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Thursday, October 22, 2009

शुक्रान अल्लाह वल हम्दुल्लाह....खुदा की नेमतों पर झुके सोनू निगम, श्रेया और सलीम के स्वर

ताजा सुर ताल TST (32)

दोस्तों, ताजा सुर ताल यानी TST पर आपके लिए है एक ख़ास मौका और एक नयी चुनौती भी. TST के हर एपिसोड में आपके लिए होंगें तीन नए गीत. और हर गीत के बाद हम आपको देंगें एक ट्रिविया यानी हर एपिसोड में होंगें ३ ट्रिविया, हर ट्रिविया के सही जवाब देने वाले हर पहले श्रोता की मिलेंगें 2 अंक. ये प्रतियोगिता दिसम्बर माह के दूसरे सप्ताह तक चलेगी, यानी 5 अक्टूबर से 14 दिसम्बर तक, यानी TST के 40 वें एपिसोड तक. जिसके समापन पर जिस श्रोता के होंगें सबसे अधिक अंक, वो चुनेगा आवाज़ की वार्षिक गीतमाला के 60 गीतों में से पहली 10 पायदानों पर बजने वाले गीत. इसके अलावा आवाज़ पर उस विजेता का एक ख़ास इंटरव्यू भी होगा जिसमें उनके संगीत और उनकी पसंद आदि पर विस्तार से चर्चा होगी. तो दोस्तों कमर कस लीजिये खेलने के लिए ये नया खेल- "कौन बनेगा TST ट्रिविया का सिकंदर"

TST ट्रिविया प्रतियोगिता में अब तक-

पिछले एपिसोड में फिर एक बार सीमा जी छाई रही, पर जवाब बस दो ही सही दिए उन्होंने, खैर आपका स्कोर हुआ 20. यदि किसी ने तीसरे जवाब के लिए कोशिश किया होता तो यकीनन दो अंक मिल सकते थे, तीसरे सवाल का सही जवाब है गीतकार प्रवीण भारद्वाज. अगले 9 एपिसोड में 18 सवाल और आयेंगें आपके सामने, उसके बाद विजेता कौन होगा ये तो हम अभी से नहीं कह सकते, पर ये तय है कि सीमा जी को टक्कर देना अब वाकई बहुत मुश्किल होगा. पर चुनौतियाँ आपको मजबूत बनाती है, तो कमर कसिये इन नयी चुनौतियों के लिए

सुजॉय - सजीव, आज TST में तरोताज़ा क्या सुनवाने जा रहे हैं?

सजीव - धर्मा प्रोडक्शन्स् की नवीन प्रस्तुति 'क़ुर्बान' फ़िल्म के गीत से आज हम शुरुआत कर रहे हैं। करण जोहर निर्मित, रेन्सिल डी'सिल्वा निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं सैफ़ अली ख़ान और करीना कपूर।

सुजॉय - मैने सुना है इस फ़िल्म की कहानी जिहाद पर आधारित है। आप ने सुना है कुछ इस बारे में?

सजीव - सुना तो मैने भी यही है। सैफ ने एक ताजा बयान में कहा है कि एक मुसलमान हो कर इस फिल्म को करने में उन्हें गर्व है और उनके साथ करीना का होना भी लोगों में दिलचस्पी पैदा करेगा. फ़िल्म के संगीत में सुफ़ियाना अंदाज़ है। पता है कौन हैं इस फ़िल्म के संगीतकार?

सुजॉय - हाँ, सलीम-सुलेमान की जोड़ी ने संगीत दिया है। इस फ़िल्म के कुल पाँच गीतों में से आज कौन सा गीत आप लेकर आए हैं?

सजीव - आज जो गीत हम सुनेंगे वो मेरे ख़याल से इस ऐल्बम का सब से अच्छा गीत है, "शुक्रां अल्लाह"। इस गीत को सुनते हुए तुम्हे फ़िल्म 'फ़ना' के गीत "सुभानल्लाह सुभानल्लाह" की शायद याद आए।

सुजॉय - एक मिनट सजीव, 'फ़ना' का बैकग्राउंड म्युज़िक सलीम-सुलेमान ने ही बनाया था न?

सजीव - बिल्कुल, और मैने तो यह भी सुना है कि "सुभानल्लाह" वाली धुन भी इसी जोड़ी ने बनाई थी जिसे जतिन-ललित ने इस्तेमाल की अपनी धुन "चाँद सिफ़ारिश जो करता हमारी" के साथ। यानी कि "सुभानल्लाह" वाली धुन सलीम-सुलेमान की थी और "चाँद सिफ़ारिश" वाली जगह जतीन-ललित की।

सुजॉय - सोनू निगम, श्रेया घोषाल और सलीम मर्चैंट ने गाया है 'कुर्बान' का यह गीत। ऐज़ युज़ुयल सोनू और श्रेया के नर्म और मासूम अंदाज़ इस गीत में भी सुनाई देती है। और सलीम ने इस गीत में जिस तरह से "शुक्रन अल्लाह" वाली जगह गाया है, एक पाक़ समां सा बंध जाता है।

सजीव - और गीतकार निरंजन अय्यंगर ने लिखा भी है बढ़िया इस गीत को। तो चलो सुनते हैं यह गीत

सुजॉय - चलते चलते बता दें कि "शुक्रां अल्लाह वल हम्दुल्लाह" का मतलब है है- खुदा तेरा शुक्रिया खुदा तेरा करम है....और श्रेय घोषाल अवश्य ही इन दिनों ये मंत्र दोहरा रही होंगी, कल राष्ट्रपति भवन में उन्हें तीसरी बार सर्वश्रेष्ठ गायिका का सम्मान दिया गया, और उन्होंने वहां "ये इश्क हाय" गाकर सबको मन्त्र मुग्ध कर दिया, श्रेया को बधाई देते हुए सुनें उनका ये नया गीत.

शुक्रान अल्लाह (कुर्बान)
आवाज़ रेटिंग - ****1/2



TST ट्रिविया # 16- तुलिप जोशी अभिनीत किस "रियलिस्टिक" फिल्म में सलीम सुलेमान ने संगीत दिया था.?

सुजॉय - वाक़ई बहुत अच्छा गाना था। अब किस गीत की बारी?

सजीव - इस हफ़्ते रिलीज़ हुई है फ़िल्म 'ब्लू'। काफ़ी उत्सुकता से लोग इस फ़िल्म का इंतेज़ार कर रहे थे। तो क्यों ना इसी फ़िल्म से एक और गीत हम अपने श्रोताओं को सुनवाएँ!

सुजॉय - बिल्कुल सुनवाते हैं। लेकिन पहले यह बताइए कि आप ने यह फ़िल्म देखी है? मैने तो नहीं अभी नहीं देखी लेकिन मेरे दफ़्तर के दोस्तों ने देखी है और अफ़सोस की बात है कि लोगों को फ़िल्म कुछ ख़ास पसंद नहीं आ रही है।

सजीव - मैंने भी प्रशेन की समीक्षा पढ़ी तो मन ही नहीं हुआ फिल्म देखने का. यह वाक़ई अफ़सोस की बात है! बॉलीवुड की सब से महँगी फ़िल्म अगर पिट जाए तो अफ़सोस के साथ साथ हैरत भी होती है। लेकिन इस तरफ़ के हादसे पहले भी हुए हैं। याद है ९० के दशक में अनिल कपूर और श्रीदेवी की एक फ़िल्म आयी थी 'रूप की रानी चोरों का राजा', जो उस ज़माने की सब से महँगी फ़िल्म थी और कितनी बुरी से पिटी थी?

सुजॉय - बिल्कुल याद है सजीव। लेकिन अभी 'ब्लू' के बारे में किसी निश्कर्ष पर पहुँचना जल्द बाज़ी होगी। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि फ़िल्म दूसरे या तीसरे सप्ताह से तेज़ी पकड़ लेती है और फिर हिट हो जाती है। वैसे खबर है कि इस फिल्म की टीम ने ब्लू का दूसरा भाग बनाने की योजना को भी अंतिम रूप दे दिया है, इसमें ज्यादा खतरनाक शार्क मछलियाँ होंगी, यानी बजट भी और खतरनाक... ख़ैर, अब बताइए कौन सा गीत हम बजा रहे हैं?

सजीव - यह है विजय प्रकाश और श्रेया घोषाल का गाया "फ़िक़राना होके हम जीयें"। ए. आर. रहमान ने काफ़ी इलेक्ट्रॊनिक्स का इस्तेमाल किया है।

सुजॉय - गाना बुरा नहीं है, लेकिन मुझे कहीं ऐसा लगता है कि ज़्यादा इलेक्ट्रॊनिक्स के इस्तेमाल से गीत में शार्पनेस तो आई है लेकिन गोलाई कहीं दूर चली गई है। बहुत ज़्यादा कृत्रिम सुनाई देता है।

सजीव - तुम्हारी बात सही है, लेकिन एक नयापन भी है गीत में। रहमान ने कम से कम अपने आप को उस वृत्त से बाहर निकालना चाहा जिसके अंदर वो कुछ सालों से फँस गए थे और एक ही तरह का संगीत उनकी तरफ़ से आ रहे थे। पर वाद्यों का शोर इस हद तक हावी है कि कई जगह तो शब्द समझ ही नहीं आते. वैसे धुन ऐसी है कि आप गुनगुना सकें.

सुजॉय - तो चलिए सुनते हैं यह गीत।

फिकराना (ब्लू)
आवाज़ रेटिंग - ***



TST ट्रिविया # 17- किस संगीत कंपनी ने "ब्लू" का एल्बम रीलिस किया है ?

सुजॉय - और अब आज के तीसरे और अंतिम गीत की बारी। कौन सा गीत है?

सजीव - फ़िल्म 'लंदन ड्रीम्स' के चार गानें हमने सुने हैं, आज इसी फ़िल्म के पाँचवे गीत की बारी। इस फ़िल्म में वैसे कुल ८ गानें हैं, और हर एक में कुछ ना कुछ बात ज़रूर है, और शायद इसी वजह से हम इस फ़िल्म के गानें सुनते और सुनवाते चले जा रहे हैं।

सुजॉय - फ़िल्म की कहानी भी शायद रॊक बैंड पर आधारित है। सलमान ख़ान और अजय देवगन की दोस्ती नज़र आएगी इस फ़िल्म में। 'हम दिल दे चुके सनम' के बाद शायद इसी फ़िल्म में ये दोनों साथ साथ नज़र आएँगे। अच्छा, आज किस गीत को आप चुन लाए हैं?

सजीव - "बरसो रे", जिसे गाया है विशाल दादलानी और रूप कुमार राठौड़ ने। याद दिला दूँ कि इस फ़िल्म में विशाल-शेखर का नहीं बल्कि शंकर अहसान लॉय का संगीत है।

सुजॉय - यह आप ने अच्छी बात की तरफ़ इशारा किया है। एक संगीतकार का किसी दूसरे संगीतकार से अपनी फ़िल्म में गानें गवाना बहुत बड़ी और स्पोर्टिंग्‍ स्पिरिट वाली बात होती है। विशाल से राजेश रोशन तक ने गानें गवाए हैं फ़िल्म 'क्रेज़ी फ़ोर' में।

सजीव - शायद इसी वजह से कि बहुत दम है विशाल की आवाज़ में। एक जो रॉक की फ़ील होती है न, उसे हर गायक नहीं निभा सकते। विशाल और के.के जैसे गायक आज के दौर में इस तरह के रॊक शैली के गीतों को बख़ूबी निभाते हैं। वैसे मैं व्यक्तिगत तौर पर इनकी आवाज़ का कायल नहीं हूँ, पर लगता है हमारे सभी संगीतकार उनके जबरदस्त फैन बन चुके हैं.

सुजॉय - हाँ, और इस गीत में भी वही रॉक अंदाज़ है। पर्काशन और माडर्न साज़ों का भरपूर इस्तेमाल हुआ है। पूरे जोश और ज़िंदादिली से इस गीत को हर एक कलाकार ने निभाया है। बेशक़ इस गीत को युवा पीढ़ी को आकृष्ट करने के लिए बनाया गया होगा। जैसे जैसे गीत आगे बढ़ती है, उसमें देसीपन बढ़ती चली जाती है। और तब देती है सुनाई रूप कुमार राठौड़ की आवाज़ और एक नाज़ुकी सी छा जाती है गीत में।

सजीव - और अंत में एक बार फिर से वही रॉक अंदाज़। रॉक होते हुए भी गीत समाप्त होता है "हनुमान की जय" के साथ। और यही अंतिम हिस्सा इस गीत एक साधारण गीत ख़ास बना देता है तो चलो सुनते हैं यह गीत। ये गानें हम पहली पहली बार सुन रहे हैं, इसलिए शायद एक ही बार में बहुत अच्छा ना लगे सुनने में, लेकिन धीरे धीरे हो सकता है कि हमारे कानों से होते हुए ये दिल में भी जगह बना लें। देखते हैं क्या होता है, फिलहाल सुनते हैं यह गीत

बरसो (लन्दन ड्रीम्स)
आवाज़ रेटिंग -****



TST ट्रिविया # 18- लन्दन ड्रीम्स के निर्देशक ने अपनी एक हिट फिल्म में एक मशहूर होली गीत फिल्माया था, कौनसा था ये गीत और कौन थे इस गीत के संगीतकार ?

