गुरुवार, 2 सितंबर 2010

न तो कारवाँ की तलाश है न तो हमसफ़र की क्योंकि ये इश्क इश्क है....कहा रोशन और मजरूह के साथ गायक गायिकाओं की एक पूरी टीम ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 475/2010/175

ज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है। इस पवित्र पर्व पर हम अपने सभी श्रोताओं व पाठकों को अपनी शुभकामनाएँ देते हैं। दोस्तों, आप समझ रहे होंगे कि क्योंकि क़व्वालियों की शृंखला चल रही है, तो जन्माष्टमी पर श्री कृष्ण का कोई गीत तो हम सुनवा नहीं पाएँगे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में, है न? लेकिन ज़रा ठहरिए, कम से कम एक क़व्वाली ऐसी ज़रूर है जिसमें श्री कृष्ण का भी ज़िक्र है, और साथ ही राधा और मीरा का भी। क्यों चौंक गए न? जी हाँ, यह सच है, इस राज़ पर से अभी पर्दा उठने वाला है। फ़िल्म संगीत में क़व्वालियों को लोकप्रिय बनाने में संगीतकार रोशन का योगदान बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसा नहीं कि उनसे पहले किसी ने मशहूर क़व्वाली फ़िल्मों के लिए नहीं बनाई, लेकिन रोशन साहब ने पारम्परिक क़व्वालियों का जिस तरह से फ़िल्मीकरण किया और जन जन में लोकप्रिय बनाया, ऐसा करने का श्रेय उन्हें ही दिया जाता रहा है। आज 'मजलिस-ए-क़व्वाली' में रोशन साहब की बनाई हुई सब से लोकप्रिय क़व्वाली की बारी, और बहुत लोगों के अनुसार यह हिंदी फ़िल्म संगीत की सब से यादगार क़व्वाली है। दरअसल ये दो क़व्वालियाँ हैं जो ग्रामोफ़ोन रेकॊर पर अलग अलग आती है, लेकिन फ़िल्म के पर्दे पर एक के बाद एक आपस में जुड़ी हुई है। इसलिए हम भी यहाँ आपको ये दोनों क़व्वालियाँ इकट्ठे सुनवा रहे हैं। फ़िल्म 'बरसात की रात' की यह क़व्वाली जोड़ी है "न तो कारवाँ की तलाश है" और "ये इश्क़ इश्क़ है"। मन्ना डे, मोहम्मद रफ़ी, आशा भोसले, सुधा मल्होत्रा, बातिश और साथियों की आवाज़ें, तथा साहिर लुधियानवी के कलम की जादूगरी है यह क़व्वाली। दरअसल रोशन साहब ने पाक़िस्तान में एक बार एक क़व्वाली सुनी "ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़" जो उन्हें इतनी पसंद आई कि अनुमति लेकर उन्होंने उस क़व्वाली को ऐसा फ़िल्मी जामा पहनाया कि ना केवल यह क़व्वाली सुपर डुपर हिट साबित हुई, बल्कि अगली फ़िल्म 'दिल ही तो है' में निर्माता ने उनसे एक और क़व्वाली ("निगाहें मिलाने को जी चाहता है") की माँग कर बैठे। पंकज राग अपनी किताब 'धुनों की यात्रा' में लिखते हैं - "'बरसात की रात' का संगीत व्यावसायिक दृष्टि से रोशन का सफलतम संगीत था। "ना तो कारवाँ की तलाश है" का अंजाम हुअ "ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़" में और फ़तेह अली ख़ाँ से अनुमति उपरान्त ली गई उनकी धुन पर रोशन ने फ़िल्म संगीत के इतिहास की सब से हिट क़व्वाली बना डाली। यह एक तरह का समझौता तो अवश्य था जिसके लिए ख़य्याम तैय्यार नहीं हुए थे, पर ऐसे समझौते रोशन ने भी कम ही किए। इस क़व्वाली का तरन्नुम, बहाव, बिलकुल अभिभूत कर देने वाला है। इसकी रेकॊर्डिंग् २९ घंटे में सम्पन्न हुई औत तब जाकर वह ऐतिहासिक प्रभाव उत्पन्न हुआ, जैसा रोशन चाहते थे। भले ही धुन की प्रेरणा कहीं और से मिली हो, पर उसका विस्तार इस क़व्वाली की सुंदर विशेषताएँ बनकर आज तक लोगों के ज़हन में ताज़ा है। 'बरसात' में क़व्वालियों की धूम रही। "निगाहें नाज़ के मारों का" और "जी चाहता है चूम लूँ" जैसी क़व्वालियाँ भी अच्छी चली।"

