रविवार, 1 नवंबर 2020

राग सिन्धु भैरवी : SWARGOSHTHI – 486 : RAG SINDHU BHAIRAVI





स्वरगोष्ठी – 486 में आज 

राज कपूर के विस्मृत संगीतकार - 2 : संगीतकार नीनू मजुमदार 

राज कपूर की स्मृति में नीनू मजूमदार की तीन दशक पहले राग सिन्धु भैरवी में बनाई धुन सुरक्षित थी 






राज कपूर 


उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ 

“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर गत सप्ताह से आरम्भ हमारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता राज कपूर के फिल्मी जीवन के पहले दशक के कुछ विस्मृत संगीतकारों की और उनकी कृतियों पर चर्चा कर रहे हैं। इन फिल्मों में से राज कपूर ने कुछ फिल्मों का निर्माण, कुछ का निर्देशन और कुछ फिल्मों में केवल अभिनय किया था। आरम्भ के पहले दशक अर्थात 1948 में प्रदर्शित फिल्म "आग" से लेकर 1958 में प्रदर्शित फिल्म "फिर सुबह होगी" तक की चर्चा इस श्रृंखला में की जाएगी। आम तौर पर राज कपूर की फिल्मों के अधिकतर संगीतकार शंकर जयकिशन ही रहे हैं। उन्होने राज कपूर की कुल 20 फिल्मों का संगीत निर्देशन किया है। इसके अलावा बाद की कुछ फिल्मों में लक्ष्मीकान्त, प्यारेलाल और रवीन्द्र जैन ने भी संगीत दिया है। राज कपूर के फिल्मों के प्रारम्भिक दशक के कुछ संगीतकार भुला दिये गए है, यद्यपि इन फिल्मों के गीत आज भी लोकप्रिय हैं। राज कपूर का जन्म 14 दिसम्बर, 1924 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में जाने-माने अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के घर हुआ था। श्रृंखला की कड़ियाँ राज कपूर के जन्म पखवारे तक और वर्ष 2020 के अन्तिम रविवार तक जारी रहेगी। उनकी 97वीं जयन्ती अवसर के लिए हमने राज कपूर और उनके कुछ विस्मृत संगीतकारों को स्मरण करने का निश्चय किया है। इस श्रृंखला के माध्यम से हम भारतीय सिनेमा के एक ऐसे स्वप्नदर्शी व्यक्तित्व राज कपूर पर चर्चा करेंगे, जिसने देश की स्वतन्त्रता के पश्चात कई दशकों तक भारतीय जनमानस को प्रभावित किया। सिनेमा के माध्यम से समाज को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले भारतीय सिनेमा के पाँच स्तम्भों; वी. शान्ताराम, विमल राय, महबूब खाँ और गुरुदत्त के साथ राज कपूर का नाम भी एक कल्पनाशील फ़िल्मकार के रूप में इतिहास में दर्ज़ हो चुका है। इस वर्ष 14 दिसम्बर को इस महान फ़िल्मकार की 97वीं जयन्ती है। इस अवसर के लिए श्रृंखला प्रस्तुत करने की जब योजना बन रही थी तब अपने पाठकों और श्रोताओं के अनेकानेक सुझाव मिले कि इस श्रृंखला में राज कपूर की आरम्भिक फिल्मों के गीतों को एक नये कोण से टटोला जाए। आज से आरम्भ हो रही श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" में हमने उनके लोकप्रिय संगीत निर्देशकों के अलावा दस ऐसे संगीतकारों के गीतों को चुना है, जिन्होने राज कपूर के आरम्भिक दशक की फिल्मों में उत्कृष्ट स्तर का संगीत दिया था। ये संगीतकार राज कपूर के व्यक्तित्व से और राज कपूर इनके संगीत से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। इसके साथ ही इस श्रृंखला में प्रस्तुत किये जाने वाले गीतों के रागों का विश्लेषण भी करेंगे। इस कार्य में हमारा सहयोग "फिल्मी गीतों में राग" विषयक शोधकर्ता और "हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया" के लेखक के.एल. पाण्डेय और फिल्म संगीत के इतिहासकार सुजॉय चटर्जी ने किया है। श्रृंखला के आज की दूसरी कड़ी में हम 1948 में राज कपूर द्वारा अभिनीत फिल्म "गोपीनाथ" का राग सिन्धु भैरवी पर आधारित एक गीत; "आई गोरी राधिका..." प्रस्तुत कर रहे हैं। राग सिन्धु भैरवी के शास्त्रीय स्वरूप का दिग्दर्शन कराने के उद्येश्य से हम राग सिन्धु भैरवी में निबद्ध एक बहुचर्चित ठुमरी "का करूँ सजनी आए न बालम..." को सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। 



