शनिवार, 6 जून 2015

‘ज़िन्दगी फूलों की नहीं...’ - गुलज़ार से जानिए कमचर्चित संगीतकार कानु रॉय और इस गीत की कहानी


एक गीत सौ कहानियाँ - 60

 

ज़िन्दगी फूलों की नहीं...’ 





रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 60-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म ’गृह प्रवेश’ के गीत "ज़िन्दगी फूलों की नहीं, फूलों की तरह महकती रहे..." के बारे में जिसे भूपेन्द्र ने गाया था...



कमचर्चित संगीतकारों में एक महत्वपूर्ण नाम है कानु रॉय का। ’उसकी कहानी’, ’अनुभव’ और ’गृह प्रवेश’ जैसी फ़िल्मों में अर्थपूर्ण और कर्णप्रिय संगीत देने के लिए आज भी कानु रॉय को संगीत प्रेमी सम्मान से याद करते हैं। सालों पहले गुलज़ार साहब ’फ़िल्मफ़ेअर’ में एक स्तंभ प्रस्तुत किया करते थे ’दिल ढूंढ़ता है’ शीर्षक से। उसके एक अंक में उन्होंने कानु रॉय के बारे में बताते हुए फ़िल्म ’गृह प्रवेश’ के एक गीत "ज़िन्दगी फूलों की नहीं..." के बनने की कहानी बताई थी। आज ’एक गीत सौ कहानियाँ’ में वही दास्तान पढ़िए। गुलज़ार साहब बताते हैं...


जब संगीतकर कोई धुन सुनाते हैं, तो उसके मीटर को सही-सही पकड़ने के लिए गीतकार उस धुन पर डमी शब्द डाल कर गाते हैं। इससे संगीतकार को यह पता चल जाता है कि गीतकार को मीटर समझ में आ गया या नहीं। और डमी शब्दों की बात करें तो आम तौर पर मेरी जान, मेरी जान, जानेमन जानेमन, तू मेरी जान जैसे शब्द, या फिर तुकबन्दी में बहारें, राहें, बाहें ज॒इसे शब्द, या फिर मेरे सनम, और कुछ लोग तो केवल ध्वनियों जैसे कि दा दा दा दा, ला ला ला ला, रा रा रा रा, का प्रयोग करते हैं। पर कानु रॉय एकमात्र ऐसे संगीतकार थे जो ति ता ति ति, ति ता ति ति जैसी ध्वनियों का प्रयोग करते थे। सुनने में बड़ा मज़ा आता था। उनकी इस अदा की पीछे क्या कारण था यह तो पत नहीं, पर उनकी यह अदा उन्हें अन्य संगीतकारों से अलग करती थी। कानु रॉय ने अपना करीअर सलिल दा के सहायक के रूप में काम करते हुए शुरू किया था। व्यवसायिक रूप से वो एक वेल्डर थे और कम उम्र में उन्होंने हावड़ा ब्रिज के एक बड़े रिपेयरिंग् के प्रकल्प में काम कर चुके थे। कानु रॉय एक शान्त स्वभाव के, बेचारा दिखने वाले इंसान थे। बासु भट्टाचार्य ने उन्हें ’उसकी कहानी’ में ब्रेक दिया था। बासु की फ़िल्में लो-बजट की होती थी और उनके पास कलाकारों को देने के लिए पैसे नहीं होते थे। कानु को कभी 6 या 8 साज़िन्दों से ज़्यादा नहीं मिलते थे, और शान्त स्वभाव वाले कानु के पास उसी से काम चलाने के सिवाय कोई और चारा नहीं होता था। हालाँकि उनके कम्पोज़िशन्स उच्चस्तरीय होते थे, पर बासु के साथ सौदा करने की क्षमता नहीं थी। बासु के बैनर के बाहर उन्हें ख़ास कोई काम भी नहीं मिला। उनकी शख़्सियत ही ऐसी थी कि वो किसी से जाकर काम माँगने की स्थिति में भी नहीं थे। वो उस तरह के इंसान ही नहीं थे। वो अपने आप को बेचना नहीं जानते थे। मुझे याद है कई बार तो ऐसा भी हुआ कि वो बासु से एक या दो अतिरिक्त वायलिन की भीख माँगते नज़र आए। कानु और बासु अच्छे दोस्त भी थे। जब भी कानु बासु से अतिरिक्त साज़ की माँग करते, बासु साफ़ कह देते कि अपने पैसे से ख़रीद लो। पर कानु के पास पैसे होते ही कहाँ थे? बहुत मिन्नतें करने के बाद बासु तरस खा कर एक वायलिन या सरोद का बन्दोबस्त करवा देते थे। इस तरह से कानु को काम करना पड़ता था। वो तारदेओ के भन्साली स्टुडियो को सुबह-सुबह 3 या 4 घण्टों के लिए बूक करते रेगुलर रेकॉर्डिंग् शिफ़्ट शुरो होने से पहले। इन विपरित परिस्थितियों में भे कानु रॉय ने कैसे कैसे गाने बनाए, जैसे कि "मेरी जाँ, मुझे जाँ ना कहो" (अनुभव), "लोगों के घरों में रहता हूँ" "बोलिये सुरीली बोलियाँ", "मचल के जब भी आँखों से", "ज़िन्दगी फूलों की नहीं, फूलों की तरह महकती रहे" (गृह प्रवेश)।


