Saturday, July 4, 2015

"मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है" - क्यों दो बार रेकॉर्ड हुआ था यह गीत?


एक गीत सौ कहानियाँ - 62

 

मेरी आँखों से कोई नींद लिये  जाता है...’ 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 62-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म ’पूजा के फूल’ के सदाबहार गीत "मेरी आँखों से कोई नींद लिये जाता है..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर ने गाया था और राजेन्द्र कृष्ण ने लिखा था।

14 जुलाई 1975 को संगीतकार मदन मोहन इस दुनिया से चले गए थे। उनके गए 40 वर्ष बीत गए हैं, पर जब भी जुलाई का यह भीगा महीना आता है, तो उनकी यादें भी झम झम बरसने लगती हैं। मदन मोहन, लता मंगेशकर और सितार वादक उस्ताद रईस ख़ान की तिकड़ी के सुरीले संगम से बनी ग़ज़ल "रस्म-ए-उल्फ़त को निभाएँ तो निभाएँ कैसे" की विस्तृत चर्चा हमने इसी स्तंभ में की है। आज इसी तिकड़ी का एक और अनमोल गीत का ज़िक्र कर रहे हैं। गीत का उल्लेख करने से पहले आपको याद दिलाना चाहूँगा कि "रस्म-ए-उल्फ़त..." के अंक में मदन मोहन और रईस ख़ान का ज़िक्र करते हुए हमने यह जानकारी दी थी कि दोनों के बीच में मनमुटाव हो जाने के बाद दोनों ने न केवल एक दूसरे के साथ काम करना बन्द कर दिया, बल्कि मदन मोहन ने फिर कभी अपने गीतों में सितार का प्रयोग ही नहीं किया। हाल ही में मदन मोहन की पुत्री संगीता जी ने मुझे बताया कि बाद में मदन मोहन जी ने उस्ताद शमीम अहमद से सितार सीखा और अपनी आख़िर की कुछ फ़िल्मों में अहमद साहब से बजाया। आज आपको बताएँगे कि ऐसा क्या हुआ था कि उस्ताद रईस ख़ान के साथ कि उनकी बरसों की जोड़ी, बरसों की दोस्ती टूट गई! 

हुआ यूं कि एक मोड़ पर मदन मोहन को यह लगने लगा कि उनकी महफ़िलों में रईस ख़ान का सिर्फ़ दोस्ती की ख़ातिर सितार बजाना ठीक नहीं है। रईस ख़ान को वो इस तरह बुला कर, सितार बजवा कर दोस्ती का ग़लत फ़ायदा उठा रहे हैं। इसलिए उन्होंने रईस ख़ान को उनका वाजिब मेहनताना देने की सोची। मगर परेशानी यह थी कि अपने दोस्त से पैसों की बात कैसे करे? सो उन्होंने 1973 की एक महफ़िल के बाद अपने मैनेजर से कहा कि वो ख़ान साहब से उनकी फ़ीस के बारे में पूछेंगे। मैनेजर ने रईस ख़ान से पूछा। रईस ख़ान ने उस वक़्त तो कुछ नहीं कहा, मगर उन्हें यह बात बहुत चुभ गई और उन्होंने इसे अपना अपमान मान लिया। अपने दोस्त मदन मोहन से वो इस तरह की उम्मीद नहीं कर रहे थे। रईस ख़ान जितने बेहतरीन कलाकार थे उतने ही तुनकमिज़ाज भी थे। वो चुपचाप बैठने वाले नहीं थे। बात चुभ गई थी। उन्होंने कुछ दिन बाद मदन मोहन को फ़ोन किया और कहा कि उनके एक दोस्त के घर में एक शादी है और शादी के जलसे में गाने के लिए आपको बुलाया है। "तो मदन भाई, आप कितने पैसे लेंगे?" अब चौंकने की बारी मदन मोहन की थी। बहुत अजीब लगा मदन मोहन को कि रईस ख़ान ने उन जैसे कलाकार को शादी में गाने के लिए कह कर उनकी तौहीन कर रहा है। यह तौहीन अब मदन मोहन बर्दाश्त नहीं कर सके। बस यहीं से दोनो के मन में ऐसी खटास पड़ी कि इन दोनों अज़ीम फ़नकारों का साथ सदा के लिए ख़त्म हो गया।

और अब आज के गीत "मेरी आँखों से कोई नींद लिये जाता है..." की कहानी। गाना रेकॉर्ड हो चुका था और मदन मोहन इस गाने से बहुत ख़ुश भी थे। फिर ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने इस गाने को दोबारा रेकॉर्ड करने का फ़ैसला ले लिया? इस गीत में छोटे-छोटे इन्टरल्यूड्स रईस ख़ान ने बजाए। पर मुख्य रूप से पंडित शिव कुमार शर्मा के सन्तूर को बहुत प्रॉमिनेन्टली इस्तेमाल किया गया। रेकॉर्डिंग् हो गई, सबकुछ सही हो गया। अब हुआ यूं कि एक दिन मदन मोहन ने यह गाना रईस ख़ान को दोबारा सुनवाया। गाने का टेप बज रहा था, तभी रईस ख़ान ने अपना सितार उठाया, और गाने के साथ सितार छेड़ने लगे। इस बार नए नए इन्टरल्यूड्स बजने लगे। नई सुर, नई तरकीबें। रईस ख़ान के सितार से इस तरह के सुर सुन कर मदन मोहन का दिल हो गया बाग़-बाग़। उन्होंने फ़ौरन AVM Productions को फ़ोन लगाया और कहा कि वो इस गाने को दोबारा रेकॉर्ड करना चाहते हैं। मदन मोहन रईस ख़ान के बजाए सितार के पीसेस से इतना मुतासिर हो गए कि जिस गाने को रेकॉर्ड करके मुतमइन थे, उस गाने को एक बार फिर से रेकॉर्ड करने की ठान ली। लीजिए, अब आप वही गीत सुनिए।



फिल्म पूजा के फूल : 'मेरी आँखों से कोई नींद लिये जाता है...' : लता मंगेशकर : मदन मोहन : राजेन्द्र कृष्ण




आभार: सुहाना सफ़र विथ अन्नु कपूर

अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 





Sunday, June 28, 2015

मियाँ की मल्हार : SWARGOSHTHI – 225 : MIYAN KI MALHAR







स्वरगोष्ठी – 225 में आज

रंग मल्हार के – 2 : राग मियाँ मल्हार

‘बिजुरी चमके बरसे मेहरवा...’ और ‘बोले रे पपीहरा...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी नई लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’, जारी है। श्रृंखला के दूसरे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की दूसरी कड़ी में हम मल्हार अंग के ही सबसे लोकप्रिय राग मियाँ मल्हार पर चर्चा करेंगे। राग मियाँ मल्हार भी एक प्राचीन राग है। ऐसी मान्यता है कि अकबर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन ने इस राग को परिष्कृत कर लोकप्रिय किया था। इसीलिए वर्तमान में मल्हार अंग के इस राग का नामकरण उनके नाम से ही प्रचलित है। आज के अंक में हम आपके लिए राग मियाँ मल्हार में निबद्ध एक मोहक खयाल रचना सुविख्यात गायक उस्ताद राशिद खाँ के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके अलावा 1971 में प्रदर्शित हिन्दी फिल्म ‘गुड्डी’ से इसी राग में पिरोया एक मधुर गीत भी सुपरिचित पार्श्वगायिका वाणी जयराम की आवाज़ में सुनवा रहे हैं।

ल्हार अंग के रागों में राग मेघ मल्हार, मेघों का आह्वान करने, मेघाच्छन्न आकाश का चित्रण करने और वर्षा ऋतु के आगमन की आहट देने में सक्षम राग माना जाता है। वहीं दूसरी ओर राग मियाँ मल्हार, वर्षा ऋतु की चरम अवस्था के सौन्दर्य की अनुभूति कराने पूर्ण समर्थ है। यह राग वर्तमान में वर्षा ऋतु के रागों में सर्वाधिक प्रचलित और लोकप्रिय है। सुप्रसिद्ध इसराज और मयूरी वीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार- राग मियाँ मल्हार की सशक्त स्वरात्मक परमाणु शक्ति, बादलों के परमाणुओं को झकझोरने में समर्थ है। राग मियाँ मल्हार के बारे में जानकारी देते हुए पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने हमें बताया कि यह राग काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। आरोह और अवरोह में दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। राग मियाँ की मल्हार के स्वरों का ढाँचा कुछ इस प्रकार बनता है कि कोमल निषाद एक श्रुति ऊपर लगने लगता है। इसी प्रकार कोमल गान्धार, ऋषभ से लगभग ढाई श्रुति ऊपर की अनुभूति कराता है। इस राग में गान्धार स्वर का प्रयोग अत्यन्त सावधानी से करना पड़ता है। राग मियाँ की मल्हार को गाते-बजाते समय राग बहार से बचाना पड़ता है। परन्तु कोमल गान्धार का सही प्रयोग किया जाए तो इस दुविधा से मुक्त हुआ जा सकता है। इन दोनों रागों को एक के बाद दूसरे का गायन-वादन कठिन होता है, किन्तु उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने एक बार यह प्रयोग कर श्रोताओं को चमत्कृत कर दिया था। इस राग में गमक की तानें बहुत अच्छी लगती है। राग मियाँ की मल्हार तानसेन के प्रिय रागों में से एक है। कुछ विद्वानों का मत है कि तानसेन ने कोमल गान्धार तथा शुद्ध और कोमल निषाद का प्रयोग कर इस राग का सृजन किया था। अकबर के दरबार में तानसेन को सम्मान देने के लिए उन्हें ‘मियाँ तानसेन’ नाम से सम्बोधित किया जाता था। इस राग से उनके जुड़ाव के कारण ही मल्हार के इस प्रकार को ‘मियाँ मल्हार’ कहा जाने लगा। इस राग के बारे में चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले आइए सुनते हैं, राग मियाँ की मल्हार में एक भावपूर्ण रचना। आपके लिए हम प्रस्तुत कर रहे हैं, उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में तीनताल में निबद्ध, मियाँ मल्हार की एक मनमोहक रचना।


