Wednesday, November 30, 2016

"विकलांगता पर हमारी फ़िल्में अधिक संवेदनशील और व्यावहारिक होनी चाहिए" - संजीवन लाल : एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है 
एपिसोड - 39


किसी दिव्यांग व्यक्ति और उसके आस पास के सप्पोर्ट सिस्टम पर बनी फिल्मों में एक ख़ास स्थान रखती है फिल्म "बबल गम", जिसके निर्देशक संजीवन एस लाल हैं हमारे आज के मेहमान, जिनसे हमने विकलांगता के विषय पर बनी कुछ अन्य फिल्मों पर भी चर्चा की, ३ दिसंबर को विश्व विकलांगता दिवस के उपलक्ष्य पर हमारा ये विशेष एपिसोड, हमें उम्मीद है आपको पसंद आएगा....प्ले पर क्लिक कर सुनें और आनंद लें....  



ये एपिसोड आपको कैसा लगा, अपने विचार आप 09811036346 पर व्हाट्सएप भी कर हम तक पहुंचा सकते हैं, आपकी टिप्पणियां हमें प्रेरित भी करेगीं और हमारा मार्गदर्शन भी....इंतज़ार रहेगा. एक मुलाकात ज़रूरी है के इस एपिसोड के प्रायोजक थे अमेजोन डॉट कॉम, अमोज़ोन पर अब आप खरीद सकते हैं, महान कथाकार प्रेमचंद की अनमोल कहानियों का ये संकलन, खरीदने के लिए क्लिक करें एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें.

मिलिए इन जबरदस्त कलाकारों से भी -
मंजीरा गांगुली, रितेश शाह, वरदान सिंह, यतीन्द्र मिश्र, विपिन पटवा, श्रेया शालीन, साकेत सिंह, विजय अकेला, अज़ीम शिराज़ी, संजोय चौधरी, अरविन्द तिवारी, भारती विश्वनाथन, अविषेक मजुमदर, शुभा मुदगल, अल्ताफ सय्यद, अभिजित घोषाल, साशा तिरुपति, मोनीश रजा, अमित खन्ना (पार्ट ०१), अमित खन्ना (पार्ट २), श्रध्दा भिलावे, सलीम दीवान, सिद्धार्थ बसरूर, बबली हक, आश्विन भंडारे , आर्व, रोहित शर्मा, अमानो मनीष, मनोज यादव, इब्राहीम अश्क, हेमा सरदेसाई, बिस्वजीत भट्टाचार्जी (बिबो), हर्षवर्धन ओझा, रफीक शेख, अनुराग गोडबोले, रत्न नौटियाल, डाक्टर सागर

Tuesday, November 29, 2016

गीत चतुर्वेदी का रानीखेत एक्स्प्रैस

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। इस शृंखला में पिछली बार आपने पूजा अनिल के स्वर में दर्शन सिंह आशट की बालकथा "गोपी लौट आया" का वाचन सुना था।

साहित्यकार गीत चतुर्वेदी के जन्मदिन के शुभ अवसर पर उन्हें शुभकामनाएं देते हुए आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं उनके उपन्यास रानीखेत एक्स्प्रैस का एक अंश जिसे स्वर दिया है पूजा अनिल ने।

प्रस्तुत अंश का कुल प्रसारण समय 9 मिनट 59 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। इस उपन्यास अंश का गद्य सबद ब्लॉग पर पढा जा सकता है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

27 नवम्बर 1977 को मुम्बई में जन्मे गीत चतुर्वेदी हिंदी के कवि, लेखक व आलोचक हैं।


हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

“उस दौरान मुझे पहली बार लगा कि प्यार में भी जेनरेशन गैप होता है।”
 (गीत चतुर्वेदी के उपन्यास रानीखेत एक्स्प्रेस से एक अंश)



नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
रानीखेत एक्सप्रेस MP3

#Twenty First Story, Ranikhet Express; Geet Chaturvedi; Hindi Audio Book/2016/21. Voice: Pooja Anil

Sunday, November 27, 2016

राग भीमपलासी : SWARGOSHTHI – 294 : RAG BHIMPALASI



स्वरगोष्ठी – 294 में आज

नौशाद के गीतों में राग-दर्शन – 7 : भीमपलासी के स्वर में पिरोया गीत

“तेरे सदक़े बलम न करे कोई ग़म.....”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज के अंक में हम आपसे राग भीमपलासी पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला में हम भारतीय फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान नौशाद अली के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला का समापन हम आगामी 25 दिसम्बर को नौशाद अली की 98वीं जयन्ती के अवसर पर करेंगे। 25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता वाहिद अली घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करते थे। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठते, साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। फिल्म प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ करता था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए माया नगरी बम्बई की ओर रुख किया।


फिल्मों में अपने सांगीतिक जीवन के पहले दशक में ही नौशाद को इतनी सफलता मिल चुकी थी कि 1949 की फिल्म ‘अन्दाज़’ से उन्हें एक फिल्म के लिए एक लाख रुपये पारिश्रमिक मिलने लगा था। कई संगीतकारों के पाकिस्तान चले जाने के कारण सबसे अधिक लाभ नौशाद और सी. रामचन्द्र को हुआ। इस समय तक नौशाद की फिल्मों में मुख्य गायिकाओं के रूप में ज़ोहराबाई, उमा देवी (टुनटुन), निर्मला देवी और शमशाद बेगम का वर्चस्व रहा। फिल्म ‘अन्दाज’ से ही नौशाद के खेमे में लता मंगेशकर का पदार्पण हुआ, जो काफी सफल और लम्बे समय तक जारी रहा। वर्ष 1949 में प्रदर्शित फिल्म ‘अन्दाज’ के निर्माण की योजना बन रही थी। निर्माण के दौरान ही नौशाद से किसी ने लता मंगेशकर के सुरीलेपन की चर्चा की। यह भी विचारणीय होगा कि नौशाद और लता मंगेशकर की परस्पर भेंट माध्यम कौन था? इस सवाल के जवाब में कई किस्से प्रचलित हैं। पहला किस्सा यह चर्चित है कि स्टूडियो में कार्यरत एक मराठीभाषी चपरासी ने लता मंगेशकर के बारे में नौशाद को जानकारी दी थी। संगीतकार गुलाम हैदर और पार्श्वगायक जी.एम. दुर्रानी का नाम भी इस मामले में लिया जाता है। यह भी कहा जाता है कि कारदार स्टूडिओ में बगल से गुनगुनाते हुए गुजरती लता मंगेशकर की सुरीली आवाज़ से प्रभावित होकर नौशाद ने उन्हें बुलवाया था, पर शायद सच यही है कि फिल्म ‘मजबूर’ में लता मंगेशकर के साथ गा चुके मुकेश ने ही नौशाद से लता मंगेशकर का परिचय कराया था। बहरहाल, लता मंगेशकर से नौशाद बहुत प्रभावित हुए और उनके साथ नौशाद ने मेहनत भी बहुत की। लता मंगेशकर ने न केवल उर्दू शब्दों के शुद्ध उच्चारण बल्कि शब्दों को आत्मसात कर उनकी भावनात्मक प्रस्तुति का कौशल भी नौशाद से सीखा। लता मंगेशकर सीधे-सीधे नौशाद के खेमे की प्रमुख गायिका बन गईं।

