Sunday, January 18, 2015

ध्रुपद शैली : एक परिचय : SWARGOSHTHI – 203 : DHRUPAD AALAP



स्वरगोष्ठी – 203 में आज

भारतीय संगीत शैली परिचय श्रृंखला – 1

राग श्री में ध्रुपद का आलाप




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का मैं कृष्णमोहन मिश्र एक नई लघु श्रृंखला मे हार्दिक स्वागत करता हूँ। हमारे अनेक पाठकों और श्रोताओं ने आग्रह किया है कि वर्तमान में भारतीय संगीत की जो शैलियाँ मौजूद हैं, उनका परिचय ‘स्वरगोष्ठी’ पर प्रस्तुत किया जाए। आपके आग्रह को स्वीकार करते हुए आज से हम यह लघु श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं, जिसका शीर्षक है- ‘भारतीय संगीत शैली परिचय श्रृंखला’। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम परम्परागत रूप से विकसित कुछ संगीत शैलियों का परिचय प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। इस संगीत परम्परा में जड़ता नहीं है। यह तो गोमुख से निरन्तर निकलने वाली वह पवित्र धारा है जिसके मार्ग में अनेक धाराएँ मिलती है और इस मुख्य धारा में विलीन हो जाती हैं। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से जो भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धांतों के अनुकूल धारा थी उसे स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। भारतीय संगीत की सबसे प्राचीन और वर्तमान में उपलब्ध संगीत शैली है, ध्रुपद अथवा ध्रुवपद। आज हम धूपद शैली पर एक दृष्टिपात कर रहे हैं। श्रृंखला के पहले अंक में हम आपको राग श्री में ध्रुपद का आलाप भी सुनवाएँगे। 


ज भारतीय उपमहाद्वीप में संगीत की जितनी भी शैलियाँ प्रचलित हैं, इनका क्रमिक विकास प्राचीन वैदिक संगीत से ही हुआ है। भारतीय संगीत की परम्परा सामवेद से जुड़ी हुई है। वैदिक काल से लेकर तेरहवीं शताब्दी तक के संगीत का स्वरूप पूर्णतः आध्यात्मिक था और यह देवालयों से जुड़ा हुआ था। मुगल शासनकाल में यह संगीत देवालयों से निकाल कर राज दरबारों तक पहुँचा, जहाँ से इस संगीत की श्रृंगार रस की धारा विकसित हुई। वर्तमान में उत्तर भारत की उपलब्ध पारम्परिक शास्त्रीय शैलियों में सबसे प्राचीन संगीत शैली है, ध्रुवपद अथवा ध्रुपद। प्राचीन ग्रन्थों में प्रबन्ध गीत का उल्लेख है। इन ग्रन्थों में लगभग एक सौ प्रकार के प्रबन्ध गीतों का वर्णन है, जिनमें एक प्रकार ‘ध्रुव’ है। ध्रुपद अथवा ध्रुवपद इसी ‘ध्रुव’ नामक प्रबन्ध गीत शैली का विकसित रूप है। प्राचीन प्रबन्ध गीत को दो भाग में बाँटा जा सकता था- अनिबद्ध और निबद्ध। वर्तमान प्रचलित ध्रुवपद शैली में आलाप का भाग अनिबद्ध गीत और अन्य सभी गीत, जिनमें तालों का प्रयोग किया जा सकता है, निबद्ध गीतों के श्रेणी में आते हैं। आधुनिक ध्रुपद परम्परा का सूत्रपात ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर (1486 – 1516) के काल से माना जाता है। उन्हें मध्ययुग की गीत शैली का प्रवर्तक माना जाता है। राजा मानसिंह स्वयं कुशल संगीतज्ञ और मर्मज्ञ थे। प्राचीन शास्त्रों का आधार लेकर उन्होने तत्कालीन प्रचलित संगीत शैली के अनुरूप एक नई संगीत शैली विकसित की। प्रबन्ध संगीत के पद काफी लम्बे-लम्बे हुआ करते थे। राजा मानसिंह तोमर ने इसे संक्षिप्त किया। गीत के साहित्य में दैवी आराधना, आश्रयदाता राजाओ व बादशाहों की प्रशस्ति, पौराणिक आख्यान, प्रकृति वर्णन, सामाजिक उत्सवों आदि की प्रधानता थी। गीतों में ब्रजभाषा का अधिकांश प्रयोग मिलता है। 

उदय भवालकर
जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है कि ध्रुपद का आलाप अनिबद्ध गीत की श्रेणी में आता है। ध्रुपद का आलाप आरम्भ में लयविहीन होता है। राग के निर्धारित स्वरों को ठहराव देते हुए क्रमशः विकसित किया जाता है। आलाप करते समय शब्दो पर नहीं बल्कि स्वरों का महत्त्व होता है और लम्बी मीड़ों का प्रयोग होता है। आरम्भ में लयविहीन आलाप क्रमशः गति पकड़ता जाता है और स्वर लयबद्ध रूप लेते जाते हैं। इसे जोड़ कहा जाता है। आलाप में स्वरोच्चार के लिए कुछ निरर्थक से लगने वाले शब्द प्राचीन प्रबन्ध गीतों से लिए गए है। इसे ‘नोम-तोम’ का आलाप कहा जाता है। दरअसल प्रबन्ध गीतों में आलाप के लिए सार्थक शब्दों का प्रयोग होता था, जैसे- ॐ अनन्त श्री हरि नारायण’ आदि। आज भी कई संगीतसाधक आलाप में इन्हीं सार्थक शब्दों के प्रयोग करते हैं। ध्रुपद के आलाप पक्ष का उदाहरण देने के लिए हमने आज के अंक में युवा ध्रुपद गायक पण्डित उदय भवालकर की आवाज़ का चयन किया है। उदय जी का जन्म उज्जैन में एक संगीत-प्रेमी परिवार में 1966 में हुआ था। बचपन में उनकी बड़ी बहन ने उन्हें संगीत की शिक्षा दी। बाद में उन्नीस पीढ़ियों से ध्रुपद के संरक्षक और सुप्रसिद्ध ‘डागरवाणी’ परम्परा के संवाहक उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर और उन्हीं के बड़े भाई उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर से गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत विधिवत शिक्षा ग्रहण की। आज के इस अंक में हम आपको उदय भवालकर के स्वरों में राग श्री का आलाप सुनवा रहे हैं। आप इस कलात्मक आलाप और जोड़ के सौन्दर्य का अनुभव कीजिए और मुझे आज यही विराम लेने की अनुमति दीजिए।


राग श्री : ध्रुपद आलाप और जोड़ : पण्डित उदय भवालकर





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 203वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक ध्रुपद गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 210 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – इस गीतांश को सुन कर आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 24 जनवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 205वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 201वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर राग भैरवी की रचना सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- आभासित धुन भजन ‘मत जा मत जा मत जा जोगी...’ की है और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- भक्त कवयित्री मीराबाई। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक से हमने एक नई लघु श्रृंखला, ‘भारतीय संगीत शैली परिचय’ शुरू की है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की विभिन्न शैलियों का सोदाहरण परिचय प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला में आप भी योगदान कर सकते हैं। भारतीय संगीत की किसी शैली पर अपना परिचयात्मक आलेख अपने नाम और परिचय के साथ हमारे ई-मेल पते पर भेज दें। आप अपनी फरमाइश या अपनी पसन्द का आडियो क्लिप भी हमें भेज सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Saturday, January 17, 2015

"महबूबा महबूबा...", जानिए कि कैसे सच साबित हुई पंचम के मामा के दिल की पुकार!


