रविवार, 27 मई 2018

राग भैरवी और मालकौंस : SWARGOSHTHI – 371 : RAG BHAIRAVI & MALKAUNS





स्वरगोष्ठी – 371 में आज

दस थाट, बीस राग और बीस गीत – 10 : भैरवी थाट

पं. भीमसेन जोशी से राग भैरवी में खयाल और पं. राजन मिश्र से फिल्म संगीत की रचना सुनिए




पण्डित भीमसेन जोशी
पण्डित राजन मिश्र
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘दस थाट, बीस राग और बीस गीत’ की दसवीं और समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रचलन लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। दस थाटों की आधुनिक प्रणाली का सूत्रपात भातखण्डे जी ने ही किया था। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से दसवाँ थाट भैरवी है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे भैरवी थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग भैरवी में निबद्ध पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में दो खयाल रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। साथ ही भैरवी थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत राग मालकौंस के स्वरों में निबद्ध एक फिल्मी गीत का उदाहरण पण्डित राजन मिश्र की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे।



श्रृंखला की पिछली नौ कड़ियों में हमने संगीत के नौ थाटों और उनके आश्रय रागों का परिचय प्राप्त किया। आज हम ‘भैरवी’ थाट और राग के बारे में चर्चा करेंगे। परन्तु इससे पहले आइए, थाट और राग के अन्तर को समझने का प्रयास किया जाए। दरअसल थाट केवल ढाँचा है और राग एक व्यक्तित्व है। थाट-निर्माण के लिए सप्तक के 12 स्वरों में से कोई सात स्वर क्रमानुसार प्रयोग किया जाता है, जब कि राग में पाँच से सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। साथ ही राग की रचना के लिए आरोह, अवरोह, प्रबल, अबल आदि स्वर-नियमों का पालन किया जाता है। आज का थाट है- ‘भैरवी’, जिसमें सा, रे॒, ग॒, म, प, ध॒, नि॒ स्वरों का प्रयोग होता है, अर्थात ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल और मध्यम स्वर शुद्ध। ‘भैरवी’ थाट का आश्रय राग भैरवी नाम से ही पहचाना जाता है। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यूँ तो इसके गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला में है, इसके साथ ही परम्परागत रूप से राग ‘भैरवी’ का गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। राग ‘भैरवी’ को ‘सदा सुहागिन राग’ भी कहा जाता है। इस राग में ठुमरी, दादरा, सुगम संगीत और फिल्म संगीत में राग भैरवी का सर्वाधिक प्रयोग मिलता है। परन्तु आज आपको सुनवाने के लिए हमने राग भैरवी में निबद्ध दो खयाल का चुनाव किया है। इन खयाल के स्वर पण्डित भीमसेन जोशी के हैं।

राग भैरवी : विलम्बित ‘फुलवन गेंद से...’ और द्रुत खयाल- ‘हमसे पिया...’ : पं. भीमसेन जोशी


भैरवी थाट के अन्य कुछ प्रमुख राग हैं- मालकौस, धनाश्री, विलासखानी तोड़ी, भूपाल तोड़ी, सेनावती, हेमवर्द्धिनी आदि। राग मालकौंस, भैरवी थाट का प्रमुख राग है। यह औडव-औडव जाति का राग है, अर्थात आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग किया जाता है। राग मालकौंस में ऋषभ और पंचम स्वरों का प्रयोग नहीं होता। गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। राग के आरोह में नि, सा, , म, , नि, सां और अवरोह में सां, नि, , म, , म, , सा स्वर लगते हैं। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में इस राग का सौन्दर्य खूब निखर उठता है।

अब हम आपको 1985 में प्रदर्शित संगीत-प्रधान फिल्म ‘सुर संगम’ से एक गीत सुनवाते हैं। यह गीत राग मालकौंस के स्वरों में पिरोया गया है। इस गीत का पार्श्वगायन पण्डित राजन मिश्र ने किया है, जबकि परदे पर समर्थ अभिनेता गिरीश कर्नाड ने इस गीत को अभिनीत किया है। फिल्म में उन्होने सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पण्डित शिवशंकर शास्त्री का चरित्र निभाया है। फिल्म ‘सुर संगम’ का कथानक संजीव सोनार का लिखा हुआ था और इसके गीतकार वसन्त देव हैं। संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने फिल्म के लगभग सभी गीत रागों के आधार पर ही तैयार किए थे। इन्हीं गीतों में से राग मालकौंस पर आधारित गीत अब हम आपको सुनवाते हैं। आप तीनताल में निबद्ध यह गीत सुनिए और हमें इस अंक को और श्रृंखला को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग मालकौंस : ‘आए सुर के पंछी आए...’ : पं. राजन मिश्र : फिल्म - सुर संगम



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 371वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक पुरानी फिल्म से रागबद्ध हिन्दी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। “स्वरगोष्ठी” के 180वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस विख्यात गायिका के स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 2 जून, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 373वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 369वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1954 में प्रदर्शित फिल्म “शबाब” के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – मुल्तानी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल - तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर - उस्ताद अमीर खाँ

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, मुम्बई, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, हैदराबाद से  डी. हरिणा माधवी और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की पहेली में पहली बार भाग लेकर विजेता बने है; गोरखपुर, उत्तर प्रदेश से डॉ. पूर्ण प्रकाश पाण्डेय। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। उपरोक्त सभी सात प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “दस थाट, बीस राग और बीस गीत” की दसवीं और समापन कड़ी में आपने भैरवी थाट का परिचय प्राप्त किया और इस थाट के आश्रय राग भैरवी में निबद्ध दो खयाल सुविख्यात गायक पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही भैरवी थाट के जन्य राग मालकौंस पर आधारित फिल्म “सुर संगम” का एक फिल्मी गीत पण्डित राजन मिश्र के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी अगली श्रृंखला में आपको विभिन्न रागों से रोगों के उपचार का तरीका बताया जाएगा। हमारी नई श्रृंखला अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग भैरवी और मालकौंस : SWARGOSHTHI – 371 : RAG BHAIRAVI & MALKAUNS : 27 मई, 2018

शनिवार, 26 मई 2018

चित्रकथा - 70: हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 1)

अंक - 70

हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 1)

"मन डोले मेरा तन डोले..." 




’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के साप्ताहिक स्तंभ ’चित्रकथा’ में आप सभी का स्वागत है। भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन शुरू से ही एक आकर्षक शैली (genre) रही है। सांपों को आधार बना कर लगभग सभी भारतीय भाषाओं में फ़िल्में बनी हैं। सिर्फ़ भारतीय ही क्यों, विदेशों में भी सांपों पर बनने वाली फ़िल्मों की संख्या कम नहीं है। जहाँ एक तरफ़ सांपों पर बनने वाली विदेशी फ़िल्मों को हॉरर श्रेणी में डाल दिया गया है, वहीं भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन को कभी पौराणिक कहानियों के रूप में, कभी सस्पेन्स युक्त नाटकीय शैली में, तो कभी नागिन के बदले की भावना वाली कहानियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिन्हें जनता ने ख़ूब पसन्द किया। हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास के पहले दौर से ही इस शैली की शुरुआत हो गई थी। तब से लेकर पिछले दशक तक लगातार नाग-नागिन पर फ़िल्में बनती चली आई हैं। आइए आज ’चित्रकथा’ में नज़र डालें उन हिन्दी फ़िल्मों पर जिनमें है नाग-नागिन के चरित्र, उनकी प्रेमकथाएँ, जिनमें है शैतान सपेरों द्वारा सांपों पर अत्याचार, और जिनमें है नागिन का इन्तक़ाम।