नौशाद  और  लता  मंगेशकर
1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘अमर’ की मुख्य नायिका के लिए एक बार फिर नौशाद ने लता मंगेशकर की आवाज़ का चयन किया। लेखक राजू भारतन ने लता मंगेशकर पर लिखी अपनी पुस्तक, ‘लता मंगेशकर – ए बायोग्राफी’ में फिल्म ‘अमर’ के एक गीत “तेरे सदक़े बलम...” की रिकार्डिंग के अवसर की एक दिलचस्प घटना का उल्लेख किया है। उनके अनुसार गीत में एक स्थान पर एक मुरकी थी, जिसे यथावत लेने में लता मंगेशकर को असुविधा हो रही थी। रिकार्डिग के दिन उनकी तबीयत ठीक नहीं थी और उन्होने कुछ खाया भी नहीं था। रिकार्डिंग का तीसरा टेक हो रहा था, जब लता मंगेशकर एकाएक बेहोश हो गईं। अफरा-तफरी में लोग इधर-उधर दौड़े, और पानी के छींटे मारने पर उन्हें होश भी आ गया, परन्तु कार्य के प्रति उनका समर्पण देखिए कि होश में आते ही उनके मुँह से निकला कि नौशाद साहब, मैं वह मुरकी नहीं ले पाई। संगीत के प्रति उनके समर्पण ने ही फिल्म ‘अमर’ तक वह इस ऊँचाई तक पहुँच गई थी कि उनके आसपास कोई नहीं था। अब हम आपको फिल्म ‘अमर’ का यही गीत सुनवाते हैं। नौशाद का राग भीमपलासी के स्वरों में पिरोया यह गीत लता मंगेशकर ने दादरा ताल में गाया है।

राग भीमपलासी : “तेरे सदक़े बलम...” : लता मंगेशकर : फिल्म – अमर



उस्ताद  गुलाम  मुस्तफा  खाँ
राग ‘भीमपलासी’ भारतीय संगीत का एक ऐसा राग है, जिसमें भक्ति और श्रृंगार रस की रचनाएँ खिल उठती है। यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात आरोह में पाँच स्वर- सा, ग (कोमल), म, प, नि (कोमल), सां और अवरोह में सात स्वर- सां नि (कोमल), ध, प, म ग (कोमल), रे, सा प्रयोग किए जाते हैं। इस राग में गान्धार और निषाद कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। यह काफी थाट का राग है और इसका वादी और संवादी स्वर क्रमशः मध्यम और तार सप्तक का षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर मध्यम के स्थान पर पंचम का प्रयोग भी किया जाता है। भीमपलासी के गायन-वादन का समय दिन का चौथा प्रहर होता है। कर्नाटक संगीत पद्यति में ‘भीमपलासी’ के समतुल्य राग है ‘आभेरी’। ‘भीमपलासी’ एक ऐसा राग है, जिसमें खयाल-तराना से लेकर भजन-ग़ज़ल की रचनाएँ संगीतबद्ध की जाती हैं। श्रृंगार और भक्ति रस की अभिव्यक्ति के लिए यह वास्तव में एक आदर्श राग है। आइए अब हम आपको इसी राग में कण्ठ संगीत का एक मोहक उदाहरण सुनवाते हैं। सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ के स्वरों में राग भीमपलासी में निबद्ध एक मोहक खयाल रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। आप इस रचना का रसास्वादन कीजिए और मुझे, आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भीमपलासी : “अब तो बड़ी देर भई...” : उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 294वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1957 में प्रदर्शित एक उल्लेखनीय हिन्दी फिल्म के एक गीत का अंश सुनवाते हैं। इस गीत के अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 297वें अंक की पहेली का उत्तर सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।







1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – गीत के इस अंश में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप इस पार्श्वगायक की आवाज़ को पहचान सकते हैं? हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 3 दिसम्बर 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 296वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 292 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘शबाब’ से एक राग केन्द्रित गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – मुल्तानी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक – उस्ताद अमीर खाँ

इस बार की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागियों में से पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आप सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर अपने सैकड़ों पाठकों के अनुरोध पर जारी लघु श्रृंखला “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” के आज के अंक में आपने राग भीमपलासी के स्वरों में पिरोये एक गीत का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला के लिए हमने संगीतकार नौशाद के आरम्भिक दो दशकों की फिल्मों के गीत चुने हैं। श्रृंखला के आलेख को तैयार करने के लिए हमने फिल्म संगीत के जाने-माने इतिहासकार और हमारे सहयोगी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। गीतों के चयन के लिए हमने अपने पाठकों की फरमाइश का ध्यान रखा है। यदि आप भी किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 


Saturday, November 26, 2016

"प्यार किया तो डरना क्या...”, ’एक गीत सौ कहानियाँ’ की 100-वीं कड़ी में इस कालजयी रचना की बातें


एक गीत सौ कहानियाँ - 100 (अंतिम कड़ी)
 

'जब प्यार किया तो डरना क्या...' 