आवाज़ की टीम ने इन गीतों को दी है अपनी रेटिंग. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसे लगे? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीतों को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

शुभकामनाएँ....



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Monday, October 5, 2009

आ ज़माने आ, आजमाले आ...गायक मोहन की आवाज़ में है सपनों को सच करने का हौंसला

ताजा सुर ताल TST (27)

दोस्तों, आज से ताजा सुर ताल यानी TST पर आपके लिए है एक ख़ास मौका और एक नयी चुनौती भी. आज से TST के हर एपिसोड में आपके लिए होंगें १ की जगह तीन नए गीत. और हर गीत के बाद हम आपको देंगें एक ट्रिविया यानी हर एपिसोड में होंगें ३ ट्रिविया, हर ट्रिविया के सही जवाब देने वाले हर पहले श्रोता की मिलेंगें २ अंक. ये प्रतियोगिता दिसम्बर माह के दूसरे सप्ताह तक चलेगी, यानी आज से अगले २० एपिसोडस तक, जिसके समापन पर जिस श्रोता के होंगें सबसे अधिक अंक, वो चुनेगा आवाज़ की वार्षिक गीतमाला के ६० गीतों में से पहली १० पायदानों पर बजने वाले गीत. इसके अलावा आवाज़ पर उस विजेता का एक ख़ास इंटरव्यू भी होगा जिसमें उनके संगीत और उनकी पसंद आदि पर विस्तार से चर्चा होगी. तो दोस्तों कमर कस लीजिये खेलने के लिए ये नया खेल- "कौन बनेगा TST ट्रिविया का सिकंदर"

तो चलिए आज के इस नए एपिसोड की शुरुआत करें, दोस्तों सुजॉय अभी भी छुट्टियों से नहीं लौटे हैं, तो उनकी अनुपस्तिथि में मैं सजीव सारथी एक बार फिर आपका स्वागत करता हूँ. इस वर्ष लगभग ४ महीनों तक सिनेमा घरों के मालिकों और फिल्म निर्माताओं के बीच ठनी रही और ढेरों फिल्मों का प्रदर्शन टल गया. यही वजह है कि आजकल एक के बाद एक फिल्में आती जा रही हैं और रोज ही किसी नयी फिल्म का संगीत भी बाज़ार में आ रहा है. "लन्दन ड्रीम्स" एक ऐसी फिल्म है जिसका सिनेमाप्रेमियों को बेसब्री से इंतज़ार होगा. इसकी एक वजह इस फिल्म का संगीत भी है, शंकर एहसान और लॉय की तिकडी ने बहुत दिनों बाद ऐसा जलवा बिखेरा है. ढेरों नए गायकों को भी इस फिल्म में उन्होंने मौका दिया है. अभिजित घोषाल से तो हम आपको मिलवा ही चुके हैं इस कार्यक्रम में. आज सुनिए एक और नए गायक मोहन और साथियों का गाया एक और जबरदस्त गीत -"खानाबदोश". इस गीत में एक बहुत ख़ास रेट्रो फील है. शुरुआत में चुटकी और कोरस का ऐसा सुन्दर इस्तेमाल बहुत दिनों बाद किसी गीत में सुनने को मिला है, मोहन की आवाज़ में जबरदस्त संभावनाएं हैं, बहुत कोशिशों के बावजूद भी मैं उनके बारे में अधिक जानकारी नहीं ढूंढ पाया. 'आ ज़माने आ..." से गीत कुछ ऐसे उठता है जिसके बाद आप उसके सम्मोहन में ऐसे बंध जाते हैं कि स्वाभाविक रूप से ही आप गीत को दुबारा सुनना चाहेंगे. मेरी नज़र में तो ये इस साल के श्रेष्ठतम गीतों में से एक है, संगीत संयोजन भी एक दम नापा तुला, और प्रसून के बोल भी कुछ कम नहीं...इससे बेहतर कि मैं कुछ और कहूं आप खुद ही सुनकर देखिये, हो सकता है पहली झलक में आपको इतना न भाए पर धीरे धीरे इसका नशा आप भी भी चढ़ जायेगा ये तय है

खानाबदोश (लन्दन ड्रीम्स)
आवाज़ रेटिंग - ****१/२.



TST ट्रिविया # ०१ - शंकर महादेवन ने शिवमणि और लुईस बैंकस के साथ मिलकर एक संगीत टीम बनायीं थी, क्या आप जानते हैं उस ग्रुप का नाम ?

चलिए आगे बढ़ते हैं. अगला गीत है एक ऑफ बीट फिल्म का. मशहूर साहित्यकार उदय प्रकाश की कहानी पर आधारित "मोहनदास" को शहरों के मल्टीप्लेक्स में काफी सराहना मिली है. संगीतकार हैं विवेक प्रियदर्शन और गीतकार हैं यश मालविय. सीमित प्रचार के बावजूद फिल्म को अच्छे सिनेमा के कद्रदानों ने पसंद किया है, जो कि ख़ुशी की बात है, फिल्म में सभी गीत पार्श्व में हैं....और ये गीत बहुत ही मधुर है, मेलोडी लौटी है विवेक के इस गीत में, शब्द भी अच्छे हैं सुनिए, और आनंद लीजिये -

नदी में ये चंदा (मोहनदास)
आवाज़ रेटिंग - ****



TST ट्रिविया # ०२ - फिल्म मोहनदास के निर्देशक मजहर कामरान ने एक मशहूर निर्देशक की फिल्म के लिए बतौर सिनेमेटोग्राफर भी काम किया है, क्या आप जानते हैं कौन है वो निर्देशक ?

आज का अंतिम गीत हिन्दुस्तान की सबसे महँगी फिल्म का थीम है, अमूमन थीम संगीत में शब्द नहीं होते पर यहाँ बोल भी है और मज़े की बात ये है कि इस थीम के बोल फिल्म के अन्य गीतों के मुकाबले अधिक अच्छे भी हैं. संगीत है ऑस्कर विजेता ऐ आर रहमान का. रहमान साहब की सबसे बड़ी खासियत ये है कि उनका संगीत अपने आप में बहुत होता है एक पूरी कहानी के लिए, उनके वाध्य बोलते हुए से प्रतीत होते हैं, थीम संगीत की अगर बात की जाए तो इसकी परंपरा भी रहमान साहब ने ही डाली थी, फिल्म बॉम्बे का थीम संगीत आज भी रोंगटे खड़े कर देता है, सत्या में विशाल भारद्वाज का थीम संगीत फिल्म के गीतों से भी अधिक लोकप्रिय हुआ था. "ब्लू" का ये थीम संगीत भी जबरदस्त ऊर्जा से भरपूर है. संगीत प्रेमियों के लिए ट्रीट है ये. गायकों कि एक बड़ी फौज है इस थीम में. नेहा कक्कड़ की आवाज़ आपने सुनी होगी इंडियन आइडल में में, दिल्ली की इस गायिका की बड़ी बहन सोनू कक्कड़ भी बेहद मशहूर गायिका हैं दिल्ली की. दोनों बहनों की आवाजें हैं इस गीत में.साथ में हैं रकीब आलम, जसप्रीत, ब्लाज़ और दिलशाद भी. इस मस्त संगीत का आनंद लें -

ब्लू थीम (ब्लू)
आवाज़ रेटिंग -****



TST ट्रिविया # ०३ - ब्लू के इस थीम ट्रैक में बोल किसने लिखे हैं, क्या आप जानते हैं ?

आवाज़ की टीम ने इन गीतों को दी है अपनी रेटिंग. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसे लगे? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीतों को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

शुभकामनाएँ....



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Thursday, September 24, 2009

ऑस्कर जीत के बाद लौटे हैं रहमान मगर इस बार रंग है "ब्लू"

ताजा सुर ताल (24)

ताजा सुर ताल में आज में आज सुनिए हिंदुस्तान की अब तक की सबसे महंगी फिल्म "ब्लू" का एक गुस्ताख गीत

सुजॉय - सजीव, लगता है कि अब वह वक़्त आ गया है कि हमारे यहाँ भी पारंपरिक फ़िल्मी कहानियों से आगे निकलकर हॉलीवुड की तरह नए नए विषयों पर फ़िल्में बनने लगी हैं।

सजीव- किस फ़िल्म की तरफ़ तुम्हारा इशारा है सुजॉय?

सुजॉय- अक्षय कुमार की नई फ़िल्म 'ब्लू'। इस ऐक्शन फ़िल्म की कहानी केन्द्रित है समुंदर के नीचे छुपे हुए ख़ज़ाने की जिसकी रखवाली कर रहे हैं शार्क मछलियाँ। अमेरिकी लेखक जोशुआ लुरी और ब्रायान सुलिवन ने इस कहानी को लिखा है और गायिका कायली मिनोग ने भी अतिथी कलाकार के रूप में इस फ़िल्म में एक गीत गाया है जो उन्ही पर फ़िल्माया गया है।

सजीव- हाँ, मैने भी सुना है इस फ़िल्म के बारे में। क्यों ना थोड़ी सी जानकारी और दी जाए इस फ़िल्म से संबंधित! कहानी ऐसी है कि सागर और सैम दो भाई हैं, जिन्हे गुप्तधन ढ़ूंढने का ज़बरदस्त शौक है। सागर की पत्नी मोना के साथ वे बहामा के लिए निकल पड़ते हैं समुंदर के २०० फ़ीट नीचे छुपे किसी ख़ज़ाने को ढ़ूंढने के लिए। लेकिन उनकी मुलाक़त होती है आरव से जो उसी गुप्तधन को ढ़ूंढने के लिए वहाँ पे आया हुआ है। फ़िल्म का ज़्यादातर हिस्सा समुंदर के नीचे फ़िल्माया गया है, और इसीलिए फ़िल्म का शीर्षक भी रखा गया है 'ब्लू'।

सुजॉय- भई, मुझे तो बहुत इंटरेस्टिंग लग रही है, मैं तो ज़रूर देखूँगा यह फ़िल्म। वैसे फ़िल्म में कलाकार भी अच्छे हैं - संजय दत्त, अक्षय कुमार, ज़ायद ख़ान और लारा दत्ता। इन्ही चार लोगों के इर्द-गिर्द घूमती है कहानी। सुना है कि बैंकॉक में इन सभी कलाकारों को फ़िल्म की शूटिंग शुरु होने से पहले स्कूबा डायविंग की ट्रेनिंग लेनी पड़ी है। अच्छा सजीव, पता है फ़िल्म में संगीत किसका है?

सजीव- हाँ, ए. आर. रहमान का। कुल ७ ट्रैक्स हैं इस ऐल्बम में। गानें लिखे हैं अब्बास टायरवाला, मयूर पुरी और रक़ीब आलम ने, और गीतों में आवाज़ें हैं सोनू निगम, उदित नारायण, श्रेया घोषाल, सुखविंदर सिंह, राशिद अली, नीरज श्रीधर, मधुश्री, सोनू कक्कर, विजय प्रकाश, जसप्रीत सिंह, दिल्शाद और रक़ीब की, साथ ही एक गीत में कायली मिनोग और सुज़ैन डी'मेलो की भी आवाज़ें हैं।

सुजॉय- यानी की ये ऑस्कर में जीत के बाद रहमान साहब की पहली प्रर्दशित फिल्म होगी, तो आज हम कौन सा गीत सुनवाएँगे?

सजीव- वही गीत जो इन दिनों काफ़ी सुना और देखा जा रहा है। श्रेया और सुखविंदर का गाया "आज दिल गुस्ताख़ है, पानियों में आग है"। ये एक पेशानेट गीत है और श्रेया ने खूब जम कर गाया है इसे, ३ बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित इस गायिका ने खुद को कभी किसी इमेज में कैद नहीं होने दिया....हाँ सुखविंदर की आवाज़ कुछ ख़ास नहीं जमी इस गीत में....हो सकता है उनका चुनाव नायक संजय दत्त को जेहन में रख कर किया गया है....

