Sunday, June 29, 2014

सुरीली बाँसुरी के पर्याय पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया




स्वरगोष्ठी – 174 में आज

व्यक्तित्व – 4 : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया


‘देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए...’ 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ की चौथी कड़ी में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी लघु श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ के अन्तर्गत हम आपसे संगीत के कुछ असाधारण संगीत-साधकों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं, जिन्होंने मंच, विभिन्न प्रसारण माध्यमों अथवा फिल्म संगीत के क्षेत्र में लीक से हट कर उल्लेखनीय योगदान किया है। हमारी आज की कड़ी के व्यक्तित्व हैं, विश्वविख्यात बाँसुरी वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया, जिन्होने एक साधारण सी दिखने वाली बाँस की बाँसुरी के मोहक सुरों के बल पर पूरे विश्व में भारतीय संगीत की विजय-पताका को फहराया है। चौरसिया जी की बाँसुरी ने शास्त्रीय मंचों पर तो संगीत प्रेमियों को सम्मोहित किया ही है, फिल्म संगीत के प्रति भी उनका लगाव बना रहा। उन्होने सुप्रसिद्ध सन्तूर वादक पण्डित शिवकुमार शर्मा के साथ मिलकर शिव-हरि नाम से कई फिल्मों में संगीत निर्देशन भी किया है। आज के अंक में हम आपके लिए चौरसिया जी द्वारा प्रस्तुत राग हंसध्वनि की एक रचना, बंगाल की एक चर्चित लोक धुन और शिव-हरि के रूप में रचे बेहद सफल फिल्म ‘सिलसिला’ का एक गीत भी प्रस्तुत करेंगे। यह भी उल्लेखनीय है कि इसी सप्ताह 1 जुलाई को पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया अपनी आयु के 77 वर्ष पूर्ण कर 78वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार इस महान संगीत-साधक को जन्मदिवस के उपलक्ष्य में शत-शत मंगलकामनाएँ अर्पित करता है।
 



भारतीय संगीत के अनेक साधकों ने विश्व-संगीत के मंच पर अपने संगीत की उत्कृष्ठता को सिद्ध किया है। इन्हीं में एक नाम बाँसुरी वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया का भी शामिल है। बाँसुरी वादक पण्डित पन्नालाल घोष (1911-1960) ने इस वाद्य को लोकमंच से शास्त्रीय संगीत के मंच पर प्रतिष्ठित करने का जो प्रयास किया था, पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया ने उसे पूर्णता दी। यह भी आश्चर्यजनक है कि ऐसी महान प्रतिभा का जन्म संगीतज्ञ या संगीत-प्रेमी परिवार में नहीं हुआ था। हरिप्रसाद जी का जन्म 1 जुलाई, 1938 को इलाहाबाद के एक ऐसे परिवार में हुआ था, जहाँ सभी सदस्य कुश्ती के शौकीन थे। उनके पिता स्वयं कुशल पहलवान थे और चाहते थे कि उनका पुत्र भी कुश्ती के दाँव-पेंच सीखे। बालक हरिप्रसाद पिता के साथ अखाड़ा जाते तो थे किन्तु उनका मन इस कार्य में कभी नहीं लगा। उनका बाल-मन तो सुरीली ध्वनियों की ओर आकर्षित होता था। ईश्वर ने उन्हें सांगीतिक प्रतिभा प्रतिभा से युक्त कर इस धरा पर भेजा था। कुश्ती के अखाड़े के बजाय उनका मन पड़ोस के संगीत शिक्षक पण्डित राजाराम के पास अधिक लगता था। बालक हरिप्रसाद को पण्डित राजाराम ने संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा दी। इसके बाद वाराणसी के सुविख्यात गुरु पण्डित भोलानाथ जी से बाँसुरी वादन की विधिवत शिक्षा प्राप्त की और 19 वर्ष की आयु के होने तक बाँसुरी-वादन में इतने कुशल हो गए कि उनकी नियुक्ति रेडियो में हो गई। 1957 में उनकी पहली तैनाती ओडिसा स्थित कटक केन्द्र पर बाँसुरी-वादक के रूप में हुई। यहाँ वे लगभग तीन वर्ष तक रहे। इस दौरान उन्होने अनेक संगीतज्ञों को सुना और क्षेत्रीय संगीत का अध्ययन भी किया। आइए, यहाँ थोड़ा विराम लेकर पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया का बजाया राग हंसध्वनि में दो रचनाएँ सुनवाते हैं। राग हंसध्वनि अत्यन्त मधुर राग है, जो उत्तर और दक्षिण, दोनों संगीत पद्यतियों में समान रूप से लोकप्रिय है। इस राग में पण्डित जी द्वारा प्रस्तुत पहली मध्य लय की रचना सितारखानी ताल में और दूसरी द्रुत तीनताल में निबद्ध है।