स्वप्नदर्शी फ़िल्मकार राज कपूर के संगीतकारों पर केन्द्रित श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की दूसरी कड़ी में, उनके द्वारा अभिनीत और 1948 में प्रदर्शित फिल्म "गोपीनाथ" के एक गीत के माध्यम से फिल्म संगीत के प्रति उनकी सोच और चिन्तन को स्पष्ट करने का प्रयास करेंगे। राज कपूर के निकट के लोगों का मानना था कि उनके मन में पहले ध्वनियों का जन्म होता था, फिर दृश्य का विचार विकसित होता था। राज कपूर के मन के तहखाने में एक संरचना वर्षों तक दबी रहती थी। वर्षों बाद किसी अन्य फिल्म के दृश्य विचार के समय उस संरचना का प्रस्फुटन होता था। सही समय और सही प्रसंग में राज कपूर उनका उपयोग कर फिल्म को विशिष्ट बना देते थे। संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने एक अवसर पर कहा था कि यदि वे संगीतकार बनना चाहते तो सर्वश्रेष्ठ संगीतकार सिद्ध होते। 

मीना कपूर
 

नीनू मजुमदार 

राज कपूर को संगीत के प्रति लगाव बचपन से ही था। उनकी माँ रमाशरणी देवी लोकगीतों की विदुषी थीं। उनके पास संस्कार गीतों का भंडार था। राज कपूर पर अपनी माँ के लोकगीतों का विशेष प्रभाव पड़ा। किशोरावस्था में राज कपूर अपने पिता पृथ्वीराज कपूर के साथ नियमित रूप से कोलकाता के न्यू थियेटर के संगीत कक्ष में जाया करते थे, वहाँ आर.सी. बोराल और सहगल जैसे दिग्गज रियाज़ किया करते थे। न्यू थियेटर के संगीत कक्ष में राज कपूर ने तबला बजाना सीखा था। युवावस्था के आरम्भिक दिनों में कुछ समय तक राज कपूर ने विधिवत शास्त्रीय और रवीन्द्र संगीत भी सीखा था। यहीं पर मुकेश भी संगीत सीखने आते थे। इन गुरु भाइयों की आजीवन मित्रता का बीजारोपण भी यहीं पर हुआ था। संगीत के प्रति असीम श्रद्धा होने के कारण रचना से पूर्व उनके मन में ध्वनियों का जन्म हो जाता था। यही कारण है कि उनकी पूरी फिल्म एक "ऑपेरा" की तरह होती थी। फिल्म का पूरा कथानक संगीत की धुरी के चारो ओर घूमता है। राज कपूर व्यक्ति को भूल सकते थे, किन्तु एक सुनी हुई धुन कभी नहीं भूलते थे। 1978 में राज कपूर द्वारा निर्मित और निर्देशित फिल्म "सत्यम शिवम सुन्दरम्" प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म का एक गीत "यशोमति मैया से पूछे नन्दलाला..." बेहद लोकप्रिय पहले भी था और आज भी है। इसके गीतकार नरेन्द्र शर्मा और संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल थे। इस सुमधुर गीत की धुन के लिए लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल को भरपूर श्रेय मिला था। बहुत कम लोगों का ध्यान इस तथ्य की ओर गया होगा कि इस मोहक धुन के कारक स्वयं राज कपूर ही थे। दरअसल राज कपूर ने 1948 में प्रदर्शित फिल्म "गोपीनाथ" में अभिनय किया था। इस फिल्म को राज कपूर और नायिका तृप्ति मित्रा के उत्कृष्ट अभिनय और संगीतकार नीनू मजुमदार के मधुर संगीत के लिए सदा याद रखा जाएगा। नीनू मजूमदार का वास्तविक नाम निरंजन मजूमदार था। वे उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ की गायकी से प्रभावित थे। लखनऊ में रह कर उन्होने सुप्रसिद्ध गायिका बेगम अख्तर से पूरब अंग की गायकी भी सीखी थी। फिल्म "गोपीनाथ" के गीतों को स्वयं नीनू मजुमदार, मीना कपूर और शमशाद बेगम ने स्वर दिया था। फिल्म के एक युगल गीत; "बाली उमर पिया मोर..." में शमशाद बेगम के साथ राज कपूर का स्वर भी है। फिल्म "गोपीनाथ" का जो गीत हम आज आपको सुनवाने जा रहे हैं, उसके बोल हैं; "आई गोरी राधिका, ब्रज में बलखाती..."। इस गीत को नीनू मजुमदार और मीना कपूर ने स्वर दिया है। राग सिन्धु भैरवी पर आधारित सूरदास का यह पद राज कपूर पर फिल्माया नहीं गया था, इसके बावजूद इसकी प्यारी धुन उनके मन के अन्तस्थल में तीन दशकों तक सुरक्षित दबी पड़ी रही। 1978 में जब राज कपूर के निर्देशन में फिल्म "सत्यं शिवम सुन्दरम्" का निर्माण हो रहा था, तीन दशक पुरानी यह धुन उनकी स्मृतियों के तहखाने से निकल कर बाहर आई। कवि नरेन्द्र शर्मा ने इस धुन को शब्दों से, लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने संगीत वाद्यों और लता मंगेशकर व मन्ना डे ने स्वरों से अलंकृत किया। अब आप सुनिये राज कपूर द्वारा अभिनीत, फिल्म "गोपीनाथ" का गीत; "आई गोरी राधिका, ब्रज में बलखाती..." और तुलना कीजिए राज कपूर द्वारा निर्मित और निर्देशित फिल्म "सत्यं शिवं सुन्दरम्" के उस लोकप्रिय गीत से। 