1931 में ’आलम आरा’ से बोलती फ़िल्मों की शुरुआत के दो साल के अन्दर 1933 में जहाँ आरा कज्जन और पेशेन्स कूपर अभिनीत फ़िल्म आई थी ’ज़हरी सांप’। फ़िल्म की कहानी उपलब्ध ना होने की वजह से ठीक-ठीक बता पाना मुश्किल है कि क्या वाक़ई इस फ़िल्म में सांप दिखाए गए थे या फिर यह बस सांकेतिक शीर्षक है फ़िल्म के किसी चरित्र के लिए! अगर यह मान लें कि यह सांप की कहानी है, तो यह हिन्दी फ़िल्म इतिहास की पहली फ़िल्म होगी इस शैली की। फ़िल्म के संगीतकार बृजलाल वर्मा और गीतकार पंडित नारायण प्रसाद ’बेताब’ ने गीत रचे और जहाँ आरा कज्जन की आवाज़ में ये तमाम गीत फ़िल्म में सुनाई दिए। हालांकि इस फ़िल्म में दस से भी अधिक गीत थे, लेकिन किसी भी गीत में सांप या उससे मिलता-जुलता कोई संदर्भ नहीं मिला। फ़िल्म इतिहास के उस पहले दौर में स्पेशल इफ़ेक्ट्स के तकनीक विकसीत नहीं हुए थे कि सांपों के दृश्य नाटकीयता के साथ दिखाए जा सके। शायद इसी वजह से किसी भी फ़िल्मकार ने इस शैली पर फ़िल्म बनाने का प्रयास नहीं किया। ’ज़हरी सांप’ बनने के दस साल बाद, 1943 में ’विष कन्या’ नामक फ़िल्म आई। फ़िल्म की शीर्षक भूमिका में थीं साधना बोस, साथ में थे पृथ्वीराज कपूर और लीला मिश्र मुख्य भूमिकाओं में। हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार विष कन्या उस लड़की को कहा जाता है जिसके ख़ून में ज़हर हो, जिस वजह से उस देश का राजा उसका इस्तमाल दुश्मनों को ख़त्म करने के लिए करते थे। विष कन्याओं का उल्लेख चाणक्य के ’अर्थशास्त्र’ में मिलता है। यह चन्द्रगुप्त मौर्य के समय काल की बात है (ईसा पूर्व 340-293)। ख़ैर, ’विष कन्या’ फ़िल्म के संगीतकार थे खेमचन्द प्रकाश और गीत लिखे किदार शर्मा ने। इस फ़िल्म में भी दस से अधिक गीत थे, बस एक गीत में "नाग" का उल्लेख मिला - "मतवाले नैना नाग रे..."। 40 के ही दशक में फ़िल्म ’नागन’ का निर्माण शुरू तो हुआ था, लेकिन फ़िल्म अन्त तक बन कर प्रदर्शित नहीं हो सकी। कुछ सूत्रों में इस फ़िल्म को 1950 की फ़िल्म मानी जाती है, लेकिन हक़ीक़त यही है कि यह एक अप्रदर्शित फ़िल्म है। इस फ़िल्म के लिए सुरेन्द्रनाथ और गीता रॉय के गाए कुछ गीत रिकॉर्ड भी हुए थे। फ़िल्म के संगीतकार के रूप में कहीं हुस्नलाल-भगतराम का नाम दिया हुआ है तो कहीं पर पंडित अमरनाथ (हुस्नलाल-भगतराम के बड़े भाई) और हरबंसलाल का। पचास के दशक में 1951 में दलसुख पंचोली ने बनाई फ़िल्म ’नगीना’। मुक्ता के चरित्र में फ़िल्म की नायिका थीं नूतन। फ़िल्म की कथानक कुछ इस तरह की है कि फ़िल्म का नायक नासिर ख़ान अपने पिता के सर से झूठा इलज़ाम हटाने के लिए सबूत इकट्ठा करने के एक पुरानी हवेली/ खंडहर में जाते हैं जहाँ उनकी मुलाक़ात एक रहस्यमयी लड़की (नूतन) से होती है। इस बात पर ध्यान दें कि इस फ़िल्म में नूतन कोई इच्छाधारी नागिन के चरित्र में नहीं है, और ना ही इसमें किसी सपेरा द्वारा किसी नागिन से नगीना या नागमणि छीनने का कोई दृश्य है। बल्कि कहानी के रहस्य को और भी अधिक घनीभूत करने के लिए नागमणि अंगूठी का एक पक्ष रखा गया है। शंकर-जयकिशन, शैलेन्द्र और हसरत के रचे गीत लता, सी. एच. आत्मा, रफ़ी और शमशाद बेगम ने गाए। सी. एच. आत्मा का गाया "रो‍ऊँ मैं सागर किनारे, सागर हंसी उड़ाए" अपने ज़माने का सुपरहिट गीत रहा है। इस तरह से इन सभी शुरुआती फ़िल्मों की कहानियों में अप्रत्यक्ष रूप से सांप या सांप संबंधित पक्ष होते हुए भी ये दरसल नाग-नागिन शैली की फ़िल्में नहीं हैं।

जिस फ़िल्म से नाग-नागिन की परम्परा हिन्दी फ़िल्मों में शुरू हुई, वह थी 1953 की फ़िल्म ’नाग पंचमी’। उन दिनों अभिनेत्री निरुपा रॉय पौराणिक फ़िल्मों में अग्रणी नायिकाओं में थीं। विनोद देसाई निर्मित व रमण देसाई निर्देशित इस फ़िल्म में नायक थे मन्हर देसाई। अपनी तरह की पहली फ़िल्म होने की वजह से यह फ़िल्म ख़ूब चली और एक सफल फ़िल्म रही उस वर्ष की। पौराणिक फ़िल्मों में काम करने वाले कलाकार टाइपकास्ट कर दिए जाते थे, जिन्हें सामाजिक फ़िल्मों में मौके नहीं मिल पाते थे आसानी से। इस फ़िल्म के संगीतकार चित्रगुप्त और गीतकार गोपला सिंह नेपाली के साथ भी यही हुआ। फ़िल्म के अधिकांश गीत आशा भोसले ने गाए जिनमें एक गीत था "ओ नाग कहीं जा बसियो रे, मेरे पिया को ना डसियो रे..."। निरुपा रॉय पर फ़िल्माया यह गीत फ़िल्म का लोकप्रिय गीत रहा। और फिर 1954 में एक ऐसी फ़िल्म आई जिसने चारों तरफ़ धूम मचा दी। यह थी ’फ़िल्मिस्तान’ की धमाकेदार फ़िल्म ’नागिन’। नन्दलाल जसवन्तलाल के निर्देशन में वैजयन्तीमाला - प्रदीप कुमार अभिनीत यह आंशिक रूप से रंगीन फ़िल्म एक ब्लॉकबस्टर सिद्ध हुई। फ़िल्म के गीतों ने भी ख़ूब धूम मचाई। हेमन्त कुमार के संगीत में, राजेन्द्र कृष्ण का लिखा और लता का गाया "मन डोले मेरा तन डोले" गीत उस वर्ष ’गीत माला’ का वार्षिक गीत बना। इस फ़िल्म के लिए बीन की धुन कल्याणजी वीरजी शाह और रवि ने तैयार की - कल्याणजी अपने ही बनाए साज़ केवियोलिन पर और रवि हारमोनियम पर। बिना असली बीन का इस्तमाल किए इतनी अच्छी बीन की धुन इससे पहले फ़िल्म संगीत में सुनाई नहीं दी थी। ’नागिन’ फ़िल्म की यह बीन-संगीत इतना मशहूर रहा है कि समय समय पर इसका प्रयोग होता चला आया है। ’नागिन’ की कहानी दो आदिवासी जनजातियों की आपस में तकरार की कहानी है। नागी जनजाति के सरदार की बेटी है माला (वैजयन्तीमाला) और रागी जनजाति के सरदार का बेटा है सनातन (प्रदीप कुमार)। नागी सरदार सनातन को मार डालना चाहता है अपनी पुरानी दुश्मनी का बदला लेने के लिए। उधर माला ग़लती से नागा इलाके में घुस आती है बीन की धुन से आकृष्ट होकर। बीन वादक सनातन से उसकी मुलाक़ात होती है और प्रेमपुष्प खिलते हैं। उस वर्ष की सफलतम फ़िल्मों में से एक ’नागिन’ एक ट्रेन्डसेतर फ़िल्म सिद्ध हुई जिसने फ़िल्मी कहानी की इस नई शैली का द्वार खोल दिया। आगे चल कर इस तरह के कबीलों की आपस की लड़ाई के बीच नायक-नायिका के प्रेम कहानियों पर बहुत सी फ़िल्में बनीं। नागिन का फ़ॉरमुला इतना पसन्द किया गया कि 1956 से 1958 के तीन सालों में कम से कम 6 फ़िल्में और बनीं। ’नाग पंचमी’ फ़िल्म की सफलता को देखते हुए बाबूभाई मिस्त्री ने फिर एक बार निरुपा रॉय और मन्हर देसाई (और साथ में महिपाल) को लेकर 1956 में पौराणिक कथा आधारित ’सती नागकन्या’ फ़िल्म का निर्माण किया। चित्रगुप्त की जगह इस बार संगीतकार बने एक और पौराणिके-ऐतिहासिक फ़िल्म संगीतकार एस. एन. त्रिपाठी। गोपाल सिंह नेपाली के साथ साथ बी. डी. मिश्र और सरस्वती कुमार दीपक ने भी कुछ गीत लिखे। ’नाग पंचमी’ की ही तरह इस फ़िल्म के अधिकांश गीत आशा भोसले ने गाए और कुछ गीतों में रफ़ी और गीता दत्त की आवाज़ें थीं। सती नागकन्या की कहानी रामायण से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथा के अनुसार एक सर्प-राजकुमारी लंकाधिपति रावण के पुत्र इन्द्रजीत मेघनाद से विवाह करती है, जो मेघनाद से अपने नाग पति की हत्या का बदला लेने आई है। मेघनाद के रथ के पहिये के नीचे कूचल कर उसके पति की मृत्यु हुई थी। इसी शीर्षक से 1983 में भी एक फ़िल्म बनी थी जिसकी भी यही कहानी है। साथ ही इस फ़िल्म में भगवान विष्णु, लक्ष्मी और शेष नाग का क्रम से राम, सीता और लक्ष्मण के रूप में पुनर्जनम की कथा भी शामिल है। फ़िल्म में जयश्री गडकर, अनीता गुहा, सुलोचना, मन्हर देसाई, अंजना मुमताज़ आदि ने मुख्य भूमिकाएँ निभाईं। 1956 और 1983 की ’सती नागकन्या’ फ़िल्मों में एक समानता यह है कि दोनों फ़िल्मों में मन्हर देसाई नज़र आए, 1983 वाले में रावण की भूमिका में।