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तंभ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 100-वीं कड़ी में आज जानिए 1960 की कालजयी फ़िल्म ’मुग़ल-ए-आज़म’ के मशहूर गीत "प्यार किया तो डरना क्या...” के बारे में जिसे लता मंगेशकर ने गाया था। बोल शिव शक़ील बदायूंनी के और संगीत नौशाद का।

फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी किस्से-कहानियाँ सुनाते हुए आज हम आ पहुँचे हैं ’एक गीत सौ कहानियाँ’ स्तंभ के 100-वें पड़ाव पर। और यहाँ पहुँच कर रुकती है यह कारवाँ। ’एक गीत सौ कहानियाँ’ के इस सीज़न का यही है समापन अंक। आप सभी ने इस सफ़र में हमारा पूरा-पूरा साथ दिया, इस मंज़िल तक हमने साथ-साथ सफ़र तय किया, इसके लिए हम आप सभी पाठकों के आभारी हैं। इस सीज़न के इस अन्तिम अंक को ख़ास बनाने के लिए हम लेकर आए हैं एक बहुत ही ख़ास गीत। यह उस फ़िल्म का गीत है जो हिन्दी फ़िल्म इतिहास के 10 सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में गिना जाता है। और यह वह गीत है जो फ़िल्म-संगीत इतिहास के 10 सर्वश्रेष्ठ रोमान्टिक गीतों में गिना जाता है। यह फ़िल्म है ’मुग़ल-ए-आज़म’ और यह गीत है “प्यार किया तो डरना क्या...”। 

‘मुग़ल-ए-आज़म' 1960 की सर्वाधिक चर्चित फ़िल्म। के. आसिफ़ निर्देशित इस महत्वाकांक्षी फ़िल्म की नीव सन् 1944 में रखी गयी थी। दरसल बात ऐसी थी कि आसिफ़ साहब ने एक नाटक पढ़ा। उस नाटक की कहानी शहंशाह अकबर के राजकाल के पार्श्व में लिखी गयी थी। कहानी उन्हें अच्छी लगी और उन्होंने इस पर एक बड़ी फ़िल्म बनाने की सोची। लेकिन उन्हें उस वक़्त यह अन्दाज़ा भी नहीं हुआ होगा कि उनके इस सपने को साकार होते 16 साल लग जायेंगे। 'मुग़ल-ए-आज़म' अपने ज़माने की बेहद महंगी फ़िल्म थी। एक एक गीत के सीक्वेन्स में इतना खर्चा हुआ कि जो उस दौर के किसी पूरी फ़िल्म का खर्च होता था। नौशाद के संगीत निर्देशन में भारतीय शास्त्रीय संगीत व लोक संगीत की छटा लिए इस फ़िल्म में कुल 12 गीत थे जिनमें आवाज़ें दी उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ, लता मंगेशकर, शम्शाद बेग़म और मोहम्मद रफ़ी। हिन्दी फ़िल्म संगीत के इतिहास का यह एक स्वर्णिम अध्याय रहा। यहाँ तक कि इस फ़िल्म के सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "प्यार किया तो डरना क्या" को शताब्दी का सबसे रोमांटिक गीत का ख़िताब भी दिया गया था। 

नौशाद साहब के ज़बान से 'मुग़ल-ए-आज़म' के साथ जुड़ी उनकी यादों के उजाले पेश हैं, नौशाद साहब की ये
शकील, लता और नौशाद
बातें हमें प्राप्त हुईं हैं विविध भारती के 'नौशाद-नामा' कार्यक्रम के ज़रिए - "मुझे एक क़िस्सा याद है, इसी घर में (जहाँ उनका यह 'इंटरव्यू' रिकार्ड हुआ था) छत पर एक कमरा है। एक दिन मैं वहाँ बैठकर अपनी आँखें बंद करके फ़िल्म 'अमर' का एक गाना बना रहा था। ऐसे में के. आसिफ़ वहाँ आये और नोटों की एक गड्डी, जिसमें कुछ 50,000 रुपय थे, उन्होंने मेरी तरफ़ फेंका। यह अगली फ़िल्म के लिए 'अडवांस' था। मेरा सर फिर गया और उन पर चिल्लाया, "यह आपने क्या किया, आपने मेरा सारा काम ख़राब कर दिया, आप अभी ये पैसे उठाकर ले जायो और ऐसे किसी आदमी को दे दो जो पैसों के बग़ैर काम नहीं करता हो।" थोड़ी देर के बाद आसिफ़ साहब कहने लगे कि मैं 'मुग़ल-ए-आज़म'  बनाने जा रहा हूँ। मैंने कहा, "कोई भी आज़म बनाइए, मैं आपके साथ हूँ क्युंकि आपका और हमारा उस वक़्त का साथ है जब दादर पर हम इरानी होटल में एक कप चाय आधी आधी पीते थे"। हमने कहा कि "हमारा आपका साथ उस वक़्त का है, क्या आप ये पैसे नहीं देंगे तो मैं काम नहीं करूँगा?" वो नीचे गये और मेरी पत्नी से कहा कि "अरे, वो उपर छत पर नोट फेंक रहे हैं।" वो मेरी पतनी को उपर ले आये और ज़मीन पर फैले नोटों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा, "मैनें दिया था उनको 'अडवांस', वो रखे नहीं"। तब मैने कहा, "देखिए, यह आप रखिए पैसे अपने, आप बनाइए, मैं आपके साथ हूँ, ख़ुदा आपको कामयाबी दे"। फिर वह फ़िल्म बनी, और बहुत सारे साल गुज़र गये इस फ़िल्म के बनते बनते। यह वही घर है जहाँ उस फ़िल्म की मीटिंग वगेरह हुआ करती थी। आख़िर में 'मुग़ल-ए-आज़म' बनकर तय्यार हो गयी।" 

अब ज़रा इस गीत को गानेवालीं सुरकोकिला लता मंगेशकर की भी राय जान लें इस गीत के बनने की कहानी के बारे में। अभी हाल में जब IBN7 TV Channel वालों ने एक मुलाक़ात में लताजी से पूछा:

"60 के दशक की बात करें तो एक फ़िल्म जिसे हम नज़रंदाज़ नहीं कर सकते, 'मुग़ल-ए-आज़म'। वह एक गाना, जो आज भी लोगों को उतना ही 'हौंटिंग फ़ीलिंग' देता है, लोग कहते हैं कि 'रोंगटे खड़े हो जाते हैं उस गाने को सुनकर', 'प्यार किया तो डरना क्या'। गाना बहुत ही 'लीजेन्डरी' है, कहते हैं कि नौशाद साहब ने आपको बाथरूम मे वह गाना गवाया था, बताइए क्या यह सच है?" 


सवाल सुनते ही लताजी के साथ साथ सभी दर्शक ज़ोर से हँस पड़े, और फिर लताजी ने जवाब दिया - "नहीं, बाथरूम मे नहीं गवाया था, वह गाना जब हमने रिकार्ड किया, तो 'लास्ट लाइन' उनको 'रिपीट' करनी थी 'इको इफ़ेक्ट' के लिए। पर 'इको इफ़ेक्ट' तब ऐसे नहीं आता था, किसी मशीन से नहीं आता था। तो मुझे उन्होने दूसरे कमरे में खड़ा किया था, और वहाँ से मैने गाया, थोड़ा नज़दीक जाके गाया, मतलब, वही सर्कस ही चलता रहा, यहाँ से वहाँ, वहाँ से वहाँ, इस तरह से उन्होंने रिकार्ड किया था।" 


बाथरूम में नहीं गवाया था?