राग सिन्धु भैरवी : "आई गोरी राधिका ब्रज में बलखाती..." नीनू मजूमदार और मीना कपूर : फिल्म - गोपीनाथ 


राग सिन्धु भैरवी की गणना आसावरी थाट के अन्तर्गत की जाती है। इस राग की जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है, अर्थात आरोह और अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किया जाता है। राग में दोनों ऋषभ, कोमल गान्धार और दोनों निषाद लगाए जाते हैं। कोमल ऋषभ स्वर का इस राग में अल्प प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध निषाद की प्रबलता होती है। कोई भी स्वर वर्जित नहीं है। राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। दिन के दूसरे प्रहर में यह राग अधिक आकर्षक लगता है। कुछ गायक पंचम स्वर को षडज मान कर गाते हैं। इस राग में ठुमरी और फिल्म संगीत की रचनाएँ अधिक मिलती है। "स्वरगोष्ठी" के आज के अक में हम आपके लिए लेकर आए हैं राग सिन्धु भैरवी की विख्यात ठुमरी; "का करूँ सजनी आए न बालम..."। इस ठुमरी को सर्वाधिक प्रसिद्धि तब मिली, जब इसे उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वरों का योगदान मिला। उन्होने इस ठुमरी को अपना स्वर देकर कालजयी बना दिया। उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ का जन्म 1902 में पराधीन भारत में पंजाब के कसूर में हुआ था जो अब पाक़िस्तान में है। उनके पिता अली बक्श खाँ तत्कालीन पश्चिम पंजाब प्रान्त के एक संगीत परिवार से सम्बन्धित थे और ख़ुद भी एक जाने-माने गायक थे। बड़े ग़ुलाम अली ने 7 वर्ष की उम्र में ही अपने चाचा काले खाँ से सारंगी वादन और गायन सीखना शुरु किया। काले ख़ाँ साहब के निधन के बाद बड़े ग़ुलाम अली अपने पिता से संगीत सीखते रहे। बड़े ग़ुलाम अली खाँ ने अपनी स्वर-यात्रा का आरम्भ सारंगी वादक के रूप में किया और कलकत्ता में आयोजित उनकी पहली संगीत-सभा में ही उन्हें लोकप्रियता मिली। बाद में उन्होने अपनी गायन प्रतिभा से भी संगीत प्रेमियों को प्रभावित किया। उनके गले की मिठास, गायकी का अन्दाज, हरकतें, आदि ने उन्हें शीर्ष स्थान पर बिठा दिया। आइए, उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वरों में सुनते हैं राग सिधु भैरवी में निबद्ध आज की ठुमरी; "का करूँ सजनी आए न बालम..."। आप यह ठुमरी सुनिए और हमें आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