राग हंसध्वनि : मध्यलय सितारखानी और द्रुतलय तीनताल की रचनाएँ : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया




वर्ष 1960 में हरिप्रसाद जी का स्थानान्तरण रेडियो कटक केन्द्र से मुम्बई केन्द्र पर हो गया। मुम्बई आ जाने के बाद उन्हें अपने संगीत को अभिव्यक्ति देने के लिए और अधिक विस्तृत फ़लक मिल गया और यहाँ आ जाने के बाद संगीत के क्षेत्र में उनकी प्रतिभा को एक नई पहचान मिली। अब उन्हें प्रतिष्ठित संगीत सभाओं में मंच-प्रदर्शन के लिए आमंत्रित किया जाने लगा था। यहीं रहते हुए उनका सम्पर्क मैहर घराने के संस्थापक और सन्त-संगीतज्ञ उस्ताद अलाउद्दीन खाँ की सुपुत्री विदुषी अन्नपूर्णा देवी से हुआ। इनका मार्गदर्शन पाकर हरिप्रसाद जी के वादन में भरपूर निखार आया। उन्होने रागों के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों के लोक-संगीत का भी गहन अध्ययन किया था। आज भी विभिन्न संगीत-समारोहों में अपने बाँसुरी-वादन को विराम देने से पहले वे कोई लोकधुन अवश्य प्रस्तुत करते हैं। आइए, अब हम आपको बाँसुरी पर पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया द्वारा प्रस्तुत बंगाल की अत्यन्त लोकप्रिय भटियाली धुन सुनवाते हैं। पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया द्वारा प्रस्तुत इस भटियाली धुन के साथ तबला संगति पण्डित योगेश समसी ने की है।


भटियाली धुन : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया : तबला संगति – योगेश समसी




बाँस से बनी बाँसुरी सम्भवतः सबसे प्राचीन स्वर-वाद्य है। महाभारत काल से पहले भी बाँसुरी का उल्लेख मिलता है। विष्णु के कृष्णावतार को तो ‘मुरलीधर’, ‘बंशीधर’, ‘वेणु के बजइया’ आदि नामों से सम्बोधित भी किया गया है। श्रीकृष्ण से जुड़ी तमाम पौराणिक कथाएँ बाँसुरी के गुणगान से भरी पड़ी हैं। यह एक ऐसा सुषिर वाद्य है जो लोक, सुगम से लेकर शास्त्रीय मंचों पर भी सुशोभित है। भारतीय संगीत के क्षेत्र में अनेक बाँसुरी के साधक हुए हैं, जिन्होने इस साधारण से दिखने वाले सुषिर वाद्य को असाधारन गरिमा प्रदान की है। वर्तमान में पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया बाँसुरी के ऐसे साधक हैं जिन्होने देश-विदेश में इस वाद्य को प्रतिष्ठित किया है। देश-विदेश के अनेकानेक सम्मान और पुरस्कारों से अलंकृत पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया ने सुप्रसिद्ध संतूर-वादक पण्डित शिवकुमार शर्मा के साथ जोड़ी बना कर वर्ष 1989 से फिल्मों में भी संगीत देना आरम्भ किया। शिव-हरि के नाम से इन दिग्गज संगीतज्ञों ने चाँदनी, विजय, सिलसिला, लम्हे, डर, फासले आदि फिल्मों में अनेक लोकप्रिय गीत दिये हैं। आज के इस अंक में हम आपको पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया और पण्डित शिवकुमार शर्मा के साथ मिल कर बनी संगीतकार जोड़ी द्वारा चर्चित हिन्दी फिल्म ‘सिलसिला’ का बेहद लोकप्रिय गीत- ‘देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए...’ सुनवाते हैं। गीतकार जावेद अख्तर के लिखे इस गीत को लता मंगेशकर और किशोर कुमार ने स्वर दिया है। इस गीत से रेखांकित करने योग्य एक तथ्य यह भी जुड़ा है कि गीत में मध्यम और निषाद स्वर रहित राग भूपाली के स्वर तो मौजूद हैं, किन्तु राग के स्वरों का चलन राग भूपाली अथवा देशकार के अनुसार नहीं है। लीजिए, अब आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