राग मियाँ मल्हार : ‘बिजुरी चमके बरसे मेहरवा...’ : उस्ताद राशिद खाँ




राग मियाँ मल्हार में वर्षा ऋतु के प्राकृतिक सौन्दर्य को स्वरों के माध्यम से अभिव्यक्त करने की अनूठी क्षमता होती है। इसके साथ ही इस राग का स्वर-संयोजन, पावस के उमड़ते-घुमड़ते मेघ द्वारा विरहिणी नायिका के हृदय में मिलन की आशा जागृत होने की अनुभूति भी कराते हैं। यह काफी थाट का और सम्पूर्ण-षाड़व जाति का राग है। अर्थात; आरोह में सात और अवरोह में छः स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में शुद्ध गान्धार का त्याग, अवरोह में कोमल गान्धार का प्रयोग तथा आरोह और अवरोह दोनों में शुद्ध और कोमल दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। आरोह में शुद्ध निषाद से पहले कोमल निषाद तथा अवरोह में शुद्ध निषाद के बाद कोमल निषाद का प्रयोग होता है। राग के स्वरों में प्रकृति के मनमोहक चित्रण की और विरह की पीड़ा को हर लेने की अनूठी क्षमता होती है।

वास्तव में पावस के उमड़ते-घुमड़ते मेघ विरह से व्याकुल नायक-नायिकाओं की विरहाग्नि को शान्त करते हैं और मिलन की आशा जगाते हैं। कई फिल्म संगीतकारों ने इस राग पर आधारित यादगार गीतों की रचना की है। ऐसे ही संगीतकारों में एक अग्रणी नाम बसन्त देसाई का है। हिन्दी और मराठी फिल्मों में राग आधारित गीत तैयार करने में इस संगीतकार का कोई विकल्प नहीं था। महाराष्ट्र के एक कीर्तनकार परिवार में 1912 में जन्में बसन्त देसाई ने मात्र 17 वर्ष की आयु में ही फिल्मों में प्रवेश किया था। प्रभात स्टूडिओ की फिल्म ‘खूनी खंजर’ बतौर अभिनेता और स्टूडिओ सहायक उनकी पहली फिल्म थी। सहायक संगीतकार के रूप उनकी प्रतिभा का परिचय कई मराठी फिल्मों में मिला। स्वतंत्र संगीतकार के रूप में 1942 में वाडिया मूवीटोन की फिल्म ‘शोभा’, 1943 में प्रदर्शित फिल्म ‘आँख का शर्म’, 1943 में बसन्त पिक्चर्स की फिल्म ‘मौज’ के माध्यम से अपनी पहचान बनाने में सफल रहे। 1943 में ही राजकमल कलामन्दिर की चर्चित फिल्म ‘शकुन्तला’ ने तो उन्हें फिल्म जगत में स्थापित ही कर दिया। इस फिल्म के गीतों में उनका रागों के प्रति अनुराग स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। रागदारी संगीत के प्रति उनका लगाव उनकी अन्तिम फिल्म ‘शक’ तक निरन्तर बना रहा। विशेष रूप से मल्हार अंग के रागों से उन्हें खूब लगाव था। 1971 में ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी फिल्म ‘गुड्डी’ में राग मियाँ की मल्हार के स्वरों की चाशनी में लिपटा गीत ‘बोले रे पपीहरा...’ तो कालजयी गीतों की सूची में शीर्षस्थ है। आज हम आपको यही गीत सुनवाते हैं। राग मियाँ की मल्हार की ही एक पारम्परिक बन्दिश ‘बोले रे पपीहरा अब घन गरजे...’ से प्रेरित फिल्म ‘गुड्डी’ का यह गीत वाणी जयराम की स्वर-प्रतिभा से सुसज्जित है। कहरवा ताल में निबद्ध, राग मियाँ की मल्हार के स्वरों से स्पंदित यह गीत आप भी सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग - मियाँ मल्हार : ‘बोले रे पपीहरा...’ : फिल्म – गुड्डी : स्वर - वाणी जयराम





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 225वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक पुरानी फिल्म में शामिल खयाल का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 230 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – गीत के इस अंश को सुन कर किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायिका की आवाज़ को पहचान सकते हैं? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 4 जुलाई, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 227वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 223वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको पुरुष कण्ठ-स्वर में खयाल अंग की एक रचना का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मेघ मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल झपताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती

इस बार की पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। दो सही उत्तर देने वाली संगीत-प्रेमी हैं- वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। पहेली के एक प्रश्न का सही उत्तर रायपुर, छत्तीसगढ़ से राजश्री श्रीवास्तव ने दिया है। पाँचों  प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’ जारी है। अगले अंक में हम वर्षा ऋतु के एक अन्य राग के साथ उपस्थित होंगे। इस श्रृंखला के लिए आप अपने पसंद के गीत, संगीत और राग की फरमाइश कर सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों के अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 



Saturday, June 27, 2015

संगीतकार अनिल बिस्वास पर तुषार भाटिया से सुजॉय चटर्जी की बातचीत

बातों बातों में - 09

संगीतकार अनिल बिस्वास पर तुषार भाटिया से सुजॉय चटर्जी की बातचीत

"कुछ और ज़माना कहता है..." 




नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते; काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रॄंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज प्रस्तुत है फ़िल्म जगत के भीष्म पितामह का दर्जा रखने वाले महान व प्रसिद्ध संगीतकार अनिल बिस्वास पर प्रसिद्ध सितार वादक व संगीतकार तुषार भाटिया से की गई हमारी टेलीफ़ोनिक बातचीत के सम्पादित अंश।  




तुषार जी, नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है आपका 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' में।

नमस्कार!

तुषार जी, सब से पहले तो आपका आभार व्यक्त करूँगा जो आपने हमें समय दिया। महान संगीतकार अनिल बिस्वास जी के बारे में आज हम आपसे जानेंगे इस बातचेत के दौरान।

मुझे बहुत ख़ुशी होगी अनिल दा के बारे में बताते हुए।

मैंने आपकी अनिल दा से की हुई बातचीत पर आधारित विविध भारती की शृंखला 'रसिकेशु' कई बार सुनी है, और जितनी बार भी इसे सुने, उतना ही अच्छा लगता है हर बार।

धन्यवाद! 'रसिकेशु' के बनने की भी एक लम्बी कहानी है, अगर बताने लगूँ तो बहुत समय निकल जाएगा आपका।


कोई बात नहीं, मैं जानना चाहूँगा, बहुत अच्छा लगेगा मुझे अनिल दा के बारे में जानकर। और सिर्फ़ मुझे ही क्यों, हमें पूरा यकीन है कि गुज़रे ज़माने के सभी संगीत रसिकों को अनिल दा के बारे में जानकर बेहद ख़ुशी होगी। क्या वो आपके फ़ेवरीट संगीतकार रहे हैं?

फ़ेवरीट अनिल दा थे और होने ही चाहिए। वो सर्वश्रेष्ठ और सर्वोपरी संगीतकार थे। ऐसा एक बार पंडित नरेन्द्र शर्मा जी ने ही कहा था। और परम आदरणीय आर. सी. बोराल साहब व पंकज मल्लिक साहब के बाद अनिल दा ही तो थे। ऐसी विलक्षण बुद्धि कभी कभार ही पैदा होती है।

अमीन सायानी साहब ने अनिल दा पर केन्द्रित एक रेडियो कार्यक्रम में उन्हें फ़िल्म संगीतकारों के भीष्म-पितामह कह कर संबोधित किया था?

जी, लेकिन अनिल दा अपने आप को 'अंकल ऑफ़ फ़िल्म म्युज़िक' कहते थे; 'फ़ादर ऑफ़ फ़िल्म म्युज़िक' का ख़िताब उन्होंने आर. सी. बोराल साहब तथा पंकज मल्लिक साहब को दे रखा था।

अच्छा तुषार जी, बताइए कि आप रेडियो से पहली बार कब जुड़े थे?