एक गीत सौ कहानियाँ - 50
 

‘महबूबा महबूबा, गुलशन में गुल खिलते हैं!’




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह लोकप्रिय स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 50वीं कड़ी में आज जानिये हिन्दी सिनेमा की माइलस्टोन फ़िल्म 'शोले' के राहुल देव बर्मन के गाये मशहूर गीत "महबूबा महबूबा, गुल्शन में गुल खिलते हैं..." से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें। 


15 अगस्त 1975 के दिन प्रदर्शित हुई फ़िल्म 'शोले' हिन्दी सिनेमा के इतिहास का एक सुनहरा पन्ना है। 1999 में BBC ने 'शोले' को 'Film of the Millenium' की उपाधि दी तो शेखर कपूर ने कहा - “There has never been a more defining film on the Indian screen. Indian film history can be divided into Sholay BC and Sholay AD." अनुपमा चोपड़ा ने अपनी किताब 'Sholay: The Making of a Classic' में इस फ़िल्म को हिन्दी सिनेमा का सुनहरा स्तर कहा है। एक तरफ़ तो 'शोले' को अपार लोकप्रियता और मकबूलियत हासिल हुई, और दूसरी तरफ़ उस वर्ष फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों में 'शोले' कुछ ख़ास कमाल नहीं दिखा सकी। इस फ़िल्म को केवल एक पुरस्कार मिला 'बेस्ट एडिटिंग' का। आश्चर्य की बात है, क्यों? 'शोले' एक ऐसी फ़िल्म थी जिसकी सफलता के लिए उसे अपने गीत-संगीत पर निर्भर नहीं रहना पड़ा। दूसरे शब्दों में 'शोले' के गाने अच्छे तो थे पर इतने भी अच्छे नहीं कि जो फ़िल्म की कामयाबी को निश्चित कर सके। वैसे इस फ़िल्म के गानें कामयाब ज़रूर हुए। फ़िल्म का होली गीत "होली के दिन दिल खिल जाते हैं..." आज भी होली पर रेडियो के विशेष कार्यक्रमों में सुनाई दे जाता है। "कोई हसीना जब रूठ जाती है तो..." और "जब तक है जान जाने जहान मैं नाचूंगी..." की भी अपनी जगह है रसिकों के दिलों में। दोस्ती पर बनने वाले गीतों में "ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे..." गीत की ख़ास जगह है। कहा जाता है कि इस गीत को शूट करने में 21 दिन लग गए थे। और पाँचवाँ गीत है "महबूबा महबूबा, गुलशन में गुल खिलते है..." की तो बात ही क्या है! अपनी तरह का इकलौता गीत; फिर इसके बाद कोई भी गीत इस तरह का नहीं बन पाया। आज के दौर के आइटम गीत बनाने वालों को "महबूबा महबूबा" से सबक लेनी चाहिए कि आइटम गीत होता क्या है! मेरे ख़याल से फ़िल्म संगीत इतिहास के श्रेष्ठ आइटम गीतों में से एक है "महबूबा महबूबा"

"महबूबा महबूबा" के बनने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। शुरू शुरू में इस गीत को गाने के लिए किशोर की आवाज़ तय हुई थी, पर किस तरह से यह गीत पंचम की झोली में आ गई, यही एक दिलचस्प कहानी है बताने लायक। हुआ यूँ कि एक बार राहुल देव बर्मन के मामा श्री निर्मल कुमार दासगुप्ता अपनी बहन यानी राहुल देव बर्मन की माँ मीरा देव बर्मन से मिलने मुम्बई आये हुए थे। पंचम और उनके मामा के बीच में बहुत प्यार था; पंचम अपने मामाजी को मोनी दादू कह कर बुलाते थे तो मामाजी अपने भांजे को टुबलू बुलाया करते। तो निर्मल जी मार्च 1975 को बम्बई अपनी बहन मीरा जी से मिलने आए। उन दिनों 'शोले' के गीतों की रेकॉर्डिंग चल रही थी। तो एक दिन शाम को 'शोले' के संगीतकार पंचम एक गीत का स्क्रैच रेकॉर्ड करके घर पहुँचे और उस स्क्रैच को अपने मामाजी को सुनवाने के लिए व्याकुल थे। माँ से पता चला कि मामाजी उपर छत पर चाय पी रहे हैं। तो पंचम सारा ताम-झाम लेकर छत पर ही पहुँच गए और अपने मोनी दादू को वह स्क्रैच सुनवाया। वह स्क्रैच था "महबूबा महबूबा" गाने का। स्क्रैच उस ज़माने में कोई भी डबिंग आर्टिस्ट या संगीतकार ही गा दिया करता था, मुख्य गायक-गायिका को इसके लिए नहीं बुलाते थे। इसलिए किशोर कुमार की आवाज़ में रेकॉर्ड होने वाले इस गीत का स्क्रैच पंचम ख़ुद अपनी आवाज़ में रेकॉर्ड कर लाए थे। पंचम के मामाजी ने जैसे ही यह स्क्रैच सुना तो तुरन्त अपने भांजे से कहा कि अरे, यह तो तुम्हारी आवाज़ में भी बहुत अच्छा लग रहा है, इसे किशोर कुमार से गवाने की क्या ज़रूरत है? पंचम ने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया था, वो तो अपने मामाजी को सिर्फ़ गीत की कम्पोज़िशन सुनवाना चाहते थे। इसलिए वो हँस पड़े और मामाजी की बात को टाल दिया। बात वहीं पर ख़त्म हो गई। फिर कुछ दिनों बाद गीत की फ़ाइनल रेकॉर्डिंग की बारी आई। पर किशोर कुमार किसी वजह से स्टुडियो नहीं पहुँच सके। सारा इन्तज़ाम हो चुका था, म्युज़िशियन्स आ चुके थे, रेकॉर्डिंग रद्द करने का मतलब माली नुकसान था। तो उस दिन भी किशोर कुमार का इन्तज़ार करते हुए पंचम साज़िन्दों को लेकर यह गीत खुद ही गा गए। उनकी आवाज़ में इस गीत को सुनते ही रमेश सिप्पी उछल पड़े। कहने लगे कि अब यह गीत आप ही गाओगे! यह फ़िल्म के किसी नायक पर नहीं फ़िल्माया जा रहा, इसलिए ज़रूरी नहीं कि इसे किशोर से गवाया जाये; क्योंकि यह जलाल आग़ा पर फ़िल्माया जाना है और आपकी आवाज़ में बड़ा ही असरदार लग रहा है, इसलिए इसे अब आप ही गाओगे। अपने मामाजी की बात भी पंचम को याद आ गई, और सबकी सहमति पर पंचम ने अपनी ही आवाज़ में यह गीत रेकॉर्ड करवाया। बाद में जब किशोर कुमार ने यह गीत सुना तो उन्होंने भी यह स्वीकार किया कि  इस तरह से तो वो भी नहीं गा पाते इस गीत को, और उनका उस दिन रेकॉर्डिंग पर ना पहुँचना ही इस गीत के लिए बेहतर सिद्ध हुआ।