(हँसते हुए), जी नहीं, बाथरूम में नहीं गवाया था।

“जब प्यार किया तो डरना क्या...” गीत के दो पैरोडी संस्करण भी बने हैं, ऐसा शायद ही किसी और गीत के साथ हुआ हो। पहला गीत है मन्ना डे का गाया हुआ 1967 की फ़िल्म ’राज़’ का गीत “जब प्यार किया तो मरना क्यों, अरे प्यार किया कोई जंग नहीं की, छुरियों से फिर लड़ना क्यों”। यह गीत आइ.एस. जोहर पर फ़िल्माया गया था और हास्य रस में डुबो कर इसे पेश किया गया। गीत के बोलों के लिए कमर जलालाबादी और संगीत के लिए कल्याणजी-आनन्दजी को भले ही क्रेडिट दिया गया है, पर बोल और संगीत, दोनों के लिहाज़ से यह गीत मूल गीत से 90% मिलता-जुलता है। दूसरा पैरोडी बना 1970 में, फ़िल्म थी ’रातों का राजा’। इस फ़िल्म में गीतकार राजेश नाहटा और संगीतकार राहुल देव बर्मन ने शम्शाद बेगम और महेन्द्र कपूर से गवाया था “जब प्यार किया तो डरना क्या, प्यार किया कोई दारु नहीं पी, छुप-छुप प्याले भरना क्या”। यह भी हास्य रस आधारित गीत है जो वैशाली और राजेन्द्र नाथ पर फ़िल्माया गया। इस गीत का संगीत पूर्णत: मूल गीत की धुन पर ही है, पर बोल नए हैं, जिसे सही मायने में पैरोडी कहते हैं।

ख़ैर यह तो रही पैरोडी की बातें, लेकिन आज हम सुनेंगे मूल गीत। आइए सुनते हैं यह कालजयी रचना और ’एक गीत सौ कहानियाँ’ स्तंभ को फ़िलहाल यहीं समाप्त करने की दीजिए मुझे इजाज़त, नमस्कार! 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Thursday, November 24, 2016

"सातों बार बोले बंसी" और "जाने दो मुझे जाने दो" जैसे नगीनों से सजी है आज की "गुलज़ार-आशा-पंचम"-मयी महफ़िल



कहकशाँ - 24
गुलज़ार, पंचम और आशा ’दिल पड़ोसी है’ में  
"दिल पड़ोसी है, मगर मेरा तरफ़दार नहीं..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है गुलज़ार, राहुल देव बर्मन और आशा भोसले की तिकड़ी के सुरीले संगम से निकले दो नगमें 'दिल पड़ोसी है’ ऐल्बम से।



बाद मुद्दत के फिर मिली हो तुम,
ये जो थोड़ी-सी भर गई हो तुम,
ये वज़न तुम पर अच्छा लगता है..

अभी कुछ दिनों पहले ही भरी-पूरी फिल्मफेयर की ट्रॉफ़ी स्वीकार करते समय गुलज़ार साहब ने जब ये पंक्तियाँ कहीं तो उनकी आँखों में गज़ब का एक आत्म-विश्वास था, लहजे में पिछले ४८ सालों की मेहनत की मणियाँ पिरोई हुई-सी मालूम होती थीं और बालपन वैसा ही जैसे किसी पाँचवे दर्जे के बच्चे को सबसे सुंदर लिखने या सबसे सुंदर कहने के लिए "इन्स्ट्रुमेंट बॉक्स" से नवाज़ा गया हो। उजले कपड़ों में देवदूत-से सजते और जँचते गुलज़ार साहब ने अपनी उम्र का तकाज़ा देते हुए नए-नवेलों को खुद पर गुमान करने का मौका यह कह कर दे दिया कि "अच्छा लगता है, आपके साथ-साथ यहाँ तक चला आया हूँ।" अब उम्र बढ़ गई है तो नज़्म भी पुरानी होंगी साथ-साथ, लेकिन "दिल तो बच्चा है जी", इसलिए हर दौर में वही "छुटभैया" दिल हर बार कुछ नया लेकर हाज़िर हो जाता है। यूँ तो यह दिल गुलज़ार साहब का है, लेकिन इसकी कारगुजारियों का दोष अपने मत्थे नहीं लेते हुए, गुलज़ार साहब "विशाल" पर सारा दोष मथ देते हैं और कहते हैं कि "इस नवजवान के कारण ही मैं अपनी नज़्मों को जवान रख पाता हूँ।" अब इसे गुलज़ार साहब का बड़प्पन कहें या छुटपन, लेकिन जो भी हो, इतना तो मानना पड़ेगा कि लगभग पचास सालों से चल रही इनकी लेखनी अब भी दवात से लबालब है। अब भी दिल पर वही सुंदर-से "हस्ताक्षर" रचती रहती है, वही गोल-गोल अक्षर, गोल-गोल अंडा, मास्टर-जी का डंडा, बकड़ी की पूँछ, मास्टर-जी की मूँछ, और लो बन गया "क"। ऐसे ही प्यारे-प्यारे तरीकों से और कल्पना की उड़ानों के सहारे गुलज़ार साहब हमारे बीच की ही कोई चीज हमें सौंप जाते हैं, जिसका तब तक हमें पता हीं नहीं होता। ८ सितम्बर १९८७ को भी यही बात हुई थी। उस दिन जब गुलज़ार साहब ने हमें "दिल" का अड्डा बताया, तभी हमें मालूम हुआ कि यह नामुराद कोई और नहीं "हमारा पड़ोसी है", यह ऐसा पड़ोसी है जो "हमारे ग़म उठा लेता है, लेकिन हमारे ग़मों को दूर नहीं करता" तभी तो गुलज़ार साहब कहते हैं:

हाँ मेरे ग़म तो उठा लेता है, ग़मख्वार नहीं,
दिल पड़ोसी है, मगर मेरा तरफ़दार नहीं..

