शनिवार, 2 जुलाई 2016

"तू मेरा कौन लागे?" क्या सम्बन्ध है इस गीत का किशोर कुमार से?


एक गीत सौ कहानियाँ - 85
 

'तू मेरा कौन लागे...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 85-वीं कड़ी में आज जानिए 1989 की फ़िल्म ’बटवारा’ के लोकप्रिय गीत "तू मेरा कौन लागे..." के बारे में जिसे अनुराधा पौडवाल, अलका याज्ञनिक और कविता कृष्णमूर्ति ने गाया था। गीत लिखा है हसन कमाल ने और संगीत दिया है लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने।  


 मारी फ़िल्मों में एकल और युगल गीतों की कोई कमी नहीं है। तीन, चार या उससे अधिक गायकों के गाये
गीतों की भी फ़ेहरिस्त काफ़ी लम्बी है। लेकिन अगर ऐसे गानें छाँटने के लिए कहा जाए जिनमें कुल तीन गायिकाओं की आवाज़ें हैं तो शायद गिनती उंगलियों पर ही की जा सकती है। दूसरे शब्दों में ऐसे गीत बहुत कम संख्या में बने हैं। आज हम एक ऐसे ही गीत की चर्चा कर रहे हैं जो बनी थी 1989 की फ़िल्म ’बटवारा’ के लिए। अलका याज्ञनिक, अनुराधा पौडवाल और कविता कृष्णमूर्ति का गाया "तू मेरा कौन लागे" गीत अपने ज़माने में काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। इस गीत की चर्चा शुरू करने से पहले जल्दी जल्दी एक नज़र डाल लेते हैं तीन गायिकाओं के गाए फ़िल्मी गीतों के इतिहास पर। पहला गीत तो वही है जो फ़िल्म संगीत इतिहास का पहला पार्श्वगायन युक्त गीत है। 1935 की फ़िल्म ’धूप छाँव’ के गीत "मैं ख़ुश होना चाहूँ..." में संगीतकार रायचन्द बोराल ने तीन गायिकाओं - पारुल घोष, सुप्रभा सरकार और हरिमति दुआ को एक साथ गवाया था। 40 के दशक में 1945 की फ़िल्म ’ज़ीनत’ में एक ऐसी क़व्वाली बनी जिसमें केवल महिलाओं की आवाज़ें थीं, फ़िल्म संगीत के इतिहास में यह पहली बार था। मीर साहब और हाफ़िज़ ख़ाँ के संगीत में "आहें ना भरी शिकवे ना किए...", इस क़वाली में आवाज़ें थीं नूरजहाँ, ज़ोहराबाई अम्बालेवाली और कल्याणीबाई की। 50 के दशक में नौशाद साहब ने तीन गायिकाओं को गवाया महबूब ख़ान की बड़ी फ़िल्म ’मदर इण्डिया’ में। तीन मंगेशकर बहनों - लता, उषा और मीना ने इस गीत को गाया, बोल थे "दुनिया में हम आये हैं तो जीना ही पड़ेगा..."। 60 के दशक में पहली बार संगीतकार रवि ने लता, आशा और उषा को एक साथ गवाकर इतिहास रचा, फ़िल्म थी ’गृहस्थी’ और गाना था "खिले हैं सखी आज..."। इसके पाँच साल बाद 1968 में कल्याणजी-आनन्दजी ने फिर एक बार इन तीन बहनों को गवाया ’तीन बहूरानियाँ’ फ़िल्म के गीत "हमरे आंगन बगिया..." में। इसी साल कल्याणजी-आनन्दजी भाइयों ने मुबारक़ बेगम, सुमन कल्याणपुर और कृष्णा बोस की आवाज़ों में ’जुआरी’ फ़िल्म में एक गीत गवाया "नींद उड़ जाए तेरी चैन से सोने वाले" जो काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। 70 के दशक में शंकर-जयकिशन ने एक कमचर्चित फ़िल्म ’दिल दौलत दुनिया’ के लिए एक दीपावली गीत रेकॉर्ड किया आशा भोसले, उषा मंगेशकर और रेखा जयकर की आवाज़ों में, "दीप जले देखो..."। और 80 के दशक में लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने 1982 की फ़िल्म ’जीवन धारा’ में पहली बार अनुराधा-अलका-कविता की तिकड़ी को पहली बार साथ में माइक के सामने ला खड़ा किया, गीत था "जल्दी से आ मेरे परदेसी बाबुल..."। और जब 1989 में ’बटवारा’ में एक ऐसे तीन गायिकाओं वाले गीत की ज़रूरत आन पड़ी तब लक्ष्मी-प्यारे ने फिर एक बार इसी तिकड़ी को गवाने का निर्णय लिया। 90 के दशक में इस तिकड़ी को राम लक्ष्मण ने ’हम साथ साथ हैं’ फ़िल्म के कई गीतों में गवाया जैसे कि "मय्या यशोदा...", "मारे हिवड़ा में नाचे मोर...", "हम साथ साथ हैं..."। इसी दशक में यश चोपड़ा की फ़िल्म ’डर’ में शिव-हरि ने लता मंगेशकर के साथ कविता कृष्णमूर्ति और पामेला चोपड़ा को गवाकर एक अद्‍भुत गीत की रचना की, बोल थे "मेरी माँ ने लगा दिये सोलह बटन मेरी चोली में..."। 2000 के दशक में भी तीन गायिकाओं के गाए गीतों की परम्परा जारी रही, अनु मलिक ने ’यादें’ फ़िल्म में अलका याज्ञनिक, कविता कृष्णमूर्ति और हेमा सरदेसाई से गवाया "एली रे एली कैसी है पहेली..."।

"तू मेरा कौन लागे" गीत में डिम्पल कपाडिया के लिए अलका याज्ञनिक, अम्रीता सिंह के लिए कविता
किशोर के साथ अनुराधा की दुर्लभ तसवीर, साथ में अमित कुमार और आशा
कृष्णमूर्ति और पूनम ढिल्लों के लिए अनुराधा पौडवाल की आवाज़ निर्धारित हुई। गाना रेकॉर्ड होकर सेट पर पहुँच गया शूटिंग् के लिए। पर फ़िल्मांकन में हो गई गड़बड़। अभिनेत्री-गायिका की जोड़ियों में गड़बड़ हो गई। शुरुआती मुखड़े में अम्रीता सिंह ने अनुराधा पौडवाल के गाए हिस्से में होंठ मिला दी जबकि अनुराधा को पूनम के लिए गाना था। गीत का अन्त तो और गड़बड़ी वाला है। डिम्पल गीत को ख़त्म करती हैं "तू मारो कोण लागे" पंक्ति को चार बार गाते हुए। पर पहली दो लाइनें अलका की आवाज़ में है और अगली दो लाइनें अनुराधा की आवाज़ में। और तो और अनुराधा जो पूनम के लिए "तू मेरा कौन लागे" गा रही थीं, अब डिम्पल के लिए "तू मारो कोण लागे" गाती हैं। ऐसा क्यों है, पता नहीं! ख़ैर, अब ज़िक्र करते हैं कि इस गीत का किशोर कुमार के साथ क्या सम्बन्ध है। गीत के रेकॉर्डिंग् के दिन की बात है। तीनों गायिकाएँ तैयार थीं, दवाब भी था उन पर क्योंकि तीनों में उन दिनों प्रतियोगिता थी। इसलिए इस दवाब में थीं कि कहीं मुझसे इस गीत में कोई ग़लती ना हो जाए! गीत रेकॉर्ड हो गया, तीनों गायिकाएँ काँच के कमरे से बाहर आ गईं। लक्ष्मी-प्यारे भी उनकी तरफ़ चले आ रहे थे कन्डक्टिंग् रूम की तरफ़ से, पर किसी के चेहरे पर कोई मुस्कुराहट नहीं थी जो आम तौर पर होता है अगर गीत अच्छा रेकॉर्ड हो जाए तो। लक्ष्मी-प्यारे के उतरे हुए चेहरे देख कर तीनों गायिकाएँ घबरा गईं यह सोच कर कि कहीं उनसे कोई ग़लती तो नहीं हो गई इस गीत में? पास आने पर अलका याज्ञनिक ने प्यारेलाल जी से पूछा कि क्या बात है? प्यारेलाल जी ने बताया, "किशोर दा नहीं रहे!" दिन था 13 अक्टुबर 1987। इसी दिन किशोर दा चले गए और इसी दिन रेकॉर्ड हुआ था ’बटवारा’ का यह गीत, हालाँकि फ़िल्म 1989 में रिलीज़ हुई थी। 



