Saturday, December 27, 2014

बातों बातों में - INTERVIEW OF ACTOR, MODEL & FORMER CRICKETER SAJIL KHANDELWAL

 बातों बातों में - 03

फिल्म अभिनेता व पूर्व-क्रिकेटर सजिल खण्डेलवाल से सुजॉय चटर्जी की बातचीत

" मेहनत ज़रूर रंग लाती है..." 






नमस्कार दोस्तों। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते। काश, परदे से इतर इनके जीवन के बारे में कुछ मालूमात हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने बीड़ा उठाया है फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का। फ़िल्मी अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रृंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार के दिन। आज दिसम्बर, 2014 के चौथे शनिवार के दिन प्रस्तुत है अभिनेता, मॉडल और पूर्व-क्रिकेटर सजिल खण्डेलवाल से सुजॉय चटर्जी की लम्बी बातचीत के सम्पादित अंश। सजिल खण्डेलवाल अपने क्रिकेट करीयर में रणजी ट्रॉफ़ी खेल चुके हैं, और अब फ़िल्म जगत में उनका पदार्पण होने वाला है फ़िल्म 'Confessions of a Rapist' से जिसमें वो नायक की भूमिका में नज़र आयेंगे। तो आइए स्वागत करते हैं सजिल खण्डेलवाल का। 




सजिल, 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के मंच पर आपका हार्दिक स्वागत है, और आपका बहुत-बहुत धन्यवाद हमारे इस निमंत्रण को स्वीकार करने के लिए।

धन्यवाद!

आपकी पहली फ़िल्म और वह भी नायक की भूमिका में जल्द ही प्रदर्शित होने जा रही है - Confessions of a Rapist' । इस फ़िल्म के लिए आप हमारी अग्रिम शुभकामनाएँ स्वीकार करें।

बहुत बहुत धन्यवाद!

हम आपकी इस फ़िल्म की विस्तृत चर्चा इस साक्षात्कार में आगे चलकर करेंगे, लेकिन शुरूआत हम शुरू से करना चाहते हैं। तो बताइए अपने जन्म और बचपन के बारे में। कैसे थे बचपन के वो दिन?

मेरी पैदाइश लखनऊ, उत्तर प्रदेश की है। एक बड़े ही इज़्ज़तदार घराने में मेरा जन्म हुआ। शुरू से ही मेरा स्वभाव सरल सहज रहा; मैं चालाक नहीं था पर हर चीज़ का ज्ञान था। कभी कभार शरारतें भी करता था जब दूसरे दोस्त शरारत करते। बचपन के वो दिन भी क्या दिन थे। सबसे पहली बात तो यह कि मैं कभी भी स्कूल ठीक समय पर नहीं पहुँच पाता था, हमेशा लेट। और इसलिए पनिशमेण्ट भी ख़ूब मिलता था मुझे। ट्यूशन में भी वही हाल था। कई बार ऐसा हुआ कि मेरे मम्मी-डैडी को मेरी शिकायत आ जाया करती, और फिर डैडी से मुझे डाँट पड़ती। जैसे जैसे उम्र बढ़ती गई, मैं और ज़्यादा शरारती और होशियार होता चला गया। मेरे टीचर्स हमेशा मेरे मम्मी-डैडी को कहते कि आपका बेटा होशियार और तेज़ है, पर शरारती बहुत है। और यह भी कहते कि अगर सही दिशा मिले तो आपका बेटा कमाल कर सकता है।

अच्छा अपने बचपन के दोस्तों के बारे में भी बताइए?

मेरे बहुत ही कम दोस्त हुआ करते थे, दो या तीन। हम एक साथ पढ़ाई करते, एक साथ खेलते-कूदते, एक साथ क्लास बंक करते, आपस में अपने-अपने मसले भी सुलझाते। मतलब हमने साथ में हर एक पल का भरपूर आनन्द लिया।

आपने बताया कि आप शरारती बहुत थे; तो क्या अपनी शरारत भरी कोई घटना याद है?

जी हाँ, शायद 15 साल पहले की बात होगी। मैंने सीढ़ियों में तेल डाल दिया था ताकि मेरा क्लास टीचर जैसे ही सीढ़ियों से उतरने लगे तो वो गिर पड़े, क्योंकि मुझे वो बिल्कुल भी पसन्द नहीं थीं। पर अफ़सोस (हँसते हुए) कि वो नहीं गिरीं।

अच्छा सजिल, ये तो थी आपके बिल्कुल बचपन के दिनों का हाल, यह बताइए कि आपने क्रिकेट खेलना, मेरा मतलब है, गम्भीरता से क्रिकेट खेलना कब शुरू किया?

गम्भीरता से क्रिकेट खेलना मैंने 8 वर्ष की आयु से शुरू किया था। मेरे डैडी हमेशा यह चाहते थे कि मैं एक क्रिकेटर बनूँ और उसमें बहुत दूर तक जाऊँ। मैं स्कूल में क्रिकेट खेलता था, घर के आस-पड़ोस में दोस्तों के साथ खेलता था, और मैं काफ़ी अच्छा खेल लेता था शुरू से ही। मुझे आउट करना मुश्किल होता था। क्रिकेट को लेकर मेरे अन्दर एक दॄढ़ संकल्प था शुरू से ही। धीरे धीरे मेरे दोस्तों और आस-पड़ोस के लोगों को यह आभास हो गया कि मैं वाक़ई अच्छा खेलता हूँ और उन सब ने मुझसे कहा कि मुझे क्रिकेट को गम्भीरता से लेनी चाहिए। सबने यह भी सुझाव दिया कि मुझे किसी क्रिकेट अकादमी में एक अच्छे कोच से इसकी तालीम लेनी चाहिए। जब मैंने यह बात अपने मम्मी-डैडी को बताई तो मेरे डैडी मुझे के. डी. सिंह बाबू  स्टेडियम ले गए जहाँ मुझे श्री संजीव पन्त और श्री शशिकान्त सिंह जैसे गुरु मिले। और वहीं से शुरू हुआ क्रिकेट का औपचारिक सफ़र।

वाह! उस वक़्त आपके फ़ेवरीट प्लेअर कौन होते थे?

ऑस्ट्रेलिआ के मार्क वा।

सजिल, क्रिकेटर बनने का आपका औपचारिक सफ़र शुरू हो गया। लेकिन एक सफल क्रिकेटर बनने और रणजी ट्रॉफ़ी में जगह बनाने के लिए किस तरह का संघर्ष आपको करना पड़ा, यह हम जानना चाहेंगे।

क्रिकेटर बनने की राह पर चलना आसान नहीं रहा। कड़ी मेहनत करनी पड़ी। सुबह बहुत जल्दी उठ कर दौड़ना पड़ता था अपने आप को फ़िज़िकली फ़िट रखने के लिए। उस वक़्त मैं स्कूल में था। तो वापस लौट कर स्कूल के लिए तैयार होकर जाना पड़ता था। स्कूल के बाद प्रैक्टिस सेशन में जाता; वहाँ से लौट कर पढ़ाई, और फिर आठ घंटे की नींद। यह मेरी दिनचर्या हुआ करती थी। जैसा कि कहा जाता है कि मेहनत रंग ज़रूर लाती है, मेरे साथ भी यही हुआ। मैं कानपुर गया जहाँ उत्तर प्रदेश क्रिकेट ऐसोसिएशन का मुख्य कार्यालय स्थित है। हर साल वहाँ ट्रायल होता है, यानी कि नए खिलाड़ियों की खोज। मुझे भी वहाँ 'Under 12 Trial' में जाने का मौका मिला। मैं बहुत घबराया हुआ था क्योंकि मेरी उम्र उस वक़्त सिर्फ़ दस साल थी। मैं ख़ुशनसीब था जो मुझे एक बहुत ही अच्छा कोच मिला जिन्होंने मुझे हर वक़्त उत्साह दिया और मेरी मदद की। मुझे याद है कि उस वक़्त कानपुर में मैं रो रहा था क्योंकि सीटें बहुत कम थीं और 500 से 1000 खिलाड़ी आए हुए थे। पर मैंने अपने आप को सम्भाला, आत्मविश्वास को वापस लाया और खेल के मैदान में उतर गया। करीब 1000 खिलाड़ियों में 40 का सीलेक्शन हुआ, और मैं उनमें से एक था। उस कैम्प का नाम था  'Uttar Pradesh Under 12 Top 40'। कैम्प चार दिनों का था। फिर मैं 12 खिलाड़ियों के टीम में चुन लिया गया। उन शुरुआती मैचों में मैंने 51 और 70 रन बनाए, यानी कि मेरा प्रदर्शन सराहनीय रहा। फिर मेरा सफ़र शुरू हुआ Under 14, 16, 19, 22 से होते हुए रणजी तक का। मैंने कुछ चार या पाँच मैच खेले, मेरा प्रदर्शन ठीक-ठाक था, बहुत अच्छा भी नहीं और बहुत ख़राब भी नहीं। मैं अपनी बल्लेबाज़ी की शुरुआत ऑफ़-ब्रेक से किया करता था। रणजी ट्रॉफ़ी की टीम में शामिल होने के लिए किसी भी खिलाड़ी को शारीरिक और मानसिक रूप से फ़िट होना पड़ता है, और मैं हमेशा इस तरफ़ ध्यान देता था। और मैंने अपने स्टेट लेवेल 'Under 16' और 'Under 19' के मैचों में क्रम से 56, 78, 43 और 65 स्कोर किया था। मेरे अन्दर हमेशा अच्छी नेट्रुत्व-क्षमता थी, तो ये सब तमाम चीज़ें काम आयी रणजी टीम में शामिल होने में।

बहुत ख़ूब! आपकी बातों से ऐसा लग रहा है कि आप एक अच्छा क्रिकेटर बनने की क्षमता रखते थे। फिर ऐसा क्या हुआ कि आपने क्रिकेट को अलविदा कह दिया और मॉडेलिंग की दुनिया में आ गए?

मैं कभी अपना प्रोफ़ेशन बदलना नहीं चाहता था, मैं एक क्रिकेटर ही रहना चाहता था, पर वह कहते हैं ना कि नसीब में जो रहता है वही होता है। सबसे बड़ी बात जो मेरे साथ हुई वह यह कि मैंने अपने पीक टाइम में अपने डैडी को हमेशा के लिए खो दिया। और इससे क्रिकेट खेलने की जो प्रेरणा मुझे उनसे मिलती थी, वह ख़तम हो गई, और मेरा इन्टरेस्ट भी ख़तम हो गया।

बहुत ही अफ़सोस की बात है! क्या उम्र रही होगी आपकी उस वक़्त?

मैं उस वक़्त 19 साल का था।

बहुत ही कठिन समय रहा होगा यकीनन। फिर मॉडेलिंग और फ़ैशन जगत में क़दम रखने के लिए आपने अपने आप को किस तरह से तैयार किया?