सुजॉय- मैने यह गीत सुना है, और बहुत दिनों के बाद ऐसा लगा कि ए. आर. रहमान कुछ अलग हट के बनाया है, वर्ना पिछले कई फ़िल्मों से पीरियड फ़िल्मों में संगीत देते देते वो थोड़े से टाइप-कास्ट होते जा रहे थे।

सजीव- हाँ, दरअसल रहमान साहब फिल्म के मूड के हिसाब से संगीत देने में माहिर हैं, अब यदि तेज़ बीट्स संगीत की बात की जाए तो "हम से मुकाबलa" से लेकर "गजनी" तक एक लम्बी सूची है, वहीँ आत्मीय और मेलोडी वाले संगीत पर गौर करें तो "रोजा" से लेकर 'जोधा अकबर" और "जाने तू..." जैसी फिल्मों में उनका संगीत कितना मधुर था ये बात हम सब जानते हैं. "ब्लू" की अगर बात की जाए तो ये एक तेज़ तर्रार एक्शन फिल्म है तो जाहिर है इसमें हर रंग का कुछ न कुछ होना चाहिए था, इस बड़े बजट फिल्म संगीत भी बड़े कैनवास का दिया है रहमान ने. कहते हैं कायली पर जो गीत फिल्माया गया है उस पर पूरे ६ करोड़ का खर्चा आया है, सुजोय अगर ६ करोड़ मिल जाए तो आप कितनी फिल्में बना सकते हैं ?

सुजॉय - कम से कम २ अच्छी फिल्में तो बन ही सकती है....

सजीव - तो सोचिये हमारी दो फिल्मों का खर्चा लेकर इन लोगों ने एक गीत फिल्मा दिया .....हा हा हा...खैर बड़े निर्माताओं की बड़ी बातें हैं ये...हम जिस गीत की आज बात कर रहे हैं इस गीत में भी जहाँ एक तरफ़ रोमांस है, वहीं दूसरी ओर इसका म्युज़िक ऐरेंजमेंट भी कमाल का है।

सुजॉय - ऐकोस्टिक गीटार का बहुत ही सुंदर इस्तेमाल सुनने को मिलता है इस गीत में, और जो ध्वनियाँ, जो संगीत इस गीत में सुनाई देता है वह बहुत ही मॊडर्ण है, कॊंटेम्पोररी है, लेकिन एक मेलडी भी है, मिठास भी है। अनर्थक शोर शराबा नहीं है, बल्कि एक सूथिंग नंबर है। कई बार सुनते सुनते गीत ज़हन में बसने लगता है। एक और बात कि इस गीत का जो अंत है, उसमें गीत का वॊल्युम धीरे धीरे कम हो कर गीत समाप्त हो जाता है। इस तरह का समापन पुराने दौर में काफ़ी सुनने को मिला है, लेकिन पिछले दो दशकों के गीतों को अगर आप सुनें तो पाएँगे कि गानें झट से समाप्त होते हैं ना कि ग्रैजुअली। तो बहुत दिनों के बाद इस तरह का ग्रैजुअल एंडिंग सुनने को मिला है।

सजीव- बिल्कुल! ऑस्कर मिलने के बाद अब रहमान से काफ़ी उम्मीदें हैं सभी को। तो ज़ाहिर बात है कि वो जल्द बाज़ी में आकर अपने संगीत के स्तर को गिरने नहीं देंगे, और आगे भी नए नए उनके प्रयोग हमें सुनने को मिलेंगे। तुम कितने अंक दोगे इस गीत को?

सुजॉय - मैं दूँगा ४ अंक। आपका क्या ख़याल है?

सजीव - बिलकुल सही मैं भी ४ अंक दूंगा.

सुजॉय- तो चलिए सुनते हैं गीत, इस फ़िल्म से तो मुझे बहुत सारी उम्मीदें हैं, देखते हैं कि फ़िल्म कैसी बनी है। एक बात तो ज़ाहिर है कि अगर हमारी जनता ने फ़िल्म को सर आँखों पर बिठा लिया तो आगे भी इस तरह की ग़ैर पारंपरिक फ़िल्में हमारे यहाँ और भी बनेंगी। क्या पता यह एक ट्रेंडसेटर फ़िल्म साबित हो जाए!

सजीव- ज़रूर! हमारी शुभकामनाएँ फ़िल्म के निर्माता धिलिन मेहता के साथ है....



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 4 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Tuesday, March 24, 2009

ए आर रहमान और ढेरों युवा संगीत कर्मियों के जोश को समर्पित एक गीत

ए आर रहमान का ऑस्कर जीतना पूरे भारत के युवा संगीत कर्मियों के लिए एक अनूठी प्रेरणा बन गया है. पहले हमारे संगीत योद्धा जो अब तक फिल्म फेयर या रास्ट्रीय पुरस्कारों के सपने सजाते थे अब उनमें साहस आ गया है कि वो बड़े अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मानों के भी ख्वाब देख पा रहे हैं. उनमें अब ये यकीन भर गया है कि अब उनका मंच एक "ग्लोबल औडिएंस" का है और उनके यानी भारतीय अंदाज़ के संगीत के श्रोता और कद्रदान देश विदेश में फैले भारतीय ही नहीं बल्कि वो विदेशी श्रोता भी हैं जो अब तक भारतीय विशेषकर लोकप्रिय भारतीय फिल्म और गैर फ़िल्मी संगीत से जी चुराते थे.

"It is being an interesting Journey till now. I have come across criticism, flattery, highs and lows" - A.R. Rahman.
ए आर के इसी वक्तव्य से प्रेरित होकर आवाज़ के एक संगीत कर्मी प्रदीप पाठक ने एक गीत रचा,
प्रदीप पाठक
इन्टरनेट पर ही मिले संगीतकार सागर पाटिल ने जब इसे पढ़ा तो वो उसे स्वरबद्ध करने के लिए प्रेरित हुए. पुनीत देसाई ने इसे अपनी आवाज़ दी और इस तरह मात्र इंटरनेटिया प्रयासों से तैयार हुआ संगीत के बादशाह ए आर रहमान को समर्पित ये जोशीला गीत जो युवाओं को बेहद सशक्त रूप से प्रेरित करने की कुव्वत रखता है.

इस गीत के गीतकार, प्रदीप पाठक हिंदुस्तान टाईम्स में सॉफ्टवयेर प्रोफेशनल हैं, दिल से कवि हैं और अपने जज़्बात कलम के माध्यम से दुनिया के सामने रखते हैं. मूल रूप से उत्तराखंड निवासी प्रदीप गुलज़ार साहब और प्रसून जोशी के "फैन" हैं. ज़ाहिर है ए आर रहमान उनके पसंदीदा संगीतकार हैं. संगीतकार सागर पाटिल पिछले 3 वर्षों से एक अंतर्राष्ट्रीय संगीत संस्थानों के लिए कार्यरत हैं. उन्हें नए प्रयोगों में आनंद मिलता है, इस कारण ये प्रोजेक्ट भी उनके लिए विशेष महत्त्व रखता है. गीत के गायक पुनीत देसाई वैसे तो इंजीनियरिंग की पढाई कर रहे हैं पर वो खुद को एक गायक के तौर पर देखना अधिक पसंद करते हैं. वो एक रॉक बैंड के सदस्य भी है और गिटार भी अच्छा बजा लेते हैं. तो सुनिए आवाज़ का एक और नजराना, इंटरनेटिया गठबंधन से बना एक और थीम गीत. संगीतकार ए आर रहमान और संगीत की दुनिया में अपना सितारा बुलन्द करने की ख्वाहिश में दिन रात एक करते देश के ढेरों युवा संगीत कर्मियों के जोश को समर्पित ये गीत जिसका सही शीर्षक दिया है प्रदीप ने - "The Journey".



गीत के बोल -
सागर पाटिल
पुनीत देसाई

चुनी राहें हमने भी, खोली बाहें हमने भी ,
सब रातें खाली हुईं हैं ! हम जागे हैं जब कभी।
कुछ सियाही सी , नदिया जो रेत की -
गलियों से गुजरती, भागे है जब कभी।

रुख जो हवाओं का , संग ले गया ज़मी,
वो मस्त बहारों का- रंग, ले गया नमी,
हम जोश मे अपने, करतब दिखाते हैं,
मिट जायें! कभी नही ! ख्वाब वो सजाते हैं।

फिज़ाओं से बही जो- पलकों की बूँद तक,
सजी आँखों मे अपने- खुदा की रूह जब कभी।
चुनी राहें हमने भी...........

मासूम सा एक पल, नई ज़िन्दगी अपनी,
हर इश्क पे सजदा है, नई बंदगी अपनी,
हम होश मे अपने- इश्क को मिलाते हैं,
थम जायें! कभी नही- धुन वो जगाते हैं।

फ़िर चमकती शाम मे, नई मौज सी लगी,
छुपी पत्तों पे जैसे- सूरज की लौ जब कहीं।

चुनी राहें हमने भी, खोली बाहें हमने भी,
सब रातें खाली हुईं हैं ! हम जागे हैं जब कभी



Thursday, March 19, 2009

माँ! तेरी जय हो। 'जय हो' का एक रूप यह भी

रहमान और भारत माता को राजकुमार 'राकू' का सलाम


रहमान के गीत 'जय हो' को ऑस्कर मिलने के बाद इस गीत के ढेरों संस्करण इंटरनेट पर उपलब्ध हो गये। भारतीय राजनीतिज्ञों के ऊपर व्यंग्य कसती 'जेल हो' गीत भी चर्चा में है। हिन्द-युग्म के राजकुमार राकू' ने रहमान की इस उपलब्धि को रहमान को भारत माँ को सलाम कहा। सब अपनी-अपनी तरह से रहमान को सलाम कर रहे थे, इसी बीच राजकुमार 'राकू' और उनकी टीम ने एक नया गीत गढ़ा 'माँ! तेरी जय हो'। इस गीत को लिखा है खुद राकुमार 'राकू' ने। राकू ने संगीत विवेक अस्थाना के साथ मिलकर इस गीत को धुन दी है। संगीत-संयोजन किया है बॉलीवुड के उभरते संगीतकार विवेक अस्थाना ने। गीत में आवाज़ें हैं राजकुमार राकू (कमेंट्री), राजेश बिसेन, सुमेधा और साथियों की। आपको बताते चलें कि यह गीत आने वाली फिल्म 'कलाम का सलाम' का हिस्सा होगा। इस गीत में सभी भारतीय वाद्य-यंत्रों का इस्तेमाल किया गया है। 'माँ' से जुड़ीं भावों को पिरोने के लिए राग दुर्गा का और विजय भाव के लिए राग जयजयवंती का प्रयोग किया गया है। आवाज़ के श्रोताओं को दुबारा याद दिला दें कि राकू और विवेक अस्थाना की जोड़ी द्वारा तैयार भिखारी ठाकुर का गीत 'हँसी-हँसी पनवा' हमने आपको दिसम्बर २००८ में सुनवाया था। आज सुनिए रहमान और भारत माँ को समर्पित यह गीत



वॉयस ओवर-
तेरी संतानों ........तेरे बच्चों ने, कला की दुनिया में तेरा नाम आसमानों पे लिख दिया। माता तेरी जय हो।
लेकिन तेरी ' आन, बान, शान, मान ' से से बढ़ कर क्या हो सकता है कोई भी सम्मान? तेरे बेटे 'रहमान' ने तो कह भी दिया .........." मेरे पास माँ है ...........!"
सच्चा बेटा तेरा ! सच्चा हिन्दोस्तानी ! उसकी गूँज तो सभी ने सुनी
और आज, उसकी शानदार ऊँचाई को मेरा छोटा सा सलाम ...........माँ! तेरे नाम!

गीत के बोल-
जय हो.........जय हो..............जय हो !
जननी मेरी .................. तेरी जय हो !
माता मेरी ....................तेरी जय हो !

तेरी गोद रहे ................आँगन मेरा!
आँचल हो तेरा ............चाहत मेरी!
ममता से भरी ............आँखें तेरी,
काबा मेरा ......काशी मेरी ..........
जय माँ मेरी माँ जय हो
महिमा तेरी माँ, जय हो
माँ शक्तिशाली जय हो
माँ सबसे न्यारी, जय हो
जयति जय, जयति जय, जय हो ..........जय हो .......जय ,जय ,जय , जय , जय , जय , हो !

ये सारा सम्मान मेरा
सौभाग्य मेरा .........अरमान मेरा !
ईमान मेरा ............भगवान् मेरा !
ये सारा हिन्दुस्ताँ, ये सारा हिन्दुस्ताँ मेरा
माँ सब कुछ है ..............वरदान तेरा !
जय हो, जय हो, जय हो
जयति जय, जय हो
जय हो ..........जय हो .......जय ,जय ,जय , जय , जय , जय , हो !

तेरी सेवा ................अनहद नाद रहे
बस तू ही तूही .........याद रहे !
आनंद रहे ..........उन्माद रहे !
हम मिट जायें ....कि..... रहे न रहें ।
बस तेरे सर पे .............ताज रहे ।
तेरे दामन में .........आबाद हैं हम ,
तो फिर कैसी......... फरियाद रहे ?

