- ज़रूर सुनवाइए।


फिल्म कोहिनूर : ‘तन रंग लो जी आज मन रंग लो...’ : मोहम्मद रफी और साथी


सुजॊय- जावेद साहब, क्या शक़ील साहब कभी आप भाई-बहनों को प्रोत्साहित किया करते थे लिखने के लिए?

जावेद- जी हाँ, वो प्रोत्साहित भी करते थे और जब हम कुछ लिख कर उन्हें दिखाते तो वो ग़लतियों को सुधार भी दिया करते थे।

सुजॊय- शक़ील बदायूनी और नौशाद अली, जैसे एक ही सिक्के के दो पहलू थे। ये दोनों एक दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त भी थे। क्या शक़ील साहब आप सब को नौशाद साहब और उस दोस्ती के बारे में बताया करते थे? या फिर इन दोनों से जुड़ी कोई यादगार घटना या वाकया याद है आपको?

जावेद- यह हक़ीक़त है कि शकील साहब और नौशाद साहब ग्रेटेस्ट फ्रेंड थे। शक़ील साहब, नौशाद साहब के साथ अपने परिवार से भी ज़्यादा वक़्त बिताया करते थे। दोनों के आपस की ट्युनिंग् ग़ज़ब की थी और यह ट्युनिंग इनके गीतों से साफ़ झलकती है। शक़ील साहब के गुज़र जाने के बाद भी नौशाद साहब हमारे घर आते रहते थे और हमारा हौसला-अफ़ज़ाई करते थे। यहाँ तक कि नौशाद साहब हमें बताते थे कि ग़ज़ल और नज़्म किस तरह से पढ़ी जाती है और मैं जो कुछ भी लिखता था, वो उन्हें सुधार दिया करते थे।

सुजॊय - यानी कि शक़ील साहब एक पिता के रूप में जिस तरह से आपको गाइड करते थे, उनके जाने के बाद वही किरदार नौशाद साहब ने निभाया और आपको पिता के समान स्नेह दिया।

जावेद- इसमें कोई शक नहीं।

सुजॊय- जावेद साहब, बचपन की कई यादें ऐसी होती हैं जो हमारे मन-मस्तिष्क में अमिट छाप छोड़ जाती हैं। शक़ील साहब से जुड़ी आप के मन में भी कई स्मृतियाँ होंगी। उन स्मृतियों में से कुछ आप हमारे साथ बाँटना चाहेंगे?

जावेद- शकील साहब के हम सब प्रायः रेकार्डिंग पर जाया करते थे और कभी-कभी तो वो हमें शूटिंग् पर भी ले जाते। फ़िल्म 'राम और श्याम' के लिए वो हमें मद्रास ले गये थे। 'दो बदन', 'नूरजहाँ' और कुछ और फ़िल्मों की शूटिंग् पर हम सब गये थे। वो सब यादें अब भी हमारे मन में ताज़ा हैं जो बहुत याद आते हैं।

सुजॊय- अब मैं आपसे जानना चाहूँगा कि शक़ील साहब के लिखे कौन कौन से गीत आपको व्यक्तिगत तौर पे सब से ज़्यादा पसंद हैं?

जावेद- उनके लिखे सभी गीत अपने आप में मासटरपीस हैं, चाहे किसी भी संगीतकार के लिए लिखे गये हों।

सुजॊय- निस्सन्देह।

जावेद- यह बता पाना नामुमकिन है कि कौन सा गीत सर्वोत्तम है। मैं कुछ फ़िल्मों के नाम ज़रूर ले सकता हूँ, जैसे कि 'मदर इण्डिया', 'गंगा जमुना', 'बैजु बावरा', 'चौदहवीं का चांद', 'साहब बीवी और ग़ुलाम', और ‘मुगल-ए-आजम’।

सुजॊय- वाह! आपने फिल्म मुगल-ए-आजम का ज़िक्र किया, और आज हम आप से शक़ील साहब के बारे में बातचीत करते हुए उनके लिखे कुछ होली गीत सुन ही रहे हैं, तो मुझे एकदम से याद आया कि इस फ़िल्म में भी एक ऐसा गीत है जिसे हम पूर्णतः होली गीत तो नहीं कह सकते, लेकिन क्योंकि उसमें राधा और कृष्ण के छेदछाड़ का वर्णन है इसलिए इसे यहाँ पर बजाया जा सकता है। मूलतः यह गीत लखनऊ कथक घराने के संस्थापक बिंदादीन महाराज की एक ठुमरी रचना है, जिसे फिल्म के नृत्य निर्देशक लच्छू महाराज और संगीत निर्देशक नौशाद ने शकील साहब से फिल्म के लिए पुनर्लेखन कराया था।