राहुल देव बर्मन और संतूर सम्राट पंडित शिव कुमार शर्मा के बीच गहरी दोस्ती थी। पंडित जी ने पंचम के कई गीतों में संतूर बजाए हैं, और 'शोले' का यह गीत भी उन्हीं में से एक है। पर इस गीत में वाद्य भारतीय संतूर नहीं बल्कि इरानी संतूर था। इस बारे में विविध भारती के 'संगीत सरिता' कार्यक्रम में एक बार पंडित जी ने विस्तार से बताया था, उन्हीं के वो शब्द यहाँ उद्धृत कर रहे हैं - "अभी पंचम का जब ज़िक्र कर रहे हैं हम लोग, तो जैसा कहते हैं न बहुत जिद्दत की बात सोचते रहते थे वो; कुछ ऐसी बात कि इस बात में से नया क्या निकाले। तो उसी की मैं आपको एक मिसाल बताऊँगा कि फ़िल्म बन रही थी 'शोले'। उसमें वो म्युज़िक दे रहे थे। और एक, जैसा मैंने कहा, जिद्दत कुछ न कुछ करते रहते थे, तो अपने गाने में भी कुछ आवाज़ ऐसी बनाते थे कि अलग अंदाज़ का एक गाना, एक अलग स्टाइल क्रिएट किया। "महबूबा महबूबा" में उन्होंने ईरानी संतूर इस्तेमाल किया। ईरानी संतूर हमारे संतूर से टोनल क्वालिटी में अलग है, शेप भी अलग है, सिस्टम वही है, और यह मेरे पास कैसे आया कि 1969 में मैं इरान गया था 'शिराज़ फ़ेस्टिवल' में बजाने के लिए। इन्टरनैशनल फ़ेस्टिवल हुआ था वहाँ तो वहाँ की सरकार ने मुझे एक गिफ़्ट दिया था। तो पंचम ने क्या किया कि इरानी संतूर को, अब सोचिए कि यह ईलेक्ट्रॉनिक म्युज़िक तो आज हुआ है, 'शोले' कभी की आई थी, राजकमल स्टुडियो में उन्होंने अपनी तरह से एक एक्स्पेरीमेण्ट करके उसकी टोन में कुछ बदलाव किया और एक अलग अंदाज़ का टोन बनाया जो उस गाने के मूड को सूट करे। बड़ा ही प्रॉमिनेण्ट पीस था जो गीत में कई बार सुनने को मिलता है, मुखड़े के दो बार "महबूबा महबूबा" के बीच में यह पीस है और अन्य कई जगहों पर भी है।"

और अब एक और महत्वपूर्ण बात। "महबूबा महबूबा" की धुन पंचम की रचना नहीं है। यह धुन प्रेरित है ग्रीक गायक डेमिस रुसोस के गीत "say you love me" की धुन से। यह गीत जारी हुआ था साल 1974 में, यानी कि 'शोले' के ठीक एक साल पहले। पर मज़े की बात तो यह है कि डेमिस रुसोस की भी यह मूल रचना नहीं है। रुसोस भी प्रेरित हुए थे एक अन्य गीत से। वह गीत था ग्रीक गायक मिकैलिस विओलरिस का गाया "ta rialia" जो बना था साल 1973 में। इस तरह से 1973 में "ta rialia", 1974 में "say you love me" और 1975 में "महबूबा महबूबा" एक ही धुन पर बना और तीनों ही गाने बेहद कामयाब रहे। तो दोस्तों, 'शोले' फ़िल्म से जुड़ी न जाने कितनी कहानियाँ है, न जाने कितने क़िस्से हैं, रेकॉर्ड्स हैं, इतिहास है, पर "महबूबा महबूबा" गीत की दास्तान बस इतनी सी ही है, और अब आप वही चर्चित गीत सुनिए।

फिल्म शोले : 'महबूबा महबूबा गुलशन में गुल खिलते हैं...' : गायक और संगीतकार - राहुल देव बर्मन 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Tuesday, January 13, 2015

कंजूस मक्खीचूस - लघुकथा

इस लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा के स्वर में घुघूती बासूती की मार्मिक कहानी "क्या अगले साल" का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं अनुराग शर्मा की एक लघुकथा कंजूस मक्खीचूस जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

प्रस्तुत कथा "कंजूस मक्खीचूस" का गद्य "बर्ग वार्ता ब्लॉग" पर उपलब्ध है। "कंजूस मक्खीचूस" का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 27 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



प्रश्न कठिन हो जाते हैं,
हर उत्तर पे इतराते हैं
मैं चिंता में घुल जाता हूँ,
चलूँ तो पथ डिग जाते हैं।
 ~ अनुराग शर्मा

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"दो मिनट की बातचीत में ही इतनी नजदीकी। लोग यूँ ही इन्हें नकचढ़ा और घमंडी बताते हैं।”
 (अनुराग शर्मा कृत "कंजूस मक्खीचूस" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
कंजूस मक्खीचूस MP3

#2nd Story, Kanjoos Makkhichoos: Anurag Sharma Hindi Audio Book/2015/02. Voice: Anurag Sharma