ऐसा हुआ था कि पंडित पन्नालाल घोष पर 'संगीत सरिता' में एक सीरीज़ हुया था एक हफ़्ते का, जिसके आख़िर के दो एपिसोड्स मैंने किए थे। इस कार्यक्रम की प्रोड्युसर छाया गांगुली जी थीं जिन्होंने मुझे इस सीरीज़ को करने की दर्ख्वास्त की। इस सीरीज़ का विषय था 'पंडित पन्नालाल घोष का फ़िल्म संगीत में योगदान'। उस समय मुझे रेडियो का कोई अनुभव नहीं था, रेडियो में कैसे बोलते हैं, किस तरह की भाषा होती है, कुछ पता नहीं था। फिर भी ज़्यादा परेशानी नहीं हुई क्योंकि पढ़के बोलना था| उस सीरीज़ का बहुत अच्छा रेसपॉन्स मिला, बहुत सारे श्रोताओं के पत्र भी मिले।

'रसिकेशु' किस तरह से प्लैन हुई और इस सीरीज़ के लिए आपको कैसे चुना गया, इसकी कहानी हम बाद में आप से पूछेंगे, पहले बताइए कि आपका ने अनिल दा से, मेरा मतलब है उनके गीतों से रु-ब-रु किस उम्र में और किस तरह से हुए थे, और किस तरह से आप अनिल दा के गीतों को सुनने लगे?

'बसंत', 'क़िस्मत', और 'तराना' जैसी फ़िल्मों के गानें मुझे आते थे, और मुझे ये गानें बहुत पसंद थे। लेकिन ज़्यादा गानें सुनने का मौक़ा नहीं मिलता था, इसलिए मै उनके काम से ज़्यादा वाक़िफ़ नहीं था। लेकिन जितना भी सुना था, वो बेहद पसंद था। मेरे मामाजी के घर में दो रेकॊर्ड्स थे, और मैं छुट्टियों में उनके घर जाया करता था; और उन रेकॉर्ड्स को अपने साथ लेकर आता था कैसेट में रेकॉर्ड करने के लिए। एक रेकॉर्ड में "बलमा जा जा जा" गीत था जिसमें खयाल और दादरे का क्या सुंदर मिश्रण था। दूसरे रेकॉर्ड में 'तराना' के दो गीत थे, एक तरफ़ "सीने में सुलगते हैं अरमान" और दूसरी तरफ़ "नैन मिले नैन हुए बावरे", और यह दूसरा गीत मुझे बेहद पसंद था। उन दिनों गानें रेडियो पर ही सुन सकते थे, विविध भारती या रेडियो सीलोन, दूसरा कोई ज़रिया नहीं था। या फिर टीवी पर जो पुरानी फ़िल्में आती थीं, उनमें गानें सुन सकते थे। 'छोटी छोटी बातें', 'तराना, 'आराम', 'परदेसी', 'स्वयमसिद्धा' जैसी फ़िल्मों के गानें मैं टी.वी से रेकॉर्ड कर लिया करता था। फिर 1979 में एक एल.पी रेकॉर्ड निकला 'Songs to Remember' जिसमें अनिल दा के कुल 12 गानें थे। 1974-75 तक मैं नौशाद साहब, ओ.पी.नय्यर साहब, रोशन साहब और सलिल दा का बहुत बड़ा भक्त बन चुका था। लेकिन जब मैंने उस एल.पी रेकॊर्ड में शामिल "पी बिन सूना" सुना जो राग जोगिया पर आधारित था, तो मैं चमत्कृत हो गया। फिर और भी गानें जैसे कि "रूठ के तुम तो चल दिए", "ज़माने का दस्तूर है ये पुराना", "आ मोहब्बत की बस्ती बसाएँगे हम", "मोहब्बत तर्क की मैंने" जैसे गानें सुना, तो जैसे वो इंद्रासन डोल गया जिसमें मैंने बाक़ी सब दिग्गज संगीतकारों को बिठा रखा था। इसलिए मैंने उस रेकॉर्ड को कहीं छुपा दिया।

यानी कि आपके दिल को यह गवारा न था कि नौशाद साहब, नय्यर साहब, सलिल दा, इनसे भी ज़्यादा कोई पसंद आ रहा है!

बिल्कुल! फिर एक दिन मेरी माताजी ने मुझसे कहा कि तुम उस रेकॉर्ड को क्यों नहीं बजाते? "दूर पपीहा बोला", "बरस बरस बदली" वगेरह? तब मैंने उस रेकॉर्ड को दुबारा बजाना शुरु किया। और उसका आनंद दुगुना हो गया। और वह रेकॉर्ड मेरे जीवन की बहुत ही आनंदायक एक सम्पत्ति बन गई। मैं रोक नहीं पाता था अपने आप को उसे बजाने से। मैं घण्टों उस रेकॉर्ड की मुख्यपृष्ठ पर अनिल दा की तस्वीर को तकता रहता था, कि एक आदमी इतना दिव्य संगीत कैसे दे सकता है, इतना पर्फ़ेक्ट कैसे हो सकता है। हर गाना कमाल का और पंकज बाबू की तरह कोई फ़िल्मीपन नहीं था उनके संगीत में, ऐसा मुझे लगता था।

वाह!

कभी कभी मुझे ऐसा लगता है कि अनिल दा के कम्पोज़िशन्स सुनके दूसरे संगीतकारों ने सारे हथियार डाल दिये होंगे। और उनका संगीत भी क्या है! "बेइमान तोरे नैनवा", "रसिया रे मनबसिया रे", और 'अनोखा प्यार' के गानें, 'गजरे' के गानें।
जी हाँ!

ये सब जो मैं अपनी बातें बता रहा हूँ ये उस दौर की हैं जब आर.डी. बर्मन का ज़माना था। और मैं कॉलेज में था उस वक़्त। यह वह दौर था जब हम लोग राजेश खन्ना, आर. डी. बर्मन और किशोर दा की तिकड़ी का, यानी इनके गानों का मज़ा लेते थे। लेकिन मैं साथ ही साथ पुराने गानों का भी मज़ा लेता था, और ऐसा मुझे फ़ील होता था कि पुराने गानों में जो गहराई थी, वो नये गानों में कम थी। मैंने एक कैसेट में अनिल दा के कई गानें रेकॉर्ड किए टीवी से, रेडियो से। उसमें 'फ़रेब' के लता जी के गाए दो गीत थे। उनमें एक था "जाओगे ठेस लगाके" और दूसरा था एक लोरी, "रात गुनगुनाती है लोरियाँ सुनाती है"। मेरी मौसी के घर पे यह रेकॉर्ड मुझे मिला, और मैं उसे रेकॉर्ड करने के लिए ले आया था। वह कैसेट कोई ले गया और वापस नहीं किया। और 1982 के बाद मैंने ये गानें फिर कभी नहीं सुनें। फिर अनिल दा का 'हमलोग' सीरियल का म्युज़िक आया, आपने सुना होगा, जिसमें मीना कपूर जी ने टाइटल गीत गाया था, "आइए हाथ उठाएँ हम भी"।

जी! मीना जी भी कमाल की गायिका रही हैं।

मेरे भाई श्यामल के अनुसार "कुछ और ज़माना कहता है" अब तक का बेस्ट फ़िल्मी गीत है।

वाह!

फिर एक दिन फ़िल्म 'सौतेला भाई' टीवी पे दिखाई गई जिसका "जा मैं तोसे नाही बोलूँ" मैंने रेकॉर्ड कर लिया। 'सौतेला भाई' के दूसरे या तीसरे हफ़्ते ही 'छोटी छोटी बातें' भी दिखाई गई, जिसका वह गाना था "कुछ और ज़माना कहता है"। इसी फ़िल्म का एक अन्य गीत "मोरी बाली री उमरिया, अब कैसे बीते राम" मैंने पहली बार सुना और सुनते ही रोंगटे खड़े हो गए। यह गीत राग पीलू पर आधारित होते हुए भी जिस तरह से अनिल दा ने इसमें कोमल निषाद का प्रयोग किया है, वह क़ाबिल-ए-तारीफ़ है। पीलू राग में आमतौर से शुद्ध निषाद बहुत प्रबल होता है, जैसे फ़िल्मी गीतों में आपने सुना होगा। कानन देवी का "प्रभुजी प्रभुजी तुम राखो लाज हमारी" (हॉस्पिटल), सहगल साहब का "काहे गुमान करे" (तानसेन), नौशाद साहब का बनाया हुआ "ओ चंदन का पलना" (शबाब), और "मोरे सैंयाजी उतरेंगे पार हो नदिया धीरे बहो" (उडन खटोला), इत्यादि इसके उदाहरण हैं। लेकिन अनिल दा के इस गीत में, "अब कैसे बीते राम, रो रो के बोली राधा मोहे तज के गयो श्याम", यह सांगीतिक वाक्य कोमल निशाद पे रुकता है। अनिल दा ने कैसे सोचा होगा इसको। और भी बहुत से संगीतकार हुए जिन्होंने शास्त्रीय संगीत पर गानें बनाये, लेकिन अनिल दा की बात ही अलग थी। उनके काम में एक नया दृष्टिकोण मुझे नज़र आता था। तो मैं एक एकलव्य की तरह अनिल दा को मन ही मन पूजता था। संगीत सृजन की रुचि होने की वजह से मेरा दृष्टिकोण एक विद्यार्थी की तरह होता था और मैं सोचता रहता था उनके बारे में। फिर 1984 में जब मैंने सुना "लूटा है ज़माने ने क़िस्मत ने रुलाया है" (दोराहा), वहाँ भी पाया कि कोमल धैवत का प्रयोग अनोखा है। मुझे अनिल दा और नौशाद साहब के कम्पोज़िशन्स के हर पहलू में सिर्फ़ पर्फ़ेक्शन ही नज़र आता। क्या ग़ज़ब की पकड़ थी इनकी अपने फ़न पर?