फिल्म – सिलसिला : ‘देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए...’ : लता मंगेशकर और किशोर कुमार : गीतकार – जावेद अख्तर





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 174वें अंक की पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत में एक रागबद्ध खयाल रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 180वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – खयाल का यह अंश सुन कर राग पहचाइए और हमे राग का नाम बताइए।

2 – गीत का यह अंश सुन कर गायक कलाकार को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 176वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 172वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1959 में प्रदर्शित फिल्म ‘चाचा ज़िन्दाबाद’ के एक गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग ललित और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक मन्ना डे और लता मंगेशकर। इस अंक के दोनों प्रश्नों के सही उत्तर पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपसे सुप्रसिद्ध बाँसुरी वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा की। इसके साथ ही हमने शास्त्रीय, लोक और फिल्म संगीत के क्षेत्र में किए गए कार्यों को रेखांकित किया। अगले अंक से हम कुछ ऋतु प्रधान रागों का की चर्चा करेंगे। यह अंक आपको कैसा लगा, हमें अवश्य बताइए। आप भी अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों की प्रतीक्षा करेंगे।
 




एक आवश्यक सूचना

अपने संगीत-प्रेमी पाठकों और श्रोताओ को कुछ नयेपन का अनुभव कराने के लिए ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के कुछ कार्यक्रमों को हम yourlisten के सहयोग से आडियो रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारा यह प्रयोग आपको कैसा लगा? अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव हमें swargoshthi@gmail.com , radioplaybackindia@live.com अथवा cine.paheli@yahoo.com पर अवश्य लिखें। आपके सुझाव के आधार पर हम अपने कार्यक्रमों को और अधिक बेहतर रूप दे सकेंगे।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Saturday, June 28, 2014

संगीतकार शंकर अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए



स्मृतियों के स्वर - 04

संगीतकार शंकर अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकीया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ हमारे इस स्तंभ में, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर, जिसमें हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। दोस्तों, आपको याद होगा 80 के दशक में दूरदर्शन पर एक कार्यक्रम आता था 'फूल खिले हैं गुलशन गुलशन' जिसमें तबस्सुम फ़िल्मी कलाकारों के साक्षात्कार लेती थीं। उसी सीरीज़ में एक बार संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन के शंकर तशरीफ़ लाये थे। आइए आज 'स्मृतियों के स्वर' में उसी साक्षात्कार का एक अंश पढ़े जिसमें शंकर जी बता रहे हैं अपने पृथ्वी थिएटर के दिनों के बारे में, और लता मंगेशकर को 'बरसात' के लिए चुनने के बारे में ...




