Saturday, November 5, 2016

"मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ...”, इस गीत का मुखड़ा हसरत जयपुरी ने नहीं बल्कि जयकिशन ने लिखा था।


एक गीत सौ कहानियाँ - 98
 

'मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'| इसकी 98-वीं कड़ी में आज जानिए 1969 की फ़िल्म ’प्यार ही प्यार’ के मशहूर गीत "मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ तेरे प्यार में ऐ कविता...” के बारे में जिसे मोहम्मद रफ़ी ने गाया था। बोल हसरत जयपुरी के और संगीत शंकर-जयकिशन का।  

1968 में शंकर जयकिशन को भारत सरकार द्वारा प्रदत्त पद्मश्री पुरस्कार से समानित किए
From right to left - Rajaram, a guest, Satish Wagle, O P Ralhan, Dharmendra, Jaikshan, Bhappi Soni (in goggles) 
जाने की घोषणा हुई। इस वर्ष फ़िल्म और संगीत के क्षेत्र में जिन कलाकारों को यह सम्मान दिया गया था उनमें शामिल थे बेगम अख़तर, सुनिल दत्त, दुर्गा खोटे, एन. टी. रामाराव, और वैजयन्तीमाला। उन्हीं दिनों फ़िल्म ’प्यार ही प्यार’ की प्लानिंग चल रही थी। फ़िल्म के निर्माता थे सतीश वागले और राजाराम। निर्देशक थे भप्पी सोनी और संगीत निर्देशक थे शंकर-जयकिशन। पद्मश्री पुरस्कार ग्रहण करने शंकर-जयकिशन और इसी फ़िल्म की नायिका वैजयन्तीमाला दिल्ली पहुँच गए। तो साथ में सतीश वागले भी दिल्ली चले आए। वागले साहब शंकर-जयकिशन के साथ ही ओबरोय होटल में रुके थे। फ़िल्म ’प्यार ही प्यार’ की कहानी जयकिशन सुन चुके थे और उन्हें पता थी कि फ़िल्म में नायक की भूमिका में धर्मेन्द्र का नाम विजय और नायिका वैजयन्तीमाला का नाम कविता है। “कविता” नाम जयकिशन के मन-मस्तिष्क पर जैसे छा गया था और अंजाने में ही इस नाम का जाप उनके मन में चल रहा था। और इसका नतीजा यह हुआ कि कुछ ही समय के अन्दर “कविता” पर एक पंक्ति उनके दिमाग़ में आ गया। सुबह नाशते के समय जयकिशन गुनगुना रहे थे, केवन धुन ही नहीं बल्कि शब्दों के साथ कुछ गुनगुना रहे थे। वो गुनगुना रहे थे “मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ तेरे प्यार में ऐ कविता”। सतीश वागले को धुन भी पसन्द आई और बोल भी बहुत भा गए। वो जयकिशन से बोले कि यह तो कमाल का गाना है यार! जयकिशन ने कहा कि धुन भी मेरी है और बोल भी मेरे ही हैं। अगर आपको पसन्द है तो यह तोहफ़ा है आपके लिए मेरी तरफ़ से, यह आपकी फ़िल्म का एक गाना होगा। और वापस पहुँचते ही हम इसे रेकॉर्ड करेंगे। बम्बई पहुँच कर हसरत जयपुरी साहब से अन्तरे लिखवा कर गाना पूरा करवाया गया। हसरत जयपुरी ने मुखड़े को ज़रा सा भी नहीं छेड़ा और ना ही कोई दूसरी लाइन जोड़ी। जैसा जयकिशन ने लिखा था “मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ तेरे प्यार में ऐ कविता”, वैसा ही ज्यों का त्यों रखा गया मुखड़ा। यही नहीं अन्तरे से मुखड़े पर आने वाला कनेक्टिंग्‍लाइन भी नहीं रखा गया। सीधे सीधे तीन अन्तरे लिख डाले –