Sunday, January 11, 2015

पहेली के विजेताओं का अभिनन्दन : SWARGOSHTHI – 202 : RAG BHAIRAVI & PURIYA KALYAN



स्वरगोष्ठी – 202 में आज

राग भैरवी और पूरिया कल्याण

संगीत पहेली की तीनों महिला विजेताओं को सुनिए और उनका अभिनन्दन कीजिए




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का नए वर्ष के दूसरे अंक में हार्दिक अभिनन्दन है। पिछले अंक में हमने आपसे ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के बीते वर्ष की कुछ विशेष गतिविधियों की चर्चा की थी। इस अंक में भी हम गत वर्ष की कुछ अन्य गतिविधियों का उल्लेख करने के साथ ही संगीत पहेली के वार्षिक विजेताओं की घोषणा करेंगे और उनका सम्मान भी करेंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के पाठक और श्रोता जानते हैं कि इस स्तम्भ के प्रत्येक अंक में संगीत पहेली के माध्यम से हम हर सप्ताह आपसे दो प्रश्न पूछते हैं। आपके दिये गये सही उत्तरों के प्राप्तांकों की गणना दो स्तरों पर की जाती है। ‘स्वरगोष्ठी’ की दस-दस कड़ियों को पाँच श्रृंखलाओं (सेगमेंट) में बाँट कर और फिर वर्ष के अन्त में सभी पाँच श्रृंखलाओं के प्रतिभागियों के प्राप्तांकों की गणना की जाती है। वर्ष 2014 की पहेलियों में कुल 17 प्रतियोगियों ने हिस्सा लिया। चार प्रतिभागी पहली बार पहेली में शामिल हुए। इनमें से तीन के उत्तर सही नहीं थे। चौथे प्रतिभागी लखनऊ के चन्द्रकान्त दीक्षित हैं जिनका एक उत्तर ठीक था। पेंसिलवानिया की श्रीमती विजया राजकोटिया ने 164वें अंक से भाग लेना शुरू किया और उसके बाद नियमित रहीं। हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी और जबलपुर, मध्यप्रदेश की श्रीमती क्षिति तिवारी की सहभागिता नियमित रही। आज के इस सिंहावलोकन अंक में हम विजयी प्रतिभागियों की आवाज़ में उनके गाये गीत भी सुनवाएँगे।



र्ष 2014 अपनी कुछ खट्टी-मीठी यादों के साथ बीत गया। पिछले सप्ताह नए वर्ष का हमने स्वागत भी किया है। आज हम आपके साथ बीते वर्ष की कुछ सुखद स्मृतियाँ बाँटेंगे और पहेली की विजेताओं का परिचय भी देंगे। वर्ष 2014 में प्रकाशित कुल 50 पहेलियों के 100 अंक निर्धारित थे। 200वें अंक के सम्पन्न होने के बाद सर्वाधिक प्राप्तांक के तीन प्रतिभागियों को विजेता के रूप में चुन लिया। यह तथ्य भी रेखांकन के योग्य हैं कि सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाली तीनों प्रतिभागी महिलाएँ हैं और संगीत की अध्यापिकाएँ हैं। पहेली में 68 अंक अर्जित कर पेंसिलवानिया, अमेरिका की श्रीमती विजया राजकोटिया ने तीसरा स्थान प्राप्त किया है।

संगीत की साधना में पूर्ण समर्पित विजया जी ने लखनऊ स्थित भातखण्डे संगीत महाविद्यालय (वर्तमान में विश्वविद्यालय) से संगीत विशारद की उपाधि प्राप्त की है। बचपन में ही उनकी प्रतिभा को पहचान कर उनके पिता, विख्यात रुद्रवीणा वादक और वीणा मन्दिर के प्राचार्य श्री पी.डी. शाह ने कई तंत्र और सुषिर वाद्यों के साथ-साथ कण्ठ संगीत की शिक्षा भी प्रदान की। श्री शाह की संगीत परम्परा को उनकी सबसे बड़ी सुपुत्री विजया जी ने आगे बढ़ाया। आगे चलकर विजया जी को अनेक संगीत गुरुओं से मार्गदर्शन मिला, जिनमें आगरा घराने के उस्ताद खादिम हुसेन खाँ की शिष्या सुश्री मिनी कापड़िया, पण्डित लक्ष्मण प्रसाद जयपुरवाले, सुश्री मीनाक्षी मुद्बिद्री और सुविख्यात गायिका श्रीमती शोभा गुर्टू प्रमुख नाम हैं। विजया जी संगीत साधना के साथ-साथ ‘क्रियायोग’ जैसी आध्यात्मिक साधना में संलग्न रहती हैं। उन्होने अपने गायन का प्रदर्शन मुम्बई, लन्दन, सैन फ्रांसिस्को, साउथ केरोलिना, न्यू जर्सी, और पेंसिलवानिया में किया है। सम्प्रति विजया जी पेंसिलवानिया के अपने स्वयं के संगीत विद्यालय में हर आयु के विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा प्रदान कर रही हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली की विजेता के रूप में अब हम आपको विजया जी का गाया एक भजन सुनवाते है। भक्त कवयित्री मीराबाई का यह भक्तिपद राग भैरवी के सुरों की चाशनी से पगा हुआ है। लीजिए, सुनिए और उन्हें बधाई दीजिए।


भजन : ‘जोगी मत जा, मत जा, मत जा...’ : स्वर – विजया राजकोटिया : कवयित्री – मीराबाई



संगीत पहेली के कुल 100 अंको में से 93 अंक प्राप्त कर दूसरे स्थान पर विजयी रहीं, हैदराबाद की सुश्री डी. हरिणा माधवी। “संगीत जीवन का विज्ञान है”, इस सिद्धान्त को न केवल मानने वाली बल्कि अपने जीवन में उतार लेने वाली हरिणा जी दो विषयों की शिक्षिका का दायित्व निभा रही हैं। हैदराबाद के श्री साईं स्नातकोत्तर महाविद्यालय में विगत 15 वर्षो से स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं को लाइफ साइन्स पढ़ा रही हैं। इसके साथ ही स्थानीय वासवी कालेज ऑफ म्यूजिक ऐंड डांस से भी उनका जुड़ाव है, जहाँ विभिन्न आयुवर्ग के विद्यार्थियों का मार्गदर्शन भी करती हैं। हरिणा जी को प्रारम्भिक संगीत शिक्षा अपनी माँ श्रीमती वाणी दुग्गराजू से मिली। आगे चल कर अमरावती, महाराष्ट्र के महिला महाविद्यालय की संगीत विभागाध्यक्ष श्रीमती कमला भोंडे से विधिवत संगीत सीखना शुरू किया। हरिणा जी के बाल्यावस्था के एक और संगीत गुरु एम.वी. प्रधान भी थे, जो एक कुशल तबला वादक भी थे। इनके अलावा हरिणा जी ने गुरु किरण घाटे और आर. डी. जी. कालेज, अकोला के संगीत विभागाध्यक्ष श्री नाथूलाल जायसवाल से भी संगीत सीखा। हरिणा जी ने मुम्बई के अखिल भारतीय गन्धर्व महाविद्यालय से संगीत अलंकार की शिक्षा प्राप्त की है। आज के इस विशेष अंक में हम आपको सुश्री डी. हरिणा माधवी की आवाज़ में राग पूरिया कल्याण में निबद्ध एक द्रुत खयाल प्रस्तुत करते हैं। यह तीनताल की रचना है।


