Sunday, December 31, 2017

ठुमरी तिलंग : SWARGOSHTHI – 350 : THUMARI TILANG




स्वरगोष्ठी – 350 में आज

फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व – 7 : समापन कड़ी में तिलंग की ठुमरी

पाश्चात्य संगीत के भराव के साथ ठुमरी - "सजन संग काहे नेहा लगाए..."




लता मंगेशकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की इस सातवीं और समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला में हमने आपके लिए फिल्मों में पारम्परिक ठुमरी के साथ-साथ उसके फिल्मी प्रयोग को भी रेखांकित किया था। इस श्रृंखला में भी हमने आपसे केवल फिल्मी ठुमरियों पर ही चर्चा की है, किन्तु ये ठुमरियाँ पारम्परिक रही हों, यह आवश्यक नहीं हैं। इन ठुमरी गीतों को फिल्मों के प्रसिद्ध गीतकारों ने लिखा है और संगीतकारों ने इन्हें विभिन्न रागों में बाँध कर ठुमरी गायकी के तत्वों से अभिसिंचित किया है। हमारी इस श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल किये गए ऐसे गीत हैं जिनमे राग, भाव और रस की दृष्टि से उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी के तत्वों का उपयोग हुआ है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में अनेकानेक ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे पाँचवें और छठे दशक की ऐसी ही कुछ गैर-पारम्परिक चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात कर रहे हैं। आज हम आपके लिए जो ठुमरी गीत प्रस्तुत करने जा रहें हैं, वह एक पारम्परिक ठुमरी को आधार बना कर रची गई है। आज की ठुमरी में हारमोनियम की ही नहीं बल्कि अन्य कई पाश्चात्य वाद्यों की भी संगति की गई है। राज कपूर, माला सिन्हा, मुबारक और लीला चिटनिस द्वारा अभिनीत फिल्म "मैं नशे में हूँ" के एक प्रसंग में संगीतकार शंकर जयकिशन ने ठुमरी अंग में इस गीत का संगीत संयोजन किया है। लता मंगेशकर के गाये इस ठुमरी गीत का मुखड़ा तो एक पारम्परिक ठुमरी -"सजन संग काहे नेहा लगाए..." का है लेकिन दोनों अन्तरे गीतकार हसरत जयपुरी ने फिल्म के नायक के चरित्र के अनुकूल, परम्परागत ठुमरी की शब्दावली में रचे हैं।


ध्यकाल में ठुमरी तवायफ़ों के कोठों सहित रईसों और जमींदारों की छोटी-छोटी महफ़िलों में फलती-फूलती रही। इस समय तक ठुमरी गायन की तीन प्रकार की उप-शैलियाँ विकसित हो चुकी थी। नृत्य के साथ गायी जाने वाली ठुमरियों में लय और ताल का विशेष महत्त्व होने के कारण ऐसी ठुमरियों को "बन्दिश" या "बोल-बाँट" की ठुमरी कहा जाने लगा। इस प्रकार की ठुमरियाँ छोटे ख़याल से मिलती-जुलती होती हैं, जिसमे शब्द का महत्त्व बढ़ जाता है। ऐसी ठुमरियों को सुनते समय ऐसा लगता है, मानो तराने पर बोल रख दिए गए हों। ठुमरी का दूसरा प्रकार जो विकसित हुआ उसे "बोल-बनाव" की ठुमरी का नाम मिला। ऐसी ठुमरियों में शब्द कम और स्वरों का प्रसार अधिक होता है। गायक या गायिका कुछ शब्दों को चुन कर उसे अलग-अलग अन्दाज़ में प्रस्तुत करते हैं। धीमी लय से आरम्भ होने वाली इस प्रकार की ठुमरी का समापन द्रुत लय में कहरवा की लग्गी से किया जाता है। ठुमरी के यह दोनों प्रकार "पूरब अंग" की ठुमरी कहे जाते हैं। एक अन्य प्रकार की ठुमरी भी प्रचलन में आई, जिसे "पंजाब अंग" की ठुमरी कहा गया। ऐसी ठुमरियों को प्रचलित करने का श्रेय बड़े गुलाम अली खाँ, उनके भाई बरकत अली खाँ और नजाकत-सलामत अली खाँ को दिया जाता है। ऐसी ठुमरियों में "टप्पा" जैसी छोटी- छोटी तानों का काम अधिक होता है।

ठुमरी के साथ हमोनियम की संगति बीसवीं शताब्दी के आरम्भ से ही शुरू हो गई थी। पिछली कड़ियों में हमने हारमोनियम पर ठुमरी बजाने में दक्ष कलाकार भैया गणपत राव की चर्चा की थी। आज की कड़ी में हम उस समय के कुछ और हारमोनियम वादकों की चर्चा करेंगे। बनारस के लक्ष्मणदास मुनीम (मुनीम जी), इस पाश्चात्य वाद्य पर गत और तोड़े बेजोड़ बजाते थे। राजा नवाब अली भी हारमोनियम पर रागों कि व्याख्या कुशलता से करते थे। इलाहाबाद के नीलू बाबू भी बहुत अच्छा हारमोनियम बजाते थे। ठुमरी और हारमोनियम का चोली-दामन का साथ रहा है।

आज जो ठुमरी हम आपको सुनवाने जा रहे हैं उसमें हारमोनियम की ही नहीं बल्कि अन्य कई पाश्चात्य वाद्यों की भी संगति की गई है। राज कपूर, माला सिन्हा, मुबारक और लीला चिटनिस द्वारा अभिनीत फिल्म "मैं नशे में हूँ" के एक प्रसंग में संगीतकार शंकर जयकिशन ने ठुमरी अंग में इस गीत का संगीत संयोजन किया है। लता मंगेशकर के गाये इस ठुमरी गीत का मुखड़ा तो एक पारम्परिक ठुमरी -"सजन संग काहे नेहा लगाए..." का है लेकिन दोनों अन्तरे गीतकार हसरत जयपुरी ने फिल्म के नायक के चरित्र के अनुकूल, परम्परागत ठुमरी की शब्दावली में रचे हैं। फिल्म के कथानक और प्रसंग के अनुसार इस ठुमरी के माध्यम से नायक (राज कपूर) और नायिका (माला सिन्हा) के परस्पर विरोधी सोच को दिखाना था। इसीलिए दोनों अन्तरों से पहले तेज लय में पाश्चात्य संगीत के दो अंश डाले गए हैं। शेष पूरा गीत ठहराव लिये हुए बोल- बनाव की ठुमरी की शक्ल में है। गीत में भारतीय और पाश्चात्य संगीत के समानान्तर प्रयोग से दर्शकों और श्रोताओं को बेहतर संगीत चुनने का अवसर देना भी प्रतीत होता है। स्वर-साधिका लता मंगेशकर ने उलाहना भाव से भरी इस ठुमरी में करुण रस का स्पर्श देकर गीत को अविस्मरणीय बना दिया है। राग तिलंग में निबद्ध होने से ठुमरी का भाव और अधिक मुखरित हुआ है। वर्ष 2017 को विदायी देते हुए आइए, सुनते हैं, रस से भरी यह ठुमरी।

ठुमरी तिलंग : "सजन संग काहे नेहा लगाए..." : लता मंगेशकर : फिल्म – मैं नशे में हूँ




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के अगले दो अंक 351 और 352, संगीत पहेली के महाविजेताओं की प्रस्तुतियों पर केन्द्रित होगा, अतः आज के अंक और अगले अंक में हम आपसे पहेली का कोई प्रश्न नहीं पूछ रहे हैं। 352वें अंक से पहेली का क्रम पूर्ववत जारी रहेगा। अगले दो अंको में आप पहेली के महाविजेताओं की प्रस्तुतियों की रसानुभूति कीजिए।

इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 348वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1959 में प्रदर्शित फिल्म “धूल का फूल” से एक ठुमरी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग काफी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – तीनताल और कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – सुधा मल्होत्रा

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में मुम्बई, महाराष्ट्र की शुभा खाण्डेकर ने पहली बार भाग लिया है और तीनों प्रश्नो के सही उत्तर दिये हैं। हम शुभा जी का हार्दिक स्वागत करते हैं और आशा करते हैं कि अपने संगीत-ज्ञान से भविष्य में भी श्रोताओं को लाभान्वित कराती रहेंगी। पहेली के प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे अन्य नियमित प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर अब तक जारी हमारी श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की यह समापन कड़ी थी। इस कड़ी में आपने 1959 में प्रदर्शित फिल्म “मैं नशे में हूँ” के ठुमरी गीत का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में हमने आपसे कुछ ऐसे फिल्मी गीतों पर चर्चा की है जिसमें आपको ठुमरी शैली के दर्शन हुए होंगे। आज आपने जो गीत सुना, वह राग तिलंग पर आधारित है। “स्वरगोष्ठी” की आगामी श्रृंखलाओं में भी हम शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा जारी रखेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले दो अंकों में हम संगीत पहेली के विजेताओं से आपका परिचय कराएँगे और उनकी प्रस्तुतियों से आपका रसास्वादन भी कराएँगे। अगले रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, December 30, 2017

चित्रकथा - 51: 2017 में प्रयात कलाकारों का स्मरण

अंक - 51

2017 में प्रयात कलाकारों का स्मरण


"बिछड़े सभी बारी बारी..." 