“तुझे दिल के आइने में मैंने बार बार देखा,
तेरी अखड़ियों में देखा तो झलकता प्यार देखा,
तेरा तीर मैंने देखा तो जिगर के पार देखा”;

“तेरा रंग है सलौना तेरे अंग में लचक है,
तेरी बात में है जादू तेरे बोल में खनक है,
तेरी हर अदा मोहब्बत तू ज़मीन की धनक है”;

“मेरा दिल लुभा रहा है तेरा रूप सादा सादा,
ये झुकी झुकी निगाहें करे प्यार दिल में ज़्यादा,
मैं तुझ ही पे जान दूँगा है यही मेरा इरादा।“

Jaikishan & Rafi
रफी साहब की आवाज़ में गाना रेकार्ड हो गया। पर एक समस्या आ गई। 'प्यार ही प्यार' फिल्म के निर्माता, यानी सतीश वागले साहब के पार्टनर राजाराम जी को गाना ज़रा सा भी पसन्द नहीं आया। और तो और फ़िल्म के वितरक ताराचन्द बरजात्या ने भी गाने को सीधा रीजेक्ट कर दिया और इस मुद्दे पर कोई भी बहस करने से मना कर दिया। सतीश वागले को बहुत बुरा लगा। उड़ते-उड़ते ख़बर जयकिशन के कानों तक भी पहुँच ही गई कि गाना कई लोगों को बेकार लगा है। जयकिशन जी को जब यह बात पता चली तो उन्होंने कहा कि ताराचन्द बरजात्या ने ’दाग़’ फ़िल्म के गाने को भी रीजेक्ट कर दिया था, पर वही गाना जो उन्होंने रीजेक्ट किया था आज भी लोगों को याद है, और वह गाना था “ऐ मेरे दिल कहीं और चल, ग़म की दुनिया से जी भर गया”। जयकिशन ने यह भी कहा कि बरजात्या को संगीत की कोई समझ नहीं है, इसलिए मेरी बात मानो, गाना अच्छा है और ख़ूब चलेगा। लिहाज़ा जयकिशन की बात मान ली गई और जो बात मान ली गई थी वह सच भी हो गई। आज भी यह गाना फ़िल्म के बाक़ी गीतों से ज़्यादा याद किया जाता है। 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 









Thursday, November 3, 2016

इसी को प्यार कहते हैं.. प्यार की परिभाषा बता रहे हैं हसरत जयपुरी और हुसैन बंधु



महफ़िल ए कहकशाँ 15




दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज पेश है गीतकार व शायर हसरत जयपुरी की लिखी नज़्म हुसैन बंधुओं की आवाज़ में| 



मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे 

स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी











Wednesday, November 2, 2016

"एक बालसुलभ प्रसन्नता के साथ लता जी अपने समकालीन कलाकारों की बात करती है" - यतीन्द्र मिश्र :एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है (35)


लेखक और संगीत अध्येता यतीन्द्र मिश्र की लिखी पुस्तक "लता सुर गाथा" को अभी हाल ही में वाणी प्रकाशन ने जारी किया है, लगभग ६५० पृष्ठों की इस ग्रंथमयी पुस्तक में ३०० से अधिक पृष्ठों में लता जी और यतीन्द्र के बीच लगभग ६ वर्षों के अंतराल में हुई बातचीत का लेखा जोखा है, जिसमें लता जी ने अपने संगीत सफ़र से जुड़े ढेरों संस्मरण पाठकों के साथ बांटे हैं. संगीत प्रेमियों के लिए एक बेहद ज़रूरी दस्तावेज़ है ये पुस्तक, जो आज सभी प्रमूख बुक स्टाल पर उपलब्ध है, यदि आप ऑनलाइन खरीदना चाहें तो अमेजोन डॉट कॉम से खरीद सकते हैं, फिलहाल 'एक मुलाकात ज़रूरी है' के इस एपिसोड में सुनिए उस पुस्तक के रचे जाने की दिलचस्प कहानी, खुद यतीन्द्र की जुबानी....



एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें 

Tuesday, November 1, 2016

माधव नागदा की लघुकथा माँ

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। इस शृंखला में पिछली बार आपने पूजा अनिल के स्वर में  दीपक मशाल की कथा "निमंत्रण" का पाठ सुना था।

इस बार हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं माधव नागदा की लघुकथा माँ, जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

प्रस्तुत लघुकथा "माँ" का कुल प्रसारण समय 3 मिनट 29 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। इस लघुकथा का गद्य सेतु पत्रिका के अक्टूबर अंक में पढा जा सकता है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

“बिग बॉस हम सबके भीतर रहता है रोड़ीलाल।”
 ~ माधव नागदा

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

“गले लगी है, बहुत दिनों बाद, रमेश को लगता है कि उसकी बाँहों में कैक्टस उग आये हैं।”
 (माधव नागदा की लघुकथा "माँ" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
माँ MP3

#Nineteenth Story, Maan; Madhav Nagda; Hindi Audio Book/2016/19. Voice: Anurag Sharma

Sunday, October 30, 2016

राग भैरवी : SWARGOSHTHI – 290 : RAG BHAIRAVI


स्वरगोष्ठी – 290 में आज
नौशाद के गीतों में राग-दर्शन – 3 : जोहराबाई के स्वर में दीवाली गीत


“आई दीवाली आई दीवाली, दीपक संग नाचे पतंगा...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान नौशाद अली के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला का समापन हम आगामी 25 दिसम्बर को नौशाद अली के 98वीं जयन्ती के अवसर पर करेंगे। 25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता वाहिद अली घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करता था। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठते, साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। फिल्म प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ करता था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए माया नगरी बम्बई की ओर रुख किया।



खनऊ से बम्बई (अब मुम्बई) आने के बाद नौशाद ने पियानो वादक और संगीतकारों के सहायक के रूप में काम किया। 1939 में स्वतंत्र रूप से पहला गीत फिल्म ‘कंगन’ के लिए स्वरबद्ध किया। इसके बाद स्वतंत्र संगीतकार के तौर पर 1940 में प्रेमनगर, 1941 में माला, दर्शन और स्टेशन मास्टर, 1942 में नई दुनिया और शारदा, 1943 में कानून, संजोग, नाटक और नमस्ते के संगीत ने लोगों को लुभाया। 1944 का साल संगीतकार नौशाद के लिए बेहद सफल था। इस वर्ष ‘जेमिनी पिक्चर्स’ के बैनर तले गीतकार मधोक ने बनाई फिल्म ‘रतन’, जिसके प्रदर्शित होते ही चारों तरफ़ इसके गीतों की धूम मच गई और नौशाद प्रथम श्रेणी के संगीतकारों में शामिल हो गए। नौशाद ने इस फ़िल्म में ज़ोहराबाई अम्बालेवाली से गीत गवाकर चारों तरफ़ तहलका मचा दिया। एम. सादिक़ निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे करण दीवान और स्वर्णलता। फ़िल्म में अन्य चर्चित गीतों के साथ ज़ोहराबाई का गाया “आई दीवाली, आई दीवाली, दीपक संग नाचे पतंगा...” जैसे गीतों में भी राग की सुगन्ध थी।