1957 में नाग-नागिन की फ़िल्मों ने रफ़्तार पकड़ ली और कुल चार फ़िल्में इस वर्ष बनीं - ’नाग लोक’, ’नाग मणि’, ’नाग पद्मिनी’ और ’शेष नाग’। ’नाग मणि’ और ’शेष नाग’ शीर्षक से 90 के दशक में भी फ़िल्में बनी हैं। ’सती नाग कन्या’ की सफलता के बाद बाबूभाई मिस्त्री फिर एक बार निरुपा रॉय को लेकर बनाई ’नाग लोक’। साथ में थे शाहु मोडक, अजीत और कृषन कुमारी। फ़िल्म के संगीतकार थे रामलाल हीरापन्ना तथा गीत लिखे भरत व्यास, गोपाल सिंह नेपाली, सरस्वती कुमार दीपक, पी. एल. संतोषी और इंदीवर ने। यह फ़िल्म भगवान शिव की पौराणिक कथाओं की फ़िल्म है, इसलिए कुछ गीत शिव भजन भी हैं जैसे कि "हे शिवशंकर हे प्रलयंकर..." (लता), "शंकर भोले भाले..." (आशा-रफ़ी), "सोलह सोमवार जिस घर में जलते सोलह दीप..." और "सोमवार के व्रत का..."। ’नाग मणि’ रमण बी. देसाई की फ़िल्म थी जिसमें निरुपा रॉय त्रिलोक कपूर, मन्हर देसाई, हेलेन मुख्य कलाकारों में थे। निरुपा रॉय और त्रिलोक कपूर की जोड़ी पौराणिक फ़िल्मों की हिट जोड़ी मानी जाती है और दोनों ने शिव-पार्वती की जोड़ी को परदे पर कई फ़िल्मों में साकार किया है। ’नाग मणि’ के संगीतकार थे अविनाश व्यास और गीतकार थे कवि प्रदीप। आशा भोसले और मन्ना डे की आवाज़ों में "ये है पाताल की दुनिया नागों..." फ़िल्म का एकमात्र गीत है नागों को समर्पित। शकीला - महिपाल के अभिनय से सजी लेखराज भाकरी निर्देशित फ़िल्म ’नाग पद्मिनी’ मुल्क राज भाकरी निर्मित फ़िल्म थी। पौराणिक फ़िल्मों में उन दिनों बड़े संगीतकार संगीत देने से कतराते थे टाइपकास्ट हो जाने के डर से। इस वजह से पौराणिक और ऐतिहासिक फ़िल्मों में संगीत देने वाले संगीतकारों की एक अलग श्रेणी ही बन गई थी। इस फ़िल्म में संगीत था सनमुख बाबू का और गाने लिखे प्रेम धवन ने। गीता दत्त और कृष्णा गोयल की आवाज़ों में "सपेरा बीन बजाये गयो, नागन को मस्त बनाये गयो, मैं तो बैठी हूँ दिल को हार, तीर तोरे नयनन का लागा जिगरवा के पार..." एक सुन्दर रचना है जिसमें बीन संगीत के सुन्दर टुकड़े रखे गए हैं। चतुर्भुज दोशी निर्देशित ’शेष नाग’ में शाहु मोडक और सुलोचना मुख्य कलाकारों में थे और त्रिलोक कपूर - निरुपा रॉय की जोड़ी फिर एक बार शंकर-पार्वती के रूप में प्रकट हुए। भरत व्यास के लिखे गीतों को अविनाश व्यास ने स्वरबद्ध किया, तथा सुधा मल्होत्रा और सुलोचना ने गीतों में आवाज़ें दीं। 1958 में विनोद देसाई निर्देशित फ़िल्म आई ’नाग चम्पा’ जिसमें मन्हर देसाई, ललिता पवार और निरुपा रॉय मुख्य कलाकारों में थे। फ़िल्म के गीत-संगीत की ख़ास बात यह थी कि इसके संगीतकार थे मन्ना डे। लेकिन ताज्जुब की बात यह थी कि मन्ना डे ने अपनी आवाज़ में कोई भी गीत नहीं गाया और सभी गीत लता या आशा की आवाज़ में थे। लता की आवाज़ में "नागन बिछड़े नाग से..." फ़िल्म की एक सुन्दर रचना है। 1976 में ’नाग चम्पा’ शीर्षक से दोबारा एक फ़िल्म बनी, निर्माता थे महेन्द्र पटेल ने। एस. एन. त्रिपाठी ना केवल इस फ़िल्म के संगीतकार थे, बल्कि फ़िल्म का निर्देशन भी उन्होंने ही किया और एक चरित्र का अभिनय भी किया। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे कानन कौशल और शाहि कपूर। भरत व्यास के लिखे "नाग चम्पा हे नटराज बिनती सुनो..." (सुमन कल्याणपुर), "बीन बजा मेरे मस्त सपेरे..." (आशा) और "नाग पंचमी का आया है यह मंगल त्योहार..." (आशा) गीतों में नाग का उल्लेख और वर्णन मिलता है। 50 के दशक में बनने वाली नाग-नागिन के फ़िल्मों की बातें समाप्त करने से पहले 1959 में बनने वाली एक पाकिस्तानी फ़िल्म ’नागिन’ का ज़िक्र ज़रूरी है। ख़लील क़ैसर निर्देशित इस फ़िल्म में नीलो, रतन कुमार, हुस्ना, यूसुफ़ ख़ान आदि नज़र आए। क़तील शिफ़ई के लिखे नग़मों को सफ़दार हुसैन की मौसिक़ी में इक़बाल बानो, ज़ुबेदा ख़ानुम, नहीद नियाज़ी और सलीम रज़ा जैसे गायकों ने आवाज़ दी।