सूत्र: दूरदर्शन

कार्य्रक्रम: 'फूल खिले हैं गुलशन गु्लशन' - संगीतकार शंकर से तबस्सुम की बातचीत

प्रसारण तिथि: 1986




किसी भी कली को फूल बन कर महकने के लिए किन रास्तों से गुज़रना पड़ता है यह आप अच्छी तरह जानते हैं। हमारे आज के महमान की कला कली से फूल बन कर कैसे महकी यह उन्हीं की ज़ुबानी सुनिये। शंकर जी!

यह बड़ा अच्छा आपने पूछा है, हमारी ज़िन्दगी जो है पृथ्वी थिएटर्स से शुरू हुई है, और आपको मालूम है कि उस थिएटर में बहुत कुछ सीखने को मिला है और बहुत काम करने को भी मिला है, और उसी की बदौलत जो है, हम आज हैं। पृथ्वी थिएटर हमेशा जब टूर पे बाहर जाया करता था, तब कुछ न कुछ हम एक्स्ट्रा काम भी किया करते थे, कैसे काम के बाद किसी भी शहर में कोई गाने बजाने वाले मिल जाते तो मैं उनको पकड़ के ले आता था क्योंकि वहाँ के जितने आर्टिस्ट्स हैं वो थक जाते थे ड्रामा क्ले बाद, तो मुझसे नाराज़ होते थे कि यार ये कहीं न कहीं से कुछ न कुछ करता है, किसी न किसी को पकड़ कर ले आता है। तो मेरी आदत थी गाना, बजाना, सुनना, और उससे कुछ हासिल करना, तो पापाजी को ये बहुत पसन्द था।


पृथ्वीराज जी को?

पृथ्वीराज जी को, क्योंखि वो क्लासिकल वगेरह में बहुत शौक रखते थे। इसी तरीके से हम लोगों के कर टूर पर कहीं न कहीं से ऐसे प्रोग्राम हुआ करते थे।


मैं गु़स्ताख़ी की माफ़ी चाहती हूँ आपने यह नहीं बताया कि आपने पृथ्वी थिएटर्स में शुरुआत कैसे की?

ओ हो हो, जब मैं बम्बई आया, तब मुझे पापाजी, एक देओधर म्युज़िक स्कूल है, वहाँ उनके दर्शन हुए। जब मैंने उनको देखा, ऐसा लगा कि वाक़ई ये इतने ख़ूबसूरत हीरो शायद ही कोई हो सकता है। उनकी ख़ूबसूरती और पर्सोनलिटी जो थी, उसको देख कर ही मैं ख़ामोश हो गया। मैं तो छोटा सा..., तो मैंने उनसे पूछा, मुझे मालूम था कि पापाजी उस वक़्त शकुन्तला ड्रामा शुरू करने वाले थे। तो मैंने उनसे पूछा कि 'पापाजी, आप हमें काम देंगे क्या?' उन्होंने पूछा कि क्या करते हैं? मैंने कहा कि मैं तबला बहुत अच्छी बजाता हूँ और हारमोनियम भी बहुत अच्छा बजाता हूँ। थोड़ा बहुत डान्स भी कर लेता हूँ और स्टेज पर अगर कोई छोटे मोटे डायलोग हों तो वो भी मैं बोल सकता हूँ।


ऑल राउन्डर?

ऑल राउन्डर? तो उनको यह बहुत अच्छी लगी बात, तो उन्होंने दादर में, आपने सुना होगा कि वो म्युज़िक के सिटिंग्स वगेरह वहीं किया करते थे। तो बुलाया वहीं पे एक दिन। साहब, दो रिहर्सल हॉल थे, वहाँ बड़े-बड़े कलाकार बैठे हुए थे। तो उन कलाकारों को देख कर मैं सोच में पड़ गया कि मैं तो कुछ भी नहीं हूँ इन लोगों के सामने। तो फिर मुझसे पूछे कि तबला सुनाओगे क्या? मैंने कहा कि आप इजाज़त दें तो ज़रूर सुनायूंगा। इत्तेफ़ाक़ से अली अकबर साहब भी वहाँ थे, तो अली अकबर साहब के साथ आप बजायेंगे क्या? मैंने बोला कि ठीक है, पहले दो मिनट मैं सोलो बजा लूँ, फिर आपके साथ संगत करूंगा। मैंने दो-चार मिनट जो सोलो बजाया, सारे लोगों ने इतनी पसन्द की, इतनी तालियाँ बजाये ज़ोर ज़ोर से।



और पृथ्वी थिएटर्स में आपके क़दम जम गये?