सन् १९९८ में गायक मन्ना डे विविध भारती पर तशरीफ़ लाए थे और कई संगीतकारों की चर्चा हुई थी, जिनमें एक नाम रोशन साहब का भी उन्होंने लिया था, और ख़ास तौर से इस क़व्वाली का ज़िक्र छिड़ा था उद्‍घोषक कमल शर्मा द्वारा ली गई उस इंटरव्यु में। रोशन साहब को याद करते हुए मन्ना दा ने कहा था "रोशन साहब, he was a strict student of good music, यानी वो ख़याल, ठुमरी, ग़ज़लें, फ़ोक, ये सब मिलाके जो एक चीज़ वो लाते थे न, वो अनोखे ढंग से नोट्स का कॊम्बिनेशन करते थे। हम तो पागल थे उनके गानों के लिए। उस्ताद आदमी थे वो और बहुत मेहनती आदमी थे। "ना तो कारवाँ की तलाश है" के लिए मुझे याद है, रामपुर के तरफ़ से क़व्वाल लोगों को बुलाये थे। उनके प्रोग्राम सुना करते थे, नोट कर कर के कर कर के फिर उन्होंने बनाना शुरु किया। और साहिर साहब ने लिखा, और उन्होंने बनाया। और वो जो तकरारें जो हैं ना बीच में, कितने मेहनत किए वो, ओ हो हो, माइ गॊड, और फिर जब हम लोगों को सुनाते थे, बोलते थे 'देखो मज़ा आना चाहिए', वो जैसे क़व्वाल लोग करते थे। वो सब तो हमें मालूम नहीं था, रफ़ी को भी मालूम नहीं था, आशा को भी मालूम नहीं था, लेकिन उन्होंने सब करवाया हमसे। और एक एक कर के ८-१० दिन रिहर्सल करके करवाया।" दोस्तों, ऐसे ऐसे ही वह फ़िल्म संगीत का सुनहरा दौर नहीं हुआ। सुनहरा उसे बनाया उस दौर के फ़नकारों की लगन ने, उनके अथक परिश्रम ने, उनके डेडिकेशन ने। साहिर साहब ने इस क़व्वाली में ऐसे अल्फ़ाज़ लिखे हैं कि इसे सुनते हुए हम ट्रान्स में चले जाते हैं और जैसे उस परम शक्ति के साथ एक कनेक्शन बनने लगता है। बड़ी धर्म निरपेक्ष क़व्वाली है जिसमें साहिर साहब लिखते हैं कि "इश्क़ आज़ाद है, हिंदु ना मुसलमान है इश्क़, आप ही धर्म है और आप ही इमान है इश्क़"। इश्क़ को केन्द्रबिंदु बनाकर चलने वाली इस क़व्वाली में बहुत से विषय शामिल किए गए हैं। यहाँ तक कि श्री कृष्ण, राधा, मीरा, सीता, भगवान बुद्ध, मसीह का भी उल्लेख है, भजन और श्री कृष्ण लीला के साथ साथ लोक-संगीत का भी अंग है। "जब जब कृष्ण की बंसी बाजी, निकली राधा सज के, जान अजान का ध्यान भुला के, लोक लाज को तज के, है बन बन डोली जनक दुलारी, पहन के प्रेम की माला, दर्शन जल की प्यासी मीरा पी गई विष का प्याला"। तो दोस्तों, अब आपको अहसास हो गया ना कि क्यों हमने यह क़व्वाली आज के लिए चुनी है! तो आइए सुना जाए कुल १२ मिनट की यह क़व्वाली। श्री कृष्ण जन्माष्टमी और रमज़ान के मुबारक़ मौक़े पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का एक और सुरीला नज़राना क़बूल कीजिए।