वाह! बहुत ही अच्छी तरह से आपने बताया कि किस तरह से आप अनिल दा के भक्त बनें। ये तो थी कि किस तरह से आपने अनिल दा के गीतों को सुनना शुरु किया, सुनते गये, उन्हें और उनके संगीत को खोजते गये, लेकिन उनसे आपकी पहली मुलाक़ात कब और कहाँ हुई थी? किस तरह की बातचीत होती थी आप में?

मैं उस वक़्त HMV में था और अनिल दा दिल्ली से बम्बई आये थे किसी भजन के रेकॉर्डिंग के लिए। और तब मैंने पहली बार उनसे मिला। यह बात 1986 की है। उस समय मैं HMV में उन्हीं के गीतों का एक ऐल्बम कम्पाइल कर रहा था, जिसका शीर्षक था 'Vintage Favourites - Anil Biswas'। मैं चाहूँगा कि इस कैसेट/ सीडी का कवर आप अपने पाठकों को ज़रूर दिखाएँ।

ज़रूर!




बाद में भी जब भी वो बम्बई आते थे, तब भी मिलता था, लेकिन मैं उनका लिहाज़ करता था, इसलिए उनसे ज़्यादा बात़चीत या सवाल नहीं पूछता था। मैं सोचता रहता था कि कैसे रहे होंगे अनिल बिस्वास! ये कैसे संभव है कि संगीत की कोई विधा ऐसी नहीं जिसे उन्होंने छोड़ा हो, अनिल दा का तो मामला ही कुछ अलग है! वो जो कुछ भी बोलते थे, वो बड़ा मार्मिक होता था, और उनके बोलने की छटा भी कमाल की थी। पाँचों भाषाओं में उनकी ज़बरदस्त पकड़ थी - हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी, बांगला और बृज भाषा। और इन भाषाओं में अच्छा काव्य लिखते भी थे। और ज़बान भी इतनी साफ़ कि सामने वाला दंग रह जाए! बहुत ही गहरा अध्ययन था काव्य का। और हिंदी से लेके उर्दू के बड़े बड़े कवियों, शायरों के साथ हुए उनके काम से मैं अच्छी तरह वाक़ीफ़ था, जैसे कि आरज़ू लखनवी, सफ़दार आह, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, पंडित नरेन्द्र शर्मा, कवि प्रदीप। साथ ही कबीर, मीरा, तुलसीदास के काव्य की भी उतनी ही गहरी जानकारी थी उनको। 'रसिकेशु' में भी उन्होंने एक दोहा कहा था अगर आपको याद है तो, "खरी बात कबीरा कहीगा, अंधाउ कहे अनूठी, बची खुची सो गुसैया कहीगा, बाकी सब बाता झूठी"।

बहुत ख़ूब। यानी कबीरदास, सूरदास और तुलसीदास, बाकी सब बकवास! अच्छा, 'रसिकेशु' के लिए अनिल दा से आपकी किस साल मुलाक़ात हुई थी और किस तरह से 'रसिकेशु' प्लैन हुई थी?

'रसिकेशु' के लिए अनिल दा से हमारी मुलाक़ात हुई 1996 में। पंडित पन्नालाल घोष के उस प्रोग्राम का इतना अच्छा रेस्पॊन्स मिला कि उसके बाद छाया जी ने मुझसे कहा कि वो अनिल दा पर भी प्रोग्राम करने की इच्छुक हैं। छाया जी जानती थीं कि अनिल दा से मेरी मुलाक़ातें होती थीं, और उन्होंने मुझसे उनसे मिलवाने को कहा। तो अगली बार जब अनिल दा बम्बई आये और हर साल की तरह उस बार भी उनके सम्मान में एक लंच का आयोजन हुआ था डॉ. जोशी के घर पे, तो मैं छाया जी को लेकर वहाँ गया।

तुषार जी, माफ़ी चाहूँगा टोकने के लिए, आगे बढ़ने से पहले यह बताइए कि छाया गांगुली जी को आप पहले से ही जानते थे?

जी हाँ, महादेवी वर्मा जी और पंडित नरेन्द्र शर्मा के कुछ गानें मैंने कम्पोज़ किए थे जिन्हें छाया जी गा चुकी थीं। हमारा एक दूसरे के घर आना जाना था। और पन्ना बाबू पर उस प्रोग्राम के लिए भी छाया जी ने ही मुझसे आग्रह किया था।

अच्छा अच्छा! अब बताइए आगे उस लंच में फिर क्या हुआ।

उस लंच में तो फिर कुछ बात नहीं हुई, बस एक appointment fix हुआ मेरा और छाया जी का अनिल दा के साथ। फिर हम अगले दिन शाम को उनसे मिलने गए और छाया जी ने उनसे इंटरव्यु की बात छेड़ी। अनिल दा ने पूछा कि इंटरव्यु कौन करेगा? तुषार, तुम सुझाओ। मैंने ब्रॉडकास्टिंग्‍ की दुनिया के दो बहुत मशहूर नाम सुझाये। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। मेरे मन में कहीं न कहीं एक ऐसी इच्छा भी थी कि काश नौशाद साहब यह इंटरव्यु करते। यह बात तो जगविदित है कि नौशाद साहब अनिल दा को अपना गुरु समझते थे। अगर ये दो दिग्गजों की बातचीत रेडियो पर लोग सुनेंगे तो इससे बेहतर तो कोई बात हो ही नहीं सकती थी। वैसे भी आर. सी. बोराल, पंकज मल्लिक और अनिल बिस्वास के बाद नौशाद साहब का ही तो नाम आता है, जिन्हें हम फ़िल्म संगीत के प्रचलित धारा के पायनीयर या युग-प्रवर्तक संगीतकार कह सकते हैं। तो मैं ये सब सोच ही रहा ही था कि काश ऐसा कुछ हो सके कि अचानक फ़ोन बजा। मैंने फ़ोन उठाया। उधर से आवाज़ आई, "क्या वहाँ अनिल बाबू तशरीफ़ रखे हुए हैं? मैंने पूछा कि आप कौन साहब बोल रहे हैं? दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई, "जी मुझ नाचीज़ को नौशाद अली कहते हैं"। उस वक़्त मेरी क्या हालत हुई होगी इसका आप अंदाज़ा लगा सकते हैं। मेरे लिए तो वर्णन के बाहर है। मैंने फ़ोन पे हाथ रख अनिल दा से कहा कि नौशाद साहब का फ़ोन है। तो अनिल दा ने मुझसे सवाल किया कि वो क्या कह रहे हैं? अब मैं नौशाद साहब से ये बात कैसे पूछता? अर्जुन को विश्वरूप दर्शन जो हुए थे, उनके सामने एक भगवान श्री कृष्ण थे, मेरे सामने दो थे। तो मैंने बहुत ही संकोच के साथ यह बात नौशाद साहब से पूछी। उन्होंने अपनी लखनवी तहज़ीब में अर्ज़ किया, "अगर अनिल बाबू फ़ारिक़ हों तो मैं आदाब-ओ-सलाम के लिए हाज़िर हो जाऊँ|" न जाने ये कैसी ग्रहदशा थी! दिल में उस इंटरव्यु की बात थी, और अगर इस वक़्त नौशाद साहब यहाँ आ जाएँ तो कोई बात बन भी जाए क्या पता! जब मैंने अनिल दा से कहा कि नौशाद साहब आकर मिलना चाहते हैं, तो अनिल दा बोले कि "फ़ोन ला"। फिर फ़ोन पर बात करने लगे, मुझे उस तरफ़ की बातें तो सुनाई नहीं दी, इस तरफ़ से दादा कहने लगे 'जीते रहो... आज रहने दो, बच्चे आये हैं, रेडियो पर इंटरव्यु की बात कर रहे हैं....."। छाया जी ने फिर पूछा कि इंटरव्यु किससे करवाना है? अनिल दा ने देर तक मेरी तरफ़ देखा और अचानक बोल उठे कि यह इंटरव्यु तुषार करेगा। मैं चौंक पड़ा। मैंने कहा, "दादा, मुझे तो कोई तजुर्बा नहीं"। तो अनिल दा भड़क उठे, कहने लगे, "तेरी यह मजाल, तू मुझे ना कह रहा है?" मैंने कहा, "दादा, आपको सवालात करने की मेरी क्या औक़ात है।" तो कहने लगे कि तूने जो पंडित पन्नालाल घोष पे प्रोग्राम किया था वो मैंने सुना था, I have heard it, I know about it'। उन्होंने छाया जी से कहा कि अगर तुषार करेगा तो ही मैं इंटरव्यु दूँगा। इसके बाद मेरे पास कोई चारा न था। मैं तो केवल छाया जी को उनसे मिलवाने ले गया था और उन्होंने पूरी ज़िम्मेदारी ही मेरे सर डाल दी।

कैसा लग रहा था आपको उस वक़्त जब इतना बड़ा मौका आपको मिला?

