Sunday, November 30, 2014

‘झनक झनक पायल बाजे...’ : SWARGOSHTHI – 196 : RAG ADANA



स्वरगोष्ठी – 196 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 5 : राग अड़ाना


फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ में उस्ताद अमीर खाँ ने गाया राग अड़ाना के स्वरों में यह गीत




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला, ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। फिल्म संगीत के क्षेत्र में चौथे से लेकर आठवें दशक के बीच शास्त्रीय संगीत के कई विद्वानों और विदुषियों ने अपना योगदान किया है। इस श्रृंखला में हमने कुछ ऐसे ही फिल्मी गीतों का चुनाव किया है, जिन्हें रागदारी संगीत के प्रयोक्ताओं और विशेषज्ञों ने रचा है। इन रचनाओं में राग के स्पष्ट स्वरूप की उपस्थिति मिलती है। श्रृंखला के पाँचवें अंक में आज हम आपसे 1955 में प्रदर्शित, भारतीय फिल्म जगत की संगीत और नृत्य की प्रधानता वाली फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ के एक शीर्षक गीत- ‘झनक झनक पायल बाजे...’ पर चर्चा करेंगे। फिल्म के इस गीत में राग अड़ाना के स्वरों का ओजपूर्ण उपयोग किया गया है। भारतीय संगीत के उल्लेखनीय स्वरसाधक उस्ताद अमीर खाँ ने इस गीत को स्वर दिया है। खाँ साहब और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर के स्वरों में राग देसी के स्वरों में पिरोया युगल गीत आपको इस श्रृंखला के दूसरे अंक में हम सुनवा चुके हैं। आज हम उस्ताद अमीर खाँ और समूह स्वरों में राग अड़ाना पर आधारित यह गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग ‘अड़ाना’ की कर्णप्रियता का अनुभव करने के लिए इस राग की एक भावपूर्ण रचना उस्ताद कमाल साबरी की सारंगी पर सुनेंगे। 
 


उस्ताद अमीर खाँ 
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्मों की गणना ‘मील के पत्थर’ के रूप में की जाती है। ऐसी ही एक उल्लेखनीय फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ थी जिसका प्रदर्शन 1955 में हुआ था। इस फिल्म में कथक नृत्य शैली का और राग आधारित गीत-संगीत का कलात्मक उपयोग किया गया था। फिल्म का निर्देशन वी. शान्ताराम ने और संगीत निर्देशन वसन्त देसाई ने किया था। वी. शान्ताराम के फिल्मों की सदैव यह विशेषता रही है कि उसके विषय नैतिक मूल्यों रक्षा करते प्रतीत होते है। साथ ही उनकी फिल्मों में रूढ़ियों का विरोध भी नज़र आता है। फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ में उन्होने भारतीय शास्त्रीय नृत्य और संगीत की महत्ता को रेखांकित किया था। फिल्म को इस लक्ष्य तक ले जाने में संगीतकार वसन्त देसाई का उल्लेखनीय योगदान रहा। जाने-माने कथक नर्तक गोपीकृष्ण फिल्म की प्रमुख भूमिका में थे। इसके अलावा संगीत के ताल पक्ष में निखारने के लिए सुप्रसिद्ध तबलावादक गुदई महाराज (पण्डित सामता प्रसाद) का उल्लेखनीय योगदान था। वसन्त देसाई ने सारंगीनवाज़ पण्डित रामनारायन और संतूरवादक पण्डित शिवकुमार शर्मा का सहयोग भी प्राप्त किया था।

वसन्त देसाई 
संगीतकार वसन्त देसाई की सफलता का दौर फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ से ही आरम्भ हुआ था। वसन्त देसाई की प्रतिभा सही मूल्यांकन वी. शान्ताराम ने ही किया था। प्रभात कम्पनी में एक साधारण कर्मचारी के रूप में उनकी नियुक्ति हुई थी। यहीं रह कर उन्होने अपनी कलात्मक प्रतिभा का विकास किया था। आगे चलकर वसन्त देसाई, शान्ताराम की फिल्मों के मुख्य संगीतकार बने। दरअसल वसन्त देसाई फिल्मों के नायक बनने की अभिलाषा लेकर ‘प्रभात’ में शान्ताराम के पास आये थे। उन्हें फ़िल्म-निर्माण के हर पहलू को जानने और परखने का सुझाव शान्ताराम ने दिया। उस प्रथम मुलाक़ात के बारे में वसन्त देसाई ने एक रेडिओ प्रस्तुतकर्त्ता को कुछ इन शब्दों में बताया था– “अजी बस एक दिन यूँही सामने जाके खड़ा हो गया कि मुझे ऐक्टर बनना है। म्युज़िक तब कहाँ आता था? और वैसे भी फ़िल्मों में हर कोई पहले ऐक्टर बनने ही तो आता है। फिर बन जाता है टेक्निशियन। तो मैं भी बाल बढ़ाकर पहुँच गया ऐक्टर बनने। मगर एक कमी थी मुझमें, मैं दुबला-पतला और छोटे कद का था जब कि वह स्टण्ट का ज़माना था। सब ऊँचे कद के पहलवान जैसे हुआ करते थे, छोटे कद के आदमी का काम नहीं था। शान्ताराम जी ने पूछा, 'क्या करना चाहते हो?' मैंने गर्दन हिलाकर बाल दिखाये और कहा कि ऐक्टर बनना चाहता हूँ। उन्होंने मुझे सर से पाँव तक देखा और सोचा होगा कि लड़का पागल है। फिर मुझ पर तरस आ गया और बोले कि मैं तुम्हे रख लेता हूँ, मगर सब काम करना पड़ेगा। कल से आ जाओ स्टुडिओ में। मैं ऑफ़िस बॉय बन गया, नो पगार, मुफ़्त में 18-18 घण्टे का काम। अरे, मालिक ख़ुद काम करते थे हमारे साथ। ऋषियों के आश्रम जैसा था 'प्रभात' का परिवेश। उनका हमेशा से ऐसा ही स्वभाव रहा है कि जैसा कहें वैसा फ़ौरन कर दो। और मैं भी उनकी हर बात मानता था, इसलिए मुझसे वो हमेशा ख़ुश रहते थे। जिस विभाग में कमी हो, अन्ना साहब मुझे फ़ौरन भेज देते, चाहे वह कैमरा विभाग हो या संगीत विभाग। इसलिए आज मैं फिल्म निर्माण की हर इकाई का काम जानता हूँ। फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में मैं उनका सहायक तक रहा हूँ। सिनेमा तकनीक में मैं उन्हें गुरु मानता हूँ। एक साल के बाद उन्होंने मेरी तनख्वाह सात रुपये से बढ़ाकर 45 रुपये कर दी, और बाद में तो यह समझ लीजिए, 'प्रभात' में सबसे ज़्यादा तनख्वाह हीरो चन्द्रमोहन को और मुझे मिलती थी।" आरम्भ से ही शान्ताराम जी को एक ऐसे सामाजिक फ़िल्मकार का दर्जा प्राप्त था, जो मनोरंजन के साथ-साथ समाज की कुप्रथाओं के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है। इसके बाद उनकी हर फ़िल्म में समाज को कोई न कोई सन्देश दिया है। शान्ताराम जी ने 1955 में फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ का निर्माण किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई ने इस फिल्म में कई राग आधारित स्तरीय गीतों की रचना की थी। फिल्म का शीर्षक गीत ‘झनक झनक पायल बाजे...’ राग अड़ाना का एक मोहक उदाहरण है। इस गीत को स्वर प्रदान किया, सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ ने। आइए, सुनते हैं, राग अड़ाना पर आधारित यह गीत।


राग – अड़ाना : ‘झनक झनक पायल बाजे...’ : फिल्म – झनक झनक पायल बाजे : स्वर – उस्ताद अमीर खाँ और साथी : संगीत – वसन्त देसाई : गीत – हसरत जयपुरी





उस्ताद कमाल साबरी 
फिल्म के इस गीत में आपको राग अड़ाना के स्वरों का स्पष्ट अनुभव हुआ होगा। राग दरबारी से ही मिलता-जुलता राग है, अड़ाना। सातवें प्रहर अर्थात रात्रि के तीसरे प्रहर में यह राग खूब खिलता है। यह आसावरी थाट और कान्हड़ा अंग का राग है। षाड़व-षाड़व जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और अवरोह में धैवत स्वर वर्जित होता है। अवरोह में कोमल गान्धार और शुद्ध मध्यम स्वर वक्रगति से प्रयोग किया जाता है। चंचल प्रकृति के इस राग से विनयपूर्ण और प्रबल पुकार के भाव की सार्थक अभिव्यक्ति सम्भव है। वीर रस के गीतों के लिए यह एक आदर्श राग है। यह राग, दरबारी से काफी मिलता-जुलता है। परन्तु अड़ाना में दरबारी की तरह अतिकोमल गान्धार स्वर का आन्दोलनयुक्त प्रयोग नहीं होता। इसके अलावा राग अड़ाना उत्तरांग प्रधान है, अर्थात इस राग के स्वर अधिकतर मध्य और तार सप्तक में चलते हैं। जबकि दरबारी पूर्वांग प्रधान राग होता है। राग अड़ाना का वादी स्वर तार सप्तक का षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। प्राचीन सिद्धान्तों के अनुसार राग अड़ाना, राग दीपक के आठ पुत्रों में से एक माना जाता है। इसे ‘रात की सारंग’ भी कहा जाता है।

वाद्य संगीत पर राग अड़ाना की सहज अनुभूति के लिए अब हम आपको यही राग सारंगी पर सुनवाते हैं। सारंगी एक ऐसा वाद्य है जो मानव कण्ठ के सर्वाधिक निकट होता है। आपके लिए सारंगी पर तीनताल में निबद्ध रचना प्रस्तुत कर रहे हैं, सुप्रसिद्ध सारंगी वादक उस्ताद कमाल साबरी। सारंगीवादकों के खानदान की सातवीं पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे उस्ताद कमाल साबरी रामपुर-मुरादाबाद के सेनिया घराने की वादन परम्परा के प्रतिभावान संवाहक हैं। इनके पिता उस्ताद साबरी खाँ विश्वविख्यात सारंगीवादक थे। कमाल साबरी ने अनेकानेक अवसरों पर स्वतंत्र सारंगीवादन के माध्यम से संगीत-प्रेमियों को चमत्कृत किया है। हमारी आज कि गोष्ठी में कमाल साबरी राग अड़ाना की एक ओजपूर्ण रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। इस प्रस्तुति में तबला पर साथ दिया है, सर्वर साबरी ने। आप यह रचना सुनिए और मुझे आज का यह अंक यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग – अड़ाना : सारंगी पर तीनताल की रचना : उस्ताद कमाल साबरी






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 196वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको लगभग साठ वर्ष पहले की एक फिल्म के जुगलबन्दी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 200वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा तथा वर्ष 2014 में सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी को वार्षिक विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में आपको किस राग की अनुभूति हो रही है?