क्या आप जानते हैं...
कि साल १९६० के अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत बिनाका गीत माला के वार्षिक कार्यक्रम में 'मुग़ल-ए-आज़म', 'चौदहवीं का चांद', 'दिल अपना और प्रीत पराई', 'धूल का फूल', 'छलिया' और 'काला बाज़ार' जैसे फ़िल्मों को पछाड़ते हुए 'बरसात की रात' फ़िल्म का शीर्षक गीत ही बना था उस वर्ष का सरताज गीत।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. एक मल्टी स्टारर फिल्म की है ये कव्वाली, फिल्म बताएं - १ अंक.
२. किस अदाकार पर फिलमाया गयी है ये कव्वाली - २ अंक.
३. गायक बताएं - २ अंक.
४ रवि का है संगीत, फिल्म के निर्देशक बताएं - ३ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
लगता है हमारे प्रोत्साहन का नतीजा निकल, अवध जी ३ अंक चुरा गए. इंदु जी, आपको नाराज़ कर मरना है क्या?, पर ये बात समझ नहीं आती कि आप एक अंक वाले सवालों का ही जवाब क्यों देती हैं. पवन जी सही जवाब के साथ वापसी की बधाई. कनाडा टीम कहाँ गायब रही...खैर अब तक के स्कोर जान लेते हैं - अवध जी ७४, इंदु जी ४०, प्रतिभा जी २८, किशोर जी २६, पवन जी २४, और नवीन जी २२ पर हैं.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

बुधवार, 1 सितंबर 2010

तेरी महफ़िल में किस्मत आजमा कर हम भी देखेंगें...एक मास्टरपीस फिल्म की मास्टरपीस कव्वाली

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 474/2010/174

'मज़लिस-ए-क़व्वाली' की तीसरी कड़ी में आज हम पहुँचे हैं साल १९५९-६० में। और इसी दौरान रिलीज़ हुई थी के. आसिफ़ की महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'मुग़ल-ए-आज़म'। इस फ़िल्म की और क्या नई बात कहूँ आप से, इस फ़िल्म का हर एक पहलु ख़ास था, इस फ़िल्म की हर एक चीज़ बड़ी थी। आसिफ़ साहब ने पानी की तरह पैसे बहाए, अपने फ़ायनेन्सर्स से झगड़ा मोल लिया, लेकिन फ़िल्म के निर्माण के साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं किया। नतीजा हम सब के सामने है। जब भी कभी पिरीयड फ़िल्मों का ज़िक्र चलता है, 'मुग़ल-ए-आज़म' फ़िल्म का नाम सब से उपर आता है। जहाँ तक इस फ़िल्म के संगीत का सवाल है, तो पहले पण्डित गोबिंदराम, उसके बाद अनिल बिस्वास, और आख़िरकार नौशाद साहब पर जाकर इसके संगीत का ज़िम्मा ठहराया गया। इस फ़िल्म के तमाम गानें सुपर डुपर हिट हुए, और इसकी शान में इतना ही हम कह सकते हैं कि जब 'ओल्ड इज़ गोल्ड' ने १०० एपिसोड पूरे किए थे, उस दिन हमने यह महफ़िल इसी फ़िल्म के "प्यार किया तो डरना क्या" से रोशन किया था। आज 'मुग़ल-ए-आज़म' ५० साल पूरे कर चुकी है, लेकिन इसकी रौनक और लोकप्रियता में ज़रा सी भी कमी नहीं आई है। ऐसे में जब इस फ़िल्म में दो बेहतरीन क़व्वालियाँ भी शामिल हैं, तो इनमें से एक को सुनाए बग़ैर हमारी ये शृंखला अधूरी ही मानी जायेगी! याद है न आपको ये दो क़व्वालियाँ कौन सी थीं? "जब रात है ऐसी मतवाली तो सुबह का आलम क्या होगा" और "तेरी महफ़िल में क़िस्मत आज़मा कर हम भी देखेंगे"। और यही दूसरी क़व्वाली से रोशन है आज की यह मजलिस। लता मंगेशकर, शम्शाद बेग़म और साथियों की आवाज़ों में यह शक़ील-नौशाद की जोड़ी का एक और मास्टरपीस है।