फिल्म - बँटवारा : "तू मेरा कौन लागे..." : अनुराधा पौडवाल, अलका याज्ञिक, कविता कृष्णमूर्ति



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




गुरुवार, 30 जून 2016

छल्ला कालियां मर्चां, छल्ला होया बैरी.. छल्ला से अपने दिल का दर्द बताती विरहणी को आवाज़ दी शौक़त अली ने



कहकशाँ - 13
छल्ला का एक रूप शौक़त अली की आवाज़ में  
"छल्ला कालियां मर्चां, छल्ला होया बैरी..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है पंजाबी लोक-संगीत ’छल्ला’ का एक रूप गायक शौक़त अली की आवाज़ में।



’कहकशाँ’ में आज एक पंजाबी नगमा, या यूँ कहिए पंजाबी लोकगीतों का एक ख़ास रूप, एक ख़ास जौनर जिसे "छल्ला" के नाम से जाना जाता है। इस "छल्ला" को कई गुलुकारों ने गाया है और अपने-अपने तरीके से गाया है। तरीकों के बदलाव में कई बार बोल भी बदले हैं, लेकिन इस "छल्ला" का असर नहीं बदला है। असर वही है, दर्द वही है, एक "विरहणी" के दिल की पीर, जो सुनने वालों के दिलों को चीर जाती है। आख़िर ये "छल्ला" होता क्या है, इसके बारे में "एक शाम मेरे नाम" के मनीष जी लिखते हैं (साभार):

"जैसा कि नाम से स्पष्ट है "छल्ला लोकगीत" के केंद्र में वो अंगूठी होती है, जो प्रेमिका को अपने प्रियतम से मिलती है। पर जब उसका प्रेमी दूर देश चला जाता है तो वो अपने दिल का हाल किसे बताए? और किस से? उसी छल्ले से जो उसके साजन की दी हुई एकमात्र निशानी है। यानि कि छल्ला लोकगीत छल्ले से कही जाने वाली एक विरहणी की आपबीती है। छल्ले को कई पंजाबी गायकों ने समय-समय पर पंजाबी फिल्मों और एलबमों में गाया है। इस तरह के जितने भी गीत हैं उनमें रेशमा, इनायत अली, गुरदास मान, रब्बी शेरगिल और शौकत अली के वर्ज़न काफी मशहूर हुए।"

तो आज हम अपनी इस महफ़िल को शौकत अली के गाए "छल्ला" से सराबोर करने वाले हैं। हम शौकत अली को सुनें, उससे पहले चलिए इनके बारे में कुछ जान लेते हैं। (सौजन्य: विकिपीडिया)

शौक़त अली ख़ान पाकिस्तान के एक जानेमाने लोकगायक हैं। इनका जन्म "मलकवल" के एक फ़नकारों के परिवार में हुआ था। शौक़त ने अपने बड़े भाई इनायत अली ख़ान की मदद से १९६० के दशक में ही अपने कॉलेज के दिनों में गाना शुरू कर दिया था। १९७० से ये ग़ज़ल और पंजाबी लोकगीत गाने लगे। १९८२ में जब नई दिल्ली में एशियन खेलों का आयोजन किया गया था, तो शौक़त अली ने वहाँ अपना लाईव परफ़ारमेंस दिया। इन्हें पाकिस्तान का सर्वोच्च सिविलियन प्रेसिडेंशियल अवार्ड भी प्राप्त है। अभी हाल ही में आए "लव आज कल" में इनके गाये "कदि ते हंस बोल वे" गाने (जो कि अब एक लोकगीत का रूप ले चुका है) की पहली दो पंक्तियाँ इस्तेमाल की गई थी। शौक़त अली साहब के कई गाने मक़बूल हुए हैं। उन गानों में "छल्ला" और "जागा" प्रमुख हैं। इनके सुपुत्र भी गाते हैं, जिनका नाम है "इमरान शौक़त"।

"छल्ला" गाना अभी हाल में ही इमरान हाशमी अभिनीत फिल्म "क्रूक" में शामिल किया गया था। वह छल्ला लोकगीत वाले सारे छ्ल्लों से काफ़ी अलग है। अगर कुछ समानता है तो बस यह है कि उसमें भी "एक दर्द" (आस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीयों का दर्द) को प्रधानता दी गई है। उस गाने को बब्बु मान ने गाया है और संगीत दिया है प्रीतम ने। प्रीतम ने उस गाने के लिए "किसी लोक-धुन" को क्रेडिट दी है, लेकिन सच्चाई कुछ और है। कुछ समय पहले जब मैंने और सुजॉय जी ने "क्रूक" के गानों की समीक्षा की थी, तो उस पोस्ट की टिप्पणी में मैंने सच्चाई को उजागर करने के लिए यह लिखा था: वह गाना बब्बु मान ने नहीं बनाया था, बल्कि "बब्बल राय" ने बनाया था "आस्ट्रेलियन छल्ला" के नाम से... वो भी ऐं वैं हीं, अपने कमरे में बैठे हुए। और उस वीडियो को यू-ट्युब पर पोस्ट कर दिया। यू-ट्युब पर उस वीडियो को इतने हिट्स मिले कि बंदा फेमस हो गया। बाद में उसी बंदे ने यह गाना सही से रिलीज़ किया .. बस उससे यह गलती हो गई कि उसने रिलीज़ करने के लिए बब्बु मान के रिकार्ड कंपनी को चुना... और आगे क्या हुआ, यह हम सबके सामने है। कैसेट पर कहीं भी बब्बल राय का नाम नहीं है, जबकि गाना पूरा का पूरा उसी से उठाया हुआ है। यह पूरा का पूरा पैराग्राफ़ आज की महफ़िल के लिए भले ही गैर-मतलब हो, लेकिन इससे दो तथ्य तो सामने आते ही है: क) हिन्दी फिल्मों में पंजाबी संगीत और पंजाबी संगीत में छल्ला के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। ख) हिन्दी फिल्म-संगीत में "कॉपी-पेस्ट" वाली गतिविधियाँ जल्द ख़त्म नहीं होने वाली और ना ही "चोरी-सीनाजोरी" भी थमने वाली है।

बातें बहुत हो गईं। चलिए तो अब ज़्यादा समय न गंवाते हुए, "छल्ला" की ओर अपनी महफ़िल का रूख कर देते हैं और सुनते हैं ये पंजाबी लोकगीत।  इस पंजाबी गीत का हिन्दी में अनुवाद करने का कार्य किया है श्री अश्विनी कुमार राय ने जिनका हम आभारी हैं :

जावो नी कोई मोड़ लियावो,
नि मेरे नाल गया जे लड़ के,
अल्लाह करे आ जावे जे सोणा ओए,
देवां जान कदमा विच धर के।

कोई जाये और मेरे प्रीतम को मना कर वापिस ले आये जो मेरे साथ लड़ कर चला गया है. अल्लाह करे कि जब वह लौट आये तो मैं अपनी जान उसके क़दमों में रख दूंगी. 

हो छल्ला बेरी बुवे, वतन माही दा दूरे,
जाना पहले पूरे, गल्ल सुन छल्लया
ओ छोरा, दिल नु लाया ई जोरा

दरवाजे के बाहर ही बेरी का पेड़ है और मेरे पति का देश बहुत दूर है. पहले मेरी बात सुनो, फिर वहाँ पर जाना. मैं तुम्हे क्या बताऊँ ये दिल कितना जोर दे रहा है.

हो छल्ला कालियां मर्चां, ओए मोरा पी के मरसां,
सिरे तेरे चडसां, ओ गल्ल सुन छल्लया,
ओ ढोला, ओए तैथों कादा ओला

छल्ला काली मिर्च है न ..मैं ज़हर पी कर तेरे सर होके मर जाऊंगी. अरे छल्ला सुनो...तुम से क्या पर्दा है मेरा! 