क़दम जम गये, और वहीं से ज़िन्दगी शुरू होती रही। थिएटर में जाते रहे, तो इत्तेफ़ाक़ से राज साहब ने पिक्चर शुरू किया 'बरसात'। राज साहब हमें गाने बनाकर रखने के लिए कहते थे। ऐसे हमने कई गानें बना लिए थे। जब उन्होंने फिर से कहा गाने बनाने के लिए तो हमने कहा कि आप गाने बनवाते हैं पर कभी लेते तो हैं नहीं। इत्तेफ़ाक़ से हम पूना गये थे थिएटर के साथ, तो रात का वक़्त है, एक धुन है सुनिये और देखिये कैसी लगती है, भैया मत लीजिए पर सुन लीजिए। गाना मैंने वो "अम्बुआ का पेड़ है, गोरी मुंढेर है, आजा मोरे बालमा, अब काहे को देर है" सुनाया। जैसे सुनाया तो बोले कि "बस अब बम्बई चलते हैं और इस गाने को रेकॉर्ड करते हैं। इस बार बम्बई आने के बाद वो सीरिसली गाने के पीछे लग गये। तो गाने के लिए हसरत मियाँ लिखने के लिए आये।


तो हसरत भाई ने उस धुन पर बोल कौन से लिखे?

"जिया बेकरार है, छायी बहार है, आजा मोरे बालमा, तेरा इन्तज़ार है"


ओ हो, यह तो बहुत लोकप्रिय गाना था। शंकर जी, आज जब हम कहते हैं कि शंकर जी आ गये तो लोग पूछते हैं कि 'कौन, शंकर-जयकिशन की जोड़ी वाले?' क्या मैं यह जान सकती हूँ कि यह शंकर-जयकिशन की जोड़ी कैसे बनी?

यह तो ऐसा है कि जब मैं थिएटर में काम किया करता था, तो एक हारमोनियम बजाने वाले की ज़रूरत थी, तो मैंने जयकिशन जी को वहाँ काम के लिए ले आया। जब लाया तो उनको पापाजी ने रख लिया। बस, उसके साथ हमारी यह जोड़ी जो बनी है, जैसे बरसात शुरू हुई है, आज तक बरसात ही बरसात होती रही है।


बहुत ख़ूब!

दोनो जब मिल कर काम करते थे कभी यह नहीं सोचा कि वो कर रहा है या मैं कर रहा हूँ, ऐसे कभी हमारे दिमाग़ में ख़याल नहीं आये, हमेशा यही सोच कर करते थे कि हमारा नाम होना चाहिये, हमें कामयाबी मिलनी चाहिये, ख़ूब दुनिया में हमारा चर्चा होना चाहिये।


अब आप यह भी हमें बतायें कि जब आप फ़िल्मी दुनिया में आये उस वक़्त यहाँ की मशहूर आवाज़ें कौन सी थीं?