Kanu Roy
"ज़िन्दगी फूलों की तरह" बासु का यमक था शब्दों पर। हम ’गृह प्रवेश’ के एक गाने के सिचुएशन पर बातचीत कर रहे थे। हमेशा की तरह इस बार भी बासु मेरे उपर अपने heavy duty thoughts लाद रहे थे जो वो इस गीत में चाहते थे। जैसे जैसे वो बोलते चले जा रहे थे तो मैंने उनके द्वारा कही हुई बांगला की एक पंक्ति को हिन्दी में अनुवाद करके यूंही कह दी कि ज़िन्दगी फूलों की नहीं। उन्हें यह लाइन बहुत पसन्द आई पर मुझे इसमें कोई ख़ास बात नज़र नहीं आ रही थी। मैंने उनसे कहा कि यह कोई काव्य नहीं है, बस शब्दों का खेल है। पर वो इस लाइन को रखने पर ज़ोर देने लगे तो इसे रख लिया गया। और जब कानु ने इसकी धुन बनाई तो सुनने में अच्छा लग रहा था। संगीतप्रेमी आज भी इस गीत को पसन्द करते हैं। और मैं आज तक यही मानता हूँ कि इसमें कोई अच्छी शायरी या काव्य नहीं है। पर यह बात भी सच है कि शायरी और संगीत में दलिल नहीं चलती। या तो आपको पसन्द है या नहीं है। आप किसी को कोई गीत पसन्द करवाने के लिए बहस नहीं कर सकते। बासु को अपनी फ़िल्मों में हँसी मज़ाक बिल्कुल पसन्द नहीं था। उनके सीन और गाने भी गम्भीर क़िस्म के होते थे। इस बात पर मेरी उनसे बहुत बहस होती थी। पर कानु पूरी ईमानदारी के साथ जो उनके पास काम आता था, करते चले जाते थे। उनका करीअर उनके जीवन के साथ समाप्त हो गया। हालाँकि हम लोग उन्हें जानते थे, वो हमेशा सबसे दूर रहते थे। उनकी व्यक्तिगत ज़िन्दगी के बारे में किसी को पता नहीं था। मुझे नहीं लगता कि उन्होंने शादी भी की थी। अफ़सोस की बात है कि वो ग़रीबी में जिये और ग़रीबी में ही चल बसे। संगीत जगत में उन्होंने एक बहुत ही छोटी सी भूमिका निभाई, लेकिन पता नहीं क्या कारण है कि वो आज भी हमारी यादों में बसा हुआ है। और यह उसकी कृतियों का ही कमाल है। उनके साथ-साथ उन संगीत भी संगीत प्रेमियों के दिलों में बसा हुआ है।