मैं यह मानता हूँ कि किसी भी प्रोफ़ेशन में सफलता प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत और लगन ज़रूरी होता है। अगर आप फ़ैशन जगत में एन्टर कर रहे हो तो आपका चेहरा, शारीरिक गठन, बॉडी लैंगुएज, कम्युनिकेशन स्किल्स बहुत ज़रूरी होता है। और अपने आप पर भरोसा होना भी बेहद ज़रूरी है; मन में यह विश्वास बनाए रखना कि चाहे कोई भी रोल हो, उसे आप निभा सकते हो। यह ज़रूर है कि एक नवागन्तुक होने की वजह से आप अपने काम और किरदार ख़ुद चुन नहीं सकते, पर आपको अपने आप को हर किरदार और हर काम के लिए तैयार रहना है। मैं हमेशा आइने के सामने घंटों खड़े हो कर प्रैक्टिस किया करता था।

क्रिकेटर बनने का स्ट्रगल तो आपने बताया था, मॉडल बनने के लिए भी ज़रूर एक बार फिर से स्ट्रगल करना पड़ा होगा?

पहली बात तो यह कि मैं बेशक़ मॉडेलिंग की दुनिया में आया, पर मेरा मक़सद एक मॉडल बनना नहीं था। मैं शुरू से ही एक अभिनेता बनना चाहता था। मैंने 21 वर्ष की आयु में अपनी ग्रैजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद ही मॉडेलिंग्‍ शुरू की। मैं अक्सर मॉडल कोर्डिनेटर्स के पीछे भागता रहता, उन्हें अपनी तस्वीरें दिखाता, और फ़ॉलो-अप करता रहता। यह एक 24-घंटों का प्रोफ़ेशन है। इसमें आपका शारीरिक गठन, उच्चता, चेहरे की बनावट, फ़ोटोजेनिक होना, ये सब चीज़ें ज़रूरी होती हैं।

कहते हैं कि ग्लैमर की दुनिया के इन चकाचौंध के पीछे का जो अन्धेरा है वह लोगों को दिखाई नहीं देता। मेरा मतलब है कि इस लाइन में सुनने में आता है कि नवागन्तुक युवाओं का शोषण और उत्पीड़न होता है। आपके क्या विचार हैं इस बारे में?

मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि यह डीपेन्ड करता है कि इस तरह की चीज़ों को कोई कितनी समझदारी और होशियारी से हैन्डल कर सकता है। यह सच है कि लोग इस प्रोफ़ेशन के बारे में बहुत सी बातें करते हैं, पर मैं यही कहना चाहता हूँ कि हमें प्रैक्टिकल होना चाहिए और सिर्फ़ अपनी मेहनत पर भरोसा रखना चाहिए, बस! किसी से कुछ पाने की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए; अगर आपमें वह बात है, अगर आपकी मेहनत में सच्चाई है तो काम ज़रूर मिलेगा। वैसे इस प्रोफ़ेशन में उतार-चढ़ाव बहुत हैं। बहुत से लड़के लड़कियों को समझौता करने को कहा जाता है। बहुत धोखेबाज़ लोग भी भर गए हैं इस लाइन में जो युवा लड़कों और लड़कियों को अपना शिकार बनाते हैं। ऐसे बहुत सी घटनाएँ हैं जो यहाँ कहना मुमकिन नहीं।

जी, मैं समझ सकता हूँ। आपकी इन बातों से युवा-वर्ग को जो सन्देश मिलना था, वह मिल चुका होगा। अच्छा अब यह बताइए कि आपने अपना पहला रैम्प शो किस तरह से हासिल किया? इसके बारे में कुछ बताइए?

वह मेरे कॉलेज का ही शो था जहाँ मुझे Mr. Prince का ख़िताब दिया गया। फिर उसके बाद मेरा पहला डिज़ाइनर शो था मुम्बई में उमैर ज़फ़र का।

दिल की क्या हालत रही होगी उस पहले पहले शो को करते हुए?

मुझे घबराहट नहीं हुई, पर मैं उत्तेजित ज़रूर था। मैंने रिहर्सल्स ठीक तरह से किए और स्टेज को हिट करने के लिए तैयार हो गया। (हँसते हुए)

यानी वही आत्मविशास एक बार फिर नज़र आया, जो क्रिकेट के मैदान में दिखता था। फिर किन किन डिज़ाइनर्स और ब्रैण्ड्स के फ़ैशन शोज़ आपने किए?

उमैर ज़फ़र के साथ
उमैर ज़फ़र के शोज़ मैं नियमित रूप से करता हूँ। मुम्बई के ही डिज़ाइनर ख़ुशीज़ के शोज़ मैंने किए। लखनऊ के डिज़ाइनर अभिजीत साईप्रेम के लिए रैम्प शोज़ मैंने किए। दिल्ली के डिज़ाइनर सदन पाण्डे के फ़ैशन शो में भी जल्दी ही काम करने जा रहा हूँ। इस तरह से जब जो शोज़ आ रहे हैं मैं करता चला जा रहा हूँ।

प्रिन्ट मीडिया में आपका पहला विज्ञापन कौन सा था?

मेरा पहला प्रिन्ट-शूट 'मदर्स डे प्रोमो शूट' था ब्लैकबेरी फ़ोन के लिए। वह एक बहुत बड़ा शूट था जिसके लिए 117 लड़के ऑडिशन के लिए आए हुए थे। सभी की टेस्ट ली गई और उनमें से मैं सीलेक्ट हुआ। मुझे अपने आप पर बहुत गर्व महसूस हुआ, और मेहनताना भी बहुत अच्छा मिला मुझे। उस ऐड को करते हुए मुझे बहुत मज़ा आया पर मैं घबराया हुआ था। पर यह ज़िन्दगी की सच्चाई ही है कि जब आप अपना 100% देते हो, तभी उसका परिणाम भी उतना ही अच्छा होता है।

और कौन कौन से विज्ञापन में आप नज़र आए हैं?

टेलीविज़न पर जो ऐड्स आते हैं, उनमें से 99% स्थापित फ़िल्म कलाकारों द्वारा किए जाते हैं, या फिर सीनियर टीवी कलाकार उन्हें करते हैं। मैंने प्रिन्ट शूट्स किए हैं लेनिन, ग्रासिम सूटिंग्स, वेडिंग टाइम्स मैगज़ीन, ब्लैकबेरी जैसे ब्राण्ड्स के लिए। फ़ैशन मैगज़ीन के कवर पेज पर भी मैं आ चुका हूँ। कैटलॉग शूट्स भी किए हैं। अब तक मुझे अच्छा रेस्पॉन्स मिला है। अगले साल जनवरी-फ़रवरी में कुछ अच्छे काम मुझे मिल रहे हैं।

एक मॉडल के लिए एक नियमित दिनचर्या का होना बहुत आवश्यक होता है शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए। आप किस तरह से इस बात को ध्यान में रखते हैं?

दिनचर्या... मेरा दिन शुरू होता है सुबह 9 या कभी कभी 10 बजे से। मैं हेवी ब्रेकफ़ास्ट करता हूँ और फिर छोटे-छोटे मील्स लेता हूँ लंच, मिड-मील, डिनर के साथ साथ। मैं एक फ़िटनेस-फ़्रीक हूँ, ईश्वर का मुझ पर आशीर्वाद ही रहा है कि मुझे एक अच्छा शरीर मिला है। और यह शूट पर भी डीपेन्ड करता है। और एक बात यह भी है कि आजकल सिर्फ़ इस प्रोफ़ेशन के लिए ही फ़िट रहना ज़रूरी नहीं बल्कि आजकल की ज़िन्दगी में हर किसी को फ़िट रहना चाहिए। जब मैं जिम जाता हूँ तो 40 मिनट वेट ट्रेनिंग करता हूँ और 20 मिनट कार्डियो और रनिंग करता हूँ।

आपने अपने फ़ूड-हैबिट की बात की; इसके बारे में और ज़रा सा विस्तार से बताइए?

मैं बहुत ही पौष्टिक आहार लेता हूँ। ब्रेकफ़ास्ट में एक सेब, दो केले, दो अन्डे का सफ़ेद हिस्सा और एक प्रोटीन शेक विथ मल्टिविटामिन लेता हूँ। लंच में एक कटोरी दाल, तीन रोटियाँ, हरी सब्ज़ियाँ, दही और चावल। जिम से निकल कर दूध और अन्डे लेता हूँ। डिनर में दो रोटियाँ और सब्ज़ियाँ लेता हूँ। दिन में तीन लिटर पानी पीता हूँ और आठ घंटे सोता ज़रूर हूँ जो एक स्वस्थ जीवन के लिए बहुत ज़रूरी होता है।

मॉडल से एक अभिनेता कैसे बने आप? क्या पहले भी कभी आपने कहीं अभिनय किया था? 'Confessions...' फ़िल्म का रोल आपको कैसे मिला?

मेरे हिसाब से हर किसी के अन्दर एक अभिनेता छुपा हुआ है। आपको बस इसका अहसास होना चाहिए, यही मेरे लिए अभिनय है। मैंने इससे पहले कभी कहीं अभिनय नहीं किया था। जैसे ही इस फ़िल्म की और इस रोल की ख़बर सुनी मुझे ऐसा लगा कि यह रोल सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे लिए है और मैं यह रोल किसी भी अन्य नए अभिनेता से बेहतर निभा सकता हूँ। यह रोल बोल्ड था और उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। मैंने ’लूक टेस्ट’ दिया, फिर मुझे ऑडिशन का बुलावा आया। दस ऑडिशन देने के बाद आख़िरकार इस ऑडिशन में मैं चुन लिया गया। प्रोडक्शन टीम ने मुझे सुबह सवा दस बजे फ़ोन किया और उनके दफ़्तर में जाकर उनसे मिलने को कहा। मैं वहाँ पहुँचा तो निर्देशक महोदय ने कहा कि सजिल, बधाई हो, आप फ़िल्म में नायक के रोल के लिए चुन लिए गए हो। मुझे जैसे एक झटका लगा, कुछ देर के लिए मैं बिल्कुल ख़ामोश सा हो गया और सोचने लगा कि कहीं मैं सपना तो नहीं देख रहा। फिर मुझे यकीन हुआ कि अपने जीवन के अब तक का सबसे बड़ा मुहुर्त मैं अनुभव कर रहा था। मुझे इतनी ख़ुशी हुई कि क्या बताऊँ। मैंने तुरन्त अपनी मम्मी को फ़ोन किया और उन्हें यह ख़ुशख़बरी दी।

वाह! वाक़ई बड़ा ही सुखद अनुभव रहा होगा। अच्छा सजिल, अब आप इस फ़िल्म के बारे में ज़रा विस्तार में बताइए कि फ़िल्म की विषयवस्तु क्या है?