फिल्म ‘रतन’ में कुल दस गीत थे, जिन्हें मधोक ने लिखे, और मधोक ने ही फ़िल्म के संवाद भी लिखे। रागों का आधार, उत्तर प्रदेश की लोकधुनें, मधुर ऑरकेस्ट्रेशन, और ग़ुलाम मोहम्मद की थिरकन भरे तबले और ढोलक के ठेके, कुल मिलाकर फिल्म संगीत की एक ऐसी शैली का जन्म हुआ जिसे लोगों ने हाथों-हाथ ग्रहण किया। कहा जाता है कि ‘रतन’ का निर्माण 80,000 रुपये में हुआ था, जबकि निर्माता को केवल ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड की रॉयल्टी से ही 3,50,000 रुपये की आमदनी हुई थी। नौशाद अपने परिवार के ख़िलाफ़ जाकर फिल्म संगीत में अपनी क़िस्मत आज़माने बम्बई गए थे। उनके संगीतकार बन जाने के बाद और सफलता हासिल कर लेने के बाद भी उनके परिवार में इस कामयाबी को अच्छी निगाहों से नहीं देखा गया। उन्हीं के शब्दों में एक मज़ेदार क़िस्से का आनन्द लीजिए यहाँ पर – “माँ का पैग़ाम आया कि शादी के लिए लड़की तय हो गई है, मैं घर आ जाऊँ। उस वक़्त मैं नौशाद बन चुका था। माँ ने कहा कि लड़की वाले सूफ़ी लोग हैं, इसलिए उनसे उन्होंने (नौशाद के पिता ने) यह नहीं कहा कि तुम संगीत का काम करते हो, बल्कि तुम दर्ज़ी का काम करते हो। मैंने मन ही मन सोचा कि संगीतकार से दर्ज़ी की इज़्ज़त ज़्यादा हो गई है। तो शादी में शामियाना लगाया गया, और बैण्ड वाले मेरे ही फिल्म के गाने बजाए जा रहे हैं और मैं दर्ज़ी बना बैठा हूँ।" लीजिए, फिल्म ‘रतन’ से जोहराबाई अम्बालेवाली की आवाज़ में राग भैरवी पर आधारित नौशाद का स्वरबद्ध वह गीत आप भी सुनिए।

राग भैरवी : “आई दीवाली, आई दीवाली,...” : जोहराबाई अम्बालेवाली : फिल्म – रतन




राग भैरवी के स्वर-समूह अनेक रसों का सृजन करने में समर्थ होते हैं। इनमें भक्ति और करुण रस प्रमुख हैं। स्वरों के माध्यम से प्रत्येक रस का सृजन करने में राग भैरवी सर्वाधिक उपयुक्त राग है। संगीतज्ञ इसे ‘सदा सुहागिन राग’ तथा ‘सदाबहार’ राग के विशेषण से अलंकृत करते हैं। सम्पूर्ण जाति का यह राग भैरवी थाट का आश्रय राग माना जाता है। राग भैरवी में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद सभी कोमल स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर शुद्ध मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, म ग (कोमल), रे॒ (कोमल), सा होते हैं। यूँ तो इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला है, किन्तु आमतौर पर इसका गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। ‘भारतीय संगीत के विविध रागों का मानव जीवन पर प्रभाव’ विषय पर अध्ययन और शोध कर रहे लखनऊ के जाने-माने मयूर वीणा और इसराज वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र से जब मैंने राग भैरवी पर चर्चा की तो उन्होने स्पष्ट बताया कि भारतीय रागदारी संगीत से राग भैरवी को अलग करने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। यदि ऐसा किया गया तो मानव जाति प्रातःकालीन ऊर्जा की प्राप्ति से वंचित हो जाएगी। राग भैरवी मानसिक शान्ति प्रदान करता है। इसकी अनुपस्थिति से मनुष्य डिप्रेशन, उलझन, तनाव जैसी असामान्य मनःस्थितियों का शिकार हो सकता है। प्रातःकाल सूर्योदय का परिवेश परमशान्ति का सूचक होता है। ऐसी स्थिति में भैरवी के कोमल स्वर- ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद, मस्तिष्क की संवेदना तंत्र को सहज ढंग से ग्राह्य होते है। कोमल स्वर मस्तिष्क में सकारात्मक हारमोन रसों का स्राव करते हैं। इससे मानव मानसिक और शारीरिक विसंगतियों से मुक्त रहता है। भैरवी के विभिन्न स्वरों के प्रभाव के विषय में श्री मिश्र ने बताया कि कोमल ऋषभ स्वर करुणा, दया और संवेदनशीलता का भाव सृजित करने में समर्थ है। कोमल गान्धार स्वर आशा का भाव, कोमल धैवत जागृति भाव और कोमल निषाद स्फूर्ति का सृजन करने में सक्षम होता है। भैरवी का शुद्ध मध्यम इन सभी भावों को गाम्भीर्य प्रदान करता है। धैवत की जागृति को पंचम स्वर सबल बनाता है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। भैरवी के स्वरों की सार्थक अनुभूति कराने के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, विदुषी डॉ. प्रभा अत्रे के स्वर में राग भैरवी में निबद्ध एक नवदुर्गा की स्तुति। इस गीत में देवी के विविध स्वरूपों का वर्णन भी है। आप दीपावली के पावन पर्व पर इस रचना के माध्यम से राग भैरवी के भक्तिरस का अनुभव कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भैरवी : "जगज्जननी भवतारिणी मोहिनी तू नवदुर्गा..." : डॉ. प्रभा अत्रे