60 के दशक के शुरू में ही आई ’नाचे नागिन बाजे बीन’। कुमकुम, चन्द्रशेखर, हेलेन आदि के अभिनय से सजी इस फ़िल्म में मजरूह सुल्तानपुरी के गीत और चित्रगुप्त का संगीत था। लता, रफ़ी और साथियों की आवाज़ों में फ़िल्म का शीर्षक गीत है, जिसमें लता गाती हैं - "मैं हूँ गोरी नागन देखूंगी रसिया, कैसे आज नहीं बाजे तेरी बीन रे", जिस पर रफ़ी का जवाब है - "किसी परदेसी का छोटा सा जिया, ऐसे नाच के ना हौले हौले छीन रे"। फिर साथियों की आवाज़ में "नाचे रे नागिन बाजे रे बीन" पंक्ति गीत को फ़िल्म का शीर्षक गीत बनाती है। बीन की धुन और नृत्य प्रधान यह सुमधुर गीत लता-रफ़ी के गाए कमचर्चित युगल गीतों में से एक है। फ़िल्म का एक अन्य गीत है सुमन कल्याणपुर और मोहम्मद रफ़ी का गाया हुआ - "गोरी नागन बन के ना चला करो, जादू मारेगा सपेरा कोई आइके, दिल हाथ में लेके चला करो, मैं तो चलूंगी हज़ारों बलखाइके"। लोक धुन आधारित बीन संगीत प्रधान यह नृत्य रचना भी फ़िल्म की एक कर्णप्रिय रचना है। 1962 में शान्तिलाल सोनी निर्देशित फ़िल्म ’नाग देवता’ में अंजलि देवी, महिपाल, शशिकला मुख्य कलाकार थे। एस. एन. त्रिपाठी के संगीत में इस पौराणिक शैली की फ़िल्म में क़मर जलालाबादी ने गीत लिखे (एक गीत प्रकाश मेहरा का लिखा हुआ था)। यह फ़िल्म असफल रही और फ़िल्म के गीत भी नहीं चले। इसी तरह से 1963 की ’नाग मोहिनी’ भी फ़्लॉप रही। इस फ़िल्म में इन्दिरा बंसल, ख़ुर्शीद बावा, विजया चौधरी आदि कलाकार थे। भरत व्यास के गीत और सरदार मलिक का संगीत भी फ़िल्म को बचा नहीं सके। सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में "फनवाले महाराज मेरी रखना तू लाज, गुण गाऊँ मैं आजा आजा तुझे कब से बुलाऊँ मैं" में "फनवाले महाराज" का उल्लेख ही नहीं बल्कि उनका गुणगान भी है कि किस तरह से उनके फन पर पूरी दुनिया टिकी हुई है। भरत व्यास ने बड़ी ख़ूबसूरती से इस गीत में नाग देवता पर लिखा है - "नाग देवता तेरा रूप है जैसे धूप और छाया, किसी ने जोखम पार सहे तो प्यार किसी ने पाया, मैं अनाथ सा फिरूँ भटकता किसी ने ना अपनाया, आज प्राण की भीख माँगने द्वार पे तेरे आया"। 1963 में नाग-नागिन फ़िल्मों की फिर एक बार होड़ सी लग गई थी। इसी साल आई ’सुनहरी नागिन’। बाबूभाई मिस्त्री ने अपने 50 के दशक के फ़ॉरमुले को लगा कर महिपाल और केलेन को मुख्य किरदारों में लेकर यह फ़िल्म बनाई। ख़ास बात यह कि इस बार उन्होंने संगीत का भार सौंपा कल्याणजी-आनन्दजी को। इस वजह से अब तक की फ़िल्मों के गीतों में जो एकरसता आई थी, वो थोड़ी दूर हुई। फ़ारूक़ क़ैसर, इंदीवर, गुल्शन बावरा, वेद पाल और आनन्द बक्शी ने फ़िल्म के गीत लिखे। लता मंगेशकर की आवाज़ में "बीन ना बजाना, ये जादू ना जगाना, के देगा ज़माना" एक सुन्दर रचना है। इस गीत में भी बीन की धुन है; इस बात की याद दिला दूँ कि 1954 की ’नागिन’ की वह प्रसिद्ध बीन संगीत कल्याणजी भाई ने अपने क्लेविओलिन पर बजाया था। हो सकता है कि इस फ़िल्म के तमाम बीन संगीत भी उसी साज़ पर तैयार किए गए हों। 1963 की अगली फ़िल्म ’नाग ज्योति’ के मुख्य कलकारों में फिर एक बार पौराणिक फ़िल्मों के कलाकार शामिल थे, जैसे कि महिपाल, अनीता गुहा, उमा दत्त और इंदिरा। फिर एक बार भरत व्यास और सरदार मलिक की जोड़ी ने गीत-संगीत का पक्ष संभाला। फ़िल्म का एक उल्लेखनीय गीत था आशा भोसले का गाया शिव तांडव स्तोत्र - "जटाटवी–गलज्जल–प्रवाह–पावित–स्थले..."। नाग-नागिन पार्श्व के पौराणिक फ़िल्मों में भगवान शिव का उल्लेख ज़रूर मिलता है और यह फ़िल्म कोई व्यतिक्रम नहीं। इसी साल ’बीन का जादू’ शीर्षक से एक फ़िल्म आई थी जिसमें महिपाल, कुमुद त्रिपाठी, हेलेन आदि कलाकार थे और संगीत के लिए फिर एक बार एस. एन. त्रिपाठी को लिया गया था। बी. डी. मिश्र के लिखे गीतों को आवाज़ दी सुमन कल्याणपुर और महेन्द्र कपूर ने। इस फ़िल्म में भी एक शिव भजन था - "शंभु शंबु शंभु शंभु, हर हर महादेव त्रिपुरारी, जटाजुट धारी..."। इसे सुमन कल्याणपुर ने गाया था। 

1964 में ’पहाड़ी नागिन’ फ़िल्म बनी थी जिसमें इंदिरा, साधना खोटे, आज़ाद आदि कलाकार थे। इक़बाल का संगीत और फ़ारूक़ क़ैसर के गीत। फ़िल्म की कहानी के बारे में जानकारी उपलब्ध ना होने की वजह से यह कह पाना मुश्किल है कि "पहाड़ी नागिन" से वाक़ई किसी नागिन का कोई सम्पर्क है या फ़िल्म की नायिका के लिए ही ऐसे ही यह शीर्षक दिया गया है। 1966 में बलवन्त भट्ट निर्देशित फ़िल्म ’नागिन और सपेरा’ में मास्टर भगवान, शकीला, बेला बोस, मन्हर देसाई जैसे कलाकार थे और संगीत था कमचर्चित संगीतकार हरबंसलाल का। गीत लिखे सत्य पाल वर्मा ने। आशा भोसले की आवाज़ में "तेरी बीन है जादू मेरा..." गीत नागिन और सपेरे के रिश्ते को दर्शाता है। इसी साल शान्तिलाल सोनी निर्देशित फ़िल्म आई ’नाग मन्दिर’। शान्तिलाल सोनी 1962 में ’नाग देवता’ निर्देशित कर चुके थे। जिस तरह से कल्याणजी-आनन्दजी ने 1963 में ’सुनहरी नागिन’ में संगीत दिया था, उसी तरह से ’नाग मन्दिर’ में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने संगीत दिया। असद भोपाली, भरत व्यास और शिव कुमार सरोज ने फ़िल्म के गीत लिखे। उन दिनों लता और रफ़ी के बीच बातचीत बन्द होने की वजह से फ़िल्म का एकमात्र युगल गीत लता ने महेन्द्र कपूर के साथ गाया। यह एक बेहद कर्णप्रिय रचना है "एक मंज़िल एक सफ़र है अब हमारा आपका"। लेकिन फ़िल्म के बॉक्स ऑफ़िस पर असफल रहने की वजह से ये गाने चर्चा में नहीं रहे। इस तरह से साल-दर-साल नाग-नागिन पर बनने वाली फ़िल्मों में नज़र दौड़ाते हुए यह महसूस किया जा सकता है कि जहाँ 50 के दशक में इस शैली की पौराणिक या स्टण्ट फ़िल्में हिट हो जाया करती थीं, वहाँ 60 के दशक में ये फ़िल्में फ़्लॉप होने लगी। दर्शकों की रुचि में बदलाव, बदलता दौर और बदलती पीढ़ी का असर नाग-नागिन के विषय पर बनने वाली पौराणिक और फ़ैन्टसी फ़िल्मों में पड़ने लगी। 

अगले अंक में इस शोधालेख का दूसरा व अंतिम भाग पोस्ट किया जाएगा।

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

रविवार, 20 मई 2018

राग तोड़ी और मुल्तानी : SWARGOSHTHI – 370 : RAG TODI & MULTANI





स्वरगोष्ठी – 370 में आज


दस थाट, बीस राग और बीस गीत – 9 : तोड़ी थाट


विदुषी मालिनी राजुरकर से राग तोड़ी में खयाल और उस्ताद अमीर खाँ से फिल्मी गीत सुनिए




विदुषी मालिनी राजुरकर
उस्ताद अमीर खाँ
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘दस थाट, बीस राग और बीस गीत’ की नौवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रचलन लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। दस थाटों की आधुनिक प्रणाली का सूत्रपात भातखण्डे जी ने ही किया था। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से नौवाँ थाट तोड़ी है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे तोड़ी थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग तोड़ी में निबद्ध खयाल रचना विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। साथ ही तोड़ी थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत जन्य राग मुल्तानी के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।



आज बारी है थाट और राग ‘तोड़ी’ से परिचय प्राप्त करने की। श्रृंखला की अभी तक की कड़ियों में हमने उत्तर भारतीय संगीत में प्रचलित थाट प्रणाली को रेखांकित करने का प्रयास किया है। आज की कड़ी में हम दक्षिण भारतीय संगीत में प्रचलित प्राचीन थाट व्यवस्था पर चर्चा करेंगे। दक्षिण भारतीय संगीत पद्यति के विद्वान पण्डित व्यंकटमखी ने थाटों की संख्या निश्चित करने के लिए गणित को आधार बनाया और पूर्णरूप से गणना कर थाटों की कुल संख्या 72 निर्धारित की। इनमें से उन्होने 19 व्यावहारिक थाटों का चयन किया। व्यंकटमखी की थाट संख्या को दक्षिण भारतीय संगीतज्ञों ने तो अपनाया, किन्तु उत्तर भारत के संगीत पर इसका विशेष प्रभाव नहीं हुआ। उत्तर भारतीय संगीत के विद्वान पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने रागों के वर्गीकरण के लिए 10 थाट प्रणाली को अपनाया और रागों का वर्गीकरण किया, जो आज तक प्रचलित है। थाट का उद्देश्य मात्र राग के शुद्ध और विकृत स्वरों को चिह्नित करना है। चूँकि एक थाट के गठन के लिए सप्तक के सातों स्वरों का होना आवश्यक है, अतः यह भी आवश्यक है कि थाट सम्पूर्ण हो।