ये थी गुलज़ार साहब की कही हुई बातें कानु रॉय और "ज़िन्दगी फूलों की तरह..." गीत के बनने से जुड़ी। यह इत्तेफ़ाक़ ही है कि इस गीत के बोल कानु रॉय के जीवन से मिलती जुलती है। "जब कहीं कोई गुल खिलता है, आवाज़ नहीं आती लेकिन, ख़ुशबू की ख़बर आ जाती है, ख़ुशबू महकती रहे..."। कानु रॉय भी बिना आवाज़ इस संगीत जगत में आए और चुपचाप अपना काम करते रहे। पर उनके संगीत की सुगन्ध आज भी हमारे मन को महका रही है, और यह महक आने वाली कई पीढ़ियों तक आती रहेगी। कानु रॉय की संगीत साधना को नमन!

अब आप फिल्म 'गृह प्रवेश' का वही गीत सुनिए, जिसकी चर्चा हमने ऊपर की है। 


फिल्म गृह प्रवेश : 'ज़िंदगी फूलों की तरह...' : गायक - भूपेन्द्र : संगीत - कनू राय




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर। 



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




रविवार, 31 मई 2015

आसावरी थाट के राग : SWARGOSHTHI – 221 : ASAVARI THAAT







स्वरगोष्ठी – 221 में आज

दस थाट, दस राग और दस गीत – 8 : आसावरी थाट

राग आसावरी में ‘सजन घर लागे...’ 
और 
अड़ाना में ‘झनक झनक पायल बाजे...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ की आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के रागों का वर्गीकरण करने में समर्थ मेल अथवा थाट व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग किया जाता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 में से कम से कम पाँच स्वरों की उपस्थिति आवश्यक होती है। भारतीय संगीत में ‘थाट’, रागों के वर्गीकरण करने की एक व्यवस्था है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार सात मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते है। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल का प्रचलन है, जबकि उत्तर भारतीय संगीत में दस थाट का प्रयोग किया जाता है। इन दस थाट का प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं दस थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को वर्गीकृत किया जाता है। श्रृंखला के आज के अंक में हम आपसे आसावरी थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग आसावरी में निबद्ध संगीतमार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के स्वरों में एक रचना प्रस्तुत करेंगे। साथ ही आसावरी थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत राग अड़ाना के स्वरों में निबद्ध एक फिल्मी गीत का उदाहरण उस्ताद अमीर खाँ की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे।


 


र्तमान भारतीय संगीत में रागों के वर्गीकरण के लिए ‘थाट’ प्रणाली का प्रचलन है। श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ के अन्तर्गत अब तक हमने सात थाटों का परिचय प्राप्त किया है। आज बारी है, आठवें थाट अर्थात ‘आसावरी’ की। इस थाट का परिचय प्राप्त करने से पहले आइए प्राचीन काल में प्रचलित थाट प्रणाली की कुछ चर्चा करते हैं। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलन में आ चुका था, जो उस समय के ग्रन्थ ‘संगीत-पारिजात’ और ‘राग-विबोध’ से स्पष्ट है। इसी काल में मेल की परिभाष देते हुए श्रीनिवास ने बताया है कि राग की उत्पत्ति थाट से होती है और थाट के तीन रूप हो सकते हैं- औडव (पाँच स्वर), षाड़व (छह स्वर), और सम्पूर्ण (सात स्वर)। सत्रहवीं शताब्दी के अन्त तक थाटों की संख्या के विषय में विद्वानों में मतभेद भी रहा है। ‘राग-विबोध’ के रचयिता ने थाटों की संख्या 23 वर्णित की है, तो ‘स्वर-मेल कलानिधि’ के प्रणेता 20 और ‘चतुर्दंडि-प्रकाशिका’ के लेखक ने 19 थाटों की चर्चा की है।

पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर
आज हमारी चर्चा का थाट है- ‘आसावरी’। इस थाट के स्वर होते हैं- सा, रे, ग॒, म, प ध॒, नि॒ अर्थात आसावरी थाट में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। आसावरी थाट का आश्रय राग आसावरी ही कहलाता है। राग आसावरी के आरोह में पाँच स्वर और अवरोह में सात स्वरों का उपयोग किया जाता है। अर्थात यह औडव-सम्पूर्ण जाति का राग है। इस राग के आरोह में सा, रे, म, प, सां तथा अवरोह में- सां, नि, , प, म, रे, सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। अर्थात आरोह में गान्धार और निषाद स्वर वर्जित होता है। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। दिन के दूसरे प्रहर में इस राग का गायन-वादन सार्थक अनुभूति कराता है। परम्परागत रूप से सूर्योदय के बाद गाये-बजाए जाने वाले इस राग में तीन कोमल स्वर, गान्धार, धैवत और निषाद का प्रयोग किया जाता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। अब हम आपके लिए संगीतमार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर का गाया राग आसावरी प्रस्तुत करते हैं। तीनताल में निबद्ध इस बन्दिश में आपको पण्डित बलवन्त राव भट्ट के कण्ठ–स्वर और विदुषी एन. राजम् की वायलिन संगति का आनन्द भी मिलेगा।


राग आसावरी : ‘सजन घर लागे या साडेया...’ : पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर




आसावरी थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ अन्य मुख्य राग हैं- जौनपुरी, देवगान्धार, सिन्धु भैरवी, आभेरी, गान्धारी, देसी, कौशिक कान्हड़ा, दरबारी कान्हड़ा, अड़ाना आदि। आज हम आपको राग अड़ाना में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाएँगे। राग अड़ाना, आसावरी थाट का राग है। यह षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग होता है, जिसमें गान्धार और धैवत कोमल तथा दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध गान्धार और अवरोह में शुद्ध धैवत का प्रयोग वर्जित होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में गाने-बजाने वाले राग अड़ाना का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है।

उस्ताद अमीर खाँ 
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्मों की गणना ‘मील के पत्थर’ के रूप में की जाती है। ऐसी ही एक उल्लेखनीय फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ थी जिसका प्रदर्शन 1955 में हुआ था। इस फिल्म में कथक नृत्य शैली का और राग आधारित गीत-संगीत का कलात्मक उपयोग किया गया था। फिल्म का निर्देशन वी. शान्ताराम ने और संगीत निर्देशन वसन्त देसाई ने किया था। वी. शान्ताराम के फिल्मों की सदैव यह विशेषता रही है कि उसके विषय नैतिक मूल्यों रक्षा करते प्रतीत होते है। साथ ही उनकी फिल्मों में रूढ़ियों का विरोध भी नज़र आता है। फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ में उन्होने भारतीय शास्त्रीय नृत्य और संगीत की महत्ता को रेखांकित किया था। फिल्म को इस लक्ष्य तक ले जाने में संगीतकार वसन्त देसाई का उल्लेखनीय योगदान रहा। जाने-माने कथक नर्तक गोपीकृष्ण फिल्म की प्रमुख भूमिका में थे। इसके अलावा संगीत के ताल पक्ष में निखारने के लिए सुप्रसिद्ध तबलावादक गुदई महाराज (पण्डित सामता प्रसाद) का उल्लेखनीय योगदान था। वसन्त देसाई ने सारंगीनवाज़ पण्डित रामनारायन और संतूरवादक पण्डित शिवकुमार शर्मा का सहयोग भी प्राप्त किया था। संगीतकार वसन्त देसाई की सफलता का दौर फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ से ही आरम्भ हुआ था। वसन्त देसाई की प्रतिभा सही मूल्यांकन वी. शान्ताराम ने ही किया था। प्रभात कम्पनी में एक साधारण कर्मचारी के रूप में उनकी नियुक्ति हुई थी। यहीं रह कर उन्होने अपनी कलात्मक प्रतिभा का विकास किया था। आगे चलकर वसन्त देसाई, शान्ताराम की फिल्मों के मुख्य संगीतकार बने। शान्ताराम जी ने 1955 में फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ का निर्माण किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई ने इस फिल्म में कई राग आधारित स्तरीय गीतों की रचना की थी। फिल्म का शीर्षक गीत ‘झनक झनक पायल बाजे...’ राग अड़ाना का एक मोहक उदाहरण है। इस गीत को स्वर प्रदान किया, सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ ने। आइए, सुनते हैं, राग अड़ाना पर आधारित यह गीत। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग अड़ाना : ‘झनक झनक पायल बाजे...’ : फिल्म झनक झनक पायल बाजे : उस्ताद अमीर खाँ और साथी