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 290वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको लगभग सात दशक पुरानी हिन्दी फिल्म के लोकप्रिय गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक का उत्तर सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – गीत के इस अंश में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायिका को आवाज़ को पहचान सकते हैं? हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 5 नवम्बर 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 292वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 288 की संगीत पहेली में हमने आपको 1946 में प्रदर्शित फिल्म ‘अनमोल घड़ी’ से एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – पहाड़ी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल - कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका – नूरजहाँ। इस बार की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागियों में से चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया। उपरोक्त सभी चार विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर सैकड़ों पाठकों के अनुरोध पर जारी लघु श्रृंखला “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” के आज के अंक में पुनः आपने राग भैरवी पर आधारित गीत का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला के लिए हमने संगीतकार नौशाद के आरम्भिक दो दशकों की फिल्मों के गीत चुने हैं। श्रृंखला के आलेख को तैयार करने के लिए हमने फिल्म संगीत के जाने-माने इतिहासकार और हमारे सहयोगी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। गीतों के चयन के लिए हमने अपने पाठकों की फरमाइश का ध्यान रखा है। यदि आप भी किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


राग भैरवी : SWARGOSHTHI – 290 : RAG BHAIRAVI : 30 अक्तूबर, 2016

Saturday, October 29, 2016

"चार दिनों की जवानी दीवाने पी ले पी ले...”, आज बेगम अख़्तर की गायकी का एक अलग ही रंग सुनिए



 एक गीत सौ कहानियाँ - 97
 

'चार दिनों की जवानी दीवाने पी ले पी ले...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'| इसकी 97-वीं कड़ी में आज जानिए 1942 की फ़िल्म ’रोटी’ के गीत "चार दिनों की जवानी, दीवाने पी ले पीले...” के बारे में जिसे बेगम अख़्तर ने गाया था। बोल डॉक्टर सफ़दार ’आह’ सीतापुरी की और संगीत अनिल बिस्वास का।  

अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी (बेगम अख़्तर)
बे
गम अख़्तर उपशास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में एक चमकता सितारा हैं। लेकिन उपशास्त्रीय संगीत और गज़लों में

