मंगलवार, 29 जनवरी 2019

ऑडियो लघुकथा: बलिहारी गुरु आपने (अनुराग शर्मा)

रेडियो प्लेबैक इंडिया के साप्ताहिक स्तम्भ 'बोलती कहानियाँ' के अंतर्गत हम आपको सुनवाते हैं हिन्दी की नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने उषा छाबड़ा की आवाज़ में हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक उदयन वाजपेयी की बोधकथा "शेर और कवया" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं अनुराग शर्मा की एक लघुकथा "बलिहारी गुरु आपने", उन्हीं के स्वर में।

कहानी "बलिहारी गुरु आपने" का कुल प्रसारण समय 1 मिनट 57 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

इस कथा "बलिहारी गुरु आपने" का टेक्स्ट बर्ग वार्ता पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिकों, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



मैं भारत से बाहर भारत मुझ में रहता है
मेरी सब सीमाएँ राष्ट्र असीमित सहता है
~ अनुराग शर्मा

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी कहानी

"लिखना सीखकर कवि-शायर बन जायेंगे और मुशायरे लूट लाया करेंगे।"
(अनुराग शर्मा की "बलिहारी गुरु आपने" से एक अंश)



नीचे के प्लेयर से सुनें.


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यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाउनलोड कर लें:
बलिहारी गुरु आपने MP3

#Fourth Story, Balihari guru Apne: Anurag Sharma/Hindi Audio Book/2019/4. Voice: Anurag Sharma

रविवार, 27 जनवरी 2019

राग कामोद : SWARGOSHTHI – 404 : RAG KAMOD






स्वरगोष्ठी – 404 में आज

कल्याण थाट के राग – 2 : राग कामोद

पण्डित राजन-साजन मिश्र से राग कामोद की बन्दिश और लता मंगेशकर से एक फिल्मी गीत सुनिए




पण्डित राजन और साजन मिश्र
लता मंगेशकर
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई लघु श्रृंखला “कल्याण थाट के राग” के दूसरे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से पहला थाट कल्याण है। इस श्रृंखला में हम कल्याण थाट के दस रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आज के अंक में कल्याण थाट के एक जन्य राग “कामोद” पर चर्चा करेंगे। इस राग में पहले सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वर में इस राग की एक बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके बाद इसी राग पर आधारित एक गीत फिल्म “चित्रलेखा” से लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं।



आज के अंक में हम आपसे राग कामोद पर चर्चा करेंगे। कल्याण थाट और कल्याण अंग से संचालित होने वाले इस राग को कुछ गायक और प्राचीन ग्रन्थकार बिलावल थाट के अन्तर्गत भी मानते हैं। औड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। तीव्र मध्यम का अल्प प्रयोग केवल आरोह में पंचम के साथ और शुद्ध मध्यम का प्रयोग आरोह और अवरोह दोनों में किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग कामोद के आरोह के स्वर हैं; सा, रे, प, म(तीव्र), प, ध, प, नि, ध, सां तथा अवरोह के स्वर हैं; सां, नि, ध, प, म(तीव्र), प, ध, प, ग, म(शुद्ध), रे, सा। राग वर्गीकरण के प्राचीन सिद्धान्तों के अनुसार राग कामोद को राग दीपक की पत्नी माना जाता है। इस राग का गायन-वादन पाँचवें प्रहर अर्थात रात्रि के प्रथम प्रहर में किया जाता है। राग हमीर के समान कामोद राग के वादी और संवादी स्वर रागों के समय सिद्धान्त की दृष्टि से खरा नहीं उतरता। रागों के समय सिद्धान्त के अनुसार जो राग दिन के पूर्व अंग में उपयोग किये जाते हैं, उनका वादी स्वर सप्तक के पूर्व अंग में होना चाहिए। कामोद राग को इस नियम का अपवाद माना गया है, क्योंकि यह रात्रि के प्रथम प्रहर गाया जाता है और इसका वादी स्वर पंचम है। यह स्वर सप्तक के उत्तरांग का एक स्वर है। अब आपको इस राग की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध युगल गायक पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र की आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। राग कामोद की यह अत्यन्त प्रचलित परम्परागत रचना है, जिसके बोल हैं- “एरी जाने न दूँगी...”। इस प्रस्तुति में तबला संगति सुधीर पाण्डेय ने और हारमोनियम संगति महमूद धौलपुरी ने की है।

राग कामोद : ‘एरी जाने न दूँगी...’ : पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र 



श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए कामोद आदर्श राग है। इस राग में ऋषभ-पंचम स्वरों की संगति अधिक होती है। ऋषभ से पंचम को जाते समय सर्वप्रथम मध्यम से मींड़युक्त झटके के साथ ऋषभ स्वर पर आते हैं और फिर पंचम को जाते हैं। यह ध्यान रखना चाहिए कि इस प्रक्रिया में पंचम के साथ ऋषभ की संगति कभी न हो। राग हमीर और केदार के समान राग कामोद में भी कभी-कभी कोमल निषाद का प्रयोग अवरोह में राग की रंजकता बढ़ाने के लिए किया जाता है। राग कामोद में गान्धार का प्रयोग कभी भी सपाट नहीं बल्कि वक्र प्रयोग होता है। राग हमीर और केदार इसके समप्रकृति राग हैं। इन रागो की चर्चा हम इसी श्रृंखला के आगामी अंकों में करेंगे। ऊपर आपने राग कामोद की जो बन्दिश सुनी है, उस बन्दिश का उपयोग फिल्म में भी हुआ है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा के चर्चित उपन्यास ‘चित्रलेखा’ पर आधारित 1964 में इसी नाम से फिल्म बनी थी, जिसमें यह बन्दिश शामिल की गई थी। फिल्म के गीतकार साहिर लुधियानवी हैं, जिन्होने राग कामोद की मूल पारम्परिक बन्दिश की स्थायी के शब्दों को यथावत रखते हुए अन्तरों में परिवर्तन किया है। फिल्म में यह गीत लता मंगेशकर ने रोशन के संगीत निर्देशन में गाया था। संगीतकार रोशन ने भी साहिर का यह गीत राग कामोद के स्वरों में संगीतबद्ध किया है। अब आप लता मंगेशकर की आवाज़ में राग कामोद की इस खयाल रचना का फिल्मी रूप सुनिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग कामोद : ‘एरी जाने न दूँगी...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – चित्रलेखा



संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 404थे अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1957 में प्रदर्शित एक फिल्म के रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। पहेली क्रमांक 410 तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इस गीत में किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 2 फरवरी, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 406 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 402 की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1975 में प्रदर्शित फिल्म “मृगतृष्णा” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – कल्याण अथवा यमन, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – रूपकताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मोहम्मद रफी