2 – जिस ताल में यह गीत निबद्ध है, उसे पहचानिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार 6 दिसम्बर, 2014 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 198वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 194वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुप्रसिद्ध उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वरों में गाये, फिल्म मुगल-ए-आजम के गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग सोहनी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दीपचंदी। पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मों गीत’ के माध्यम से हम भारतीय संगीत जगत के मूर्धन्य कलासाधकों के द्वारा उनके फिल्म संगीत के क्षेत्र में किये गए योगदान को रेखांकित कर रहे हैं। इस श्रृंखला के बारे में आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। नए वर्ष से ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के अन्तर्गत आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   



Saturday, November 29, 2014

"दग़ा देके चले गए..." - सितारा देवी को श्रद्धा-सुमन, उन्हीं के गाये इस गीत के ज़रिए



एक गीत सौ कहानियाँ - 46
 
सितारा देवी का स्मरण करती एक विशेष प्रस्तुति 

दग़ा देके चले गए...



 
 
'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 46-वीं कड़ी में आज हम श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं कथक दिवा सितारा देवी को उन्हीं के गाये और उन्हीं पर फ़िल्माए गए फिल्म 'आज का हिन्दुस्तान' के गीत "दग़ा देकर चले गए..." के माध्यम से। 



25 नवंबर 2014 को कथक नृत्य के आकाश का सबसे रोशन 'सितारा' हमेशा हमेशा के लिए अस्त हो गया। कथक नृत्यांगना सितारा देवी नहीं रहीं। कुछ कलाकार ऐसे हुए हैं जिनके नाम के साथ कोई कलाविधा ऐसी घुल-मिल गई कि वे एक दूसरे का पर्याय ही बन गए। सितारा देवी और कथक नृत्य का कुछ ऐसा ही रिश्ता रहा। निस्संदेह सितारा देवी का कथक में जो योगदान है, वह अविस्मरणीय है, अद्वितीय है, तभी तो उन्होंने पद्मविभूषण स्वीकार करने से मना कर दिया था क्योंकि उनके हिसाब से वो भारतरत्न की हक़दार रही हैं। यह तो सभी जानते हैं कि सितारा देवी का कथक नृत्य जगत में किस तरह का योगदान रहा है, पर शायद कम ही लोग जानते होंगे कि सितारा देवी ने बहुत सारी हिन्दी फ़िल्मों में अभिनय भी किया है, नृत्य भी किए हैं, और यही नहीं अपने उपर फ़िल्माए गीतों को ख़ुद गाया भी है। यह 30 और 40 के दशकों का दौर था। उस समय सितारा देवी अपनी दो बड़ी बहनों - अलकनन्दा और तारा देवी - की तरह स्टेज पर नृत्य करने लगी थीं और मशहूर भी हो गई थीं। एक बार फ़िल्म निर्देशक निरंजन शर्मा 'उषा हरण' नामक फ़िल्म बना रहे थे जिसमें सुल्ताना नायिका थीं और एक अन्य चरित्र के लिए वो एक ऐसी नई लड़की की तलाश कर रहे थे जिसे शास्त्रीय नृत्य का ज्ञान हो। यह तलाश उन्हें बनारस खींच लाया। सितारा देवी के नृत्य को देखते ही निरंजन शर्मा को वो पसन्द आ गईं और 'उषा हरण' में अभिनय करने हेतु सितारा देवी आ गईं बम्बई नगरी, और इस तरह से वर्ष 1933 से शुरू हुआ उनका फ़िल्मी सफ़र। फिर इसके बाद अगले दो दशकों तक इन्होंने जम कर फ़िल्मों में अभिनय किया, गीत गाये और नृत्य तो किए ही। 40 के दशक की बहुत सी फ़िल्मों में वो मुख्य नायिका भी बनीं। 50 के दशक में उन्होंने चरित्र अभिनेत्री के रूप में फ़िल्मों में नृत्य करती नज़र आईं। महबूब ख़ान की महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'मदर इण्डिया' में मशहूर गीत "होली आई रे कन्हाई..." में उनका नृत्य सभी ने देखा। पर अफ़सोस कि यही उनकी अभिनीत आख़िरी फ़िल्म रही। इसके बाद उन्होंने फ़िल्म जगत से किनारा कर लिया और कथक नृत्य की सेवा में ही अपना पूरा ध्यान लगा दिया।

"दग़ा देके चले गए बलमवा जमुना के पुल पार..." 1940 की फ़िल्म 'आज का हिन्दुस्तान' का गीत है जिसे सितारा देवी ने कान्तिलाल के साथ मिल कर गाया था और इन्हीं दोनों पर यह फ़िल्माया भी गया था। दीनानाथ मधोक का लिखा यह गीत है, जिसके संगीतकार थे खेमचन्द्र प्रकाश। इस गीत को तो लोगों ने याद नहीं रखा, पर कुछ हद तक यह गीत सितारा देवी के जीवन के एक पहलू की तरफ़ इशारा ज़रूर करता है। 1944 में सितारा देवी ने फ़िल्मकार के. आसिफ़ से प्रेम-विवाह किया, पर कुछ ही सालों में दोनों के बीच मतभेद उत्पन्न होने लगा। 'मदर इण्डिया' के बाद फ़िल्म-लाइन को त्यागने का विचार भी इसी मतभेद के कारण उत्पन्न हुआ था। सितारा देवी के जीवनकाल में सुप्रसिद्ध फिल्म इतिहासकार शिशिर कृष्ण शर्मा को दिए एक साक्षात्कार में सितारा देवी ने बताया था- "वैसे देखा जाए तो के. आसिफ़ हर तरफ़ से एक शरीफ़, होनहार और तरक्कीपसन्द इंसान थे और मेरी बहुत अच्छी तरह से देखभाल भी करते थे, पर उनकी एक बात जो मुझे अच्छी नहीं लगती थी, वह था उनका रंगीला मिज़ाज। हमारी शादी के दो-तीन साल बाद ही उन्होने लाहौर जाकर दूसरी शादी कर ली। 1950 में उन्होंने 'मुग़ल-ए-आज़म' की नीव रखी और उस फ़िल्म में अभिनय कर रही निगार सुल्ताना से शादी कर ली; यह उनकी तीसरी शादी थी। और मैं, जो उनकी कानूनी पत्नी थी, मुझे उनसे अलग होना पड़ा। 1958 में मैं ईस्ट अफ़्रीका गई प्रोग्राम करने के लिए। वहाँ हम जिस गुजराती परिवार के यहाँ ठहरे हुए थे, उसी परिवार के प्रताप बारोट से हमारी दोस्ती हुई जो बाद में विवाह में बदल गई। प्रताप बारोट गायिका कमल बारोट और निर्देशक चन्द्रा बारोट के भाई थे। 1970 में मेरा और प्रताप का तलाक़ हो गया। हमारा एकलौता बेटा रणजीत बारोट मुम्बई में रहता है और संगीत जगत में एक जाना-माना नाम है। ख़ैर, के. आसिफ़ अपनी तीसरी शादी से भी सन्तुष्ट नहीं हुए और 1960 में गुरुदत्त को लेकर 'लव ऐण्ड गॉड' फ़िल्म के निर्माण के दौरान दिलीप कुमार की छोटी बहन अख्तर से शादी कर डाली जो उनकी चौथी शादी थी। 9 मार्च 1971 के दिन बम्बई के शनमुखानन्द हॉल में प्रोग्राम करने के बाद जब रात को 2 बजे घर पहुँची तो ख़बर मिली कि के. आसिफ़ अब इस दुनिया में नहीं रहे। उस वक़्त वो सिर्फ़ 48 साल के थे। उनकी मौत के बाद उनकी कानूनी पत्नी होने की हैसियत से मैंने ही हिन्दू परम्परा के अनुसार शय्यादान आदि शेष कार्य सम्पन्न किए।" इस तरह से दग़ा देके चले जाने वाले के. आसिफ़ को सितारा देवी ने अपने दिल से कभी नहीं दूर किया और एक पत्नी का फ़र्ज़ अन्तिम समय तक निभाया। और आज सितारा देवी भी इस दुनिया को दग़ा देकर हमेशा-हमेशा के लिए चली गईं, और अपने पीछे छोड़ गईं एक पूरा का पूरा एक कला संस्थान जो आने वाली कई पीढ़ियों को नृत्य सिखाता रहेगा। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की तरफ़ से सितारा देवी को नमन।

फिल्म - आज का हिन्दुस्तान : 'दगा देके चले गए हो जमुना के उस पार...' : स्वर- सितारा देवी और कान्तिलाल : संगीत - खेमचन्द्र प्रकाश : गीत - दीनानाथ मधोक 



'एक गीत सौ कहानियाँ' के इस अंक में ब्लॉग, 'बीते हुए दिन' से सन्दर्भ लिया है। इसके लिए हम इस ब्लॉग और 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के मित्र शिशिर कृष्ण शर्मा के प्रति आभार प्रकट करते हैं। अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें।  


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र




Tuesday, November 25, 2014

बोलती कहानियाँ: जयशंकर प्रसाद की कला

जयशंकर प्रसाद की कहानी कला

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट काजल कुमार की लघुकथा 'लोकतंतर' का पॉडकास्ट सुना था। आज हम लेकर आये हैं महान साहित्यकार जयशंकर प्रसाद की कहानी "कला", जिसको स्वर दिया है अर्चना चावजी ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 11 मिनट 15 सेकंड।

इसी कहानी का एक अन्य ऑडियो संस्करण बोलती कहानियाँ के लिए अनुराग शर्मा के स्वर में भी उपलब्ध है

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानी, उपन्यास, नाटक, धारावाहिक, प्रहसन, झलकी, एकांकी, या लघुकथा को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



झुक जाती है मन की डाली, अपनी फलभरता के डर में।
~ जयशंकर प्रसाद (30-1-1889 - 14-1-1937)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए एक नयी कहानी

अब मैं घर जाऊंगी, अब मेरी शिक्षा समाप्त हो चुकी।
(जयशंकर प्रसाद की "कला" से एक अंश)



नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें
कला MP3

#15th Story, Kala: Jaishankar Prasad/Hindi Audio Book/2014/15. Voice: Archana Chaoji

Sunday, November 23, 2014

‘प्रेम जोगन बन के...’ : SWARGOSHTHI – 195 : RAG SOHANI



स्वरगोष्ठी – 195 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 4 : राग सोहनी

एक बड़े मानदेय के एवज में उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ ने रचे मुगल-ए-आजम के मनोहारी गीत