जैसा कि फ़िल्म के शीर्षक से ही प्रतीत होता है कि फ़िल्म की कहानी बलात्कार पर केन्द्रित है। मैं इस फ़िल्म में एक दोहरा-किरदार निभा रहा हूँ। पहले किरदार में मेरी थोड़ी सी दाढ़ी है, एक पोनी टेल है, और पतला शरीर है। और दूसरे किरदार में मैं क्लीन शेव और सामान्य छोटे बालों वाला हूँ। फ़िल्म की शूटिंग् दिल्ली, गोरखपुर और कानपुर में हुई है। यह फ़िल्म समाज को एक सशक्त सन्देश देगा बलात्कार विरोधी अभियान के बारे में, जो आज के भारतीय समाज के सबसे जघन्य अपराधों में से एक है। साथ ही नारी सुरक्षा का भी सन्देश है इस फ़िल्म में। मैं इससे ज़्यादा इस वक़्त नहीं बता सकता फ़िल्म के बारे में। बस इतना कहूँगा कि फ़िल्म में दो लड़कियाँ हैं जो मुख्य किरदारों में हैं, एक जो मेरी बहन का रोल निभा रही है और दूसरी जो एक रिपोर्टर है। मेरी ही तरह इस फ़िल्म के निर्देशक भी फ़िल्म जगत में अपना पहला क़दम रख रहे हैं। He is a chilled out guy and also very young. उन्हें भी इस फ़िल्म से बहुत सारी उम्मीदें हैं और उनका यह मानना है कि यह फ़िल्म हर किसी को पसन्द आएगी।

फ़िल्म के सह-कलाकारों और ख़ास कर निर्देशक के साथ आपकी ट्युनिंग् कैसी रही? पहली फ़िल्म होने की वजह से आपको बहुत कुछ सीखने को भी मिला होगा न?

मुझे पूरी टीम यूनिट के साथ काम करते हुए बहुत ही मज़ा आया, ख़ूब मस्ती की। साथी कलाकारों और निर्देशक साहब के साथ काम करके बहुत अच्छा लगा। इस यूनिट के साथ जुड़ने का जो मौका मुझे मिला, इसे मैं अपनी ख़ुशक़िस्मती समझता हूँ। भविष्य में फिर कभी मौका मिले तो इस यूनिट का दोबारा हिस्सा बनना चाहूँगा। हम जैसे एक ही परिवार के सदस्य बन गए थे। इस फ़िल्म को करते हुए मुझे बहुत ही ख़ूबसूरत तजुर्बे हुए, पर मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि एक अभिनेता बनने के लिए प्रतिबद्धता के साथ-साथ भाग्य भी साथ में होना चाहिए। जब बात ना बन रही हो और टेक के बाद टेक हो रहे हों तो आदमी झल्ला जाता है। और कभी-कभी ऐसा वक़्त भी आता है कि आपको लगता है कि सबसे उपर हो। शूटिंग के दौरान पूरे यूनिट की निगाह आप पर होती है। तो कभी कोई शॉट इतना बेकार होता है कि आप झल्ला जाते हो। फिर यह भी कहा गया है कि practice makes a man perfect। मुम्बई में हर रोज़ लाखों लोग क़दम रखते हैं फ़िल्म जगत में अपने सपनों को पूरा करने के लिए। पर बहुत कम लोग ही कुछ कर पाते हैं। मैं ख़ुशनसीब हूँ कि मुझे यह मौका मिला और भविष्य में भी मैं अच्छे प्रोजेक्ट्स में काम कर सकूँ, उसकी कोशिश मैं करता रहूँगा। अभी तो करीअर की बस शुरूआत ही है।

और हम आपको इसके लिए ढेरों शुभकामनाएँ देते हैं।

धन्यवाद!

अच्छा सजिल, इस फ़िल्म की पृष्ठभूमि से तो आपने हमें अवगत करवाया, लेकिन हमने ऐसा सुना है कि फ़िल्म को लेकर कोई विवाद चल रहा है और इसके रिलीज़ की भी तारीख़ अभी निर्धारित नहीं हो पायी है, क्या यह सही है?

जी हाँ, फ़िल्म की रिलीज़ डेट अभी तय नहीं हो पायी है। फ़िल्म विवादित है, पर मेरा इसके बारे में कुछ कहना ठीक नहीं रहेगा। बस इतना कहूँगा कि कि बलात्कार जैसे सेन्सिटिव विषय पर होने की वजह से सेन्सर बोर्ड ने अभी तक अनुमति नहीं दी है। पर जल्दी ही मामला निपट जाएगा और उसके बाद ही रिलीज़ डेट तय की जाएगी।

क्या आपको यह लगता है कि यह विवाद आपके मात्र शुरू हुए करीअर पर बुरा असर कर सकता है? या फिर इस विवाद से फ़िल्म को पब्लिसिटी मिलने की उम्मीद दिखाई देती है?

कोई भी विवाद किसी कलाकार को चोट नहीं पहुँचा सकता। कलाकार का विवाद से क्या लेना देना? कलाकार विवाद के लिए ज़िम्मेदार नहीं होता। और रही पब्लिसिटी स्टण्ट की बात, तो इसका भी कोई मतलब नहीं बनता क्योंकि इस फ़िल्म से कई लोगों का करीअर शुरू होने जा रहा है। मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि हर किसी को पता है कि क्लास स्थायी होता है, मुझे ऑफ़र्स मिल रहे हैं। मेरी इच्छा है कि भविष्य में मुझे अच्छे-अच्छे निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिले। फ़िलहाल तो जैसे ही सेन्सर बोर्ड का यह मामला सुलझ जाता है, हम फ़िल्म का प्रोमोशन शुरू करेंगे और इसकी रिलीज़ के लिए जुट जायेंगे।

जी बिल्कुल! जैसा कि आपने बताया कि फ़िल्म का विषय बोल्ड है, तो क्या अपनी पहली फ़िल्म के लिए ऐसे बोल्ड सब्जेक्ट पर काम करने से आपको डर नहीं लगा? एक पल के लिए भी आपने यह नहीं सोचा कि यह आपके हित में नहीं भी हो सकता है?

यह सच है कि मैंने एक बोल्ड करैक्टर निभाया है इस फ़िल्म में और बहुत चुनौतीपूर्ण भी रहा। पर कोई भी अभिनेता ऐसे रोल करने से डरेगा क्यों भला? अगर आपको एक सफल अभिनेता बनना है तो हर तरह के किरदार आपको निभाने पड़ेंगे। और यह रोल तो आज के समाज को एक बहुत ही ज्वलन्त मुद्दे को लेकर एक बड़ा सन्देश दे रहा है। हाल ही में दिल्ली में हमने एक भयानक बलात्कार का हादसा देखा जिसने पूरे देश को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया। उसके बाद भी बलात्कार के मामले कम नहीं हुए हैं। हमारा देश, हमारी सरकार क्या क़दम उठा रही है इस तरफ़, यही सब कुछ हमने इस फ़िल्म में कैप्चर किया है। फ़िल्म के क्लाइमैक्स सीन में हम एक सशक्त सन्देश देने जा रहे हैं। मैं इस फ़िल्म से बहुत ख़ुश हूँ और हम सभी का यह मानना है कि देशवासियों को यह फ़िल्म पसन्द आएगी, ना कि वो इस फ़िल्म को नकारात्मक्ता से देखेगी।

चलिए इस फ़िल्म के बारे में तो हमने जाना, अब यह बताइए कि आप एक अभिनेता के रूप में किस तरह से पनपना चाहते हैं? आपकी किस तरह की उम्मीदें हैं इस फ़िल्म इंडस्ट्री से?

यहाँ पर पनपने का जो सबसे उत्तम तरीका है, वह है कड़ी मेहनत और अपने आप पर भरोसा। मुझे बहुत कुछ करना है आगे, मैं बहुत तरह के किरदार निभाना चाहता हूँ, सिर्फ़ नायक की भूमिका में ही नहीं बल्कि खलनायक और हास्य अभिनेता के रूप में भी अपनी पहचान बनाना चाहता हूँ। मैं मधुर भण्डारकर जी के साथ काम करना चाहता हूँ क्योंकि वो मेरे सबसे पसन्दीदा निदेशक रहे हैं। और मेरे आइडॉल हैं शाहरुख़ ख़ान। वो मेरे सब कुछ हैं।

सजिल, यह बताइए कि पहले क्रिकेट, फिर मॉडलिंग्, उसके बाद फ़िल्म अभिनेता, अब इसके बाद क्या??

कुछ भी नहीं (हँसते हुए), मैं ख़ुशनसीब हूँ कि क़िस्मत ने मुझे इतना कुछ करने का मौका दिया है। पर इस वक़्त मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ अभिनय को लेकर सीरियस हूँ और इसे ही अपना करीअर मानता हूँ और इसी पर अपना पूरा ध्यान लगा रहा हूँ।

आप एक युवा क्रिकेटर, मॉडल और अभिनेता हैं, और निश्चित रूप से युवाओं के लिए एक लाइट-हाउस की तरह भी हैं। क्या सन्देश देना चाहेंगे आप उन युवाओं को जो आप ही की तरह एक क्रिकेटर या अभिनेता/मॉडल बनना चाहते हैं?

मैं सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूँ कि किसी भी शॉर्ट-कट में विश्वास नहीं करनी चाहिए और ना ही किसी से कोई भी उम्मीद रखनी चाहिए। अपने जीवन में आप जो भी करना चाहें, उस तक पहुँचने के लिए कड़ी मेहनत कीजिए और अपना पूरा ध्यान उस पर लगाए रखिए। ईश्वर पर भरोसा कीजिए, वो आपको फल ज़रूर देगा। हमेशा ख़ुश रहिए और चीज़ों को हल्के अंदाज़ में ग्रहण कीजिए। कोई भी प्रोफ़ेशन आप चुनिए, क्रिकेट, मॉडलिंग् या ऐक्टिंग्, सभी में आपको कड़ी मेहनत करनी होगी। सफलता अगर पाना है तो कोई भी शॉर्ट-कट नहीं चलेगा, there is no shortcut to success, मैं ऐसा मानता हूँ।

बहुत अच्छी बात बताई आपने और यह बिल्कुल सही भी है। और सजिल, अन्त में हम यह जानना चाहेंगे कि सजिल उस वक़्त क्या कर रहे होते हैं जब वो ना तो अभिनय कर रहे होते हैं, ना ही मॉडलिंग और ना ही जिम में वर्क आउट?