ठुमरी सिन्धु भैरवी : "का करूँ सजनी आए न बालम..." : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 486वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको लगभग सात दशक पुरानी एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के चौथे सत्र अर्थात अंक संख्या 490 की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के चतुर्थ सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का प्रभाव है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 7 नवम्बर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 488 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 484वें अंक में हमने आपको 1948 में प्रदर्शित फिल्म "आग" से लिये गए एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागियों को सफलता मिली। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मुकेश। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब तक हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। इसका प्रकोप भी अब कम हुआ है। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की दूसरी कड़ी में आज आपने राज कपूर की अभिनीत फिल्म "गोपीनाथ" के एक गीत का रसास्वादन और गीत का परिचय प्राप्त किया। यह गीत राग सिन्धु भैरवी पर आधारित है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वर में एक अत्यन्त लोकप्रिय ठुमरी "का करूँ सजनी आए न बालम..." सुनवाई। 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  
रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग सिन्धु भैरवी : SWARGOSHTHI – 486 : RAG SINDHU BHAIRAVI : 1 नवम्बर, 2020 



रविवार, 25 अक्तूबर 2020

राग भैरवी : SWARGOSHTHI – 485 : RAG BHAIRAVI





स्वरगोष्ठी – 485 में आज 

राज कपूर के विस्मृत संगीतकार - 1 : संगीतकार राम गांगुली


राज कपूर के पहले संगीतकार राम गांगुली ने इस गीत में राग भैरवी का आधार लिया





राज कपूर 

राम गांगुली 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ हो रही हमारी नई श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता राज कपूर के फिल्मी जीवन के पहले दशक के कुछ विस्मृत संगीतकारों की और उनकी कृतियों पर चर्चा कर रहे हैं। इन फिल्मों में से कुछ का उन्होने निर्माण, कुछ का निर्देशन और कुछ फिल्मों में केवल अभिनय किया था। आरम्भ के पहले दशक अर्थात 1948 में प्रदर्शित फिल्म "आग" से लेकर 1958 में प्रदर्शित फिल्म "फिर सुबह होगी" की चर्चा इस श्रृंखला में की जाएगी। आम तौर पर राज कपूर की फिल्मों के अधिकतर संगीतकार शंकर जयकिशन ही रहे हैं। उन्होने राज कपूर की कुल 20 फिल्मों का संगीत निर्देशन किया है। हैं। इसके अलावा बाद की कुछ फिल्मों में लक्ष्मीकान्त - प्यारेलाल और रवीन्द्र जैन ने भी संगीत दिया है। राज कपूर के फिल्मों के प्रारम्भिक दशक के कुछ संगीतकार भुला दिये गए है, यद्यपि इन फिल्मों के गीत आज भी लोकप्रिय हैं। राज कपूर का जन्म 14 दिसम्बर, 1924 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में जाने-माने अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के घर हुआ था। श्रृंखला की कड़ियाँ राज कपूर के जन्म पखवारे तक और वर्ष 2020 के अन्तिम रविवार तक जारी रहेगी। उनकी 97वीं जयन्ती अवसर के लिए हमने राज कपूर और उनके कुछ विस्मृत संगीतकारों को स्मरण करने का निश्चय किया है। इस श्रृंखला के माध्यम से हम भारतीय सिनेमा के एक ऐसे स्वप्नदर्शी व्यक्तित्व राज कपूर पर चर्चा करेंगे, जिसने देश की स्वतन्त्रता के पश्चात कई दशकों तक भारतीय जनमानस को प्रभावित किया। सिनेमा के माध्यम से समाज को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले भारतीय सिनेमा के पाँच स्तम्भों; वी. शान्ताराम, विमल राय, महबूब खाँ और गुरुदत्त के साथ राज कपूर का नाम भी एक कल्पनाशील फ़िल्मकार के रूप में इतिहास में दर्ज़ हो चुका है। इस वर्ष 14 दिसम्बर को इस महान फ़िल्मकार की 97वीं जयन्ती है। इस अवसर के लिए श्रृंखला प्रस्तुत करने की जब योजना बन रही थी तब अपने पाठकों और श्रोताओं के अनेकानेक सुझाव मिले कि इस श्रृंखला में राज कपूर की आरम्भिक फिल्मों के गीतों को एक नये कोण से टटोला जाए। आज से आरम्भ हो रही श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" में हमने दस ऐसे संगीतकारों के गीतों को चुना है, जिन्होने राज कपूर के आरम्भिक दशक की फिल्मों में उत्कृष्ट स्तर का संगीत दिया था। ये संगीतकार राज कपूर के व्यक्तित्व से और राज कपूर इनके संगीत से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। इसके साथ ही इस श्रृंखला में प्रस्तुत किये जाने वाले गीतों के रागों का विश्लेषण भी करेंगे। इस कार्य में हमारा सहयोग "फिल्मी गीतों में राग" विषयक शोधकर्ता और "हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया" के लेखक के.एल. पाण्डेय ने किया है। आज की पहली कड़ी में हम राज कपूर की पहली फिल्म "आग" का राग भैरवी पर आधारित एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। राग भैरवी के शास्त्रीय स्वरूप का दिग्दर्शन कराने के उद्येश्य से हम राग भैरवी पर आधारित दो खयाल रचनाएँ पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। 