हो छल्ला नौ नौ देवे, पुत्तर मिठ्ठे मेवे,
अल्लाह सब नु देवे, छल्ला छी छी 
ओ पाया, ओए धीयाँ धन जे पराया

छल्ला ! बेटे, मीठे मेवे की तरह हैं ...अल्लाह करे सब को ये मिलें . बेटियाँ तो पराया धन ही होती हैं.

हो छल्ला पाया गहने, दुख ज़िंदडी ने सहने,
सदा मापे नहीं रहने, गल सुन सांवला ढोला,
ओए साड के कित्ता ई कोला

छल्ला गहनों में मिला है, दुःख तो इस ज़िंदगी ने ही उठाने हैं क्योंकि माँ-बाप तो सदा नहीं रहते. मेरे सांवले ढोला सुनो! तुम क्यों स्वयं को कोयले की तरह जला रहे हो! 

ओ छल्ला होया बैरी, सजन भज गए कचहरी,
रोवां शिखर दोपहरी, ओ गल सुन छलया
ओ पावे बुरा वेला ना आवे

छल्ला अब तो मेरे साजन वैरी हो कर कचहरी में चले गए हैं. मैं शिखर दोपहर में रो रही हूँ ...छल्ला तुम मेरी बात सुनो “बुरा वक्त किसी पर न आये”

हो छल्ला ज़ेरां ज़बरां, मौया मल्लियाँ कबरां 
जिंदे लेन्दे ना खबरां ओए गल सुन छलया 
वेहडे अल्लाह संग न उखेड़े,

छल्ला अब तो सब जोर ज़बरदस्ती है ...जो मर गए वो कब्र में दफन हैं और जो जीवित हैं वे कोई खबर नहीं लेते. ओ छल्ला मेरी बात सुनो इस आँगन में अल्लाह किसी का साथ न छुडाये. 

हो छल्ला हिको कमाई, ओए जिऊण बहना दे भाई ओए,
अल्लाह मुक्के जुदाई, परदेश दुहाई 
ओ गल्ल सुन छलया
ओ तारां वीरा नाल बहारां 

छल्ला अब तो एक ही कमाई है कि बहनों के भाई चिरायु हों. अल्लाह करे इस जुदाई का अंत हो मैं परदेस की दुहाई देती हूँ कि भाइयों के साथ ही अच्छा वक़्त (बहार) कटता है. 

हो छल्ला बेरी बुवे, वतन माही दा दूरे,
जाना पहले पूरे, गल्ल सुन छल्लया
ओ छोरा, दिल नु लाया ई जोरा

दरवाजे के बाहर ही बेरी का पेड़ है और मेरे पति का देश बहुत दूर है. पहले मेरी बात सुनो, फिर वहाँ पर जाना. मैं तुम्हे क्या बताऊँ ये दिल कितना जोर दे रहा है.





’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

बुधवार, 29 जून 2016

"कुछ भी पाने के लिए अपने मकसद के प्रति एक नशा, एक पागलपन, एक जूनून होना चाहिए" -सलीम दीवान : एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है (17)
Actor Salim Diwan 

दोस्तों इस कार्यक्रम अब तक हमने आपकी मुलाकात अधिकतर संगीत पक्ष से जुड़े कलाकारों से करवाई है, मगर आज हम आपको फिल्म के बेहद महत्वपूर्ण पक्ष यानी अभिनय से जुड़े एक प्रतिभावान कलाकार से मिलवाने जा रहे हैं. "बॉलीवुड डायरिस" से अभिनय जगत में प्रवेश करने वाले अभिनेता सलीम दीवान हैं हमारे आज के ख़ास मेहमान. तो मिलते हैं सलीम दीवान से और जानते हैं उनके जीवन और अब तक के करियर से जुडी कुछ ख़ास बातें....


एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें 

रविवार, 26 जून 2016

राग चारुकेशी : SWARGOSHTHI – 276 : RAG CHARUKESHI


स्वरगोष्ठी – 276 में आज


मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 9 : राष्ट्रीय पुरस्कार से अलंकृत संगीत


‘बइयाँ ना धरो ओ बलमा...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ जारी है। श्रृंखला की नौवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी दे रहे हैं। गत 25 जून को हमने मदन मोहन का 93वाँ जन्मदिन मनाया। श्रृंखला की नौवीं कड़ी में आज हम आपको राग चारुकेशी के स्वरों में पिरोये गए 1970 में प्रदर्शित फिल्म ‘दस्तक’ से एक सुमधुर गीत का रसास्वादन कराएँगे। इस राग आधारित गीत को स्वर दिया है, लता मंगेशकर ने। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग चारुकेशी के स्वर में निबद्ध फिल्म ‘दस्तक’ के इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम सुप्रसिद्ध सारंगी वादक उस्ताद सुल्तान खाँ की सारंगी पर राग चारुकेशी का आलाप और एक विलम्बित रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं।


संगीतकार मदन मोहन के गीतों की बात चल रही हो और 1970 की फ़िल्म ’दस्तक’ के गीत-संगीत की चर्चा ना हो, तो शायद चर्चा अधूरी रह जाए। 70 का दशक मदन मोहन के संगीत सफ़र का अन्तिम अध्याय था। पिछले दो दशकों से उत्कृष्ट संगीत देने के बावजूद जब उन्हें कोई भी विशिष्ट पुरस्कार कहीं से नहीं मिला तो इस बात का अफ़सोस उन्हें ज़रूर था, ऐसा उनके परिवार वालों ने उनके वेबसाइट पर लिखा है। मदन जी को पुरस्कारों पर से ना केवल भरोसा उठ गया था बल्कि उनमें पुरस्कार प्राप्त करने में कोई इच्छा ही नहीं बची थी। इसलिए जब ’दस्तक’ के लिए उनका नाम राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए चुना गया तो उन्होंने दिल्ली जाकर उसे ग्रहण करने से साफ़ इनकार कर दिया। उनकी यह नाराज़गी जायज़ थी, पर राष्ट्रपति द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कार को ग्रहण करने से इनकार की बात सुन कर उनके परिवार वाले और फ़िल्म-जगत के उनके मित्र विक्षुब्ध हो उठे। बहुत लोगों ने उन्हें समझाया पर वो मानने के लिए तैयार नहीं। अन्त में अभिनेता संजीव कुमार, जिन्हें ’दस्तक’ फ़िल्म के लिए ही सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिल रहा था, ने उनसे कहा कि मैं भी दिल्ली जा रहा हूँ इसी फ़िल्म के लिए पुरस्कार ग्रहण करने, तब जाकर मदन जी राज़ी हुए साथ चलने को।

फ़िल्म ’दस्तक’ में कुल चार ही गीत थे - तीन लता की आवाज़ में और एक रफ़ी का गाया हुआ। "माई री मैं कासे कहूँ पीर अपने जिया की..." गीत फ़िल्म में लता जी की आवाज़ में है, पर मदन मोहन की आवाज़ में इसका एक संस्करण रेकॉर्ड पर उपलब्ध है। "हम हैं मताय-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह..." गीत के बारे में डॉ. अलका देव मारुलकर कहती हैं, "अभिजात संगीत, परिष्कृत संगीत, अमर्त्य संगीत की परिभाषा क्या है, यह हम नहीं जानते, लेकिन वैसा ही होगा जैसा मदन मोहन के गीत हैं, जिसे हम कहते हैं अभिरुचि सम्पन्न। ऐसा ही एक गीत है फ़िल्म ’दस्तक’ में। इस गीत में करूण विलाप है, बाज़ार में बिकनेवाली कला का करूण विलाप!"।  फ़िल्म ’दस्तक’ का तीसरा लता जी का गाया गीत है "ब‍इयाँ ना धरो ओ बलमा..." जिसे हमने आज के इस अंक के लिए चुना है। यह गीत राग चारुकेशी पर आधारित है। इस गीत की गायकी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि लता जी ने इसे अपने सबसे कम स्वरमान (lowest pitch) पर गाया है। लता जी के अधिकतर गीत ऊँची पट्टी पर गाये गए हैं, पर यह गीत बिल्कुल विपरीत है। इस गीत के साथ एक दिलचस्प घटना भी जुड़ी हुई है। इसे लता जी के अपने शब्दों में ही पढ़िए - "शायरी पर वो बहुत ज़ोर देते थे। जब तक शब्दों में गहराई न हो, गीतकार को गीत का आलेख वापस लौटा देते थे। फिर कोशिश कीजिए, जब दिल से बात निकलेगी तब असर करेगी। एक दिन मजरूह साहब का गीत रेकॉर्ड हुआ। बहुत अच्छा रेकॉर्ड हुआ। तर्ज़ तो थी ही अच्छी, कविता बहुत ही सुन्दर थी। रेकॉर्डिंग के बाद मदन भ‍इया इतने ज़्यादा ख़ुश थे कि फ़ौरन पहुँचे स्टुडियो में शाबाशी देने शायर को। आप जानते हैं किस तरह शाबाशी दी? बेचारे मजरूह साहब के पेट पर हल्के हल्के दर्जनों मुक्के बरसा दिए। मजरूह साहब ठहरे शायर, और वो भी सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश के, मरहबा का यह तरीक़ा उनके लिए यक़ीनन एक नया तजुर्बा था। पता नहीं पुरदर्द था या पुरकैफ़। मदन भ‍इया बोले घर चलिए मैं आपको अपने हाथ से पका कर खाना खिलाऊँगा। रस चाहे स्वर का हो या रसोई का, वो दोनों में माहिर थे।" आइए, राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म ‘दस्तक’ का यही गीत सुनते हैं।