दुनिया देखे ............देखे दुनिया...............ऐसी तेरी, माँ तेरी जय हो ...ऐसी तेरी, माँ तेरी जय हो

जय हो.....जय हो ! ................जय ही जय हो !
आई मेरी ..............माई मेरी !
जननी मेरी .........माता मेरी !
भारतमाता ..........माय मदर इंडिया
माय मदर इंडिया ...........भारतमाता !
जय हो .......तेरी.तेरी जय हो .........तेरी जय हो .....................जय हो !
जय हो !

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Friday, February 20, 2009

"ससुराल गैन्दाफूल..."- रेखा भारद्वाज का चिर परचित अंदाज़


"नमक इश्क का", फ़िल्म ओमकारा का ये हिट गीत था जिसे गाने के बाद रेखा भरद्वाज ने कमियाबी का असली स्वाद चखा था. इस गीत के संगीतकार हैं विशाल भरद्वाज जो रेखा के पति और एक कामियाब संगीतकार होने के साथ साथ एक उत्कृष्ट निर्देशक भी हैं. नमक इश्क का गीत लिखा था गुलज़ार साहब ने जिन्हें रेखा अपना मेंटर मानती है. १९९६ में बनी गुलज़ार की फ़िल्म "माचिस" से विशाल भरद्वाज बतौर संगीतकार चर्चा में आए थे. इसी फ़िल्म में रेखा ने विशाल को सहयोग दिया था संगीत में. तत्पश्चात चाची ४२०, गोड़ मदर, हु तू तू और मकडी में उन्होंने विशाल के साथ काम किया. कभी कभार कुछ गीतों को अपनी आवाज़ भी दी.

विशाल ने "मकडी" से निर्देशन में कदम रखा, और अगली फ़िल्म "मकबूल" में उन्होंने रेखा से दो बेहद दमदार "रोने दो" और "चिंगारी" गीत गवाए, २००३-०४ में उन्हीं के संगीत निर्देशन में रेखा की पहली चर्चित एल्बम "इश्का इश्का" आई. इससे ठीक दस साल पहले १९९४ में जब रेखा बुल्ले शाह के गीतों पर विशाल के निर्देशन में काम कर रही थी, उन्हीं दिनों माचिस की सिटिंग के लिए उनका गुलज़ार साहब के यहाँ आना जाना हुआ, जहाँ एक दिन गुलज़ार साहब ने उनसे वादा किया कि वो उनकी अल्बम के लिए गीत लिखेंगे. और गुलज़ार साहब ने अपना वादा निभाया भी.

इस एल्बम के बाद उन्हें एक अच्छे सूफी गायिका के रूप में देखा जाने लगा था. विशाल को जब भी किसी गीत में एक अलग लहजे की आवाज़ की दरकार होती वो रेखा को ही चुनते. याद कीजिये "एक वो दिन भी थे..." (चाची ४२०), "मेरी जान (भागमती), और "फूँक दे.." (नो स्मोकिंग). ऐसा नही कि रेखा ने सिर्फ़ विशाल के संगीत निर्देशन में ही गाया हो, जैसा कि कुछ आलोचक उन्हें विशाल की परछाई बता कर दरकिनार कर देते हैं. शांतनु मोइत्रा के निर्देशन में फ़िल्म "लागा चुनरी में दाग" का शीर्षक गीत इस मिथक को तोड़ने के लिए काफ़ी है. इस गीत में नायिका के मन में बदलते भावों को अपनी आवाज़ से उभारना आसान नही था और शुद्ध और क्लिष्ट हिन्दी के शब्दों का इस्तेमाल किया था इस गीत में गीतकार स्वानंद किरकिरे ने भी, पर रेखा ने इस चुनौती भरे गीत को भी उतनी खूबी से निभाया जैसे ठीक उल्टे मिजाज़ के (ठेठ देसी नाच गीत)"नमक इश्क का" गीत को निभाया था.

रेखा आजकल एक बार फ़िर खूब तारीफें बटोर रही है, दिल्ली ६ में पहली बार ऐ आर रहमान के निर्देशन में गाये रंगीले अंदाज़ के अपने गीत "गैन्दाफूल" के लिए. वहीदा रहमान पर फिल्माए गए इस गीत में देसी छेड़ छाड़ तो है ही, एक अलग तरह मस्ती भी है, जो बार बार सुने जाने को मजबूर करती है. रेखा की आवाज़ अपने पूरे शबाब पर है यहाँ और प्रसून के शब्द भी गुदगुदाते हैं. तो सुनिए...क्या क्या होता है नई नवेली दुल्हन के साथ ससुराल में -



Sunday, February 15, 2009

बिल्लू को कहना नही कोई हज्ज़ाम...

सप्ताह की संगीत सुर्खियाँ (11)
नामांकन में आना भी एक उपलब्धि है - पंडित रवि शंकर
ग्रैमी पुरस्कार विजेता उस्ताद जाकिर हुसैन को बधाई देने वालों में तीन बार ग्रैमी हुए पंडित रवि शंकर भी हैं. एक ताज़ा इंटरव्यू में पंडित जी ने कहा-"विश्व मोहन भट्ट को जब ग्रैमी मिला तब इस बाबत मीडिया में जग्रता आयी. मेरे पहले दो सम्मानों के बारे में तो मुझे भी ख़बर नही लगी देशवासियों की बात तो दूर है. कई बार जूरी के सदस्यों के वोट न मिल पाने के कारण कोई अच्छा संगीतकार विजयी होने से रह जाता है पर इससे उसके संगीत की महत्ता कम नही होती, मेरा मानना है कि नामांकन में आना भी एक बड़े सम्मान की बात है. मुझे दुःख है कि लक्ष्मी शंकर ग्रैमी नही जीत पायी, वे बेहद प्रतिभाशाली हैं.पर खुशी इस बात की है कि जाकिर ने इसे जीता." गौरतलब है कि मोहन वीणा वादक पंडित विश्व मोहन भट्ट भी पंडित रवि शंकर जी के ही शिष्य हैं. भारत रत्न पंडित रवि शंकर ऐ आर रहमान को भी बधाई देना नही भूले-"मैं हिन्दी फ़िल्म संगीतकारों का सालों से प्रशंसक रहा हूँ, सी रामचंद्र, सलिल चौधरी, एस डी और आर डी बर्मन, इल्ल्याराजा और अब ऐ आर रहमान जो निरंतर इतनी सुंदर धुनों से संगीत को संवार रहे हैं. फिल्मों के लिए उनका पार्श्व संगीत भी सराहनीय रहा है. विदेशों में भी अब उन्हें ख्याति प्राप्त करते देख खुशी हो रही है." दुनिया भर से ढेरों सम्मान पाने वाले पंडित रवि शंकर के लिया सबसे बड़ा सम्मान क्या है ? -"जो कुछ भी मिला है उसके लिए मैं ईश्वर, अपने गुरु और अपने प्रशंसकों को धन्येवाद देना चाहता हूँ, पर जब मैं परफोर्म करता हूँ और अपने संगीत में डूबे हुए किसी श्रोता का गर दिल भर आए और उसकी आँख से आंसू का एक कतरा गिरे, तो वो मेरे लिए सर्वोत्तम पुरस्कार है..". आपको नमन है ऐ संगीत शिरोमणि.



मैं एक खिलाड़ी जैसा महसूस कर रहा हूँ - ऐ आर रहमान

बाफ्टा की फ़तेह के बाद अब रहमान चले हैं एक और गढ़ जीतने न्यू यार्क शहर को. मनीष के ख़ास निर्मित बंद गले के सूट पहने रहमान इस समय ख़ुद को एक खिलाड़ी सा महसूस कर रहे हैं जिस पर सारे देश की नज़र है और जिससे ओलंपिक गोल्ड की पूरी पूरी उम्मीद की जा रही है -"ओलंपिक के लिए निकलते किसी खिलाड़ी से जिसपर पूरे देश को स्वर्ण लेकर आने की उम्मीद रहती है, मैं ख़ुद को इस वक्त उस खिलाड़ी सा महसूस कर रहा हूँ, पता नही मैं उनकी उम्मीदों पर खरा उतरूंगा या नही, खुदा ने मुझे पहले ही मेरी काबिलियत से अधिक दिया है, इसलिए मैं कभी भी ज्यादा की महत्वकांक्षा नही कर पाता, ये मेरा स्वाभाविक गुण है...".


भारतीय संगीत एल्बम के लिए ग्रैमी जीतना चाहता हूँ - उस्ताद जाकिर हुसैन

"जब कोई दूसरा देश आपकी कला को सम्मान देता है, सबकी निगाहें आपकी तरफ़ उठ जाती है, पर जब आपका गुरु आपको शाबाशी दे कोई गौर नही करता. पर मेरे लिए दूसरी बात अधिक मायने रखती है", ग्रैमी जीतने वाले उस्ताद जाकिर हुसैन ने एक ताज़ा इंटरव्यू में ये बात कही -"मेरे गुरु और पिता मरहूम उस्ताद अल्लाह रखा खान ने मात्र दो बार मुझसे ये कहा कि मैंने अच्छा बजाया. दो बार उनके इन शब्दों से मिला सम्मान मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है. मैं कभी एक पूरी तरह से भारतीय शास्त्रीय संगीत के किसी एल्बम के लिए ग्रैमी जीतना चाहता हूँ, जैसा कि पंडित रवि शंकर जी ने कर दिखाया था. विदेशी संगीतकारों के साथ गठबंधन ग्रैमी तक पहुँचने का आसान रास्ता बना देता है...".


बिल्लू को कहना नही कोई हज्ज़ाम

एक और बड़ी फ़िल्म और एक और नया विवाद, अब तो जैसे ये एक परम्परा ही हो गई है...खैर हम विवादों की तरफ़ न जाकर सुनते हैं सप्ताह का सॉलिड गीत फ़िल्म "बिल्लू" से. ठेठ देसी अंदाज़ के इस गीत में गुलज़ार साहब ने कमाल के शब्द चुने हैं. "लोशन खुसबुदार" और "उस्तरे की धार" जैसे शब्दों ने गीत को खासा नया पन दे दिया है. प्रीतम ने भी बहुत बढ़िया धुन और संयोजन किया है. आवाजें हैं रघुबीर यादव, अजय जिन्गरान और कल्पना की...हाँ ...और गाने का अन्तिम हिस्सा सबसे शानदार है....सुनिए और आनन्द लीजिये.





Friday, February 13, 2009

खुदाया खैर...एक बार फ़िर शाहरुख़ की आवाज़ बने अभिजीत


"बड़ी मुश्किल है, खोया मेरा दिल है..." शाहरुख़ खान के उपर फिल्माए गए इस गीत में आवाज़ थी अभिजीत भट्टाचार्य की. जब ये गीत आया तो श्रोताओं को लगा कि यही वो आवाज़ है जो शाहरुख़ के ऑन स्क्रीन व्यक्तित्व को सहज रूप से उभरता है. पर शायद वो ज़माने लद चुके थे जब नायक अपनी फिल्मों के लिए किसी ख़ास आवाज़ की फरमाईश करता था. जहाँ शाहरुख़ के शुरूआती दिनों में कुमार सानु ने उनके गीतों को आवाज़ दी (कोई न कोई चाहिए..., और काली काली ऑंखें...), वहीँ बाद में उनकी रोमांटिक हीरो की छवि पर उदित नारायण की आवाज़ कुछ ऐसे जमी की सुनने वाले बस वाह वाह कर उठे, "डर" और "दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगें" के गीत आज तक सुने और याद किए जाते हैं.

फ़िर हीरो की छवि बदली, पहले जिस नायक का लक्ष्य नायिका को पाना मात्र होता था, वह अब अपने कैरिअर के प्रति भी सजग हो चुका था. वो चाँद तारे तोड़ने के ख्वाब सजाने लगा और ऐसे नायक को परदे पर साकार किया शाहरुख़ ने एक बार फ़िर अपनी फ़िल्म "येस् बॉस" में और यहाँ फ़िर से मिला उन्हें अभिजीत की आवाज़ का साथ और इस फ़िल्म के गीतों ने इस नायक-गायक की जोड़ी को एक नई पहचान दी. पर ये वो दौर था जब समय चक्र तेज़ी से बदल रहा था, और शाहरुख़ खान रुपी नायक ने भी बदलते किरदारों को जीते हुए अलग अलग आवाजों में ख़ुद को आजमाना शुरू किया.