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला, ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। फिल्म संगीत के क्षेत्र में चौथे से लेकर आठवें दशक के बीच शास्त्रीय संगीत के कई विद्वानों और विदुषियों ने अपना योगदान किया है। इस श्रृंखला में हमने कुछ ऐसे ही फिल्मी गीतों का चुनाव किया है, जिन्हें रागदारी संगीत के प्रयोक्ताओं और विशेषज्ञों ने रचा है। इन रचनाओं में राग के स्पष्ट स्वरूप की उपस्थिति मिलती है। श्रृंखला के चौथे अंक में आज हम आपसे 1956 में प्रदर्शित, भारतीय फिल्म जगत की उल्लेखनीय फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ के एक गीत- ‘प्रेम जोगन बन के...’ पर चर्चा करेंगे। फिल्म के इस गीत में राग सोहनी के स्वरों का भावपूर्ण उपयोग किया गया है। भारतीय संगीत के शीर्षस्थ साधक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ ने इस गीत को स्वर दिया था। खाँ साहब ने अपने पूरे सांगीतिक जीवनकाल में एकमात्र फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ में ही दो गीत गाये थे। इन्हीं दो गीतों में से एक गीत राग सोहनी के स्वरों में पगा हुआ है। आज की गोष्ठी में हम इसी गीत पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही राग ‘सोहनी’ के मिजाज को समझने के लिए हम आपके लिए सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद राशिद खाँ के स्वरों में इस राग की एक बन्दिश भी प्रस्तुत करेंगे। 
 


उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ
मारे कई संगीत-प्रेमियों ने फिल्म संगीत में पटियाला कसूर घराने के विख्यात गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के योगदान पर चर्चा करने का आग्रह किया था। आज का यह अंक हम उन्हीं की फरमाइश पर प्रस्तुत कर रहे हैं। पटियाला कसूर घराने के सिरमौर, उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ पिछली शताब्दी के बेमिसाल गायक थे। अपनी बुलन्द गायकी के बल पर संगीत-मंचों पर लगभग आधी शताब्दी तक उन्होने अपनी बादशाहत को कायम रखा। पंजाब अंग की ठुमरियों के वे अप्रतिम गायक थे। संगीत-प्रेमियों को उन्होने संगीत की हर विधाओं से मुग्ध किया, किन्तु फिल्म संगीत से उन्हें परहेज रहा। एकमात्र फिल्म- ‘मुगल-ए-आजम’ में उनके गाये दो गीत हैं। आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में हम इनमें से एक गीत पर चर्चा करेंगे।

भारतीय फिल्मों के इतिहास में 1960 में प्रदर्शित, बेहद महत्त्वाकांक्षी फिल्म- ‘मुगल-ए-आजम’, एक भव्य कृति थी। इसके निर्माता-निर्देशक के. आसिफ ने फिल्म की गुणबत्ता से कोई समझौता नहीं किया था। फिल्म के संगीत के लिए उन्होने पहले गोविन्द राम और फिर अनिल विश्वास को दायित्व दिया, परन्तु फिल्म-निर्माण में लगने वाले सम्भावित अधिक समय के कारण बात बनी नहीं। अन्ततः संगीतकार नौशाद तैयार हुए। नौशाद ने फिल्म में मुगल-सल्तनत के वैभव को उभारने के लिए तत्कालीन दरबारी संगीत की झलक दिखाने का हर सम्भव प्रयत्न किया। नौशाद और के. आसिफ ने तय किया कि अकबर के नवरत्न तानसेन की मौजूदगी का अनुभव भी फिल्म में कराया जाए। नौशाद की दृष्टि विख्यात गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ पर थी, किन्तु फिल्म में गाने के लिए उन्हें मनाना सरल नहीं था। पहले तो खाँ साहब ने फिल्म में गाने से साफ मना कर दिया, परन्तु जब दबाव बढ़ा तो टालने के इरादे से, एक गीत के लिए 25 हजार रुपये की माँग की। खाँ साहब ने सोचा कि एक गीत के लिए इतनी बड़ी धनराशि देने के लिए निर्माता तैयार नहीं होंगे। यह उस समय की एक बड़ी धनराशि थी, परन्तु के. आसिफ ने तत्काल हामी भर दी। नौशाद ने शकील बदायूनी से प्रसंग के अनुकूल गीत लिखने को कहा। गीत तैयार हो जाने पर नौशाद ने खाँ साहब को गीत सौंप दिया। उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ ने ठुमरी अंग की गायकी में अधिक प्रयोग किए जाने वाले राग सोहनी, दीपचन्दी ताल में निबद्ध कर गीत- ‘प्रेम जोगन बन के...’ को रिकार्ड कराया। रिकार्डिंग से पहले खाँ साहब ने वह दृश्य देखने की इच्छा भी जताई, जिस पर इस गीत को शामिल करना था। मधुबाला और दिलीप कुमार के उन प्रसंगों को देख कर उन्होने गायन में कुछ परिवर्तन भी किये। इस प्रकार भारतीय फिल्म-संगीत-इतिहास में राग सोहनी के स्वरों में ढला एक अनूठा गीत शामिल हुआ। आइए पहले आपको यह गीत सुनवाते हैं-


राग – सोहनी : फिल्म – मुगल-ए-आजम : ‘प्रेम जोगन बन के...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ : ताल – दीपचन्दी




उस्ताद राशिद खाँ 
उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ द्वारा राग सोहनी के स्वरों में पिरोया यह गीत के. आसिफ को इतना पसन्द आया कि उन्होने खाँ साहब को दोबारा 25 हजार रुपये भेंट करते हुए एक और गीत गाने का अनुरोध किया। खाँ साहब का फिल्म में गाया राग रागेश्री, तीनताल में निबद्ध दूसरा गीत है- ‘शुभ दिन आयो राजदुलारा...’। ये दोनों गीत फिल्म संगीत के इतिहास के सर्वाधिक उल्लेखनीय किन्तु सबसे खर्चीले गीत सिद्ध हुए।

आइए, खाँ साहब के गाये, राग सोहनी में निबद्ध इस गीत के बहाने थोड़ी चर्चा राग सोहनी के बारे में करते हैं। हम ऊपर यह चर्चा कर चुके हैं कि राग सोहनी का प्रयोग खयाल और ठुमरी, दोनों प्रकार की गायकी में किया जाता है। ठुमरी अंग में इस राग का प्रयोग अधिक होता है। यह राग मारवा थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग पंचम स्वर का प्रयोग वर्जित होता है। आरोह में कोमल ऋषभ स्वर पूर्णतः वर्जित नहीं होता, बल्कि अल्प परिमाण में प्रयोग किया जाता है। राग सोहनी में उन्हीं स्वरों का प्रयोग होता है, जिनका राग पूरिया और मारवा में भी किया जाता है। किन्तु इसके प्रभाव और भावाभिव्यक्ति में पर्याप्त अन्तर हो जाता है। राग सोहनी का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। धैवत पीड़ा की अभिव्यक्ति करने में समर्थ होता है। ‘नी सां रें (कोमल) सां’ की स्वर संगति से तीव्र पुकार का वातावरण निर्मित होता है। संवादी गान्धार कुछ देर के लिए इस उत्तेजना को शान्त कर सुकून देता है। वास्तव में वादी और संवादी स्वर राग के प्राणतत्त्व होते हैं, जिनसे रागों के भावों का सृजन होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में राग सोहनी के भाव अधिक स्पष्ट होते हैं। इस राग में मींड़ एवं गमक को कसे हुए ढंग से मध्यलय में प्रस्तुत करने से राग का भाव अधिक मुखरित होता है। राग सोहनी का चलन कुछ इस प्रकार से किया जाता है- ग s म(तीव्र) ध नी सां s नी ध नी ध, म(तीव्र) ग, ग म(तीव्र) ध ग म(तीव्र) ग, रे(कोमल) सा। यह चंचल प्रवृत्ति का राग है। श्रृंगार के विरह पक्ष की सार्थक अनुभूति कराने में यह राग समर्थ है। राग सोहनी, कर्नाटक पद्यति के राग हंसनन्दी के समतुल्य है। यदि राग हंसनन्दी में शुद्ध ऋषभ का प्रयोग किया जाए तो यह ठुमरी अंग के राग सोहनी की अनुभूति कराता है। तंत्रवाद्य पर राग मारवा, पूरिया और सोहनी का वादन अपेक्षाकृत कम किया जाता है।

राग सोहनी के खयाल और ठुमरी अंग की अनुभूति के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, युवा संगीतज्ञ उस्ताद राशिद खाँ के स्वरों में एक कर्णप्रिय रचना प्रस्तुत करेंगे। उस्ताद राशिद खाँ रामपुर सहसवान घराने की गायकी के संवाहक हैं। उस्ताद राशिद खाँ इस घराने के संस्थापक उस्ताद इनायत हुसैन खाँ के प्रपौत्र हैं। उन्होने अपने नाना उस्ताद निसार हुसैन खाँ से गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत संगीत की विधिवत शिक्षा ग्रहण की है। आइए, प्रतिभा के धनी गायक उस्ताद राशिद खाँ से सुनते हैं, राग सोहनी की यह आकर्षक रचना। आप राग सोहनी का आनन्द लीजिए और मुझे आज इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग – सोहनी : ‘देख वेख मोरा जिया ललचाए....’ : उस्ताद राशिद खाँ : ताल - तीनताल





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 195वें अंक की पहेली में आज हम आपको फिर एक बार लगभग छः दशक पुरानी एक फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 200वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का और सभी पाँच श्रृंखलाओं में सर्वाधिक अंक पाने वाले प्रतिभागी को वर्ष 2014 का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – यह रचना किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 29 नवम्बर, 2014 को मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 197वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 193वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘बसन्त बहार’ के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग बसन्त बहार और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल द्रुत एकताल। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम भारतीय शास्त्रीय संगीत के विद्वानों द्वारा फिल्मों के लिए गाये गए गीतों पर चर्चा कर रहे हैं। वर्ष 2015 से ‘स्वरगोष्ठी’ की श्रृंखलाओं के बारे में हमे अनेक पाठकों और श्रोताओ के बहुमूल्य सुझाव प्राप्त हो रहे हैं। इन सभी सुझाव पर विचार-विमर्श कर हम नये वर्ष से अपनी प्रस्तुतियों में आवश्यक संशोधन करने जा रहे हैं। यदि आपने अभी तक अपने सुझाव और फरमाइश नहीं भेजी हैं तो आविलम्ब हमें भेज दें। अगले रविवार 30 नवम्बर, 2014 को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Saturday, November 22, 2014

बातों बातों में - INTERVIEW OF MUSIC DIRECTOR & VIOLINIST JUGAL KISHORE

 बातों बातों में - 02

फिल्म संगीतकार व वायलिनिस्ट जुगल किशोर से सुजॉय चटर्जी की बातचीत

"जनम जनम का साथ है हमारा तुम्हारा..." 