संगीत पहेली  


‘स्वरगोष्ठी’ के 221वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको छः दशक से भी अधिक पुरानी एक हिन्दी फिल्म के गीत का अंश एक उस्ताद गायक की आवाज में सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 230 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश में किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – यह भक्तिकाल की एक कवयित्री की रचना मानी जाती है। क्या आप उस कवयित्री को पहचान सकते हैं? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 6 जून, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 223वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 219वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको पुरानी बाँग्ला फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग बागेश्री, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- मध्यलय तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक उस्ताद अमीर खाँ। इस बार की पहेली में वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया ने पहली बार संगीत पहेली में भाग लिया और एक प्रश्न का सही उत्तर देकर एक अंक अर्जित कर लिया। हम उनका हार्दिक स्वागत करते हैं। इसके साथ ही जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका की विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने सही उत्तर दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ जारी है। अब यह श्रृंखला समापन की ओर अग्रसर है। इसके बाद हमारी अगली श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के रागों’ पर केन्द्रित रहेगी। इस श्रृंखला के लिए आप अपने पसंद के गीत, संगीत और राग की फरमाइश कर सकते हैं। अगले अंक में हम एक और थाट के साथ उपस्थित होंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों के अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फर्माइशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र    


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शनिवार, 30 मई 2015

चित्रशाला - 01 : फ़िल्मों में प्रेमचन्द



चित्रशाला - 01

फ़िल्मों में प्रेमचन्द




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, आज से महीने के हर पाँचवे शनिवार को हम प्रस्तुत करेंगे फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विविध पहलुओं से सम्बन्धित शोधालेखों पर आधारित श्रृंखला 'चित्रशाला'। आज इसकी पहली कड़ी में प्रस्तुत है शोधालेख – 'फ़िल्मों में प्रेमचन्द’। हमारे देश के जो प्रमुख और महान साहित्यकार हुए हैं, उनमें मुंशी प्रेमचन्द का नाम बहुत ऊँचाइयों पर आता है। 31 जुलाई 1880 को जन्मे और 8 अक्टुबर 1936 को इस दुनिया से जाने वाले प्रेमचन्द जी को उनके जीवन काल में शायद इतनी ख्याति नहीं मिली हो जितना उनके जाने के बाद उनके नाम को मिला, उनकी कृतियों को मिली। और इसके पीछे महत्वपूर्ण योगदान रहा उनकी कहानियों और उपन्यासों पर बनने वाली फ़िल्मों का भी। आइए इस लेख के माध्यम से जाने कि प्रेमचन्द जी की कौन-कौन सी कृतियों पर बनी थी फ़िल्में और पढ़ें उन फ़िल्मों से सम्बन्धित कुछ रोचक तथ्य। 