आइए आज आपका परिचय ‘तोड़ी’ थाट से कराते हैं। इस थाट में प्रयोग होने वाले स्वर हैं- सा, रे॒, ग॒, म॑, प, ध॒, नि अर्थात ऋषभ, गान्धार और धैवत स्वर कोमल, मध्यम तीव्र तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते है। इस थाट का आश्रय राग ‘तोड़ी’ ही कहलाता है। राग ‘तोड़ी’ एक सम्पूर्ण जाति का राग है, जिसके आरोह में- सा, रे॒, ग॒, म॑प, ध॒, नि, सां स्वरों का तथा अवरोह में- सां, नि, ध॒, प, म॑, ग॒, रे॒, सा स्वरों का प्रयोग होता है। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है तथा राग के गायन-वादन का समय दिन का दूसरा प्रहर माना जाता है। अब हम आपको राग तोड़ी की एक मोहक बन्दिश का रसास्वादन कराते हैं। द्रुत तीनताल में प्रस्तुत इस खयाल रचना के बोल हैं- ‘कान्ह करत मोसे रार ऐ री माई...’। इसे प्रस्तुत कर रहीं हैं, ग्वालियर परम्परा में देश की जानी-मानी गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर। 1941 में जन्मीं मालिनी जी का बचपन राजस्थान के अजमेर में बीता और वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा भी सम्पन्न हुई। आरम्भ से ही दो विषयों- गणित और संगीत, से उन्हें गहरा लगाव था। उन्होने गणित विषय से स्नातक की पढ़ाई की और अजमेर के सावित्री बालिका विद्यालय में तीन वर्षों तक गणित विषय पढ़ाया भी। इसके साथ ही अजमेर के संगीत महाविद्यालय से गायन में निपुण स्तर तक शिक्षा ग्रहण की। सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित गोविन्दराव राजुरकर और उनके भतीजे बसन्तराव राजुरकर से उन्हें गुरु-शिष्य परम्परा में संगीत की शिक्षा प्राप्त हुई। बाद में मालिनी जी ने बसन्तराव जी से विवाह कर लिया। मालिनी जी को देश का सर्वोच्च संगीत-सम्मान, ‘तानसेन सम्मान’ से नवाजा जा चुका है। खयाल के साथ-साथ मालिनी जी टप्पा, सुगम और लोक संगीत के गायन में भी कुशल हैं। लीजिए, मालिनी जी के स्वरों में सुनिए राग तोड़ी की यह बन्दिश।

राग तोड़ी : ‘कान्ह करत मोसे रार...’ : विदुषी मालिनी राजुरकर


तोड़ी थाट के कुछ अन्य प्रमुख राग हैं, मधुवन्ती, मुल्तानी, कोकिलापंचमी, गुर्जरीतोड़ी, हेमवन्ती, रुद्रमंजरी, श्रीवन्ती आदि। राग मुल्तानी, तोड़ी थाट का राग है। इसकी जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर का प्रयोग किया जाता है। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं किया जाता। इस राग में ऋषभ, गान्धार तथा धैवत स्वर कोमल और मध्यम स्वर तीव्र प्रयोग किया जाता है। आज हम आपको राग मुल्तानी में निबद्ध एक फिल्मी गीत सुनवाते है। वर्ष 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘शबाब’ के संगीतकार नौशाद ने सुविख्यात शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ से यह गीत गवाया था। इससे पूर्व वर्ष 1952 में नौशाद ने उस्ताद अमीर खाँ से फिल्म ‘बैजू बावरा’ में दो गीत गवा कर अपने शास्त्रीय संगीत के प्रति अनुराग को सिद्ध किया था। उस्ताद अमीर खाँ जैसे दिग्गज गवैये नौशाद की प्रतिभा के ऐसे कायल हुए कि आगे चल कर जब भी उन्हें नौशाद ने बुलाया, अपनी सहमति और सहयोग प्रदान किया। रागदारी संगीत के प्रति नौशाद की ऐसी अगाध श्रद्धा थी कि इस विषय पर प्रायः फिल्म के निर्माता-निर्देशक के साथ उनकी मीठी नोकझोक भी हो जाती थी। एक साक्षात्कार में नौशाद ने फ़िल्मकार ए.आर. कारदार के हवाले से जिक्र किया भी था कि फिल्म में राग आधारित गीत रखने के सवाल पर कैसे उन्हें चुनौती मिली थी। उस्ताद अमीर खाँ को नौशाद साहब ने दोबारा याद किया, 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘शबाब’ के लिए। इस फिल्म के अन्य गीतों के लिए मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर और हेमन्त कुमार थे, किन्तु उस्ताद अमीर खाँ से उन्होने राग मुल्तानी के स्वरों में मीरा का एक पद- ‘दया कर हे गिरिधर गोपाल...’ गवाया। यह राग दिन के चौथे प्रहर के परिवेश को यथार्थ रूप से अनुभूति कराता है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग मुल्तानी : ‘दया कर हे गिरिधर गोपाल...’ : उस्ताद अमीर खाँ : फिल्म - शबाब


संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 370वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको 1985 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध हिन्दी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस विद्वान गायक के स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 26 मई, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 372वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 368वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1955 में प्रदर्शित फिल्म "झनक झनक पायल बाजे" के एक रागाधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - अड़ाना, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल - तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर - उस्ताद अमीर खाँ और साथी।

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; मुम्बई, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 

अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “दस थाट, बीस राग और बीस गीत” की नौवीं कड़ी में आपने तोड़ी थाट का परिचय प्राप्त किया और इस थाट के आश्रय राग तोड़ी में पिरोया एक खयाल सुविख्यात गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही तोड़ी थाट के जन्य राग मुल्तानी में निबद्ध फिल्म “शबाब” का एक फिल्मी गीत उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी अगली श्रृंखला में आपको विभिन्न रागों से रोगों के उपचार का तरीका बताया जाएगा। हमारी नई श्रृंखला अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

राग तोड़ी और मुल्तानी : SWARGOSHTHI – 370 : RAG TODI & MULTANI : 20 मई, 201

शनिवार, 19 मई 2018

चित्रकथा - 69: स्वर्गीय बालकवि बैरागी की फ़िल्मी रचनाओं में ग्राम्य संस्कृति की सुगंध

अंक - 69

स्वर्गीय बालकवि बैरागी की फ़िल्मी रचनाओं में ग्राम्य संस्कृति की सुगंध

"बन्नी तेरी बिन्दिया की ले लूँ रे बल‍इयाँ..." 



बालकवि बैरागी
(10 फ़रवरी 1931 - 13 मई 2018)


13 मई 2018 को हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, कवि और गीतकार बालकवि बैरागी का 87 वर्ष की आयु में निधन हो जाने से हिन्दी साहित्य के आकाश का एक जगमगाता बुलन्द सितारा अस्त हो गया। 10 फ़रवरी 1931 को मध्यप्रदेश के मंदसौर ज़िले की मनासा तहसील के रामपुर गाँव में जन्में बालकवि बैरागी ने आगे चल कर विक्रम विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया और समय के साथ-साथ एक प्रसिद्ध साहित्यकार व कवि बन कर निखरे। राजनीति में गहन दिलचस्पी की वजह से वो राजनीति में भी सक्रीय रहे और राज्य सभा के सांसद के रूप में भी चुने गए। और इसी रुचि की झलक उनकी लेखि कविताओं में भी मिलती है। कई प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित बालकवि बैरागी मध्यप्रदेश में अर्जुन सिंह सरकार में खाद्यमंत्री भी रहे। बालकवि बैरागी की लिखी कविताओं में ’सूर्य उवाच’, ’हैं करोड़ों सूर्य’, ’दीपनिष्ठा को जगाओ’ जैसी कविताएँ यादगार रहे हैं। ’गीत’, ’दरद दीवानी’, ’दो टूक’, ’भावी रक्षक देश के’, ’आओ बच्चों गाओ बच्चों’ इनकी अन्य महत्वपूर्ण रचनाएं हैं। बालकवि बैरागी का सरल हृदय और हंसमुख व्यवहार आम लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता था। बालकवि बैरागी ने कुछ फ़िल्मों में गीत भी लिखे। जहाँ एक ओर उनकी ग़ैर फ़िल्मी लेखनी में राजनीति की झलक मिलती है, वहीं उनके फ़िल्मी गीतों में ग्रामीण संस्कृति की ख़ुशबू। आइए आज ’चित्रकथा’ में बालकवि बैरागी के लिखे उन फ़िल्मी गीतों की बातें करें जिनसे लोक संस्कृति की भीनी भीनी सुगंध आती है। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है स्वर्गीय बालकवि बैरागी की पुण्य स्मृति को!