नमस्कार दोस्तों। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते। काश, इनकी ज़िन्दगी के बारे में कुछ मालूमात हो जाती। काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने बीड़ा उठाया है फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का। फ़िल्मी अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रॄंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार के दिन। आज नवम्बर, माह के चौथे शनिवार के दिन प्रस्तुत है संगीतकार जुगल किशोर से सुजॉय चटर्जी के लम्बी बातचीत के सम्पादित अंश। जी हाँ, ये वही जुगल किशोर हैं जिन्होंने अपने भाई तिलक राज के साथ मिल कर हमे फ़िल्म 'भीगी पलकें' के वो दो अमर गीत दिए हैं - "जनम जनम का साथ है हमारा तुम्हारा..." और "जब तक मैंने समझा जीवन क्या है, जीवन बीत गया..."। तो आइए स्वागत करते हैं संगीतकार जुगल किशोर का। 




जुगल किशोर जी, नमस्कार और बहुत बहुत स्वागत है आपका 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के मंच पर।

नमस्कार और आपका बहुत बहुत शुक्रिया मुझे आमंत्रित करने का।


मैं बड़ा ही रोमांचित हो रहा हूँ यह सोच कर कि वह गीत जिसे बचपन से न जाने कितनी बार रेडियो पर सुना है, "जनम जनम का साथ है हमारा तुम्हारा...", आज उसी गीत के संगीतकार से बातचीत कर रहा हूँ। बहुत ही ख़ुशी हो रही है।

बहुत बहुत शुक्रिया, मुझे भी उतनी ही ख़ुशी है कि आपने मुझे बोलने का मौका दिया और आज के इस दौर में भी मुझे याद रखा।


जुगल किशोर जी, बातचीत का सिलसिला मैं शुरू करना चाहूँगा इस सवाल से कि क्या संगीत आपको विरासत में ही मिला था?

जी हाँ, हमारा पूरा परिवार ही संगीत से जुड़ा हुआ रहा है। मेरे दादाजी थे मास्टर तुलसीदास, जो कि 'कलकत्ता थिएट्रिकल कम्पनी में एक संगीतकार के हैसियत से काम करते थे। वहाँ उन्होंने कई नाटकों में संगीत दिया जैसे कि 'राजा हरिशचन्द्र', 'कृष्ण सुदामा', 'दिल की प्यास', 'देवर-भाभी' इत्यादि। उसके बाद उन्होंने प्राइवेट म्यूज़िक कम्पनी 'Durgadas & Sons Records Company' में राजस्थानी गीतों के कई रेकॉर्ड्स बनाए। एक संगीतकार होने के साथ-साथ वो एक शास्त्रीय गायक भी थे। जोधपुर में उनके बहुत से शिष्य थे।


वाह, अच्छा, आपके पिताजी भी संगीत जगत में आए?

जी हाँ, पिताजी ने मेरे दादाजी से ही संगीत की तालिम ली और उन्हीं के संगीत निर्देशन में 'Durgadas & Sons Records Company' में गाने गाये जिनके ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड्स बने। उसके बाद वो भी उसी रेकॉर्ड कम्पनी में संगीतकार भी बने, दादाजी की तरह।

पं शिवराम, तिलकराज, मो. रफ़ी, जुगल किशोर

आपने अपने पिताजी का नाम नहीं बताया।

पण्डित शिवराम।


वही पण्डित शिवराम कृष्ण, जिन्होंने बहुत सारी हिन्दी फ़िल्मों में भी संगीत दिया है?

जी हाँ, जैसे कि 'तीन बत्ती चार रास्ता', 'सती अनुसूया', 'रंगीला राजा', 'सती नारी', 'दूर्गा पूजा', 'ऊँची हवेली', 'कण कण में भगवान', 'श्रवण कुमार', 'वीर बजरंग', 'श्री राम-भरत मिलाप', 'गौरी शंकर', 'सुरंग', 'बद्रीनाथ यात्रा', 'महासती बेहुला', 'रफ़्तार', 'सम्पूर्ण तीर्थयात्रा', 'जय अम्बे', 'माया कादम', 'फूल और कलियाँ', 'काले गोरे', वगेरह। माइथोलोजिकल फ़िल्मों में ख़ास तौर से उन्होंने संगीत दिया और उनकी ख़ास पहचान बन गई थी। राजस्थानी फ़िल्म 'बाबा रामदेव' में उनका दिया संगीत ख़ूब चला था, ख़ास कर महेन्द्र कपूर का गाया "खम्मा खम्मा ओ धनिया...", जिसकी धुन का उन्होंने फिर एक बार 'कण कण में भगवान' फ़िल्म में इस्तेमाल किया सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में "अपने पिया की मैं तो बनी रे जोगनिया..."। उनकी अन्य राजस्थानी फ़िल्मों में उल्लेखनीय हैं 'बाबासा री लाडली', 'धनी लुगाई', 'नानीबाई को माइरो', 'गणगौर', 'गोगाजी पीर', 'गोपीचन्द भारथरी'।


बहुत खूब, जुगल किशोर जी, यह तो थी आपके दादाजी और पिताजी का परिचय। यह बताइए कि आपकी पैदाइश कहाँ की है?

मेरा जन्मस्थान है जोधपुर, राजस्थान और मेरा जन्म हुआ था 28 अगस्त 1947 की रात।


यानी देश के स्वाधीन होने के ठीक 13 दिन बाद?

जी हाँ, बिल्कुल, आज़ाद भारत में मेरा जन्म हुआ। आज़ादी से पहले मेरे पिताजी लाहौर में रहते थे।


अच्छा, फिर तो बँटवारे का वह ख़ौफ़नाक मंज़र उन्होंने भी देखा होगा?

जी, वैसे उनका जन्म जोधपुर में ही हुआ था। 16 वर्ष की आयु में उनकी संगीत यात्रा उस समय शुरू हुई जब जोधपुर के राजकुमार उमेद सिंह के दरबार में उन्हें संगीतकार की नौकरी मिली। उसके बाद वो लाहौर चले गए थे और वहाँ पर पण्डित अमरनाथ और मास्टर ग़ुलाम हैदर जैसे दिग्गज संगीतकारों की छत्र-छाया में काम करने लगे। देश विभाजन के बाद वो भारत वापस चले आए और लखनऊ में HMV के लिए काम करने लगे। यह बात है सन् 1948 से 1950 के बीच की। 1950 में वो बम्बई चले आए एक स्वतंत्र संगीतकार बनने की चाह लिए। वी. शान्ताराम जी ने उन्हें दो फ़िल्मों में संगीत देने का मौका दे दिया, ये फ़िल्में थीं 'तीन बत्ती चार रास्ता' और 'सुरंग'। दोनों ही फ़िल्में हिट हुई और सिल्वर जुबिली मनाई। 1953 में उनकी पहली फ़िल्म 'तीन बत्ती चार रास्ता' जब रिलीज़ हुई तब हम सब, यानी हमारा परिवार, बम्बई आ गया और हम सब बम्बई में सेटल हो गए। उस वक़्त मैं पाँच साल का था।


इसका मतलब आप बम्बई (अब मुम्बई) में ही पले बढ़े?

जी हाँ, मुम्बई में पला-बढ़ा, शिक्षा, सब कुछ। संगीत की शिक्षा भी यहीं पर, पहले पिताजी से, फिर वायलिन सीखा गुरू बाबा रामप्रसादजी शर्मा से, महान संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल के प्यारेलाल जी के पिता थे।


जी हाँ, और कहा जाता है कि वो बिल्कुल फ़्री में सबको वायलिन सिखाते थे। क्या यह सच है?

बिल्कुल सच बात है!


अच्छा जुगल किशोर जी, आपने बताया कि पाँच वर्ष की आयु में आप मुम्बई आए और फिर अपने पिताजी से संगीत सीखा। पर संगीत का पहला पाठ आपने कब और किनसे सीखा था?

अपने दादीमाँ से। उनका नाम है श्रीमती हरियन देवी से। वो मुझे रोज़ हारमोनियम और गायन सिखाती थी जब मैं तीन साल का था। वहीं से मेरा संगीत से साथ नाता बना।


दादाजी, दादीमाँ और पिताजी, इन तीनों का आपकी संगीत यात्रा में हाथ रहा है। अपनी माताजी के बारे में भी कुछ बताइए। क्या योगदान रहा है उनका आपके जीवन में, आपके करीयर में?

मेरी माताजी श्रीमती सीतादेवी शिवराम एक गृहवधु थीं और उन्हें संगीत सुनने का शौक था। उन्हीं की वजह से हम लोग मुम्बई में सेटल हो सके हैं। उन्होंने ही पिताजी को कहा था कि वापस जोधपुर न जाकर मुम्बई में ही हमें रहना चाहिए, अगर रोज़ी-रोटी ना भी मिले तो भी हम यहीं रह कर संघर्ष करेंगे। उनका यह अटल विश्वास, उनकी इस तपस्या और बलिदान की वजह से ही हमारा परिवार फला-फूला।


जुगल किशोर जी, प्रोफ़ेशनली आपका करीयर कब और कहाँ से शुरू हुआ?

14 साल की उम्र में, जैसा कि मैंने शुरू शुरू में बताया कि मैं अपने पिताजी के साथ काम करता था, तो शुरू में उनके फ़िल्मी गानों में रिदम प्लेअर और साइड रिदम जैसे कि मँजीरा, कब्बास, कांगो आदि बजाया करता था। उसके बाद मैं ऑरकेस्ट्रा में वायलिन बजाने लगा। साल 1964 में मैंने 'बॉलीवूड सिने म्युज़िशियन्स ऐसोसिएशन' में शामिल हो गया। मेरी पहली रेकॉर्डिंग संगीतकार उषा खन्ना जी के लिए था।


वह कौन सा गीत था कुछ याद है आपको?

दरसल मैं उस समय सिर्फ़ 17 साल का था, और अब बस इतना ही याद है कि वह रेकॉर्डिंग तारदेव रेकॉर्डिंग सेन्टर में हुई थी। उस पहले गीत की रेकॉर्डिंग‌ के वक़्त मैं 50 म्युज़िशियन के बीच बैठ कर बेहद नर्वस हो गया था। पर दूसरे ही गीत से मैं कॉनफ़िडेन्ट हो गया था कि मैं एक बड़े ऑरकेस्ट्रा में वायलिन बजा सकता हूँ।


कौन सा था वह दूसरा गीत?