वर्ष 2017 अब कुछ ही समय का महमान है। एक और बरस बीत गया, न जाने कितनी यादें जमा हुईं इस वर्ष, न जाने कितने नए लोग आए, न जाने कितने लोग हमसे हमेशा के लिए जुदा हो गए। फ़िल्म जगत में इस वर्ष बहुत से गुणी कलाकार हमसे बिछड़ गए, जिनका जाना कला जगत का बहुत बड़ा नुकसान है। आइए आज के ’चित्रकथा’ में याद करें उन महान कलाकारों को जिनका 2017 में देहावसान हो गया। 



"देखी ज़माने की यारी, बिछड़े सभी बारी बारी"। जन्म और मृत्यु प्रकृति और मनुष्य जीवन के ऐसे दो शाश्वत सत्य हैं जिन पर किसी का वश नहीं चलता। जिसने भी इस धरती पर जन्म लिया, उसी दिन यह तय हो गया कि उसे एक दिन यहाँ से जाना भी होगा। लेकिन कुछ लोग अपने जीवन काल में कुछ ऐसा कर जाते हैं कि शारीरिक रूप से वो इस धरती पर भले ना रहें, लेकिन अपनी कला और उपलब्धियों के ज़रिए हमेशा हमेशा के लिए अमर हो जाते हैं। ऐसे ही कुछ नामचीन कलाकारों का स्मरण करते हैं जिनका इस वर्ष 2017 में निधन हो गया।

1. उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ


निधन: 4 जनवरी 2017


सुप्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद अब्दुल हालीम जाफ़र ख़ाँ साहब के निधन से भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत का एक उज्ज्वल नक्षत्र अस्त हो गया। पद्मभूषण, पद्मश्री, और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कारों से सम्मानित हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब का शास्त्रीय-संगीत जगत के साथ-साथ फ़िल्म-संगीत जगत में भी योगदान स्मरणीय है। अब्दुल हलीम साहब का जन्म इन्दौर के पास जावरा ग्राम में सन् 1929 में हुआ था। कुछ समय बाद इनका परिवार बम्बई स्थानान्तरित हो गया। अब्दुल हलीम के पिता उस्ताद जाफ़र खाँ भी सितार के अच्छे ज्ञाता थे। बचपन से ही सांगीतिक वातावरण मिलने के कारण हलीम साहब का संगीत के प्रति लगाव हो जाना स्वाभाविक था। उनकी प्रारंभिक सितार-शिक्षा प्रसिद्ध बीनकार उस्ताद बाबू खाँ से शुरू हुई। उसके बाद उस्ताद महबूब खाँ साहब से सितार की उच्चस्तरीय शिक्षा प्राप्त की। अच्छी शिक्षा और अपने आप में लगन, धैर्य और समर्पण से उन्होंने जल्दी ही अपनी कला में पूरी दक्षता प्राप्त कर ली। फ़िल्मों में उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब का प्रवेश उनकी इच्छा नहीं बल्कि उनकी ज़रूरत थी। पिता की मृत्यु के कारण उनके सामने आर्थिक समस्या आन पड़ी, और घर का चुल्हा जलता रहे, इस उद्येश्य से उन्हें फ़िल्म जगत में जाना ही पड़ा। कलाकार में कला हो तो वो किसी भी क्षेत्र में कामयाब होता है। हलीम साहब को फ़िल्म-संगीत में कामयाबी मिली और पूरे देश में लोग उन्हें जानने लगे, फ़िल्मी गीतों में उनके बजाए सितार के टुकड़ों को सुन कर भाव-विभोर होने लगे।

उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ के फ़िल्म संगीत में योगदान की विस्तृत जानकारी के लिए ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के इस पोस्ट को पढ़ें।


2. ओम पुरी 



निधन: 6 जनवरी 2017


समानान्तर सिनेमा के लोह स्तंभ ओम प्रकाश पुरी, जिन्हें हम ओम पुरी के नाम से जानते हैं, का जन्म 18 अक्टूबर 1950 को हुआ था। यूं तो ओम पुरी ने व्यावसायिक फ़िल्मों में भी अच्छा खासा काम किया, लेकिन उन्हें सबसे अधिक याद किया जाता है समानान्तर सिनेमा और थिएटर में उनके मूल्यवान योगदान के लिए। ’आक्रोश’, ’आरोहन’ जैसी फ़िल्में हों या ’सदगति’ और ’तमस’ जैसी टीवी धारावाहिक, या फिर ’जाने भी दो यारों’, ’चाची 420’ और ’मालामाल वीकली’ जैसी हास्य फ़िल्में, ओम पुरी हर किरदार में श्रेष्ठ सिद्ध हुए, और करोड़ों दर्शकों के दिलों पर राज किया। श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलानी जैसे दिग्गज फ़िल्मकारों की वो पहली पसन्द रहे। केवल भारत में ही नहीं, ओम पुरी ने अमरीका, इंगलैण्ड और पाक़िस्तान की फ़िल्मों में भी अपना योगदान दिया है। फ़िल्म जगत में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें ’पद्मश्री’ पुरस्कार से सम्मानित किया। निकट भविष्य में ओम पुरी को ’दादा साहब फाल्के’ पुरस्कार से भी सम्मानित किए जाने की सम्भानवा जताई जा रही है। 6 जनवरी 2017 को ओम पुरी साहब का निधन हो गया। ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ करता है इस अद्वितीय प्रतिभा को सलाम!


3. किशोरी अमोनकर 



निधन: 3 अप्रैल 2017


भले किशोरी  अमोनकर ने केवल दो फ़िल्मों में अपनी आवाज़ दी है, लेकिन उनकी गाई हुई ये चन्द रचनाएँ किसी ख़ज़ाने से कम नहीं। 10 अप्रैल 1932 को बम्बई में जन्मीं किशोरी अमोनकर ने संगीत की पहली शिक्षा अपनी माँ मोगुबाई कुर्डिकर से ली जो जयपुर-अतरौली घराने की जानीमानी गायिका थीं। साथ ही भिंडीबाज़ार घराने के अंजनी मालपेकर से भी उन्होंने तालीम ली। पारम्परिक रागों में निबद्ध ख़याल गायकी में उन्होंने महरथ हासिल की। भजन और ठुमरी में भी किशोरी अमोनकर का कोई सानी नहीं। एक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका के रूप में वो 60 के दशक के शुरु में प्रतिष्ठित हुईं। 1964 में वी. शान्ताराम एक नृत्यप्रधान फ़िल्म बना रहे थे ’गीत गाया पत्थरों ने’। शीर्षक गीत के लिए उन्होंने किशोरी अमोनकर को चुना। उनकी माँ और गुरुजी ने उन्हें समझाया कि उनके परिवार के लिए गीत-संगीत व्यवसाय नहीं बल्कि साधना है और इसलिए उन्हें फ़िल्मी गायन से दूर रहना चाहिए। पर किशोरी की तीव्र इच्छा थी फ़िल्म में गाने की। इसलिए उन्होंने अपनी माँ और गुरुजी के सुझाव को नज़रंदाज़ कर वी. शान्ताराम की फ़िल्म में मिले मौके को हाथोंहाथ ग्रहण कर लिया। इस कामयाबी के बावजूद किशोरी अमोनकर ने फ़िल्म जगत से अपने सारे रिश्ते समाप्त करने का निर्णय लिया। उनकी माँ ने उन्हें चेतावनी दे दी कि अगर उसने फिर कभी किसी फ़िल्म के लिए गाया तो वो उसे अपने दो तानपुरों को छूने तक नहीं देंगी। किशोरी जी को अपनी ग़लती का अहसास हुआ। और अपना पूरा ध्यान शास्त्रीय संगीत में लगा दिया और दिन दुगुनी रात चौगुनी उन्नति करती चली गईं। 

किशोरी अमोनकर के फ़िल्म संगीत में योगदान की विस्तृत जानकारी के लिए ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के इस पोस्ट को पढ़ें।


4. जयराम आचार्य 



निधन: 12 अप्रैल 2017

12 अप्रैल 2017 को सितार वादक, दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित, पंडित जयराम आचार्य का निधन हो जाने से फ़िल्म-संगीत के धरोहर को समृद्ध करने वाले उन तमाम गुमनाम टिमटिमाते सितारों में से एक सितारा हमेशा के लिए डूब गया। यह कटु सत्य ही है कि किसी फ़िल्मी गीत की सफलता के पीछे अक्सर गायक, संगीतकार और गीतकार के हाथ को स्वीकारा जाता है, और लोग भूल जाते हैं उन तमाम वादकों को जिनके वाद्यों के टुकड़ों से गीतों का श्रॄंगार होता रहा है, जिनसे गीतों की सुन्दरता बढ़ती रही है। जयराम जी भी ऐसे ही एक सितार वादक थे जिन्होंने बहुत से कामयाब गीतों में सितार के सुन्दर टुकड़े बजाए पर उन गीतों के साथ उन्हें लोगों ने कभी याद नहीं किया। जयराम आचार्य का जन्म तमिल नाडु में 4 जुलाई 1928 को हुआ था। उन्हें संगीत विरासत में ही मिली। उनके पूर्वज सितार और वायलिन के वादक थे। वर्ष 1939 में जयराम बम्बई आए फ़िल्मों में एक गायक बनने का सपना लेकर। उस समय पार्श्वगायन का इजाद हो चुका था, इसलिए जयराम के मन में एक पार्श्वगायक बनने की ही लालसा थी। पर पार्श्वगायन के आने के बावजूद वह ज़माना सिंगिंग् स्टार्स का ही था। इसलिए इस क्षेत्र में पाँव जमाना आसान काम नहीं था। दो वर्ष तक संघर्ष करने के बाद जयराम को 1941 की फ़िल्म ’मेरा संसार’ में कोरस में गाने का मौक़ा मिला। जयराम को समझ में आ चुका था कि गायकी में क़दम जमाना आसान नहीं। उधर उनके पिता चाहते थे कि जयराज दिलरुबा साज़ को अपनाए और उसी में उस्ताद बने। लेकिन युवा जयराम को सितार से प्यार था। पिता के सुझाव पर वो दिलरुबा बजाने तो लगे थे, पर घर पर एक सितार भी हुआ करता था। एक दिन जयराम ने सितार उठाया और उसके तार छेड़ दिए। सितार के तार छेड़ते ही उन्हें समझ आ गया कि यही वह साज़ है जो उनका हमसफ़र है। 