क्या बताऊँ मैं कि कितना टेन्शन दिया दादा ने मुझे! मेरे सामने तीन मसले थे। एक तो संगीत का महासागर मेरे सामने लहरा रहा था जिसे मुझे दुनिया के सामने पेश करना था। दूसरा मसला था समय का। मेरे पास प्रिपेयर्ड होने का टाइम नहीं था, क्योंकि इंटरव्यु दूसरे-तीसरे दिन ही था। और तीसरा मसला यह था कि दादा न अपने बारे में बोलना चाहते थे और ना मैं उनकी तारीफ़ कर सकता था। अनिल दा को अपनी तारीफ़ से नफ़रत थी। यह उनका तजुर्बा था कि उन्होंने मुझमें कुछ देख लिया था जिसकी वजह से उन्होंने मुझे इस महान कार्य के लिए चुना। अब मेरे लिए मुश्किल की घड़ी थी। दूसरे दिन मेरे घर में शादी थी और उसी दिन शाम को मुझे और छाया जी को उनसे जाकर मिलना था। मुझे यह सोचकर बुखार आ गया था कि दादा का इंटरव्यु कैसे करूँगा, क्योंकि वो कोई ऐसे वैसे कलाकार नहीं थे, वो भारत के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार थे। और उनसे वो सब सवाल नहीं पूछ सकते थे जो किसी भी आम इंटरव्यु में एक जर्नलिस्ट कलाकार को पूछते हैं। मुझे ऐसे सवाल पूछने थे जो उनके बारे में भी ना हो लेकिन उनका साहित्य और संगीत पे जो आधिपत्य है, जो महारथ उन्हें हासिल है, वो सब दुनिया के सामने रख सकूँ। जो विराट दर्शन मुझे हो रहा था, मैं चाहता था कि वही दर्शन लोगों को भी इस कार्यक्रम के ज़रिए हो। और एक बात यह भी थी कि अनिल दा बहुत सालों के बाद रेडियो में आ रहे थे। न जाने उनको मुझ पर इतना भरोसा कैसे हो गया था, यह बात मुझे समझ में नहीं आ रही थी। ख़ैर, छाया जी का प्लैन था कि यह शृंखला तीन से सात एपिसोड्स में पूरी हो जाए।

लेकिन यह शृंखला तो 26 एपिसोड्स की थी न?

हाँ। तो मैं सोच में पड़ गया कि किस तरह से इंटरव्यु के मामले को आगे बढ़ाया जाये। कौन कौन से विषय चुने जायें, मैंने अनिल दा से पूछा। उन्होंने कहा कि कल आ जाओ। शाम को जब मैं और छाया जी उनके घर गये, तो दादा बहुत ही एक्साइटेड थे। उन्होंने एक लिस्ट बनाई थी संगीतकारों की। बड़े उत्साह से वो कहने लगे कि मैं आर. सी. बोराल साहब से शुरु करूँगा, फिर पंकज मल्लिक साहब से आगे बढ़ाऊँगा, वगेरह वगेरह। मैं और छाया जी एक दूसरे की तरफ़ देखने लगे कि तीन कड़ियों की यह शृंखला तो दादा पर है, पर वो तो दूसरे संगीतकारों की बातें किए जा रहे हैं। आप देखिए, उस वक़्त उनकी उम्र 85 वर्ष थी, फिर भी कितना जोश था उनमें। फिर पूछने लगे, और लिखते गये, सहगल साहब, कानन देवी....। पूछा कि हम पंकज बाबू के कौन से गानें बजाएँगे? शुरुआत तो "मैं क्या जानू क्या जादू है" से ही करूँगा, फिर 'डॉक्टर' फ़िल्म का "गुज़र गया वो ज़माना" आएगा, और फिर मुझसे पूछा कि पंकज दा का और कौन सा गीत रखें। मैंने कहा कि कविगुरु रबीन्द्रनाथ की कविता, पंकज दा की बनाई हुई धुन पे, "दिनेर शेषे घूमेर देशे"। मैं क्या बताऊँ, काश उस वक़्त मेरे पास कैमरा होता, उनके चेहरे पर जो एक्स्प्रेशन आया! बोल पड़े, "लाजवाब! इससे अच्छा तो कुछ हो ही नहीं सकता"। दादा "दिनेर शेषे घूमेर देशे" को गुनगुनाना शुरु किया और धीरे धीरे उनकी आँखें भरने लगीं, और आँसू बहने लगे। मैं और छाया जी बहुत चिंतित हो गये कि इतने भावावेश में कहीं उनकी तबीयत ख़राब ना हो जाये। शाम के 6:30 बज रहे थे, जाड़े का मौसम था। वो रोते गये और गाते गये। मीना दीदी ने दादा को आगे गाने से मना किया। लेकिन अनिल दा ने कहा कि नहीं मैं गाऊँगा, ज़रूर गाऊँगा। वो कहाँ सुनने वाले थे। मीना दी के रोकने के बावजूद अनिल दा ने गाना बंद नहीं किया और मुझसे अंतरे के शब्द पूछे। मैंने कहा, "दादा, रहने दीजिए आज।" कहने लगे, "तू अंतरा बता"। मैंने कहा, "घौरे जारा जाबार तारा कौखोन गैछे घौर पाने...." कहने लगे, "ये तो मेरी ज़िंदगी की कहानी है; क्या अनिल बिस्वास नाम का प्राणी ऐसी धुन बना पाएगा? कदापि नहीं।" उन्होंने इतना ईमोशनल होकर गाया कि क्या बताऊँ। ज़रा सोचिये कि क्या आलम होगा वह, रबीन्द्रनाथ की कविता, पंकज बाबू की धुन, गाने वाले अनिल दा, और शब्द पूछे जा रहे थे तुषार भाटिया से, और सुनने वालों में मीना दी और छाया जी, यानी दो सशक्त गायिकाएँ। यह सोच कर ही जैसे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ख़ैर, आधा घंटा लगा उनको स्वस्थ होने में। छाया जी और मैं सोचने लगे कि यह सीरीज़ दादा पर है लेकिन वो तो अपने बारे में कुछ कह ही नहीं रहे हैं, ना ही अपने गीतों के बारे में। मैंने  हिम्मत करके दादा से पूछा, "दादा, आपके कौन से गानें लें? तो कहने लगे, "मेरे गानों के बारे में मैं क्या बोलूँ, तू ही बोल, तू ही सोच"। तभी मैंने सोच लिया कि मुझे ऐसे सवाल पूछने पड़ेंगे कि जिनमें अनिल बिस्वास नाम के महासागर में छिपा हुआ सर्वश्रेष्ठ संगीतकार, विद्वान, काव्यरसिक तथा संगीत-गुरु लोगों को नज़र आ सके।

वाह!

आर. सी. बोराल साहब से लेकर आर. डी. बर्मन तक उन्होंने एक लिस्ट बनाई थी जिन पर वो बोलना चाहते थे; लेकिन गीतो के चयन की ज़िम्मेदारी उन्होंने मेरे सर पे डाल दी। और उसी शाम को हम बैठ कर गानें सीलेक्ट किए। ये तो थे पहले के 13 एपिसोड्स जो दूसरे संगीतकारों के बारे में थे। ये तो तैयार हो गए। उसी दिन मैंने सोच लिया था कि आर. सी. बोराल, पंकज मल्लिक, कमल दासगुप्ता, खेमचंद प्रकाश और नौशाद पे पूरा पूरा एपिसोड होगा, बाक़ी सब के दो दो कम्बाइन करेंगे, और कम्बिनेशन भी ठीक ठीक बन रहे थे। ये तो थी दूसरों की बातें, मैं तो सोचने लगा कि अब दादा का संगीत कैसे पेश किया जाए! ये सोचते रात बीत गई कि सीरीज़ का स्ट्रक्चर कैसा रखूँ! यह एक बहुत बड़ी चैलेंज थी। आप शायद यकीन नहीं करेंगे कि कुछ भी प्री-प्लैन्ड नहीं था, सबकुछ बिलकुल स्पॊण्टेनियसली हुआ। अलग अलग विषयों पर उनसे सवाल पूछा; संगीत के अलग अलग प्रकार, शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत, जिनके माध्यम से दादा की सोच को बाहर निकालने की कोशिश करता रहा। हर विधा की चर्चा के बाद उसी विधा में दादा का बनाया हुआ गीत पेश करता था। कुछ बातें ज़रूर रह गईं जैसे कि बंदिश की ठुमरी के बारे में चर्चा। मैंने छाया जी से यह कहा भी था कि दादा से पूरी बातचीत रेकॉर्ड कर लेते हैं क्योंकि ऐसा मौक़ा बार बार नहीं आयेगा, बाद में एडिटिंग में बैठेंगे तो सबकुछ देखा जाएगा। और छाया जी भी इसी मत से सहमत थीं।

अच्छा तुषार जी, कितने दिनों में रेकॉडिंग्‍ पूरी हुई थी?