आज क़व्वालियों के जिस पहलु पर हम थोड़ी चर्चा करेंगे, वह है इसके प्रकार। 'हम्द' एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ है वह गीत जो अल्लाह की शान में गाया जाता है। पारम्परिक तौर पर किसी भी क़व्वाली की महफ़िल हम्द से शुरु होती है। उसके बाद आता है 'नात' जो प्रोफ़ेट मुहम्मद की शान में गाया जाता है और जिसे नातिया क़व्वाली भी कहते हैं। नात हम्द के बाद गाया जाता है। 'मन्क़बत' फिर एक बार अरबी शब्द है जिसका अर्थ है वह गीत जो इमाम अली या किसी सूफ़ी संत की शान में गायी जाती है। उल्लेखनीय बात यह है कि मन्क़बत सुन्नी और शिआ, दोनों की मजलिसों में गायी जाती है। अगर मन्कबत गाई जाती है तो उसका नंबर नात के बाद आता है। क़व्वाली का एक और प्रकार है 'मरसिया' जो किसी की मौत पर दर्द भरे अंदाज़ में गाई जाती है। इसकी शुरुआत हुई थी उस वक़्त जब इमाम हुसैन का परिवार करबला के युद्ध में शहीद हो गया था। यह किसी शिआ के मजलिस में ही गाई जाती है। क़व्वाली का एक प्रकार 'ग़ज़ल' भी है। यह वह ग़ज़ल नहीं जिसे भारत और पाक़िस्तान में हम आज सुना करते हैं, बल्कि इसका अंदाज़ क़व्वालीनुमा होता है। इसके दो प्रमुख उद्देश्य होते हैं - शराब पीने का मज़ा और अपनी महबूबा से जुदाई का दर्द। लेकिन इनमें भी अल्लाह के तरफ़ ही इशारा होता है। 'शराब' का मतलब होता है 'दैवीय ज्ञान' और साक़ी यानी अल्लाह या मसीहा। 'काफ़ी' क़व्वाली का वह प्रकार है जो पंजाबी, सेरैकी या सिंधी में लिखा जाता है और जिसका अंदाज़-ए-बयाँ शाह हुसैन, बुल्ले शाह और सचल सरमस्त जैसे कवियों के शैली का होता है। "नि मैं जाना जोगी दे नाल" और "मेरा पिया घर आया" दो सब से लोकप्रिय काफ़ी हैं। और अंत में 'मुनदजात' वह रात्री कालीन संवाद है जिसमें गायक अल्लाह का शुक्रिया अदा करता है विविध काव्यात्मक तरीकों से। फ़ारसी भाषा में गाए जाने वाले क़व्वाली के इस रूप के जन्मदाता मौलाना जलालुद्दीन रुमी को माना जाता है। तो दोस्तों, यह थी जानकारी क़व्वालियों के विविध रूपों की और यह जानकारी हमने बटोरी विकिपीडिया से। और आइए अब सुनते हैं आज की क़व्वाली और हम आपसे भी यही कहेंगे कि हमारी इस महफ़िल के पहेली प्रतियोगिता में आप भी अपनी क़िस्मत आज़माकर देखिए!



क्या आप जानते हैं...
कि 'मुग़ल-ए-आज़म' के रंगीन संस्करण ने साल २००६ में पाक़िस्तान में भारतीय फ़िल्मों के प्रदर्शन पर लगी पाबंदी को ख़्तम कर दिया, जो पाबंदी सन्‍ १९५६ से चल रही थी।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. इस कव्वाली में कहीं श्रीकृष्ण का भी जिक्र है, किस मशहूर फिल्म से है ये लाजवाब कव्वाली - १ अंक.
२. गायक गायिकाओं की पूरी फ़ौज है इसमें, संगीतकार बताएं - २ अंक.
३. किस शायर की कलम से निकली है ये कव्वाली - ३ अंक.
४ फिल्म के नायक बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
कनाडा टीम (प्रतिभा जी, नवीन जी, और किशोर जी के लिए सामूहिक संबोधन) बहुत बढ़िया कर रही है. अवध जी, इंदु जी, जरा जोश दिखाईये.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