राग चारुकेशी : “बइयाँ ना धरो ओ बलमा...” : लता मंगेशकर : फिल्म – दस्तक



राग चारुकेशी मूलतः दक्षिण भारतीय संगीत पद्यति का राग है। उत्तर भारतीय संगीत में इस राग का प्रचलन कर्नाटक संगीत से ही हुआ है। यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात आरोह और अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। राग चारुकेशी में धैवत और निषाद स्वर कोमल तथा शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। आरोह में – सा, रे, ग, म, प, ध(कोमल), नि(कोमल), सां तथा अवरोह में सां, नि(कोमल), ध(कोमल), प, म, ग, रे, सा स्वर होते हैं। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। राग चारुकेशी को दिन के दूसरे प्रहर में गाने-बजाने की परम्परा है। इस राग में यदि शुद्ध ऋषभ स्वर को कोमल ऋषभ स्वर में परिवर्तित कर दिया जाए तो यह राग बसन्त मुखारी की अनुभूति कराता है। इसी प्रकार यदि कोमल निषाद स्वर को शुद्ध निषाद स्वर में परिवर्तित कर दिया जाए तो राग नटभैरव का अनुभव होने लगता है। फिल्मों में राग चारुकेशी का सर्वाधिक प्रयोग संगीतकार कल्याणजी आनन्दजी ने किया है। राग चारुकेशी के यथार्थ स्वरूप को समझने के लिए अब हम इस राग में वाद्य-संगीत की एक रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। देश के सुविख्यात सारंगी वादक उस्ताद सुल्तान खाँ की सारंगी पर राग चारुकेशी का आलाप और एक विलम्बित रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं। आप वाद्य संगीत की इस रचना में फिल्म ‘दस्तक’ के गीत के स्वर तलाश करने का प्रयास कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति प्रदान कीजिए।


राग चारुकेशी : सारंगी पर आलाप और विलम्बित लय की एक रचना : उस्ताद सुल्तान खाँ





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 276वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक बार पुनः संगीतकार मदन मोहन के संगीत से सजे एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन का आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत के गायक को पहचान सकते हैं? हमे गायक का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 2 जुलाई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 278वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 274 की संगीत पहेली में हमने आपको मदन मोहन के संगीत निर्देशन में बनी और 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘जहाँआरा’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – छायानट, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है – ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक और गायिका – मोहम्मद रफी और सुमन कल्याणपुर

इस बार की पहेली में चार प्रतिभागियों ने सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। इन सभी विजेताओं ने दो-दो अंक अर्जित किये है। सभी विजेता प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में जारी हमारी श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की आज की कड़ी में आपने राग चारुकेशी का परिचय प्राप्त किया। इस श्रृंखला में हम फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। हमारी अगली श्रृंखला “वर्षा ऋतु के राग” विषय पर आधारित होगी। इस श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव या फरमाइश ऊपर दिये गए ई-मेल पते पर शीघ्र भेजिए। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शनिवार, 25 जून 2016

BAATON BAATON MEIN - 20: INTERVIEW OF SHAMSHAD BEGUM (PART-3)

बातों बातों में - 20

पार्श्वगायिका शमशाद बेगम से गजेन्द्र खन्ना की बातचीत
भाग-3


"मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि अल्लाह ने मुझे मौक़ा दिया कि दूसरों की मदद करूँ, बिना किसी फ़ायदे के "  




नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रृंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज इस स्तंभ में हम आपके लिए लेकर आए हैं फ़िल्म जगत की सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका शमशाद बेगम से गजेन्द्र खन्ना की बातचीत। गजेन्द्र खन्ना के वेबसाइट www.shamshadbegum.com पर यह साक्षात्कार अंग्रेज़ी में पोस्ट हुआ था जनवरी 2012 में। गजेन्द्र जी की अनुमति से इस साक्षात्कार को हिन्दी में अनुवाद कर हम ’रेडियो प्लेबैक इन्डिया’ पर प्रस्तुत कर रहे हैं। पिछले महीने हमने पेश किए थे इस साक्षात्कार का दूसरा भाग; आज प्रस्तुत है इसका तीसरा और अन्तिम भाग।

    


दोस्तों, पिछली कड़ी में शमशाद जी ने अपनी शुरुआती फ़िल्म - ’तक़दीर’ और ’पन्ना’ के बारे में विस्तार से हमें बताया। साथ ही उमराओ ज़िआ बेगम और ज़ोहराबाई अम्बालेवाली से अपनी दोस्ती की बातें बताईं। और फिर कुछ ऐसे संगीतकारों को याद किया जो आज लगभग भूला दिए गए हैं जैसे कि पंडित गोबिन्दराम, पंडित अमरनाथ, हुस्नलाल-भगतराम, बुलो सी. रानी, ग़ुलाम मोहम्मद, फ़िरोज़ निज़ामी, उस्ताद झंडे ख़ाँ, विनोद, ज्ञान दत्त, ख़ुर्शीद अनवर और ख़ान मस्ताना। आइए अब बातचीत का सिलसिला वहीं से आगे बढ़ाते हैं।


शमशाद जी, आपने नौशाद साहब के लिए भी बहुत सारे गाने गाए हैं।

जी हाँ, ’शाहजहाँ’ के गाने हिट होने के बाद मैं उनकी मेन सिंगर बन गई थी।

उनके साथ बहुत से रेकॉर्डिंग् आपने किए हैं, कोई ख़ास वाकिया याद है उनसे जुड़ा?