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 402 की पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, फीनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडिया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी। उपरोक्त सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी श्रृंखला “कल्याण थाट के राग” की दूसरी कड़ी में आज आपने राग कामोद का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र इस राग की एक लोकप्रिय बन्दिश का रसास्वादन किया। इसी बन्दिश को ही आधार बना कर 1964 में प्रदर्शित फिल्म “चित्रलेखा” में एक गीत शामिल किया गया था। गीतकार साहिर लुधियानवी बन्दिश के स्थायी को बरकरार रखते हुए अन्तरे जोड़े थे। संगीतकार रोशन ने इस गीत को राग कामोद में ही संगीतबद्ध किया है और इसे लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछले अंकों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग कामोद : SWARGOSHTHI – 404 : RAG KAMOD : 27 Jan, 2019

रविवार, 20 जनवरी 2019

कल्याण थाट : SWARGOSHTHI – 403 : KALYAN THAT




स्वरगोष्ठी – 403 में आज

कल्याण थाट के राग – 1 : राग कल्याण अर्थात यमन

उस्ताद राशिद खाँ से राग कल्याण / यमन में खयाल और मोहम्मद रफी से एक फिल्मी गीत सुनिए




उस्ताद राशिद खाँ
मोहम्मद रफी
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ हो रही एक नई लघु श्रृंखला “कल्याण थाट के राग” के प्रथम अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से पहला थाट कल्याण है। इस श्रृंखला में हम कल्याण थाट के दस रागों पर क्रमशः चर्चा करेंगे। प्रत्येक थाट एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आज के अंक में कल्याण थाट के आश्रय राग कल्याण अथवा यमन पर चर्चा करेंगे। आपके लिए पहले सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में इस राग की एक बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके बाद इसी राग पर आधारित एक गीत फिल्म “मृगतृष्णा” से मोहम्मद रफी की आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं।



कल्याण थाट के स्वर होते हैं- सा, रे, ग, म॑, प ध, नि, अर्थात इस थाट में मध्यम स्वर तीव्र होता है और शेष स्वर शुद्ध होता है। राग कल्याण अथवा यमन, कल्याण थाट का आश्रय अथवा जनक राग माना जाता है। मध्यकालीन ग्रन्थों में इस राग का यमन नाम से उल्लेख मिलता है। परन्तु प्राचीन ग्रन्थों में इसका नाम केवल कल्याण ही मिलता है। आधुनिक ग्रन्थों में यमन एक सम्पूर्ण जाति का राग है। यह कल्याण थाट का आश्रय राग होता है। आश्रय राग का अर्थ होता है, ऐसा राग, जिसमें थाट में प्रयुक्त स्वर की उपस्थिति हो। इस थाट के आश्रय राग कल्याण अथवा यमन में सभी सात स्वरों का प्रयोग होता है। मध्यम स्वर तीव्र और शेष सभी छः स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। वादी स्वर गान्धार और संवादी निषाद होता है। इसका गायन-वादन समय गोधूली बेला अर्थात सूर्यास्त से लेकर रात्रि के प्रथम प्रहर तक होता है। राग कल्याण अथवा यमन के आरोह के स्वर हैं- सा, रे, ग, म॑, प, ध, नि, सां तथा अवरोह के स्वर हैं- सां, नि, ध, प, म॑, ग, रे, सा होते हैं। अब हम आपको राग कल्याण अथवा यमन के स्वरों में तीनताल में निबद्ध एक खयाल रचना सुनवाते है। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, रामपुर सहसवान घराने के सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद राशिद खाँ।

राग कल्याण अथवा यमन : ‘ऐसों सुगढ़ सुगढ़वा बालम...’ : उस्ताद राशिद खान



इस राग का प्राचीन नाम कल्याण ही मिलता है। मुगल काल में राग का नाम यमन प्रचलित हुआ। वर्तमान में इसका दोनों नाम, कल्याण और यमन, प्रचलित है। यह दोनों नाम एक ही राग के सूचक हैं, किन्तु जब हम ‘यमन कल्याण’ कहते हैं तो यह एक अन्य राग का सूचक हो जाता है। राग यमन कल्याण, राग कल्याण अथवा यमन से भिन्न है। इसमें दोनों मध्यम का प्रयोग होता है, जबकि यमन में केवल तीव्र मध्यम का प्रयोग होता है। राग कल्याण अथवा यमन के चलन में अधिकतर मन्द्र सप्तक के निषाद से आरम्भ होता है और जब तीव्र मध्यम से तार सप्तक की ओर बढ़ते हैं तब पंचम स्वर को छोड़ देते हैं। राग कल्याण के कुछ प्रचलित प्रकार हैं; पूरिया कल्याण, शुद्ध कल्याण, जैत कल्याण आदि। राग कल्याण गंभीर प्रकृति का राग है। इसमे ध्रुपद, खयाल तराना तथा वाद्य संगीत पर मसीतखानी और रजाखानी गतें प्रस्तुत की जाती हैं। अब हम राग कल्याण अथवा यमन के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। यह गीत हमने 1975 में प्रदर्शित फिल्म “मृगतृष्णा” से लिया है। फिल्म के संगीतकार शम्भू सेन हैं और इस गीत को स्वर मोहम्मद रफी ने दिया है। गीत के आरम्भ में कवित्त की पंक्तियों के स्वर सम्भवतः संगीतकार शम्भू सेन के हैं। यह गीत अभिनेत्री हेमामालिनी के नृत्य पर फिल्माया गया है। आप राग कल्याण अथवा यमन की इस रचना का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग कल्याण अथवा यमन : “नव कल्पना नव रूप से...” : मोहम्मद रफी : फिल्म – मृगतृष्णा



संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 403सरे अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1964 में प्रदर्शित एक फिल्म के रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। पहेली क्रमांक 410 तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 26 जनवरी, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 405 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 401 में हमने आपसे पहेली का कोई भी प्रश्न नहीं पूछा था। इसीलिए हम इस अंक में पहेली का उत्तर और विजेताओं के नाम प्रकाशित नहीं कर रहे हैं। पहेली क्रमांक 402 की पहेली का उत्तर और विजेताओं के नाम “स्वरगोष्ठी” के क्रमांक 404 में हम प्रकाशित करेंगे।

अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ हो रही श्रृंखला “कल्याण थाट के राग” का यह प्रवेशांक था। श्रृंखला की पहली कड़ी में आपने कल्याण थाट के आश्रय अथवा जनक राग कल्याण अथवा यमन का परिचय प्राप्त किया। इस कड़ी में आपने उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में कल्याण थाट के राग कल्याण अथवा यमन की एक बन्दिश का रसास्वादन किया। दूसरे चरण में इसी राग पर आधारित फिल्म “मृगतृष्णा” का गीत मोहम्मद रफी के स्वर में प्रस्तुत किया गया। “स्वरगोष्ठी” पर महाविजेताओं पर केन्द्रित अंकों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। आज हम दो महाविजेताओं की प्रतिक्रिया से आपको अवगत करा रहे हैं। पहले आप हमारी तृतीय महाविजेता मेरिलैण्ड, अमेरिका की विजया राजकोटिया के विचार से अवगत हों;

Vijaya Rajkotia Thank you So much for your dedicated work on Swargoshthi. I enjoyed watching and reading interesting information about lot of things. I will send you a detailed email later. We are in the process of moving into apartment so have been very busy so I will touch basis with you. Namaskar.