("ये जो थोड़ी-सी भर गई हो तुम..." यह सुनकर आपको नहीं लगता कि शायर ने किसी ख़ास के लिए ये अल्फ़ाज़ कहे हैं। अलग बात है कि फिल्मफेयर की ब्लैक-लेडी पर भी ये पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं, लेकिन पवन झा जी की मानें तो गुलज़ार साहब ने कुछ सालों पहले "एक ख़ास" के लिए यह नज़्म लिखी थी.. वह ख़ास कौन है? यह पूछने की ज़रूरत भी है क्या? :) )

हाँ तो हम गुलज़ार साहब और "दिल पड़ोसी है" की बातें कर रहे थे। इस एलबम के एक-एक गीत को गुलज़ार साहब ने इतनी शिद्दत से लिखा है (वैसे ये हर गीत को उतनी ही मेहनत, शिद्दत और हसरत से रचते हैं) कि मुझसे अपनी पसंद के एक या दो गाने चुनते नहीं बन रहे। "कोयले से हीरे को ढूँढ निकाला जा सकता है, लेकिन जहाँ हीरे ही हीरे हो वहाँ पारखी का सर घूम न जाए तो कहना।" वैसे मैं अपने आप को पारखी नहीं मानता लेकिन हीरों के बीच बैठा तो ज़रूर हूँ। शायद एक-एक हीरा परखता चलूँ तो कुछ काम बने। अब ज़रा इसे देखिए:

चाँद पेड़ों पे था,
और मैं गिरजे में थी,
तूने लब छू लिए,
जब मैं सजदे में थी,
कैसे भूलूँगी मैं, वो घड़ी गश की थी,
ना तेरे बस की थी, ना मेरे बस की थी.. (रात क्रिसमस की थी)

या फिर इसे:

माँझी रे माँझी, रमैया माँझी,
मोइनी नदी के उस पार जाना है,
उस पार आया है जोगी,
जोगी सुना है बड़ा सयाना है..

शाम ढले तो पानी पे चलके पार जाता है,
रात की ओट में छुपके रसिया मोहे बुलाता है,
सोना सोना, जोगी ने मेरा
जाने कहाँ से नाम जाना है.. (माँझी रे माँझी) 

यहाँ पर माँझी और मोइनी नदी के बहाने "माया-मोह" की दुनिया के उस पार बसे "अलौकिक" संसार की बात बड़े ही खूबसूरत और सूफ़ियाना तरीके से गुलज़ार साहब ने कह दी है। ऐसी ही और भी कई सारी नज़्में हैं इस एलबम में जिसमें गुलज़ार, पंचम और आशा की तिकड़ी की तूती गूँज-गूँज कर बोलती है। जिस तरह हमने पिछली कड़ी में खुद इन दिग्गजों से ही इनकी पसंद-नापसंद और गानों के बनने की कहानी सुनी थी, उसी तरह आज भी क्यों न वह बागडोर इन्हीं को सौंप दी जाए।

आशा: "सातों बार बोले बंसी"

पंचम: इसके बारे में गुलज़ार, तुम बताओ।

गुलज़ार: "सातों बार बोले बंसी, एक हीं बार बोले ना.. तन की लागी सारी बोले, मन की लागी खोले ना".. ये गाने में खास बात ये है कि बांसुरी को "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए आप।

पंचम: कैसे?

गुलज़ार: जितनी फूंक तन पे लगती है, उतनी हीं बार बोलती है लेकिन अंदर की बात नहीं बताती। उसके सुर सात हैं, सातों बोलते हैं, जो चुप रहती है जिस बात पे, वो नहीं बोलती।

आशा: वाह!

गुलज़ार: उसमें खूबसूरत बात ये है कि उसको "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए। किस तरह से वो उठके कृष्णा के मुँह लगती है, मुँह लगी हुई है, मुँह चढी हुई है, और वो सारी बातें कहती है, एक जो उसका अपनापन है, वो चुप है, वो नहीं बोलती, उन सात सुरों के अलावा। उसके सारी "इलस्ट्रेशन" जितनी है, वो बाँसुरी के साथ "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए आप।

पंचम: ये गाने में थोड़ा लयकारी भी किया था, सरगम भी किए थे, बड़ा अच्छा था।

आशा: और उसमें बाँसुरी साथ में बोल रही है, और आवाज़ भी आ रही है, तो समझ में नहीं आ रहा कि बाँसुरी बोल रही है कि राधा बोल रही है।

गुलज़ार: हाँ, वही, उसमें "परसोनिफ़िकेशन" है सारी की सारी। फूंक पे बोलती है और वो फूंक पे हीं बोलती है बाँसुरी।

अब चूँकि गुलज़ार साहब ने इस गाने को बड़ी ही बारीकी से समझा दिया है, इसलिए मुझे नहीं लगता है मुझे कुछ और कहने की ज़रुरत पड़ेगी। तो चलिए पढते और सुनते हैं यह गाना:

सातों बार बोले बंसी,
एक ही बार बोले ना,
तन की लागी सारी बोले,
मन की लागी खोले ना..

चुपके सुर में भेद छुपाये,
फूँक-फूँक बतलाये,
तन की सीधी मन की घुन्नी,
पच्चीस पेंचे खाए,
हो.. हाँ बोले ना बोले ना,
हाँ बोले ना बोले ना..

प्रीत की पीड़ा जाने मुई,
छाती छेद पड़े, 
उठ-उठ के फिर मुँह लगती है,
कान्हा संग लड़े,
हो.. हाँ बोले ना बोले ना,
हाँ बोले ना बोले ना..




नियम से तो हमें बस एक ही गाने तक अपनी महफ़िल को सीमित रखना चाहिए था, लेकिन बात जब इस "स्वर्णिम" तिकड़ी की हो रही हो तो एक से किसका मन भरता है! यूँ भी हम जितना इनके गाने सुनेंगे, उतना ही हमें संगीत की बारीकियाँ जानने को मिलेंगी। पंचम दा की यही तो ख़ासियत रही थी कि वे संगीत को बस "ट्रेडिशनल" एवं "कन्वेशनल" वाद्य-यंत्रों तक घेरकर नहीं रखते थे, बल्कि "बोल" के हिसाब से उसमे "रेलगाड़ी की सीटी", "मुर्गे की बाँग", "जहाज का हॉर्न" तक डाल देते थे। तभी तो सुनने वाला इनके संगीत की ओर खुद-ब-खुद खींचा चला आता था। जहाँ तक आशा ताई की बात है, तो इनके जैसा "रेंज" शायद ही किसी गायिका के पास होगा। ये जितने आराम से "दिल चीज़ क्या है" गाती हैं, उतनी ही सहूलियत से "दम मारो दम" को भी निभा जाती हैं। अब जहाँ ये तीनों अलग-अलग इतने करामाती हैं तो फिर साथ आ जाने पर "क़यामत" तो आनी ही है। आशा जी "दिल पड़ोसी है" को अपना सर्वश्रेष्ठ एलबम मानती है, तभी तो गुलज़ार साहब को उनके जन्मदिवस पर बधाई-संदेश भी इसी के रंग में रंगकर भेज डालती हैं: "भाई जन्म-दिन मुबारक। पंचम, आप और मैं खंडाला में, दिल पड़ोसी है के दिन, मैं जिंदगी में कभी नहीं भूलूंगी।" हम भी इस तिकड़ी को कभी नहीं भूलेंगे। इसी वादे और दावे के साथ चलिए अगली बातचीत और अगले गाने का लुत्फ़ उठाते हैं:

आशा(गाती हैं): "जेते दाओ आमाए डेको ना... "

गुलज़ार: वाह!