ज़ाहिद न कह बुरी कि ये मस्ताने आदमी हैं.. ताहिरा सैय्यद ने कुछ यूँ आवाज़ दी दाग़ की दीवानगी और मस्तानगी को

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #९८

कोई नामो-निशाँ पूछे तो ऐ क़ासिद बता देना,
तख़ल्लुस 'दाग़' है और आशिकों के दिल में रहते हैं।

"कौन ऐसी तवाएफ़ थी जो ‘दाग़’ की ग़ज़ल बग़ैर महफिल में रंग जमा सके? क्या मुशाअरे, क्या अदबी मजलिसें, क्या आपसी सुहबतें, क्या महफ़िले-रक्स, क्या गली-कूचें, सर्वत्र ‘दाग़’ का हीं रंग ग़ालिब था।" अपनी पुस्तक "शेर-ओ-सुखन: भाग ४" में अयोध्या प्रसाद गोयलीय ने उपरोक्त कथन के द्वारा दाग़ की मक़बूलियत का बेजोड़ नज़ारा पेश किया है। ये आगे लिखते हैं:

मिर्ज़ा ‘दाग़’ को अपने जीवनकाल में जो ख्याति, प्रतिष्ठा और शानो-शौकत प्राप्त हुई, वह किसी बड़े-से-बड़े शाइर को अपनी ज़िन्दगी में मयस्सर न हुई। स्वयं उनके उस्ताद इब्राहिम ‘ज़ौक़’ शाही क़फ़समें पड़े हुए ‘तूतिये-हिन्द’ कहलाते रहे, मगर १०० रू० माहवारी से ज़्यादा का आबो-दाना कभी नहीं पा सके। ख़ुदा-ए-सुख़न ‘मीर’, ‘अमर-शाइर’ ‘गा़लिब’ और ‘आतिश’-जैसे आग्नेय शाइरों को अर्थ-चिन्ता जीवनभर घुनके कीड़े की तरह खाती रही। हकीम ‘मोमिन शैख़’, ‘नासिख़’ अलबत्ता अर्थाभाव से किसी क़द्र निश्चन्त रहे, मगर ‘दाग़’ जैसी फ़राग़त उन्हें भी कहाँ नसीब हुई? जागीर मिलने और उच्च पदवियोंसे विभूषित होनेके अतिरिक्त १५०० रू० मासिक वेतन, राजसी ठाट-बाट और नवाब हैदराबाद के उस्ताद होने का महान् गौरव मिर्जा़ ‘दाग़’ को प्राप्त था। सच मानिए तो १९वीं शताब्दीका अन्तिम युग ‘दाग़’ युग था।

दाग़ की ख्याति का यह आलम था कि उनकी शिष्य मण्डली में सम्मलित होना बहुत बड़ा सौभाग्य एवं गौरव समझा जाता था। हैदराबाद-जैसे सुदूर प्रान्तमें ‘दाग़’ के समीप जो शाइर नहीं रह सकते थे, वे लगभग शिष्य संशोधनार्थ ग़ज़लें भेजते थे। ‘दाग़’ का शिष्य कहलाना ही उन दिनों शाइर होने का बहुत बड़ा प्रमाणपत्र समझा जाता था। मिर्जा दाग़के जन्नत-नशीं होने के बाद एक दर्जन से अधिक शिष्य अपने को ‘जा-नशीने-दाग़’ (गुरुका उत्तराधिकारी शिष्य) लिखने लगे। नवाब ‘साइल’ मिर्जा ‘दाग़’ के दामाद भी थे और शिष्य भी। अतः बहुत बड़ी संख्या उन्हीं को ‘जानशीने-दाग़’ समझती थी। ‘बेखुद’ देहलवी, ‘बेखुद’ बेख़ुद’ बदायूनी, ‘आगा’ शाइर क़िज़िलबाश, ‘अहसन’ मारहरवी’, ‘नूह’ नारवी, भी अपने को ‘जानशीने-दाग़’ लिखने में बहुत अधिक गर्व का अनुभव करते हैं; और किसी कि मजाल नहीं जो उन्हें इस गौरवास्पद शब्द से वंचित कर सके। वास्तविक उत्ताधिकारी कौन है, इस प्रश्न को सुलझाने के लिए वर्षों वाद-विवाद चले है।