दूसरी रेकॉर्डिंग थी लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के साथ, गाना था फ़िल्म 'दिल्लगी' का, लता मंगेशकर का गाया हुआ, "क्या कहूँ आज क्या बात है..."। फिर तीसरा मेरे पिता पण्डित शिवराम के साथ, फ़िल्म 'महासती बेहुला', गायक महेन्द्र कपूर। और उसके बाद तो उस दौर के सभी नामी संगीतकारों के साथ काम किया जैसे कि शंकर जयकिशन, सी. रामचन्द्र, मदन मोहन, नौशाद, एस. डी. बर्मन, आर. डी. बर्मन, और यहाँ तक कि आज के दौर के संगीतकारों के लिए भी वायलिन वादक का काम कर रहा हूँ।


बहुत ख़ूब, यह तो रही बात एक साज़िन्दे की, एक वायलिन वादक की। यह वायलिन वादक एक फ़िल्म संगीतकार कब और कैसे बना?

तिलक राज के साथ
यह सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ गीतकार एम. जी. हशमत के ज़रिए। फ़िल्म थी 'भीगी पलकें'। हशमत जी ने हमें ओड़िसा के प्रोड्युसर के. के. आर्या और निर्देशक शिशिर मिश्र से मिलवाया, जो अपनी फ़िल्म के लिए एक नए संगीतकार की तलाश कर रहे थे। मैंने और तिलकराज ने उन्हें अपने म्युज़िक रूम में आमन्त्रित किया और जितने भी कम्पोज़िशन्स हमने बनाए हुए थे, एक एक कर सब उन्हें सुनाया। इन कम्पोज़िशन्स में "जनम जनम का साथ है हमारा तुम्हारा" की धुन भी शामिल थी। जैसे ही यह धुन हमने गा कर सुनाई, तो सबने हमें वहाँ रोका और कहा कि हमें यह धुन पसन्द आई और यह हम इसे अपनी फ़िल्म में रखेंगे। प्रोड्युसर साहब ने हमसे पूछा कि क्या आप लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी को इस गीत को गाने के लिए राज़ी करवा सकते हैं, तो मैंने और हशमत जी ने कहा कि जी हाँ। फिर हशमत जी ने गीत के बोल लिखे और फ़िल्म का थीम सांग भी लिखा "जब तक मैंने समझा जीवन क्या है..."। इस गीत को मैंने एक ही दिन में कम्पोज़ कर लिया था। 10 दिसम्बर 1979 के दिन 'मेहबूब स्टुडियो' में इस गीत की रेकॉर्डिंग हुई थी, मुझे यह अब तक याद है।


'भीगी पलकें' के ये दोनों गीत सदाबहार है इसमें कोई संदेह नहीं है, और एक तरह से जुगल किशोर - तिलक राज की पहचान भी है। अच्छा तिलक राज जी के बारे में बताइए। इनके साथ जोड़ी कैसे बनी?

तिलक राज तो मेरा ही छोटा भाई है। बचपन से ही हम दोनों साथ में संगीत की चर्चा भी करते थे और साथ ही में बजाते भी थे। अपने स्कूल के वार्षिक दिवस के कार्यक्रम के लिए दोनों साथ में मिल कर नए गाने कम्पोज़ करते थे और स्टेज पर साथ में गाते थे। हमने अपना ऑरकेस्ट्रा भी बनाया था 'जयश्री ऑरकेस्ट्रा' के नाम से। जयश्री मेरी छोटी बहन है। आपने जयश्री शिवराम का नाम सुना होगा जो एक प्लेबैक सिंगर रही है।


जी बिल्कुल सुना है। 'रामा ओ रामा' फ़िल्म का शीर्षक गीत मुझे याद है उन्होंने ही गाया था। अच्छा आप कितने भाई बहन हैं?

हम लोग आठ भाई बहन हैं और सभी के सभी फ़िल्म इंडट्री से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं। मैं वायलिनिस्ट, कम्पोज़र और सिंगर, तिलक राज कम्पोज़र और सिंगर, मुकेश शिवराम एक सिंगर है, भगवान शिवराम एक रिदम प्लेयर, पूर्णिमा परिहार एक सिंगर, नवीन शिवराम एक कीबोर्ड प्लेयर तथा जयश्री शिवराम व निशा चौहान सिंगर्स हैं। इस तरह से तीन पीढ़ियों से हमारा परिवार संगीत की सेवा में लगा हुआ है।


वाकई संगीत जगत में उल्लेखनीय योगदान है आपने परिवार का। जुगल किशोर जी, बात चली थी फ़िल्म 'भीगी पलकें' की, उसके ये दो यादगार गीतों की। तो हम और ज़रा डिटेल में जानना चाहेंगे इन दोनों गीतों के बारे में। तो पहले गीत "जनम जनम का साथ है..." की रेकॉर्डिंग से जुड़ी कोई बात हो, कोई यादगार घटना हो तो हमें बताइए?

बात ऐसी थी कि मुझे इस फ़िल्म के सभी गीतों को 1979 के दिसम्बर के महीने में रेकॉर्ड कर लेने का निर्देश मिला हुआ था। पर लता दीदी ने कहा कि उस समय तो वो लन्दन के शो में बिज़ी रहेंगी। इस वजह से हमें 10 अप्रैल 1980 तक रुकना पड़ा। लता जी वापस आईं और तब जाकर गाना रेकॉर्ड हुआ। उधर रफ़ी साहब इतने प्यारे थे कि उन्होंने हमें बता रखा था कि लता जी जैसे ही मेहबूब स्टुडियो पहुँचे, मुझे फ़ोन कर देना, मैं बाकी सब काम छोड़ कर वहाँ तुरन्त पहुँच जाऊँगा। और उन्होंने वैसा ही किया। वो मेरी रेकॉर्डिंग को 1 बजे पूरा करके ही आर. डी. बर्मन के रेकॉर्डिंग पर गए।

तिलक राज और लता जी

लता जी और रफ़ी साहब से अपनी पहली ही फ़िल्म में गाना गवा रहे थे आप। आपको डर नहीं लगा, नर्वस नहीं हुए?

मैं नर्वस तो नहीं था पर टेन्स ज़रूर था क्योंकि एक ही सेशन में मुझे दो दो गाने रेकॉर्ड करने थे। एक हैप्पी और एक सैड वर्ज़न जो लता दीदी का सोलो था "जनम जनम का साथ है तुम्हारा हमारा, जीवन साथी बन कर तूने हमसे किया किनारा..."। जैसा कि मैंने बताया दोपहर 1 बजे तक लता-रफ़ी डुएट रेकॉर्ड हो गया था, और लता जी का यह सैड वर्ज़न 1 से 2 बजे की बीच में ही रेकॉर्ड कर लिया गया। सब सही सही हो गया। और जहाँ तक लता दीदी या रफ़ी साहब से डरने वाली बात है तो ऐसा बिल्कुल नहीं था क्योंकि बहुत छोटे उम्र से ही मैं अपने पिताजी के साथ रिहर्सल्स पर जाया करता था जहाँ मुझे लता जी और रफ़ी साहब बैठे मिलते थे। मैं उनके घरों में भी गया, और वो मुझे पहचानते थे शिवराम जी के बेटे के रूप में। इसलिए जब मैं म्युज़िक डिरेक्टर बना तो दोनों ने मेरी मदद की और हौसला बढ़ाया, आशीर्वाद दिया।


अच्छा! अब किशोर दा वाले गीत के बारे में भी कुछ बताइए?

किशोर दा को गीत "जब तक मैं यह समझा जीवन क्या है..." की धुन इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने कहा कि सिंगिंग केबिन की सारी लाइट्स ऑफ़ कर दी जाए और सिर्फ़ एक डिम लाइट ही ऑन रखी जाए ताकि वो गीत के बोलों को पढ़ सके। उनका यह अनुरोध मुझे कुछ अजीब सा लगा, इसलिए मैं उनसे पूछ ही बैठा कि किशोर दा, आपने यह अँधेरा क्यों करवा दिया स्टुडियो में? तो उन्होंने कहा कि यह जो गीत है "जब तक मैंने समझा जीवन क्या है, जीवन बीत गया..." इसका माहौल बनाने के लिए यह अँधेरा करवाया है। और उन्होंने उस अँधेरे में खड़े हो कर पूरा गीत रेकॉर्ड किया मेहबूब स्टुडियो में। रेकॉर्डिंग हो जाने के बाद किशोर दा ने हमें बहुत आशीर्वाद दिया, उन्हें यह गीत बहुत ही अच्छा लगा और उनके दिल को छू लिया था।


वाह! और क्या मास्टरपीस बना! अच्छा जुगल किशोर जी, 'भीगी पलकें' के बाद आपके संगीत से सजी कौन कौन सी फ़िल्में आईं?

'समय की धारा', 'तेरे बिना क्या जीना', 'सुलगते अरमान', 'लाखा', 'बिरजू', 'हम दहेज लाए हैं', 'ननद भौजाई', 'करमाबाई', 'गौरी', 'बिननी वोट देने चली', 'मेहन्दी रच्या हाथ', 'म्हारी अक्खा तीज', 'लाडलो'। ये सब हिन्दी और राजस्थानी फ़िल्में थीं। फिर एक ओड़िया फ़िल्म 'बस्त्राहरण' में भी मैंने संगीत दिया। कुछ ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम्स भी किए जैसे कि 'जय श्री राम' और 'मैया का दरबार'। और आजकल अमिताभ बच्चन के जीवन पर आधारित एक ऐल्बम बना रहे हैं जिसका शीर्षक है 'कभी हम जुदा न होंगे'। 'समय की धारा' में मैंने अपनी बहन जयश्री शिवराम को गवाया था किशोर दा के साथ।


जी, और इस फ़िल्म में आशा जी का गाया एक गीत था "प्यार तो किया प्यार की प्यास रह गई, टूटे दिल में क्यों मिलन की आस रह गई...", यह गीत मुझे बहुत पसन्द है, बहुत ही सुन्दर बोल हैं और कम्पोज़िशन भी बहुत ही सुन्दर है।

शुक्रिया! इस फ़िल्म के गाने भी एम. जी. हशमत जी के ही लिखे हुए हैं।


"प्यार तो किया प्यार की प्यास रह गई, टूटे दिल में क्यों मिलन की आस रह गई...", क्या आपके दिल में भी यह ख़याल आया कि आपने फ़िल्मों में अच्छा संगीत तो दिया पर बड़ी कामयाबी की आस रह गई? मेरा मतलब है कि 'भीगी पलकें' और 'समय की धारा' में इतना अच्छा संगीत देने के बावजूद आपको कभी बड़े बैनर की फ़िल्म नहीं मिली, और न ही संगीत निर्देशन के क्षेत्र में बड़ी सफलता मिली। इसके पीछे आप कौन सा कारण देखते हैं?