पंचम: ये तो आप बंगाली में गा रही हैं.. "प्रोग्राम" का हिन्दी गानों का है।

आशा: हिन्दी हो, पंजाबी हो, चाहे टिम्बकटु की ज़बान हो, गाना सुर जहाँ अच्छे, मतलब जहाँ अच्छा, वो गाना अच्छा होता है।

गुलज़ार: सच में आशा जी, मैंने इसके कई बंगाली गाने चुराए हैं।

आशा: अच्छा?

गुलज़ार: हाँ, बहुत बार। ये पूजा के लिए जो गाने करते हैं, तो मैं पास बैठे हुए, कई बार धुन बहुत अच्छी लगी, जैसे एक, उसके पूरे बंगाली के बोल मुझे याद नहीं, और गौरी दा "फ़ेमस पोयट फ़्रॉम बंगाल"

आशा: गौरी शंकर मजुमदार

गुलज़ार: जी हाँ, और इनके बोल चल रहे थे पूजा के गाने के "आस्थे आमार देरी होबे"

पंचम: आ हा हा

गुलज़ार: उसपे वो गाना लिखा था उस ट्युन पर.. "तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं"

पंचम: ये उसी का गाना?

गुलज़ार: हाँ, आँधी में। और ये भी उसी तरह का गाना इनका, जिसपे आप अभी गा रहीं थीं, "जेते दाव आमाय"

आशा: "दिल पड़ोसी है" में.. (गाती हैं) "जाने दो मुझे जाने दो"।

और ये रहे उस गाने के बोल:

जाने दो मुझे जाने दो
रंजिशें या गिले, वफ़ा के सिले
जो गये जाने दो
जाने दो मुझे जाने दो

थोड़ी ख़लिश होगी, थोड़ा सा ग़म होगा,
तन्हाई तो होगी, अहसास कम होगा
गहरी ख़राशों की गहरी निशानियाँ हैं
चेहरे के नीचे कितनी सारी कहानियाँ हैं
माज़ी के सिलसिले, जा चुके जाने दो 
ना आ आ..

उम्मीद-ओ-शौक़ सारे लौटा रही हूँ मैं,
रुसवाई थोड़ी-सी ले जा रही हूँ मैं
बासी दिलासों की शब तो गुज़ार आये
आँखों से गर्द सारी रोके उतार आये
आँखों के बुलबुले बह गये, जाने दो 
ना आ आ..




’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Wednesday, November 23, 2016

"संगीतकारों के पास आजकल गायकों के बहुत से विकल्प उपलब्ध हैं" - मंजीरा गांगुली : एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है 
एपिसोड - 38


एक रियलटी शो से लोकप्रिय हुई गायिका मंजीरा गांगुली आज बॉलीवुड में एक जाना माना नाम है, ताज़ा प्रदर्शित फिल्म "फाईनल कट ऑफ़ द डैरक्टर" में इनका हिमेश रेशमिया के साथ एक डुएट जारी हुआ है, जिसे समीर ने लिखा और मोंटी शर्मा ने स्वरबद्ध किया है. इसके आलावा मंजीरा और क्या क्या कर रही है इन दिनों जानिए इसी खूबसूरत आवाज़ की मालकिन गायिका से, आज के एपिसोड में, प्ले का बटन दबाएँ और आनंद लें इस दिलचस्प बातचीत का 



एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें 

Sunday, November 20, 2016

राग मुल्तानी : SWARGOSHTHI – 293 : RAG MULTANI



स्वरगोष्ठी – 293 में आज

नौशाद के गीतों में राग-दर्शन – 6 : राग मुल्तानी का रसास्वादन कराता गीत

“दया कर हे गिरिधर गोपाल...”



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” की छठीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज के अंक में हम आपसे राग मुल्तानी पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला में हम भारतीय फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान नौशाद अली के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला का समापन हम आगामी 25 दिसम्बर को नौशाद अली की 98वीं जयन्ती के अवसर पर करेंगे। 25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता वाहिद अली घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करते थे। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठते, साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। फिल्म प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ करता था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए माया नगरी बम्बई की ओर रुख किया।



उस्ताद  अमीर  खाँ
ड़े संघर्ष में बीते फिल्मों में सांगीतिक जीवन के पहले दशक में नौशाद ने अनेक मानक गढ़े। इस पहले दशक में उन्होने अपने गीतों में रागों का स्पर्श तो किया, किन्तु अत्यन्त सरलीकृत रूप में। दूसरे दशक में प्रवेश करने के बाद नौशाद ने रागदारी संगीत को यथार्थ रूप में प्रस्तुत करने पर अधिक बल दिया। अपने फिल्म संगीत जीवन के पहले दशक में नौशाद ने राग आधारित गीतों के लिए उस समय के लोकप्रिय पार्श्वगायक-गायिकाओं का सहयोग लिया था जबकि दूसरे दशक में अपने रागबद्ध गीतों के गायन के लिए उन्होने तत्कालीन उस्तादों और पण्डितों को आमंत्रित करने से भी नहीं चूके। पिछले अंक में आपने तत्कालीन दिग्गज संगीतज्ञ पण्डित दात्तात्रेय विष्णु पलुस्कर और उस्ताद अमीर खाँ के स्वरों में फिल्म ‘बैजू बावरा’ का राग देसी में निबद्ध एक गीत सुना है। इसी फिल्म में राग देसी के इस गीत के अलावा नौशाद ने उस्ताद अमीर खाँ से राग पूरिया धनाश्री और मेघ मल्हार के स्वरों में दो गीत और गवाए थे। नौशाद की संगीत के प्रति अगाध श्रद्धा और गीतो को स्वरबद्ध करने की कुशलता के गुण से प्रभावित होकर उस्ताद अमीर खाँ ने नौशाद की आगे की फिल्मों में भी गायन किया। 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘शबाब’ में राग पर केन्द्रित एक गीत गाने के लिए नौशाद ने उस्ताद अमीर खाँ को पुनः आमंत्रित किया। फिल्म में अमीर खाँ द्वारा गाया गया गीत –“दया कर हे गिरिधर गोपाल...” राग मुल्तानी के स्वरों में पिरोया गया है। फिल्म में लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी और हेमन्त कुमार के स्वरों में अन्य गीत भी हैं, जिन्हें नौशाद ने राग शहाना, जोगिया, बसन्त बहार, वृन्दावनी सारंग, पहाड़ी, माँड, पीलू आदि रागों पर आधारित थे। अब हम आपको नौशाद द्वारा स्वरबद्ध किये उस्ताद अमीर खाँ की आवाज़ में फिल्म ‘शबाब’ का वही गीत सुनवा रहे हैं। यह गीत राग मुल्तानी, तीनताल में निबद्ध है। दरअसल यह गीत भक्त कवयित्री मीराबाई का एक पद है, जिसे उस्ताद अमीर खाँ ने बड़े ही भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है।