राग पूरिया कल्याण : ‘बहुत दिन बीते...’ : स्वर- डी. हरिणा माधवी : द्रुत तीनताल



वर्ष 2014 की संगीत पहेली में 98 अंक अर्जित कर प्रथम स्थान प्राप्त करने वाली जबलपुर, मध्यप्रदेश की श्रीमती क्षिति तिवारी की संगीत शिक्षा लखनऊ और कानपुर में हुई। लखनऊ के भातखण्डे संगीत महाविद्यालय से गायन में प्रथमा से लेकर विशारद तक की परीक्षाएँ उत्तीर्ण की। बाद में इस संस्थान को विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त हुआ, जहाँ से उन्होने संगीत निपुण और उसके बाद ठुमरी गायन मे तीन वर्षीय डिप्लोमा भी प्राप्त किया। इसके अलावा कानपुर के वरिष्ठ संगीतज्ञ पण्डित गंगाधर राव तेलंग जी के मार्गदर्शन में खैरागढ़, छत्तीसगढ़ के इन्दिरा संगीत कला विश्वविद्यालय की संगीत स्नातक और स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। क्षिति जी के गुरुओं में डॉ. गंगाधर राव तेलंग के अलावा पण्डित सीताशरण सिंह, पण्डित गणेशप्रसाद मिश्र, डॉ. सुरेन्द्र शंकर अवस्थी, डॉ. विद्याधर व्यास और श्री विनीत पवैया मुख्य रूप से हैं। क्षिति जी को स्नातक स्तर पर भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से ग्वालियर घराने की गायकी के अध्ययन के लिए छात्रवृत्ति भी मिल चुकी है। कई वर्षों तक लखनऊ के महिला कालेज और जबलपुर के एक नेत्रहीन बच्चों के विद्यालय मे माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा देने के बाद वर्तमान में क्षिति जी स्नातक स्तर के छात्र-छात्राओं का मार्गदर्शन कर रहीं हैं। खयाल, ठुमरी और भजन गायन के अलावा उन्होने प्रोफेसर कमला श्रीवास्तव से गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत लोक संगीत भी सीखा है, जिसे अब वह अपने विद्यार्थियों को बाँट रही हैं। क्षिति जी कथक नृत्य और नृत्य नाटिकाओं में गायन संगत की विशेषज्ञ हैं। सुप्रसिद्ध नृत्यांगना डॉ. कुमकुम धर और नृत्यांगना डॉ. विधि नागर के कई कार्यक्रमों में अपनी इस प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुकी हैं। आज के इस विशेष अंक में श्रीमती क्षिति तिवारी महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की चर्चित सरस्वती वन्दना को अपना स्वर दे रही हैं।

सरस्वती वन्दना : ‘वर दे वीणावादिनी वर दे...’ : स्वर – क्षिति तिवारी और साथी : कवि – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 202वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत के एक रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 210वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह भारतीय संगीत की कौन सी शैली है?

2 – इस संगीत शैली में ताल देने के लिए किस वाद्य का प्रयोग किया जाता है? ताल वाद्य का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार 17 जनवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 204वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 200वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको संगीत के दो शीर्षस्थ कलासाधकों, उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ (शहनाई) और उस्ताद विलायत खाँ (सितार) की जुगलबन्दी का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य शहनाई और सितार। इस बार पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर एकमात्र प्रतिभागी पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने ही दिया है। विजया जी को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


पहेली के वार्षिक विजेता


वर्ष 2014 की पहेली में सर्वाधिक 98 अंक अर्जित कर जबलपुर, मध्यप्रदेश की श्रीमती क्षिति तिवारी ने प्रथम स्थान प्राप्त किया है। 93 अंक पाकर प्रतियोगिता में दूसरा स्थान हैदराबाद की सुश्री डी. हरिणा माधवी ने हस्तगत किया है। तीसरे स्थान को विजित करने वाली विदुषी विजया राजकोटिया, अमेरिका के पेंसिलवानिया शहर की निवासी हैं और भारतीय संगीत की खयाल और भजन गायकी की साधना, प्रदर्शन और प्रचार-प्रसार में संलग्न रहती हैं। पहेली प्रतियोगिता में उन्होने 68 अंक प्राप्त कर तीसरा स्थान प्राप्त किया है। पहेली के तीनों शीर्ष स्थानों पर विजयी प्रतिभागी महिलाएँ हैं और तीनों ही विदुषी संगीत की अध्यापिकाएँ हैं। तीनों विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इंडिया’ टीम की ओर से हार्दिक बधाई और शुभकामना।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर अगले सप्ताह से एक नई लघु श्रृंखला शुरू कर रहे हैं। इस श्रृंखला का शीर्षक होगा- ‘भारतीय संगीत की विविध शैलियाँ’। यदि आप भी संगीत के किसी भी विषय पर हिन्दी में लेखन की इच्छा रखते हैं तो हमसे सम्पर्क करें। हम आपकी प्रतिभा को निखारने का अवसर देंगे। आगामी श्रृंखलाओं के बारे में आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के आगामी अंकों में आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 


Saturday, January 10, 2015

अभिनेत्री जयश्री टी. और माला सिन्हा की स्मृतियों में मोहम्मद रफ़ी, मुकेश और लता मंगेशकर


स्मृतियों के स्वर - 15

अभिनेत्री जयश्री टी. और माला सिन्हा की स्मृतियों में रफ़ी, मुकेश और लता 





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकीया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ हमारे इस स्तंभ में, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर, जिसमें हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। आज की कड़ी में प्रस्तुत है अभिनेत्री जयश्री टी. और माला सिन्हा की स्मृतियाँ। बरसों बरस पहले जयश्री टी. ने मोहम्मद रफ़ी और मुकेश के साथ कई सारे स्टेज शोज़ किये हैं और इस तरह से इन दो गायकों को करीब से देखा और जाना है। जयश्री टी. बता रही हैं रफ़ी साहब और मुकेश जी के बारे में। इसी तरह माला जी बता रही हैं लता से उनकी मुलाक़ात के बारे में। 