फ़िल्म ’गोगोला’ से 1966 में बालकवि बैरागी ने फ़िल्मी गीतलेखन की शुरुआत की थी। उस समय उनकी उम्र 35 वर्ष थी। इस फ़िल्म के बाद 70 के दशक में उन्होंने ’रेशमा और शेरा’, ’वीर छत्रसाल’, ’दो बूंद पानी’, ’क्षितिज’, ’रानी और लालपरी’, ’जादू टोना’ और ’पल दो पल का साथ’ जैसी फ़िल्मों में गीत लिखे। 1985 में उन्होंने फ़िल्म ’अनकही’ में गीत लिख कर अपने फ़िल्मी गीत लेखन के पारी की समाप्ति की घोषणा कर दी। फ़िल्म ’रेशमा और शेरा’ के "तू चंदा मैं चांदनी’ गीत की अपार सफलता के बावजूद उनके लिखे किसी अन्य फ़िल्मी गीत को इस तरह की प्रसिद्धि नहीं मिली। आज हम बात कर रहे हैं बालकवि बैरागी के लिखे उन फ़िल्मी गीतों की जिनमें है ग्रामीण संस्कृति की महक, लोक परम्पराओं की सुगंध। 1966 की स्टण्ट फ़िल्म ’गोगोला’ में रॉय-फ़्रांक का संगीत था। कम बजट की इस फ़िल्म में मीनू पुरुषोत्तम और उषा मंगेशकर का गाया गीत "देखा देखा बलमा प्यारा" उस ज़माने में काफ़ी मशहूर हुआ था। इस तरह का दो गायिकाओं वाला लोक शैली का नृत्य गीत फ़िल्मों में एक लम्बे समय से रहा है। इस गीत में बालकवि बैरागी ने बड़े ही सरल और साधारण शब्दों के प्रयोग से प्यारे बलमा का वर्णन किया है।


"चाँद से गोरा, बेमतवाला
रस का लोभी, मन का काला
चल हट तूने क्या कह डाला"


इस गीत की दो नायिकाओं में एक नायिका नायक की गुणगान करती हुई उसे चाँद से भी गोरा बताती है तो दूसरी नायिका उसे रस का लोभी और मन का काला कहती है। इसी तरह से दूसरे अन्तरे में भी दोनों में मतभेद बना रहता है। इन छोटी-छोटी पर पूरा भाव सुन्दर तरीके से व्यक्त कर देने वाली पंक्तियों की वजह से गीत की सुन्दरता को चार चांद लगा दिया है बैरागी जी ने।


"मैं क्या उसका रूप बखानू
जानू री जानू, सब कुछ जानू
बतियाँ तोरी मैं ना मानू"


इसी फ़िल्म में उषा मंगेशकर और साथियों की आवाज़ों में "मोहे ला दे राजा मछरिया रे" कुछ कुछ लोक शैली में गाए जाने वाले मुजरा गीत की तरह है। इस गीत में "मछरिया" से इशारा समाज के मक्कारों और शैतानों से है जो रिश्वत लेकर भष्टाचार को बढ़ावा देते हैं, समाज को गंदा करते हैं, जो खाने-पीने की चीज़ों में मिलावट करके मासूम लोगों की ज़िन्दगियों के साथ खिलवाड़ करते हैं। एक मस्ती भरे मुजरा शैली के गीत माध्यम से बालकवि बैरागी ने समाज के अंधकार वाले क्षेत्रों पर प्राक्श डालने की कोशिश की है। ऐसे अपराधियों को सज़ा ना देने वाली "कचहरियों" पर लानत है का निशाना साधते हुए "मछरिया" को "कचहरिया" के साथ तुकबन्दी ने गीत को और भी अधिक मज़ेदार बना दिया है।

1971 में ऐतिहासिक फ़िल्म ’वीर छत्रसाल’ में एस. एन. त्रिपाठी का संगीत था। फ़िल्म के पाँच गीतों में एक गीत नीरज ने, एक गीत महाकवि भूषण ने और बाकी के तीन गीत बालकवि बैरागी ने लिखे। इन तीन गीतों में से दो गीत लोक धुन पर आदधारित थे। सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में पहला गीत "हाय बेदर्दी पिया काली रात में तो आ रे" फिर एक बार मुजरा शैली का गीत है, जिसके मुखड़े में ही ’क़सम’ शब्द का दो अलग प्रयोग करते हुए बैरागी जी लिखते हैं - "मोरी क़सम झूठी क़समें ना खा रे"। इसी तरह से पहले अन्तरे की पहली पंक्ति में ’बदली’ का दो बार प्रयोग भी बड़ा आकर्षक है।


"प्रेम में बदली बदली में पानी
पानी के बीच मेरी प्यासी जवानी
अब तो कर ले मेरी मनमानी"


बालकवि बैरागी का चाँद और चाँदनी से ख़ासा लगाव सा लगता है, तभी वो गीत में कैसे भी इनका संदर्भ ले ही आते हैं। ’गोगोला’ के गीत में उन्होंने लिखा था "चाँद सा गोरा, बेमतवाला", और इस गीत में वो लिखते हैं "गोरी गोरी रात गई सौतन को"। यहाँ "गोरी गोरी रात" का शाब्दिक अर्थ चाँदनी रात है, पर भाव मिलन की रात से है।


"गोरी गोरी रात गई सौतन को
समझा दिया था मैंने बालपन को
कैसे समझाऊँ हाय राम जोबन को"


’वीर छत्रसाल’ फ़िल्म में ही सुमन कलयाणपुर का ही गाया एक और गीत है "निंबुआ पे आओ मेरे अम्बुआ पे आओ, आओ रे पखेरु मेरी बगिया में आओ"। बालकवि बैरागी ने फिर एक बार प्रकृति से रूपक उधार लेकर कितनी सुनदरता से एक नारी के मन की आस का वर्णन किया है जब वो लिखते हैं - "ना कोई माली ना रखवारा, फगुना ने कस मस अंग कस डाला"।


"दिन नहीं चैन रात नहीं निंदिया
तुमको पुकारे मेरी भौरी अमरैया
भौरी अमरैया को मत तरसाओ रे
आओ मेरी अम्बिया में चोंच गढ़ाओ"


1971 के वर्ष ही आई थी ’रेशमा और शेरा’ जिसके "तू चंदा मैं चांदनी" ने बालकवि बैरागी को, कुछ समय के लिए ही सही, चर्चित गीतकारों की श्रेणी में ला खड़ा कर दिया। फिर एक बार चाँद और चांदनी के रूपक का प्रयोग कर एक ख़ूबसूरत मांड आधारित रचना का सृजन किया। मांड पर बनने वाली फ़िल्मी रचनाओं में इस रचना का स्थान शीर्ष पर है और इसके बाद फिर कभी किसी फ़िल्म में मांड की इतनी सुन्दर रचना सुनने को नहीं मिली। ’तू ये है तो मैं वो हूँ’ शैली के गीत शुरू से ही बनते चले आए हैं हिन्दी फ़िल्म संगीत में। "तू मेरा चाँद मैं तेरी चाँदनी", "तू सूरज है मेरी तेरी किरण", "तू दीपक है, मैं ज्योति हूँ" आदि गीतों के बीच फ़िल्म ’रेशमा और शेरा’ का यह मांड भीड़ से बिल्कुल अलग सुनाई देता है।


"तू चंदा मैं चांदनी, तू तरुवर मैं शाख रे
तू बादल मैं बिजुरी, तू पंछी मैं पात रे"


राजस्थान के रेगिस्तानों की बंजर तपती धरती और साथ ही नायिका के स्वयमावस्था और पिया मिलन की आस को व्यक्त करने के लिए बैरागी जी कितने सुन्दर शब्दों में लिखते हैं -


"ना सरोवर, ना बावड़ी, ना कोई ठंडी छांव
ना कोयल, ना पपीहरा, ऐसा मेरा गांव रे
कहाँ बुझे तन की तपन, ओ सैयां सिरमोड़
चंद्र-किरन को छोड़ कर, जाए कहाँ चकोर
जाग उठी है सांवरे, मेरी कुँवारी प्यास रे
(पिया) अंगारे भी लगने लगे, आज मुझे मधुमास रे"