मुझे बहुत सी चीज़ों का शौक है, जैसे कि मैं क्रिकेट खेलता हूँ अपने निकट के दोस्तों के साथ जब भी मुझे समय मिलता है। बान्द्रा में या फिर जब मैं लखनऊ में होता हूँ तो दोस्तों के साथ हैंग-आउट करता हूँ। मैं अपने प्ले-स्टेशन में भी ख़ूब गेम्स खेलता हूँ। मुझे गाड़ियाँ चलाने का भी बड़ा शौक है। और अपने परिवार के साथ ढेर सारा समय बिताना मुझे बेहद अच्छा लगता है।

बहुत बहुत शुक्रिया सजिल जो आपने हमें अपना कीमती समय दिया और अपने बारे में, और अपनी आने वाली फ़िल्म के बारे में इतना कूछ बताया। आपको फ़िल्म की कामयाबी के लिए ढेरों शुभकामनाएँ देते हुए आपसे विदा लेते हैं, नमस्कार!

आपको बहुत बहुत धन्यवाद, ढेर सारा प्यार, नमस्कार।


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी cine.paheli@yahoo.com पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए।  



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



Sunday, December 21, 2014

‘आयो प्रभात सब मिल गाओ...’ : SWARGOSHTHI – 199 : RAG BHATIYAR


स्वरगोष्ठी – 199 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 8 : राग भटियार


पण्डित राजन मिश्र ने एस. जानकी के साथ भटियार के स्वरों में गाया- 'आयो प्रभात सब मिल गाओ...'



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला, ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। अब हम इस लघु श्रृंखला के समापन की ओर बढ़ रहे हैं। इस श्रृंखला में अभी तक आपने 1943 से 1960 के बीच में बनी कुछ फिल्मों के ऐसे गीत सुने जो रागों पर आधारित थे और इन्हें किसी फिल्मी पार्श्वगायक या गायिका ने नहीं बल्कि समर्थ शास्त्रीय गायक या गायिका ने गाया था। छठे दशक के बाद अब हम आपको सीधे नौवें दशक में ले चलते है। इस दशक में भी फिल्मी गीतों में रागदारी संगीत का हल्का-फुल्का प्रयास किया गया था। ऐसा ही एक प्रयास संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने 1985 की फिल्म ‘सुर संगम’ में किया था। इस फिल्म के मुख्य चरित्र के लिए उन्होने सुविख्यात गायक पण्डित राजन मिश्र (युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र में से एक) से पार्श्वगायन कराया था। आज के अंक में हम आपको इसी फिल्म से पण्डित राजन मिश्र की आवाज़ में राग भटियार के स्वरों में पिरोया एक गीत सुनवा रहे हैं। राग भटियार का एक अलग प्रयोगधर्मी स्वरूप का अनुभव करने के लिए सुप्रसिद्ध गायक पण्डित कुमार गन्धर्व के स्वरों में इस राग की एक आकर्षक रचना भी हम सुनेंगे। 


पण्डित राजन मिश्र
ठवें दशक से ही फिल्म संगीत की प्रवृत्तियों में काफी बदलाव आ चुका था। नौवें दशक के फिल्म संगीत में रागदारी संगीत का समावेश एक उल्लेखनीय घटना मानी जाएगी। ऐसे ही माहौल में 1985 में ‘सुर संगम’ और ‘उत्सव’, दो फिल्में बनीं जिसके संगीत में रागों का सहारा लिया गया था। यह भी उल्लेखनीय है कि इन दोनों फिल्मों के संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल थे। फिल्मों में लम्बे समय तक लोकप्रिय संगीत देने के लिए लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का योगदान सराहनीय रहा है। 1963 में फिल्म ‘पारसमणि’ से फिल्म संगीतकार के रूप में पदार्पण करने वाली इस संगीतकार जोड़ी ने शुरुआती दौर की निम्नस्तरीय स्टंट फिल्मों में भी राग आधारित धुनें बना कर अपनी पैठ बनाई थी। उस दौर में उनकी फिल्में भले ही न चली हो, किन्तु उसका संगीत खूब लोकप्रिय हुआ। उनकी फिल्मों में लोक संगीत और लोकप्रिय सुगम संगीत के साथ-साथ राग आधारित धुनों का भी सहारा लिया गया था। 1985 में प्रदर्शित फिल्म ‘सुर संगम’ में उन्होने तत्कालीन प्रचलित फिल्म संगीत की प्रवृत्तियों के विपरीत संगीत दिया था। इस फिल्म के प्रायः सभी गीत विभिन्न रागों का आधार लिये हुए थे। यही नहीं फिल्म में मुख्य चरित्र के लिए उन्होने किसी फिल्मी पार्श्वगायक को नहीं बल्कि सुप्रसिद्ध शास्त्रीय युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र बन्धुओं में से एक राजन मिश्र का सहयोग लिया।

विदुषी एस. जानकी 
फिल्म ‘सुर संगम’ में राग आधारित संगीत देना एक अनिवार्यता थी। दरअसल यह फिल्म दक्षिण भारतीय फिल्म ‘शंकराभरणम्’ का हिन्दी रूपान्तरण थी। फिल्म में मुख्य चरित्र संगीतज्ञ पण्डित शिवशंकर शास्त्री थे, जो संगीत की शुचिता और मर्यादा के प्रबल पक्षधर थे। अपने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शास्त्री जी मानव-मानव में कोई भेद नहीं मानता थे। ऐसे विषय के लिए राग आधारित संगीत की आवश्यकता थी। फिल्म में राग मालकौंस पर आधारित गीत- ‘आए सुर के पंछी आए...’, राग भूपाली और देशकार पर आधारित गीत- ‘जाऊँ तोरे चरणकमल पर वारी...’, राग भैरवी के सुरों में- ‘धन्यभाग सेवा का अवसर पाया...’ जैसे आकर्षक गीत पण्डित राजन मिश्र की आवाज़ में थे। परन्तु इस फिल्म का जो गीत लेकर आज हम उपस्थित हुए हैं, वह राग भटियार के सुरों में पिरोया गीत- ‘आयो प्रभात सब मिल गाओ...’ है। इस गीत में पण्डित राजन मिश्र के साथ दक्षिण भारत की सुप्रसिद्ध गायिका एस. जानकी के स्वर भी शामिल हैं। गीतकार बसन्त देव का लिखा यह गीत संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने सितारखानी ताल में निबद्ध किया है। इस गीत के अन्य पक्ष पर चर्चा जारी रहेगी, आइए पहले यह गीत सुनते हैं।


राग भटियार : ‘आयो प्रभात सब मिल गाओ...’ : पण्डित राजन मिश्र  और एस. जानकी : फिल्म - सुर संगम : संगीत - लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल : गीत - बसन्त देव



आरोही नी अल्प ले, मध्यम दोऊ सम्हार,
रे कोमल, संवाद म स, क़हत राग भटियार।

अर्थात, इस राग में कोमल ऋषभ और दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। आरोह में निषाद स्वर का अल्प प्रयोग किया जाता है। यह मारवा थाट का सम्पूर्ण जाति का राग है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यह रात्रि के अन्तिम प्रहर विशेष रूप से सन्धिप्रकाश काल में गाया-बजाया जाने वाला राग है। अवरोह के स्वर वक्रगति से लिये जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि यह पाँचवीं शताब्दी के राजा भर्तृहरि की राग रचना है। उत्तरांग प्रधान यह राग भंखार के काफी निकट होता है। राग भंखार में पंचम स्वर प ठहराव दिया जाता है, जबकि राग भटियार में शुद्ध मध्यम पर। यह राग गम्भीर, दार्शनिक भाव और जीवन के उल्लास की अभिव्यक्ति देने में पूर्ण समर्थ है। फिल्म ‘सुर संगम’ का यह गीत इन्हीं भावों की अभिव्यक्ति करता है। राग भटियार का एक शास्त्रोक्त और प्रयोगधर्मी स्वरूप का अनुभव कराने के लिए अब हम आपको पण्डित कुमार गन्धर्व की आवाज़ में इसी राग में एक खयाल रचना भी सुनवाएँगे।

पण्डित कुमार गन्धर्व 
पण्डित कुमार गन्धर्व भारतीय संगीत की एक नई प्रवृत्ति और नई प्रक्रिया के पहले कलासाधक थे। घरानों की पारम्परिक गायकी की अनेक शताब्दी पुरानी जो प्रथा थी उसमें संगीत तो जीवित रहता था, किन्तु संगीतकार के व्यक्तित्व और प्रतिभा का विसर्जन हो जाता था। कुमार गन्धर्व ने पारम्परिक संगीत के कठोर अनुशासन के अन्तर्गत ही कलासाधक की सम्भावना को स्थापित किया। 8 अप्रैल 1924 को बेलगाम, कर्नाटक के पास सुलेभवी नामक स्थान में एक संगीत प्रेमी परिवार में उनका जन्म हुआ था। माता-पिता ने नाम तो रखा था शिवपुत्र सिद्धरामय्या कोमकलीमठ, किन्तु आगे चल कर संगीत जगत में उन्हें कुमार गन्धर्व के नाम से प्रसिद्धि मिली। जिन दिनों कुमार गन्धर्व ने संगीत जगत में पदार्पण किया, उन दिनों भारतीय संगीत दरबारी जड़ता से प्रभावित था। कुमार गन्धर्व, पूर्णनिष्ठा और स्वर संवेदना के साथ एकाकी ही सक्रिय हुए। उन्होने अपनी एक निजी गायन शैली विकसित की जो हमें भक्तिपदों के आत्मविस्मरणकारी गायकी का स्मरण कराती है। वे मात्र एक साधक ही नहीं अन्वेषक भी थे। उनकी अन्वेषण प्रतिभा ही उन्हें भारतीय संगीत का कबीर बनाती है। उनका संगीत इसलिए भी रेखांकित किया जाएगा कि वह लोकोन्मुख रहा है। आइए, अब हम आपको पण्डित कुमार गन्धर्व के स्वर में राग भटियार, तीनताल में निबद्ध एक खयाल सुनवाते हैं। आप इस कृति का रसास्वादन कीजिए और इसी के साथ आज के इस अंक से विराम लेने की हमें अनुमति दीजिए।


राग भटियार : ‘दिन गए बीत दुःख के...’ : पण्डित कुमार गन्धर्व : तीनताल





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 199वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। फिल्म के इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं।वर्ष 2014 की 200वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि आपको इसमें किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – यह रचना किस गायिका की आवाज़ में है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 27 दिसम्बर, 2014 को मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 201वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 197वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1960 में प्रदर्शित बाँग्ला फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ के एक राग आधारित गीत अथवा खयाल का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग बागेश्री और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल मध्य लय तीनताल। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर पूर्व की भाँति जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम भारतीय शास्त्रीय संगीत के विद्वानों द्वारा फिल्मों के लिए गाये गए गीतों पर चर्चा कर रहे हैं। अब हम इस लघु श्रृंखला के समापन की ओर बढ़ रहे हैं। वर्ष 2015 से ‘स्वरगोष्ठी’ की श्रृंखलाओं के बारे में हमे अनेक पाठकों और श्रोताओ के बहुमूल्य सुझाव प्राप्त हो रहे हैं। इन सभी सुझाव पर विचार-विमर्श कर हम नये वर्ष से अपनी प्रस्तुतियों में आवश्यक संशोधन करने जा रहे हैं। यदि आपने अभी तक अपने सुझाव और फरमाइश नहीं भेजी हैं तो आविलम्ब हमें भेज दें। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Saturday, December 20, 2014

"नन्हे जिस्मों के टुकड़े लिए खड़ी है एक माँ..." - 15 साल बाद भी उतना ही सार्थक है यह गीत


एक गीत सौ कहानियाँ - 48 


"बारूद के धुएँ में तू ही बोल जाएँ कहाँ..."