उस वक़्त तो मेरे ख़याल से शमशाद बाई थीं, ज़ोहराबाई अम्बालेवाली, अमीरबाई कर्नाटकी, राजकुमारी, ख़ुर्शीद, सुरैया और नूरजहाँ जैसी गायिकायें थीं। तो ऐसे बड़े बड़े गाने वाले थे। लेकिन हम एक दिन 'जुपिटर स्टुडियो' में गये थे, तो मैंने एक लड़की को वहाँ देखा जो हुस्नलाल-भगतराम के वहाँ अपनी आवाज़ सुनाने के लिए आयी थी। तो वहाँ पर अपनी आवाज़ सुनाया इन्होंने पर हुस्नलाल-भगतराम ने पसन्द नहीं किया और वापस भेज दिया। मेरे दिमाग़ में नहीं मालूम वह आवाज़ क्यों रही, क्या है, जब यह गाना 'बरसात' का बनाया "जिया बेक़रार है", तब उस लड़की को मैंने बुलाया। अच्छा जब बुलाया तब आप समझेंगी नहीं कि यह लड़की गाना गायेगी या गा सकती है, ऐसी कुछ बातें उनमें नज़र नहीं आ रही थी।


मैं आपसे यही सवाल करने जा रही थी कि जब उस ज़माने की मशहूर आवाज़ों को ना लेते हुए आपने यह गाना लताजी से गवाने का फ़ैसला क्यों किया?

नाम वाले तो हैं ही लेकिन उस वक़्त दिमाग़ में मेरे यह आया कि मैं ख़ुद नया हूँ, ज़िदगी का कुछ ठिकाना नहीं था, लेकिन मैंने उस लडअकी की आवाज़ को पसन्द किया, इसलिये पसन्द किया क्योंकि मेरे दिमाग़ में था कि यह गायेगी, उसको एक गाने के लिये ले आये हैं, वो हैं लता मंगेशकर!

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ज़रूरी सूचना:: उपर्युक्त लेख 'दूरदर्शन' के कार्यक्रम का अंश है। इसके सभी अधिकार दूरदर्शन के पास सुरक्षित हैं। किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा इस प्रस्तुति का इस्तमाल व्यावसायिक रूप में करना कॉपीराइट कानून के ख़िलाफ़ होगा, जिसके लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ज़िम्मेदार नहीं होगा।



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Sunday, June 22, 2014

संगीतकार मदनमोहन के राग आधारित गीत




स्वरगोष्ठी – 173 में आज

व्यक्तित्व – 3 : फिल्म संगीतकार मदनमोहन

‘भूली हुई यादों मुझे इतना न सताओ अब चैन से रहने दो मेरे पास न आओ...’ 
 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ की तीसरी कड़ी में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी लघु श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ के अन्तर्गत हम आपसे संगीत के कुछ असाधारण संगीत-साधकों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं, जिन्होंने मंच, विभिन्न प्रसारण माध्यमों अथवा फिल्म संगीत के क्षेत्र में लीक से हट कर उल्लेखनीय योगदान किया है। हमारी आज की कड़ी के व्यक्तित्व हैं, फिल्म संगीत-प्रेमियों के बीच “गजल-सम्राट” की उपाधि से विभूषित यशस्वी संगीतकार, मदनमोहन। उनके संगीतबद्ध गीत अत्यन्त परिष्कृत हुआ करते थे। आभिजात्य वर्ग के बीच उनके गीत बड़े शौक से सुने और सराहे जाते थे। वे गज़लों को संगीतबद्ध करने में सिद्ध थे। गज़लों के साथ ही अपने गीतों में रागों का प्रयोग भी निपुणता के साथ करते थे। विभिन्न रागों पर आधारित उनके अनेक गीत आज भी सदाबहार बने हुए हैं। उनके अधिकतर राग आधारित गीतों को लता मंगेशकर और मन्ना डे स्वर प्रदान किए हैं। आज के अंक में हम मदनमोहन के शास्त्रीय राग आधारित रचनाओं के सन्दर्भ में उनकी विलक्षण प्रतिभा को रेखांकित करेंगे। यह भी सुखद संयोग है कि आज से तीसरे दिन अर्थात 25 जून को मदनमोहन का 91वाँ जन्मदिवस है। इस अवसर पर ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार इस महान संगीत-साधक की स्मृतियों को उन्हीं के स्वरबद्ध गीतों के माध्यम से स्वरांजलि अर्पित करता है। 
 