पंडित जयराम आचार्य के फ़िल्म संगीत में योगदान की विस्तृत जानकारी के लिए ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के इस पोस्ट को पढ़ें।



5. विनोद खन्ना



निधन: 27 अप्रैल 2017


अभिनेता, फ़िल्म निर्माता और सांसद विनोद खन्ना का जन्म 6 अक्टुबर 1946 को हुआ था। 1969 से अपना फ़िल्मी सफ़र एक खलनायक के रूप में शुरू करने के बाद बहुत जल्द ही वो नायक बने और सफलता उनके क़दम चूमे। ’मेरे अपने’, ’मेरा गाँव मेरा देश’, ’कच्चे धागे’, ’ग़द्दार’, ’इम्तिहान’, ’मुक़द्दर का सिकन्दर’, ’इनकार’, ’अमर अकबर ऐन्थनी’, ’राजपूत’, ’दि बर्निंग् ट्रेन’, ’क़ुर्बानी’, ’क़ुद्रत’, ’पर्वरिश’, ’ख़ून पसीना’, ’दयावान’, ’चांदनी’, ’जुर्म’ और न जाने कितनी और सफ़ल फ़िल्मों में अभिनय किया विनोद खन्ना ने। 1982 में अपने करीअर के शीर्ष पर रहते विनोद खन्ना ने अचानक फ़िल्म जगत को छोड़ दिया और अपने गुरु ओशो रजनीश की शरण में अमरीका चले। पाँच वर्ष बाद वापस लौट कर दो फ़िल्में की, ’इंसाफ़’ और ’सत्यमेव जयते’।

विनोद खन्ना की पहली फ़िल्म ’मन का मीत’ में उनके अभिनय के बारे में विस्तार से पढ़ें ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ का यह पोस्ट



6. उस्ताद रईस ख़ान



निधन: 6 मई 2017

2017 का वर्ष सितार जगत के लिए अब तक एक दुर्भाग्यपूर्ण वर्ष रहा है। 4 जनवरी को उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ, 12 अप्रैल को पंडित जयराम आचार्य, और 6 मई को उस्ताद रईस ख़ाँ साहब। सितार जगत के तीन तीन उज्वल नक्षत्र अस्त हो गए एक के बाद एक, और पैदा हो गया एक महाशून्य शास्त्रीय संगीत जगत में। हलीम जाफ़र ख़ाँ और जयराम आचार्य ही की तरह रईस ख़ाँ साहब का भी फ़िल्म संगीत में महत्वपूर्ण योगदान रहा। हालाँकि संगीतकार मदन मोहन के साथ ख़ाँ साहब ने सबसे उम्दा काम किया, और क्यों ना करते, दोनों जिगरी दोस्त जो थे, लेकिन अन्य संगीतकारों के लिए भी ख़ाँ साहब ने सितार बजाया और गीतों के अन्तराल संगीत को ऐसा सुरीला अंजाम दिया कि इन तमाम गीतों की इन सितार की ध्वनियों के बग़ैर कल्पना भी नहीं की जा सकती। सितार के इन स्वर्गिक ध्वनियों को अगर इन गीतों से निकाल दिया जाए तो शायद इन गीतों की आत्माएँ ही चली जाएँगी। उस्ताद रईस ख़ाँ साहब के सितार के टुकड़ों से सजे उल्लेखनीय फ़िल्मी गीत हैं - "नग़मा-ओ-शेर की सौग़ात किसे पेश करूँ", "नैनों में बदरा छाये", "मैंने रंग ली आज चुनरिया सजना तोरे रंग में", "सपनों में अगर तुम मेरे आओ तो सो जाऊँ", "मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है", "तुम्हारी ज़ुल्फ़ के साये में शाम कर लूँगा", "छायी बरखा बहार पड़े अंगना फुहार", "दो दिल टूटे दो दिल हारे", "हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह", "बैयाँ ना धरो हो बलमा", "आज सोचा तो आँसू भर आए", "रस्म-ए-उल्‍फत को निभाएं तो निभाएं कैसे", "ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे साजना मोरे कान का बाला", "आप यूंही अगर हमसे मिलते रहे, देखिए एक दिन प्यार हो जाएगा", "इशारों इशारों में दिल लेने वाले", "जाइए आप कहाँ जाएंगे", "बहारों मेरा जीवन भी सँवारो", "तुम्हें याद करते करते जाएगी रैन सारी", "सजनवा बैरी हो गए हमार", "चंदन सा बदन चंचल चितवन", "पिया को मिलन कैसे होए री मैं जानु नाही", "इतना तो याद है मुझे कि उनसे मुलाक़ात हुई", "मेरी साँसों को जो महका रही है"।

उस्ताद रईस ख़ान के फ़िल्म संगीत में योगदान की विस्तृत जानकारी के लिए ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के इस पोस्ट को पढ़ें।


7. रीमा लागू



निधन: 18 मई 2017

18 मई 2017 को सुप्रसिद्ध अभिनेत्री रीमा लागू का मात्र 59 वर्ष की आयु में निधन हो गया। इतनी जल्दी उनके दुनिया-ए-फ़ानी से चले जाने से अभिनय जगत को जो क्षति पहुँची है उसकी भरपाई हो पाना असंभव है। 35 सालों से उपर के अभिनय सफ़र में रीमा जी ने दर्शकों के दिलों पर राज किया; कभी गुदगुदाया, कभी रुलाया, और कभी अपने अभिनय से हमें भाव-विभोर कर दिया। ऑन-स्क्रीन माँ के किरदार में फ़िल्म इतिहास में बहुत सी अभिनेत्रियों ने बुलंदी हासिल किए हैं जिनमें वो नाम जो सबसे पहले याद आते हैं, वो हैं निरुपा रॉय, कामिनी कौशल, सुलोचना, दुर्गा खोटे, अचला सचदेव, और बाद के वर्षों में नज़र आने वाली अभिनेत्रियों में एक प्रमुख नाम रीमा लागू का है। ’क़यामत से क़यामत तक’, ’मैंने प्यार किया’, ’आशिक़ी’, ’हिना’, ’साजन’, ’हम आपके हैं कौन’, ’जुड़वा’, ’येस बॉस’, ’कुछ कुछ होता है’, ’हम साथ-साथ हैं’, ’वास्तव’, ’मैं प्रेम की दीवानी हूँ’, ’कल हो न हो’, ’रंगीला’ जैसी ब्लॉकबस्टर फ़िल्मों में माँ की सफल भूमिका निभा कर रीमा लागू दर्शकों के दिलों में एक अपना अलग ही मुकाम बना चुकी थीं। उनके परदे पर आते ही जैसे एक रौनक सी छा जाती। उन्होंने फ़िल्मी माँ के किरदार को एक दुखियारी औरत से बाहर निकाल कर एक ग्लैमरस महिला में परिवर्तित किया। लेकिन आज भले उन्हें हम उनकी माँ की भूमिका वाली फ़िल्मों के लिए याद करते हैं, हक़ीकत यह है कि 1988 में ’क़यामत से क़यामत तक’ के आने से पहले उन्होंने कई फ़िल्मों में कई तरह के चरित्र निभाए जिनकी तरफ़ हमारा ध्यान यकायक नहीं जाता। 21 जून 1958 को जन्मीं रीमा लागू का असली नाम नयन भडभडे था। उनकी माँ मन्दाकिनी भडभडे मराठी स्टेज ऐक्ट्रेस थीं और उन्हीं से शायद अभिनय की बीज नयन में भी अंकुरित हुई। उनके अभिनय क्षमता से उनका स्कूल वाक़िफ़ था। माध्यमिक स्तर की पढ़ाई पूरी करते ही वो पेशेवर तौर पर अभिनय करना शुरु किया। विवेक लागू से विवाह के पश्चात् नयन भडभडे बन गईं रीमा लागू। 1979 से लेकर 1988 तक वो यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया में नौकरी भी की और साथ ही साथ टेलीविज़न और फ़िल्मों में अभिनय भी जारी रखा। 1988 के बाद उनका फ़िल्मी सफ़र तेज़ हो जाने की वजह से उन्होंने नौकरी छोड़ दी। 

रीमा लागू की शुरुआती फ़िल्मों की विस्तृत जानकारी के लिए ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के इस पोस्ट को पढ़ें।