"दिल से" में ऐ आर रहमान ने शाहरुख़ पर फिल्माए गए ४ गीतों में चार अलग अलग आवाजों का इस्तेमाल किया, जिसमें सुखविंदर (छैयां छैयां), उदित नारायण (ऐ अजनबी), सोनू निगम (सतरंगी रे) और ख़ुद ऐ आर आर ने आवाज़ दी फ़िल्म के शीर्षक गीत को. दरअसल अब संगीतकार गायक का चुनाव करते समय गीत के मूड को सर्वोपरि रखने लगे थे, बाकि उस आवाज़ को अपनी आवाज़ से मिलाने का काम नायक का होने लगा. उर्जा से भरे शाहरुख़ खान को अब अपने जोशीले गानों के लिए सुखविंदर जैसी दमदार आवाज़ मिल गई थी वहीँ भावनात्मक गीतों के लिए वो कभी सोनू निगम, कभी उदित तो कभी रूप कुमार राठोड की आवाजों में ख़ुद को ढालने लगे, और इन सब के बीच अभिजीत कहीं पीछे छूट गए.

"चलते चलते" में वो फ़िर से शाहरुख़ की आवाज़ बने, फ़िर बहुचर्चित "मैं हूँ न" में उनका सामना सीधे तौर पर सोनू निगम से हुआ, जब फ़िल्म का शीर्षक गीत जो दो संस्करण में था, एक को आवाज़ दी सोनू ने तो इसी गीत का दर्द संस्करण गाया अभिजीत ने. रजत पटल पर शाहरुख़ ने एक लंबा सफर तय किया है और बेशक अभिजीत ने उनके लिए कुछ बेहद यादगार गीतों को गाकर उनके इस सफर में एक अहम् भूमिका अदा की है. "तुम आए तो..." "अयाम दा बेस्ट.." (फ़िर भी दिल है हिन्दुस्तानी), "तौबा तुम्हारे ये इशारे...", "सुनो न..." "चलते चलते..." (चलते चलते), "चाँद तारे...", "मैं कोई ऐसा..." (येस् बॉस), "रोशनी से...", "रात का नशा..." (अशोक), और "धूम ताना...."( ओम् शान्ति ओम्), जैसे गीत शाहरुख़ के लिए गाने के आलावा अभीजीत ने कुछ और भी बेहतरीन गीत गाये जो अन्य नायकों पर फिल्माए गए जैसे, - "तुम दिल की धड़कन में...", "आँखों में बसे हो तुम..."(टक्कर), "एक चंचल शोख हसीना...","चांदनी रात है..."(बागी), "ये तेरी ऑंखें झुकी झुकी..."(फरेब) और "लम्हा लम्हा दूरी..."(गैंगस्टर).

कानपूर में जन्में अभिजीत ने अपने "ख्वाबों" का पीछे करते हुए १९८१ में अपने परिवार की इच्छाओं को ठुकराकर मुंबई को अपना घर बना लिया और चार्टेड एकाउंटेंट की पढ़ाई को छोड़कर, पार्श्वगायन को अपना लक्ष्य. देव आनंद की फ़िल्म 'आनंद और आनंद" से उन्होंने शुरुआत की, इस फ़िल्म में उनका गाया "मैं आवारा ही सही..." सुनकर एक बार किशोर दा उनसे कहा- "तुम बहुत सुर में गाते हो..". अभिजीत आज भी मानते हैं कि किशोर दा की ये टिपण्णी उनके लिए दुनिया का सबसे बड़ा पुरस्कार है. अपनी एल्बम "तेरे बिना" जो कि बहुत मकबूल भी हुई से अभिजीत ने संगीत निर्देशन के क्षेत्र में भी ख़ुद को उतार दिया है. आजकल वो एक टेलेंट शो में बतौर निर्णायक भी खासी चर्चा बटोर रहे हैं.

शाहरुख़ की सबसे ताज़ा फ़िल्म में भी एक नर्मो नाज़ुक अंदाज़ का गीत उनके हिस्से आया है, अभिजीत को गायिकी की एक और सुरीली पारी की शुभकामनायें देते हुए आईये सुनें फ़िल्म "बिल्लू" (जो कि पहले बिल्लू बार्बर थी) का ये गीत जिसे लिखा है गुलज़ार ने और सुरों में पिरोया है प्रीतम ने -





Tuesday, February 10, 2009

रहमान के बाद अब बाज़ी मारी उस्ताद जाकिर हुसैन ने भी...


भारतीय संगीत की थाप विश्व पटल पर सुनाई दे रही है, लॉस एन्जेलेंस और लन्दन में भारत के दो संगीत महारथियों ने अपने अन्य प्रतियोगियों पर विजय पाते हुए शीर्ष पुरस्कारों पर कब्जा जमाया. जहाँ चार अन्य प्रतिभागियों को पीछे छोड़ते हुए रहमान ने एक बार फ़िर "स्लम डोग मिलिनिअर" के लिए बाफ्टा (ब्रिटिश एकेडमी ऑफ़ फ़िल्म एंड टेलिविज़न आर्ट) जीता तो वहीँ तबला उस्ताद जाकिर हुसैन ने दूसरी बार ग्रैमी पुरस्कार जिसे संगीत का सबसे बड़ा सम्मान माना जाता है, पर अपनी विजयी मोहर लगायी.जाकिर ने अपनी एल्बम "ग्लोबल ड्रम प्रोजेक्ट" के लिए कंटेम्पररी वर्ल्ड म्यूजिक अल्बम श्रेणी में ये पुरस्कार जीता. गोल्डन ड्रम प्रोजेक्ट में हुसैन ने रॉक बैंड "ग्रेटफुल डेड" के मिकी हार्ट के साथ जुगलबंदी की है और उनका साथ दिया नईजीरियन पर्काशानिस्ट सिकिरू एडेपोजू और जैज़ पर्काशानिस्ट प्युरेटो रिकोन ने. ये इस समूह का और ख़ुद हुसैन का दूसरा ग्रैमी है. पहली बार भी १९९१ में उन्होंने मिकी हार्ट ही के साथ टीम अप कर "प्लेनट ड्रम" नाम का एल्बम किया था जिसे १९९२ में ग्रैमी सम्मान हासिल हुआ था.

दूसरी तरफ़ लन्दन में हुए बाफ्टा समारोह में भी गोल्डन ग्लोब की तर्ज पर एक बार फ़िर स्लम डोग पूरी तरह से छाई रही. फ़िल्म को कुल ७ बाफ्टा अवार्ड मिले जिसमें रहमान के आलावा एक भारतीय और भी है. जी हाँ, केरल निवासी और फ़िल्म के साउंड निर्देशक रसूल पुकुट्टी ने भी अपने फन से भारतीय संगीत प्रेमियों का सर गर्व से ऊंचा किया. पहली बार बाफ्टा में भारतीय नाम आए हैं, पुरस्कार पाने वालों में. हालाँकि बाफ्टा ने फिल्मों में उनके योगदान के लिए निर्देशक यश चोपडा का सम्मान किया था सन २००६ में. इसके आलावा संजय लीला बंसाली की "देवदास" को विदेशी फिल्मों की श्रेणी में नामांकन मिला था २००२ में, पर स्पेनिश फ़िल्म "टॉल्क टू हर" ने बाज़ी मार ली थी.

बाफ्टा ने बेशक भारतीय कलाकारों को देर में पहचाना पर ग्रैमी पुरस्कारों में भारतीय पहले भी अपना जलवा दिखा चुके हैं. उस्ताद जाकिर हुसैन के आलावा पंडित रवि शंकर और मोहन वीणा वादक विश्व मोहन भट्ट की कला को भी ग्रैमी ने सम्मानित किया है बारम्बार. पंडित रवि शंकर ने तो ३ बार ये सम्मान जीता है. दरअसल पंडित जी पहले ग्रैमी सम्मान पाने वाले भारतीय कलाकार बने थे जब १९६७ में मशहूर वोइलानिस्ट येहुदी मेनुहिन के साथ वेस्ट मीट ईस्ट कंसर्ट के लिए उन्हें बेस्ट चेंबर म्यूजिक पर्फोर्मांस श्रेणी में पुरस्कृत किया गया था.

खुशी की बात ये भी है की इस बार ग्रैमी की दौड़ में और भी ४ श्रेणियों में ३ अन्य भारतीय भी शामिल रहे. लुईस बैंक को जैज़ एल्बम श्रेणी में दो नामांकन मिले (एल्बम माइल्स फ्रॉम इंडिया, और फ्लोटिंग पॉइंट), कोलकत्ता के संगीतकार को उनकी एल्बम "कोलकत्ता क्रोनिकल" के लिए तो मशहूर शास्त्रीय गायक लक्ष्मी शंकर को "डांसिंग इन दा लाइट" के लिए नामांकन मिला. गोल्डन ग्लोब, बाफ्टा और ग्रैमी के बाद अब सबकी नज़रें २२ तारीख को होने वाले ऑस्कर पर टिकी हैं. उम्मीद है यहाँ भी तिरंगा लहराएगा पूरे आन बान और शान के साथ. अभी के लिए तो उस्ताद जाकिर हुसैन, रहमान, और रसूल पुकुट्टी को हम सब की ढेरो बधाईयाँ. आईये सुनते हैं उस्ताद का तबला वादन १९९९ में आई उनकी जैज़ फुयूज़न एल्बम "दा बिलीवर" से ये ट्रैक "फईन्डिंग दा वे...". साथ में हैं जॉन मेक्लिंग, यू श्रीनिवास, और वी सेल्वागणेश.



धीमे कनेक्शन वाले यहाँ से सुनें-






Sunday, February 8, 2009

सुनिए "इमोशनल अत्याचार" की ये कहानी

सप्ताह की संगीत सुर्खियाँ (11)
शास्त्रीय संगीत का किसी अन्य संगीत विधा से कोई मुकाबला नही है - पंडित शिव कुमार शर्मा
"येहुदी मेनुहिन कितने महान फनकार थे पर मेडोना या माइकल जेक्सन को हमेशा मीडिया ने अधिक तरजीह दी. ये ट्रेंड पूरी दुनिया का है अकेले भारत का नही. भारतीय शास्त्रीय संगीत को पॉप संस्कृति या फ़िल्म संगीत से भिड़ने की आवश्यकता नही है."- ये कथन थे ५४ वर्षों से भारतीय शास्त्रीय संगीत का परचम अपने संतूर वादन से दुनिया भर में फहराने वाले पंडित शिव कुमार शर्मा जी के. दिल्ली के पुराना किला में अपनी एक और लाइव प्रस्तुति देने आए पंडित जी ने संगीतकार ऐ आर रहमान को बधाई देते हुए कहा कि वो रहमान ही थे जिन्होंने फिल्मों में इलेक्ट्रॉनिक संगीत का ट्रेंड शुरू किया. उनसे पहले के संगीतकार धुन और prelude बनाते थे और बाकी कामों के लिए उन्हें साजिंदों पर निर्भर रहना पड़ता था. यश राज की बहुत सी सफल फिल्मों में साथी पंडित हरी प्रसाद चौरसिया के साथ जोड़ी बनाकर संगीत देने वाले पंडित शिव कुमार शर्मा ने ये पूछने पर कि वो फ़िर से कब फिल्मों में संगीत देंगे, पंडित जी का जवाब था - "फिल्मों में संगीत देने के लिए बहुत समय की जरुरत पड़ती है और कुछ आकर्षक विषय भी मिलने चाहिए..."



मैं ख़ुद को ऑस्कर में देख रहा हूँ - गुलज़ार

रहमान यदि ऑस्कर जीतेंगे तो मुझे सबसे अधिक खुशी होगी - जयपुर साहित्यिक समारोह में गुलज़ार साहब ने खुले दिल से इस युवा संगीतकार की जम कर तारीफ की. ७२ वर्षीया गुलज़ार साहब ने कहा कि मानसिक रूप से मैं अभी से ख़ुद को ऑस्कर में देख रहा हूँ. आवाज़ की पूरी टीम ऐ आर और गुलज़ार साहब के साथ साउंड मास्टर रसूल पूकुट्टी के भी ऑस्कर में विजयी होने की कामना करता है...आप सब भी दुआ करें.


कुमार सानु का मानवीय पक्ष

गायक कुमार सानु ने अपनी नई फ़िल्म "ये सन्डे क्यों आता है" के लिए चार बूट पोलिश करने वाले बच्चों को न सिर्फ़ अभिनय सिखाने के लिए अभिनय स्कूल में डाला बल्कि वो वापस अपने पुराने जीवन चर्या की तरफ़ न मुडें इस उद्देश्य से उनके लिए दो खोलियां (छोटे घर) भी खरीद दिए और उन्हें नियमित स्कूलों में दाखिल भी करवा दिया. बहुत नेक काम किया आपने सानु साहब हमें आपकी इस फ़िल्म का भी इंतज़ार रहेगा.