गीत के पहले अन्तरे में जहाँ वर्तमान अवस्था का वर्णन है, वहीं दूसरे अन्तरे में कवि नायिका के मन की इच्छा को व्यक्त करते हुए लिखते हैं - 


"तुझे आंचल मैं रखूँगी ओ सांवरे
काली अलकों से बाँधूँगी ये पांव रे
गल बैयाँ वो डालूं की छूटे नहीं
तेरा सपना साजन अब टूटे नहीं
मेंहदी रची हथेलियाँ, मेरे काजर-वारे नैन रे
(पिया) पल पल तुझे पुकारते, हो हो कर बेचैन रे"


और अन्तिम अन्तरे में साजन को सावन का रूपक दिया गया है। जिस तरह से रेगिस्तान की तपती बंजर धरती पर सावन की फुहार किसी अमृत वर्षा से कम नहीं होती, वैसे ही अपने साजन का सान्निध्य पा कर जैसे मन मयूर बन नाचने लगा है। 


"ओ मेरे सावन साजन, ओ मेरे सिंदूर
साजन संग सजनी बनी, मौसम संग मयूर"


फिर से ’चांदनी’ पे वापस आते हुए वो लिखते हैं - 


"चार पहर की चांदनी, मेरे संग बिता
अपने हाथों से पिया मोहे लाल चुनर उढ़ा
केसरिया धरती लगे, अम्बर लालम-लाल रे
अंग लगा कर साहेबा रे, कर दे मुझे निहाल रे"


बैरागी जी के निधन पर फ़िल्म ’रेशमा और शेरा’ के इस गीत के संबंध में विविध भारती के लोकप्रिय उद्‍घोषक यूनुस ख़ान ने अपने फ़ेसबूक पेज पर लिखा है - "रेशमा और शेरा की प्रसिद्ध मांड पर हमेशा गर्व से अनाउन्स किया, गीतकार बालकवि बैरागी"। जयदेव के संगीत में यह गीत इतना लोकप्रिय हुआ कि अगले ही साल जयदेव के संगीत से सजी फ़िल्म ’दो बूंद पानी’ में कैफ़ी आज़मी जैसे गीतकार के होने के बावजूब एक गीत बालकवि बैरागी से लिखवाया गया। दरसल यह फ़िल्म भी राजस्थान की पृष्ठभूमि पर बनी जिसमें पानी की समस्या को दर्शाया गया है। लक्ष्मी शंकर और सखियों की आवाज़ में यह गीत है "बन्नी तेरी बिंदिया की ले लूँ रे बल‍इयाँ..."। जितना सुमधुर जयदेव का संगीत है, उतनी ही सुरीली आवाज़ लक्ष्मी शंकर की, और ग्राम्य भाषा में बालकवि बैरागी के बोलों ने इस गीत को फ़िल्म संगीत के धरोहर का एक अनमोल गीत बना दिया है। फ़िल्म के नायक जब शादी करके अपनी दुल्हन ले आता है, तो नायक की बहन और उसकी सखियाँ किस तरह से नई भाभी का स्वागत करती हैं, कैसे कैसे शब्दों से उसे दुआएँ देती हैं, ये ही सब बातें हैं इस गीत में।


"बन्नी तेरी बिन्दिया की ले लूँ रे बल‍इयाँ
भाभी तेरी बिन्दिया की ले लूँ रे बल‍इयाँ
दियेना सी दमके लाजो की सुरतिया
कर दी उजारी मेरे भैया की रतियाँ
महका दी गोरी तूने ये फुलवारी
देवी मैया दे तुझे लाल हजारी
लछमी सी मेरी रानी
भतीजे की मीठी बानी मांगे रे ननंदिया"


दो अन्तरों वाले इस गीत के पहले अन्तरे में दुआओं में अपनी भाभी को ननंद पुत्रवती होने की दुआ दे रही है तो दूसरे अन्तरे में उसे सौभाग्यवती (सदा सुहागन) और समृद्ध होने का आशिर्वाद दे रही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जब जब लोक धुनों पर आधारित फ़िल्मी गीतों की चर्चा होगी, फ़िल्म ’दू बूंद पानी’ के बालकवि बैरागी के लिखे इस गीत को बड़े सम्मान के साथ लिया जाएगा। ख़्वाजा अहमद अब्बास निर्देशित इस फ़िल्म को यादगार बनाने में इसके अनोखे गीतों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, और इसके लिए जिन कलाकारों को श्रेय जाता है, उनमें एक नाम बैरागी जी का भी है।


"लाली लाली रहे तेरी लाली रे चुनरिया
जोड़वे को लग जाए मेरी रे उमरिया
चांद सूरज हों तेरे पनिहारे
चाकर हों तेरे नौ लख तारे
भैया जी की बगिया से
बन्नी तेरी बगिया से बिछड़े ना छैयां"


1977 में एक फ़िल्म आई थी ’जादू टोना’ जिसमें आशा भोसले के बेटे हेमन्त भोसले संगीतकार थे और उनकी बेटी वर्षा भोसले ने कुछ गीत गाए। बालकवि बैरागी ने इस फ़िल्म में एक ख़ूबसूरत गीत लिखा "ये गाँव प्यारा प्यारा ये लवली लवली गाँव"। इस गीत की ख़ास बात यह है कि यह एक बाल गीत है, जिसमें गाँव की बातें हैं, लेकिन इन बातों को देहाती भाषा में ना कह कर आधुनिक भाषा में कहा गया है और अंग्रेज़ी के "लवली" शब्द को भी बड़ी ख़ूबसूरती से इसमें शामिल किया गया है। बालकवि बैरागी की लिखी बाल कविताएँ बहुत प्रचलित रही हैं। ’शिशुओं के लिए पाँच कविताएँ’ के पाँच खण्ड प्रकाशित हुए हैं। यह गीत भी दरसल एक बाल कविता ही है। यह अफ़सोसजनक बात है कि सिने संगीत जगत में बच्चों के गीत बहुत कम होने के बावजूद इस सुन्दर रचना की तरफ़ ज़्यादा ध्यान किसी का नहीं गया।


"ये गाँव प्यारा प्यारा, ये लवली लवली गाँव
ये हरियाली पीपल की घनी छाँव
राजा बेटा धरती का प्यारा प्यारा गाँव

ये फूल सा जहाँ इसमें आग ही कहाँ
प्यार के सिवा कुछ भी क्यों नहीं यहाँ
क्या हो गया मुझे ये प्यार ये लगाव
अब मेरा ये हो गया है दादी तेरा गाँव

आज़ाद है हवा आकाश है खुला
रंग जिस कदर ये तालाब में बुना
हसीन दादी सा श्रॄंगार ना बना
तेरे ही जैसा है ये दादी तेरा गाँव"


1978 में ’पल दो पल का साथ’ शीर्षक से एक कमचर्चित फ़िल्म आई थी जिसमें श्याम सागर का संगीत था और फ़िल्म के चार गीत चार अलग-अलग गीतकारों के लिखे हुए थे - देव कोहली, नक्श ल्यालपुरी, योगेश और बालकवि बैरागी। बैरागी जी का लिखा आशा भोसले का गाया गीत "सजा ली तेरी बिन्दिया, रचा ली तेरी मेहंदी" लोक शैली का गीत है। मुखड़े की दूसरी पंक्ति में बैरागी जी ने "ये राधा कन्हैया का नाम कैसे ले" के प्रयोग से गीत के स्तर को ऊँचा कर दिया है।


"इधर झांके पर्वत, उधर देखे नदियाँ
ये झरनों के पहरे लगे हैं सांवरे
तू मनचआही सैयां की बैयां थाम कैसे ले
ये राधा कन्हैया का नाम कैसे ले"