कहा जाता है कि दाग़ के २००० से अधिक शागिर्द थे। इन शागिर्दों में दो ऐसे भी शागिर्द रहे हैं, जिन्हें उत्तराधिकारी कहे जाने का कोई शौक़ या कोई जिद्द नहीं थी, लेकिन इन्हीं दोनों ने दाग़ का नाम सबसे ज्यादा रौशन किया है। उनमें से एक थे जिगर मुरादाबादी, जिनके बारे में हम पिछली एक महफ़िल में ज़िक्र कर चुके हैं और दूसरे थे मोहम्मद अल्लामा इक़बाल। इक़बाल अपनी कविताएँ डाक द्वारा ‘दाग़’ देहलवी को संशोधनार्थ भेजा करते थे। महज २२ वर्ष की आयु में हीं इक़बाल ऐसी दुरूस्त गज़लें लिखने लगे थे कि मिर्ज़ा दाग़ को भी उनकी काबिलियत का लोहा मानना पड़ा था। दाग़ ने उनकी रचनाएँ इस टिप्पणी के साथ वापस करनी शुरू कर दीं कि रचनाएँ संशोधन की मोहताज नहीं हैं।

अभी ऊपर हमने दाग़ के सुपूर्द-ए-खाक होने की बातें कीं, लेकिन इससे पहले जो चार दिन की ज़िंदगी होती है या फिर जन्म होता है, उसका ज़िक्र भी तो लाजिमी है। तो दाग़ का जन्म नवाब मिर्ज़ा खान के रूप में २५ मई १८३१ को हुआ था। इन्होंने बस दस वर्ष की अवस्था से ही ग़ज़ल पढ़ना प्रारम्भ कर दिया था। १८६५ में वे रामपूर चले गए। रामपुर में इनकी मक़बूलियत का हवाला देते हुए हजरत ‘नूह’ नारवी लिखते हैं कि -"मुझसे रामपुर के एक सिन-रसीदा (वयोवृद्ध) साहब ने जिक्र किया कि नवाब कल्ब अली खाँ साहब का मामूल था कि मुशाअरे के वक़्त कुछ लोगों को मुशाअरे के बाहर महज़ इस ख्याल बैठा देते थे कि बाद में ख़त्म मुशाअरा लोग किसका शेर पढ़ते हुए मुशाइरे से बाहर निकलते हैं। चुनाव हमेशा यही होता था कि ‘दाग़’ साहबका शेर पढ़ते हुए लोग अपने-अपने घरोंको जाते थे।" २४ साल रामपुर में व्यतीत करने के बाद दाग़ १८९१ के आस-पास हैदराबाद चले गए। यहीं पर १७ फरवरी १९०५ को इन्होंने अंतिम साँसें लीं।

दाग़ के बारे में और जानने के लिए चलिए अब हम निदा फ़ाज़ली साहब की शरण में चलते हैं:

दाग़ के पिता नवाब शम्सुद्दीन ने अपनी बंदूक से देश प्रेम में ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अधिकारी को उड़ा दिया था. नवाब साहब को फाँसी दी गई और उनकी पत्नी अपने पाँच साल के बेटे को रामपुर में अपनी बहन के हवाले करके, जान बचाने के लिए इधर-उधर भागती रहीं. जहाँ उन्हें मदद मिली वहाँ-वहाँ इसकी क़ीमत उन्हें अपने शरीर से चुकानी पड़ी. जिसके नतीजे में दाग़ के एक भाई और बहन अंग्रेज़ नस्ल से भी हुए. यह अभागिन महिला आख़िर में, आख़िरी मुगल सम्राट के होने वाले जानशीन मिर्ज़ा फखरू के निकाह में आई. यह १८५७ से पहले का इतिहास है. महल में आने के बाद माँ को रामपुर में छोड़े हुए बेटे की याद आई और किस्मत, बदकिस्मत बेटे को रामपुर से लालकिले में ले आई. १८५७ से एक साल पहले मिर्जा फखरू का देहांत हुआ और उसके बाद माँ और बेटा दोनों फिर से बेघर हो गए. दाग़ उस वक़्त शायर बन चुके थे. मशहूर हो चुके थे. शायरी ने उस समय के रामपुर नबाव को उन पर मेहरबान बनाया और उन्होंने फिर से घर-बार बसाया.