इमोशनल अत्याचार

देव डी, बड़ा ही अजीब लगता था ये नाम, पर निर्देशक अनुराग कश्यप ने इसके माने साफ़ कर दिए जब एलान किया कि ये आज के दौर के देवदास की कहानी है, तो देवदास ही हैं जो अब देव डी के नाम से जाने जा रहे हैं. "नो स्मोकिंग " जैसी उत्कृष्ट और तमाम लीकों से हटकर फ़िल्म देने वाले अनुराग से उम्मीदें हैं कि उनकी ये फ़िल्म कुछ अलग और नया देखने की चाह रखने वाले दर्शकों की उम्मीदों पर खरी उतरेगी. इस हफ्ते का हमारा "सप्ताह का गीत" भी इसी फ़िल्म से है जो इन दिनों हर किसी की जुबां पर चढा हुआ है. अमिताभ वर्मा के लिखे इस "इमोशनल अत्याचार" को स्वरबद्ध किया है अमित त्रिवेदी ने जिनका अंदाज़ हमेशा की तरह एकदम नया और ताज़ा है, आवाज़ है बोनी चक्रवर्ती की. सुनिए और आनंद लीजिये -








Tuesday, February 3, 2009

मैं शायर बदनाम, महफिल से नाकाम

(पिछली कड़ी से आगे...)
बक्षी साहब ने फ़िल्म मोम की 'गुड़िया(1972)' में गीत 'बाग़ों में बहार आयी' लता जी के साथ गाया था। इस पर लता जी बताती हैं कि 'मुझे याद है कि इस गीत की रिकार्डिंग से पहले आनन्द मुझसे मिलने आये और कहा कि मैं यह गीत तुम्हारे साथ गाने जा रहा हूँ 'इसकी सफलता तो सुनिश्चित है'। इसके अलावा 'शोले(1975)', 'महाचोर(1976)', 'चरस(1976)', 'विधाता(1982)' और 'जान(1996)' में भी पाश्र्व(प्लेबैक)गायक रहे। आनन्द साहब का फिल्म जगत में योगदान यहीं सीमित नहीं, 'शहंशाह(1988)', 'प्रेम प्रतिज्ञा(1989)', 'मैं खिलाड़ी तू आनाड़ी(1994)', और 'आरज़ू(1999)' में बतौर एक्शन डायरेक्टर भी काम किया, सिर्फ यही नहीं 'पिकनिक(1966)' में अदाकारी भी की।

लता की दिव्या आवाज़ में सुनिए फ़िल्म अमर प्रेम का ये अमर गीत -


बक्षी के गीतों की महानता इस बात में है कि वह जो गीत लिखते थे वह किसी गाँव के किसान और शहर में रहने वाले किसी बुद्धिजीवी और ऊँची सोच रखने वाले व्यक्तिव को समान रूप से समझ आते हैं। वह कुछ ऐसे चुनिंदा गीतकारों में से एक हैं जिनके गीत जैसे उन्होंने लिखकर दिये वह बिना किसी फेर-बदल या नुक्ताचीनी के रिकार्ड किये गये। आनन्द साहब कहते थे फिल्म के गीत उसकी कथा, पटकथा और परिस्थिति पर निर्भर करते हैं। गीत किसी भी मन: स्तिथि, परिवेश या उम्र के लिए हो सकता है सो कहानी चाहे 60,70 या आज के दशक की हो इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है।

उनका सबसे अधिक साथ संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ रहा, ढेरों फिल्में और ढेरों सुपर हिट गीतों का ये काफिला इतना लंबा है की इस पर बात करें तो पोस्ट पे पोस्ट लग जाएँगीं. फिलहाल सुनते हैं फ़िल्म सरगम का ये दर्द भरा नग्मा -


आनन्द साहब को बड़े-बड़े पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिसमें 'आदमी मुसाफ़िर है' [अपनापन(1977)], 'तेरे मेरे बीच कैसा है यह बन्धन' [ एक दूजे के लिए(1981)], 'तुझे देखा तो यह जाना सनम' [दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे (1995)] और 'इश्क़ बिना क्या जीना यारों' [ ताल(1999)] गीतों के लिए चार बार फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार भी सम्मिलित है।

ऐ आर रहमान का संगीतबद्ध किया फ़िल्म ताल का ये गीत साबित करता है हर पीढी के संगीतकारों के साथ पैठ बिठाने में बक्षी साहब को कभी परेशानी नही हुई -


बक्षी साहब का निर्वाण 30 मार्च 2002 को मुम्बई में हुआ। फेफड़े और दिल की बीमारी को लेकर नानावती हास्पिटल में उनका इलाज काफ़ी समय चला लेकिन बचाने की कोशिश नाकामयब रही। आनन्द बक्षी साहब आज हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी कमी सिर्फ़ हमें नहीं खलती बल्कि उन फिल्मकारों को भी खलती है जिनके लिए वह गीत लिखते रहे, आज अगर आप उनकी आने वाली फ़िल्मों के गीत सुने तो कहीं न कहीं उनमें प्यार की मासूमियत और सच्ची भावना की कमी झलकती है, या बनावटीपन है या उनके जैसा लिखने की कोशिश है। आनन्द साहब इस दुनिया से क्या रुख़्सत हुए जैसे शब्दों ने मौन धारण कर लिया, जाने यह चुप्पी कब टूटे कब कोई दूसरा उनके जैसा गीतकार जन्म ले!

उस मशहूरो-बदनाम शायर की याद में ये नग्मा भी सुनते चलें -


प्रस्तुति - विनय प्रजापति "नज़र"



Monday, January 26, 2009

आज १५ बार सर उठा कर गर्व से सुनें-गुनें - राष्ट्रीय गान

"उस स्वतंत्रता के होने का कोई महत्व नहीं है जिसमें गलतियाँ करने की छूट सम्मिलित ना हो"-महात्मा गाँधी.
आवाज़ के सभी श्रोताओं को गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें. आज हम आपके लिए लाये हैं एक ख़ास पेशकश. "जन गण मन" के १५ अलग अलग रूप. सबसे पहले सुनिए सामूहिक आवाजों में राष्ट्र वंदन -



31 राज्य, 1618 भाषाएँ, 6400 जातियाँ, 6 धर्म और 29 मुख्य त्योहार लेकिन फिर भी एक महान राष्ट्र।

पंडित हरी प्रसाद चौरसिया -


जन गण मन संस्कृत मिश्रित बंगाली में लिखा गया भारत का राष्ट्रीय गीत है। ये ब्रह्म समाज की एक प्रार्थना के पहले पाँच बन्द हैं जिनके रचियता नोबल पुरस्कार से सम्मानित रविन्द्रनाथ टैगोर हैं।

पंडित भीम सेन जोशी -


सबसे पहले इसे 27 दिसम्बर 1911 को नैशनल कांग्रेस के कलकत्ता सम्मेलन में गाया गया। 1935 में इस गीत को दून स्कूल ने अपने विद्यालय के गीत के रूप में अपनाया।

लता मंगेशकर -


24 जनवरी, 1950 को संविधान द्वारा इसे अधिकारिक रूप से भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया गया। ऐसा माना जाता है कि इसकी वर्तमान धुन को राम सिंह ठाकुर जी के एक गीत से लिया गया है लेकिन इस बारे में विवाद हैं। औपचारिक रूप से राष्ट्रीय गीत को गाने में 48-50 सैकेंड का समय लगता है लेकिन कभी-कभी इसे छोटा कर के सिर्फ इसकी प्रथम और अंतिम पंक्तियों को ही गाया जाता है जिसमें लगभग 20 सैकेंड का समय लगता है ।

उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान, गुलाम मुर्तजा खान और गुलाम कादिर -


भारत ने अपने इतिहास के पिछले 1000 वर्षों में कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया।
भारत ने संख्याओं का आविष्कार किया। आर्यभट ने 'शून्य' का आविष्कार किया।

भूपेन हजारिका और सादिक खान -


संसार का पहला विश्वविद्यालय 700 ई.पूर्व तक्षशिला में बना था। जहाँ संपूर्ण विश्व से आए हुए 10,500 से ज़्यादा विद्यार्थी 60से ज़्यादा विषयों की शिक्षा ग्रहण करते थे। ई.पूर्व चौथी शताब्दी में बना नालंदा विश्विद्यालय शिक्षा के क्षेत्र में प्राचीन भारत की महान उपलब्धियों में से एक था।
फोर्ब्स पत्रिका के अनुसार कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर के लिए भारत की एक हज़ार साल पुरानी संस्कृत भाषा सबसे उपयुक्त है। आर्युवेद ही चिकित्सा के क्षेत्र में सबसे पुरानी ज्ञात प्रणाली है।

पंडित जसराज -


कभी भारत की गिनती पृथ्वी के सबसे सपन्न साम्राज्यों में होती थी। पश्चिमी संचार माध्यम आधुनिक भारत को वहाँ फैले राजनीतिक भ्रष्टाचार की वजह से गरीबी से जकड़े हुए पिछड़े देश के रूप में दर्शाते हैं।
यंत्र द्वारा दिशा खोजने की कला का जन्म 5000 वर्ष पूर्व सिंधु नदी के क्षेत्र में हुआ था। असल में 'नेवीगेशन' शब्द संस्कृत के 'नवगति' शब्द से उत्पन्न हुआ है। π के मूल्य की गणना सबसे पहले बौधायन द्वारा की गई थी और उन्होंने ही 'प्रमेय' की अवधारणा को समझाया था। ब्रिटिश विद्वानों ने 1999 में अधिकारिक रूप से प्रकाशित किया कि बौधायन के कार्य यूरोपीय गणितज्ञों के उद्भव से बहुत पहले यानी कि छठीं शताब्दी के हैं।

एस पी बाला सुब्रमण्यम -


'बीजगणित' (Algebra),'त्रिकोणमिति'(Trignometry) और 'कैलकुलस' (Calculus) भारत से ही आए थे, 11वीं शताब्दी में श्रीधराचार्य द्वारा 'द्विघात समीकरण' (Quadratic equations ) का निर्माण किया गया। ग्रीक और रोमन के 106 अंकों के मुकाबले भारतीय 1053 अंकों का प्रयोग करते थे।
अमेरिका के Gemological संस्थान के अनुसार 1896तक सिर्फ भारत ही संपूर्ण विश्व के लिए 'हीरों' का एकमात्र स्रोत था। अमेरिका आधारित IEEE ने शिक्षाविदों में एक सदी से फैले संदेह को दूर करते हुए साबित किया है कि बेतार संचार के अग्रणी मारकोनी नहीं बल्कि प्रोफेसर जगदीश चंद्र बोस थे।

जगजीत सिंह -


सिंचाई के लिए जलाशय और बाँध का निर्माण सबसे पहले सौराष्ट्र में हुआ था। शतरंज का आविष्कार भारत में हुआ था। शुश्रुत को शल्य चिकित्सा के पितामह के रूप में जाना जाता है। 2600 वर्ष पहले उनके तथा समकालीन चिकित्सा विज्ञानियों द्वारा Rhinoplasty, सिज़ेरियन वर्ग, मोतियाबिन्द, टूटी हड्डियों और पेशाब की पत्थरियों से सबंधित शल्य क्रियाएँ की गईं। मूर्छित कर इलाज करने की कला का प्राचीन भारत में बखूबी प्रयोग किया जाता था।
जब दुनिया की कई संस्कृतियाँ सिर्फ घुमंतू जीवन व्यतीत करती थी, तब 5000 साल पहले भारतीयों ने सिंधु घाटी (सिंधु घाटी सभ्यता) में हड़प्पा संस्कृति की स्थापना की। मूल्य प्रणाली (Place Value System) तथा दशमलव प्रणाली (Decimal System) को 100 ई.पूर्व भारत में विकसित किया गया था।

बेगम परवीन सुल्ताना -


अल्बर्ट आइंस्टीन- "हम भारतीयों के बहुत ज़्यादा ऋणी हैं कि उन्होंने हमें गिनना सिखाया, जिसके बिना कोई भी लाभप्रद वैज्ञानिक खोज मुमकिन नहीं हो पाती।"

डा. बाला मुरलीकृष्णा -


मार्क ट्वाईन- "मानव जाति का उद्भव भी भारत में हुआ, वाक् कला भी सबसे पहले यहीं पनपी, इतिहास का निर्माण भी यहीं से हुआ, दंतकथाएँ भी यहीं से जन्मी और महान परंपराएँ भी यहीं से प्रारंभ हुई।"

उस्ताद अमजद अली खान, अमन अली बंगेश और अयान अली बंगेश-


रोमेन रोलॉन्ड (एक फ्रांसीसी विद्वान)- अगर पृथ्वी के चेहरे पर कोई ऐसा स्थान मौजूद है जहाँ पर जीवित इनसानों के सभी सपनों (जब से उसने उन्हें देखना आरम्भ किया हैं) को उनका घर मिलता है तो वो इकलौती जगह भारत है।

हरिहरन -


हू शिह (अमेरिका में पूर्व चीनी राजदूत)- बिना एक भी सैनिक को सीमा पार भेजे भारत ने 20 शताब्दियों तक सांस्कृतिक तौर पर चीन पर अपना प्रभुत्व तथा कब्ज़ा जमाए रखा।

उस्ताद सुलतान खान -


फ्रेंकलिन पी. एडम्स- भारत की एक परिभाषा 'गणतंत्र' भी है।

पंडित शिव कुमार शर्मा और राहुल शर्मा -


सच्चा गणतंत्र- पुरुषों को उनके अधिकारों से अधिक और कुछ नहीं चाहिए, महिलाओं को उनके अधिकारों से कम कुछ भी नहीं चाहिए।

सभी वाद्यों का सामूहिक उद्घोष -


जय है...जय है...जय है....जय हिंद
.