बस दो ही दिनों में, एक दिन चार घण्टे और एक दिन 6-7 घण्टे। लेकिन पूरी एडिटिंग्‍ में 4 महीने लग गये। कई जगहों पर बाद में मैंने डब भी किया, जैसे कि सॊंग्‍ डिटैल्स, और कुछ कुछ चीज़ें जो इंटरव्यु के दौरान बतानी रह गयी थी। संगीत और साहित्य विषयक चर्चाएँ काफ़ी हमें काट देनी पड़ी क्योंकि समय की पाबंदी थी। रेकॊर्डिंग्‍ के दौरान दादा में इतना जोश था कि वो रुकते ही नहीं थे, हमने बस एक आध ब्रेक ही लिया चाय पीने के लिए। इस इंटवयु में मैंने पन्ना बाबू वाले प्रोग्राम जैसी भाषा का इस्तमाल नहीं किया जो पढ़के बोलना था। इसमें तो कुछ भी तय नहीं था। और दादा ने मुझसे कुछ भी नहीं पूछा कि तुम क्या क्या पूछोगे। दादा इंटरव्यु के दौरान ख़ुद तो गाते ही थे, मुझे भी गाने को कहते थे।

अच्छा एक बात बताइए तुषार जी, यह जो शीर्षक है 'रसिकेशु', क्या यह छाया जी या आप ने रखी थी?

बिल्कुल नहीं, यह शीर्षक भी दादा का ही दिया हुआ था, जिसका अर्थ भी उन्होंने बताया था; 'रसिकेशु' यानी रसिकों को समर्पित।

वाह, क्या बात है! अच्छा, इस शृंखला में कुछ एपिसोड्स के बाद से मीना कपूर जी को भी शामिल किया गया था। यह किस तरह से हुआ? क्या यह प्री-प्लैन्ड था या यह भी अकस्मात? कहीं ऐसा तो नहीं कि जिन दो दिनों में रेकॊर्डिंग्‍ हुई थी, उनमें दूसरे दिन मीना जी भी साथ आईं होंगी?

नहीं, मीना दी हमेशा दादा के साथ ही रहती थीं और दोनों दिन वो भी स्टुडियो में तशरीफ़ लायी थीं। मीना दी बहुत ही इंट्रोवर्ट हैं, शाइ हैं। हम लोगों ने उनसे निवेदन किया कि आप भी बातचीत में शामिल हो जाइए। आपने देखा होगा कि उनके इस बातचीत में शामिल हो जाने से पूरी शृंखला में एक अलग रंग आ गया।

जी हाँ!

दीदी के आने से ऐसी बहुत सारी बातें थीं जो मैं ईज़ीली कर सकता था क्योंकि दादा और दीदी, दोनों ही गा गा के, जो भी विषय होता था, उदाहरण देते थे। दोनों के कुशाग्रता की जितनी भी तारीफ़ की जाये कम है। किसी भी विषय पर उनसे दिलचस्प चर्चा हो सकती थी। और हर विषय में उनके पास उदाहरण देने के लिए गानें मौजूद होते थे। दादा के साथ इतने वर्षों की जो औपचारिकता थी, उन्होंने ख़त्म कर दी। इस शृंखला के ज़रिए मैं उनके और भी बहुत करीब आ गया। इस तरह से 'रसिकेशु' पूरी हुई और जब इसका ब्रॉडकास्ट शुरु होने ही वाला था, उसके पिछले दिन मेरा बहुत बड़ा ऑपरेशन था। और दूसरे दिन से मैं रोज़ सुबह अस्पताल में पड़े पड़े 'रसिकेशु' सुना करता था।

इस शृंखला के प्रसारण को अनिल दा और मीना दी ने भी रेडियो पर सुना होगा। क्या उन्होंने अपनी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त की?

मुझे उनका लिखा हुआ एक लेटर आया, जिसमें लिखा हुआ था - "MY DEAR PAGLA, YOUR DIDI SAYS THAT THE EDITING IS PERFECT."

वाह! मीना जी के नाम से उन्होंने ही आपकी तारीफ़ की।

जी हाँ, यही तो उनकी ख़ासीयत थी जो दूसरों में मैंने नहीं देखा। और जब 'रसिकेशु' ब्रॉडकास्ट हुई, तब मुझे भी और रेडियो स्टेशन को भी बहुत सारे लेटर्स आये दुनिया भर से, अमेरिका से, कनाडा से, कई लोगों ने लिखा कि उन्होंने इसे रेकॉर्ड कर अपने पास रखा हुआ है। मुझे इस बात की ख़ुशी हुई कि सब जगह अनिल दा की इस शृंखला के चर्चे होने लगे। और इसके बाद दादा टीवी पर भी आना शुरु हो गए। लोगों को उनके बारे में जानकारी हो गई कि वो कहाँ हैं। गजेन्द्र सिंह जी ने मुझसे दादा का फ़ोन नंबर लेकर उन्हें 'सा रे गा मा' में निमंत्रण दिया। इस बात का गर्व है मुझे कि 'रसिकेशु' करने का मौका मिला और मेरे जीवन की एक बहुत ही अविस्मरणीय घटना है। इसके लिए मैं छाया गांगुली जी को और विविध भारती को जितना धन्यवाद दूँ, कम है। लोगों को यह शृंखला पसंद आई और हर साल यह ब्रॉडकास्ट होती चली आ रही है पिछले 13 सालों से, और यह हमारी सफलता का ही चिन्ह है, इसका मुझे आनंद है।

तुषार जी, आपका मैं किन शब्दों में शुक्रिया अदा करूँ समझ नहीं आ रहा है; जिस विस्तार से और प्यार से आपने अनिल दा के बारे में हमें बताया, 'रसिकेशु' के बारे में बताया, हमें यकीन है कि हमारे पाठकों को यह बातचीत बहुत पसंद आई होगी। वैसे आप से अभी और भी बहुत सारी बातें करनी है, राय बाबू के बारे में, पंकज बाबू के बारे में, नौशाद साहब के बारे में, नय्यर साहब के बारे में, रोशन साहब, सलिल दा, इन सभी के बारे में, और आपकी फ़िल्म 'अंदाज़ अपना अपना' के बारे में भी। हम फिर किसी दिन आपसे एक और लम्बी बातचीत करेंगे। एक बार फिर आपका बहुत बहुत धन्यवाद!

बहुत बहुत धन्यवाद!



आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी cine.paheli@yahoo.com पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





Sunday, June 21, 2015

मेघ मल्हार : SWARGOSHTHI – 224 : MEGH MALHAR



स्वरगोष्ठी – 224 में आज

रंग मल्हार के – 1 : राग मेघ मल्हार

आषाढ़ के प्रथम मेघ का प्रतिनिधि - राग मेघ मल्हार

‘गरजे घटा घन कारे कारे, पावस रुत आई...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हमारी नई लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’, आरम्भ हो रही है। श्रृंखला के पहले अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में हम राग मेघ मल्हार की चर्चा करेंगे। राग मेघ मल्हार एक प्राचीन राग है, जिसके गायन-वादन से संगीतज्ञ वर्षा ऋतु के प्रारम्भिक परिवेश का सृजन करते हैं। इस राग में आज हम आपको सुप्रसिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती द्वारा प्रस्तुत एक खयाल रचना और इसी राग के स्वरों पर आधारित 1942 में प्रदर्शित फिल्म ‘तानसेन’ से खुर्शीद बेगम का गाया गीत भी सुनवा रहे हैं।

स वर्ष कुछ विलम्ब से ही सही आजकल हम सब प्रकृति के अद्भुत वरदान पावस ऋतु का आनन्द ले रहे हैं। हमारे चारो ओर के परिवेश ने हरियाली की चादर ओढ़ने की पूरी तैयारी कर ली है। तप्त-शुष्क भूमि पर वर्षा की फुहारें पड़ने पर चारो ओर जो सुगन्ध फैलती है वह अवर्णनीय है। ऐसे ही मनभावन परिवेश का सृजन करने के लिए और हमारे उल्लास और उमंग को द्विगुणित करने के लिए आकाश में कारे-कजरारे मेघ उमड़-घुमड़ रहे हैं। भारतीय साहित्य और संगीत को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली दो ऋतुएँ, बसन्त और पावस हैं। पावस ऋतु में मल्हार अंग के रागों का गायन-वादन अत्यन्त सुखदायी होता है। वर्षाकालीन सभी रागों में सबसे प्राचीन राग मेघ मल्हार माना जाता है। काफी थाट का यह राग औड़व-औड़व जाति का होता है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में 5-5 स्वरों का प्रयोग होता है। गान्धार और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। समर्थ कलासाधक कभी-कभी परिवर्तन के तौर पर गान्धार स्वर का प्रयोग करते है। भातखण्डे जी ने अपने ‘संगीत-शास्त्र’ ग्रन्थ में भी यह उल्लेख किया है कि कोई-कोई कोमल गान्धार का प्रयोग भी करते हैं। लखनऊ के वरिष्ठ संगीत-शिक्षक और शास्त्र-अध्येता पण्डित मिलन देवनाथ के अनुसार लगभग एक शताब्दी पूर्व राग मेघ में कोमल गान्धार का प्रयोग होता था। आज भी कुछ घरानों की गायकी में यह प्रयोग मिलता है। रामपुर, सहसवान घराने के जाने-माने गायक उस्ताद राशिद खाँ जब राग मेघ गाते हैं तो कोमल गान्धार का प्रयोग करते हैं। ऋषभ का आन्दोलन राग मेघ का प्रमुख गुण होता है। यह पूर्वांग प्रधान राग है। इस राग के माध्यम से आषाढ़ मास के मेघों की प्रतीक्षा, उमड़-घुमड़ कर आकाश पर छा जाने वाले काले मेघों और वर्षा ऋतु के प्रारम्भिक परिवेश का सजीव चित्रण किया जाता है। आइए, अब हम राग मेघ मल्हार में एक भावपूर्ण खयाल सुनते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे है, पटियाला गायकी में सिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती। यह मध्यलय झपताल की रचना है, जिसके बोल हैं- ‘गरजे घटा घन कारे कारे पावस रुत आई...’।