"आज पेशावर पाक़िस्तान में इंसानियत को शर्मिन्दा करने वाला जो हत्याकाण्ड हुआ, जिसमें कई मासूम लोगों और बच्चों को बेरहमी से मारा गया, वह सुन के मेरी रूह काँप गई। उन सभी के परिवारों के दुख में मैं शामिल हूँ" 
- लता मंगेशकर, 16 दिसम्बर 2014


"हमसे ना देखा जाए बरबादियों का समा, 
उजड़ी हुई बस्ती में ये तड़प रहे इंसान, 
नन्हे जिस्मों के टुकड़े लिए खड़ी है एक माँ, 
बारूद के धुएँ में तू ही बोल जाएँ कहाँ..."। 

रीब 15 साल पहले फ़िल्म ’पुकार’ के लिए लिखा गया यह गीत उस समय के परिदृश्य में जितना सार्थक था, आज 15 साल बाद भी उतना ही यथार्थ है। हालात अब भी वही हैं। आतंकवाद का ज़हर समूचे विश्व के रगों में इस क़दर फैल चुका है कि करीबी समय में इससे छुटकारा पाने का कोई भी आसार नज़र नहीं आ रहा है। आतंकवाद का रूप विकराल से विकरालतम होता जा रहा है। इससे पहले सार्वजनिक स्थानों पर हमला कर नागरिकों या फिर फ़ौजी जवानों पर हमला करने से बाज़ ना आते हुए अब लाचार और बेबस मासूम बच्चों को अपना निशाना बना कर आतंकवादियों ने न केवल इन्सानियत को ज़बरदस्त धक्का मारा है बल्कि अपनी कायरता और खोखलेपन का नमूना भी पेश किया है पूरी दुनिया के सामने। पेशावर की दुखद और कल्पनातीत घटना ने समूचे विश्व के लोगों के दिलों को दहला कर रख दिया है, विश्व के हर नागरिक को ऐसी चोट पहुँची है कि हम यह सोचने पर विवश हो गए हैं कि क्या हम वास्तव में इतने लाचार हो गए हैं कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ अब कुछ भी नहीं किया जा सकता? क्या यह बिल्कुल ही असम्भव है कि इस दुनिया के मुखपृष्ठ से आतंकवाद का नामोनिशाँ मिट जाए? और अगर यह मुमकिन है तो फिर कैसे? मज़हबी आतंकवाद भारत, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और मध्यपूर्व एशिया (इराक़, सीरिया आदि देशों) से लेकर अफ़्रीका के नाइजीरिया, केनिया तक अपनी जड़े फैला चुका है। किसी एक देश के लिए इसका खात्मा कर पाना सम्भव नहीं। ज़रूरत है एक ऐसी अन्तर्राष्ट्रीय संस्था के गठन की जिसके सदस्य हों इन तमाम देशों की सरकारें, और संयुक्त रूप से एक ठोस प्रणाली बना कर आतंकवाद पर इस तरह से शिकंजा कसा जाए कि कोई भी आतंकवादी फिर सर ना उठा सके। यह काम असम्भव सा प्रतीत ज़रूर हो रहा है पर मुमकिन है अगर हर देश की सरकार पूरी इमानदारी से इस काम में जुट जाए। इंसान आज मंगल की दर तक जा पहुँचा है, ऐस्टरॉयड के उपर अन्तरिक्ष यान लैण्ड करवा चुका है, तो क्या अपनी ही धरती से आतंकवाद जैसी बीमारी को दूर नहीं कर सकता? फ़िल्म ’पुकार’ के इसी गीत की शुरुआती पंक्तिओं की तरह ईश्वर-अल्लाह से हम बस यही प्रार्थना कर सकते हैं कि-

आ जा के सब मिल के रब से दुआ माँगे,
जीवन में सुकूँ चाहे, चाहत में वफ़ा माँगे,
हालात बदलने में अब देर ना हो मालिक,
जो दे चुके फिर ये अन्धेर ना हो मालिक।

और इस गीत के आख़िर की पंक्तिओं में प्रेम और अमन के सन्देश पर ज़ोर देते हुए जैसे कहा गया है कि "इन्हें फिर से याद दिला दें सबक वही प्यार का, बन जाये गुलशन फिर से काँटों भरी दुनिया", यही बात अगर हर एक इंसान की समझ में आ जाती तो यह संसार हमारे सपनों का संसार हो गया होता।

फ़िल्म ’पुकार’ साल 2000 की फ़िल्म थी। फ़िल्म में लता मंगेशकर का गाया यह एकमात्र गीत है और इसे उन्हीं पर फ़िल्माया गया है। स्कूली बच्चों के साथ गाया गया यह एक प्रार्थना गीत है जिसमें ईश्वर से प्रार्थना के साथ-साथ युद्ध या आतंकवाद के खिलाफ़ आवाज़ भी है; ठीक वैसे जैसे लता जी ने बरसों पहले फ़िल्म ’हम दोनों’ में "अलाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम" गाया था। वैसे तो गीत के गायक कलाकारों के रूप में लता मंगेशकर और कोरस कहा गया है, पर विश्वसनीय सूत्र के हवाले से यह जानकारी मिली है कि जिन चार बाल-गायिकाओं ने लता जी के साथ अपनी आवाज़ें मिलाई थीं, उनके नाम हैं के. विद्या, आर. सुरविहि, आर. प्रिया और सुभिक्षा रंगराजन। इनमें से सुभिक्षा रंगराजन एक शास्त्रीय गायिका बन कर उभरी हैं, बाकि तीन बच्चियों भी क्या आगे चलकर गायिकाएँ बनीं, इसका पता नहीं लगाया जा सका। गायक कलाकारों के बाद अब गीतकार की बारी। फ़िल्म ’पुकार’ के गीतकार के रूप में मजरूह सुल्तानपुरी और जावेद अख़्तर के नाम दिए गए हैं, पर किन्होंने कौन सा गीत लिखा है इसकी जानकारी रेकॉर्ड लेवल पर नहीं दिया गया। सम्भवत: साल 2000 में मजरूह के निधन के बाद जावेद अख़्तर से अधूरा कार्य सम्पन्न करवाया गया होगा। IMDB Database के अनुसार "एक तू ही भरोसा" गीत को मजरूह ने लिखा है, पर कुछ फ़िल्म विश्लेषकों का यह मानना है कि इस गीत के शब्दों पर ग़ौर करने से ऐसा लगता है कि ये जावेद अख़्तर के लिखे बोल हैं। ऐसा मानने का यह भी कारण हो सकता है कि इसी फ़िल्म के आसपास बनने वाली दो और फ़िल्मों - ’1947 अर्थ' और ’बॉर्डर' में उन्होंने इसी तरह के देशभक्ति और विश्वशान्ति के गीत लिखे थे। और आख़िर में बात इस गीत के संगीत की। लता और बच्चों की आवाज़ों के साथ-साथ पियानो के arpeggios का जो संगम ए. आर. रहमान ने किया है, उसने गीत को एक अलग ही मुकाम तक जा पहुँचाया है। इस गीत की धुन रहमान ने इस फ़िल्म के बनने के चार साल पहले, यानी कि 1996 में कम्पोज़ किया था, बोसनिआ के सिविल वार में मरने वाले लाखों लोगों की याद में, जिसे उन्होंने "Oh Bosnia" शीर्षक गीत के माध्यम से मलयेशिया के एक कॉनसर्ट में प्रस्तुत किया था। इसी धुन का इस्तेमाल कर "एक तू ही भरोसा, एक तू ही सहारा" का यह भजन बना, जिसे सभी ने हाथों हाथ ग्रहण किया। 2000 के दशक में लता जी के गाए चन्द गीतों में यह एक महत्वपूर्ण रचना है जो आज के विश्व में एक मार्गदशक गीत है, जिसके बोलों को अगर सही मायने में समझा जाए तो शायद इस विश्व से आतंकवाद का नामोनिशान मिट जाएगा। आइए ऐसी ही दुआ करें।

फिल्म - पुकार : 'आजा कि सब मिल के रब से दुआ मांगे...' : लता मंगेशकर और बच्चे 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की तरफ़ से 16 दिसम्बर 2014 के दिन पेशावर में हुए हत्याकाण्ड में मृत  132 बच्चों की पुण्य स्मृति को विनम्र नमन और अश्रुपूर्ण श्रद्धासुमन अर्पित है।



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी, कृष्णमोहन मिश्र

Tuesday, December 16, 2014

विनय के. जोशी की कथा ईमानदार

इस साप्ताहिक स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको हिन्दी में मौलिक और अनूदित, नई और पुरानी, प्रसिद्ध कहानियाँ और छिपी हुई रोचक खोजें सुनवाते रहे हैं। पिछली बार आपने अर्चना चावजी के स्वर में प्रसिद्ध साहित्यकार जयशंकर प्रसाद की काव्यात्मक लघुकथा "कला" का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं विनय के. जोशी की कथा ईमानदार जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी "ईमानदार" का गद्य कथा कलश पर उपलब्ध है। इस कथा का कुल प्रसारण समय 1 मिनट 46 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

श्रम मंत्रालय राजस्थान सरकार, भास्कर रचनापर्व, दैनिक भास्कर तथा जवाहर कला केन्द्र द्वारा पुरस्कृत लेखक विनय के. जोशी उदयपुर में रहते हैं। उनकी रचनायें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से छपती रही हैं।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"शर्माजी से जैरामजी कर आगे बढ़ने लगा तो पास में खड़े कुल्फी वाले ने कुरते की बाह पकड़ कर कहा ..."
 (विनय के. जोशी रचित "ईमानदार" से एक अंश)





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यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
ईमानदार MP3

#Sixteenth Story, Imandar: Vinay K. Joshi/Hindi Audio Book/2014/16. Voice: Anurag Sharma

Sunday, December 14, 2014

‘कैसे कटे रजनी अब सजनी...’ : SWARGOSHTHI – 198 : RAG BAGESHRI


 
स्वरगोष्ठी – 198 में आज


शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 7 : राग बागेश्री


उस्ताद अमीर खाँ ने गाया बाँग्ला फिल्म में राग बागेश्री के स्वरों में खयाल- ‘कैसे कटे रजनी...’







‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला, ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। फिल्म संगीत के क्षेत्र में चौथे से लेकर आठवें दशक के बीच शास्त्रीय संगीत के कई विद्वानों और विदुषियों ने अपना योगदान किया है। छठें दशक के फिल्म संगीत में इस प्रकार के गीतों की संख्या अधिक थी। इस श्रृंखला में हमने कुछ ऐसे ही फिल्मी गीतों का चुनाव किया है, जिन्हें रागदारी संगीत के प्रयोक्ताओं और विशेषज्ञों ने रचा है। इन रचनाओं में राग के स्पष्ट स्वरूप की उपस्थिति मिलती है। श्रृंखला के सातवें अंक में आज हम आपसे 1960 में प्रदर्शित बाँग्ला फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ के एक गीत पर चर्चा करेंगे। फिल्म का यह गीत राग बागेश्री कामोद के स्वरों में पिरोया गया है। सुविख्यात गायक उस्ताद अमीर खाँ और बाँग्ला गीतों की सुप्रसिद्ध गायिका प्रतिमा बनर्जी ने इस गीत को स्वर दिया है। फिल्म के संगीतकार मैहर घराने के संवाहक उस्ताद अली अकबर खाँ थे। राग बागेश्री के स्वरूप का एक अलग रंग का अनुभव कराने के लिए सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद राशिद खाँ के स्वरों में द्रुत खयाल की एक रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं।



उस्ताद अमीर खाँ 
विगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कथाओं पर कई नाटकों और फिल्मों की रचना हुई है। वर्ष 1960 में उनकी एक कथा पर विख्यात फिल्म-शिल्पी तपन सिन्हा के निर्देशन में फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ का निर्माण किया गया था। फिल्म की मुख्य भूमिका में सौमित्र चटर्जी और अरुन्धति देवी ने अभिनय किया था। फिल्म की कहानी के केन्द्र में एक शापित हवेली है, जिसमें एक सरकारी कारिन्दा उलझ जाता है। इस फिल्म का सर्वाधिक उललीखनीय पक्ष इसका संगीत है। मैहर परम्परा के उस्ताद अली अकबर खाँ फिल्म के संगीतकार थे। फिल्मी संगीत-नृत्य से अलग हटकर संगीत के मौलिक शास्त्रीय स्वरूप को बनाए रखा गया था। इससे पूर्व विश्वविख्यात फ़िल्मकार सत्यजीत रॉय 1958 की बाँग्ला फिल्म ‘जलसाघर’ में भी ऐसा ही प्रयोग कर चुके थे, जिसके संगीतकार सुप्रसिद्ध सितारवादक उस्ताद विलायत खाँ थे।

उस्ताद अली अकबर खाँ 
तपन सिन्हा के निर्देशन में बनी फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ के संगीतकार उस्ताद अली अकबर खाँ बाबा अलाउद्दीन खाँ के सुपुत्र थे। उनका जन्म तो हुआ था त्रिपुरा में, किन्तु जब वे एक वर्ष के हुए तब बाबा अलाउद्दीन खाँ सपरिवार मैहर जाकर बस गए। उनके संगीत की पूरी शिक्षा-दीक्षा मैहर में हुई थी। बाबा के कठोर अनुशासन में ध्रुवपद, धमार, खयाल, तराना और अपने चाचा फकीर आफताबउद्दीन से अली अकबर को पखावज और तबला वादन की शिक्षा मिली। नौ वर्ष की आयु में उन्होने सरोद वाद्य को अपना मुख्य लक्ष्य बनाया और साधनारत हो गए। एक दिन अली अकबर बिना किसी को कुछ बताए मुम्बई (तत्कालीन बम्बई) चले गए। बाबा से उन्हें सरोद वादन की ऐसी उच्चकोटि की शिक्षा मिली थी कि एक दिन रेडियो से उनके सरोद वादन का कार्यक्रम प्रसारित हुआ, जिसे मैहर के महाराजा ने सुना और उन्हें वापस मैहर बुलवा लिया। 1936 के प्रयाग संगीत सम्मेलन में अली अकबर खाँ ने भाग लिया। इस सम्मेलन में उनके द्वारा प्रस्तुत राग ‘गौरी मंजरी’ को विद्वानों ने खूब सराहा। इसमें राग नट, मंजरी और गौरी का अनूठा मेल था। कुछ समय तक आप आकाशवाणी के लखनऊ केन्द्र पर भी कार्यरत रहे। इसके अलावा कई वर्षों तक महाराजा जोधपुर के दरबार में भी रहे। उस्ताद अली अकबर खाँ ने राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भरपूर ख्याति अर्जित की। उदयशंकर की नृत्य-मण्डली के साथ उन्होने पूरे भारत के साथ-साथ पश्चिमी देशों का भ्रमण किया। 1956 में उन्होने ‘अली अकबर खाँ कॉलेज ऑफ म्यूजिक’ की स्थापना की थी, जिसकी शाखाएँ विदेशों में आज भी सक्रिय हैं। खाँ साहब की भागीदारी फिल्म संगीत के क्षेत्र में भी रही। कई हिन्दी और बांग्ला फिल्मों में उन्होने संगीत रचनाएँ की, जिनमें 1952 की हिन्दी फिल्म ‘आँधियाँ’ और 1960 की बांग्ला फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ संगीत की दृष्टि से बेहद सफल फिल्में थीं। फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ में उन्होने एक गीत छोटा खयाल के रूप में शामिल किया था, जिसे उस्ताद अमीर खाँ और प्रतिमा बनर्जी ने राग बागेश्री में गाया था। आइए, पहले वही गीत सुनते है-


राग – बागेश्री : ‘कैसे कटे रजनी अब सजनी...’ : उस्ताद अमीर खाँ और प्रतिमा बनर्जी : फिल्म - क्षुधित पाषाण





उस्ताद राशिद खाँ 
राग बागेश्री भारतीय संगीत का अत्यन्त मोहक राग है। कुछ लोग इस राग को बागेश्वरी नाम से भी पुकारते हैं, किन्तु सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल के मतानुसार इस राग का नाम बागेश्री अधिक उपयुक्त होना चाहिए। इस राग को काफी थाट से अन्तर्गत माना जाता है। राग के वर्तमान प्रचलित स्वरूप के आरोह में ऋषभ स्वर वर्जित होता है और पंचम स्वर का अल्पत्व प्रयोग किया जाता है। अवरोह में सातों स्वर प्रयोग होते हैं। इस प्रकार यह राग षाड़व-सम्पूर्ण जाति का होता है। कुछ विद्वान आरोह में ऋषभ के साथ पंचम स्वर भी वर्जित करते हैं। इस राग में गान्धार और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। कर्नाटक पद्यति में इस राग के समतुल्य राग नटकुरंजी है, जिसमें पंचम स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। राग बागेश्री में यदि पंचम और कोमल निषाद का प्रयोग न किया जाए तो यह राग आभोगी की अनुभूति कराता है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। रात्रि के दूसरे प्रहर विशेष रूप से मध्यरात्रि में इस राग का सौन्दर्य खूब निखरता है। इस राग में भक्ति और श्रृंगार रस की रचनाएँ भली लगती है। अब हम आपको राग बागेश्री की एक मोहक बन्दिश का रसास्वादन कराते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद राशिद खाँ। संगीतज्ञ उस्ताद राशिद खाँ रामपुर सहसवान घराने की गायकी के संवाहक हैं और इस घराने के संस्थापक उस्ताद इनायत हुसैन खाँ के प्रपौत्र हैं। उन्होने अपने नाना उस्ताद निसार हुसैन खाँ से गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत संगीत की विधिवत शिक्षा ग्रहण की है। आइए, प्रतिभा के धनी गायक उस्ताद राशिद खाँ से सुनते हैं, राग बागेश्री की यह श्रृंगार रस से अभिमंत्रित, आकर्षक रचना। द्रुत एकताल में निबद्ध इस खयाल रचना के बोल हैं- ‘अपनी गरज पकर लीन्ह बइयाँ मोरी....’। आप राग बागेश्री का आनन्द लीजिए और मुझे आज इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग – बागेश्री : ‘अपनी गरज पकर लीन्ह बइयाँ मोरी....’ : उस्ताद राशिद खाँ : द्रुत एकताल






आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 198वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको अस्सी के दशक में बनी एक फिल्म के राग आधारित युगलगीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 200वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा तथा वर्ष 2014 में सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी को वार्षिक विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में आपको किस राग की झलक मिल रही है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार 20 दिसम्बर, 2014 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 200वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 196वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपकोफिल्म ‘रागिनी’ के लिए उस्ताद अमानत अली खाँ और फतेह अली खाँ के युगल स्वरों में एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग कामोद और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल द्रुत तीनताल। पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मों गीत’ के माध्यम से हम भारतीय संगीत जगत के मूर्धन्य कलासाधकों के द्वारा उनके फिल्म संगीत के क्षेत्र में किये गए योगदान को रेखांकित कर रहे हैं। इस श्रृंखला के बारे में आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। नए वर्ष से ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के अन्तर्गत आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Saturday, December 13, 2014

गायिका अनुराधा पौडवाल के बचपन और शुरुआती दौर की स्मृतियाँ


स्मृतियों के स्वर - 13

गायिका अनुराधा पौडवाल के बचपन और शुरुआती दौर की स्मृतियाँ





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकिया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ, हमारे इस स्तम्भ में, जिसका शीर्षक है - 'स्मृतियों के स्वर', जिसमें हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। आज की कड़ी में प्रस्तुत है पार्श्वगायिका अनुराधा पौडवाल से एक मुलाक़ात के अंश जिसमें वो बता रही हैं अपने बचपन और करीयर के शुरुआती दिनों के बारे में।




सूत्र: 'सरगम के सितारे', विविध भारती

प्रसारण तिथि: 18 अगस्त 2007


सबसे पहले तो हम यह जानना चाहते हैं कि अनुराधा जी को कब पता चला कि वो इतना सुन्दर गाती हैं। परिवार में गाने का माहौल था?  कैसे इतना सुरीला गला आपने पाया?