राज कपूर के फिल्म निर्माण की लालसा का आरम्भ फिल्म "आग" से हुआ था। फिल्म के संगीतकार राम गांगुली थे। दरअसल यह पहली फिल्म राज कपूर के भावी फिल्मी जीवन का एक घोषणापत्र था। ठीक उसी प्रकार जैसे लोकतन्त्र में चुनाव लड़ने वाला प्रत्याशी अपने दल का घोषणापत्र जनता के सामने प्रस्तुत करता है। फिल्म "आग" में जो मुद्दे लिये गए थे, बाद की फिल्मों में उन्हीं मुद्दों का विस्तार था, और "आग" की चरम परिणति "मेरा नाम जोकर" में हम देखते हैं। "आग" का नायक नाटक और रंगमंच के प्रति दीवाना है। फिल्म में राज कपूर का एक संवाद है; "मैं थियेटर को उस ऊँचाई पर ले जाऊँगा, जहाँ लोग उसे सम्मान की दृष्टि से देखते हैं..."। राज कपूर अपने पिता के "पृथ्वी थियेटर" में एक सामान्य कर्मचारी के रूप में कार्य करते थे। "आग" का कथ्य यहीं से उपजा था। केवल कथ्य ही नहीं, पहली फिल्म के संगीतकार भी राज कपूर को "पृथ्वी थियेटर" से ही मिले थे, संगीतकार राम गांगुली। राम गांगुली ही पृथ्वीराज कपूर की नाट्य संस्था के नाटकों के संगीतकार हुआ करते थे। 