जी हाँ, एक बताती हूँ। तलत (महमूद) उस वक़्त बम्बई में नए नए आए थे। वो कुछ म्युज़िक डिरेक्टरों के लिए गा चुके थे पर अभी तक टॉप पर नहीं पहुँचे थे। नौशाद साहब ने उन्हें बुलाया मेरे साथ "मिलते ही आँखें दिल हुआ दीवाना किसी का" गाने के लिए। रिहर्सलें हुईं। तलत की आवाज़ बहुत नर्म थी और उनकी एक काँपती हुई आवाज़ थी जो उनकी गायिकी की ख़ासियत थी। फ़ाइनल टेक देते वक़्त तलत नर्वस हो गए। उस वक़्त नौशाद टॉप कम्पोज़र थे और मैं टॉप सिंगर। शायद यही बात उनके दिमाग़ में चल रही होगी जिस वजह से उनकी आवाज़ और ज़्यादा काँपने लगी टेक दर टेक। नौशाद साहब को यह बात पसन्द नहीं आ रही थी और रेकॉर्डिंग् में देर होती जा रही थी। एक वक़्त तो नौशाद साहब ने यह भी सोचा कि तलत साहब को हटा दिया जाए अन्द मुझसे इस बारे में कहा। मैंने उन्हें समझाया कि तलत की आवाज़ बहुत अच्छी है पर वो ज़रा नर्वस हो गए हैं, हमें उनका हौसला अफ़ज़ाई करना चाहिए और तभी रेकॉर्डिंग् समय पर हो पाएगी। मैंने नौशाद साहब को उनका हौसला बढ़ाने के लिए कहा। मैंने उनसे कहा कि वो रेकॉर्डिंग् रूम में जाएँ और तलत को मुस्कुराते चेहरे से ’थम्प्स-अप’ दिखाए चाहे वो कैसे भी गाएँ! ऐसा करने पर उन्हें उनका फ़ाइनल टेक जल्दी ही मिल जाएगा। जैसे ही नौशाद साहब अन्दर चले गए, मैंने तलत से कहा कि आपकी आवाज़ बहुत अच्छी है, बस आप ज़रा नर्वस हो रहे हैं। इस तरह से नर्वस होकर तो आप अपन अकरीयर बिगाड़ लेंगे। कुछ समय के लिए यह भूल जाइए कि मैं और नौशाद बड़े फ़नकार हैं। दिल में रब का नाम लीजिए और गाना शुरु कीजिए, सब ठीक हो जाएगा। हमें आप अपने कलीग मानिए और अपना पूरा जी-जान लगा दीजिए इस गीत में। अरे अगर मरना ही है तो डर के क्यों मरो, लड़ के मरो। ऐसा कहने पर उन्हें हिम्मत मिली और पहला टेक पहले से काफ़ी बेहतर हुआ। नौशाद के ’थम्प्स-अप’ को देख कर उन्हें और हिम्मत मिली और फ़ाइनली तीसरा टेक ओ.के. हो गया।


यह बहुत ही अच्छा क़िस्सा आपने बताया। आप वैसे भी हमेशा सब की मदद की है। मैंने कहीं पढ़ा था कि आपके नुसखे गायक मुकेश के भी काम आए?

जी हाँ, एक वक़्त ऐसा था जब मुकेश की तबीयत ठीक नहीं थी जिस वजह से उनकी रेकॉर्डिंग्स कैन्सल हो रही
थी एक के बाद एक। मुझे अफ़सोस हो रहा था कि उनका माली नुकसान हो रहा है, उस वक़्त वो स्ट्रगल ही कर रहे थे। एक दिन मेरी उनके साथ रेकॉर्डिंग् थी और मैंने उ्नसे इस बारे में बात की। शुरु शुरु में तो वो हिचकिचा रहे थे मुझे बताने से, लेकिन फिर बोले। उसकी नाभी खिसक रही थी। मैंने पूछा कि क्या सिर्फ़ यही बात है? इसका हल आपके घर के औरतों को ज़रूर पता होगा। औरतों में यह आम बीमारी है। मैंने उनसे कहा, हार पिरोने वाला सूत सात दफ़ा इकट्ठा करो और पैर के बड़े अंगूठे से लूज़-टाइट बाँध दो। यह नुसखा उनके काम आ गई। और उन्होंने मुझे इस इलाज के लिए शुक्रिया भी कहा। मैं हमेशा लोगों की मदद करना चाहती थी। मैंने चित्रगुप्त जी के करीयर को भी दुबारा उपर लाना चाहा उनके लिए स्टण्ट फ़िल्मों में गा गा कर जैसे कि ’सिंदबाद जहाज़ी’, हालाँकि लोगों ने मुझे चेतावनी दी थी कि ऐसा करना मेरे लिए अच्छा नहीं होगा क्योंकि मेन-स्ट्रीम सिंगर्स के लिए ऐसी फ़िल्मों में गाना करीयर के लिए ठीक नहीं। इस तरह की फ़िल्मों में दूसरी स्तर की गायिकाएँ गाती हैं। नाशाद ने भी बुरा वक़्त देखा है। मैंने उनके लिए ’दादा’ में गाया था। 1953 में मैंने उनके लिए ’नगमा’ फ़िल्म के लिए बूकिंग् दी थी जिसने उनके करीयर को बढ़ावा दिया। आज तक वो मेरे उस गीत "काहे जादू किया जादूगर बालमा" के लिए याद किए जाते हैं!

आप ने राज कपूर की भी मदद की थी उनकी पहली फ़िल्म ’आग’ में गीत गा कर?

जी हाँ, वो मेरे पास आए थे और कहने लगे कि मैं पृथ्वीराज कपूर का बेटा हूँ, मैंने उनकी मदद की। उन्होंने मेरा
शुक्रिया अदा किया, लेकिन बाद में बहुत सालों के बाद जब मिले तो अफ़सोस ज़ाहिर की और माफ़ी भी माँगी कि उन्होंने मेरे लिए कुछ कर नहीं सके। मैंने मदन मोहन, सी. रामचन्द्र, ओ. पी. नय्यर और भी कई नए नए संगीतकारों की शुरुआती फ़िल्मों में गाया। इन संगीतकारों के इन शुरुआती गीतों ने उन्हें इंडस्ट्री में स्थापित किया। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि अल्लाह ने मुझे मौक़ा दिया कि दूसरों की मदद करूँ, बिना किसी ख़ुद के फ़ायदे के।

किशोर कुमार एक और ऐसे गायक थे जो आपके एहसानमन्द थे।

जी हाँ, फ़िल्म ’बहार’ में मेरे साथ गाते हुए उनको अपना मेजर ब्रेक मिला था, और वहीं से उनके करीयर ने कामयाबी की सीढी पकड़नी शुरु की। उसने दरियादिली से मेरा शुक्रिया अदा किया क्योंकि मेरे साथ गाने की वजह से उन्हें पहचान मिली।


आप महबूब ख़ान के क़रीब थीं और ’मदर इण्डिया’ के गाने भी बहुत लोकप्रिय हुए थे।

यहाँ उषा रात्रा जी बताती हैं....

जी हाँ, हम महबूब साहब के एहसानमन्द हैं। यह ज़्यादा लोगों को मालूम नहीं कि उन्होंने मम्मी के करीयर को
एक बार नहीं बल्कि दो बार बढ़ावा दिया था। पहली बार की बात तो मम्मी बता चुकी हैं। मेरे डैडी का 1955 में अचानक इन्तकाल हो गया, जिससे मेरी मम्मी को बहुत बड़ा शौक लगा।  वो हमेशा रोती रहती थीं, अल्लाह को याद करती रहती थीं। लगभग एक साल तक उन्होंने कोई गाना नहीं गाया। उस समय महबूब ख़ान ’मदर इण्डिया’ पर काम कर रहे थे। उनकी इच्छा थी कि बस मम्मी ही उनकी फ़िल्म के लिए गाए। नौशाद साहब ने उन्हें बताया कि मम्मी तो आजकल गा नहीं रही हैं, फिर भी महबूब साहब ने नौशाद साहब से कहा कि आप उनसे दरख्वास्त कीजिए कि वो गाने के लिए तैयार हो जाएँ। लेकिन मम्मी ने नौशाद साहब को ना कह दिया। उस पर नौशाद साहब ने कहा कि अगर आप नहीं चलेंगी तो मैं आपको ज़बरदस्ती उठा ले जाऊँगा।


आगे की दासतान शमशाद जी बताती हैं...

उन्होंने कहा, जब मेरे हँसने वाले गाने गाए तो क्या आपको कभी दुख नहीं था? आप एक उम्दा आर्टिस्ट हो। आप फ़ीलिंग्स बहुत अच्छी तरह से माइक के सामने गा सकती हो चाहे आपके अन्दर जो भी फ़ीलिंग्स चल रही हों! उनके लिए मेरे दिल में बहुत इज़्ज़त है और आख़िर में कहा कि मैं आपको निराश नहीं करूँगी। रिहर्सलें शुरु हुईं। पहला गाना जो रेकॉर्ड हुआ, वह था "होली आई रे कन्हाई" जो एक ही टेक में ओ.के. हो गई। मुझे अब तक याद है कि "पी के घर" गीत के रेकॉर्डिंग् के वक़्त वहाँ मौजूद सभी आर्टिस्ट्स रो रहे थे।

आप भी रो रही थीं?