हमें कोई शिकायत नहीं है किसी से भी। पॉपुलर गाने देने के बाद भी इण्डस्ट्री में ऐज़ मुज़िक डिरेक्टर हमें ज़्यादा काम नहीं मिला, इसका हमें कोई ग़म नहीं है। मैं यही कहना चाहूँगा कि बॉलीवुड में कलाकारों का कोई आत्म-सम्मान नहीं है, उन्हें प्रोड्युसरों के इर्द-गिर्द घूमना पड़ना है काम पाने के लिए जो कि हमें करना नहीं था क्योंकि हम अपना काम बहुत अच्छी तरह जानते थे। यह हमारे उसूलों के ख़िलाफ़ था कि किसी के सामने जाकर काम माँगे। संगीत निर्देशन हमारे लिए बहुत ज़रूरी नहीं था क्योंकि वायलिन बजाकर हम अपनी रोज़ी-रोटी बहुत अच्छी तरह से और आत्म-सम्मान के साथ कमा सकते थे, और आज तक कमा रहे हैं। हम बहुत ख़ुश हैं हमें जितना भी मिला है, जो भी मिला है, कोई शिकवा नहीं किसी से, कोई गिला नहीं।


बहुत अच्छा लगा यह जानकर, और शायद यही जीवन में ख़ुश रहने का मूलमंत्र है। अच्छा फ़िल्म संगीतकार के रूप में ना सही पर एक वायलिनिस्ट के रूप में आप ने एक लम्बी पारी खेली है। तो कुछ ऐसे गीतों के बारे में बताइए जिनमें आपने वायलिन बजाया है?

इस लिस्ट का कोई अन्त नहीं है। बस यही कह सकता हूँ कि मैंने लता जी, आशा जी, रफ़ी साहब, किशोर दा, मुकेश जी, महेन्द्र कपूर जी, अलका याज्ञ्निक, कविता कृष्णमूर्ति, कुमार सानू, सुरेश वाडकर, जेसुदास जैसे कलाकारों के साथ बजाया है।


फिर भी कम से कम कोई एक गीत तो बताइए जो बहुत हिट हुआ हो और जिसमें आपका बजाया हुआ वायलिन बहुत ही प्रॉमिनेन्स के साथ सुनाई देता हो?

फ़िल्म 'शोर' का गीत "एक प्यार का नग़मा है"।

क्या बात है, क्या बात है साहब!!! अच्छा जुगल किशोर जी, हमने यह जाना कि तीन पीढ़ियों से आपका परिवार संगीत की सेवा करता चला आ रहा है। क्या आपकी अगली पीढ़ी भी इसी राह पर है?

जी हाँ, मेरा बेटा प्रभात किशोर बॉलीवुड में वायलिन बजाता है और वो Symphony Orchestra of India से भी जुड़ा हुआ है। उसने मास्को, लन्दन, दुबई, श्रीलंका और भारत के तमाम शहरों में पर्फ़ार्म किया है, और कई बड़े-बड़े उस्तादों के साथ संगत किया है जैसे कि उस्ताद ज़ाकिर हुसैन, पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया। अनुष्का शंकर के साथ उसने लन्दन के Royal Albert Hall में बजाया है। इसी 14 नवम्बर को मैं और प्रभात मुम्बई के शनमुखानन्द हॉल में लीजेन्ड प्यारेलाल जी के साथ कॉनसर्ट में बजाने वाले है जो गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी को श्रद्धांजलि स्वरूप एक कार्यक्रम है। मेरे भाई के बेटे कपिल कुमार और अमित कुमार गायक हैं जो दुनिया भर में शोज़ कर रहे हैं। मेरे भाई भगवान के बेटे दिव्य कुमार ने कई हिन्दी फ़िल्मों में गीत गाए हैं जैसे कि 'इशकज़ादे', 'काई पोचे', 'भाग मिलखा भाग'। "हवन कुण्ड में बैठ के क्या करेंगे, हवन करेंगे...", यह गीत जो काफ़ी लोकप्रिय हुआ, यह उसी का गाया हुआ है।

वाह, क्या बात है! अच्छा जुगल किशोर जी, अब एक आख़िरी सवाल आपसे पूछना चाहूँगा, क्योंकि आप वायलिन के मास्टर हैं, तो क्या आप हमारे उन पाठकों को जो अपने बच्चों को वायलिन सिखाना चाहते हैं, उन्हें कुछ टिप्स देना चाहेंगे?

बच्चों के लिए मेरा सुझाव यही है कि अगर रुचि है तो आप ज़रूर सीख सकते हैं लेकिन 5 से  8 वर्ष की आयु से, इससे पहले नहीं। वायलिन एक बहुत ही कठिन साज़ है जिसमें महारथ हासिल करने के लिए दिन में कम से कम 2 घंटे रियाज़ करने पड़ेंगे कम से कम 5 वर्षों तक। और जो लोग इसे करीयर के रूप में लेना चाहते हैं, उनसे मैं यह कह दूँ कि ऐसी कोई गारंटी नहीं है कि हर वायलिन सीखने वाला ही कलाकार बन जाएगा, सब कुछ क़िस्मत पर और आपकी साधना पर डिपेण्ड करेगा।

बहुत बहुत धन्यवाद जुगल किशोर जी, आपने हमारा यह निमंत्रण स्वीकार किया और इतना समय हमें दिया, अपने बारे में बताया, मैं अपनी तरफ़ से, 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की तरफ़ से, और हमारे तमाम पाठकों की तरफ़ से आपको बहुत बहुत धन्यवाद देता हूँ, और ईश्वर से आपके उत्तर स्वास्थ्य के साथ दीर्घायु होने की कामना करता हूँ।

आपको और सभी पाठकों को बहुत बहुत धन्यवाद।


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी cine.paheli@yahoo.com पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



Tuesday, November 18, 2014

कार्टूनिस्ट काजल कुमार रचित लोकतंतर

इस साप्ताहिक स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको हिन्दी में मौलिक और अनूदित, नई और पुरानी, प्रसिद्ध कहानियाँ और छिपी हुई रोचक खोजें सुनवाते रहे हैं। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में उन्हीं की लघुकथा "खान फ़िनॉमिनॉन " का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट काजल कुमार की व्यंग्यात्मक लघुकथा लोकतंतर जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी "लोकतंतर" का गद्य कथा कहानी ब्लॉग पर उपलब्ध है। इस कथा का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 4 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

कवि, कथाकार और कार्टूनिस्ट काजल कुमार के बनाए चरित्र तो आपने देखे ही हैं। उनकी व्यंग्यात्मक लघुकथायेँ "एक था गधा" और "ड्राइवर" आप पहले सुन चुके हैं। काजल कुमार दिल्ली में रहते हैं।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

सरकार में इस तरह से एडवांस देने का कोई सिस्टम नहीं है।
 (काजल कुमार रचित "लोकतंतर" से एक अंश)





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लोकतंतर MP3

#14th Story, Loktantra: Kajal Kumar/Hindi Audio Book/2014/14. Voice: Anurag Sharma

Sunday, November 16, 2014

‘केतकी गुलाब जूही चम्पक वन फूले...’ : SWARGOSHTHI – 194 : RAG BASANT BAHAR



स्वरगोष्ठी – 194 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 3 : राग बसन्त बहार

पार्श्वगायक मन्ना डे ने जब पण्डित भीमसेन जोशी को राज-दरबार में पराजित किया 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनो हमारी नई लघु श्रृंखला, ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’ जारी है। फिल्म संगीत के क्षेत्र में चौथे से लेकर आठवें दशक के बीच शास्त्रीय संगीत के कई विद्वानों और विदुषियों ने अपना योगदान किया है। इस श्रृंखला में हमने कुछ ऐसे ही फिल्मी गीतों का चुनाव किया है, जिन्हें रागदारी संगीत के प्रयोक्ताओं और विशेषज्ञों ने रचा है। इन रचनाओं में राग के स्पष्ट स्वरूप की उपस्थिति मिलती है। श्रृंखला के तीसरे अंक में आज हम आपसे 1956 में प्रदर्शित फिल्म ‘बसन्त बहार’ के एक गीत- ‘केतकी गुलाब जूही चम्पक बन फूलें...’ पर चर्चा करेंगे। फिल्म के इस गीत में राग ‘बसन्त बहार’ के स्वरों का उपयोग किया गया है। विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी ने इस गीत को स्वर दिया था और संगीत रचने में भी अपना योगदान किया था। इस युगल गीत में पण्डित जी के साथ जाने-माने पार्श्वगायक मन्ना डे ने भी अपना स्वर दिया है। इसके साथ ही राग ‘बसन्त बहार’ के यथार्थ स्वरूप को अनुभव करने के लिए हम आपके लिए सुविख्यात संगीतज्ञ डॉ. लालमणि मिश्र का विचित्र वीणा पर बजाया राग ‘बसन्त बहार’ की एक रचना भी प्रस्तुत करेंगे।
 


मन्ना डे : रेखांकन - सुवायु नंदी
भीमसेन जोशी : रेखांकन - उदय देव
फिल्म-संगीत-जगत में समय-समय पर कुछ ऐसे गीतों की रचना हुई है, जो आज हमारे लिए अनमोल धरोहर बन गए हैं। एक ऐसा ही गीत 1956 में प्रदर्शित फिल्म 'बसन्त बहार' में रचा गया था। यूँ तो इस फिल्म के सभी गीत अपने समय में हिट हुए थे, किन्तु फिल्म का एक गीत- 'केतकी गुलाब जूही चम्पक वन फूलें...' कई कारणों से फिल्म-संगीत-इतिहास के पृष्ठों में दर्ज़ हुआ। इस गीत की मुख्य विशेषता यह है कि पहली बार किसी वरिष्ठ शास्त्रीय गायक (पण्डित भीमसेन जोशी) और फिल्मी पार्श्वगायक (मन्ना डे) ने मिल कर एक ऐसा युगल गीत गाया, जो राग बसन्त बहार के स्वरों में ढला हुआ था। यही नहीं, फिल्म के प्रसंग के अनुसार राज-दरबार में आयोजित प्रतियोगिता में नायक गोपाल (भारतभूषण) को गायन में दरबारी गायक के मुक़ाबले में विजयी होना था। आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि दरबारी गायक के लिए भीमसेन जी ने और नायक के लिए मन्ना डे ने पार्श्वगायन किया था। फिल्म से जुड़ा तीसरा रेखांकन योग्य तथ्य यह है कि फिल्म की संगीत-रचना में सुप्रसिद्ध सारंगी वादक पण्डित रामनारायण का उल्लेखनीय योगदान था।