8. शिवराज



निधन: 3 जून 2017

3 जून 2017 को फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध चरित्र अभिनेता शिवराज का निधन हो गया। पाँच दशकों के दौरान 200 से उपर हिन्दी फ़िल्मों में तरह तरह के किरदारों में नज़र आने वाले शिवराज का हर कहानी को जीवन्त करने में बहुमूल्य योगदान रहा है। किरदार कोई भी हो, अपने सहज और प्रभावशाली अभिनय क्षमता से शिवराज ने हर फ़िल्म में दर्शकों के दिलों में अमिट छाप छोड़ गए। यूं तो शिवराज पाँच दशकों तक फ़िल्मों में नज़र आते रहे, पर 50 और 60 के दशकों में उन्होंने सबसे ज़्यादा फ़िल्में की और उस दौर में वो एक जाना-पहचाना चेहरा बन गए थे। IMDB डेटाबेस के अनुसार शिवराज ने 167 हिन्दी फ़िल्मों में अभिनय किया है, लेकिन कुछ फ़िल्म इतिहासकारों का मानना है कि यह संख्या 200 से उपर है। ख़ैर, शिवराज ने फ़िल्म जगत में क़दम रखा साल 1951 में, शमीम भगत निर्देशित फ़िल्म ’बड़ी बहू’ से, जिसमें शेखर (नायक) और निम्मी (नायिका) थे। इसी साल फणी मजुमदार निर्देशित फ़िल्म ’आंदोलन’ में भी वो नज़र आए। फिर 1952 की दो फ़िल्मों - ’नौबहार’, ’तमाशा’ - में एक डॉक्टर की भूमिका अदा करने के बाद इसी साल उन्हें उनका पहला बड़ा ब्रेक मिला। राज कपूर - नर्गिस अभिनीत फ़िल्म ’आशियाना’ में वो नर्गिस के पिता का चरित्र निभाया। इसमें उन्होंने नर्गिस के साथ-साथ राज कपूर के साथ बहुत से फ़्रेमों में नज़र आए और इनको अभिनय में बराबर का टक्कर दिया। इस फ़िल्म से वो एक सशक्त अभिनेता के रूप में स्थापित हो गए। इस फ़िल्म के बाद तो उनके अभिनय से सजी फ़िल्मों की कतार लग गई। 

अभिनेता शिवराज के फ़िल्मी सफ़र की विस्तृत जानकारी के लिए ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के इस पोस्ट को पढ़ें।


9. सबिता चौधरी



निधन: 29 जून 2017

29 जून 2017 को जानी-मानी गायिका सबिता चौधरी का 72 वर्ष की आयु में निधन हो गया। बांग्ला फ़िल्मी व ग़ैर-फ़िल्मी गीतों की मशहूर गायिका सबिता जी ने कई हिन्दी फ़िल्मों में के लिए भी पार्श्वगायन किया है। सुप्रसिद्ध संगीतकार सलिल चौधरी की पत्नी सबिता चौधरी का संगीत के धरोहर को समृद्ध करने में उल्लेखनीय योगदान रहा। सबिता चौधरी सलिल चौधरी की दूसरी पत्नी थीं। विवाह से पहले उनका नाम था सबिता बनर्जी। हिन्दी फ़िल्मों में पार्श्वगायन की जहाँ तक बात है, पहली बार सबिता जी ने संगीतकार नाशाद (शौकत दहल्वी) के निर्देशन में 1954 की फ़िल्म ’दरवाज़ा’ में चार गीत गाए। फ़िल्म में उस दौर की एक और उभरती गायिका सुमन कल्याणपुर के भी कई गीत थे। दो गीतों में इन दोनों की आवाज़ें शामिल हैं। सबिता बनर्जी की आवाज़ में मजरूह सुल्तानपुरी की लिखी ग़ज़ल "कोई किसलिए मेरी महफ़िल में आए, बूझी शमा हूँ मैं कोई किसलिए जलाए" को क्या ख़ूब गाया था उन्होंने! संगीतकार सलिल चौधरी के संगीत निर्देशन में सबिता चौधरी ने पहला हिन्दी फ़िल्मी गीत गाया 1958 की कालजयी फ़िल्म ’मधुमती’ में। यह बड़े अफ़सोस की बात है कि इस फ़िल्म के तमाम लोकप्रिय गीतों के अलावा तीन गीत ऐसे थे जिनकी कभी चर्चा नहीं हुई या बहुत कम हुई। पहला गीत है मुबारक बेगम की आवाज़ में "हम हाल-ए-दिल सुनायेंगे सुनिये के ना सुनिये", दूसरा गीत है द्विजेन मुखर्जी की आवाज़ में "तन जले मन जलता रहे" और तीसरा गीत है आशा भोसले, सबिता चौधरी और ग़ुलाम मोहम्मद की आवाज़ में एक बड़ी ही दुर्लभ रचना "कंचा ले कंची लई लाग्यो" जो पहाड़ी धुनों पर आधारित रचना है। 

गायिका सबिता चौधरी के फ़िल्म-संगीत सफ़र की विस्तृत जानकारी के लिए ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के इस पोस्ट को पढ़ें।


10. इन्दर कुमार



निधन: 28 जुलाई 2017

28 जुलाई 2017 को अभिनेता इन्द्र कुमार की मात्र 43 वर्ष की आयु में असामयिक मृत्यु बेहद अफ़सोसजनक रही। इन्द्र कुमार उन अभिनेताओं में शामिल हैं जिन्होंने ना तो बहुत ज़्यादा फ़िल्में की और ना ही ज़्यादा कामयाब रहे, लेकिन जितना भी काम किया, अच्छा किया और उनके चाहने वालों ने उन गिने-चुने फ़िल्मों की वजह से उन्हें हमेशा याद किया। चोकोलेटी हीरो से लेकर खलनायक की भूमिका निभाने वाले इन्द्र कुमार अब हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनकी वह प्यारी मुस्कान, उनका सुन्दर चेहरा और शारीरिक गठन, और उनकी सहज अदाकारी उनाकी फ़िल्मों के ज़रिए सदा हमारे साथ रहेगी। जयपुर के एक मारवाड़ी परिवार में जन्मे इन्दर कुमार सरफ़ की शिक्षा मुंबई के सेन्ट ज़ेवियर’स हाइ स्कूल और सरदार वल्लभ भाई पटेल विद्यालय में हुई। स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद केवल 23 वर्ष की उम्र में उन्हें उनकी पहली फ़िल्म में बतौर हीरो अभिनय करने का सौभाग्य मिल गया। ऐसा सुनहरा मौक़ा बहुत कम नवोदित कलाकारों को मिल पाता है। इस दिशा में इन्दर के मेन्टर रहे फ़िल्म पब्लिसिस्ट राजू करिया जिनकी मदद से इन्दर को कई फ़िल्म निर्माताओं से मिलने का मौका मिला। 1996 में उन्हे उनका पहला ब्रेक मिला फ़िल्म ’मासूम’ में। आयेशा जुल्का के साथ उनकी यह फ़िल्म तो बॉक्स ऑफ़िस पर ज़्यादा टिक नहीं सकी, लेकिन फ़िल्म के गीतों, ख़ास तौर से उन्हीं पर फ़िल्माया "ये जो तेरी पायलों की छम छम है" और आदित्य नारायण का मशहूर "छोटा बच्चा जान के हमको आँख न दिखाना रे", की वजह से इस फ़िल्म को लोगों ने पसन्द किया। इसी साल इन्दर कुमार ने अक्षय कुमार, रेखा, रवीना टंडन अभिनीत फ़िल्म ’खिलाड़ियों का खिलाड़ी’ में अक्षय कुमार के बड़े भाई अजय का किरदार निभाया जो फ़िल्म की कहानी का एक महत्वपूर्ण चरित्र था। फिर इसके अगले ही साल 1997 में बतौर नायक उनकी दूसरी फ़िल्म आई ’एक था दिल एक थी धड़कन’, जो नाकामयाब रही। लेकिन फिर एक बार फ़िल्म के गीतों ने धूम मचाई। ख़ास तौर से "रेशम जैसी हैं राहें, खोले हैं बाहें" और "एक था दिल एक थी धड़कन" को काफ़ी समय तक रेडियो पर सुनाई देते रहे। फ़िल्में नाकामयाब होने के बावजूद एक चोकोलेटी हीरो के रूप में इन्दर कुमार की दर्शकों में और ख़ास कर युवा वर्ग में काफ़ी लोकप्रिय होने लगे थे। काउन्ट-डाउन शोज़ में ’मासूम’ और ’एक था दिल...’ के गीत चार्टबस्टर्स रहे।

अभिनेता इन्दर कुमार के फ़िल्मी सफ़र की विस्तृत जानकारी के लिए ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के इस पोस्ट को पढ़ें।