मुकेश 
5 अगस्त, 1928 को जन्में राम गांगुली को सितार वादन की शिक्षा उस्ताद अलाउद्दीन से प्राप्त हुई थी। मात्र 17 वर्ष की आयु से ही उन्होने मंच प्रदर्शन करना आरम्भ कर दिया था। संगीतकार आर.सी. बोराल ने उन्हें न्यू थियेटर में वादक के रूप स्थान दिया। बाद में पृथ्वीराज कपूर ने अपने नाटकों में संगीत निर्देशन के लिए पृथ्वी थियेटर में बुला लिया। "पृथ्वी थियेटर" के ही अत्यन्त लोकप्रिय नाटक "पठान" में अभिनय करते हुए राज कपूर ने राम गांगुली का संगीतबद्ध किया गीत; "हम बाबू नये निराले हैं..." गाया था। अपने इन्हीं प्रगाढ़ सम्बन्धों के कारण राज कपूर ने अपनी पहली निर्मित, अभिनीत और निर्देशित फिल्म "आग" के संगीतकार के रूप में राम गांगुली को चुना। फिल्म "आग" के गीत; "काहे कोयल शोर मचाए...", "कहीं का दीपक कहीं की बाती...", "रात को जो चमके तारें..." आदि अपने समय में लोकप्रिय हुए थे, किन्तु जो लोकप्रियता "ज़िंदा हूँ इस तरह कि गम-ए-ज़िंदगी नहीं..." गीत को मिली वह आज तक कायम है। आज भी यह गीत सुनने वालों को रोमांचित कर देता है। इस गीत में वी. शान्ताराम की फिल्म "सेहरा" के संगीतकार और चर्चित शहनाई और बाँसुरी वादक रामलाल ने गीत में अत्यंत संवेदनशील बाँसुरी वादन किया था। साथ ही राज कपूर की सर्वाधिक 20 फिल्मों में संगीत निर्देशन करने वाले शंकर और जयकिशन, फिल्म "आग" में क्रमशः तबला और हारमोनियम वादक थे। फिल्म "आग" के गीतकार बहजाद लखनवी थे और गायक थे, राज कपूर के सबसे प्रिय गायक मुकेश। अब आप स्वप्नदर्शी फ़िल्मकार राज कपूर की पहली निर्देशित और अभिनीत फिल्म "आग" से राग भैरवी के सुरों को स्पर्श करता यह गीत सुनिए। 

राग भैरवी : "ज़िंदा हूँ इस तरह कि..." : मुकेश : फिल्म - आग : संगीत - राम गांगुली 



पण्डित भीमसेन जोशी 
आज का राग भैरवी है। यह भारतीय संगीत का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण राग है। इस राग में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल और मध्यम स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। शेष स्वर शुद्ध होते हैं। राग कि जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है। कुछ विद्वान इस राग में सभी बारह स्वरों का प्रयोग भी करते हैं। भैरवी थाट का आश्रय अथवा जनक राग भैरवी नाम से ही इस राग को पहचाना जाता है। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यूँ तो इसके गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला में है, इसके साथ ही परम्परागत रूप से राग ‘भैरवी’ का गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। इस राग में कुछ संगीतज्ञ पंचम स्वर को वादी और षडज स्वर को संवादी मान कर प्रयोग करते हैं, किन्तु अधिकतर संगीतज्ञ मध्यम स्वर को वादी और षडज स्वर को संवादी मानते हैं। राग ‘भैरवी’ को ‘सदा सुहागिन राग’ भी कहा जाता है। इस राग में ठुमरी, दादरा, सुगम संगीत और फिल्म संगीत में राग भैरवी का सर्वाधिक प्रयोग मिलता है। राग भैरवी में खयाल रचनाएँ कम ही गायी-बजायी जाती है। परन्तु आज आपको सुनवाने के लिए हमने राग भैरवी में निबद्ध दो रागदारी रचनाओं का चुनाव किया है। इन रचनाओं के स्वर पण्डित भीमसेन जोशी के हैं। आप यह रागदारी संगीत की रचना सुनिए और हमें आज की इस कड़ी से यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए। 

राग भैरवी : विलम्बित "फुलवन गेंद से..." और द्रुत खयाल "हमसे पिया..." : पण्डित भीमसेन जोशी 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 485वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको सात दशक पुरानी एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के चौथे सत्र अर्थात अंक संख्या 490 की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के चतुर्थ सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किस विस्मृत गायक के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 31 अक्तूबर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 487 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 483वें अंक में हमने आपको 1932 में कुन्दनलाल सहगल के स्वर में रिकार्ड किये गए एक गैरफ़िल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागी सफल नहीं रहे। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - आसावरी और गान्धारी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – कुन्दनलाल सहगल। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, और शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब तक हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। इसका प्रकोप भी अब कम हुआ है। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की पहली कड़ी में आज आपने राज कपूर की अभिनीत और निर्देशित फिल्म "आग" के एक गीत का रसास्वादन और गीत का परिचय प्राप्त किया। यह गीत राग भैरवी पर आधारित है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में दो खयाल रचनाएँ सुनवाई। "स्वरगोष्ठी" के 483वें अंक पर प्रतिक्रिया व्यक्त करती हुई हमारी बहुत पुरानी पाठक और श्रोता, पेंसिलवेनिया, अमेरिका निवासी श्रीमती विजया राजकोटिया लिखती हैं; So good to hear Nom-Tom alaap of Dhrupad style from Ustad Faiyaz Khan ji. Also the movie song is great sung by Amir Khan and D.V.Paluskar. These are unique pieces and will remain living in the hearts of all music lovers. 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया
राग भैरवी : SWARGOSHTHI – 485 : RAG BHAIRAVI : 25 अक्तूबर, 2020 