अनुवाद द्वारा- राजीव तनेजा

Wednesday, January 21, 2009

सुनिए और बूझिये कि आखिर कौन है दिल्ली ६ की ये मसकली

सप्ताह की संगीत सुर्खियाँ (9) स्लमडॉग विशेषांक

स्लम डॉग ने रचा इतिहास
इस सप्ताह की ही नही इस माह की सबसे बड़ी संगीत ख़बर है ऐ आर रहमान का गोल्डन ग्लोब जीतना. आज का ये एपिसोड हम इसी बड़ी ख़बर को समर्पित कर रहे हैं. जिस फ़िल्म के लिए ऐ आर को ये सम्मान मिला है उसका नाम है स्लम डॉग मिलेनिअर. मुंबई के एक झोंपड़ बस्ती में रहने वाले एक साधारण से लड़के की असाधारण सी कहानी है ये फ़िल्म, जो की आधारित है विकास स्वरुप के बहुचर्चित उपन्यास "कोश्चन एंड आंसर्स" पर. फ़िल्म का अधिकतर हिस्सा मुंबई के जुहू और वर्सोवा की झुग्गी बस्तियों में शूट हुआ है. और कुछ कलाकार भी यहीं से लिए गए हैं. नवम्बर २००८ में अमेरिका में प्रर्दशित होने के बाद फ़िल्म अब तक ६४ सम्मान हासिल कर चुकी है जिसमें चार गोल्डन ग्लोब भी शामिल हैं. फ़िल्म दुनिया भर में धूम मचा रही है,और मुंबई के माध्यम से बदलते हिंदुस्तान को और अधिक जानने समझने की विदेशियों की ललक भी अपने चरम पर दिख रही है. पर कुछ लोग हिंदुस्तान को इस तरह "थर्ड वर्ल्ड" बनाकर दुनिया के सामने प्रस्तुत करने को सही भी नही मानते. अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि फ़िल्म इसलिए पसंद की जा रही है क्योंकि विकसित देश भारत का यही रूप देखना चाहते हैं. पर लेखक विकास स्वरुप ऐसा नही मानते. उनका कहना है कि फ़िल्म में स्लम में रहने वालों को दुखी या निराश नही दिखाया गया बल्कि उन्हें ख़ुद को बेहतर बनाने और अपने सपनों को सच करने की कोशिश करते हुए दिखाया गया है, यही उभरते हुए भारत की सच्चाई है. फ़िल्म में एक दृश्य है जहाँ नायक का बड़ा भाई उसे वो इलाका दिखाता हुए कहता है जहाँ कभी उनकी झुग्गी बस्ती हुआ करती थी और जहाँ अब गगनचुम्भी इमारतें खड़ी है,कि -"भाई आज इंडिया दुनिया के मध्य में है और मैं (यानी कि एक आम भारतीय) उस मध्य के मध्य में..." यकीनन ये संवाद अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है. बहरहाल हम समझते हैं कि ये वक्त बहस का नही जश्न का है. जब "जय हो" और "रिंगा रिंगा" जैसे गीत अंतर्राष्ट्रीय चार्ट्स पर धूम मचा रहे हों, तो शिकायत किसे हो. अमूमन देखने में आता है कि गोल्डन ग्लोब जीतने वाली फिल्में ऑस्कर में भी अच्छा करती हैं, तो यदि अब हम आपके लिए रहमान के ऑस्कर जीतने की ख़बर भी लेकर आयें तो आश्चर्य मत कीजियेगा



जिक्र उनका जो गुमनाम ही रहे

बात करते हैं इस फ़िल्म से जुड़े कुछ अनजाने हीरोस की. रहमान ने अपने इस सम्मान को जिस शख्स को समर्पित किया है वो हैं उनके साउंड इंजिनीअर श्रीधर. ४ बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित श्रीधर, रहमान के साथ काम कर रहे थे उनकी पहली फ़िल्म "रोजा" से, जब स्लम डॉग बन कर तैयार हुई श्रीधर ने रहमान का धन्येवाद किया कि उन्होंने उनका नाम एक अंतर्राष्ट्रीय एल्बम में दर्ज किया, दिसम्बर २००८ में श्रीधर मात्र ४८ वर्ष की आयु में दुनिया को अलविदा कह गए और उस अद्भुत लम्हें को देखने से वंचित रह गए जब रहमान ने गोल्डन ग्लोब जीता. पर रहमान ने अपने इस साथी के नाम इस सम्मान को कर इस अनजाने हीरो को अपनी श्रद्धाजन्ली दी. इसी तरह के एक और गुमनाम हीरो है मुंबई के राज. जब निर्देशक डैनी बोयल से पूछा गया कि यदि उन्हें २ करोड़ रूपया मिल जायें तो वो क्या करेंगे, तो उनका जवाब था कि वो अपने पहले सह निर्देशक (फ़िल्म के)जो कि राज हैं को दे देंगें, दरअसल राज पिछले कई सालों से मुंबई के गरीब और अनाथ बच्चों के लिए सड़कों पर ही चलते फिरते स्कूल चलाते हैं और उनकी निस्वार्थ सेवा भाव ने ही डैनी को इस फ़िल्म के लिए प्रेरित किया, चूँकि उनका इन बच्चों के संग उठाना बैठना रहता है फ़िल्म के बेहतर बनाने में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है. राज जैसे लोग आज के इस नए हिंदुस्तान की ताक़त है. जिनका जज्बा आज दुनिया देख रही है.


तन्वी शाह की खुशी का कोई ठिकाना नही

स्लम डॉग के लिए "जय हो" गीत गाने वाली चेन्नई की तन्वी शाह आजकल हवाओं से बात कर रही है. मात्र एक गाने ने उन्हें अन्तराष्ट्रीय स्टार बना दिया है. उनके फ़ोन की घंटी निरंतर बज रही है, और इस युवा गायिका के कदम जमीं पर नही पड़ रहे हैं...क्यों न हो. आखिर जय हो ने वो कर दिखाया है जिसका सपना हर संगीतकर्मी देखता है. तन्वी ने कभी अपनी आवाज़ कराउके रिकॉर्डिंग कर अपने एक दोस्त को दी थी, जिसकी सी डी किसी तरह रहमान तक पहुँच गई. और वो इस तरह "होने दो दिल को फ़ना..."(फ़िल्म-फ़ना) की गायिका बन गई. स्लम डॉग से पहले उन्होंने अपनी आवाज़ का जादू "जाने तू...", "गुरु" और "शिवाजी" जैसी फिल्मों के लिए भी ऐ आर के साथ गा चुकी है....पर कुछ भी कहें "जय हो" को बात ही अलग है.


मिलिए दिल्ली ६ की इस मसकली से

देसी पुरस्कारों में भी रहमान की ही धूम है हाल ही में संपन्न स्क्रीन अवार्ड में रहमान को जोधा अकबर के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीतकार चुना गया. वहीँ फ़िल्म "बचना ऐ हसीनों" के गीत "खुदा जाने..." के लिए इस गीत के गायक (के के), गायिका (शिल्पा राव) और गीतकार अन्विता दास गुप्तन को भी पुरस्कृत किया गया है. इस सप्ताह से हम आपको साप्ताहिक सुर्खियों के साथ साथ एक चुना हुआ सप्ताह का गीत भी सुनवायेंगे. इस सप्ताह का गीत है आजकल सब की जुबां पर चढा हुआ फ़िल्म दिल्ली ६ का - "मसकली....". क्या आप जानते हैं कि कौन है ये "मसकली", मसकली नाम है दिल्ली ६ के एक कबूतर का, जिसके लिए ये पूरा गीत रचा गया है...फ़िल्म के प्रोमोस देख कर लगता है कि राकेश ने "रंग दे बसंती" के बाद एक और शानदार प्रस्तुति दी है...पर फिलहाल तो आप आनंद लें मोहित चौहान (डूबा डूबा फेम) के गाये और प्रसून जोशी के अनोखे मगर खूबसूरत शब्दों से सजे इस लाजवाब गीत का -




Tuesday, January 13, 2009

गोल्डन ग्लोब ए आर रहमान ने कहा "करोड़ों भारतीयों" को सलाम


बात सन् ९६ की है। ४ सालों से बिना रूके, बिना थके फिल्मों में म्युजिक देने के बाद रहमान कुछ अलग करना चाहते थे। दीगर बात है कि कलाकार सीमाओं में अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं दे पाता और फिल्मों में संगीत देना सीमा में बँधने जैसा हीं है। निर्माता-निर्देशक,कहानी-पटकथा सबकी बात सुननी होती है।तो हुआ यूँ कि स्क्रीन अवार्ड्स के लिए रहमान मुंबई आए हुए थे और एक होटल में ठहरे थे। अचानक उन्हें कुछ ख्याल आया और उन्होंने अपने बचपन के दोस्त जी० भरत को तलब किया। जी० भरत यानि भरत बाला ने रहमान के साथ लगभग १०० से ज्यादा जिंगल्स पर काम किया था। रहमान और भरत के बीच संगीत पर चर्चा हुई। बातों-बातों में उन दोनों ने अपने अगले एलबम का प्लान कर लिया। उसी साल अंतर्राष्ट्रीय ख्याति-लब्ध म्युजिक कंपनी "सोनी म्युजिक" का भारतीय संगीत-उद्योग में आना हुआ । सोनी भारतीय कलाकारों को प्रोत्साहित करने के बहाने बाज़ार में पाँव जमाना चाहती थी। सोनी के मैनेजिंग डायरेक्टर "विजय सिंह" के दिमाग में जिस पहले बंदे का नाम आया वह थे ए०आर० रहमान । सोनी ने रहमान के साथ तीन कैसेट्स का अनुबंध किया। रहमान ने भरत बाला के साथ जिस प्रोजेक्ट की चर्चा की थे, उसे उन्होंने सोनी म्युजिक के साथ भी शेयर किया। सोनी को उन दोनों का आयडिया अच्छा लगा और इस तरह रहमान के गैर-फिल्मी एलबम पर काम शुरू हो गया। दर-असल "रोजा" के "भारत हमको जान से प्यारा है" के बाद रहमान किसी देशभक्ति गाने या फिर पूरे एलबम पर काम करना चाहते थे। समय भी माकूल था। अगले हीं साल भारत की आज़ादी की ५०वीं सालगिरह मननी थी। लेकिन एम०टी०वी० के दौर के युवाओं को "वन्दे मातरम्" या फिर "जन गण मन" कितना लुभाता इसका संदेह था। रहमान ने इन दोनों ऎतिहासिक गानों से अलग कुछ रचने का विचार किया। तिरंगा के "तीन रंगों" को परिभाषित करते तीन गाने बन कर तैयार हो गए। "केसरिया" को ध्यान में रखकर जो गाना बनाया गया वह आज तक बच्चे-बच्चे की जुबान पर बैठा है। इसी गाने में पहली बार "रहमान" कैमरे के सामने आए थे। बड़ी-बड़ी लटों के बीच साधारण से नैन-नक्श लेकिन गज़ब के तेज वाले उस चेहरे को कौन भूल सकता है, जो जब हवा में हाथ उठाकर "माँ तुझे सलाम" का आलाप लेता था, तो लगता था मानो हवाएँ थम गई हैं। जी हाँ महबूब के लिखे इस गाने ने देशभक्ति की एक नई लहर पैदा कर दी। रहमान यहीं पर नहीं थमे। "सफेद" रंग के लिए "रिवाईवल- वंदे मातरम्" को तैयार किया गया। नुसरत फतेह अली खान साहब के साथ रहमान के गाए गाने "गु्रूज़ औफ पीस" की बात हीं अलहदा है। "हरे" रंग को भूषित करता और विश्व-शांति का उपदेश देता यह गाना खुद में अनोखा इसलिए भी है क्योंकि संगीत के दो महारथी पहली मर्तबा इस गाने में साथ आए। कहा जाता है कि "सोनी" ने रहमान को छूट दी थी कि वह किसी भी अंतर्राष्टीय फ़नकार को आजमा सकते हैं,यहाँ तक कि "सेलिन डिओन" का नाम भी सुझाया गया था। लेकिन रहमान ने "खान साहब" को हीं चुना। इस बाबत रहमान का कहना था कि "मैं नाम के साथ काम करना नहीं चाहता। मैं चाहता हूँ कि उस कलाकार के साथ काम करूँ, जिसके काम के साथ मैं जुड़ाव महसूस करूँ। मैने बहुत सारे ऎसे गठजोड़ ( कोलेबोरेशन्स) देखे हैं जहाँ तेल और पानी के मिलने का बोध होता है। मैं ऎसा कतई नहीं चाहता।" रहमान का यही विश्वास "माँ तुझे सलाम" को बाकी देशभक्ति गानों से अलग करता है।