(हँसते हुए) नहीं, मैं रोती तो टेक कैसे होता? इस गीत के बाद भी मेरे बहुत से हिट गीत आए, और काम करते करते धीरे धीरे मैं अपने वालिद की मौत के ग़म से बाहर निकली।

आपने मद्रास के कई स्टुडियोज़ के लिए भी बहुत गीत गाई हैं? उन लोगों के साथ भी आपका बहुत अच्छा रिश्ता बन गया था।

जी हाँ, वो लोग मुझे बूक करते थे और मैं 15 दिनों के लिए मद्रास जाया करती थी रेकॉर्डिंग्स के लिए। उन दिनों में होटल से स्टुडियो, और वापस स्टुडियो से होटल, लगातार करती रहती थी। रात के दस बजे होटल वापस लौटती थी, फिर सुबह उठ कर वापस स्टुडियो के लिए निकल जाती। इस वजह से मद्रास शहर को देखने का ज़्यादा मौक़ा नहीं मिला। लेकिन वहाँ के लोगों ने मेरे काम की बहुत तारीफ़ की।

फ़िल्म ’आन’ के तमिल वर्ज़न में भी आपने गाया था?

जी हाँ, लेकिन अफ़सोस कि मुझे मालूम नहीं वो मौजूद हैं भी या नहीं!

मुझे भी वो कहीं पर नहीं मिले। हमें उम्मीद है कि इस साक्षात्कार को पढ़ने वाले पाठकों में से कोई पाठक उन्हें ढूंढ़ने में कारगर साबित होंगे। शमशाद जी, यह वाक़ई हैरान कर देने वाली बात है कि आप इतनी बड़ी फ़नकार होते हुए भी इतनी आमफ़हम हैं, इतनी ज़मीन पर हैं। 

जी हाँ, मेरी पैदाइश ही ऐसी है। जैसा कि मैंने कहा था कबीर वाली बात कि ्ना काहु संग दोस्ती ना काहु संग बैर। मेरे लिए यह जुमला काम कर गई।


यहाँ उषा रात्रा जी बताती हैं...

जी हाँ, मम्मी ने कभी रेकॉर्डिंग् कैन्सल नहीं की। मुझे याद है एक बार उन्हें 102 डिग्री बुखार था और फिर भी
ज़िद करने लगी कि रेकॉर्डिंग् पे जाएगी। मैंने पूछा कि ऐसी क्या मजबूरी है ऐसी हालत में रेकॉर्डिंग् पे जाने की? क्या आपको पैसों की ज़रूरत है? तो वो हँसने लगी और कहा कि बेटा, मैं वहाँ म्युज़िशियनों के लिए जा रही हूँ। जब रेकॉर्डिंग् कैन्सल हो जाती है तो उन्हें ख़ाली हाथ घर लौटना पड़ता है और भूखे पेट भी कई दफ़ा रहने पड़ते हैं। उनके दिल में मेरे लिए बहुत इज़्ज़त है और मेरे रेकॉर्डिंग् पर बजा कर उन्हें बहुत ख़ुशी मिलती है। वो कहते कि अगर आज वो आ रही हैं तो हमें भी आज खाना मिलेगा। उन लोगों ने मुझे ऐसी इज़्ज़त दी है कि मैं उन्हें निराश या तकलीफ़ नहीं पहुँचा सकती। इसलिए मैं हमेशा रेकॉर्डिंग् पर जाती हूँ, यह ज़रूरी नहीं कि मैं क्या फ़ील कर रही हूँ। इस तरह की इंसान हैं ये। इन्होंने हमेशा सादगी भरी ज़िन्दगी जी है और पूरे समर्पण के साथ काम किया है।

इसमें कोई शक़ नहीं। मैंने कहीं पढ़ा है कि एक बार सी. रामचन्द्र जी के साथ एक रेकॉर्डिंग् पर किसी ग़लतफ़हमी की वजह से 1951 में आपने गाने की किताब को बन्द करके स्टुडियो से निकल गई थीं और कभी उनके पास वापस न आने का इरादा बनाकर। क्या यह सच है?

जी नहीं, यही किसी का ख़याली पुलाव है। ऐसी कोई बात नहीं हुई थी। जब भी उन्होंने मुझे बुलाया, मैं गई उनके लिए गाने। प्रोड्युसर्स ही हमारी बूकिंग्स किया करते थे। ज़्यादातर जगहों पर कम्पोज़र के पास सिंगर चुनने का ज़्यादा हक़ नहीं होता था। 50 के दशक के दूसरे भाग में भी मैं उनके लिए गा रही थी। उनके गीतों की लिस्ट पर आप ग़ौर करेंगे तो इस बात का पता चलेगा आपको। अफ़सोस कि उस वक़्त उनका करीयर ढलान पर था। मैंने 1970 में अपनी शो पर आने का दावत भी उन्हें दिया था। वो मुझे बहुत इज़्ज़त देते थे और आभारी थे।

जी हाँ, मैंने उस शो की तसवीरें देखी हैं। और उसी शो में आपकी तसवीरें पहली बार प्रकाशित हुई थीं, है ना?

जी हाँ, 1970 के आसपास मैंने दो शो किए थे और उनकी पब्लिसिटी के लिए मुझे एक फ़ोटोशूट करना पड़ा था। आप मेरी जिस तसवीर को लगभग सभी आर्टिकल्स में देखते हैं, वह ’माधुरी’ मैगज़ीन के दफ़्तर में खींची गई थी। इससे जुड़ा एक मज़ेदार क़िस्सा बताती हूँ। मैं उसी फ़ोटो के शूट के लिए जा रही थी। बिल्डिंग् पर पहुँचकर मैं अपनी बेटी के साथ लिफ़्ट में घुसी और कुछ दूसरे लोग भी थे लिफ़्ट में। एक लड़की जो एक जर्नलिस्ट थी, वो किसी को बता रही थी कि वो कितनी ख़ुश है कि आज आख़िरकार उसे शमशाद बेगम को देखने का मौका मिलेगा। वहाँ किसी ने मुझे नहीं पहचाना क्योंकि मेरी कोई तसवीर नहीं थी अब तक। वो बता रही थी कि अगले कुछ ही मिनटों में वो मुझे सामने से देख सकेगी और मैं वहाँ उसकी बगल में ही खड़ी थी और उसे नहीं मालूम!


जो लोग उस शो में मौजूद थे, वो आज भी याद करते हैं कि किस तरह से आपने गुज़रे ज़माने के उन अनमोल नग़मों को गाया था और आपकी आवाज़ में क्या चमक थी तब भी। आपने गाना छोड़ क्यों दिया शमशाद जी?


जिस तरह से उन दिनों रेकॉर्डिंग्स हो रही थी, मैं उससे ख़ुश नहीं थी। मैं कभी काम माँगने के लिए लोगों के पीछे-पीछे नहीं घूमी। यह मेरी आदत नहीं थी। इसलिए धीरे धीरे मेरी बूकिंग् कम होने लगी बावजूद हिट गीत देने के। मैंने एक हिट गीत दी। उससे पहले अगर मुझे 20 गीत मिल रहे होते तो अचानक उस हिट गीत के बाद मुझे 10 गीत मिलने लगे, और इस तरह से कम होते गए। मैं इस बारे में कुछ समय तक सोचती रही। मेरी बेटी की शादी भी हो चुकी थी तब तक और मैं अपने बेटी-दामाद के साथ पूरे हिन्दुस्तान में घूमने लगी क्योंकि मेरा दामाद फ़ौज (आर्मी) में था। मैं हमेशा फ़न के लिए गाती थी, ना कि पैसों के लिए। मैं बहुत सादा क़िस्म की ज़िन्दगी जीती थी। सिवाय खाने और कपड़ों के मेरा कोई और खर्चें नहीं था। पैसों का मैं क्या करती? मामूली लत्थे की सलवार-कमीज़ पहनती थी उस ज़माने में भी। तीन-चार ख़रीद लिया तो साल भर चल जाते। अब वक़्त बदल गया है। सारे पुराने कम्पोज़र्स चले गए या पीछे रह गए, धुंधले हो गए। और इस वजह से भी मेरे अन्दर रेकॉर्डिंग् की वह जोश कम हो गई थी। इसलिए मैं वो सब कुछ छोड़ कर अपनी बेटी के परिवार में शामिल होना ही ठीक समझा। फिर मैं इनके पोस्टिंग के साथ-साथ घूम रही थी, हिन्दुस्तान के बाहर भी रही। मेरी बेटी और दामाद ने मेरा बहुत अच्छे से ख़याल रखा है। मैं कहूँगी कि हर किसी को उषा जैसी बेटी और योगराज जैसा दामाद मिले।

यह किस वक़्त की बात है?