रविवार, 18 अक्तूबर 2020

राग गान्धारी : SWARGOSHTHI – 484 : RAG GANDHARI




स्वरगोष्ठी – 484 में आज 

आसावरी थाट के राग – 6 : राग - गान्धारी 

प्रोफेसर बी.आर. देवधर से गान्धारी में रागदारी संगीत की रचना और के.एल. सहगल से गैरफिल्मी गीत सुनिए 





प्रोफेसर बी.आर. देवधर 


कुन्दनलाल सहगल 

“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “आसावरी थाट के राग” की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच स्वरों का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से आठवाँ थाट आसावरी है। इस श्रृंखला में हम आसावरी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम आसावरी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की छठी कड़ी में आज हमने आसावरी थाट के जन्य राग गान्धारी का चयन किया है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम आपके लिए षाड़व-सम्पूर्ण जाति के राग गान्धारी का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात संगीतज्ञ और शिक्षक प्रोफेसर बी.आर. देवधर के स्वरों में राग गान्धारी में निबद्ध एक रागदारी रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। इस राग के स्वरों का प्रयोग करने वाला कोई भी फिल्मी गीत नहीं मिला। अतः गायक और अभनेता कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ में एक गैरफ़िल्मी गीत सुनवा रहे हैं। इस गीत की रिकार्डिंग का उपयोग 1955 में प्रदर्शित फिल्म "अमर सहगल" में किया गया है। गीत के आरम्भ में राग आसावरी और बाद में राग गान्धारी परिलक्षित होता है। गीत सम्भवतः हज़रत अमीर खुसरो का लिखा हुआ है और स्वयं कुन्दनलाल सहगल द्वारा स्वरबद्ध किया यह गीत कुन्दनलाल सहगल के ही स्वर में प्रस्तुत किया गया है। 



राग गान्धारी की गणना आसावरी थाट के अन्तर्गत की जाती है। इस राग में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल और दोनों ऋषभ स्वरों का प्रयोग किया जाता है। आरोह में गान्धार स्वर वर्जित होता है और अवरोह में सातो स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इसलिए इस राग की जाति षाड़व-सम्पूर्ण होती है। राग गान्धारी का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर कोमल गान्धार माना जाता है। इस राग के गायन अथवा वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय दिन का तीसरा प्रहर होता है। यह एक कम प्रचलित राग है। धैवत स्वर और उत्तरांग प्रधान चलन होने से इस राग की प्रस्तुति में ओज, पुकार और जागृति का भाव उत्पन्न होता है। आरोह में जौनपुरी की छाया परिलक्षित होती है किन्तु भैरवी और आसावरी की स्वर संगतियों के प्रयोग से वह छाया तिरोहित भी हो जाती है। राग में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाने के कारण यह प्रश्न भी उठ सकता है कि इस राग को भैरवी थाट के अन्तर्गत क्यों न रखा जाय। स्वर की दृष्टि से भैरवी और आसावरी में केवल ऋषभ स्वर का अन्तर है। अतः इसे भैरवी और आसावरी दोनों थाट में रखा जा सकता है। परन्तु राग गान्धारी का चलन आसावरी जैसा होने के कारण इसे आसावरी थाट में रखना अधिक उपयुक्त है। अब हम आपको राग "गान्धारी" की तीनताल में निबद्ध एक दुर्लभ बन्दिश सुनवाते हैं, जिसे गत शताब्दी के सुप्रसिद्ध शास्त्रज्ञ प्रोफेसर बी.आर. देवधर ने प्रस्तुत किया है। 