सूत्र: 'उजाले उनकी यादों के', विविध भारती


जयश्री टी - मोहम्मद रफ़ी

"मैंने रफ़ी साहब के साथ बहुत शोज़ किये हैं। साउथ अफ़्रीका मैं गई थी उनके साथ, वहाँ पर हम लोगों ने बहुत सारे शोज़ किये। वहाँ जाने के लिए हमें बड़ी तकलीफ़ हुई, मतलब तकलीफ़ in the sense कि हमें काफ़ी वेट करना पड़ा। लेकिन वहाँ जाने के बाद जो प्यार मोहब्बत मिली है वहाँ के लोगों से यह आप इमाजिन नहीं कर सकते। जितनी पब्लिक अन्दर थी, वहाँ ऐसे टेण्ट जैसे लगे होते थे बड़े-बड़े, उसके अन्दर जितनी पब्लिक होती थी, उतनी ही पब्लिक बाहर होती थी। सूट-बूट पहने हुए लोग, कहते थे हमको टिकट दे दीजिये, हम कहीं भी नीचे बैठ जायेंगे, हमको शो देखना है। और जयश्री टी, मीना टी, मोहम्मद रफ़ी। उन दिनो मतलब इतने सारे शोज़, इतने सारे आर्टिस्ट्स नहीं आते थे। यानी कि हीरो-हीरोइन तो कोई आता ही नहीं था। लोग मुझसे कहते थे कि जयश्री, तुम स्टेज पे कैसे डान्स कर लेती हो, तुम तो फ़िल्मस्टार हो। मैंने कहा तो क्या हुआ? I was much ahead of time. वहाँ पर लोगों ने हमें बहुत रेस्पॉन्स दिया, वन्स मोर हमें मिलता था। और रफ़ी साहब was a great man, मैं रफ़ी साहब के बारे में एक बात कहना चाहूँगी कि जब हम स्टेज पे जाते थे, हम उनके पैर छूते थे, लेकिन वो जब स्टेज पे जाते थे तो मेरी माँ के पैर छूते थे और कहते थे माँ भगवान का रूप होती है। बहुत ही प्यारे, बहुत ही नेक इंसान थे। तो उनके साथ प्रोग्राम करने में बहुत मज़ा आया, और हम लोग वहाँ पे खाना खाते थे तो रफ़ी साहब कहते थे कि पहले सबको बुलाओ, एक साथ बैठ के खाना खायेंगे। बिल्कुल परिवार का माहौल था और हम घूमने भी जाते थे तो सबको साथ में लेके जाते थे। उनकी मिसेस, उनके जो ज़हीर साहब थे, और मेरी माँ थीं, मीना टी थीं, मेरी सिस्टर, तो हम लोग सब साथ में ही जाते थे।

रफ़ी साहब गाते हुए बीच में कभी-कभी हाथ को ऐसे उठा कर, जैसे ऐक्शन करते थे तो पब्लिक खिल जाती थी, तालियाँ मार कर सपोर्ट करती थी। तो कभी कभी ऐसा जेस्चर मार कर, ख़ुश हो जाती थी पब्लिक। रफ़ी साहब बातें बहुत कम करते थे। और आपस में जब हम बात करते थे तो बहुत सॉफ़्ट स्पोकेन एक दम, एक दम आहिस्ते से बात करते थे, कभी उनको ऊँची आवाज़ में आज तक सुना ही नहीं, किसी से भी नहीं। बहुत अच्छे से बात करते थे। रफ़ी साहब के साथ हम कई बार स्टेज पे गये, तो उनसे कहा जाता था कि दो शब्द कहिये। तो वो कहते थे कि मैं दो शब्द नहीं, दो लाइन गा के सुनाऊँगा। और वो हमेशा गा के सुनाते थे। कुछ कहते नहीं थे।"



जयश्री टी - मुकेश

"मुकेश जी के साथ मैंने बचपन में शोज़ किये हैं। जब मैं छोटी थी तो हम लोगों ने गुजरात के बहुत दौरे किये। तो हम क्या करते थे कि शो ख़तम हो जाने के बाद हम कार में बैठ के दूसरे गाँव जाते थे और वहाँ पे हम होटल में जाते थे। तो मुकेश जी हमेशा मुझसे और मेरी माँ से कहते थे कि आप लोग सो जाओ, मैं ड्राइवर से बात करता हूँ ताकि वो सोये नहीं ट्रैवलिंग में। और मुकेश जी was the first person who told me कि जयश्री, देखो तुम फ़िल्मों में आयी हो, तुम्हारा नाम हो गया है, तो सबसे पहले यह शो बिज़नेस है, यहाँ पे तुम जितना शो-ऑफ़ करोगी, उतना तुम्हारा मार्केट बढ़ेगा। यह उन्होंने मुझे सिखाया। और उन्होंने सबसे पहले मुझको बताया कि तुम घर लेने से पहले गाड़ी ले लो। एक बड़ी गाड़ी ले लो और इसलिए मैंने फ़ोर्ड की गाड़ी उस वक़्त ली थी। और एक बात बताना चाहूँगी, पता नहीं रफ़ी साहब और मुकेश जी के साथ, शायद मेरी माँ का, अगले जनम का, या मैं उनकी माँ रह चुकी हूँ पता नहीं, जब मुकेश जी फ़ॉरेन चले गये अमरीका शो के लिये तो जाने से पहले वहाँ हमारे घर आ के हमसे मिल के गये। और मेरी माँ से भी आशीर्वाद लेके गये। और वहाँ जाने के बाद वो गुज़र गये।"


माला सिन्हा - लता मंगेशकर

"लता जी, लता जी, लता जी से हम मिलने गये तो मैं उनको निहारती ही रही, निहारती ही गई। पर लता जी जो हैं, वो धरती पर हैं, धरती के उपर न उनका दिमाग़ है और न पैर। तो उनको देखा, खिलखिलाके हँसती हैं, बहने कहकर बातचीत करती हैं, हमने सब बातचीत की, मैंने कहा कि दीदी, मुझे आपकी आवाज़ बहुत अच्छी लगती है, आपने इतने गाने गाये, मेरे लिये भी गाये, मैं तो बचपन से आपका फ़ैन रह चुकी हूँ। मैं आपका गाना गा गा कर मुझे 'बेबी लता' का खिताब मिला हुआ था। तो उन्होंने कहा कि फिर गाना क्यों प्रैक्टिस करती? उन्होंने मुझे कहा, मुझे डाँटा कि अरे इतनी अच्छी आवाज़ है, उन्होंने सुना भी मुझे, गाके बता, प्रैक्टिस किया करो, उनके भाई भी, हृदयनाथ जी ने भी कहा, दोनो ने मुझे सुना है, फ़ंक्शन में, गाना गाते हुए, क्योंकि बाँग्ला में मैंने बहुत सारे फ़ंक्शन में गाने गाये हैं। कल्याणजी-आनन्दजी भाई के गाने गाये, "कंकरिया मार के जगाया", यह गाना मैंने, तो उन्होंने मेरी आवाज़ सुनी हुई है। तो बोली कि तू पागल है, रियाज़ किया कर। तो मैंने बोला कि दीदी, आपके होते हुए मैं क्यों गाऊँ? आप इतना अच्छा गाती हैं मेरे लिए, मेरी ऐक्टिंग ही ठीक है।"