राग मुल्तानी : “दया कर हे गिरिधर गोपाल...” : उस्ताद अमीर खाँ : फिल्म – शबाब



पण्डित  रविशंकर
राग मुल्तानी, तोड़ी थाट का राग माना जाता है। इसकी जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर का प्रयोग किया जाता है। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं किया जाता, किन्तु अवरोह में सातो स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इस राग में ऋषभ, गान्धार तथा धैवत स्वर कोमल और मध्यम स्वर तीव्र प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। राग मुल्तानी का गायन-वादन आम तौर पर दिन के चौथे प्रहर में किया जाता है। इसे परमेल प्रवेशक राग माना गया है। कारण यह है कि यह दिन के चौथे प्रहर का अन्तिम राग है। इसमें कोमल गान्धार के साथ-साथ कोमल ऋषभ और कोमल धैवत भी प्रयोग किया जाता है। ऋषभ स्वर कोमल होने से राग मुल्तानी सन्धिप्रकाश रागों की श्रेणी में आता है। इस राग में दिन के चौथे प्रहर और सन्धिप्रकाश बेला की विशेषताएँ हैं। इस प्रकार यह तोड़ी थाट के रागों से पूर्वी, मारवा और भैरव थाट के रागों में प्रवेश कराता है। इसीलिए इसे परमेल प्रवेशक राग कहा गया है। परमेल प्रवेशक राग दो थाटों के बीच का राग होता है जो एक थाट से दूसरे थाट में प्रवेश कराता है। राग मुल्तानी में यदि शुद्ध ऋषभ और शुद्ध धैवत स्वरों का प्रयोग किया जाय तो यह राग मधुवन्ती हो जाता है। राग मुल्तानी के शास्त्रीय स्वरूप का अनुभव कराने के लिए अब हम आपको विश्वविख्यात सितार वादक पण्डित रविशंकर द्वारा प्रस्तुत राग मुल्तानी में द्रुत लय की एक रचना सुनवा रहे हैं। आप इस प्रस्तुति का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग मुल्तानी : सितार पर द्रुत एकताल में निबद्ध रचना : पण्डित रविशंकर




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 293वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको लगभग 62 वर्ष पहले की एक सफल फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 297 के सम्पन्न होने के उपरान्त जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – आप इस गीत की गायिका के स्वर को पहचान कर उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 26 नवम्बर, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 295वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 291वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको लगभग साढ़े छः दशक पुरानी लोकप्रिय फिल्म ‘बैजू बावरा’ से राग पर केन्द्रित गीत का एक अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – देसी या देसी तोड़ी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है – गायक – पण्डित दत्तात्रेय विष्णु (डी. वी.) पलुस्कर और उस्ताद अमीर खाँ

इस बार की पहेली के प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


पिछली श्रृंखला के विजेता

इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (अंक 281 से 290 तक) की संगीत पहेली के प्राप्तांकों की गणना के बाद 20 – 20 अंक प्राप्त कर प्रथम स्थान प्राप्त किया है, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी ने। द्वितीय स्थान के भी दो विजेता हैं। चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया ने 18 – 18 अंक अर्जित कर श्रृंखला में दूसरा स्थान प्राप्त किया है। इसी क्रम में 10 अंक प्राप्त कर हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने तीसरा स्थान प्राप्त किया है। श्रृंखला के सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में अपने सैकड़ों पाठकों के अनुरोध पर जारी हमारी ताज़ा लघु श्रृंखला “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” के इस अंक में हमने आपको सुनवाने के लिए राग मुल्तानी पर केन्द्रित गीत का चुनाव किया था। इस श्रृंखला के लिए हमने संगीतकार नौशाद के आरम्भिक दो दशकों की फिल्मों के गीत चुने हैं। श्रृंखला का आलेख को तैयार करने में हमने फिल्म संगीत के जाने-माने इतिहासकार और हमारे सहयोगी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। गीतों के चयन के लिए हमने अपने पाठकों की फरमाइश का ध्यान रखा है। यदि आप भी किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

 


Saturday, November 19, 2016

"इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत...”, बटालवी के इस कविता की क्यों ज़रूरत आन पड़ी ’उड़ता पंजाब’ में?


एक गीत सौ कहानियाँ - 99
 

'इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार।
दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'| इसकी 99-वीं कड़ी में आज जानिए 2016 की फ़िल्म ’उड़ता पंजाब’ के मशहूर गीत "इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत ग़ुम है ग़ुम है...” के बारे में जिसे दिलजीत दोसंझ और शाहिद मालिया ने गाया था। बोल शिव कुमार बटालवी के और संगीत अमित त्रिवेदी का।