11. ज़फ़र गोरखपुरी



निधन: 29 जुलाई 2017

82 बरस की उम्र में लम्बी बीमारी के बाद शायर व गीतकार ज़फर गोरखपुरी ने 29 जुलाई 2017 की रात मुम्बई में अपने परिवार के बीच आखिरी सांस ली। गोरखपुर की सरज़मी पर पैदा ज़फर गोरखपुरी की शायरी उन्हें लम्बे समय तक लोगों के दिल-ओ-दिमाग में ज़िंदा रखेगी। ज़फ़र साहब उर्दू के उम्दा शायर तो थे ही, साथ ही कुछ हिन्दी फ़िल्मों के लिए गाने भी लिखे। ज़फर को श्रद्धांजलि देते हुए साहित्यकार दयानंद पाण्डेय अपनी वाल पर लिखते हैं कि ‘अजी बड़ा लुत्फ था जब कुंवारे थे हम तुम, या फिर धीरे धीरे कलाई लगे थामने, उन को अंगुली थमाना ग़ज़ब हो गया! जैसी क़व्वालियों की उन दिनों बड़ी धूम थी। उस किशोर उम्र में ज़फर की यह दोनों कव्वाली सुन जैसे नसे तड़क उठती थी, मन जैसे लहक उठता था।’ लेकिन ज़फर के साथ ऐसे अनुभव का नाता नई पीढ़ी से भी जुड़ा जब शाहरूख ख़ान पर फिल्माया फिल्म बाज़ीगर का गीत ‘किताबें बहुत सी पढ़ीं होंगी तुमने’ गुनगुनाते हुए बड़ी हुई। ज़फर गोरखपुरी को मुम्बई के चार बंगला अंधेरी पश्चिम के कब्रिस्तान में 30 जुलाई को दोपहर डेढ़ बजे सुपुर्द-ए-खाक किया गया और इसी के साथ अन्त हुआ एक और अदबी शायर का। ज़फ़र गोरखपुरी बासगांव तहसील के बेदौली बाबू गांव में 5 मई 1935 को जन्मे। प्रारंभिक शिक्षा गांव में प्राप्त करने के बाद उन्होंने मुंबई को अपना कर्मक्षेत्र बनाया। मुम्बई वे मजदूरी करने गए थे। बताते हैं कि पढ़ाई लिखाई तो ज्यादा थी नहीं, घर चलाने के लिए पिता ने उन्हें मुम्बई बुला लिया जहाँ उन्होंने मिट्टी तक ढोया। मज़दूरी करते हुए पढ़ाई की, फिर मुम्बई नगर निगम के स्कूल में पढ़ाने भी लगे। शुरूआती दौर में परिवार बच्चे गांव ही रहते थे। तमाम आर्थिक कठिनाइयों के बीच उनकी ख़ुशकिस्मती थी कि उन्हें फ़िराक़ गोरखपुरी, जोश मलीहाबादी, मजाज़ लखनवी और जिगर मुरादाबादी सरीखे शायरों को सुनने और उनसे अपने कलाम के लिए दाद हासिल करने का मौका मिला था। सन 1952 में उन्होंने शायरी की शुरूआत की थी। सिर्फ 22 साल की उम्र में फ़िराक़ साहब के सामने ग़ज़ल पढ़ी, "मयक़दा सबका है सब हैं प्यासे यहाँ मय बराबर बटे चारसू दोस्तो, चंद लोगों की ख़ातिर जो मख़सूस हों तोड़ दो ऐसे जामो-सुबू दोस्तो"। फ़िराक़ साहब ने दाद दी, बल्कि ऐलान किया कि नौजवान बड़ा शायर बनेगा।

गीतकार और शायर ज़फ़र गोरखपुरी के फ़िल्म संगीत में योगदान की विस्तृत जानकारी के लिए ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के इस पोस्ट को पढ़ें।


12. शकीला



निधन: 20 सितंबर 2017

20 सितंबर 2017 को गुज़रे ज़माने की सुप्रसिद्ध अभिनेत्री शकीला का 82 वर्ष की आयु में निधन हो गया। 1 जनवरी 1936 को जन्मीं शकीला के पूर्वज अफ़गानिस्तान और ईरान के शाही खानदान से ताल्लुक रखते थे। राजगद्दी पर कब्ज़े के खानदानी झगड़ों में शकीला के दादा-दादी और माँ मारे गए थे। शकीला तीन बहनों में सबसे बड़ी थी और तीनों बच्चियों को साथ लेकर उनके पिता और बुआ जान बचाकर मुम्बई भाग आए थे। शकीला की उम्र उस वक़्त क़रीब 4 साल की थी। शकीला के पिता भी बहुत जल्द गुज़र गए। उनकी बुआ फ़िरोज़ा बेगम ज़िंदगी भर अविवाहित रह कर तीनों अनाथ भतीजियों का पालन पोषण किया। ए. आर. कारदार और महबूब ख़ान जैसे फ़िल्मकारों के साथ पारिवारिक सम्बन्ध होने की वजह से एक बार कारदार ने ही शकीला को फ़िल्म ‘दास्तान’ में एक 13-14 साल की लड़की का रोल करने को कहा था और इस तरह साल 1950 में प्रदर्शित हुई फिल्म ‘दास्तान’ से शकीला का अभिनय सफ़र शुरू हो गया। और बहुत जल्द एक सशक्त अभिनेत्री के रूप में वो उभर कर सामने आयीं। 

शकीला पर फ़िल्माए दस चुनिन्दा गीतों की विस्तृत जानकारी के लिए ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के इस पोस्ट को पढ़ें।


13. टॉम ऑल्टर



निधन: 29 सितंबर 2017

मशहूर अभिनेता टॉम ऑल्टर का 29 सितंबर 2017 को निधन हो गया. लंबे समय से स्किन कैंसर से कैंसर से पीड़ित टॉम ऑल्टर ने 67 साल की उम्र में अंतिम सांस ली. तीन सौ से ज्यादा फिल्मों में काम कर चुके टॉम ने कई टीवी शो में भी काम किया. अभिनय के साथ लेखन भी करते रहे इस वरिष्ठ अभिनेता को पद्मश्री सम्मान से भी अलंकृत किया गया था. उम्दा उर्दू बोलने वाले टॉम ऑल्टर का जन्म सन 1950 में मसूरी में हुआ था. वे भारत में तीसरी पीढ़ी के अमेरिकी थे. उन्होंने वूडस्टॉक स्कूल में पढ़ाई की और इसके बाद थोयेल यूनिवर्सिटी में पढ़े. सन 1972 में उन्होंने पुणे के प्रतिष्ठित फिल्म एंड टेलिविजन इंस्टीट्यूट में एडमीशन लिया.  अस्सी और नब्बे के दशक में उन्होंने खेल पत्रकारिता भी की. यह इस समय के दौरान हुआ था कि उन्होंने हिंदी फ़िल्म आराधना को देखा जो एक फ़िल्म थी जिसे उन्होंने और उसके दोस्तों को इतना पसंद किया था कि उन्होंने एक हफ्ते में इसे तीन बार देखा था।[8] इस देखने के दौरान एल्टर के जीवन में एक मोड़ लग गया और राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर की अभिनय ने युवाओं के लिए अल्टर को फ़िल्मों में आकर्षित किया। उन्होंने एक अभिनय करियर का पीछा करने का विचार किया और दो साल के लिए इस विचार पर विचार किया, जिसके बाद वह पुणे में फ़िल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) के अध्यक्ष बने, जहां उन्होंने रोशन तनेजा के तहत 1972 से 1974 तक अभिनय का अध्ययन किया। उन्होंने एफटीआईआई में रोशन तनेजा के शिक्षण में इन दोनों वर्षों में अभिनय में अपनी उपलब्धियों का श्रेय दिया और नसीरुद्दीन शाह, बेंजामिन गिलानी और शबाना आज़मी सहित अन्य छात्रों के साथ बातचीत। उन्होंने बहुत सारी हिन्दी फ़िल्मों में चरित्र अभिनेता के रूप में अभिनय किया जिनमें कुछ नाम हैं ’चरस’, ’शतरंज के खिलाड़ी’, ’हम किसी से कम नहीं’, ’क्रान्ति’, ’गांधी’, ’राम तेरी गंगा मैली’, ’कर्मा’, ’सली लंगड़े पे मत रो’, ’परिन्दा’, ’आशिक़ी’ आदि। दूरदर्शन धारावाहिक ’जुनून’ में उनके केशव कल्सी वाले किरदार को लोगों ने आज तक याद रखा है।


14. कुंदन शाह



निधन: 7 अक्टुबर 2017

19 अक्टुबर 1947 में स्वाधीन भारत में जन्में कुंदन शाह एक जाने माने फ़िल्म निर्देशक व लेखक थे। अपनी पहली ही फ़िल्म ’जाने भी दो यारों’ और बाद में आई टीवी धारावाहिक ’ये जो है ज़िन्दगी’, ’मनोरंजन’, ’वागले की दुनिया’ और ’नुक्कड़’ के लिए वो सबसे अधिक जाने जाते रहे हैं। यह 80 के दशक का दौर था। 90 के दशक में कुंदन शाह ने सिनेमा की ओर दोबारा रुख़ किया और 1993 में शाहरुख़ ख़ान अभिनीत ’कभी हाँ कभी ना’ का निर्देशन किया जिसके लिए उन्हें Filmfare Critics Award for Best Movie का पुरस्कार मिला। 1998 में ’क्या कहना’ फ़िल्म को निर्देशित किया जिसके लिए भी उनकी काफ़ी तारीफ़ें हुईं। इसके बाद ’हम तो मोहब्बत करेगा’, ’दिल है तुम्हारा’ और ’एक से बढ़ कर एक’ जैसी फ़िल्में आईं जो असफल रहीं। ’जाने भी दो यारों’ फ़िल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों के अन्तर्गत ’इन्दिरा गांधी अवार्ड’ से सम्मानित किया गया था जिसे उन्होंने पिचले ही साल लौटा दिया था जब फ़िल्म जगत के बहुत से कलाकारों ने देश में बढ़ती असहिष्णुता के मद्देनज़र अपने अपने पुरस्कार लौटा दिए थे।


15. लेख टंडन



निधन: 15 अक्टुबर 2017

बहुत से मशहूर फ़िल्मों और टीवी धारावाहिकों के निर्देशक लेख टंडन का 15 अक्टुबर 2017 को निधन हो गया। ’प्रोफ़ेसर’, ’प्रिन्स’,”आम्रपाली’, ’झुक गया आसमान’, ’एक बार कहो’, ’अगर तुम ना होते’, ’दुल्हन वही जो पिया मन भाये’, ’दूसरी दुल्हन’ जैसी फ़िल्मों का निर्देशन करने वाले लेख टंडन को फ़िल्म जगत में क़दम रखने का सुझाव पृथ्वीराज कपूर ने दिया था जो लेख टंडन के पिता फ़कीर चंद टंडन के स्कूल के मित्र थे। उन्होंने 50 के दशक में बतौर सहायक निर्देशक काम करना शुरु किया और 60 के दशक में जाकर फ़िल्म ’प्रोफ़ेसर’ से स्वतंत्र निर्देशक बने। 80 के दशक में टेलीविज़न की बढ़ती लोकप्रियता के मद्देनज़र लेख टंडन ने टीवी का रुख़ किया और कई लोकप्रिय धारावाहिक निर्देशित किए जिनमें शामिल हैं ’फिर वही तलाश’, ’फ़रमान’, ’दिल दरिया’ आदि। इसी ’दिल दरिया’ धारावाहिक से शाहरुख़ ख़ान ने अपना अभिनय सफ़र शुरु किया था। ’दुल्हन वही जो पिया मन भाये’, ’आम्रपाली’, और ’अगर तुम ना होते’ फ़िल्मों के लिए उन्हें पुरस्कृत किया गया। लेख टंडन द्वारा निर्देशित कुछ और फ़िल्मों के नाम हैं ’आन्दोलन’, ’शारदा’, ’ख़ुदा क़सम’, ’उत्तरायन’, और ’दो राहें’। ’स्वदेस’, ’रंग दे बसन्ती’, ’चेन्नई एक्सप्रेस’ और ’चार फ़ूटिया छोकरे’ जैसी फ़िल्मों में उन्होंने अभिनय भी किया।