और अब हम वोरहीज, न्यूजर्सी के डॉ. किरीट छाया की प्रतिक्रिया प्रस्तुत कर रहे हैं;

Dear shree Krishna Mohanji, 

Once again I am honoured to be selected one of the Maha Vijeta for the year 2018. It is always an interesting challenge that I look forward to every Saturday night ( For us ). Your description of each Raag is so perfect that an amateur like me learns something each week. This year it has prompted me to take up learning to play Harmonium. Your dedication and your expertise along with your equally knowledgeable colleagues is exemplary. I thank Shrimati Vijayaben for introducing me to this wonderful blog. I take this opportunity to thank you all at Swaragoshthi for a great job and please continue doing this. 

हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  
रेडियो प्लेबैक इण्डिया
कल्याण थाट : SWARGOSHTHI – 403 : KALYAN THAT : 20 Jan, 2019
 

मंगलवार, 15 जनवरी 2019

ऑडियो: शेर और कवया (उदयन वाजपेयी) - उषा छाबड़ा

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में  प्रियांकी मिश्रा के संस्मरण "मेघ" का वाचन सुना था।

आज प्रस्तुत है उदयन वाजपेयी की रोचक बालकथा 'शेर और कवया', जिसे स्वर दिया है उषा छाबड़ा ने।

यह कहानी तक्षशिला प्रकाशन की पत्रिका साइकिल में प्रकाशित हुई थी। इसका कुल प्रसारण समय 9 मिनट 4 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितने सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिकों, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं आदि को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।


विचारक, अनुवादक, पत्रकार, और साहित्यकार उदयन वाजपेयी का जन्म 04 जनवरी 1960 को सागर (मध्य प्रदेश) में हुआ था।

कम-से-कम भारत में राष्ट्रवाद के उभरने के पीछे हमारा आधुनिकता की अन्ध-स्वीकृति और अपनी पारम्परिक दृष्टियों का उतना ही अन्धा तिरस्कार है।
~ उदयन वाजपेयी

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“उस इलाके में कहानी कहने वाले को कवया कहा जाता है।" (उदयन वाजपेयी की कथा 'शेर और कवया' से एक अंश)


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शेर और कवया (उदयन वाजपेयी) MP3

#Third Story, Sher Aur Kavaya; Udayan Vajpeyi; Hindi Audio Book/2019/03. Voice: Usha Chhabra

रविवार, 13 जनवरी 2019

वर्ष के महाविजेता - 2 : SWARGOSHTHI – 402 : MAHAVIJETA OF THE YEAR






स्वरगोष्ठी – 402 में आज


महाविजेताओं की प्रस्तुतियाँ – 2


संगीत पहेली के महाविजेताओं क्षिति, हरिणा और प्रफुल्ल का उन्हीं की प्रस्तुतियों से अभिनन्दन




क्षिति तिवारी
डी.हरिणा माधवी
"रेडियो प्लेबैक इण्डिया" के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का नए वर्ष के दूसरे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। पिछले अंक में हमने आपसे ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के बीते वर्ष की कुछ विशेष गतिविधियों की चर्चा की थी। साथ ही पहेली के दूसरे, तीसरे और चौथे महाविजेता डॉ. किरीट छाया, विजया राजकोटिया और शुभा खाण्डेकर से आपको परिचित कराया था और उनकी प्रस्तुतियों को भी सुनवाया था। इस अंक में भी हम गत वर्ष की कुछ अन्य गतिविधियों का उल्लेख करने के साथ ही संगीत पहेली के एक प्रथम और दो द्वितीय महाविजेताओं की घोषणा कर रहे हैं और उनका सम्मान भी कर रहे हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के पाठक और श्रोता जानते हैं कि इस स्तम्भ के प्रत्येक अंक में संगीत पहेली के माध्यम से हम हर सप्ताह भारतीय संगीत से जुड़े तीन प्रश्न देकर पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए आपसे कम से कम दो प्रश्नों का उत्तर पूछते हैं। आपके दिये गये सही उत्तरों के प्राप्तांकों की गणना दो स्तरों पर की जाती है। ‘स्वरगोष्ठी’ की दस-दस कड़ियों को पाँच सत्रों (सेगमेंट) में बाँट कर और फिर वर्ष के अन्त में सभी पाँच सत्रों के प्रतिभागियों के कुल प्राप्तांकों की गणना की जाती है। वर्ष 2018 की संगीत पहेली में अनेक प्रतिभागी नियमित रूप से भाग लेते रहे। 399वें अंक की पहेली के परिणाम आने तक शीर्ष के छः महाविजेता चुने गए। अंकों की गणना करने के बाद सर्वाधिक 96 अंक पाकर क्षिति तिवारी ने प्रथम, 92 अंक प्राप्त कर तीन प्रतिभागियों; डी. हरिणा माधवी, प्रफुल्ल पटेल तथा डॉ. किरीट छाया ने द्वितीय स्थान प्राप्त किया। इसी प्रकार 66 अंक अर्जित कर विजया राजकोटिया ने तृतीय स्थान और 58 अंक प्राप्त कर शुभा खाण्डेकर ने चौथा स्थान प्राप्त किया। आज के अंक में हम प्रथम और द्वितीय स्थान के महाविजेताओं क्रमशः, क्षिति तिवारी, हरिणा माधवी और प्रफुल्ल पटेल का अभिनन्दन करेंगे और उनकी प्रस्तुतियाँ सुनवाएँगे।आज के अंक में प्रथम महाविजेता क्षिति तिवारी राग यमन में पिरोयी शिव-स्तुति और राग तिलक कामोद की बन्दिश प्रस्तुत कर रही हैं। द्वितीय महाविजेता डी. हरिणा माधवी अपनी ही पुस्तक "प्रेरणा" से राग बागेश्री की एक स्वरचित बन्दिश प्रस्तुत कर रही हैं। समान अंक होने के कारण द्वितीय महाविजेता प्रफुल्ल पटेल पाँचवें दशक में सुप्रसिद्ध गायक जगमोहन का गाया एक गैर फिल्मी गीत अपनी आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। 