1985 में अमोल पालेकर द्वारा निर्मित व निर्देशित फ़िल्म ’अनकही’ आई थी जो काफ़ी चर्चा में रही। अमोल पालेकर, दीप्ति नवल, श्रीराम लागू के अभिनय से सजी इस फ़िल्म का संगीत जयदेव ने तैयार किया व फ़िल्म के चार गीतों में से दो में आशा भोसले की और बाकी दो गीतों में भीमसेन जोशी की आवाज़ें थीं। फ़िल्म के गीतकार के रूप में एक गीत पारम्परिक, एक गीत तुलसीदास रचित, एक गीत कबीरदास की रचना, और एक गीत के गीतकार थे बालकवि बैरागी। बैरागी जी का लिखा भक्ति रस आधारित रचना "मुझको भी राधा बना ले नन्दलाल" एक अत्यन्त सुमधुर व उच्चस्तरीय रचना है जिसे बहुत कम सुना गया है। फ़िल्म की कहानी में कैसे इस राधा-कृष्ण आधारित भक्ति रचना को जगह दी गई होगी, यह तो नहीं पता, लेकिन इसमें कोई संशय नहीं कि इस गीत का इशारा नायिका के मन के भाव से ही संबंधित रहा होगा। सितार के सुन्दर प्रयोग ने भक्ति रस को भी गहरा कर दिया है। शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ लोक शैली का एक अंग है इस गीत में जिसने इसकी मधुरता में चार चाँद लगा दिया है। बालकवि बैरागी के लिखे जितने भी लोक शैली की रचनाओं का अब तक उल्लेख किया गया है, वो सभी ऐसी रचनाएँ हैं जिनमें नारी के मनोभाव का वर्णन है। कभी छोटी बच्ची, कभी प्रेमिका, कभी पत्नी, कभी कोठे की नर्तकी, और कभी ननंद के होठों पर सजे बालकवि बैरागी की ये फ़िल्मी रचनाएँ।


"जसोदा के अंगना में दूंगी गुहारी
तेरी मुरलिया को दूंगी ना गारी
मटकी लुटा दूंगी माखन की सारी
जमुना किनारे रखूंगी सजाके
काया का केसरिया थाल
मुझको भी राधा बना ले नन्दलाल"


बालकवि बैरागी ने केवल नौ हिन्दी फ़िल्मों में गीत लिखे हैं, और इनमें से अधिकतर फ़िल्मों में उन्होंने कम से कम एक गीत हमारी ग्राम्य संस्कृति के पार्श्व पर ज़रूर लिखा है। उनके लिखे हर गीत को सुनते हुए यह महसूस होता है कि वो दूसरे गीतकारों से कितने अलग रहे। उनके लिखे फ़िल्मी गीतों की संख्या अधिक नहीं है, लेकिन उनका हर गीत मास्टरपीस कहलाने लायक है। ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ करता है इस अनोखे गीतकार को सलाम!




आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

रविवार, 13 मई 2018

राग आसावरी और अड़ाना : SWARGOSHTHI – 369 : RAG ASAVARI & ADANA




स्वरगोष्ठी – 369 में आज

दस थाट, बीस राग और बीस गीत – 8 : आसावरी थाट

पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर से राग आसावरी में खयाल और उस्ताद अमीर खाँ से फिल्म संगीत सुनिए




पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर
उस्ताद अमीर खाँ
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘दस थाट, बीस राग और बीस गीत’ की आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रचलन लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। दस थाटों की आधुनिक प्रणाली का सूत्रपात भातखण्डे जी ने ही किया था। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से आठवाँ थाट आसावरी है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे आसावरी थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग आसावरी में निबद्ध खयाल रचना संगीत मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। साथ ही आसावरी थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत जन्य राग अड़ाना के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।



आज हमारी चर्चा का थाट है- ‘आसावरी’। इस थाट के स्वर होते हैं- सा, रे, ग॒, म, प ध॒, नि॒ अर्थात आसावरी थाट में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। आसावरी थाट का आश्रय राग आसावरी ही कहलाता है। राग आसावरी के आरोह में पाँच स्वर और अवरोह में सात स्वरों का उपयोग किया जाता है। अर्थात यह औडव-सम्पूर्ण जाति का राग है। इस राग के आरोह में सा, रे, म, प, सां तथा अवरोह में- सां, नि, , प, म, , रे, सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। अर्थात आरोह में गान्धार और निषाद स्वर वर्जित होता है। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। दिन के दूसरे प्रहर में इस राग का गायन-वादन सार्थक अनुभूति कराता है। परम्परागत रूप से सूर्योदय के बाद गाये-बजाए जाने वाले इस राग में तीन कोमल स्वर, गान्धार, धैवत और निषाद का प्रयोग किया जाता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। अब हम आपके लिए संगीतमार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर का गाया राग आसावरी प्रस्तुत करते हैं। तीनताल में निबद्ध इस बन्दिश में आपको पण्डित बलवन्त राव भट्ट के कण्ठ–स्वर और विदुषी एन. राजम् की वायलिन संगति का आनन्द भी मिलेगा।

राग आसावरी : ‘सजन घर लागे या साडेया...’ : पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर


आसावरी थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ अन्य मुख्य राग हैं- जौनपुरी, देवगान्धार, सिन्धु भैरवी, आभेरी, गान्धारी, देसी, कौशिक कान्हड़ा, दरबारी कान्हड़ा, अड़ाना आदि। आज हम आपको राग अड़ाना में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाएँगे। राग अड़ाना, आसावरी थाट का राग है। यह षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग होता है, जिसमें गान्धार और धैवत कोमल तथा दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध गान्धार और अवरोह में शुद्ध धैवत का प्रयोग वर्जित होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में गाने-बजाने वाले राग अड़ाना का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है।

भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्मों की गणना ‘मील के पत्थर’ के रूप में की जाती है। ऐसी ही एक उल्लेखनीय फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ थी जिसका प्रदर्शन 1955 में हुआ था। इस फिल्म में कथक नृत्य शैली का और राग आधारित गीत-संगीत का कलात्मक उपयोग किया गया था। फिल्म का निर्देशन वी. शान्ताराम ने और संगीत निर्देशन वसन्त देसाई ने किया था। वी. शान्ताराम के फिल्मों की सदैव यह विशेषता रही है कि उसके विषय नैतिक मूल्यों रक्षा करते प्रतीत होते है। साथ ही उनकी फिल्मों में रूढ़ियों का विरोध भी नज़र आता है। फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ में उन्होने भारतीय शास्त्रीय नृत्य और संगीत की महत्ता को रेखांकित किया था। फिल्म को इस लक्ष्य तक ले जाने में संगीतकार वसन्त देसाई का उल्लेखनीय योगदान रहा। जाने-माने कथक नर्तक गोपीकृष्ण फिल्म की प्रमुख भूमिका में थे। इसके अलावा संगीत के ताल पक्ष में निखारने के लिए सुप्रसिद्ध तबलावादक गुदई महाराज (पण्डित सामता प्रसाद) का उल्लेखनीय योगदान था। वसन्त देसाई ने सारंगीनवाज़ पण्डित रामनारायन और संतूरवादक पण्डित शिवकुमार शर्मा का सहयोग भी प्राप्त किया था। संगीतकार वसन्त देसाई की सफलता का दौर फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ से ही आरम्भ हुआ था। वसन्त देसाई की प्रतिभा का सही मूल्यांकन वी. शान्ताराम ने ही किया था। प्रभात कम्पनी में एक साधारण कर्मचारी के रूप में उनकी नियुक्ति हुई थी। यहीं रह कर उन्होने अपनी कलात्मक प्रतिभा का विकास किया था। आगे चलकर वसन्त देसाई, शान्ताराम की फिल्मों के मुख्य संगीतकार बने। शान्ताराम जी ने 1955 में फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ का निर्माण किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई ने इस फिल्म में कई राग आधारित स्तरीय गीतों की रचना की थी। फिल्म का शीर्षक गीत ‘झनक झनक पायल बाजे...’ राग अड़ाना का एक मोहक उदाहरण है। इस गीत को स्वर प्रदान किया, सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ ने। आइए, सुनते हैं, राग अड़ाना पर आधारित यह गीत। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग अड़ाना : ‘झनक झनक पायल बाजे...’ : फिल्म झनक झनक पायल बाजे : उस्ताद अमीर खाँ और साथी



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 367वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक बाँग्ला फिल्म से रागबद्ध हिन्दी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 370वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस उस्ताद गायक के स्वर है।?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 19 मई, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 371वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 367वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको पुरानी बाँग्ला फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग - बागेश्री, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल - मध्यलय तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है - गायक - उस्ताद अमीर खाँ

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “दस थाट, बीस राग और बीस गीत” की आठवीं कड़ी में आपने आसावरी थाट का परिचय प्राप्त किया और इस थाट के आश्रय राग आसावरी में पिरोया एक खयाल सुविख्यात गायक संगीत मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही आसावरी थाट के जन्य राग अड़ाना में निबद्ध फिल्म “झनक झनक पायल बाजे” का एक फिल्मी गीत उस्ताद अमीर खाँ और साथियों के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी अगली श्रृंखला में आपको विभिन्न रागों से शारीरिक और मानसिक रोगों के उपचार का तरीका बताया जाएगा। हमारी नई श्रृंखला अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग आसावरी और अड़ाना : SWARGOSHTHI – 369 : RAG ASAVARI & ADANA : 13 मई, 2018

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