16. राम मुखर्जी



निधन: 22 अक्टुबर 2017

जानेमाने फ़िल्म निर्देशक, पटकथा लेखक और निर्माता राम मुखर्जी का 22 अक्टुबर 2017 को निधन हो गया। वो अभिनेत्री रानी मुखर्जी के पिता थे। हिन्दी और बांग्ला फ़िल्म जगत में एक जाना माना नाम राम मुखर्जी की उल्लेखनीय फ़िल्मों में ’हम हिन्दुस्तानी’ और ’लीडर’ शामिल हैं। राम मुखर्जी के पिता रवीन्द्रमोहन मुखर्जी जानेमाने फ़िल्मकार शशधर मुखर्जी के बड़े भाई थे, और ’फ़िल्मालय स्टुडियोज़’ के एक संस्थापक सदस्य भी। राम मुखर्जी की पत्नी कृष्णा मुखर्जी एक पार्श्वगायिका रहीं और पुत्री रानी मुखर्जी का उल्लेख तो हम कर ही चुके हैं। उनके पुत्र राजा मुखर्जी भी फ़िल्म निर्देशक हैं जिन्होंने अपनी अभिनीत पहली फ़िल्म ’बिधातार खेला’ में अभिनय सफ़र शुरु करने से पहले अपने पिता के सहायक के रूप में कई फ़िल्मों में काम कर चुके थे। राम मुखर्जी ने रानी मुखर्जी को लौन्च करने के लिए 1996 में बांग्ला फ़िल्म बनाई ’बियेर फूल’ और 1997 में रानी को हिन्दी फ़िल्म जगत में लौन्च करने के लिए बनाई ’राजा की आएगी बारात’। राम मुखर्जी ने 1972 की फ़िल्म ’एक बार मुस्कुरादो’ भी निर्देशित की 1969 की फ़िल्म ’संबंध’ का निर्माण किया। दिलीप कुमार अभिनीत फ़िल्म ’लीडर’ को निर्देशित करने के साथ साथ इसकी पटकथा भी उन्होंने ही लिखी।


17. मोहन कुमार



निधन: 10 नवंबर 2017

1 जून 1934 को अविभाजित भारत के सियालकोट (जो अब पाक़िस्तान में है) में जन्में मोहन कुमार फ़िल्म जगत के जाने माने निर्देशक, निर्माता और पटकथा लेखक थे। देश के बटवारे के बाद वो बम्बई चले आए और यहीं बस गए। मोहन कुमार का फ़िल्मी सफ़र शुरु हुआ बतौर निर्देशक साल 1961 में जे. ओम प्रकाश की फ़िल्म ’आस का पंछी’ से। इसे आप संयोग ही कहिए या कुछ और, मोहन कुमार की लगभग सभी फ़िल्मों के नाम अंग्रेज़ी के "A" अक्षर से शुरु होते हैं, फिर चाहे फ़िल्म का निर्माण उन्होंने ख़ुद किया हो या जे. ओम प्रकाश ने या किसी और ने। बस एक 1972 की फ़िल्म ’मोम की गुड़िया’ को छोड़ कर उनके द्वारा निर्मित या/और निर्देशित फ़िल्मों के नाम "A" शुरु होते हैं। ’आस का पंछी’ की अपार सफलता के बाद तो जैसे उनकी सफ़ल फ़िल्मों की कतार खड़ी हो गई। ’अनपढ़’, ’आयी मिलन की बेला’, ’आपकी परछाइयाँ’, ’अमन’, ’अनजाना’, ’आप आए बहार आयी’, ’अमीर ग़रीब’, ’आप बीती’, ’अवतार’, ’ऑल राउन्डर’, ’अमृत’ और ’अम्बा’ जैसी फ़िल्में मोहन कुमार के सफ़ल फ़िल्मी करीयर के गवाह हैं।



18. मीना कपूर



निधन: 12 नवंबर 2017

फ़िल्म जगत के सुनहरे दौर की जानी-मानी पार्श्वगायिका मीना कपूर का 23 नवंबर को कोलकाता में निधन हो गया। ख़ुद एक सुरीली गायिका होने के साथ-साथ मीना जी संगीतकार अनिल बिसवास जी की पत्नी  भी थीं। मीना कपूर के गाए गीत हमें जिन फ़िल्मों में सुनने को मिली, उनमें प्रमुख हैं ’शहनाई’ ’छोटी छोटी बातें’, ’अनोखा प्यार’, ’परदेसी’, ’आग़ोश’, ’दुखियारी’, ’हरिदर्शन’, ’गोपीनाथ’, ’आकाश’, ’नैना’, ’उषा किरण’, ’दूर चलें’, ’चलते चलते’, ’घायल’, ’आधी रात’, ’घर की इज़्ज़त’ और ’नई रीत’। बरसों पहले ’विविध भारती’ के लोकप्रिय कार्यक्रम ’संगीत सरिता’ के लिए अनिल दा और मीना जी की सितार वादक व संगीतकार श्री तुषार भाटिया से लम्बी बातचीत रेकॉर्ड की गई थी। इस बातचीत को ’रसिकेषु’ नामक श्रूंखला के रूप में प्रसारित किया गया था, और आगे भी इसका कई कई बार दोहराव हुआ है। इसी ’रसिकेषु’ के बनने की कहानी सुनते हैं तुषार जी से, जिनसे आपका यह दोस्त सुजॉय चटर्जी मुख़ातिब हुआ था। 

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19. श्यामा



निधन: 14 नवंबर 2017

श्यामा सन 1950 के दशक की मशहूर अभिनेत्री थीं। अभिनेत्री बनने से पहले श्यामा क़रीब 50 फ़िल्मों में बाल और अतिरिक्त कलाकार के तौर पर छोटे-मोटे रोल कर चुकी थीं। श्यामा ने 1946 में रिलीज़ हुई ‘घूंघट’, ‘नई मां’ और ‘निशाना’ जैसी कुछ शुरुआती फ़िल्मों में ख़ुर्शीद (जूनियर) और बेबी ख़ुर्शीद के नाम से काम किया। लेकिन चूंकि उस ज़माने में इसी नाम की एक बहुत बड़ी स्टार पहले से फ़िल्मों में काम कर रही थीं, इसलिए उन्हें अपना नाम बदलकर 'बेबी श्यामा' रख लेना पड़ा था। अभिनेत्री श्यामा का जन्म 12 जून सन 1935 को लाहौर, पाकिस्तान में हुआ था। उनका वास्तविक नाम ख़ुर्शीद अख़्तर था। उनके अब्बा फलों के कारोबारी थे। श्यामा महज़ दो साल की थीं, जब उनके अब्बा कारोबार के सिलसिले में लाहौर छोड़कर परिवार के साथ मुंबई चले आए थे। नौ भाई-बहनों में वह सबसे छोटी थीं। एक मुलाक़ात के दौरान श्यामा ने बताया था कि फ़िल्में उन्हें आकर्षित तो करती थीं, लेकिन उस जमाने की सामाजिक सोच को देखते हुए फ़िल्मों में काम करने की बात वह सोच भी नहीं सकती थीं। इसके बावजूद उनका इस क्षेत्र में आना महज़ इत्तेफ़ाक़ ही था, जिसे लेकर घर में और ख़ासतौर से अब्बा की तरफ़ से थोड़ा-बहुत विरोध भी हुआ था। लेकिन वह विरोध ज़्यादा दिन तक नहीं टिक पाया। श्यामा का बड़ा बेटा फ़ारूख़ मिस्त्री विज्ञापन जगत का मशहूर कैमरामैन है तो छोटा बेटा इंग्लैंड में रहता है। नादिरा, निरुपा रॉय, सितारा देवी, निम्मी, शकीला और शशिकला से उनकी गाढ़ी दोस्ती थी और इन सभी का आपस में मिलना-जुलना होता रहता था। लेकिन नादिरा और निरुपा रॉय जो इनके घर के क़रीब ही रहती थीं, अब जीवित नहीं हैं। एक दिन श्यामा अपनी सहेलियों के साथ एक फ़िल्म की शूटिंग देखने गयीं। वह फ़िल्म थी ‘ईस्टर्न पिक्चर्स’ के बैनर में बनी ‘ज़ीनत’, जिसके निर्माता-निर्देशक, नूरजहां के शौहर सैयद शौक़त हुसैन रिज़वी थे। श्यामा के मुताबिक़ शौक़त हुसैन ने सेट पर मौजूद लड़कियों से पूछा कि- "क्या वह फ़िल्म में काम करना चाहेंगी", तो श्यामा और उनकी सहेलियों ने तुरंत हामी भर दी। साल 1945 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘ज़ीनत’ की क़व्वाली ‘आहें ना भरीं शिक़वे ना किए’ में श्यामा महज़ नौ साल की उम्र में पहली बार परदे पर नज़र आयी थीं। गीतकार ‘नख़्शब’ की लिखी, हफ़ीज़ ख़ां द्वारा संगीतबद्ध और नूरजहां, जोहराबाई अम्बालेवाली और कल्याणीबाई की गायी ये क़व्वाली अपने दौर में बेहद मशहूर हुई थी। परदे पर इस क़व्वाली में श्यामा का साथ शशिकला और शालिनी ने दिया था। श्यामा के अभिनय से सजी उल्लेखनीय फ़िल्में हैं ’तराना’, ’श्रीमतीजी’, ’ठोकर’, ’सज़ा’, ’आसमान’, ’शर्त’, ’आर पार’, ’मुसाफ़िरख़ाना’, ’छू मन्तर’, ’लाला रुख़’, ’भाई-भाई’, ’भाभी’, ’शारदा’, ’बरसात की रात’, ’दुनिया झुकती है’ आदि।