राग गान्धारी : "जियरा लरजे मोरा..." : प्रोफेसर बी.आर. देवधर 

 

राग गान्धारी उत्तरांग प्रधान राग है। इसका चलन राग जौनपुरी की तरह मध्य सप्तक के उत्तरांग में तथा तार सप्तक में अधिक होता है, किन्तु पूर्वांग में दोनों ऋषभ के प्रयोग से यह राग स्पष्ट हो जाता है और समप्रकृति रागों से अलग हो जाता है। राग गान्धारी पर आधारित किसी फिल्मी गीत को खोजने का हमने काफी प्रयास किया, किन्तु हमें सफलता नहीं मिली। इस खोज को आगे बढ़ाने के लिए हमने अपने मित्र और "फिल्मी गीतों में राग" विषयक शोधकर्ता व "हिन्दी सिने राग इन्साक्लोपीडिया" के लेखक श्री के.एल. पाण्डेय से सम्पर्क किया। श्री पाण्डेय के अनुसार उन्हें राग गान्धारी पर आधारित एक भी फिल्मी गीत नहीं मिला। हाँ, गायक-अभिनेता कुन्दनलाल सहगल कि आवाज़ में एक गैर फिल्मी गीत अवश्य मिला है, जिसमें राग आसावरी और गान्धारी का मेल है। आज हम आपको यही गीत सुनवाते है। फिल्म संगीत के इतिहास के लेखक और शोधकर्ता सुजॉय चटर्जी और सहगल के जीवन पर आधारित 1955 में प्रदर्शित फिल्म "अमर सहगल" के अनुसार यह गीत कुन्दनलाल सहगल ने फिल्मी दुनियाँ में आने से पूर्व गाया था। इस गीत में राग आसावरी के साथ राग गान्धारी का प्रयोग हुआ है। गीतकार के नाम के विषय में श्री चटर्जी ने बताया कि अधिक सम्भावना अमीर खुसरो की है। वर्ष 1932 में यह गीत हिन्दुस्तान ग्रामोफोन कम्पनी ने रिकार्ड किया था। फिल्म "अमर सहगल" में इसी रिकार्ड का प्रयोग किया गया है। गीत के संगीतकार पर भी पर्याप्त मतभेद है। रिकार्ड पर संगीतकार के रूप में सहगल का नाम ही अंकित है, किन्तु कहीं-कहीं आर.सी. बोराल का नाम और कुछ इतिहासकारों के अनुसार अपरेश लाहिड़ी के नाम का अनुमान लगाया गया है। यदि किसी पाठक को इस गीत के विषय में कोई प्रामाणिक जानकारी हो तो कृपया हमें अवश्य सूचित करें। आप यह गैरफिल्मी गीत सुनिए और हमें आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग गान्धारी और आसावरी : "झुलना झुलाओ री..." : स्वर - कुन्दनलाल सहगल : गैरफिल्मी गीत 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 483वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित, गैरफिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के चौथे सत्र अर्थात अंक संख्या 490 की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के चतुर्थ सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 24 अक्तूबर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 486 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 482वें अंक में हमने आपको 1952 में प्रदर्शित फिल्म "बैजू बावरा" के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागी सफल रहे। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - देसी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर और उस्ताद अमीर खाँ। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, और शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब तक हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “आसावरी थाट के राग” की छठी कड़ी में आज आपने आसावरी थाट के जन्य राग गान्धारी का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने आपको सुप्रसिद्ध संगीतविद प्रोफेसर बी.आर. देवधर के स्वरों में राग की एक बन्दिश सुनवाया। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार हमने फिल्मी गीतों में राग गान्धारी के प्रयोग को खोजने का पर्याप्त प्रयास किया, परन्तु हमें ऐसा कोई भी गीत नहीं मिला। अन्ततः आज की कड़ी में हम आपको 1932 में रिकार्ड किया और कुन्दनलाल सहगल के स्वर में प्रस्तुत एक गैरफिल्मी गीत प्रस्तुत किया है। इस गीत में राग आसावरी के साथ राग गान्धारी का प्रयोग हुआ है। 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग गान्धारी : SWARGOSHTHI – 484 : RAG GANDHARI : 18 अक्तूबर, 2020
 


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