भारत में साहित्यकारों, कवियों, लेखकों की ना उस ज़माने में कोई कद्र थी, ना ही आज है। और यही कारण है कि अत्यन्त प्रतिभाशाली होते हुए भी ये लेखक, ये साहित्यकार हमेशा ग़रीबी और आर्थिक समस्याओं से जीवन भर जूझते रहे। महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द भी इसमें व्यतिक्रम नहीं रहे। उनकी साहित्यिक पत्रिका ’हंस’ और ’जागरण’ में उन्हें माली नुकसान हुआ, पत्रिका बन्द करने के कगार पर आ गई। इसके चलते प्रेमचन्द जी की आर्थिक स्थिति और भी भायानक हो गई, उनकी जेब बिल्कुल ख़ाली हो चुकी थी। इसलिए 54 वर्ष की आयु में, 31 मई 1934 को वो आ गए बम्बई नगरी फ़िल्म जगत में अपनी क़िस्मत आज़माने। फ़िल्म निर्देशक मोहन भवनानी, जिन्हें हम एम. भवनानी के नाम से जानते हैं, प्रेमचन्द को बम्बई आने का निमंत्रण दिया था। यहाँ भवनानी ने उन्हें 'अजन्ता सिनेटोन’ में स्क्रिप्ट राइटर की नौकरी दिला दी। उन्होंने 'अजन्ता सिनेटोन’ के लिए एक कहानी लिखी ’मिल मज़दूर’। 1934 में ही इस कहानी पर एम. भवनानी के निर्देशन में फ़िल्म बनी ’मज़दूर’। मिस बिब्बो, जयराज, नयमपल्ली और भुडो अडवानी इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे। फ़िल्म में प्रेमचन्द ने भी सरपंच की एक छोटी सी भूमिका निभाई थी। फ़िल्म में मज़दूरों द्वारा शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के दृश्य दिखाए गए जिस वजह से समाज के कुछ बलशाली लोगों ने ब्रिटिश सरकार के कान भर कर फ़िल्म पर रोक लगवा दी। इसके बाद 1936 में भी इसी कहानी पर 'अजन्ता सिनेटोन’ ने ही एक अन्य नाम से एक फ़िल्म दोबारा बना डाली। इस बार फ़िल्म का शीर्षक रखा गया 'ग़रीब परवर’ उर्फ़ ’दयावान’।


साल 1935 में ’अजन्ता सिनेटोन’ की बैनर तले प्रेमचन्द की एक और कहानी पर फ़िल्म प्रदर्शित हुई जिसका शीर्षक था ’नवजीवन’। इस फ़िल्म के निर्देशक भी एम. भवनानी ही थे। ’अजन्ता सिनेटोन’ के बाहर 1934 में ’महालक्ष्मी सिनेटोन’ ने प्रेमचन्द जी की मशहूर कहानी ’सेवा सदन’ पर एक फ़िल्म बना डाली जिसका नाम रखा गया ’बाज़ार-ए-हुस्न’। यह कहानी वेश्याओं की समस्याओं पर आधारित थी। इसका निर्देशन किया था नानूभाई वकील ने। यह वाक़ई रोचक बात है कि इस फ़िल्म के बनने के ठीक 80 वर्ष बाद प्रेमचन्द की इसी ’सेवासदन’ कहानी पर ’बाज़ार-ए-हुस्न’ के नाम से ही दोबारा फ़िल्म बनी। इस बार निर्माता थे ए. के. मिश्र। यह फ़िल्म 18 जुलाई 2014 को प्रदर्शित हुई थी। रेशमी घोष, जीत गोस्वामी, ओम पुरी और यशपाल शर्मा अभिनीत इस फ़िल्म की एक और ख़ास बात यह है कि इस फ़िल्म में संगीत दिया है वरिष्ठ और सुरीले संगीतकार ख़य्याम ने। तमिल फ़िल्मकार सुब्रह्मण्यम ने 1937 में सफल फ़िल्म ’बालायोगिनी’ के बाद और भी कई सामाजिक फ़िल्में बनाने का निर्णय लिया। 1938 में उन्होंने ’सेवासदन’ उर्फ़ ’बाज़ार-ए-हुस्न’ को फ़िल्मी जामा पहनाया तमिल फ़िल्म ’सेवासदनम्’ के नाम से। फ़िल्म की पटकथा उन्होने स्वयं लिखी और इसका अपने ’मद्रास यूनाइटेड आर्टिस्ट्स कॉर्पोरेशन’ बैनर तले निर्माण किया। फ़िल्म का मुख्य चरित्र एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी ने निभाया।