20. बहादुर नानजी



निधन: 24 नवंबर 2017

बहादुर नानजी का नाम शायद बहुत अधिक लोगों को पता ना हो। और हो भी तो कैसे जब हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री में साज़िन्दों और संगीत संयोजकों की उतनी क़द्र नहीं है जितनी संगीतकार की। बहुत सी जानीमानी फ़िल्मों में बतौर ऑरगैन प्लेयर व संगीत संयोजक के रूप में काम करने वाले फ़नकार बहादुर नानजी का 96 वर्ष की आयु में 24 नवंबर 2017 को निधन हो गया। नानजी भाई ने अपने ज़माने के लगभग सभी दिग्गज संगीतकारों के साथ काम किया जिनमें शामिल हैं नौशाद, रोशन, शंकर-जयकिशन, ओ.पी. नय्यर और नीनू मज़ुमदार। इन तमाम दिग्गजों के गीतों में उन्होंने ऑरगैन बजाया, और कई फ़िल्मों में बतौर म्युज़िक अरेंजर भी इनके लिए काम किया। फ़िल्म ’सीमा’ के गीत "तू प्यार का सागर है", फ़िल्म ’बैजु बावरा’ का "ओ दुनिया के रखवाले", तथा नौशाद के ही संगीत में "मोहे भूल गए सांवरिया" और "बचपन की मोहब्बत को दिल से ना भुला देना" जैसी हिट गीतों में बहादुर नानजी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। 2013 में नानजी भाई को ’स्वर आलाप’ ने स्टेज पर सम्मानित करते हुए फ़िल्म संगीत में उनके उल्लेखनीय योगदान पर प्रकाश डाली गई।



21. शशि कपूर


निधन: 4 दिसंबर 2017


शशि कपूर का असली नाम बलबीर राज कपूर था। इनका जन्म जाने माने अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के घर हुआ। अपने पिता एवं भाइयो के नक़्शे कदम पर चलते हुए इन्होने भी फ़िल्मो में ही अपनी तक़दीर आजमाई। शशि कपूर ने ४० के दशक से ही फ़िल्मो में कम करना शुरू कर दिया था। उन्होंने कई धार्मिक फ़िल्मो में भूमिकाये निभाई। इन्होने मुंबई के डॉन बोस्को स्कूल से पढ़ाई पूरी की। पिता पृथ्वीराज कपूर इन्हें छुटिट्यो के दौरान स्टेज पर अभिनय करने के लिए प्रोत्साहित करते रहते थे। इसका नतीजा रहा कि शशि के बड़े भाई राजकपूर ने उन्हें 'आग' (१९४८) और 'आवारा' (१९५१) में भूमिकाएं दी। आवारा में उन्होंने राजकपूर (जय रुद्) बचपन का रोल किया था। ५० के दशक मे पिता की सलाह पर वे गोद्फ्रे कैंडल के थियेटर ग्रुप 'शेक्स्पियाराना' में शामिल हो गए और उसके साथ दुनिया भर में यात्रायें की। इसी दौरान गोद्फ्रे की बेटी और ब्रिटिश अभिनेत्री जेनिफर से उन्हें प्रेम हुआ और मात्र २० वर्ष की उम्र में १९५० में विवाह कर लिया। शशि कपूर ने गैर परम्परागत किस्म की भूमिकाओ के साथ सिनेमा के परदे पर आगाज किया था। उन्होंने सांप्रदायिक दंगो पर आधारित धर्मपुत्र (१९६१) में काम किया था। उसके बाद ’चार दीवारी’ और ’प्रेमपत्र’ जैसी ऑफ बीट फ़िल्मों में नजर आये। वे हिंदी सिनेमा के पहले ऐसे अभिनेता थे जिन्होंने हाउसहोल्डर और शेक्सपियर वाला जैसी अंग्रेजी फ़िल्मो में मुख्या भूमिकाये निभाई। वर्ष १९६५ उनके लिए एक महत्वपूर्ण साल था। इसी साल उनकी पहली जुबली फ़िल्म 'जब जब फूल खिले' रिलीज हुई और यश चोपड़ा ने उन्हें भारत की पहली बहुल अभिनेताओ वाली हिंदी फ़िल्म 'वक्त' के लिए कास्ट किया। बॉक्स ऑफिस पर लगातार दो बड़ी हिट फ़िल्मो के बाद व्यावहारिकता का तकाजा यह था की शशि कपूर परम्परागत भूमिकाये करे, लेकिन उनके अन्दर का अभिनेता इसके लिए तैयार नहीं था। इसके बाद उन्होंने 'ए मत्तेर ऑफ़ इन्नोसेंस' और 'प्रीटी परली ६७' जसी फ़िल्मे की. वहीँ हसीना मन जाएगी, प्यार का मोसम ने उन्हें एक चोकलेटी हीरो के रूप में स्थापित किया। वर्ष १९७२ की फ़िल्म सिथार्थ के साथ उन्होंने अन्तराष्ट्रीय सिनेमा के मंच पर अपनी मोजुदगी कायक राखी. ७० के दसक में शशि कपूर सबसे व्यस्त अभिनेताओ में से एक थे। इसी दसक में उनकी 'चोर मचाये शोर', ’दीवार’, ’कभी-कभी’, ’दूसरा आदमी’ और 'सत्यम शिवम् सुन्दरम' जैसी हिट फ़िल्में रिलीज हुईं. वर्ष १९७१ में पिता पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद शशि कपूर ने जेनिफर के साथ मिलकर पिता के स्वप्न को जारी रखने के लिए मुंबई में पृथ्वी थियेटर का पुनरूथान किया। अमिताभ बच्चन के साथ आई उनकी फ़िल्मो दीवार, कभी - कभी, त्रिशूल, सिलसिला, नमक हलाल, दो और दो पञ्च, शान ने भी उन्हें बहुत लोकप्रियता दिलवाई। १९७७ में इन्होने अपनी होम प्रोडक्सन क. 'फ़िल्म्वालाज' लॉन्च की। 

(साभार: विकिपीडिया)

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Tuesday, December 26, 2017

ऑडियो: मुंशी प्रेमचंद की 'नेउर'

इस लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम आपको सुनवाते रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने मुंशी प्रेमचंद की एक भावमय कहानी शूद्रा समीर गोस्वामी के स्वर में सुनी थी।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं मुंशी प्रेमचंद की एक भावमय कथा नेउर जिसे स्वर दिया है समीर गोस्वामी ने।

एक शताब्दी से हिन्दी (एवं उर्दू) साहित्य जगत में मुंशी प्रेमचंद का नाम एक सूर्य की तरह चमक रहा है। विशेषकर, ज़मीन से जुड़े एक कथाकार के रूप में उनकी अलग ही पहचान है। उनके पात्रों और कथाओं का क्षेत्र काफी विस्तृत है फिर भी उनकी अनेक कथाएँ भारत के ग्रामीण मानस का चित्रण करती हैं। उनका वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। वे उर्दू में नवाब राय और हिन्दी में प्रेमचंद के नाम से लिखते रहे। आम आदमी की बेबसी हो या हृदयहीनों की अय्याशी, बचपन का आनंद हो या बुढ़ापे की जरावस्था, उनकी कहानियों में सभी अवस्थाएँ मिलेंगी और सभी भाव भी। उनकी कहानियों पर फिल्में भी बनी हैं और अनेक रेडियो व टीवी कार्यक्रम भी। उनकी पहली हिन्दी कहानी सरस्वती पत्रिका के दिसंबर 1915 के अंक में "सौत" शीर्षक से प्रकाशित हुई थी और उनकी अंतिम प्रकाशित (1936) कहानी "कफन" थी।

प्रस्तुत कथा का गद्य "हिंदी समय" पर उपलब्ध है। "नेउर" का कुल प्रसारण समय 22 मिनट है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।





मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ ... मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं।
~ मुंशी प्रेमचंद (1880-1936)

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"तुमसे तम्बाकू पिये बिना कैसे रहा जाता है नेउर काका?”
(मुंशी प्रेमचन्द कृत "नेउर" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
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नेउर MP3

#22th Story, Neur: Munshi Premchand/Hindi Audio Book/2017/22. Voice: Sameer Goswami

Monday, December 25, 2017

फिल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड 20 || नौशाद

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 20
Naushad 


फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के 20 वें एपिसोड में सुनिए कहानी सुरों के जादूगर नौशाद की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....


फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -

Sunday, December 24, 2017

ठुमरी काफी : SWARGOSHTHI – 349 : THUMARI KAFI




स्वरगोष्ठी – 349 में आज

फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व – 6 : श्रृंगार का वियोग पक्ष रेखांकित

रंगमंच पर नृत्य के साथ प्रस्तुत की गई ठुमरी - "कासे कहूँ मन की बात..."