अपनी पहचान से पहले उन्हें उर्दू और हिन्दी थिएटर में बतौर अभिनेत्री एक लगाव सा रहा जो फ़िल्म निर्माण के शुरू होने पर फ़िल्मों की तरफ़ भी बढ़ा। उनका थिएटर और फ़िल्मों में पदार्पण उतना ही अचानक था जितनी उनकी पहली पब्लिक प्रस्तुति बतौर शास्त्रीय गायिका जो 1925 में कलकत्ता में आयोजित बिहार फ़्लड रिलीफ़ कॉनसर्ट में थी। इसमें उन्हें तब अचानक मौक़ा मिल गया जब अन्य सभी बड़े कलाकारों ने ऐन मौक़े पर इनकार कर दिया था। दर्शकों और श्रोताओं को शान्त करने के लिए आयोजकों ने अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी को स्टेज पर भेजा। जब उन्होंने “तूने बुत-ए-हरजाई कुछ ऐसी अदा पायी...” ग़ज़ल पेसशक तो वहाँ मौजूद दर्शकों ने उनसे और ग़ज़लों, दादरा और ठुमरियों की माँग की। दो घंटों तक अख़्तरीबाई प्रोग्राम पेश करती रहीं, और लोगों को समझ आ गया कि एक नए सितारे का अभी अभी जन्म हुआ है। उस ऑडिएन्स में मेगाफ़ोन रेकॉर्डिंग् कंपनी के चीफ़ एग्ज़िक्युटिव और कोरिन्थिअन थिएटर के मालिक भी शामिल थे। अच्छी गायकी के साथ-साथ अख़्तरीबाई देखने में भी सुन्दर थीं। बस, कोरिन्थिअन थिएटर में उन्हें सिंगिंग्‍ स्टार का रोल मिल गया। दर्जनों में नाटकों में उन्होंने वहाँ अभिनय किया और गीत गाए। रोचक तथ्य है कि ’लैला मजनूं’ नाटक में उन्होंने मजनूं का रोल निभाया क्योंकि उस किरदार के लिए 16 गीत थे।

फ़िल्मों का दौर शुरू होते ही अख़्तरीबाई फ़िल्मों में आ गईं। ’ईस्ट इण्डिया फ़िल्म कंपनी’ में बतौर
अनिल बिस्वास
सिंगिंग्‍ स्टार दाख़िल हो गईं। वहाँ उनके अभिनय व गायक से सजी पहली फ़िल्म निकली ’एक दिन का बादशाह’ जो बनी
1933 में। फिर उसके बाद ’नल दमयन्ती’ (1933), ’मुमताज़ बेगम’ (1934), रूप कुमारी’ (1934), ’अमीना’ (1934), ’जवानी का नशा’ (1935), ’नसीब का चक्कर’ (1936) जैसी फ़िल्में आईं। फ़िल्मों में अत्यधिक व्यस्त होने की वजह से संगीत के प्रति एक तरह से वो अन्याय कर रही थीं। इसलिए 1937-38 में उन्होंने फ़िल्मों से सन्यास लेकर लखनऊ चली गईं और गायन में पूरा ध्यान लगा दिया। एक छोटे अरसे के लिए वो रामपुर के नवाब के दरबार में गायिका भी रहीं। उनके फ़िल्मों का सफ़र अभी ख़त्म नहीं हुआ था। 1941 में अख़्तरीबाई पूना गईं एक स्टेज शो के लिए। उस शो में निर्माता-निर्देशक महबूब ख़ान और संगीतकार अनिल बिस्वास भी ऑडिएन्स में बैठे उनका गायन सुन रहे थे। दरसल वो वहाँ अख़्तरीबाई को अपनी अगली फ़िल्म ’रोटी’ में गवाने के लिए राज़ी करवाने के उद्येश्य से ही आए थे। बात कुछ यूं हुई कि जब महबूब साहब ने अनिल दा को आकर कहा कि ’रोटी’ के गीत सरदार अख़्तर गायेंगी, तब अनिल दा ने साफ़-साफ़ कह दिया कि फिर गाने वैसे ही बनेंगे। महबूब साहब चिढ़ कर बोले कि क्या तुझे अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी चाहिए? अनिल दा ने साफ़ जवाब दिया कि मँगवा दे! इस तरह से दोनों पहुँच गए पूना। उन दिनों रामपुर के नवाब उनसे निकाह करना चाहते थे, पर अख़्तरीबाई को शादी के बन्धनों में नहीं बंधना था। इसलिए महबूब के ’रोटी’ के प्रस्ताव को पाकर बम्बई स्थानान्तरित होने का फ़ैसला लिया। 1942 में प्रदर्शित ’रोटी’ अख़्तरीबाई की बतौर अभिनेत्री अन्तिम हिन्दी फ़िल्म साबित हुई।