मुझे गाने का तो बचपन से ही शौक रहा है, और बहुत ही छुटपन से, मतलब, मुझे याद भी नहीं है कि किस उम्र से मुझे गाना अच्छा लगने लगा, लेकिन हमेशा से मुझे, मतलब, म्युज़िक की मुझे, बहुत पसन्द था और विशेष रूप से मेरी माताजी जो हैं, मिसेस नादकर्नी, तो वो हमेशा से उनको गाने का बहुत शौक था और वो ओमकारनाथ जी की शिष्या थीं। लेकिन जैसा कि आप जानते हैं कि उन दिनों में वो म्युज़िक करीयर को परस्यू नहीं कर पायीं, तो जब उन्होंने देखा कि मुझे बहुत शौक है गाने का तो उनकी बहुत तमन्ना थी कि मैं सिंगर बनूँ। वो कोशिश करके कहीं मुझे प्रोग्राम में ले जाना, तो उनकी हमेशा तमन्ना यही रही कि मैं एक सिंगर बनूँ। और क्योंकि जिस फ़ैमिली को मैं बिलांग करती हूँ, मतलब, मेरे फ़ादर के साइड से, मतलब, उन्हें किसी को गाने का शौक नहीं था। उनका बहुत ज़्यादा ध्यान एजुकेशन का था, वो हमेशा कहते थे कि ठीक है, एक शौकिया गाने तक ठीक है, लेकिन मेन एडुकेशन होना चाहिये। लेकिन जहाँ-जहाँ पे मौके मिलते थे, वहाँ-वहाँ पे मैं स्टेज प्रोग्राम्स करती थी।


तो पहले आपने स्कूल में गाया?

नहीं, पहली बार जो मैंने गाया, मतलब, महिला-मंडल होती है न, तो मेरी मासी, वो एक मेम्बर थीं महिला-मंडल की, तो जब मैं पाँच साल की थी तो पहला परफ़ॉर्मैन्स वहाँ किया था। फिर जैसे गणपति उत्सव जैसे होते हैं, उस तरह के प्रोग्राम्स मैंने काफ़ी किये।


अच्छा आपको वह गीत याद होगा जो पाँच साल की उम्र में आपने गाया था महिला-मंडल के उस शो में?

एक मराठी गीत था, "आलो शरण तुला भगवन्ता घेइ कुशित तुऴ्या भगवन्ता..."


अच्छा जब इतनी प्रशंसा मिली होगी, आप इतनी छोटी थीं कि आपको तो पता नहीं होगा कि माँ ने कहा कि गाना गाओ तो गा दिया होगा, लेकिन कभी दिल में यह नहीं आया होगा कि आगे मैं यही बनूंगी, यानी गायिका?

जी, वही मैं कहने जा रही थी, कि वैसे तो हमने, मतलब मैंने कभी मन में ऐसा नहीं सोचा था कि मुझे सिंगर ही बनना है क्योंकि आज आप देखेंगे कि, almost if not all, हर दूसरे घर का कोई न कोई फ़िल्म से या टेलीविज़न से या रेडियो से जुड़ा हुआ है, नहीं तो DJ है या कम्पेयरर है, किसी न किसी रूप में है। तो उस वक़्त ऐसा नहीं था। तो हमेशा हम लोगों को ऐसा लगता कि अच्छे घर के लोग फ़िल्म इंडस्ट्री में नहीं जाते हैं वगेरह। शादी तक तो सवाल ही नहीं उठता कि इस बारे में सोचूँ लेकिन जब मेरी शादी अरुण पौडवाल जी से हुई और वो इसी इंडस्ट्री के थे और he was a musician, music director भी थे, तो उसके बाद फिर भी नैचरली और बिल्कुल बाइ चान्स मैं इस इंडस्ट्री में आयी हूँ। उनको पसन्द तो था लेकिन उन्होंने भी ऐसे नहीं सोचा था कि पत्नी कोई प्लेबैक सिंगर बने। लेकिन उनके पिताजी जो थे, यानी मेरे ससुर जी, उनको बहुत ज़्यादा शौक था। मैं तो यह कहूंगी कि उनको शौक क्या, उनका तो सपना था कि मैं प्लेबैक सिंगर बनूँ। और यह बड़ी रेयर चीज़ है क्योंकि माता-पिता के तो बहुत ज़्यादा सपने होते हैं कि उनकी बेटी कुछ बने लेकिन यह बहुत रेअर केस होती है कि सास-ससुर इनको यह तमन्ना हो कि मेरी बहु एक दिन एक सिंगर बने।


जो कि बहुत सौभाग्य की बात है!

बिल्कुल बिल्कुल! और मुझे लगता है कि आज जो भी कुछ मैं हूँ तो मेरी माँ की तो ब्लेसिंग्स है ही, लेकिन साथ-साथ मेरे ससुर जी, सासु माँ, मेरे गुरु, उनकी जो तमन्ना थी उसकी वजह से यह सच हुआ है।


बड़ों का आशिर्वाद तो हमेशा साथ देता है!

बिल्कुल बिल्कुल!


अनुराधा जी, यह पूछना चाहूंगी कि आपने सीखना कब शुरू किया शास्त्रीय संगीत?

बचपन से जेनरली महाराष्ट्रियन घरों में आपने तो देखा होगा कि संगीत सिखाते हैं, तो इससे मुझे लगता है कि शायद 6-7 साल की थी, तब से मैंने गाना सीखना शुरु किया, सीखना मतलब क्या, वह क्लास में जाते थे और उस तरह का। ऐसे कि गुरु करके, ऐसा तो था नहीं, ऐट नो स्टेज।


ऐसा कहा जाता है कि हमने कई लोगों से बात भी की है जो गायक हैं, कि वो कहते हैं कि पूरी तरह ध्यान लगाते हैं, जो गायक होते हैं, गायिका होते हैं, सब कुछ भूल के अपने गुरु के साथ संगीत, और आपके साथ ऐसा नहीं हुआ?

ऐसा ऐक्चुअली होना चाहिये, लेकिन मेरे साथ ऐसा संभव इसलिए नहीं हुआ क्योंकि मैं हमेशा, मतलब पहले मैं फ़मिली में आयी, मेरी अपनी फ़ैमिली, मेरे बच्चे, पति, हमारी जॉयन्ट फ़ैमिली थी, तो उस वजह से थोड़ा जितना मैं रियाज़ कर सकती थी, उतना मैंने किया। लेकिन यह देखते हुए मुझे लगता है कि ईश्वर ने मुझे संगीत से नवाज़ा है और मुझे अपने आप को बहुत लकी समझती हूँ कि बहुत बड़ी कृपा है परमात्मा की। as a house wife, as a daughter, as a mother, मेरी responsibilities बहुत ज़्यादा हैं। पर जैसे जैसे गाने मिलते गये, मैं गाती गयी, लेकिन I was lucky enough कि गाने मिलते भी गये। अच्छा एक बात और! आजकल जो लोग करीयर को प्रायरिटी देते हैं, इसमें डेफ़िनिटली यह बात है लेकिन इतना मैं इतना ज़रूर कहना चाहूंगी इसमें कि पर्सनली, यह पर्सनली as a working woman मुझे लगता है कि profession important है लेकिन family is more important।


यह बहुत अच्छी बात कही आपने क्योंकि प्रेफ़ेशन की भी अपनी एक सीमा होती है।

जी, प्रोफ़ेशन, मैं उन लोगों के लिए यह नहीं बोलती हूँ जिनके लिए प्रोफ़ेशन एक ज़रूरत है, जैसे कि आप देखते हैं कि जिनके लिए यह रोज़ी-रोटी का ज़रिया है, you have no option, अगर रोटी का सवाल नहीं है then I think we should keep the family at first।


कैसी थीं अनुराधा पौडवाल जब वो छोटी थीं? बहुत शैतान थीं? पडः़आई में मन लगता था या गाने गुनगुनाती हुई इधर उधर लगी रहती थीं?

पढ़ाई का exactly शौक तो मैं नहीं खऊंगी लेकिन ऐसा भी नहीं था कि पढ़ाई को अन्देखा करती थी, normal, natural जैसे होता है, more inclined towards artistic, जैसे कि कोई artistic चीज़ें बनाना, जैसे crafts है या संगीत है। कला के तरफ़ झुकाव था।


शैतानी नहीं करती थीं? 

नहीं (हँसते हुए)।


पढ़ाई में आप, क्योंकि मुंबई में ही आप रहती थीं, तो आपको गाने का मौका आपको और अच्छा मिला, क्योंकि बहुत छोटी-छोटी जगहों पर लोग रहते हैं, उस समय मुंबई में रहने से और संगीत जानने से आपको कितना फ़ायदा मिला, आपको यहाँ मौके कितने मिले?

उस वक़्त मैंने, शादी के बाद सबसे पहले फ़िल्म 'अभिमान' के लिए गाया। उसके बाद फिर, लेकिन उससे पहले एक वाक्या आपको बता देना चाहती हूँ कि आज जब हम यहाँ AIR पे हैं, और एक तरीके से मेरा जो करीयर है वह रेडियो से शुरु हुआ, वह किस तरह से मैं बताती हूँ आपको। 'युवा-वाणी' करके एक प्रोग्राम आता था, जो बहुत ज़्यादा पॉपुलर था और उसके बाद एक और मराठी 'आपली आवड' करके एक प्रोग्राम होता था, which was very popular। तो मैंने 'युवा-वाणी' में एक गीत गाया जो उन्होंने 'युवा-वाणी' और 'आपली आवड' के बिल्कुल जंक्शन पे रखा था। 10 को 5 मिनट कम तो मेरा गाना, उन्होंने प्ले किया था जो मैंने रेडियो के लिए गाया था, और उस गीत को काफ़ी सारे म्युज़िक डिरेक्टर्स ने, जैसे लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल हैं, हृदयनाथ मंगेशकर जी हैं, फिर और काफ़ी सारे लोगों ने, बप्पी लाहिड़ी जी हैं, तो उन्होंने वह गीत सुना और उन्होंने मुझे फ़ोन करके बुलाया लेकिन मैं उस वक़्त प्रोफ़ेशनली नहीं गाती थी। तन उन्होंने मुझे कहा कि जिस वक़्त आप प्रोफ़ेशनली शुरु करो तो आप बताइये, we would like to record you।


अच्छा तो फिर यह प्रोफ़ेशनली आप कैसे आयीं? पहला मौका किसने दिया?

पहला मौका मुझे इस तरह मिला कि अरुण जी, मेरे पति म्युज़िक डिरेक्टर थे और वो एस. डी. बर्मन के लिए असिस्टैण्ट भी थे। उन्हें बहुत शौक था कि वो जब भी कुछ कम्पोज़ करते थे, पहले मेरी आवाज़ में वो घर के टेप-रेकॉर्डर पे वो टेप करते थे कि कैसा लगता है। उन दिनों में 'अभिमान' फ़िल्म का बैकग्राउण्ड चल रहा था। इसके लिए बर्मन दादा ने इनको कुछ कम्पोज़ करने के लिए बोला था। एक शिव जी की स्तुति थी जो उन्हें रेकॉर्ड करनी थी। शिव जी की स्तुति उन्होंने रेकॉर्ड की उनके टेप-रेकॉर्डर पे, जिस वक़्त उन्होंने बर्मन दादा को सुनाया, तो बर्मन दादा ने कहा कि तुमने इसके पहले क्यों नहीं बताया कि तुम्हारी बीवी गाती है? तो उसी की आवाज़ में हम इसको रेकॉर्ड करते हैं, और इस तरह से हृषी दा की फ़िल्म 'अभिमान; में मैंने वह शोल्क गाया।


ज़रा गा कर सुनायेंगी वह श्लोक?