सुधा मल्होत्रा
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की इस छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला में हमने आपके लिए फिल्मों में पारम्परिक ठुमरी के साथ-साथ उसके फिल्मी प्रयोग को भी रेखांकित किया था। इस श्रृंखला में भी हम केवल फिल्मी ठुमरियों की चर्चा कर रहे हैं, किन्तु ये ठुमरियाँ पारम्परिक हों, यह आवश्यक नहीं हैं। इन ठुमरी गीतों को फिल्मों के प्रसिद्ध गीतकारों ने लिखा है और संगीतकारों ने इन्हें विभिन्न रागों में बाँध कर ठुमरी गायकी के तत्वों से अभिसिंचित किया है। हमारी इस श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल किये गए ऐसे गीत हैं जिनमे राग, भाव और रस की दृष्टि से उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी के तत्वों का उपयोग हुआ है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे पाँचवें और छठे दशक की ऐसी ही कुछ गैर-पारम्परिक चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात कर रहे हैं। आज हम आपके लिए जो ठुमरी गीत प्रस्तुत करने जा रहें हैं, फिल्म में उसे ब्रिटिश शैली के रंगमंच पर, कुछ ख़ास दर्शकों के बीच फिल्माया गया है। 1959 में प्रदर्शित फिल्म "धूल का फूल" में शामिल इस ठुमरी के बोल हैं "कासे कहूँ मन की बात..."। गीत में श्रृंगार का वियोग पक्ष ही रेखांकित हुआ है, परन्तु एक अलग अन्दाज़ में। नायिका अपने प्रेमी के प्रति शिकवे-शिकायत व्यक्त करती है। गीत का मुखड़ा एक परम्परागत ठुमरी पर आधारित है। राग "काफी", तीन ताल और कहरवा में निबद्ध इस ठुमरी का गायन सुधा मल्होत्रा ने किया है। परदे पर इसे नृत्य की संगति में गाया गया है।


“फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” विषयक श्रृंखला में इन दिनों हम ठुमरी शैली के विकास- क्रम पर चर्चा कर रहे हैं। बनारस में ठुमरी पर चटक लोक-रंग चढ़ा। यह वह समय था जब अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम विफल हो गया था और एक-एक कर देशी रियासतें ब्रिटिश शासन के कब्जे में आते जा रहे थे। कलाकारों से राजाश्रय छिनता जा रहा था। भारतीय कलाविधाओं को अंग्रेजों ने हमेशा उपेक्षित किया। ऐसे कठिन समय में तवायफों ने, भारतीय संगीत; विशेष रूप से ठुमरी शैली को जीवित रखने में अमूल्य योगदान किया। भारतीय फिल्मों के प्रारम्भिक तीन-चार दशकों में अधिकतर ठुमरियाँ तवायफों के कोठे पर ही प्रस्तुत की गई। पिछले अंक में अवध के जाने-माने संगीतज्ञ उस्ताद सादिक अली खाँ का जिक्र हुआ था। अवध की सत्ता नवाब वाजिद अली शाह के हाथ से निकल जाने के बाद सादिक अली ने ही ठुमरी का प्रचार देश के अनेक भागों में किया था। सादिक अली खाँ के एक परम शिष्य थे भैयासाहब गणपत राव; जो ठुमरी गायन के साथ-साथ हारमोनियम वादन में दक्ष थे। सादिक अली से प्रेरित होकर गणपत राव हारमोनियम जैसे विदेशी वाद्य पर ठुमरी और दादरा के बोल इतनी सफाई से बजाते थे कि श्रोता चकित रह जाते थे। भैयासाहब ने भी बनारस, गया, कलकत्ता आदि केन्द्रों में ठुमरी का प्रचार-प्रसार किया था। भैया गणपत राव ग्वालियर के थे और इनकी माँ का नाम चन्द्रभागा बाई था। महाराजा ग्वालियर की वह प्रेयसी थीं और एक कुशल गायिका भी थीं। भैया जी अपने समय के संगीतज्ञों में अद्वितीय थे। उनका पालन-पोषण संगीत के प्रमुख केन्द्र ग्वालियर में हुआ था, परन्तु उनकी स्वाभाविक अभिरुचि लोकप्रिय संगीत की ओर थी। सादिक अली की ठुमरियों पर दीवाने होकर उन्होंने लखनऊ की ठुमरी को अपनाया।

उन दिनों हारमोनियम भारतीय शास्त्रीय संगीत में उपेक्षित था। गायन संगति के लिए सारंगी का ही प्रयोग मान्य था। यह उचित भी था; क्योंकि सारंगी ही एक ऐसा वाद्य है जो मानव-कण्ठ के सर्वाधिक निकट है। ऐसे माहौल में गणपत राव ने हारमोनियम जैसे विदेशी वाद्य को अपनाया और उस साज़ पर वह ठुमरी के बोलों को इतनी कुशलता से बजाते थे कि बड़े-बड़े सारंगी वादक भी यह कार्य नहीं कर पाते थे। यह भैया गणपत राव के साहसिक कदम का ही प्रतिफल है कि आज हारमोनियम केवल ठुमरी में ही नहीं बल्कि हर प्रकार के संगीत में धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है। यहाँ तक कि आजादी के बाद तक "आकाशवाणी" में प्रतिबन्धित हारमोनियम आज स्टूडियो की शोभा बढ़ा रहा है। ठुमरी की विकास-यात्रा में नये-नये प्रयोग हुए तो कुछ भ्रान्तियाँ और रूढ़ियाँ भी टूटीं। ठीक इसी प्रकार फिल्मों में भी ठुमरी के कई नए प्रयोग किये गए। राज-दरबारों से लेकर तवायफ के कोठे तक ठुमरियों का फिल्मांकन हुआ। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में ब्रिटिश रंगमंच की देखा-देखी शेक्सपीयर के नाटकों के मंचन और ओपेरा आदि के लिए बने रंगमंच पर ठुमरियों और कथक नृत्य की प्रस्तुतियाँ होने लगी थीं| ठुमरी दरबार की ऊँची दीवार से बाहर तो निकल आई, लेकिन जनसामान्य से उसकी दूरी अभी भी बनी हुई थी। ऐसे आयोजन विशिष्ट लोगों के लिए ही होते थे।

आज जो ठुमरी गीत आपके लिए हम प्रस्तुत करने जा रहें हैं, फिल्म में यह ब्रिटिश शैली के रंगमंच पर, कुछ ख़ास दर्शकों के बीच प्रस्तुत की गई है। 1959 में प्रदर्शित फिल्म "धूल का फूल" में शामिल इस ठुमरी के बोल हैं "कासे कहूँ मन की बात..."। गीत में श्रृंगार का वियोग पक्ष ही रेखांकित हुआ है, परन्तु एक अलग अन्दाज़ में। नायिका अपने प्रेमी के प्रति शिकवे-शिकायत व्यक्त करती है। गीत का मुखड़ा एक परम्परागत ठुमरी पर आधारित है। थोड़े फेर-बदल के साथ ठुमरी "कासे कहूँ मन की बात..." के स्थायी की यही पंक्तियाँ कुछ अन्य फ़िल्मों में भी प्रयोग हुए हैं। 1954 की फिल्म "सुबह का तारा" और 1979 में बनी फिल्म "भलामानुष" में इस ठुमरी की स्थायी पंक्तियाँ प्रयोग की गई हैं। राग "काफी", तीन ताल और कहरवा में निबद्ध फिल्म “धूल का फूल” की इस ठुमरी का गायन सुधा मल्होत्रा ने किया है। फिल्मी परदे पर इसे नृत्य की संगति में गाया गया है। गायिका गायन के साथ-साथ सितार वादन भी करती है। गीत के प्रारम्भ में सितार पर बेहद आकर्षक आलाप और उसके बाद सरगम प्रस्तुत किया गया है। फिल्म "धूल का फूल" की इस ठुमरी गीत के प्रसंग में अभिनेता अशोक कुमार, नन्दा, राजेन्द्र कुमार और माला सिन्हा दर्शक के रूप मौजूद हैं। फिल्म में गीत साहिर लुधियानवी का और संगीत एन. दत्ता का है। आइए राग "काफी" में निबद्ध फिल्म "धूल का फूल" की यह ठुमरी सुधा मल्होत्रा की आवाज़ में सुनते हैं।

ठुमरी काफी : “कासे कहूँ मन की बात...” : सुधा मल्होत्रा : फिल्म – धूल का फूल



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 349वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको 1959 में प्रदर्शित एक फिल्म से एक ठुमरी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही प्रश्न का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष के अन्तिम अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद महाविजेताओं की घोषणा भी की जाएगी।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 30 दिसम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 351वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 347वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1958 में प्रदर्शित फिल्म “कालापानी” से एक ठुमरी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग खमाज, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – आशा भोसले

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे प्रतिभागी हैं – एक अन्तराल के बाद चित्तौड़गढ़, राजस्थान से हमारी नियमित पाठक / श्रोता इन्दु पुरी गोस्वामी ने पहेली प्रतियोगिता में भाग लिया और तीनों प्रश्नो का सही उत्तर दिया है। अन्य सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की आज की कड़ी में आपने 1959 में प्रदर्शित फिल्म “धूल का फूल” के ठुमरी गीत का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे फिल्मी गीतों पर चर्चा कर रहे हैं, जिसमें आपको ठुमरी शैली के दर्शन होंगे। आज आपने जो ठुमरी गीत सुना, वह राग काफी पर आधारित है। इस श्रृंखला में भी हम आपसे फिल्मी ठुमरियों पर चर्चा कर रहे हैं और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा भी जारी है। हमारी वर्तमान और आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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