1934-35 के इन दो सालों में ही प्रेमचन्द जी का फ़िल्म जगत पर से जैसे विश्वास उठ गया। जो आशाएँ और सपने लेकर वो बम्बई आए थे, वो जैसे कहीं ऊब गए। उन्होंने इस बारे में एक पत्र अपने मित्र साहित्यकार ज्ञानेन्द्र को लिखा और बताया कि जिन सपनों को लेकर वो बम्बई आए थे, वो सपने बिखर गए हैं। यहाँ निर्देशक सर्वेसर्वा हैं और वो कहानी के साथ मनमर्ज़ी से फेरबदल करते हैं, बेवजह अश्लील गाने ठूस दिए जाते हैं, ये सब कोई भी ख़ुद्दार स्वाभिमानी लेखक बरदाश्त नहीं कर सकता। इस घटना के बाद प्रेमचन्द बम्बई हमेशा हमेशा के लिए छोड़ कर वापस बनारस आ गए। और एक ही वर्ष के भीतर बनारस में ही 8 अक्टुबर 1936 को उनका 56 वर्ष की अल्पायु में निधन हो गया। प्रेमचन्द चले गए, परन्तु उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी लिखी कहानियों और उपन्यासों पर फ़िल्में बनाने का सिलसिला चलता रहा। एम. भवनानी, जिनके कारण प्रेमचन्द बम्बई तशरीफ़ लाए थे, उन्होंने साल 1946 में प्रेमचन्द लिखित कहानी ’रंगभूमि’ पर एक फ़िल्म बनाई थी जिसका नाम था ’चौगान-ए-हस्ती’। 1963 में त्रिलोक जेटली ने प्रेमचन्द की अमर कृति ’गोदान’ पर इसी शीर्षक से फ़िल्म बनाई जिसमें राजकुमार और कामिनी कौशल मुख्य भुमिकाओं में थे। 1966 में सुनील दत्त और साधना को लेकर ॠषीकेश मुखर्जी ने प्रेमचन्द की एक और महत्वपूर्ण कृति ’ग़बन’ पर इसी शीर्षक से फ़िल्म बनाई।


1977 में सत्यजीत रे ने प्रेमचन्द की एक कहानी पर ’शतरंज के खिलाड़ी’ बनाई। यह कहानी लखनऊ के नवाबों के पतन की कहानी थी जिसमें एक खेल के प्रति ऑबसेशन सारे खिलाड़ियों का खा जाती है, और उन्हें एक संकट की घड़ी में अपने दायित्वों को भुला देती है। सत्यजीत रे ने प्रेमचन्द की एक और कृति ’सदगति’ पर साल 1981 में एक फ़िल्म बनाई। यह एक लघु कथा थी ग़रीब ’दुखी’ की एक तुच्छ सहायता के बदले में लकड़ी काटते-काटते थकावट से मर जाता है। 1977 में प्रेमचन्द जी की कहानी ’कफ़न’ पर प्रसिद्ध फ़िल्मकार मृणाल सेन ने तेलुगू में ’ओका ऊरी कथा’ शीर्षक से एक फ़िल्म बनाई थी जो तेलुगू में बनने वाली गिनती भर की कलात्मक फ़िल्मों में गिनी जाती है। प्रेमचन्द की कृतियों पर बनने वाली फ़िल्मों में कुछ और नाम हैं ’गोधूली’ (1977), 'पंचपरमेश्वर’ (1995) और ’गुल्ली डंडा’ (2010)

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खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी





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