(गाती हुईं) "ओम्कारम्‍ बिन्दु संयुक्तम्‍ नित्यम्‍ ध्यायन्ती योगिन:, कामनदम्‍ मोक्षदम्‍ कैव ओम्काराय नमो नम:"। तो इसको सुन के उस वक़्त फ़िल्म इंडस्ट्री छोटी थी, दो तीन ही स्टुडियोस थे, 'फ़ेमस', 'फ़िल्म सेन्टर', तो जयदेव जी को पता चला, उन्होंने बुलाया। केवल तीन दिन बाद ही जयदेव जी ने मुझे बुलाया और मुझे एक पूरा गाना गाने का मौका दिया। वह मेरा पहला फ़िल्मी गीत था और वह भी महान गायक मुकेश जी के साथ। मुकेश जी ने मेरा हौसला बढ़ाया और उनके साथ मेरा पहला गाना रेकॉर्ड हुआ।



कॉपीराइट: विविध भारती



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Sunday, December 7, 2014

‘छेड़ दिये मेरे दिल के तार क्यों...’ : SWARGOSHTHI – 197 : RAG KAMOD



स्वरगोष्ठी – 197 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 6 : राग कामोद


पार्श्वगायक किशोर कुमार के लिए जब उस्ताद अमानत अली खाँ ने स्वर दिया




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला, ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। फिल्म संगीत के क्षेत्र में चौथे से लेकर आठवें दशक के बीच शास्त्रीय संगीत के कई विद्वानों और विदुषियों ने अपना योगदान किया है। छठें दशक के फिल्म संगीत में इस प्रकार के गीतों की संख्या अधिक थी। इस श्रृंखला में हमने कुछ ऐसे ही फिल्मी गीतों का चुनाव किया है, जिन्हें रागदारी संगीत के प्रयोक्ताओं और विशेषज्ञों ने रचा है। इन रचनाओं में राग के स्पष्ट स्वरूप की उपस्थिति मिलती है। श्रृंखला के छठें अंक में आज हम आपसे 1958 में प्रदर्शित नृत्य प्रधान फिल्म ‘रागिनी’ के एक गीत पर चर्चा करेंगे। फिल्म का यह गीत राग कामोद के स्वरों में गूँथा गया है। पटियाला घराने के युगल गायक उस्ताद अमानत अली खाँ और फतेह अली खाँ ने इस गीत को स्वर दिया है। फिल्म के संगीतकार ओ.पी. नैयर ने इस गीत का प्रयोग मंच पर अभिनेत्री-नृत्यांगना पद्मिनी द्वारा प्रदर्शित किये जाने वाले नृत्य के लिए किया था। इस गीत के साथ ही राग कामोद के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए सुप्रसिद्ध युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वरों में इस राग की एक मोहक बन्दिश भी प्रस्तुत कर रहे हैं।



उस्ताद अमानत अली व फतेह अली खाँ
ओ.पी. नैयर 
फिल्म संगीत के क्षेत्र में सफलतम संगीतकारों की सूची ओ.पी. नैयर के नाम के बिना अधूरी रहेगी। उनके सांगीतिक जीवन से जुड़े कई अनोखे तथ्य रहे हैं, जिनकी चर्चा समय-समय पर होती रही है। इनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि नैयर साहब ने अपने लम्बे सांगीतिक जीवन में लता मंगेशकर से कभी भी, कोई भी गीत नहीं गवाया। उनके अधिकतर गीतों को शमशाद बेगम, गीता दत्त और आशा भोसले ने अपना स्वर देकर लोकप्रिय बनाया। नैयर के स्वरबद्ध अधिकतर गीत पंजाब के लोक संगीत की धुनों और तालों पर ही आधारित रहे हैं। ओ.पी. नैयर का जन्म 16 जनवरी 1926 को लाहौर में हुआ था। उन्हें विधिवत संगीत शिक्षा प्राप्त नहीं हुई थी, परन्तु अपनी सीखने-समझने की अनूठी क्षमता के कारण बचपन से ही रेडियो पर बाल कार्यक्रमों में गाने लगे थे। फिल्मों में उनका प्रवेश पंजाबी फिल्म ‘दूल्हा भट्ठी’ से हुआ, जिसमें उन्होने संगीतकार गोविन्दराम के निर्देशन में गीत गाये थे। कुछ समय के लिए उन्होने एच.एम.वी. के लिए गायन भी किया और संगीत भी रचे। इस दौर का सबसे लोकप्रिय गीत प्रसिद्ध गायक सी.एच. आत्मा की आवाज़ मे गैर फिल्मी गीत ‘प्रीतम आन मिलो...’ था। इस गीत की संगीत रचना ओ.पी. नैयर ने की थी। विभाजन के बाद नैयर लाहौर छोड़ कर पहले पटियाला और फिर तत्कालीन बम्बई आ गए। 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘आसमान’ में उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला। इसी फिल्म के एक गीत को गाने के प्रश्न पर उनका लता मंगेशकर से मतभेद हुआ और आजीवन उन्होने लता से कोई गीत नहीं गवाया।

1958 में नैयर के संगीत निर्देशन में फिल्म ‘रागिनी’ का निर्माण हुआ था। फिल्म में किशोर कुमार शास्त्रीय गायक और अभिनेत्री पद्मिनी शास्त्रीय नृत्यांगना के चरित्र में प्रस्तुत किये गए थे। ऐसे चरित्रों के लिए संगीत में रागों का आधार अनिवार्य था। फिल्म के लिए ओ.पी. नैयर ने लीक से हट कर संगीत तैयार किया। एक प्रसंग में अभिनेत्री पद्मिनी को मंच पर भाव प्रदर्शन के साथ शुद्ध नृत्य के कुछ टुकड़े प्रस्तुत करने थे। गायन संगतकार के रूप में किशोर कुमार अपने एक सहयोगी गायक के साथ थे। नैयर ने इस प्रसंग के लिए राग कामोद का सहारा लेकर गीत रचा था। किशोर कुमार स्वयं एक पार्श्वगायक थे, किन्तु यह गीत उनसे न गवा कर पटियाला घराने के सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद अमानत अली खाँ और फतेह अली खाँ से गवाया गया। फिल्म का यह गीत तीनताल में निबद्ध है। लीजिए, पहले आप यह गीत सुनिए।


राग कामोद : ‘छेड़ दिये मेरे दिल के तार क्यों...’ : उस्ताद अमानत अली खाँ और फतेह अली खाँ : फिल्म – रागिनी : संगीत - ओ.पी. नैयर




कल्याणहिं के थाट में दोनों मध्यम लाय,

प-रि वादी-संवादि कर, तब कामोद सुहाय।

पण्डित राजन व साजन मिश्र 
संगीत के विद्यार्थियों को राग के ढाँचे का परिचय देने के उद्देश्य से उपरोक्त दोहे का प्रयोग किया जाता है। इसके साथ ही राग के स्वरों की जानकारी ‘लक्षण गीत’ के माध्यम से भी दी जाती है। आज के अंक में हम आपसे राग कामोद पर चर्चा करेंगे। कल्याण थाट और कल्याण अंग से संचालित होने वाले इस राग को कुछ विद्वान काफी थाट के अन्तर्गत भी मानते हैं। औड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। अवरोह में दोनों मध्यम का प्रयोग और शेष सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग कामोद के आरोह के स्वर हैं- सा रे प म(तीव्र) प ध प नि ध सां तथा अवरोह के स्वर हैं- सां नि ध प म(तीव्र) प ध प ग म(शुद्ध) रे सा। राग वर्गीकरण के प्राचीन सिद्धान्तों के अनुसार राग कामोद को राग दीपक की पत्नी माना जाता है। इस राग का गायन-वादन पाँचवें प्रहर अर्थात रात्रि के प्रथम प्रहर में किया जाता है। अब आपको इस राग की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध युगल गायक पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र की आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। राग कामोद की यह अत्यन्त प्रचलित परम्परागत रचना है, जिसके बोल हैं- ‘एरी जाने न दूँगी...’। श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए यह आदर्श राग है। इस बन्दिश का उपयोग फिल्म में भी हुआ है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा के चर्चित कथानक ‘चित्रलेखा’ पर आधारित 1964 में इसी नाम से फिल्म बनी थी, जिसमें यह बन्दिश शामिल की गई थी। फिल्म में यह गीत लता मंगेशकर ने रोशन के संगीत निर्देशन में गाया था। यह गीत हम किसी अन्य अवसर पर आपको सुनवाएँगे। अभी आप पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र के स्वरों में आप राग कामोद की यह खयाल रचना सुनिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग – कामोद : ‘एरी जाने न दूँगी...’ : पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र : तबला संगति – सुधीर पाण्डेय : हारमोनियम संगति – महमूद धौलपुरी





आज की पहेली


 ‘स्वरगोष्ठी’ के 197वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक गैर हिन्दी भाषा की भारतीय फिल्म का गीतांश सुनवा रहे हैं। फिल्म में उत्तर भारतीय संगीत शैली में रचे-बसे गीत-संगीत का वर्चस्व था। इस राग रचना को सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 200वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का और सभी पाँच श्रृंखलाओं में सर्वाधिक अंक पाने वाले प्रतिभागी को वर्ष 2014 का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – यह रचना किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 13 दिसम्बर, 2014 को मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 199वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 195वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1955 में प्रदर्शित फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग अड़ाना और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल द्रुत तीनताल। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर पूर्व की भाँति जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम भारतीय शास्त्रीय संगीत के विद्वानों द्वारा फिल्मों के लिए गाये गए गीतों पर चर्चा कर रहे हैं। वर्ष 2015 से ‘स्वरगोष्ठी’ की श्रृंखलाओं के बारे में हमे अनेक पाठकों और श्रोताओ के बहुमूल्य सुझाव प्राप्त हो रहे हैं। इन सभी सुझाव पर विचार-विमर्श कर हम नये वर्ष से अपनी प्रस्तुतियों में आवश्यक संशोधन करने जा रहे हैं। यदि आपने अभी तक अपने सुझाव और फरमाइश नहीं भेजी हैं तो आविलम्ब हमें भेज दें। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 


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