यह कोई 1971 की बात होगी; मुझे याद है कि यह उन दो शोज़ के बाद के वक़्त की बात है। हालाँकि पहले के रेकॉर्डेड गाने उसके बाद भी रिलीज़ होते रहे।

जहाँ तक मुझे पता है आपके आख़िरी गीतों में से थे 1981 की फ़िल्म ’गंगा माँग रही बलिदान’ के गाने जो आपने प्रेम धवन जी के लिए गाए थे। क्या यह फ़िल्म बहुत से रिलीज़ हुई (लगभग दस साल बाद) या फिर आपने 1981 में ही इन्हें गाया था?

ये मेरे आख़िरी गीतों में से होंगे जैसा कि आपने कहा। मुझे वाक़ई अब याद नहीं कि मैंने इन्हें कब गाया था। मैं हमेशा सफ़र पर रहती थी परिवार के साथ। यह संभव है कि कभी मैंने प्रेम धवन के लिए ये गीत गाए होंगे जिनके साथ मैंने पहले बहुत काम किया हुआ है। अब इस उम्र में मुझे 100% सही से नहीं कह सकती कि ये गानें मैंने कब रेकॉर्ड करवाए थे।

(इन गीतों के फ़िल्मांकन में जुनियर महमूद की उम्र को देखते हुए यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यह देर से प्रदर्शित हुई फ़िल्म होगी)

शमशाद जी, मैं किन शब्दों में आपका शुक्रिया अदा करूँ समझ नहीं आ रहा, पिछले साढ़े छह घंटों से आप इस एक कुर्सी पर बैठी हुईं हमसे बात कर रही हैं। आपसे विदा लेने से पहले एक आख़िरी सवाल पूछना चाहता हूँ जो आपने सभी चाहने वाले पूछना चाहते होंगे शायद, और वह यह कि आपको अपने गाए हुए गीतों में से सबसे पसन्दीदा गाने कौन कौन से हैं?

माँ को सभी बच्चे प्यारे होते हैं! मुझे हर एक गीत गाने में उतना ही मज़ा आया। हर एक गीत का अपना अलग तजुर्बा था और मैं हर गीत को बराबर मानती हूँ। मेरे कई अच्छे गाने ज़्यादा नहीं चले और कई बन्द भी हो गए। लेकिन मैं हर एक गीत से साथ पूरा इंसाफ़ करने की कोशिश करती थी।

और बहुत से गाने ऐसे हैं जिन्हें पब्लिक ने ख़ूब गुनगुनाया, ख़ूब दाद दी। किन किन गीतों के लिए आपको पब्लिक से बहुत ज़्यादा दाद मिली?

अल्लाह का करम है कि मेरी झोली में बहुत सारी हिट गीत दिए हैं और उन गीतों की वजह से आज तक लोगों ने मुझे याद रखा है। उनके रीमिक्स वर्ज़न आज की पीढ़ी को भी नचा रही है। मेरे गीत जैसे कि "एक तेरा सहारा", "छोड़ बाबुल का घर", "सावन के नज़ारे हैं" सदाबहार हैं। मुझे याद है "छोड़ बाबुल का घर" मेरी बेटी की विदाई के मौक़े पर बैण्ड वाले बजा रहे थे। मुझे रोना आ रहा था और तब मेरा ही गाया यह गीत बजने लगा मेरे दिल को बहलाने के लिए।

जी हाँ, ये गीत अब तक याद किए जाते हैं, सुने जाते हैं। मैंने सुना है कि आपको बहुत जल्द Gr8 Women Achievers award function में कोई पुरस्कार मिलने वाला है?

जी हाँ, मुझे बहुत ख़ुशी है कि इस उम्र में आने बाद लोग मुझे याद कर रहे हैं। यह मेरे फ़ैन्स के प्यार का ही नतीजा है और मेरे काम का सच्चा पुरस्कार आज जाकर मुझे मिल रहा है।

यहाँ उषा जी बताती हैं....

जी हाँ, देर से ही सही पर आज जो इन्हें सम्मान मिल रहा है, उससे हम बहुत ख़ुश हैं। जब इन्हें हम पद्मभूषण
पुरस्कार ग्रहण करवाने दिल्ली ले गए थे तब ये बहुत ख़ुश थीं और बहुत सुन्दर तरीके से इसे प्राप्त किया। पर जैसी उनकी प्रोफ़ेशनल आदत थी कि रेकॉर्डिंग् स्टुडियो से सीधे घर चली आती थी, वहाँ भी पुरस्कार लेने के बाद वापस चले आने के लिए अधीर हो उठीं। वहाँ बहुत से लोग आए उन्हें बधाई देने के लिए। गुरशरण कौर (प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह की पत्नी) बहुत अच्छे से हमसे मिलीं। अक्षय कुमार और ऐश्वर्या राय को भी पद्म पुरस्कार मिला था, वो दोनों आए मम्मी से आशिर्वाद लेने। एक मज़ेदार क़िस्सा भी उस पार्टी में आगे चलकर। मम्मी को फ़िल्में देखने का ज़्यादा शौक़ नहीं था। अगर आप ’मुग़ल-ए-आज़म’ या ’मदर इण्डिया’ के प्रीमियर की बात करें तो उसमें उन फ़िल्मों से जुड़े सभी लोग शामिल थे एक मम्मी को छोड़ कर। जया बच्चन जी उन्हें बधाई देने के लिए आए और कहा कि मैं आपकी बहुत बड़ी फ़ैन हूँ, जिसके जवाब में मम्मी ने फ़ौरन कहा कि मैं भी आपकी बड़ी फ़ैन हूँ। और यह मम्मी दिल से और ईमानदारी से बोल रही थीं। मम्मी जो आम तौर पर फ़िल्में नहीं देखती, जया जी की अदाकारी की वजह से ’ख़ामोशी’ पूरे तीन बार देखी थी।

शमशाद जी ने गर्व के साथ मुझे अपना ’भारत भूषण’ पुरस्कार दिखाया जो ड्रॉविंग् रूम में रखा हुआ था। उन्होंने बताया कि उन्हें कितनी ख़ुशी हुई थी इसे ग्रहण करते हुए क्योंकि बीते ज़माने के फ़नकारों में से बहुत कम ही फ़नकारों को पद्मभूषण मिला है अब तक (अधिकतर को पद्मश्री मिला है)। लेकिन फिर वो कहती हैं कि उन्हें सबसे ज़्यादा ख़ुशी मिलती है उनके चाहने वालों के प्यार से। वो याद करती हैं अपनी बेटी की बिदाई का मौक़ा जब वो रो रही थीं, पर उनकी आँसू एक पल के लिए जैसे रुक गईं जब बैण्ड वालों ने "छोड़ बाबुल का घर" बजा उठे। शमशाद जी के परिवार ने उनके बहुत सारे कैसेट्स और पुरानी यादों का सामान सहेज कर रखा हुआ है जो किसी ख़ज़ाने से कम नहीं। मैंने ख़ुद देखा कि ढेर सारा फ़ैन-मेल रखा हुआ है और उनमें मेरी लिखी हुई वह कविता भी शामिल है जो मैंने उन्हें भेजा था। रात्रा परिवार ने कुछ दुर्लभ तसवीरें दिखाईं और हमें अपने वेबसाइट पर अपलोड करने की अनुमति दी जिसके लिए हम उनके आभारी हैं।

जैसे हम वहाँ से निकल रहे थे, शमशाद जी ने कहा कि वो अल्लाह का शुक्रगुज़ार हैं जो कुछ भी उन्हें मिला है ज़िन्दगी से, और उन्हें अपनी ज़िन्दगी से कोई शिकवा नहीं है, कोई गिला नहीं है। उनके इस बात पर हमने उनसे विदा ली और उनसे वादा किया कि अगली बार जब मुंबई आना होगा तो उनसे दुबारा मिलेंगे। ईश्वर शमशाद को उम्रदराज़ करें, और उनके परिवार को ढेरों ख़ुशियाँ दे!