वर्ष 2018 की संगीत पहेली में सर्वाधिक 96 अंक अर्जित कर जबलपुर, मध्यप्रदेश की क्षिति तिवारी ने प्रथम महाविजेता होने का गौरव प्राप्त किया है। संगीत पहेली में प्रथम महाविजेता होने का सम्मान प्राप्त करने वाली जबलपुर, मध्यप्रदेश की श्रीमती क्षिति तिवारी की संगीत शिक्षा लखनऊ और कानपुर में सम्पन्न हुई। लखनऊ के भातखण्डे संगीत महाविद्यालय से गायन में प्रथमा से लेकर विशारद तक की परीक्षाएँ उत्तीर्ण की। बाद में इस संस्थान को विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त हुआ, जहाँ से उन्होने संगीत निपुण और उसके बाद ठुमरी गायन मे तीन वर्षीय डिप्लोमा भी प्राप्त किया। इसके अलावा कानपुर के वरिष्ठ संगीतज्ञ पण्डित गंगाधर राव तेलंग जी के मार्गदर्शन में खैरागढ़, छत्तीसगढ़ के इन्दिरा संगीत कला विश्वविद्यालय की संगीत स्नातक और स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। क्षिति जी के गुरुओं में डॉ. गंगाधर राव तेलंग के अलावा पण्डित सीताशरण सिंह, पण्डित गणेशप्रसाद मिश्र, डॉ. सुरेन्द्र शंकर अवस्थी, डॉ. विद्याधर व्यास और श्री विनीत पवइया प्रमुख हैं। क्षिति को स्नातक स्तर पर भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से ग्वालियर घराने की गायकी के अध्ययन के लिए राष्ट्रीय छात्रवृत्ति भी मिल चुकी है। कई वर्षों तक लखनऊ के महिला कालेज और जबलपुर के एक नेत्रहीन बच्चों के विद्यालय मे माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा देने के बाद वर्तमान में जबलपुर के ‘महाराष्ट्र संगीत महाविद्यालय’ में संगीत गायन की शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं। ध्रुपद, खयाल, ठुमरी और भजन गायन के अलावा उन्होने प्रोफेसर कमला श्रीवास्तव से गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत लोक संगीत भी सीखा है, जिसे अब वह अपने विद्यार्थियों को बाँट रही हैं। क्षिति जी कथक नृत्य और नृत्य नाटिकाओं में गायन संगति की विशेषज्ञ हैं। सुप्रसिद्ध नृत्यांगना और भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय की प्रोफेसर कुमकुम धर और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कला संकाय की प्रोफेसर और नृत्यांगना विधि नागर के कई कार्यक्रमों में अपनी इस प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुकी हैं। आज के इस विशेष अंक में क्षिति तिवारी के कथक नृत्य के साथ गायन संगति की एक रिकार्डिंग हम प्रस्तुत कर रहे हैं। इस रिकार्डिंग में क्षिति तिवारी पहले राग यमन में निबद्ध शिवस्तुति, “नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय...” प्रस्तुत किया है। अगले चरण में नृत्यांगना के भाव प्रदर्शन के लिए उन्होने राग तिलक कामोद की एक बन्दिश; “नीर भरन कैसे जाऊँ...” का गायन प्रस्तुत किया है। लीजिए, अब आप यह रचनाएँ सुनिए और प्रथम महाविजेता क्षिति तिवारी का अभिनन्दन कीजिए।

राग यमन और तिलक कामोद : शिवस्तुति और बन्दिश “नीर भरन कैसे जाऊँ...” : क्षिति तिवारी


‘स्वरगोष्ठी’ की संगीत पहेली 2018 में 92 अंक प्राप्त कर द्वितीय महाविजेता बनीं हैं, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी। हम उन्हें सहर्ष सम्मानित करते हैं। “संगीत जीवन का विज्ञान है”, इस सिद्धान्त को केवल मानने वाली ही नहीं बल्कि अपने जीवन में उतार लेने वाली हरिणा जी दो विषयों की शिक्षिका का दायित्व निभा रही हैं। हैदराबाद के श्री साईं स्नातकोत्तर महाविद्यालय में विगत 16 वर्षो से स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं को लाइफ साइन्स पढ़ा रही हैं। इसके साथ ही स्थानीय वासवी कालेज ऑफ म्यूजिक ऐंड डांस से भी उनका जुड़ाव है, जहाँ विभिन्न आयुवर्ग के विद्यार्थियों का मार्गदर्शन भी करती हैं। हरिणा जी को प्रारम्भिक संगीत शिक्षा अपनी माँ श्रीमती वाणी दुग्गराजू से मिली। आगे चल कर अमरावती, महाराष्ट्र के महिला महाविद्यालय की संगीत विभागाध्यक्ष श्रीमती कमला भोंडे से विधिवत संगीत सीखना शुरू किया। हरिणा जी के बाल्यावस्था के एक और संगीत गुरु एम.वी. प्रधान भी थे, जो एक कुशल तबला वादक भी थे। इनके अलावा हरिणा जी ने गुरु किरण घाटे और आर. डी. जी. कालेज, अकोला के संगीत विभागाध्यक्ष श्री नाथूलाल जायसवाल से भी संगीत सीखा। हरिणा जी ने मुम्बई के अखिल भारतीय गन्धर्व महाविद्यालय से संगीत अलंकार की उपाधि प्राप्त की है। पिछले दिनों हरिणा जी की संगीत विषयक पुस्तक; “प्रेरणा” का प्रकाशन हुआ था। यह उनकी स्वरचित बन्दिशों का संग्रह है, जिसमें राग भैरव से लेकर राग भैरवी तक प्रचलित 25 रागों में कुल 61 बन्दिशें सम्मिलित की गई हैं। हमारे आग्रह पर इस अंक के लिए हरिणा जी ने अपनी पुस्तक से, अपने ही स्वर में राग बागेश्री की एक बन्दिश हमें भेजी है। आज के इस विशेष अंक में हम शिक्षिका और विदुषी डी. हरिणा माधवी का महाविजेता के रूप में हार्दिक अभिनन्दन करते हैं और आपको हरिणा जी की आवाज़ में राग बागेश्री में एक स्वरचित बन्दिश सुनवाते हैं।