1949 की फिल्म 'बरसात' से अपनी हलकी-फुलकी और आसानी से गुनगुनाये जाने वाली सरल धुनों के बल पर सफलता के झण्डे गाड़ने वाले शंकर-जयकिशन को जब फिल्म 'बसन्त बहार' का प्रस्ताव मिला तो उन्होने इस शर्त के साथ इसे तुरन्त स्वीकार कर लिया कि फिल्म के राग आधारित गीतों के गायक मन्ना डे ही होंगे। जबकि फिल्म के नायक भारतभूषण के भाई शशिभूषण सभी गीत मोहम्मद रफी से गवाना चाहते थे। मन्ना डे की प्रतिभा से यह संगीतकार जोड़ी, विशेष रूप से शंकर, बहुत प्रभावित थे। शंकर-जयकिशन ने फिल्म 'बसन्त बहार' में मन्ना डे के स्थान पर किसी और पार्श्वगायक को लेने से साफ मना कर दिया। फिल्म के निर्देशक राजा नवाथे मुकेश की आवाज़ को पसन्द करते थे, परन्तु वो इस विवाद में तटस्थ बने रहे। निर्माता आर. चन्द्रा भी पशोपेश में थे। मन्ना डे को हटाने का दबाव जब अधिक हो गया तब अन्ततः शंकर-जयकिशन को फिल्म छोड़ देने की धमकी देनी पड़ी। अन्ततः मन्ना डे के नाम पर सहमति बनी।

फिल्म 'बसन्त बहार' में शंकर-जयकिशन ने 9 गीत शामिल किए थे, जिनमें से दो गीत- 'बड़ी देर भई...' और 'दुनिया न भाए मोहे...' मोहम्मद रफी के एकल स्वर में गवा कर उन्होने शशिभूषण की बात भी रख ली। इसके अलावा उन्होने मन्ना डे से चार गीत गवाए। राग मियाँ की मल्हार पर आधारित 'भयभंजना वन्दना सुन हमारी...' (एकल), राग पीलू पर आधारित 'सुर ना सजे...' (एकल), लता मंगेशकर के साथ युगल गीत 'नैन मिले चैन कहाँ...' और इन सब गीतों के साथ शामिल था राग बसन्त बहार के स्वरों में पिरोया वह ऐतिहासिक गीत- 'केतकी गुलाब जूही...', जिसे मन्ना डे ने पण्डित भीमसेन जोशी के साथ जुगलबन्दी के रूप में गाया है। इस आलेख की आरम्भिक पंक्तियों में हम फिल्म के उस प्रसंग की चर्चा कर चुके हैं, जिसमें यह गीत फिल्माया गया था। आइए, अब कुछ चर्चा इस गीत की रचना-प्रक्रिया के बारे में करते हैं। संगीतकार शंकर-जयकिशन फिल्म के इस प्रसंग के लिए एक ऐतिहासिक गीत रचना चाहते थे। उन्होने सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पण्डित भीमसेन जोशी और सारंगी वादक पण्डित रामनारायण को आमंत्रित किया और यह दायित्व उन्हें सौंप दिया। इसके आगे की कहानी आप स्वयं पण्डित भीमसेन जोशी की जुबानी सुनिए, इस रिकार्डिंग के माध्यम से। पण्डित भीमसेन जोशी पर निर्मित वृत्तचित्र का यह एक अंश है, जिसमें गीतकार गुलज़ार, पण्डित जी से सवाल कर रहे हैं।


पण्डित भीमसेन जोशी से की गई गीतकार गुलज़ार की बातचीत का एक अंश



 पण्डित जी ने बातचीत के दौरान जिस 'गीत लिखने वाले' की ओर संकेत किया है, वो कोई और नहीं, बल्कि गीतकार शैलेन्द्र थे। दूसरी ओर शंकर-जयकिशन ने जब इस जुगलबन्दी की बात मन्ना डे को बताई तो वे एकदम भौचक्के से हो गए। मन्ना डे ने यद्यपि कोलकाता में उस्ताद दबीर खाँ और मुम्बई आकर उस्ताद अमान अली खाँ और उस्ताद अब्दुल रहमान खाँ से संगीत का प्रशिक्षण प्राप्त किया था, किन्तु पण्डित जी के साथ जुगलबन्दी गाने का प्रस्ताव सुन कर उनकी हिम्मत जवाब दे गई। मन्ना डे की उस समय की मनोदशा को समझने के लिए लीजिए, प्रस्तुत है- उनके एक साक्षात्कार का अंश-


मन्ना डे के एक साक्षात्कार का अंश



इस गीत को गाने से बचने के लिए मन्ना डे चुपचाप पुणे चले जाने का निश्चय कर चुके थे, लेकिन पत्नी के समझाने पर उन्होने इस प्रकार पलायन स्थगित कर दिया। पंकज राग द्वारा लिखित पुस्तक 'धुनों की यात्रा' में इस प्रसंग का उल्लेख करते हुए लिखा गया है कि- मन्ना डे अपने संगीत-गुरु उस्ताद अब्दुल रहमान खाँ के पास मार्गदर्शन के लिए भी गए थे। इसके अलावा मन्ना डे के गाये हिस्से में राग बसन्त के साथ राग बहार का स्पर्श दिया गया और लय भी थोड़ी धीमी की गई थी। पण्डित रामनारायण ने मन्ना डे को कुछ ऐसी तानें सीखा दी, जिससे फिल्म का नायक विजयी होता हुआ नज़र आए। साक्षात्कार में मन्ना डे ने स्वीकार किया है कि उनके साथ गाते समय पण्डित जी ने अपनी पूरी क्षमता का प्रयोग नहीं किया था। अन्ततः पण्डित भीमसेन जोशी, पण्डित रामनारायण, मन्ना डे और शैलेन्द्र के प्रयत्नों से फिल्म 'बसन्त बहार' का ऐतिहासिक गीत- 'केतकी गुलाब जूही चम्पक वन फूलें...' की रचना हुई और फिल्म संगीत के इतिहास में यह गीत सुनहरे पृष्ठों में दर्ज़ हुआ। लीजिए, अब आप पूरा गीत सुनिए।


फिल्म – बसन्त बहार : ‘केतकी गुलाब जूही चम्पक वन फूलें...’ : पण्डित भीमसेन जोशी और सुर गन्धर्व मन्ना डे



बसन्त ऋतु का अत्यन्त मोहक राग ‘बसन्त बहार’ दो रागों के मेल से बना है। कुछ विद्वान इसे ‘छायालग राग’ कहते हैं। आम तौर पर इस राग के आरोह में बहार और अवरोह में बसन्त के स्वरों का प्रयोग किया जाता है। यदि आरोह में बसन्त के स्वरों का प्रयोग किया जाए तो इसे पूर्वांग प्रधान रूप देना आवश्यक है। राग बसन्त और बहार में मुख्य अन्तर यह है कि बहार में कोमल गान्धार और दोनों निषाद तथा बसन्त में कोमल ऋषभ व कोमल धैवत के साथ शुद्ध गान्धार का प्रयोग होता है। राग ‘बसन्त बहार’ दो प्रकार से प्रचलन में है। यदि बसन्त को प्रमुखता देनी हो तो इसे पूर्वी थाट के अन्तर्गत लेना चाहिए। ऐसे में वादी स्वर षडज और संवादी पंचम हो जाता है। काफी थाट के अन्तर्गत लेने पर राग बहार प्रमुख हो जाता है और वादी मध्यम और संवादी षडज हो जाता है। अन्य ऋतुओं में इस राग का गायन-वादन रात्रि के तीसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु बसन्त ऋतु में इसका प्रयोग किसी भी समय किया जा सकता है।

डॉ. लालमणि मिश्र 
अब हम आपको एक प्राचीन और लुप्तप्राय तंत्रवाद्य विचित्रवीणा पर राग ‘बसन्त बहार’ सुनवाते हैं। इसे प्रस्तुत किया है, बहुआयामी प्रतिभा के धनी कलासाधक, शिक्षक और शोधकर्त्ता डॉ. लालमणि मिश्र ने। कृतित्व से पूर्व इस महान कलासाधक के व्यक्तित्व पर एक दृष्टिपात करते चलें।

डॉ. लालमणि मिश्र का जन्म 11 अगस्त, 1924 को कानपुर के कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पाँच वर्ष की आयु में उन्हें स्कूल भेजा गया किन्तु 1930 में कानपुर के भीषण दंगों के कारण न केवल इनकी पढ़ाई छूटी बल्कि इनके पिता का व्यवसाय भी बर्बाद हो गया। परिवार को सुरक्षित बचाकर इनके पिता कलकत्ता (अब कोलकाता) आ गए। कोलकाता में बालक लालमणि की माँ को संगीत की शिक्षा प्रदान करने वाले कथावाचक पण्डित गोवर्द्धन लाल घर आया करते थे। एक बार माँ को सिखाए गए 15 दिन के पाठ को यथावत सुना कर उन्होने पण्डित जी को चकित कर दिया। उसी दिन से लालमणि की विधिवत संगीत शिक्षा आरम्भ हो गई। पण्डित गोवर्द्धन लाल से उन्हें ध्रुवपद और भजन का ज्ञान मिला तो हारमोनियम वादक और शिक्षक विश्वनाथप्रसाद गुप्त से हारमोनियम बजाना सीखा। ध्रुवपद-धमार की विधिवत शिक्षा पण्डित कालिका प्रसाद से, खयाल की शिक्षा रामपुर सेनिया घराने के उस्ताद वज़ीर खाँ के शिष्य मेंहदी हुसेन खाँ से मिली। बिहार के मलिक घराने के शिष्य पण्डित शुकदेव राय से सितार वादन की तालीम मिली। मात्र 16 वर्ष की आयु में मुंगेर, बिहार के एक रईस परिवार के बच्चों के संगीत-शिक्षक बन गए। 1944 में कानपुर के कान्यकुब्ज कालेज में संगीत-शिक्षक नियुक्त हुए। इसी वर्ष सुप्रसिद्ध विचित्र वीणा वादक उस्ताद अब्दुल अज़ीज खाँ (पटियाला) के वाद्य विचित्र वीणा से प्रभावित होकर उन्हीं से शिक्षा ग्रहण की और 1950 में लखनऊ के भातखण्डे जयन्ती समारोह में इस वाद्य को बजा कर विद्वानो की प्रशंसा अर्जित की। लालमणि जी 1951 में उदयशंकर के दल में बतौर संगीत निर्देशक नियुक्त हुए और 1954 तक देश-विदेश का भ्रमण किया। 1951 में कानपुर के गाँधी संगीत महाविद्यालय के प्रधानाचार्य बने। 1958 में पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के आग्रह पर वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संगीत संकाय में वाद्य विभाग के रीडर पद पर सुशोभित हुए और यहीं डीन और विभागाध्यक्ष भी हुए। संगीत की हर विधा में पारंगत पण्डित लालमणि मिश्र ने अपनी साधना और शोध के बल पर अपनी एक अलग शैली विकसित की जिसे ‘मिश्रवाणी’ के नाम से स्वीकार किया गया। 17 जुलाई, 1979 को मात्र 55 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ था। आइए अब पण्डित लालमणि मिश्र से सुनते हैं, राग बसन्त बहार।


राग – बसन्त बहार : विचित्र वीणा पर एक ताल में निबद्ध रचना : डॉ. लालमणि मिश्र 



आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 194वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक बार फिर लगभग छः दशक पुरानी एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 200वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा तथा वर्ष 2014 में सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी को वार्षिक विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में आपको किस राग की झलक मिलती है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार 22 नवम्बर, 2014 की मध्यरात्रि से पूर्व तक प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 196वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 192वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुविख्यात गायक पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर और उस्ताद अमीर खाँ के युगल स्वरों में गाये, फिल्म बैजू बावरा के गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग देसी अथवा देसी तोड़ी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल विलम्बित तीनताल। पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मों गीत’ के माध्यम से हम भारतीय संगीत जगत के मूर्धन्य कलासाधकों के द्वारा उनके फिल्म संगीत के योगदान को रेखांकित कर रहे हैं। इस श्रृंखला के बारे में आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। नए वर्ष से ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के अन्तर्गत आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Saturday, November 15, 2014

"हमको हँसते देख ज़माना जलता है..." - जानिये कैसे एक दूसरे की मदद की थी रफ़ी और दुर्रानी ने


एक गीत सौ कहानियाँ - 45
 

हमको हँसते देख ज़माना जलता है...