राग मेघ मल्हार : ‘गरजे घटा घन कारे कारे, पावस रुत आई...’ : पण्डित अजय चक्रवर्ती




भारतीय साहित्य में भी राग मेघ मल्हार के परिवेश का भावपूर्ण चित्रण मिलता है। वर्षा ऋतु के आगमन की आहट देने वाले राग मेघ की प्रवृत्ति को महाकवि कालिदास ने ‘मेघदूत’ के प्रारम्भिक श्लोकों में अत्यन्त यथार्थ रूप में चित्रित किया है। ‘मेघदूत’ का यक्ष अपनी प्रियतमा तक सन्देश भेजने के लिए आषाढ़ मास के मेघों को ही अपना दूत बनाता है। इससे थोड़ा भिन्न परिवेश पाँचवें दशक की एक फिल्म से हमने लिया है। आज का गीत हमने 1942 में रणजीत स्टूडियो द्वारा निर्मित और जयन्त देसाई द्वारा निर्देशित फिल्म ‘तानसेन’ से चुना है। फिल्म के प्रसंग के अनुसार अकबर के आग्रह पर तानसेन ने राग ‘दीपक’ गाया, जिसके प्रभाव से उनका शरीर जलने लगा। कोई उपचार काम में नहीं आने पर उनकी शिष्या ने राग ‘मेघ मल्हार’ का आह्वान किया, जिसके प्रभाव से आकाश मेघाच्छन्न हो गया और बरखा की बूँदों ने तानसेन के तप्त शरीर का उपचार किया। इस प्रसंग में राग ‘मेघ मल्हार’ की अवतारणा करने वाली तरुणी को कुछ इतिहासकारों ने तानसेन की प्रेमिका कहा है तो कुछ ने उसे तानसेन की पुत्री तानी बताया है। बहरहाल, इस प्रसंग से यह स्पष्ट हो जाता है कि राग ‘मेघ मल्हार’ मेघों का आह्वान करने में सक्षम है। दूसरे रूप में हम यह भी कह सकते हैं कि इस राग में मेघाच्छन्न आकाश, उमड़ते-घुमड़ते बादलों की गर्जना और वर्षा के प्रारम्भ की अनुभूति कराने की क्षमता है। फिल्म ‘तानसेन’ के संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश और गीतकार पण्डित इन्द्र थे। फिल्म में तानसेन की प्रमुख भूमिका में कुन्दनलाल (के.एल.) सहगल थे। फिल्म के लगभग सभी गीत विभिन्न रागों पर आधारित थे। फिल्म ‘तानसेन’ में राग मेघ मल्हार पर आधारित गीत है- ‘बरसो रे कारे बादरवा हिया में बरसो...’, जिसे उस समय की विख्यात गायिका-अभिनेत्री खुर्शीद बेगम ने गाया और अभिनय भी किया था। तीनताल में निबद्ध इस गीत में पखावज की संगति की गई है। आइए, सुनते हैं वर्षा ऋतु का आह्वान करते राग ‘मेघ मल्हार’ पर आधारित यह गीत। आप इस गीत के माध्यम से पावस का आनन्द लीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग मेघ मल्हार : ‘बरसो रे कारे बादरवा...’ फिल्म – तानसेन : स्वर – खुर्शीद बेगम





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 224वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको सुप्रसिद्ध उस्ताद गायक की आवाज़ में प्रस्तुत खयाल का एक अंश सुनवा रहे हैं। इस गीत के अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 230वें अंक के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में किस राग की झलक है?

2 – गीत के अंश में प्रयोग किये गए ताल को ध्यान से सुनिए और हमें ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत के गायक को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 27 जून, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 226वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 222 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1985 में प्रदर्शित फिल्म ‘सुर संगम’ से लिये गए एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा गया था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मालकौंस, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक पण्डित राजन मिश्र। इस बार पहेली में हमारी एक नई श्रोता-पाठक, गोरखपुर से पूजा पाण्डेय ने पहली बार प्रतियोगिता में भाग लिया और एक प्रश्न का सही उत्तर दिया। पूजा जी का स्वागत करते हुए उन्हें एक अंक दिया जाता है। अन्य नियमित प्रतिभागियों में से वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, रायपुर, छत्तीसगढ़ से राजश्री श्रीवास्तव, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने दिया है।सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’ का आज से शुभारम्भ हुआ है। आज के अंक में आपने राग मेघ मल्हार का रसास्वादन किया। श्रृंखला के आगामी अंकों में हम आपको मल्हार अंग के अन्य रागों को सुनवाएँगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी पिछली श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Saturday, June 20, 2015

‘सात अजूबे इस दुनिया में...’ - क्यों महिला समितियों ने विरोध किया इस गीत का?


एक गीत सौ कहानियाँ - 61

 

सात अजूबे इस दुनिया में...’ 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इइसकी 61-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म ’धरम वीर’ के शीर्षक गीत "सात अजूबे इस दुनिया में आठवीं अपनी जोड़ी..." के बारे में जिसे मोहम्मद रफ़ी और मुकेश ने गाया था...


Rafi & Mukesh
हिन्दी फ़िल्म संगीत में पुरुष युगल गीतों का भी अपना एक अलग स्थान रहा है। सुनहरे दौर में रफ़ी और किशोर के गाए युगल गीत ख़ूब लोकप्रिय हुआ करते थे और इन रफ़ी-किशोर डुएट्स की संख्या भी अन्य जोड़ियों से अधिक हैं। रफ़ीस-किशोर के बाद रफ़ी-मन्ना और रफ़ी-मुकेश की जोड़ियों के गाए युगल गीत भी यदा-कदा अते रहे। आज बात करते हैं मोहम्मद रफ़ी और मुकेश के गाए युगल गीतों की। शोध करने पर पता चला कि पहला रफ़ी-मुकेश डुएट बना था साल 1949 में फ़िल्म ’चिलमन’ के लिए। पी. एल. संतोषी का लिखा और हनुमान प्रसाद का स्वरवबद्ध किया यह गीत था "जले जलाने वाले हमको जैसे मोमबत्ती..."। उसी साल संगीतकार स्नेहल भाटकर ने फ़िल्म ’ठेस’ में इन दोनों से एक युगल गीत गवाया "बात तो कुछ भी नहीं..."। गीतकार थे किदार शर्मा। फिर एक लम्बा अन्तराल आया और लगभग 10 साल बाद, 1958 में यादगार फ़िल्म ’फिर सुबह होगी’ में रफ़ी और मुकेश ने क्रम से रहमान और राज कपूर के लिए पार्श्वगायन करते हुए एक युगल गीत गाया "जिस प्यार में यह हाल हो उस प्यार से तौबा..."। संगीतकार ख़य्याम, गीत साहिर का था। 1959 की फ़िल्म ’उजाला’ में शंकर जयकिशन ने रफ़ी और मुकेश से क्रम से शम्मी कपूर और राज कुमार के लिए आवाज़ें ली। शैलेन्द्र का लिखा वह गीत था "यारों सूरत हमारी पे मत जाओ..."। संगीतकार चित्रगुप्त के निर्देशन में 1961 की फ़िल्म ’हम मतवाले नौजवान’ में रफ़ी और मुकेश ने गाया मजरूह का लिखा "मत पूछिए दिल है कहाँ..."। 70 के दशक में कुछ रफ़ी-मुकेश डुएट्स तो सर चढ़ कर बोले। कल्याणजी-आनन्दजी, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल और रवीन्द्र जैन ने रफ़ी-मुकेश डुएट्स की लिस्ट को इज़ाफ़ा दिलाया। 1973 की फ़िल्म ’समझौता’ का गीत "बड़ी दूर से आए हैं प्यार का तोहफ़ा लाए हैं..." में अनिल धवन के लिए गाया रफ़ी ने और शत्रुघन सिन्हा के लिए गाया मुकेश ने। 1975 की फ़िल्म ’दो जासूस’ में तो तीन युगल गीत थे रफ़ी और मुकेश के - फ़िल्म का शीर्षक गीत "दो जासूस करे महसूस कि दुनिया बड़ी ख़राब है...", "साल मुबारक़ साहेब जी..." और "चढ गई चढ़ गई अंगूर की बेटी..."। इसमें राजेन्द्र कुमार के लिए रफ़ी और राज कपूर के लिए मुकेश की आवाज़ गूंजी। 1977 की फ़िल्म में फ़िल्म ’ईमान धरम’ में एक बड़ा ही महत्वपूर्ण गीत था "ओ जट्टा आई वैसाखी..."। इसमें सबको चकित करते हुए रफ़ी साहब की आवाज़ सजी उत्पल दत्त के होठों पर, और मुकेश गाए संजीव कुमार के लिए। पीढ़ी बदल गई पर रफ़ी-मुकेश डुएट्स का सिलसिला बरकरार रहा। 1977 में ही धर्मेन्द्र और जीतेन्द्र के लिए क्रम से रफ़ी और मुकेश की आवाज़ों में बनी ब्लॉकबस्टर फ़िल्म ’धरम वीर’ का शीर्षक गीत "सात अजूबे इस दुनिया में आठवीं अपनी जोड़ी..."। इस गीत का एक सैड वर्ज़न भी था। और यही आख़िरी गीत था इन दो महान गायकों की युगल आवाज़ों में। मुकेश के अचानक इस दुनिया से चले जाने से यह सिलसिला समाप्त हो गया।