कुछ वर्ष पहले फ़िल्म ’लव आजकल’ के मशहूर गीत “अज दिन चढ़ेया तेरे रंग वरगा...” के लिए गीतकार
Shiv Kumar Batalvi
इरशाद कामिल को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था, यह बात बहुतों को पता है। पर जो बात पंजाब के बाहर बहुत कम लोग जानते हैं, वह यह कि इस गीत का जो मुखड़ा है “अज दिन चढ़ेय तेरे रंग वरगा”, यह दरसल प्रसिद्ध पंजाबी कवि शिव कुमार बटालवी की लिखी कविता की पंक्ति है। ’लव आजकल’ के गीत के लिए बटालवी को कोई क्रेडिट नहीं मिला, पर इस वर्ष की चर्चित फ़िल्म ’उड़ता पंजाब’ में बटालवी की लिखी कविता “इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत” को जब गीत के रूप में पेश किया गया तो उन्हें पूरा-पूरा सम्मान और क्रेडिट दिया गया इस गीत के लिए। शिव कुमार बटालवी पंजाब के पहले आधुनिक कवि माने जाते हैं। उनकी कविताएँ बेहद लोकप्रिय हो जाया करती थीं और लेखन शैली ऐसी थी कि उनकी कविताओं को गीतों के रूप में भी पेश किया जा सकता था। शुरु शुरु में वो ख़ुद ही अपनी कविताओं को गा कर प्रस्तुत करते थे, पर बाद में अन्य गायकों ने भी उनकी कविताओं को ख़ूब गाया। 70 के दशक के शुरुआती किसी वर्ष में बम्बई के शणमुखानन्द हॉल में उन्होंने पहली बार “इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत” गाया था। उस दिन वो मन में एक अवसाद लेकर स्टेज पर गए थे। उनके भीतर यह भावना थी कि कई गए-गुज़रे लेखक और कवि शोहरत की बुलन्दी पर पहुँच चुके हैं जबकि वो दुनिया की नज़रों में आने के लिए कड़ी संघर्ष किए जा रहे हैं। झल्लाकर उन्होंने उस दिन स्टेज पर यह कह दिया कि “आजकल हर कोई कवि है”, और भी अनाप-शनाप कई बातें उन्होंने कही जिसकी वजह से वहाँ बैठी ऑडिएन्स भड़क उठी। तभी उन्होंने गाना शुरु किया “इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत...”। जनता शान्त हो गई और गाना ख़त्म होते ही तालियों की गड़गड़ाहट ने पूरे हॉल पर कब्ज़ा कर लिया। गीत बेहद मशहूर हो गई और कई गायकों ने इसे गाया। महेन्द्र कपूर की आवाज़ में भी यह गीत काफ़ी मशहूर हुआ था। इनके अलावा जगजीत सिंह ज़िरवी और रब्बी शेरगिल के संस्करण भी ख़ूब चर्चित रहे। और अब इस साल 2016 में विवादों से घिरी फ़िल्म ’उड़ता पंजाब’ में भी इसी गीत को दो संसकरणों में पेश किया गया। अमित त्रिवेदी के संगीत में इसे दिलजीत दोसंझ और शाहिद मालिया ने अलग-अलग गाया।


’उड़ता पंजाब’ फ़िल्म में इस कविता की ज़रूरत क्यों आन पड़ी, इस पर चर्चा करते हैं। फ़िल्म के निर्देशक अभिषेक चौबे बताते हैं, “इक कुड़ी इस फ़िल्म में आई अपने बोलों की वजह से और तब आई जब हम फ़िल्म को लिख ही रहे थे। और इस कविता के शब्द भी ऐसे थे कि जो हमारे सिचुएशन पर पूरी तरह से फ़िट बैठ रहे थे।“ संगीतकार अमित त्रिवेदी के शब्दों में, “जब मेरे पास गीत के बोल आए तो मैंने देखा कि पूरे के पूरे चार पन्ने हैं। पूरे चार पन्ने का गीत। फिर हम लोग सब एक साथ बैठे और साथ मिल कर डिसाइड किया कि जो बेस्ट लाइन्स हैं उन्हें हम इस गीत में रखें। कम्पोज़िशन में हमने मूल गीत से पाँच-छह स्केल ऊपर गए और दिलजीत ने ज़बरदस्त निभाया गीत को।“ अभिनेत्री आलिया भट्ट पर फ़िल्माये इस गीत के बारे में वो कहती हैं, “मैं समझती हूँ कि फ़िल्म में मेरे किरदार की पंजाब में आने से पहले की जो जर्नी है और पंजाब आने के बाद उसकी जर्नी कैसी हो गई, इन दोनों चीज़ों को दिखाना ज़रूरी था। इस गीत के ज़रिए इन बातों को उभारा जा सका है।“ इसमें कोई संदेह नहीं कि बटालवी के इस कविता को अमित त्रिवेदी ने एक नया रूप प्रदान किया है सिर्फ़ एक बार नहीं बल्कि दो दो बार। और दोनों संस्करण अपने आप में उम्दा है। शाहिद मालिया का गाया संस्करण ग्राम्य, लोक-आधारित और भावपूर्ण है, जबकि दिलजीत दोसंझ का गाया संस्करण समकालीन (आधुनिक) और मेलोडी-सम्पन्ना है। दोनों की अपनी-अपनी ख़ासियत है, सुनने वाले पर निर्भर करता है कि उसे कौन सा संस्करण पसन्द है! लेकिन जो भी कहें, महेन्द्र कपूर वाले संस्करण का कोई मुकाबला नहीं है।

“इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत” कविता एक गीत के लिए बहुत लम्बी है। इसलिए जब भी इसे गाया गया, कुछ पंक्तियाँ काट दी गई। ’उड़ता पंजाब’ में तो केवल मुखड़ा और कविता का पहला अन्तरा ही लिया गया है। करीब साढ़े चार मिनटों में ही गीत को निपटा दिया गया है, जबकि महेन्द्र कपूर वाले संस्करण में चार अन्तरे (तीन शुरु के और एक आख़िर का) लिया गया है। शिव कुमार बटालवी के गाए मूल गीत में उन्होंने सभी अन्तरे गाये थे। लीजिए पेश है बटालवी की लिखी यह कविता...

इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोहणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है

सूरत उसदी परियां वरगी
सीरत दी ओह मरियम लगदी
हसदी है तां फुल्ल झड़दे ने
तुरदी है तां ग़ज़ल है लगदी
लम्म सलम्मी सरूं क़द दी
उम्र अजे है मर के अग्ग दी
पर नैणां दी गल्ल समझदी

गुमियां जन्म जन्म हन ओए
पर लगदै ज्यों कल दी गल्ल है
इयों लगदै ज्यों अज्ज दी गल्ल है
इयों लगदै ज्यों हुण दी गल्ल है
हुणे ता मेरे कोल खड़ी सी
हुणे ता मेरे कोल नहीं है
इह की छल है इह केही भटकण
सोच मेरी हैरान बड़ी है
नज़र मेरी हर ओंदे जांदे
चेहरे दा रंग फोल रही है

ओस कुड़ी नूं टोल रही है
सांझ ढले बाज़ारां दे जद
मोड़ां ते ख़ुशबू उगदी है
वेहल थकावट बेचैनी जद
चौराहियां ते आ जुड़दी है
रौले लिप्पी तनहाई विच
ओस कुड़ी दी थुड़ खांदी है
ओस कुड़ी दी थुड़ दिसदी है
हर छिन मैंनू इयें लगदा है
हर दिन मैंनू इयों लगदा है

ओस कुड़ी नूं मेरी सौंह है
ओस कुड़ी नूं आपणी सौंह है
ओस कुड़ी नूं सब दी सौंह है
ओस कुड़ी नूं रब्ब दी सौंह है
जे किते पढ़दी सुणदी होवे
जिउंदी जां उह मर रही होवे
इक वारी आ के मिल जावे
वफ़ा मेरी नूं दाग़ न लावे
नई तां मैथों जिया न जांदा
गीत कोई लिखिया न जांदा
इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोहणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है।



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आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




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