रामपुर में हर साल एक मेला लगता था. जिसमें देश की मशहूर तवायफ़ें अपने गायन और नृत्य का प्रदर्शन करती थीं. उन तवायफों में एक नवाब साहब के भाई की प्रेमिका थी. दाग़ का दिल उसी पर आ गया. उनका नाम था मुन्नी बाई हिजाब. मुहब्बत की दीवानगी में पत्नी के मना करने के बावजूद नवाब साहब के नाम दाग़ ने खत लिख डाला: "नवाब साहब आपको ख़ुदा ने हर ख़ुशी से नवाज़ा है, मगर मेरे लिए सिर्फ़ एक ही ख़ुशी है और वह है मुन्नी बाई."

नवाब तो दाग़ की शायरी के प्रशंसक थे. उन्होंने मुन्नी बाई के ज़रिए ही उत्तर भेजा. लिखा था - "दाग़ साहब हमें आपकी ग़ज़ल से ज़्यादा मुन्नी बाई अजीज़ नहीं है." मुन्नी बाई दाग़ साहब की प्रेमिका के रूप में उनके साथ रहने लगीं. लेकिन जब मन में धन का प्रवेश हुआ तो मन बेचारा बंजारा बन गया और मुन्नी बाई उन्हें छोड़ के चली गईं. इसी बेवफ़ाई पर शायद दाग़ ने यह शेर कहा था:

तू जो हरजाई है अपना भी यही तौर सही
तू नहीं और सही और नहीं, और सही

लखनवी और देहलवी अंदाज़ की शायरी का सम्मिश्रण दाग की शायरी में बखूबी नज़र आता है। अब आप सोच रहे होंगे कि ये दो अंदाज़ हैं क्या और इनमें अंतर क्या है। इसी प्रश्न का जवाब देवी नागरानी आर०पी०शर्मा "महर्षि" से पूछ रही हैं: (साभार: साहित्य कुंज) "देहलवी शायरी में प्रेमी का उसके सच्चे प्रेम तथा दुख-दर्द का स्वाभाविक वर्णन होता है, जब कि लखनवी शायरी अवध की उस समय विलासता से प्रभावित रही। अतः उसमें प्रेम को वासना का रूप दे दिया गया तथा शायरी प्रेमिका के इर्द -गिर्द ही घूमती रही। वर्णन में कृत्रिमता एवं उच्छृंखलता से काम लिया गया। अब लखनवी शायरी में सुधार आ गया है।" ये तो हुई अंतर की बात, लेकिन अगर इनमें मेल-मिलाप जानना हो तो दाग़ के इन शेरों से बढकर और मिसाल नहीं मिल सकते:

ग़म से कहीं निजात मिले चैन पाएं हम,
दिल खुं में नहाए तो गंगा नहाएं हम

ख़ूब परदा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं,
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

अपने दिल को भी बताऊँ न ठिकाना तेरा
सब ने जाना, जो पता एक ने जाना तेरा


दाग़ के बारे में आज हमने बहुत कुछ जाना। महफ़िल तभी सफ़ल मानी जाती है जब शेरों के साथ-साथ शायर की भी दिल खोलकर बातें हों। आज की महफ़िल भी कुछ वैसी हीं थी। इसलिए मैं मुतमुईन होकर ग़ज़ल की और बढने को बेकाबू हूँ। चलिए तो अब आज की ग़ज़ल से रूबरू हुआ जाए। इस ग़ज़ल को अपनी आवाज़ से सजाया है मल्लिका पुखराज की सुपुत्री ताहिर सैय्यद ने, जो खुद हीं बेमिसाल आवाज़ की मालकिन रही हैं। तो लीजिए पेश-ए-खिदमत है आज की ग़ज़ल, जिसमें दाग़ ज़ाहिद से यह दरख्वास्त कर रहे हैं कि ये प्यार में पागल मस्ताने और दीवाने आदमी हैं, इसलिए इन्हें बुरा न कहा जाए:

ज़ाहिद न कह बुरी कि ये मस्ताने आदमी हैं
तुझ से लिपट पड़ेंगे, दीवाने आदमी हैं

गै़रों की दोस्ती पर क्यों ऐतबार कीजे
ये दुश्मनी करेंगे, ____ आदमी हैं

तुम ने हमारे दिल में घर कर लिया तो क्या है
आबाद करते. आख़िर वीराने आदमी हैं

क्या चोर हैं जो हम को दरबाँ तुम्हारा टोके
कह दो कि ये तो जाने-पहचाने आदमी हैं




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "बला" और शेर कुछ यूँ था-

जा कि हवा-ए-शौक़ में हैं इस चमन से 'ज़ौक़'
अपनी बला से बादे-सबा अब कहीं चले

इस शब्द पर ये सारे शेर महफ़िल में कहे गए:

वो जब चाहे छीन ले मुझको ही मुझसे
उनकी बला से फिर में भले तड़पता ही रहूँ (अवनींद्र जी)

जल गया दिल मगर ऐसी जो बला निकले है
जैसे लू चलती मेरे मुँह से हवा निकले है। (मीर तक़ी ’मीर’)

उनकी बला से जीउँ या मरूँ मैं ,
उनकी आदत रिवाज बन गई रे ! (मंजु जी)

आईने में वो अपनी अदा देख रहे है
मर जाये की मिट जाये कोई उनकी बला से (सोहेल राना)

ये दुनिया भर के झगड़े, घर के किस्‍से, काम की बातें
बला हर एक टल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ (जावेद अख्तर)

रुतबा है जिनका ना आपे में वो हैं
सरे आम मुल्क में तबाही मची है
न है परवाह उनको उनकी बला से
इज्ज़त लुटी या किसी की बची है. (शन्नो जी)

पूरे दो घंटे बैठकर लिखी गई महफ़िल पोस्ट करते वक़्त डिलीट (गायब) हो गई। मैं पूरी तरह से हतोत्साहित हो चुका था। लेकिन फिर हिम्मत जुटाकर महज़ २५ मिनट में मैंने इसे याद से तैयार किया है।

पिछली महफ़िल की शान बने अवनींद्र जी। इस मुकाम के लिए आप बधाई के पात्र हैं। आपके बाद महफ़िल में शरद जी की आमद हुई। उस्ताद ज़ौक़ को समर्पित महफ़िल में उस्तादों के उस्ताद मीर तक़ी मीर का शेर पेश करके आपने सोने पर सुहागा जड़ दिया। इसके लिए किन लफ़्ज़ों में आपका शुक्रिया अदा करूँ! शन्नो जी और मंजु जी, आप दोनों के स्वरचित शेर कमाल के हैं। इन्हें पढकर मज़ा आ गया। आशीष जी, दाग़ का शेर "खूब परदा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं... " आप पर फिट बैठता है। आप की यह लुकाछिपी, किसी एक महफ़िल में आना, किसी से नदारद रहना कोई अदा है क्या? नहीं ना? तो फिर नियमित हो जाईये। :) चलिए आप सब आए तो कम से कम, न जाने हमारे बाकी मित्र किधर गायब हैं। सीमा जी, नीलम जी, आप दोनों तो नियमित हुआ करती थीं। भई.. जिधर भी हैं आप, तुरत लाईन-हाज़िर होईये, आपको तलब किया जाता है। :) उम्मीद है कि हमारे वे सारे भूले-भटके दोस्त आज भटकते हुए महफ़िल की ओर रूख कर लेंगे। दिल पर हाथ रखकर कह रहा हूँ, हमारा यह दिल मत तोड़िएगा। अरे हाँ, बातों-बातों में पिछले बुधवार की अपनी गैर-मौजूदगी की तो मुआफ़ी माँगना हीं भूल गया। दर-असल मैं अपने गृह-नगर (गाँव हीं कह लीजिए) गया हुआ था, वहाँ न तो बिज़ली सही थी और न हीं इंटरनेट, इसलिए लाख कोशिशों के बावजूद महफ़िल पोस्ट न कर सका। आप हमारी मजबूरी समझ रहे हैं ना? बढिया है।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