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ- 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 45वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'हम सब चोर हैं' के गीत "हमको हँसते देख ज़माना जलता है..." के बारे में जिसे मोहम्मद रफी और जी. एम. दुर्रानी ने गाया था।



जी. एम. दुर्रानी
र कलाकार का अपना एक वक़्त होता है जब उसकी चमक, उसका तेज सूरज की तरह होता है, और फिर एक ऐसा समय आता है जब यह चमक धीरे धीरे कम होने लगती है, उस कलाकार का वक़्त पूरा हुआ चाहता है। कुछ कलाकारों का यह वक़्त लम्बा होता है, और कुछ कलाकारों का छोटा। गायक जी. एम. दुर्रानी के गाये हुए गीतों की कामयाबी का दौर केवल 6-7 साल चला, यानी 1943 से 1951 तक। और फिर न जाने क्या हुआ कि फ़िल्मी दुनिया उनसे दूर होती चली गई। मोहम्मद रफ़ी, जो दुर्रानी साहब के नक्श-ए-क़दम पर, उन्हीं की आवाज़ का अनुकरण कर पार्श्वगायन की दुनिया में उतरे थे, वो कामयाबी की ऊँचाइयाँ चढ़ते चले गये, जबकि मूल आवाज़ का मालिक जी. एम. दुर्रानी ढलान पर उतरते चले गये। जी. एम. दुर्रानी के अपने शब्दों में - "मैं जब टॉप पर था, शोहरत की ऊँचाइयों पर था, मैंने गाना छोड़ दिया। मेरे गाना छोड़ने के दो ओजुहात हैं। सबसे पहली वजह तो यह है कि उपरवाले की मर्ज़ी। यानी जिसने आपको, मुझको, तमाम दुनिया वालों को पैदा किया है, उसके क़रीब पहुँचने के लिए मैंने गाना बजाना और यह फ़िल्म लाइन छोड़ दिया। बंगले में रहना, गाड़ियों में घूमना, नोटों को गिनना, उसके पीछे-पीछे भागना, यह बात सन् 1951 की है। मैने किसी फ़िल्मवाले को देख कर गर्दन नीची कर लिया करता था और सोचता था कि इससे बात करूँगा तो फ़िजूल बातें मुँह से निकलेंगी और दाढ़ी भी मैंने इसलिए बढ़ा ली थी कि कोई मुझे जल्दी पहचान ना सके।बस मेरे दिल में यह होता रहता कि गाना बजाना, फ़िल्म लाइन, ये सब बुरी बातें हैं। मैंने बैंक से थोड़े से कुछ पैसे निकाल कर लोगों में, ग़रीबों में बाँटने शुरु कर दिये और बे-नियाज़ हो गया। अंजाम यह हुआ कि मैं फ़क्कड़ हो गया। फिर साहब, किसी से मैंने थोड़े से क़र्ज़-वर्ज़ लेकर जनरल मर्चैन्ट की दुकान खोल ली।" और इस तरह से गुज़रे ज़माने का एक शानदार गायक और संगीतकार बन गया एक मामूली दुकानदार।

दुर्रानी और रफ़ी
आज जब रफ़ी और दुर्रानी के गाये युगल गीत की बात चली है तो यह बताना बेहद ज़रूरी है कि रफ़ी साहब के संघर्ष के दिनों में दुर्रानी साहब ने उनकी बड़ी मदद की थी। यह वह वक़्त था जब जी. एम. दुर्रानी और कुन्दनलाल सहगल जैसे कुछ ही गायक फ़िल्म जगत में डिमाण्ड में थे। ऐसी स्थिति में किसी नये गायक का इस उद्योग में क़दम जमाना और मशहूर बनना आसान काम नहीं था। ऐसे समय में मोहम्मद रफ़ी ने फ़िल्मी गायन के क्षेत्र में पाँव रखने का निर्णय लिया और अपने संघर्ष की शुरुआत कर दी। तब जी. एम. दुर्रानी साहब ही एक मसीहा बन कर उनके सामने आये और उन्हें काम दिलवाने में उनकी बहुत मदद की। दुर्रानी साहब अच्छे गायक व संगीतकार तो थे ही, लेकिन उससे भी ज़्यादा अच्छे और भले इंसान भी थे। और यही कारण था कि एक ही व्यावसाय में होते हुए भी काम ढूँढ रहे रफ़ी को वो संगीतकार श्यामसुन्दर के पास ले गये। उन्होंने इस बात का तनिक भी विचार नहीं किया कि अगर रफ़ी का सितारा चमक गया तो उन्हीं की पेट पर लात पड़ सकती है। और श्यामसुन्दर से वो रफ़ी की सिफ़ारिश कर दी, और फ़िल्म 'गाँव की गोरी' के एक गाने में कोरस में गाने का मौका दिलवा दिया। इस सिफ़ारिश और दुर्रानी साहब के मदद का ही नतीजा था कि रफ़ी साहब को थोड़ा-थोड़ा काम मिलने लगा। और फिर अपनी मेहनत, लगन, प्रतिभा और ईश्वर-प्रदत्त आवाज़ के बल पर मोहम्मद रफ़ी बन गये हिन्दी सिनेमा संगीत जगत के महागायक।

ओ. पी. नय्यर
जब रफ़ी का सितारा दिन-ब-दिन चढ़ता चला जा रहा था, तब दुर्भाग्यवश जी. एम. दुर्रानी साहब का करीयर धीरे-धीरे ढलान पर आ गया। काम कम हो गया, काम नहीं मिलने की वजह से आमदनी कम हो गई, और घर में धीरे-धीरे मुफ़लिसी आने लगी। उपर लिखे दुर्रानी के शब्दों से प्रतीत होता है कि उन्होंने ही फ़िल्म लाइन छोड़ दी, पर हक़ीक़त यही था कि उन्हें काम मिलना बन्द हो गया था। नई पीढ़ी के गायकों के आने से सहगल-दुर्रानी युग समाप्त हो चुका था। दुर्रानी साहब की माली हालत बद से बदतर हो गई। उनकी इस ग़रीबी का पता रफ़ी साहब को चला और उन्हें बड़ी तक़लीफ़ हुई। अपने आइडल गायक, जिनकी आवाज़ का अनुसरण कर वो गायन के इस क्षेत्र में उतरे थे, जिन्हें वो अपना गुरु मानते थे, उस इंसान को ग़रीबी से परेशान देख वो ख़ुद भी बेचैन हो उठे और उन पुराने दिनों को याद करते हुए दुर्रानी साहब को हरसम्भव मदद करने का फ़ैसला लिया। रफ़ी साहब नय्यर साहब के पास जा कर उन्होंने रीक्वेस्ट की कि वो 1956 में बनने वाली फ़िल्म 'हम सब चोर हैं' के गाने में रफ़ी साहब के साथ दुर्रानी साहब को भी गाना गवाये। नय्यर साहब ने बात मान ली और इस फ़िल्म में एक गाना ऐसा रखा गया जिसमें नायक और हास्य चरित्र, दोनों गाते हैं। इस सिचुएशन के लिए रफ़ी साहब के साथ दुर्रानी का गाया गीत रखा गया। यह गीत था "हमको हँसते देख ज़माना जलता है..."। इस गीत के अलावा भी कुछ और संगीतकारों से कह कर रफ़ी साहब ने दुर्रानी साहब को गाने दिलवाये। जहाँ तक मेरा ख़याल है रफ़ी और दुर्रानी ने साथ में पहला डुएट 1946 की फ़िल्म 'सस्सी पुन्नु' में गाया था, गोविन्दराम के संगीत निर्देशन में। 'हम सब चोर हैं' के अलावा ओ. पी. नय्यर ने रफ़ी और दुर्रानी को साथ में फ़िल्म 'मुसाफ़िरख़ाना' में भी गवाया था जिसके बोल थे "कुछ आँख मिली कुछ पैसा मिला..."। इसके करीब 10 साल बाद भी नय्यर साहब ने दुर्रानी को 1966 में फ़िल्म 'अक्लमन्द' के एक गीत में गाने का मौका दिया जिसमें महेन्द्र कपूर और भूपेन्द्र की आवाज़ें भी थीं और गीत के बोल थे "ओ बेख़बर तुझको क्या पता..."। संगीतकार नाशाद ने रफ़ी और दुर्रानी से एक डुएट गवाया था, 1959 की फ़िल्म 'ज़रा बच के' में जिसके बोल थे "ऐ इश्क़ इसे बरबाद ना कर..."। रफ़ी और दुर्रानी ने साथ में मिल कर कुछ 6 डुएट गाने और कुछ कोरस भी गाये। इस तरह आगे चलकर भी नेकदिली का रफ़ी साहब को जब भी मौका मिला तो उन्होंने इस मौके को नहीं गँवाया, और सारी ज़िन्दगी उन्हें जहाँ पर भी लगा, वो हमेशा दूसरों के काम आये। गुरु-शिष्य के सम्बन्ध का इससे बेहतर उदाहरण और क्या हो सकता है कि शुरु में गुरु ने शिष्य को स्थापित करने का हर सम्भव प्रयास किया, और जब शिष्य स्थापित हो गया और गुरु के बुरे दिन आये तो उसी शिष्य ने अपने गुरु की हर सम्भव सेवा की। गुरु जी. एम. दुर्रानी और शिष्य मोहम्मद रफ़ी को हमारा नमन। अब आप गुरु-शिष्य के अनूठे सम्बन्ध को रेखांकित करता हुआ यह गीत सुनिए।

फिल्म - हम सब चोर हैं : 'हमको हँसते देख ज़माना जलता है...' : जी. एम. दुर्रानी और मोहम्मद रफी : संगीत - ओ. पी. नैयर : गीत - मजरूह सुल्तानपुरी



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खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

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