’रोटी’ में बेगम अख़्तर यानी अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी के गाए छह गीत थे। इस फ़िल्म में अख़्तरीबाई के साथ चन्द्रमोहन, शेख मुख़्तार अशरफ़ ख़ान और सितारा देवी ने मुख्य किरदारों में अभिनय किया। अफ़सोस की बात यह था कि जब यह फ़िल्म रिलीज़ होने ही वाली थी तब मेगाफ़ोन रेकॉर्डिंग् कंपनी ने उनके ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर दिया क्योंकि उनके साथ उनका कॉनट्रैक्ट था। अदालत ने फ़िल्म पर रोक लगा दी, और फ़िल्म तभी जारी हो सकी जब उनके गाए सभी गीतों को फ़िल्म से हटा दिया गया। बाद में मेगाफ़ोन ने ही इन छह गीतों का 78 RPM रेकॉर्ड जारी किया। “चार दिन की जवानी...” गीत एक पार्टी गीत है जिसे अख़्तरीबाई फ़िल्म के किरदार के अनुरूप गाती हैं। इस फ़िल्म में उनके गाए छह गीतों में चार ग़ज़लें हैं जिनमें अनिल बिसवास से ज़्यादा उनकी ख़ुद की पहचान दिखती है। पर बाक़ी के दो गीत फ़िल्मी शैली के गीत हैं, और आज का प्रस्तुत गीत इन्हीं में से एक है। आप भी सुनिए और आनन्द लीजिए अख्तरीबाई फ़ैज़ाबादी उर्फ़ बेगम अख़्तर के गाए इस बिल्कुल ही अलग अन्दाज़ के गीत का। 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 






Thursday, October 27, 2016

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में.. मादर-ए-वतन से दूर होने के ज़फ़र के दर्द को हबीब की आवाज़ ने कुछ यूँ उभारा



कहकशाँ - 22
बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र की लिखी मशहूर ग़ज़ल  
"लगता नहीं जी मेरा उजड़े दयार में..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र की लिखी मशहूर ग़ज़ल "लगता नहीं जी मेरा उजड़े दयार में" हबीब वली मोहम्मद की आवाज़ में।



ये तो सभी जानते हैं कि 1857 के गदर के वक़्त मुग़ल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र ने अपने क़िले बागियों के लिए खोल दिए थे। इस गुस्ताख़ी की उन्हें यह सज़ा मिली कि उनके दो बेटों और एक पोते को मौत के घाट उतार दिया गया। बहादुर शाह ज़फर ने हुमायूं के मकबरे में शरण ली, लेकिन मेजर हडस ने उन्हें उनके बेटे मिर्ज़ा मुग़ल और खिजर सुल्तान व पोते अबू बकर के साथ पकड़ लिया। अंग्रेज़ों ने ज़ुल्म की सभी हदें पार कर दी। जब बहादुर शाह ज़फ़र को भूख लगी तो अंग्रेज़ उनके सामने थाली में परोसकर उनके बेटों के सिर ले आए। ८२ साल के उस बूढ़े पर उस वक़्त क्या गुज़री होगी, इसका अंदाजा लगाना भी नामुमकिन है। क्या ये कम था कि अंग्रेजों ने ज़फ़र को कैद करके दिल्ली से बाहर, दिल्ली ही नहीं उनकी सरज़मीं हिन्दुस्तान के बाहर बर्मा (आज का मयन्मार) भेज दिया, कालापानी के तौर पर। ज़फ़र अपनी मौत के अंतिम दिन तक अपनी सरज़मीं को वापस आने के लिए तड़पते रहे। उन्हें अपनी मौत का कोई गिला न था, उन्हें गिला, उन्हें अफसोस तो इस बात का था कि मरने के बाद जो मिट्टी उनके सीने पर डाली जायगी, वह मिट्टी पराई होगी। वे अपने कू-ए-यार में, अपने मादर-ए-वतन की गोद में दफ़न होना चाहते थे, लेकिन ऐसा न हुआ। बर्मा की गुमनाम गलियों में घुट-घुटकर मरने के बाद उन्हीं अजनबी पौधों और परिंदों के बीच सुपूर्द-ए-ख़ाक होना उनके नसीब में था। ७ नवंबर १८६२ को उनकी मौत के बाद उन्हें वहीं रंगून (आज का यंगोन) में श्वेडागोन पैगोडा के नजदीक दफ़ना दिया गया। वह जगह बहादुर शाह ज़फ़र दरगाह के नाम से आज भी प्रसिद्ध है। शायद ज़फ़र को अपनी मौत का पूर्वाभास हो चुका था, तभी तो इस ग़ज़ल के एक-एक हर्फ़ में उनका दर्द मुखर होकर हमारे सामने आता है:

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में 
किस की बनी है आलम-ए-नापायेदार में 

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसे 
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में

उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाये थे चार दिन 
दो आरज़ू में कट गये दो इन्तज़ार में 

काँटों को मत निकाल चमन से ओ बाग़बाँ
ये भी गुलों के साथ पले हैं बहार में

बुलबुल को बाग़बाँ से ना सय्याद से गिला
क़िस्मत में क़ैद लिखी है फ़स्ल-ए-बहार में 

कितना है बदनसीब "ज़फ़र" दफ़्न के लिये 
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में


यह ग़ज़ल पढ़ते वक़्त जितना असर करती है, उससे हज़ार गुणा असर तब होता है, जब इसे हबीब वली मोहम्मद की आवाज़ में सुना जाए। तो लीजिए पेश है हबीब साहब की यह पेशकश:





हाँ तो बात ज़फ़र की हो रही थी, तो आज भी हमारे हिन्दुस्तान में ऐसे कई सारे मुहिम चल रहे हैं, जिनके माध्यम से ज़फ़र की आखिरी मिट्टी, ज़फ़र के कब्र को हिन्दुस्तान लाए जाने के लिए सरकार पर दबाव डाला जा रहा है। हम भी यही दुआ करते हैं कि सरकार जगे और उसे इस बात का बोध हो कि स्वतंत्रता-सेनानियों के साथ किस तरह का व्यवहार किया जाना चाहिए। आज़ादी की लड़ाई में आगे रहने वाले धुरंधरों और रणबांकुरों को इस तरह से नज़र-अंदाज़ किया जाना सही नहीं।

ज़फ़र उस वक़्त के शायर हैं जब ग़ालिब, ज़ौक़ और मोमिन जैसे शायर अपनी काबिलियत से सबके बीच लोहा मनवा रहे थे। ऐसे में भी ज़फ़र ने अपनी ख़ासी पहचान बनाने में कामयाबी हासिल की। (और क्यों न करते, जब ये तीनों शायर इन्हीं के राज-दरबार में बैठकर अपनी शायरी सुनाया करते थे, जब ज़ौक़ ज़फ़र के उस्ताद थे और ज़ौक़ की असमय मौत के बाद ग़ालिब ज़फ़र के साहबजादे के उस्ताद बने) ज़फ़र किस हद तक शेर कह जाते थे, यह जानने के लिए उनकी इस ग़ज़ल पर नज़र दौड़ाना जरूरी हो जाता है:

या मुझे अफ़सर-ए-शाहा न बनाया होता 
या मेरा ताज गदाया न बनाया होता 

ख़ाकसारी के लिये गरचे बनाया था मुझे 
काश ख़ाक-ए-दर-ए-जानाँ न बनाया होता 

नशा-ए-इश्क़ का गर ज़र्फ़ दिया था मुझ को 
उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता 

अपना दीवाना बनाया मुझे होता तूने 
क्यों ख़िरद्मन्द बनाया न बनाया होता 

शोला-ए-हुस्न चमन् में न दिखाया उस ने 
वरना बुलबुल को भी परवाना बनाया होता 

रोज़-ए-ममूरा-ए-दुनिया में ख़राबी है 'ज़फ़र' 
ऐसी बस्ती से तो वीराना बनाया होता 


’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्व दीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

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