बन्दिश राग बागेश्री : “सखि जनम गवायो...” डी. हरिणा माधवी


प्रफुल्ल पटेल
पहेली प्रतियोगिता में 92 अंक प्राप्त कर द्वितीय महाविजेता बने हैं, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल। भारतीय शास्त्रीय संगीत में गहरी रुचि रखने वाले प्रफुल्ल पटेल न्यूजर्सी, अमेरिका में रहते हैं। साप्ताहिक स्तम्भ, ‘स्वरगोष्ठी’ को पसन्द करने वाले प्रफुल्ल जी शास्त्रीय संगीत के अलावा भारतीय लोकप्रिय संगीत भी रुचि के साथ सुनते हैं। इस प्रकार के संगीत से उन्हें गहरी रुचि है। परन्तु कहते हैं कि उन्हें पाश्चात्य संगीत ने कभी भी प्रभावित नहीं किया। पेशे से इंजीनियर, भारतीय मूल के प्रफुल्ल जी पिछले पचास वर्षों से अमेरिका में रह रहे हैं। प्रफुल्ल जी स्वान्तःसुखाय हारमोनियम बजाते हैं और स्वयं गाते भी है, किन्तु बताते हैं कि उनकी गायन और वादन का स्तर ‘स्वरगोष्ठी’ में प्रसारित शिखर-कलासाधकों के गायन अथवा वादन जैसा नहीं है। जब हमने उनका गाया-बजाया अथवा उनकी पसन्द का कोई ऑडियो क्लिप उनसे भेजने का अनुरोध किया तो पहले तो उन्होने किसी एक कलाकार को चुनने में असमंजस के कारण संकोच के साथ टाल दिया। हमारे दोबारा आग्रह पर उन्होने अपनी आवाज़ में एक आकर्षक गैरफिल्मी गीत हमें भेज दिया। ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली में नियमित रूप से भाग लेने वाले प्रफुल्ल जी के संगीत-ज्ञान का अनुमान इस तथ्य से किया जा सकता है कि संगीत पहेली में 92 अंक अर्जित कर उन्होने वार्षिक महाविजेताओ की सूची दूसरे महाविजेता का सम्मान प्राप्त किया है। “स्वरगोष्ठी” के आज के इस अंक के माध्यम से ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी संचालक और सम्पादक मण्डल के सदस्य, संगीत-प्रेमी प्रफुल्ल पटेल का महाविजेता के रूप में हार्दिक अभिनन्दन करते हैं और उनकी आवाज़ में एक गैर फिल्मीगीत “मुझे न सपनों से बहलाओ...” प्रस्तुत कर रहे हैं। वर्ष 1945 में सुप्रसिद्ध गायक जगमोहन (जगनमय मित्रा) के गैर फिल्मी गीतों का एक अलबम जारी हुआ था। यह गीत उसी अलबम से है, जिसे अपार लोकप्रियता मिली। आप इस मोहक गायन का रसास्वादन कीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। इस अंक से हमारी पहेली प्रतियोगिता की पुनः शुरुआत हो रही है। आप सभी इसमें भाग लेना न भूलिए।

गैर फिल्मी गीत : “मुझे न सपनों से बहलाओ...” : स्वर - प्रफुल्ल पटेल



संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 402सरे अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1975 में प्रदर्शित एक फिल्म के रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। पहेली क्रमांक 410 तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग से प्रेरित है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 19 जनवरी, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 404 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 400 में हमने आपसे पहेली का कोई भी प्रश्न नहीं पूछा था। अब हम आज के अंक की पहेली का उत्तर और विजेताओं के नाम “स्वरगोष्ठी” के क्रमांक 404 में प्रकाशित करेंगे।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज पहेली के वर्ष 2018 के महाविजेताओं पर केन्द्रित था। आज के अंक में पहेली की प्रथम महाविजेता जबलपुर की क्षिति तिवारी और दो द्वितीय महाविजेता हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी तथा चेरीहिल, न्यूजर्सी, अमेरिका के प्रफुल्ल पटेल की प्रस्तुतियों का रसास्वादन किया। अगले सप्ताह से हम आप जैसे अधिक़तर संगीत-प्रेमियों के अनुरोध पर एक नई श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
वर्ष के महाविजेता - 2 : SWARGOSHTHI – 402 : MAHAVIJETA OF THE YEAR : 13 Jan. 2019

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

ऑडियो संस्मरण: मेघ (प्रियांकी मिश्रा)

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने पूजा अनिल के स्वर में मिन्नी मिश्रा की लघुकथा "रील बनाम रीयल" का वाचन सुना था।

आज प्रस्तुत है प्रियांकी मिश्रा का मर्मस्पर्शी संस्मरण मेघ, जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

प्रस्तुत संस्मरण "मेघ" का गद्य कला और साहित्य के द्वैभाषिक मासिक सेतु के दिसम्बर 2018 अंक में उपलब्ध है। इसका कुल प्रसारण समय 8 मिनट 21 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितने सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिकों, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं आदि को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।


डॉ. प्रियांकी मिश्रा एम जी एम मेडिकल कॉलेज,जमशेदपुर में प्राध्यापक हैं। हिन्दी और अंग्रेजी में लेखन, अंग्रेजी उपन्यास "Whatsoever you do" प्रकाशित।

वस्तुतः मैं लेखन को अपने जीवन और अपने ईश्वर से एकाकारिता का एक माध्यम मानती हूँ और आत्म संतुष्टि के लिए लिखती जाती हूँ।
~ प्रियांकी मिश्रा

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

“थेथर के नाम से पहचानी जाने वाली झाड़ी की डंडियाँ उन दिनों पशुओं के साथ साथ बच्चों पर भी समान रूप से प्रयोग होती थीं।" (प्रियांकी मिश्रा के संस्मरण 'मेघ' से एक अंश)


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मेघ (प्रियांकी मिश्रा) MP3

#Second Story, Megh; Priyanki Mishra; Hindi Audio Book/2019/02. Voice: Anurag Sharma

रविवार, 6 जनवरी 2019

वर्ष के महाविजेता - 1 : SWARGOSHTHI – 401 : MAHAVIJETA OF THE YEAR






स्वरगोष्ठी – 401 में आज

सभी पाठकों और श्रोताओं का नववर्ष 2019 के पहले अंक में अभिनन्दन

महाविजेताओं की प्रस्तुतियाँ – 1

महाविजेता शुभा खाण्डेकर, विजया राजकोटिया और डॉ. किरीट छाया के सम्मान में उनकी प्रस्तुतियाँ




विजया राजकोटिया
शुभा खाण्डेकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का नववर्ष के पहले अंक में हार्दिक अभिनन्दन है। इसी अंक से आपका प्रिय स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ नौवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। विगत आठ वर्षों से असंख्य पाठकों, श्रोताओं, संगीत शिक्षकों और वरिष्ठ संगीतज्ञों का प्यार, दुलार और मार्गदर्शन इस स्तम्भ को मिलता रहा है। इन्टरनेट पर शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक, सुगम और फिल्म संगीत विषयक चर्चा का सम्भवतः यह एकमात्र नियमित साप्ताहिक स्तम्भ है, जो विगत आठ वर्षों से निरन्तरता बनाए हुए है। इस पुनीत अवसर पर मैं कृष्णमोहन मिश्र, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सम्पादक और संचालक मण्डल के सभी सदस्यों; सजीव सारथी, सुजॉय चटर्जी, अमित तिवारी, अनुराग शर्मा, विश्वदीपक, संज्ञा टण्डन, पूजा अनिल और रीतेश खरे के साथ अपने सभी पाठकों और श्रोताओं के प्रति आभार प्रकट करता हूँ। आज नौवें वर्ष के इस प्रवेशांक में हम ‘स्वरगोष्ठी’ की संगीत पहेली के दूसरे महाविजेता डॉ. किरीट छाया द्वारा प्रेषित पण्डित निखिल बनर्जी का सितार पर बजाया राग सोहनी का वीडियो, तीसरी महाविजेता विजया राजकोटिया की स्वयं की आवाज़ में राग भीमपलासी पर केन्द्रित गोस्वामी तुलसीदास के भजन का वीडियो और चौथी महाविजेता शुभा खाण्डेकर द्वारा प्रेषित पार्श्वगायिका आशा भोसले के स्वर में एक मराठी अभंग की प्रस्तुतियों का रसास्वादन कराएँगे। इसके अलावा नववर्ष के इस प्रवेशांक में मांगलिक अवसरों पर परम्परागत रूप से बजने वाले मंगलवाद्य शहनाई का वादन भी प्रस्तुत करेंगे। वादक हैं, भारतरत्न के सर्वोच्च अलंकरण से विभूषित उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और राग है सर्वप्रिय भैरवी।



उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ
‘स्वरगोष्ठी’ का शुभारम्भ ठीक आठ वर्ष पूर्व ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ संचालक और सम्पादक मण्डल के प्रमुख सदस्य सुजॉय चटर्जी ने रविवार, 2 जनवरी 2011 को किया था। आरम्भ में यह ‘हिन्दयुग्म’ के ‘आवाज़’ मंच पर हमारे अन्य नियमित स्तम्भों के साथ प्रकाशित हुआ करता था। उन दिनों इस स्तम्भ का शीर्षक ‘सुर संगम’ था। दिसम्बर 2011 से हमने ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ नाम से एक अपना नया सामूहिक मंच बनाया और पाठकों के अनुरोध पर जनवरी 2012 से इस स्तम्भ का शीर्षक ‘स्वरगोष्ठी’ कर दिया गया। तब से हम आपसे निरन्तर यहीं मिलते हैं। समय-समय पर आपसे मिले सुझावों के आधार पर हम अपने सभी स्तम्भों के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ में भी संशोधन करते रहते हैं। इस स्तम्भ के प्रवेशांक में सुजॉय जी ने इसके उद्देश्यों पर प्रकाश डाला था। उन्होने लिखा था;

“नये साल के इस पहले रविवार की सुहानी सुबह में मैं, सुजॉय चटर्जी, आप सभी का 'आवाज़' पर स्वागत करता हूँ। यूँ तो हमारी मुलाक़ात नियमित रूप से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर होती रहती है, लेकिन अब से मैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के अलावा हर रविवार की सुबह भी आपसे मुख़ातिब रहूँगा इस नये स्तम्भ में जिसकी हम आज से शुरुआत कर रहे हैं। दोस्तों, प्राचीनतम संगीत की अगर हम बात करें तो वो है हमारा शास्त्रीय संगीत, जिसका उल्लेख हमें वेदों में मिलता है। चार वेदों में सामवेद में संगीत का व्यापक वर्णन मिलता है। इन वैदिक ऋचाओं को सामगान के रूप में गाया जाता था। फिर उससे 'जाति' बनी और फिर आगे चलकर 'राग' बनें। ऐसी मान्यता है कि ये अलग-अलग राग हमारे अलग-अलग 'चक्र' (ऊर्जाविन्दु) को प्रभावित करते हैं। ये अलग-अलग राग आधार बनें शास्त्रीय संगीत का और युगों-युगों से इस देश के सुरसाधक इस परम्परा को निरन्तर आगे बढ़ाते चले जा रहे हैं, हमारी संस्कृति को सहेजते हुए बढ़े जा रहे हैं। संगीत की तमाम धाराओं में सबसे महत्वपूर्ण धारा है शास्त्रीय अर्थात रागदारी संगीत। बाकी जितनी तरह का संगीत है, उन सबमें उच्च स्थान पर है अपना रागदारी संगीत। तभी तो संगीत की शिक्षा का अर्थ ही है शास्त्रीय संगीत की शिक्षा। अक्सर साक्षात्कारों में कलाकार इस बात का ज़िक्र करते हैं कि एक अच्छा गायक या संगीतकार बनने के लिए शास्त्रीय संगीत का सीखना बेहद ज़रूरी है। तो दोस्तों, आज से 'आवाज़' पर पहली बार एक ऐसा साप्ताहिक स्तम्भ शुरु हो रहा है जो समर्पित है, भारतीय परम्परागत शास्त्रीय संगीत को। गायन और वादन, यानी साज़ और आवाज़, दोनों को ही बारी-बारी से इसमें शामिल किया जाएगा। भारतीय संगीत से इस स्तम्भ की हम शुरुआत कर रहे हैं, लेकिन आगे चलकर अन्य संगीत शैलियों को भी शामिल करने की उम्मीद रखते हैं।”

तो यह सन्देश हमारे इस स्तम्भ के प्रवेशांक का था। ‘स्वरगोष्ठी’ की कुछ और पुरानी यादों को ताज़ा करने से पहले आज का का चुना हुआ संगीत सुनते हैं। आज ‘स्वरगोष्ठी’ नौवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। हम इस पावन अवसर पर मंगलवाद्य शहनाई का वादन प्रस्तुत कर रहे हैं। इस अंक में हम देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारतरत्न’ से अलंकृत उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर बजाया राग भैरवी प्रस्तुत कर रहे हैं।

मंगलध्वनि : राग भैरवी : शहनाई वादन : उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और साथी



हमारे दल के सर्वाधिक कर्मठ साथी सुजोय चटर्जी ने ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ की नीव रखी थी। उद्देश्य था, शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत-प्रेमियों को एक ऐसा मंच देना जहाँ किसी कलासाधक, प्रस्तुति अथवा किसी संगीत-विधा पर हम आपसे संवाद कायम कर सकें और आपसे विचारों का आदान-प्रदान कर सकें। आज के 401वें अंक के माध्यम से हम कुछ पुरानी स्मृतियों को ताज़ा कर रहे हैं। जैसा कि पहले ही उल्लेख किया गया है कि इस स्तम्भ की बुनियाद सुजॉय चटर्जी ने रखी थी और आठवें अंक तक अपने आलेखों के माध्यम से अनेक संगीतज्ञों व्यक्तित्व और कृतित्व से हमें रससिक्त किया था। नौवें अंक से हमारे एक नये साथी सुमित चक्रवर्ती हमसे जुड़े और आपके अनुरोध पर उन्होने शास्त्रीय, उपशास्त्रीय संगीत के साथ लोक संगीत को भी ‘सुर संगम’ से जोड़ा। सुमित जी ने इस स्तम्भ के 30वें अंक तक आपके लिए बहुविध सामग्री प्रस्तुत की, जिसे आप सब पाठकों-श्रोताओं ने सराहा। इसी बीच मुझ अकिंचन को भी कई विशेष अवसरों पर कुछ अंक प्रस्तुत करने का अवसर मिला। सुमित जी की पारिवारिक और व्यावसायिक व्यस्तता के कारण 31वें अंक से ‘सुर संगम’ का पूर्ण दायित्व मेरे साथियों ने मुझे सौंपा। मुझ पर विश्वास करने के लिए अपने साथियों का मैं आभारी हूँ। साथ ही अपने पाठकों-श्रोताओं का अनमोल प्रोत्साहन भी मुझे मिला, जो आज भी जारी है।