कॉपीराइट: विविध भारती



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Tuesday, January 6, 2015

घुघूती बासूती की कहानी क्या अगले साल

इस साप्ताहिक स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको हिन्दी में मौलिक और अनूदित, नई और पुरानी, प्रसिद्ध कहानियाँ और छिपी हुई रोचक खोजें सुनवाते रहे हैं। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में वरुण कुमार जायसवाल की छोटी सी लेकिन मर्मस्पर्शी कथा "लाज" का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं घुघूती बासूती की हृदयस्पर्शी संस्मरणात्मक कथा क्या अगले साल जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

"क्या अगले साल" का गद्य घुघूती बासूती ब्लॉग पर उपलब्ध है। उनका व्यंग्य "ओह" हम आपको पहले सुना चुके हैं।

कहानी "क्या अगले साल" का कुल प्रसारण समय 3 मिनट 39 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

संसार में कुछ अंतिम कुछ प्रथम नहीं होता। संसार एक तरह का मेरी गो राउंड है। सब कुछ जाता है सब कुछ वापिस आता है। बस जब अपने सामने आए तो पकड़ लो, थाम लो इक पल। जी लो वही इक पल!
घुघूती बासूती

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"सोचा कि माँ और बाबा शायद कोई विस्मयकारी गुप्त योजना बना रहे हैं।"
 (घुघूती बासूती रचित "क्या अगले साल" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
क्या अगले साल MP3

#First Story, Kya Agle Saal: Ghughuti Basuti/Hindi Audio Book/2015/1. Voice: Anurag Sharma

Sunday, January 4, 2015

स्वागत नववर्ष 2015 : SWARGOSHTHI – 201 : RAG BHAIRAVI



स्वरगोष्ठी – 201 में आज

मंगलध्वनि और राग भैरवी

मंगलवाद्य शहनाई-वादन से नववर्ष का अभिनन्दन




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का नए वर्ष के पहले अंक में हार्दिक अभिनन्दन है। इसी 201वें अंक से आपका प्रिय स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पाँचवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। विगत चार वर्षों से हमें असंख्य पाठकों, श्रोताओं, संगीत शिक्षकों और वरिष्ठ संगीतज्ञों का प्यार, दुलार और मार्गदर्शन इस स्तम्भ को मिलता रहा है। इन्टरनेट पर शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक और सुगम संगीत विषयक चर्चा का सम्भवतः यह एकमात्र नियमित साप्ताहिक स्तम्भ है, जो विगत चार वर्षों से निरन्तरता बनाए हुए है। इस पुनीत अवसर पर मैं कृष्णमोहन मिश्र, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सभी सदस्यों- सजीव सारथी, सुजॉय चटर्जी, अमित तिवारी, अनुराग शर्मा, विश्वदीपक और संज्ञा टण्डन के प्रति भी आभार प्रकट करता हूँ, जिनकी आहुतियाँ भी इस यज्ञ में होती हैं। आज पाँचवें वर्ष के इस प्रवेशांक में हम आपसे इस साप्ताहिक स्तम्भ के आरम्भ की कुछ स्मृतियों को बाँटेंगे। इसके साथ ही आज के इस अंक में शुभ अवसरों पर परम्परागत रूप से बजने वाले मंगलवाद्य शहनाई का वादन भी प्रस्तुत करेंगे। वादक हैं, भारतरत्न के सर्वोच्च अलंकरण से विभूषित उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और राग है सर्वप्रिय भैरवी। इसके अलावा राग भैरवी के स्वरों में पिरोया एक अर्थपूर्ण फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे, जिसे सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पण्डित राजन मिश्र ने गाया है।




ठीक चार वर्ष पूर्व ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ संचालक मण्डल के प्रमुख सदस्य सुजॉय चटर्जी ने रविवार, 2 जनवरी 2011 को इस स्तम्भ का शुभारम्भ किया था। आरम्भ में यह ‘हिन्दयुग्म’ के ‘आवाज़’ मंच पर हमारे अन्य नियमित स्तम्भों के साथ प्रकाशित हुआ करता था। उन दिनों इस स्तम्भ का शीर्षक ‘सुर संगम’ था। दिसम्बर 2011 से हमने ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ नाम से एक नया मंच बनाया और पाठकों के अनुरोध पर जनवरी 2012 से इस स्तम्भ का शीर्षक ‘स्वरगोष्ठी’ हो गया। तब से हम आपसे निरन्तर यहीं मिलते हैं। समय-समय पर आपसे मिले सुझावों के आधार पर हम अपने सभी स्तम्भों में संशोधन भी करते रहते हैं। इस स्तम्भ के प्रवेशांक में सुजॉय जी ने इसके उद्देश्यों पर प्रकाश डाला था। उन्होने लिखा था-

“नये साल के इस पहले रविवार की सुहानी सुबह में मैं, सुजॊय चटर्जी, आप सभी का 'आवाज़' पर स्वागत करता हूँ। यूँ तो हमारी मुलाक़ात नियमित रूप से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर होती रहती है, लेकिन अब से मैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के अलावा हर रविवार की सुबह आपसे मुख़ातिब रहूँगा इस नये स्तम्भ में जिसकी हम आज से शुरुआत कर रहे हैं। दोस्तों, प्राचीनतम संगीत की अगर हम बात करें तो वो है हमारा शास्त्रीय संगीत, जिसका उल्लेख हमें वेदों में मिलता है। चार वेदों में सामवेद में संगीत का व्यापक वर्णन मिलता है। इन वैदिक ऋचाओं को सामगान के रूप में गाया जाता था। फिर उससे 'जाति' बनी और फिर आगे चलकर 'राग' बनें। ऐसी मान्यता है कि ये अलग-अलग राग हमारे अलग-अलग 'चक्र' (ऊर्जा विंदु) को प्रभावित करते हैं। ये अलग-अलग राग आधार बनें शास्त्रीय संगीत का और युगों-युगों से इस देश के सुरसाधक इस परम्परा को निरन्तर आगे बढ़ाते चले जा रहे हैं, हमारी संस्कृति को सहेजते हुए बढ़े जा रहे हैं। संगीत की तमाम धाराओं में सब से महत्वपूर्ण धारा है शास्त्रीय अर्थात रागदारी संगीत। बाकी जितनी तरह का संगीत है, उन सबसे उच्च स्थान पर है अपना रागदारी संगीत। तभी तो संगीत की शिक्षा का अर्थ ही है शास्त्रीय संगीत की शिक्षा। अक्सर साक्षात्कारों में कलाकार इस बात का ज़िक्र करते हैं कि एक अच्छा गायक या संगीतकार बनने के लिए शास्त्रीय संगीत का सीखना बेहद ज़रूरी है। तो दोस्तों, आज से 'आवाज़' पर पहली बार एक ऐसा साप्ताहिक स्तम्भ शुरु हो रहा है जो समर्पित है, भारतीय परम्परागत शास्त्रीय संगीत को। गायन और वादन, यानी साज़ और आवाज़, दोनों को ही बारी-बारी से इसमें शामिल किया जाएगा। भारतीय संगीत से इस स्तम्भ की हम शुरुआत कर रहे हैं, लेकिन आगे चलकर अन्य संगीत शैलियों को भी शामिल करने की उम्मीद रखते हैं।...”