इस साक्षात्कार के 16 महीने बाद, 23 अप्रैल 2013 के दिन 94 वर्ष की आयु में शमशाद बेगम ने इस दुनिया-ए-फ़ानी को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। आज शमशाद बेगम ज़िन्दा हैं अपने गीतों के ज़रिए और हमेशा ज़िन्दा रहेंगी!



आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी soojoi_india@yahoo.co.in पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 


साक्षात्कार : गजेन्द्र खन्ना
अनुवाद एवं प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





गुरुवार, 23 जून 2016

तुम बोलो कुछ तो बात बने....जगजीत-चित्रा की दिली ख़्वाहिश आज ’कहकशाँ’ में



कहकशाँ - 12
जगजीत-चित्रा की दिली ख़्वाहिश 
"आइये चराग़-ए-दिल आज ही जलाएँ हम..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है छाया गांगुली की आवाज़, इब्राहिम अश्क़ के बोल और भूपेन्द्र सिंह का संगीत।




"मिट्टी दा बावा नइयो बोलदा वे नइयो चालदा...", इस नज़्म ने न जाने कितनों को रूलाया है, कितनों को ही किसी खोए हुए अपने की याद में डूबो दिया है। अपने जिगर के टुकड़े को खोने का क्या दर्द होता है, वह इस नज़्म में बख़ूबी झलकता है। तभी तो गायिका मिट्टी का एक खिलौना बनाती है ताकि उसमें अपने खोए बेटे को देख सके, लेकिन मिट्टी तो मिट्टी ठहरी, उसमें कोई जान फूँके तभी तो इंसान बने। यह गाना बस ख़्यालों में ही नहीं है, बल्कि यथार्थ में उस गायिका की निजी ज़िंदगी से जु्ड़ा है। ८ जुलाई १९९० को अपने बेटे "विवेक" को एक दु्र्घटना में खोने के बाद वह गायिका कभी भी वापस गा नहीं सकी। संगीत से उसने हमेशा के लिए तौबा कर लिया और खुद में ही सिमट कर रह गईं। उस गायिका या कहिए उस फ़नकारा ने अब अध्यात्म की ओर रूख़ कर लिया है ताकि ईश्वर से अपने बेटे की ग़लतियों का ब्योरा ले सके। भले ही आज वह नहीं गातीं, लेकिन फ़िज़ाओं में अभी भी उनकी आवाज़ की खनक मौजूद है और हम सबको यह अफ़सोस है कि उनके बाद "जगजीत सिंह" जी की गायकी का कोई मुकम्मल जोड़ीदार नहीं रहा। जी आप सब सही समझ रहे हैं, हम "जगजीत सिंह" की धर्मपत्नी और मशहूर गज़ल गायिका "चित्रा सिंह" की बात कर रहे हैं।

चित्रा सिंह, जिनका वास्तविक नाम "चित्रा दत्ता" है, मूलत: एक बंगाली परिवार से आती हैं। घर में संगीत का माहौल था इसलिए ये भी संगीत की तरफ़ चल निकलीं। १९६० में "द अनफौरगेटेबल्स" एलबम की रिकार्डिंग के दौरान जगजीत सिंह के संपर्क में आईं और वह संपर्क शादी में परिणत हो गया। जगजीत सिंह और चित्रा सिंह ने एक साथ न जाने कितनी ही गज़लें गाई हैं; जगजीत सिंह का संगीत और दो सदाबहार आवाज़, इससे ज़्यादा कोई क्या चाह सकता है! इनकी गज़लें बस हिंदी तक ही सीमित नहीं रही, इन्होंने पंजाबी और बंगाली में भी बेहतरीन नज़्में और गज़लें दी हैं। यह तो हुई दोनों के साथ की बात, अब चलते हैं चित्रा सिंह के सोलो गानों की ओर। "ये तेरा घर, ये मेरा घर", "क्यों ज़िन्दगी की राह में मजबूर हो गए", "तुम आओ तो सही", "वो नहीं मिलता मुझे", "सारे बदन का खून", "दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है", "दिल ही तो है", "हर एक बात पर कहते हो", ये सारी कुछ ऐसी नज़्में और गज़लें हैं जो बरबस ही चित्रा जी की मखमली आवाज़ का दीवाना बना देती हैं। इनकी आवाज़ में है ही ऐसा जादू कि कोई एक बार सुन ले तो फिर इनका फ़ैन हो जाए। इससे पहले कि इस जादू का असर कम हो, हम आपको आज की गज़ल से मुख़ातिब कराते हैं।

आज की गज़ल चित्रा जी के संगीत सफ़र के अंतिम दिनों की गज़ल है। १९९० में जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की साथ में एक एलबम आई थी.. "समवन समवेयर(someone somewhere)"| इस एलबम में शामिल सारी ग़ज़लें एक से बढ़कर एक थीं। यूँ तो हर ग़ज़ल का मजमून मु्ख्तलिफ़ होता है, लेकिन यह नामुमकिन नहीं कि हरेक गज़ल में कोई न कोई चीज एक जैसी हो। आप खुद मानेंगे कि दुनिया में प्यार एक ऐसी ही चीज है, जो ना चाहते हुए भी सब कुछ में शामिल है। "फ़ासला तो है मगर कोई फ़ासला नहीं" - यह ग़ज़ल भी इसी प्यार के कोमल भावों से ओत-प्रोत है। "शमिम करबानी" साहब ने हर प्रेमी की दिली ख़्वाहिश कागज़ पर उतार दी है। कहते हैं कि अगर आपके पास प्यार है तो आपको और कुछ नहीं चाहिए। शायद यही विश्वास है जो किसी प्रेमी को दुनिया से बग़ावत करा देता है। मंझधार में फ़ँसा आशिक़ बस अपने इश्क़ और अपने ख़ुदा को पुकारता है, नाख़ुदा की तरफ़ देखता भी नहीं। और वैसे भी जिसकी पु्कार इश्क़ ने सुन ली उसे औरों की क्या जरूरत...फिर चाहे वह "और" कोई ख़ुदा ही क्यों न हो!!!

तो अगर आपका इश्क़ चुप है, आपका हबीब ख़ामोश है तो पहले उसे मनाइये, ख़ुदा का क्या है, इश्क़ उसे मना ही लेगा:

तुम बोलो कुछ तो बात बने,
जीने लायक हालात बने।

ये तो हुए मेरे जज़्बात, अब हम "शमिम" साहब के जज़्बातों में डूबकी लगाते हैं और जगजीत-चित्रा के मौजों का मज़ा लेते हैं:

फ़ासला तो है मगर कोई फ़ासला नहीं,
मुझसे तुम जुदा सही, दिल से तो जुदा नहीं।

आसमां की फ़िक्र क्या, आसमां ख़फ़ा सही,
आप ये बताइये, आप तो खफ़ा नहीं।

कश्तियाँ नहीं तो क्या, हौसले तो पास हैं,
कह दो नाखुदाओं से, तुम कोई ख़ुदा नहीं।

लीजिए बुला लिया आपको ख़्याल में,
अब तो देखिये हमें, कोई देखता नहीं।

आइये चराग़-ए-दिल आज ही जलाएँ हम,
कैसी कल हवा चले कोई जानता नहीं।





’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

बुधवार, 22 जून 2016

"हमारे देश में बहुत सारा टेलेंट है और उन्हें मौके मिलने चाहिए" -सिद्धार्थ बसरूर : एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है (16)

Siddharth Basrur
हौंटड ३, कट्टी बट्टी, फोबिया, हैप्पी एंडिंग, और अभी हाल ही में रमन राघव २.० में पर्व्श्गायन कर गायक सिद्धार्थ बसरूर में गायन की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बना ली है. राम संपत, शंकर एहसान लोय, और सचिन जिगर जैसे बड़े संगीतकारों के साथ काम  कर चुके सिद्धार्थ है हमारे आज के ख़ास मेहमान, मिलिए इस उभरते हुए गायक से "एक मुलाकात ज़रूरी है" के आज के एपिसोड में. 


एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें 

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