Anand Bakshi with LP
फ़िल्म ’धरम वीर’ के शीर्षक गीत के साथ एक बड़ा ही दिलचस्प क़िस्सा जुड़ा हुआ है। आनन्द बक्शी ने यह गीत लिखा था "सात अजूबे इस दुनिया में आठवीं अपनी जोड़ी, तोड़े से भी टूटे ना यह धरम वीर की जोड़ी"। तीन अन्तरों के साथ गीत बन कर तैयार हो गया। पर जैसे ही गीत रेकॉर्ड पर जारी हुआ, इस गीत की वजह से बवाल मच गया। महिला समितियाँ फ़िल्म के निर्माता मनमोहन देसाई और गीतकार आनन्द बक्शी के घर पर मोर्चा लेकर पहुँच गए और "हाय हाय" का नारा लगने लगे। ऐसा क्या था इस गीत में जो महिला समितियों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया? बात दरसल ऐसी थी कि इस गीत का दूसरा अन्तरा कुछ इस तरह था - "यह लड़की है या रेशम की डोर है, कितना ग़ुस्सा है कितनी मुंहज़ोर है, ढीला छोड़ ना देना हँस के, रखना दोस्त लगाम कस के, अरे मुश्किल से काबू में आए लड़की हो या घोड़ी..."। बस, यह जो आख़िरी जुमला था "लड़की हो या घोड़ी", यह था सारी मुसीबतों का जड़। निस्सन्देह लड़की की तुलना घोड़ी से करने वाली बात जायज़ नहीं थी। विरोध इतना बढ़ गया कि अन्त में मनमोहन देसाई ने उन्हें यह कह कर आश्वस्त किया कि इस पंक्ति को बदल कर दोबारा गीत रेकॉर्ड किया जाएगा। आनन्द बक्शी ने मनमोहन देसाई की परेशानी को दूर करते हुए इस पंक्ति को दोबारा इस तरह से लिखा - "अरे मुश्किल से काबू में आए थोड़ी ढील जो छोड़ी"। गाना दोबारा रेकॉर्ड हुआ और इस नए संस्करण पर ही गाना फ़िल्माया गया। इस गीत का एक सैड वर्ज़न भी है रफ़ी और मुकेश की ही आवाज़ों में। अफ़सोस की बात है कि इस गीत के रेकॉर्ड होने के कुछ ही दिनों बाद मुकेश जी की अमरीका में मृत्यु हो गई, और इस गीत के बोलों को झूठा साबित करते हुए टूट गई मुकेश-रफ़ी की जोड़ी। बस इतनी सी है इस गीत की कहानी।लीजिए, अब आप यह युगल गीत सुनिए। 

फिल्म धरम वीर : 'सात अजूबे इस दुनिया में आठवीं अपनी जोड़ी...' : मोहम्मद रफी और मुकेश



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 





Sunday, June 14, 2015

भैरवी थाट के राग : SWARGOSHTHI – 223 : BHAIRAVI THAAT



स्वरगोष्ठी – 223 में आज
 

दस थाट, दस राग और दस गीत – 10 : भैरवी थाट
 
राग भैरवी में ‘फुलवन गेंद से मैका न मारो...’ 
और 
मालकौंस में ‘आए सुर के पंछी आए...’


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ की दसवीं और समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के रागों का वर्गीकरण करने में समर्थ मेल अथवा थाट व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग किया जाता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 में से कम से कम पाँच स्वरों की उपस्थिति आवश्यक होती है। भारतीय संगीत में ‘थाट’, रागों के वर्गीकरण करने की एक व्यवस्था है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार सात मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते है। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल का प्रचलन है, जबकि उत्तर भारतीय संगीत में दस थाट का प्रयोग किया जाता है। इन दस थाट का प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं दस थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को वर्गीकृत किया जाता है। श्रृंखला के आज के अंक में हम आपसे भैरवी थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग भैरवी में निबद्ध पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में दो खयाल रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। साथ ही भैरवी थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत राग मालकौंस के स्वरों में निबद्ध एक फिल्मी गीत का उदाहरण पण्डित राजन मिश्र की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे। 




श्रृंखला की पिछली नौ कड़ियों में हमने संगीत के नौ थाटों और उनके आश्रय रागों का परिचय प्राप्त किया। आज हम ‘भैरवी’ थाट और राग के बारे में चर्चा करेंगे। परन्तु इससे पहले आइए, थाट और राग के अन्तर को समझने का प्रयास किया जाए। दरअसल थाट केवल ढाँचा है और राग एक व्यक्तित्व है। थाट-निर्माण के लिए सप्तक के 12 स्वरों में से कोई सात स्वर क्रमानुसार प्रयोग किया जाता है, जब कि राग में पाँच से सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। साथ ही राग की रचना के लिए आरोह, अवरोह, प्रबल, अबल आदि स्वर-नियमों का पालन किया जाता है। आज का थाट है- ‘भैरवी’, जिसमें सा, रे॒, ग॒, म, प, ध॒, नि॒ स्वरों का प्रयोग होता है, अर्थात ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल और मध्यम स्वर शुद्ध। ‘भैरवी’ थाट का आश्रय राग भैरवी नाम से ही पहचाना जाता है। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यूँ तो इसके गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला में है, इसके साथ ही परम्परागत रूप से राग ‘भैरवी’ का गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। राग ‘भैरवी’ को ‘सदा सुहागिन राग’ भी कहा जाता है। इस राग में ठुमरी, दादरा, सुगम संगीत और फिल्म संगीत में राग भैरवी का सर्वाधिक प्रयोग मिलता है। परन्तु आज आपको सुनवाने के लिए हमने राग भैरवी में निबद्ध दो खयाल का चुनाव किया है। इन खयाल के स्वर पण्डित भीमसेन जोशी के हैं।  

राग भैरवी : विलम्बित ‘फुलवन गेंद से...’ और द्रुत खयाल- ‘हमसे पिया...’ : पं. भीमसेन जोशी




भैरवी थाट के अन्य कुछ प्रमुख राग हैं- भैरवी, मालकौस, धनाश्री, विलासखानी तोड़ी, भूपाल तोड़ी, सेनावती, हेमवर्द्धिनी आदि। राग मालकौंस, भैरवी थाट का प्रमुख राग होता है। यह औडव-औडव जाति का राग है, अर्थात आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग किया जाता है। राग मालकौंस में ऋषभ और पंचम स्वरों का प्रयोग नहीं होता। गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। राग के आरोह में निसा निसां और अवरोह में सांनिधसा स्वर लगते हैं। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में इस राग का सौन्दर्य खूब निखर उठता है। अब हम आपको 1985 में प्रदर्शित संगीत-प्रधान फिल्म ‘सुर संगम’ से एक गीत सुनवाते हैं। यह गीत राग मालकौंस के स्वरों में पिरोया गया है। इस गीत का पार्श्वगायन पण्डित राजन मिश्र ने किया है, जबकि परदे पर समर्थ अभिनेता गिरीश कर्नाड ने अभिनीत किया है। फिल्म में उन्होने सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पण्डित शिवशंकर शास्त्री का चरित्र निभाया है। फिल्म ‘सुर संगम’ का कथानक संजीव सोनार का लिखा हुआ था और इसके गीतकार वसन्त देव हैं। संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने फिल्म के लगभग सभी गीत रागों के आधार पर ही तैयार किए थे। इन्हीं गीतों में से राग मालकौंस पर आधारित गीत अब हम आपको सुनवाते हैं। आप यह गीत सुनिए और हमें इस अंक से और श्रृंखला से यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग मालकौंस : ‘आए सुर के पंछी आए...’ : पं. राजन मिश्र : फिल्म सुर संगम






संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 223वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक खयाल का अंश विद्वान गायक की आवाज में सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 230 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – गीत के इस अंश को सुन कर किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायक की आवाज़ को पहचान सकते हैं? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 20 जून, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 225वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 221वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘शबाब’ से चुन कर एक गीत का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मुलतानी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- कवयित्रि भक्त मीराबाई। इस बार की पहेली में सही उत्तर देने वाले संगीत-प्रेमी हैं- वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात   


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ का यह समापन अंक था। अगले अंक से हमारी नई श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के रागों’ पर केन्द्रित रहेगी। इस श्रृंखला के लिए आप अपने पसंद के गीत, संगीत और राग की फरमाइश कर सकते हैं। अगले अंक में हम मल्हार अंग के एक प्रकार के साथ उपस्थित होंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों के अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फर्माइशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


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