जावेद- जी बिलकुल ठीक फरमाया आपने। सुनने वालों को यह होली गीत जरूर सुनवाइये।


फिल्म मुगल-ए-आजम : ‘मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे...’ : लता मंगेशकर और साथी


सुजॊय- अच्छा जावेद साहब, हम शक़ील साहब के लिखे गीतों को हर रोज़ ही कहीं न कहीं से सुनते हैं, लेकिन उनके लिखे गैर-फिल्मी नज़मों और गज़लों को कम ही सुना जाता है। इसलिए मैं आप से उनकी लिखी अदबी शायरी और प्रकाशनों के बारे में जानना चाहूँगा।

जावेद- मैं आपको बताऊँ कि भले ही वो फ़िल्मी गीतकार के रूप में ज़्यादा जाने जाते हैं, लेकिन हक़ीक़त में पहले वो एक लिटररी फ़िगर थे और बाद में फ़िल्मी गीतकार। फ़िल्मों में गीत लेखन वो अपने परिवार को चलाने के लिये किया करते थे। जहाँ तक ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं का सवाल है, उन्होंने ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लों के पाँच दीवान लिखे हैं, जिनका अब ‘कुलयात-ए- शकील’ के नाम से संकलन प्रकाशित हुआ है। उन्होंने अपने जीवन काल में 500 से ज़्यादा ग़ज़लें और नज़्में लिखे होंगे जिन्हें आज भारत, पाक़िस्तान और दुनिया भर के देशों के गायक गाते हैं।

सुजॊय- आपने आँकड़ा बताया तो मुझे याद आया कि हमनें आप से शक़ील साहब के लिखे फ़िल्मी गीतों की संख्या नहीं पूछी। कोई अंदाज़ा है आपको कि शक़ील साहब ने कुल कितने फ़िल्मी गीत लिखे होंगे?

जावेद- उन्होने 108 फिल्मों में लगभग 800 गीत लिखे थे। इनमें से 5 फिल्में अनरिलीज़्ड भी हैं।

सुजॊय- वाह! जावेद साहब, यहाँ पर हम शक़ील साहब का लिखा एक और बेहतरीन होली गीत सुनना और सुनवाना चाहेंगे। नौशाद साहब के अलावा जिन संगीतकारों के साथ उन्होंने काम किया, उनमें एक महत्वपूर्ण नाम है रवि साहब का। अभी कुछ देर पहले आपने 'दो बदन' और 'चौदहवीं का चाँद' फ़िल्मों का नाम लिया जिनमें रवि का संगीत था। तो रवि साहब के ही संगीत में शक़ील साहब नें फ़िल्म 'फूल और पत्थर' के भी गीत लिखे जिनमें एक होली गीत था- ‘लाई है हज़ारों रंग होली, कोई तन के लिये, कोई मन के लिए...’ आइए सुनते हैं इस गीत को।


फिल्म फूल और पत्थर : ‘लाई है हज़ारों रंग होली...’ : आशा भोसले और साथी


सुजॊय- अच्छा जावेद साहब, अब एक आख़िरी सवाल आप से। शक़ील साहब नें जो मशाल जलाई है, क्या उस मशाल को आप या परिवार का कोई और सदस्य उसे आगे बढ़ाने में इच्छुक हैं?

जावेद- मेरी बड़ी बहन रज़ीज़ को पिता जी के गुण मिले हैं और वो बहुत खूबसूरत शायरी करती हैं।

सुजॊय- बहुत-बहुत शुक्रिया जावेद साहब। होली के इस रंगीन पर्व को आप ने शक़ील साहब की यादों से और भी रंगीन किया, और साथ ही उनके लिखे होली गीतों को सुन कर मन ख़ुश हो गया। भविष्य में हम आपसे शक़ील साहब की शख्सियत के कुछ अनछुये पहलुओं पर चर्चा करना चाहेंगे। आपको एक बार फिर होली की हार्दिक शुभकामना देते हुए अब विदा लेते हैं, नमस्कार।

जावेद- आपको और सभी पाठकों / श्रोताओं का बहुत-बहुत शुक्रिया और होली की मुबारकबाद अदा करता हूँ।

तो दोस्तों, होली पर ये थी 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की ख़ास प्रस्तुति जिसमें हमनें शक़ील बदायूनी के लिखे होली गीत सुनने के साथ-साथ थोड़ी बातचीत की, उन्हीं के बेटे जावेद बदायूनी से। आपको आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव हमें भेजने के लिए  radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें। आप सभी को एक बार फिर होली की हार्दिक शुभकामनाएँ, नमस्कार!

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