बीते वर्ष के अंकों में ‘स्वरगोष्ठी’ से असंख्य पाठक, श्रोता, समालोचक और संगीतकार जुड़े। हमें उनका प्यार, दुलार और मार्गदर्शन मिला। उन सभी का नामोल्लेख कर पाना सम्भव नहीं है। ‘स्वरगोष्ठी’ का सबसे रोचक भाग प्रत्येक अंक में प्रकाशित होने वाली ‘संगीत पहेली’ है। इस पहेली में बीते वर्ष के दौरान अनेक संगीत-प्रेमियों ने सहभागिता की। इन सभी उत्तरदाताओं को उनके सही उत्तर पर प्रति सप्ताह अंक दिये गए। वर्ष के अन्त में सभी प्राप्तांकों की गणना की की गई। 399वें अंक तक की गणना की जा चुकी है। इनमें से सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाले छः महाविजेताओं का चयन कर लिया गया है। आज के इस अंक में हम आपका परिचय पहेली के दूसरे, तीसरे और चौथे महाविजेताओं से करा रहे हैं। पहले और दूसरे महाविजेताओ की घोषणा और उनकी प्रस्तुतियों का रसास्वादन हम अगले अंक में कराएँगे।

पहेली प्रतियोगिता में चतुर्थ स्थान को सुशोभित करने वाली कल्याण, महाराष्ट्र निवासी शुभा खाण्डेकर को संगीत की प्राथमिक शिक्षा दिल्ली में श्री चतुर सेन जी से मिली। ये संस्कार आज 50 साल बाद भी शुभा जी में जीवित हैं। इनके माता-पिता दोनों संगीतप्रेमी हैं। इनके घर में चौबीस घण्टे रेडियो पर अच्छा संगीत सुनने को मिलता था। शास्त्रीय, उपशास्त्रीय के साथ-साथ हिन्दी और मराठी फिल्म संगीत, मराठी नाट्य संगीत और भावगीत तथा भारत के हर प्रदेश के लोकसंगीत भी सुनती रही हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब और महाराष्ट्र के लोकगीतों से खास लगाव रहा। कर्णाटक संगीत में ताल-वाद्य-कचेरी इन्हें बहुत अच्छी लगी। शुभा जी का गान्धर्व महाविद्यालय की तीन परीक्षा पास करने के बाद शिक्षा और रियाज़ तो छूट गया पर श्रवण-भक्ति जारी रही। राष्ट्रीय स्तर का ऐसा कोई गायक या वादक नहीं, जिन्हें उन्होने महफ़िल में सामने बैठकर नहीं सुना। 35 साल बाद मुम्बई में उन्हें फिर से गायन सीखने का मौका मिला, श्रीमती मालती कामत जी से, जो कि श्रीमती किशोरी आमोणकरजी की शिष्या हैं। परन्तु यह सिलसिला भी एक साल तक ही चल पाया। शुभा जी गाना तो अब भी चाहती हैं पर उनके अनुसार अब सम्भव नहीं। इतिहास में दिल्ली विश्वविद्यालय से एम्.ए. करने के बाद शुभा खाण्डेकर की रूचि पुरातत्त्व शास्त्र में हुई। पुणे के डेक्कन कॉलेज से इस विषय में डाक्ट्रेट करने का प्रयास विफल होने के बाद उन्होने कई साल मुम्बई में The Economic Times और अन्य अँग्रेजी दैनिकों के news desk पर काम किया। उन्होने “अमर चित्र कथा” में ऐतिहासिक विषयों पर scripts लिखे. इतिहास और पुरातत्त्वशास्त्र पर आधारित उनके लेख प्रकाशित होते रहे हैं। 2017 में उनकी पुरातत्त्व सम्बन्धित पुस्तक ArchaeoGiri : A Bridge Between the Archaeologist and the Common Man दिल्ली के कावेरी बुक्स द्वारा प्रकाशित हो चुकी है। वर्तमान में शुभा खाण्डेकर कल्याण, महाराष्ट्र में रहती हैं और भ्रमण के लिए पुरातत्त्वीय स्थल या हिमालय की ओर निकल जाती हैं। बाकी समय पढ़ती हैं, लिखती हैं, कार्टून्स बनाती हैं और हाथ की कढाई करती हैं, लेकिन यह सब करते समय संगीत निरन्तर सुनती रहती हैं। “स्वरगोष्ठी” की पहेली प्रतियोगिता में शुभा जी ने 368वें अंक की पहेली से भाग लेना आरम्भ किया था। अपनी प्रतिभा और संगीत-ज्ञान के बल पर उन्होने वर्ष के अन्त तक 58 अंक अर्जित कर चौथी महाविजेता बनने का गौरव प्राप्त किया। आज के इस अंक के माध्यम से उन्हें महाविजेता के रूप में सम्मानित करते हुए हमें अपार हर्ष हो रहा है। आज के इस अंक में अपनी अभिरुचि का संगीत सुनाने के लिए शुभा खाण्डेकर जी ने आशा भोसले का गाया हुआ एक मराठी अभंग (भजन) भेजा है, जिसकी असीम मिठास और भक्तिभाव उन्हें हमेशा संवेदनशील बना देती है। यह अभंग सन्त जनाबाई (13वीं शताब्दी) की रचना है।

मराठी अभंग : “येग येग विठाबाई...” : स्वर - आशा भोसले : प्रेषक - शुभा खाण्डेकर



“स्वरगोष्ठी” के अन्तर्गत आयोजित वर्ष 2018 की पहेली प्रतियोगिता में 66 अंक प्राप्त कर तृतीय महाविजेता का सम्मान प्राप्त करने वाली प्रतिभागी हैं, मेरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया। पहले विजया जी पेंसिलवेनिया, अमेरिका में निवास करती थीं। संगीत की साधना में पूर्ण समर्पित विजया जी ने लखनऊ स्थित भातखण्डे संगीत महाविद्यालय (वर्तमान में विश्वविद्यालय) से संगीत विशारद की उपाधि प्राप्त की है। बचपन में ही उनकी प्रतिभा को पहचान कर उनके पिता, विख्यात रुद्रवीणा वादक और वीणा मन्दिर के प्राचार्य श्री पी.डी. शाह ने कई तंत्र और सुषिर वाद्यों के साथ-साथ कण्ठ संगीत की शिक्षा भी प्रदान की। श्री शाह की संगीत परम्परा को उनकी सबसे बड़ी सुपुत्री विजया जी ने आगे बढ़ाया। आगे चलकर विजया जी को अनेक संगीत गुरुओं से मार्गदर्शन मिला, जिनमें आगरा घराने के उस्ताद खादिम हुसेन खाँ की शिष्या सुश्री मिनी कापड़िया, पण्डित लक्ष्मण प्रसाद जयपुरवाले, सुश्री मीनाक्षी मुद्बिद्री और सुविख्यात गायिका श्रीमती शोभा गुर्टू प्रमुख नाम हैं। विजया जी संगीत साधना के साथ-साथ ‘क्रियायोग’ जैसी आध्यात्मिक साधना में भी संलग्न रहती हैं। उन्होने अपने गायन का प्रदर्शन मुम्बई, लन्दन, सैन फ्रांसिस्को, साउथ केरोलिना, न्यूजर्सी, और पेंसिलवानिया में किया है। विजया जी पेंसिलवानिया के अपने स्वयं के संगीत विद्यालय में हर आयु के विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा प्रदान कर रही थीं। वर्तमान में मेरीलैंड में रह कर संगीत-सेवा कर रही हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ पहेली की महाविजेता के रूप में अब हम आपको विजया जी के स्वर में राग भीमपलासी के स्वर में पिरोया गोस्वामी तुलसीदास का एक भक्तिपद सुनवा रहे हैं। यह पद ग्वालियर घराने के संगीतज्ञ प्रायः प्रस्तुत करते हैं। लीजिए, राग भीमपलासी के स्वरों में भजन सुनिए और विजया जी को महाविजेता बनने पर बधाई दीजिए।