तो लीजिए हम आपको सुनाते हैं,रहमान का संगीत-बद्ध और स्वरबद्ध किया "माँ तुझे सलाम"-



कुछ बातें ऎसी होती हैं,जिन्हें सुनकर हँसी भी आती है, गुस्सा भी आता है और कुछ ओछी मानसिकता वाले लोगों पर तरस भी आता है। "वन्दे मातरम्" की रीलिज के बाद कुछ कट्टरपंथियों ने रहमान को जान से मारने की धमकी दे डाली। ये कट्टरपंथी दोनों फिरकों के थे- हिन्दु भी और मुस्लिम भी। हिन्दुओं ने रहमान पर "एक हिन्दु गाने का अपमान करने का" आरोप लगाया तो वहीं मुसलमानों ने "गैर-इस्लामिक गाने को स्वरबद्ध करने का" । रहमान फिर भी अपने पक्ष पर अडिग रहे। उनका कहना था कि "महज़ संस्कृत में होने से गाना हिन्दुओं का या फिर गैर-इस्लामिक नहीं हो जाता। इस गाने में माँ को पूजने की बात कही गई है, धरती माँ की इबादत की गई है और कौन-सा धर्म माँ और मातृभूमि की पूजा नहीं करता या फिर पूजने से मनाही करता है।" एक फ़नकार से मज़हब की बात करना कितना शर्मनाक है इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। रहमान अपनी जगह सही थे और उन्होंने किसी की भी दबाव में आए बिना माँ और मातृभूमि के कदमों में सज़दे करना ज़ारी रखा। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है ५०वें गणतंत्र दिवस पर आया "जन गण मन" जिसमें देश के लगभग २५ गणमान्य संगीत-शिरोमणियों ने उनका साथ दिया। संगीत से मातृभूमि की ऎसी सेवा शायद हीं किसी ने की हो।

ए०आर०रहमान और माईकल जैक्शन को एक मंच पर कल्पना करना कईयों के लिए नामुमकिन होगा, लेकिन अक्टूबर १९९९ की वह रात इस कल्पना को हकीकत में बदलने के लिए काफी थी। कोरियोग्राफर्स "शोभना" और "प्रभुदेवा" के साथ "माईकल जैक्शन एंड फ्रेंड़्स कोंसर्ट" में "रहमान" को आमंत्रित किया गया था। रहमान ने जो गाना वहाँ गया था, उसके बोल थे "एकम् नित्यम्" । इस गाने के आधे बोल संस्कृत में थे तो आधे अंग्रेजी में। रहमान ने गाने के चुनाव से साबित कर दिया था कि "भारतीय संस्कृति" उनके दिल में किस कदर बसी हुई है। यह कंसर्ट रहमान के विदेशी साझेदारियों के मार्फत बस पहला कदम था इसके बाद रहमान की झोली में ऎसे कई सारे प्रोजेक्ट्स आते गए। "बॉम्बे" के "बॉम्बे थीम्स" से प्रेरित होकर "म्युजिकल थियेटर कम्पोज़र" एंड्र्यु ल्वायड वेबर ने रहमान के साथ "बॉम्बे ड्रीम्स" नाम के म्युजिकल प्ले पर काम किया। यह कार्यक्रम बेहद सफल साबित हुआ और विश्व मंच पर रहमान के संगीत को वाहवाही मिली। ऎसे हीं "लौड औफ द रिंग्स" के म्युजिकल एडेपटेशन को रहमान ने फीनलैंड के फोक म्युजिक बैंड "वार्तिना" के साथ मिल्कर संगीत से सुसज्जित किया और धुनों की छ्टा बिखेर दी।जानकारी के बता दूँ कि "लौड औफ द रिंग्स" ब्रिटिश लेखक "जे०आर०आर० टाल्किन" का मशहूर उपन्यास है, जिसपर इसी नाम से फिल्म भी बन चुकी है। शेखर कपूर के "लार्जर दैन लाईफ" फिल्म "एलिजाबेथ" को रहमान ने अपने संगीत से मुकम्मल किया। रहमान की धुनों को "इनसाईड मैन", "लौड औफ वार", "द एक्सिडेंटल हसबेंड" में भी इस्तेमाल किया गया है।

रहमान को सही मायने में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति तब मिली, जब २००३ में आई मैंडरिन/जापानी भाषा की फिल्म "वैरियर्स औफ हेवेन एंड अर्थ"। इस फिल्म के सभी गाने रहमान ने तैयार किये, यहाँ तक कि पार्श्व-संगीत भी रहमान का हीं था। २००४ में यह फिल्म इंग्लिश डब होकर आई और तब इसके गाने सबकी जुबान पर चढ गए। ताईवानी गायिका "जोलिन स्वाई(साई ई लिन)" के गाये मैडरिन भाषा के गाने "वैरियर्स इन पिस" को इंग्लिश में गाया युवा की "खुदा हाफिज़" फेम "सुनीता सारथी" ने तो हिंदी में गाया "साधना सरगम" ने। आंग्ल-भाषा में बोल लिखे थे "ब्लाज़े" ने तो हिंदी के बोल थे "महबूब" के। मैंडरिन भाषा के इस फिल्म के गाने फिल्म की रीलिज के बाद "बिटविन हेवेन एंड अर्थ" नाम से अलग से रीलिज किए गए।

तो लीजिए सुनिए साधना सरगम की आवाज़ में यह गाना

लगभग १०० से भी ज्यादा फिल्मों में संगीत दे चुके एवं "पद्म-श्री" से सम्मानित ए०आर०रहमान को कल हीं गोल्डेन ग्लोब से नवाज़ा गया है। गुलज़ार साहब द्वारा कलमबद्ध किये और सुखविंदर सिंह की आवाज़ से सजे "जय हो" के लिए रहमान को यह सम्मान दिया गया। किसी भी भारतीय के लिए यह पहला "गोल्डेन ग्लोब" है। यह बात शायद हीं किसी को पता हो कि "जय हो" वास्तव में "युवराज" के लिए तैयार किया गया था। "गुलज़ार" इस सिलसिले में कहते हैं- "मैने एक गाना (आजा आजा जिंद शामियाने के तले, आजा ज़री वाले नीले आसमान के तले) युवराज के लिए लिखा था, लेकिन कुछ कारणो इसे फिल्म में शामिल नहीं किया जा सका। बाद में रहमान ने जब "स्लमडौग मिलिनिअर" की चर्चा की और कहा कि उस फिल्म में एक सिचुएशन है जहाँ यह गाना इस्तेमाल हो सकता है तो सुभाष जी ने इस गाने को देने के लिए हामी भर दी और दखिए कि यह गाना कहाँ से कहाँ पहुँच गया।" सुभाष घई इस गाने को गंवाने से तनिक भी विचलित नहीं दिखते । उन्हैं के शब्दों में- "यह गाना ज़ायेद खान पर फिल्माया जाना था, लेकिन मुझे ज़ायेद के हरफनमौला कैरेक्टर के सामने यह गाना थोड़ा सोफ्ट महसूस हुआ इसलिए मैने रहमान और गुलज़ार साहब को दूसरा गाना गढने को कहा। जहाँ तक इस गाने की प्रसिद्धि का सवाल है तो अच्छा लगता है जब अंग्रेजी बोलने वाली जनता बिना अर्थ जाने एक हिन्दी गाना गुनगुनाती है।" रहमान ने इस गाने के लिए गोल्डेन ग्लोब के अलावा और भी कई अवार्ड जीते हैं, जिनमे क्रिटिक च्वाईस प्रमुख है। वैसे यह माना जाता है कि क्रिटिक च्वाईस एवं गोल्डेन ग्लोब ओस्कर के पहले की सीढी है। इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि रहमान औस्कर से ज्यादा दूर नहीं है। हम तो यही दुआ करेंगे कि रहमान औस्कर जीतें और पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन करें।

"स्लमडौग मिलिनिअर" के डायरेक्टर डैनी बोयल ने रहमान की क्या तारीफ की.आप भी सुनें

अंत में कुछ महान हस्तियों के शब्द रहमान के विषय में-

तमिल कवि वैरामुथु- मैं शब्दों का हीं काम करता हूँ और एक प्रतिष्ठित कवि माना जाता हूँ, फिर भी मेरे पास रहमान का वर्णन करने के लिए कोई शब्द नहीं है। रहमान एक साधारण संगीतकार नहीं, बल्कि संगीत को खुदा की देन है। कोई भी संगीतकार जब धुन बनाता है, तो उसे चिन्ता होती है कि धुन श्रोताओं पर असर करेगी या नही, लेकिन रहमान की मान्यता है कि अगर कोई धुन दिल से और सच्चाई से बनाई गई है तो धुन जरूर हीं सफ़ल होगी। इसी लगन की वज़ह से रहमान का हर गाना दिल को छू जाता है।

गुलज़ार- भारतीय फिल्म संगीत में रहमान एक मील के पत्थर से कम नहीं है। उन्होंने अकेले अपने दम पर भारतीय संगीत की दिशा और दशा बदल दी है। मुखरा-अंतरा के पुराने ढर्रे पर न चलते हुए रहमान ने कई सारे नए फोरमेट्स बनाए हैं। मुक्त छंदों (फ्री वर्स) को धुन में पिरोना आसान नहीं होता, लेकिन रहमान यह काम भी आसानी से कर जाते हैं।

गीतकार महबूब- अगर दुनिया में ऎसा कोई खुदा का बंदा है, जिसे मैं खुदा की तरह पूजता हूँ तो वह बस एक हीं है- रहमान। वह मेरे लिए मेरा परिवार है, मेरा भाई है। मैं उसकी इतनी इज़्ज़त करता हूँ कि मेरे पास उस प्रशंसा/चाहत को शब्द देने के लिए शब्द नहीं हैं।

एस०पी०बालासुब्रमण्यम- आज के संगीत में वेराईटी लाने वाला बस एक हीं इंसान है- ए०आर०रहमान।

जावेद अख्तर- मेरे अनुसार रहमान आल-राउंडर हैं। वे इंडियन क्लासिकल म्युजिक जानते है, कर्नाटिक म्युजिक से उनका लगाव है, इंडियन फोक म्युजिक पर भी बराबर पकड़ है, उन्होंने लंदन के ट्रीनिटी कालेज आफ म्युजिक से वेस्टर्न क्लासिकल म्युजिक की पढाई की है, उन्हें मध्य-पूर्वी (मिड्ल ईस्ट) संगीत का भी ज्ञान है। यही कारण है कि उनके गीतों में सभी रंगों के दर्शन होते हैं। उन्होंने संगीत एवं ध्वनि को एक नया आयाम दिया है। वे बेहद लगनशील है और बस अपने काम से मतलब रखते हैं। इतनी सफलता के बाद भी उनमें ज़र्रा-भर भी गुरूर नहीं है और यही एक सफ़ल इंसान की पहचान है।

एंड्र्यु ल्वायड वेबर- I think he has an incredible tone of voice. I have seen many Bollywood films, but what he manages to do is quite unique--he keeps it very much Indian. For me as a Westerner, I can always recognize his music because it has got a rule tone of voice of its own. It's very definitely Indian, yet it has an appeal which will go right across the world. He will hit the West in an amazing kind of way; that is, if he is led in the right way. He is the most extraordinary' composer who is still true to his cultural roots, ' and deserves to be heard by an international public.

रंगीला की रिकार्डिंग से जुड़ा एक किस्सा सुनिये ताई "आशा भोंसले" के शब्दों में-



रहमान के प्रति और भी लोगों का मत जानने को यहाँ जाएँ-

और अब देखिये वो यादगार लम्हा जिसे हर भारतीय संगीत प्रेमी बरसों तक नही भूलना चाहेगा, सुनिए किस तरह रहमान ने अपना सम्मान दुनिया भर में फैले भारतीयों को समर्पित किया -



गोल्डेन ग्लोब के लिए रहमान को पुनश्च शुभकामनाएँ। आस्कर में बस अब डेढ महीने बचे हैं। खुदा करे कि आस्कर के जरिये रहमान भारत का नाम आसमान की बुलंदियों तक ले जाने में सफल हों।
आमीन!!!!!!


सुनिए स्लमडॉग मिलियनेयर के सभी गीत-



चित्र में उपर - बाल रहमान (सौजन्य ARR फैन्स अधिकारिक साईट), नीचे - रहमान अपने स्टूडियो में
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प्रस्तुति - विश्व दीपक "तन्हा"

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