तो यह सन्देश हमारे इस स्तम्भ के प्रवेशांक का था। ‘स्वरगोष्ठी’ की कुछ और पुरानी यादों को ताज़ा करने से पहले आज का चुना हुआ संगीत सुनते हैं। आज ‘स्वरगोष्ठी’ पाँचवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। इस पावन अवसर पर मंगल वाद्य शहनाई का वादन प्रस्तुत कर रहे हैं। इस अंक में हम देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारतरत्न’ से अलंकृत उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर राग भैरवी प्रस्तुत कर रहे हैं।


मंगलध्वनि : राग भैरवी : शहनाई वादन : उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ


हमारे दल के सर्वाधिक कर्मठ साथी सुजोय चटर्जी ने ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ की नीव रखी थी। उद्देश्य था- शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत-प्रेमियों को एक ऐसा मंच देना जहाँ किसी कलासाधक, प्रस्तुति अथवा किसी संगीत-विधा पर हम आपसे संवाद कायम कर सकें और आपसे विचारों का आदान-प्रदान कर सकें। आज के 201वें अंक के माध्यम से हम कुछ पुरानी स्मृतियों को ताज़ा कर रहे हैं। जैसा कि पहले ही उल्लेख किया गया है कि इस स्तम्भ की बुनियाद सुजॉय चटर्जी ने रखी थी और आठवें अंक तक अपने आलेखों के माध्यम से अनेक संगीतज्ञों की कृतियों से हमें रससिक्त किया था। नौवें अंक से हमारे एक नये साथी सुमित चक्रवर्ती हमसे जुड़े और आपके अनुरोध पर उन्होने शास्त्रीय, उपशास्त्रीय संगीत के साथ लोक संगीत को भी ‘सुर संगम’ से जोड़ा। सुमित जी ने इस स्तम्भ के 30वें अंक तक आपके लिए बहुविध सामग्री प्रस्तुत की, जिसे आप सब पाठकों-श्रोताओं ने सराहा। इसी बीच मुझ अकिंचन को भी कई विशेष अवसरों पर कुछ अंक प्रस्तुत करने का अवसर मिला। सुमित जी की पारिवारिक और व्यावसायिक व्यस्तता के कारण 31वें अंक से ‘सुर संगम’ का पूर्ण दायित्व मेरे मित्रों ने मुझे सौंपा। मुझ पर विश्वास करने के लिए अपने साथियों का मैं आभारी हूँ। साथ ही अपने पाठकों-श्रोताओं का अनमोल प्रोत्साहन भी मुझे मिला, जो आज भी जारी है।

पिछले 200 अंकों में ‘स्वरगोष्ठी’ से असंख्य पाठक, श्रोता, समालोचक और संगीतकार जुड़े। हमें उनका प्यार, दुलार और मार्गदर्शन मिला। उन सभी का नामोल्लेख कर पाना सम्भव नहीं है। ‘स्वरगोष्ठी’ का सबसे रोचक भाग प्रत्येक अंक में प्रकाशित होने वाली ‘संगीत पहेली’ है। इस पहेली में गत वर्ष के दौरान लगभग बारह संगीत-प्रेमियों ने सहभागिता की, जिनमें से चार प्रतिभागी नियमित थे। सभी प्रतिभागियों के पूरे वर्ष भर के प्राप्तांकों की गणना जारी है। अगले अंक में हम प्रथम तीन विजेताओं की घोषणा करेंगे। इस अंक में हम राग भैरवी पर चर्चा कर रहे हैं। राग भैरवी में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद सभी कोमल स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, म (कोमल), रे॒ (कोमल), सा होते हैं। यूँ तो इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला में है, किन्तु आम तौर पर इसका गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। आइए, इसी राग के स्वरों में निबद्ध एक फिल्मी गीत सुनते हैं। यह गीत हमने 1985 की फिल्म ‘सुर संगम’ से लिया है। फिल्म के संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल और गीतकार बसन्त देव हैं। राग भैरवी पर आधारित जो गीत हम प्रस्तुत कर रहे हैं, उसे सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित राजन मिश्र ने स्वर दिया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भैरवी : ‘धन्यभाग सेवा का अवसर पाया...’ : फिल्म सुर संगम : पण्डित राजन मिश्र और कविता कृष्णमूर्ति




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 201 अंक की पहेली में आज हम आपको किसी गीत या संगीत का अंश नहीं सुनवा रहे हैं। आज की पहेली के दोनों प्रश्न ऊपर सुनवाए गए मंगलवाद्य शहनाई से सम्बन्धित है। उपरोक्त शहनाई वादन को एक बार पुनः ध्यान से सुनिए। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 210 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2015 की इस पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।

1 – इस वाद्य संगीत को सुन कर क्या आपको किसी लोकप्रिय भक्ति-गीत की प्रचलित धुन का अनुभव हो रहा है? यदि हाँ, तो उस गीत की आरम्भिक पंक्ति बताइए।

2 – यह भी बताइए कि यह भक्ति-काल के किस कवि / कवयित्री की रचना है? 

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 10 जनवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 203वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 199वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1981 में प्रदर्शित फिल्म ‘कुदरत’ के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका विदुषी परवीन सुल्ताना। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर पूर्व की भाँति जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ ने इस अंक के साथ पाँचवें वर्ष में प्रवेश किया है। नए वर्ष में हम आपके लिए कुछ नई श्रृंखलाएँ लेकर उपस्थित हो रहे हैं। हमारी आगामी श्रृंखलाएँ आपके सुझावों पर आधारित है। यदि आपने अभी तक अपने सुझाव और फरमाइश नहीं भेजी हैं तो आविलम्ब हमें भेज दें। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 


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