भजन राग भीमपलासी : “कहाँ के पथिक कहाँ किन्हों है गमनवा...” : विजया राजकोटिया



डॉ.किरीट छाया
वोरहीज, न्यूजर्सी के डॉ. किरीट छाया ने वर्ष 2018 की संगीत पहेली में 92 अंक अर्जित कर द्वितीय स्थान प्राप्त किया है। किरीट जी पेशे से चिकित्सक हैं और 1971 से अमेरिका में निवास कर रहे हैं। मुम्बई से चिकित्सा विज्ञान से एम.डी. करने के बाद आप सपत्नीक अमेरिका चले गए। बचपन से ही किरीट जी के कानों में संगीत के स्वर स्पर्श करने लगे थे। उनकी बाल्यावस्था और शिक्षा-दीक्षा, संगीत-प्रेमी और पारखी मामा-मामी के संरक्षण में बीता। बचपन से ही सुने गए भारतीय शास्त्रीय संगीत के स्वरो के प्रभाव के कारण किरीट जी का संगीत के प्रति अनुराग निरन्तर बना रहा। किरीट जी न तो स्वयं गाते हैं और न बजाते हैं, परन्तु संगीत सुनने के दीवाने हैं। वह इसे अपना सौभाग्य मानते हैं कि उनकी पत्नी को भी संगीत के प्रति लगाव है। नब्बे के दशक के मध्य में किरीट जी ने अमेरिका में रह रहे कुछ संगीत-प्रेमी परिवारों के सहयोग से “रागिनी म्यूजिक सर्कल” नामक संगीत संस्था का गठन किया है। इस संस्था की ओर से समय-समय पर संगीत अनुष्ठानों और संगोष्ठियों का आयोजन किया जाता है। अब तक उस्ताद विलायत खाँ, उस्ताद अमजद अली खाँ, पण्डित अजय चक्रवर्ती, पण्डित मणिलाल नाग, पण्डित बुद्धादित्य मुखर्जी आदि की संगीत सभाओं का आयोजन यह संस्था कर चुकी है। दो वर्ष पूर्व विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती की संगीत सभा का फिलेडेल्फिया नामक स्थान पर सफलतापूर्वक आयोजन किया गया था। किरीट जी गैस्ट्रोएंट्रोंलोजी चिकित्सक के रूप में विगत 40 वर्षों तक लोगों की सेवा करने के बाद जुलाई, 2014 में सेवानिवृत्त हुए हैं। सेवानिवृत्ति के बाद किरीट जी अब अपना अधिकांश समय शास्त्रीय संगीत और अपनी अन्य अभिरुचि, फोटोग्राफी और 1950 से 1970 के बीच के शास्त्रीय संगीत और हिन्दी फिल्म संगीत को दे रहे हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ मंच से डॉ. किरीट छाया का सम्पर्क हमारी एक अन्य नियमित प्रतिभागी विजया राजकोटिया के माध्यम से हुआ है। किरीट जी हमारे नियमित सहभागी हैं और अपने संगीत-प्रेम और स्वरों की समझ के बल पर वर्ष 2018 की संगीत पहेली में दूसरे महाविजेता बने हैं। रेडियो प्लेबैक इण्डिया परिवार उन्हें यह महाविजेता का सम्मान सादर समर्पित करता है। हमारी परम्परा है कि हम जिन्हें सम्मानित करते हैं स्वयं उनका अथवा उनकी पसन्द का संगीत सुनवाते हैं। लीजिए, प्रस्तुत है, डॉ. किरीट छाया की पसन्द का एक वीडियो। यू-ट्यूब के सौजन्य से प्रस्तुत इस वीडियो के माध्यम से हम आपको पण्डित निखिल बनर्जी का सितार पर बजाया राग सोहनी सुनवा रहे हैं।

राग सोहनी : सितार वादन : पण्डित निखिल बनर्जी : प्रेषक – डॉ. किरीट छाया




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 401 और 402वें अंक में हम वर्ष 2018 की संगीत पहेली के महाविजेताओं को उन्हीं की प्रस्तुतियों के माध्यम से सम्मानित कर रहे हैं, अतः इस अंक में हम आपको कोई संगीत पहेली नहीं दे रहे हैं। अगले अंक में हम पुनः एक नई पहेली के साथ उपस्थित होंगे।

इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 399वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1961 में प्रदर्शित फिल्म “स्त्री” से एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – बसन्त, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – दादरा तथा तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- स्वर – आशा भोसले, महेन्द्र कपूर और साथी

वर्ष 2018 की इस अन्तिम पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; फीनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडिया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, मेरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज का यह अंक नववर्ष 2019 का पहला अंक था। इस अंक में हमने आपको संगीत पहेली के दूसरे महाविजेता डॉ. किरीट छाया, तीसरी महाविजेता विजया राजकोटिया और चौथी महाविजेता शुभा खाण्डेकर से परिचित कराया और उनकी रचनाएँ भी प्रस्तुत की। अगले अंक में हम आपका परिचय पहेली के प्रथम और द्वितीय स्थान के महाविजेताओं से कराएँगे। वर्ष 2018 की प्रस्तुतियों को हमारे अनेकानेक पाठकों ने पसन्द किया है। हम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 7 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


मंगलवार, 1 जनवरी 2019

रील बनाम रीयल (मिन्नी मिश्रा)

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने शीतल माहेश्वरी के स्वर में राशि सिंह की लघुकथा "पॉकेटमनी" का वाचन सुना था।

आज प्रस्तुत है मिन्नी मिश्रा की लघुकथा रील बनाम रीयल, जिसे स्वर दिया है पूजा अनिल ने।

प्रस्तुत लघुकथा "रील बनाम रीयल" का गद्य कला और साहित्य के द्वैभाषिक मासिक सेतु के दिसम्बर 2018 अंक में उपलब्ध है। इसका कुल प्रसारण समय 4 मिनट 19 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिकों, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं आदि को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।


विधा: लघुकथा;
शिक्षा: स्नातकोत्तर (हिंदी);
निवास: पटना (बिहार)
~ मिन्नी मिश्रा

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी


“अभी नहीं रोहित, जल्दी घर पहुँचना है।” अपना हाथ खींचते हुए मैं बोली।(मिन्नी मिश्रा की लघुकथा 'रील बनाम रीयल' से एक अंश)


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रील बनाम रीयल MP3

#First Story, Reel Banaam Real; Minni Mishra; Hindi Audio Book/2019/01. Voice: Pooja Anil

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