फिल्म संगीत के क्षेत्र में मदनमोहन का नाम एक ऐसे संगीतकार के रूप में लिया जाता है, जिनकी रचनाएँ सभ्रान्त और संगीत रसिकों के बीच चाव से सुनी जाती है। उनका संगीत जटिलताओं से मुक्त होते हुए भी हमेशा सतहीपन से भी दूर ही रहा। उनका जन्म 25 जून, 1924 को बगदाद में हुआ था। फिल्मी संस्कार उन्हें विरासत में मिला था। मदनमोहन के पिता रायबहादुर चुन्नीलाल, विख्यात फिल्म निर्माण संस्था ‘फिल्मिस्तान’ के संस्थापक थे। मुम्बई में उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई। बचपन से ही संगीत के प्रति लगाव होते हुए भी शिक्षा पूर्ण होने के बाद आश्चर्यजनक रूप से मदनमोहन ने सेना की नौकरी की। परन्तु लम्बे समय तक वे सेना की नौकरी में नहीं रहे और वहाँ से मुक्त होकर लखनऊ रेडियो के संगीत विभाग में नियुक्त हो गए। यहाँ रह कर जिस सांगीतिक परिवेश और संगीत की विभूतियों से उनका सम्पर्क हुआ, उसका प्रभाव उनकी रचनाओं पर स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। लखनऊ रेडियो केन्द्र पर कार्य करते हुए मदनमोहन का सम्पर्क विख्यात गायिका बेगम अख्तर और उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ से हुआ। आगे चलकर मदनमोहन के फिल्म संगीत पर इन विभूतियों का असर हुआ। फिल्मों में गजल गायकी का एक मानक स्थापित करने में मदनमोहन का योगदान प्रशंसनीय रहा है। निश्चित रूप से यह प्रेरणा उन्हें बेगम अख्तर से ही मिली थी। इसी प्रकार उनके अनेक गीतों में रागों की विविधता के दर्शन भी होते हैं। फिल्म संगीत को रागों के परिष्कृत और सरलीकृत रूप प्रदान करने की प्रेरणा उन्हें उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ और लखनऊ के तत्कालीन समृद्ध सांगीतिक परिवेश से ही मिली थी। ‘स्वरगोष्ठी’ की इस कड़ी में हम मदनमोहन के संगीतबद्ध कुछ राग आधारित गीतों पर चर्चा कर रहे हैं। सबसे पहले हम जिस गीत की चर्चा करेंगे वह 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ से लिया गया है। मदनमोहन ने इस फिल्म के प्रायः सभी गीत विविध शास्त्रीय रागों पर आधारित करते हुए रचे थे। फिल्म के सभी गीत गुणबत्ता और लोकप्रियता की दृष्टि से अद्वितीय थे। इन्हीं गीतों में से हमने आपके लिए राग जैजैवन्ती के स्वरों से अलंकृत गीत- ‘बैरन हो गई रैना...’ चुना है। इस गीत में नायिका के विरह भाव का चित्रण किया गया है। रात्रि के दूसरे प्रहर में मध्यरात्रि के निकट गाया-बजाया जाने वाला राग जैजैवन्ती के स्वरों में प्रतीक्षा और विरह का भाव खूब मुखर होता है। ऐसे गीतों के लिए पुरुष पार्श्वगायकों में मन्ना डे, मदनमोहन की पहली पसन्द थे। तीनताल में निबद्ध इस गीत को मन्ना डे ने बड़े ही भावपूर्ण ढंग से गाया है।


राग जैजैवन्ती : ‘बैरन हो गई रैन...’ : स्वर – मन्ना डे : संगीत – मदनमोहन : फिल्म – देख कबीरा रोया

 



मदनमोहन के संगीत में लता मंगेशकर के स्वरों का योगदान हमेशा महत्त्वपूर्ण रहा है। पाँचवें दशक के अन्तिम वर्षों में लता मंगेशकर पार्श्वगायन के क्षेत्र में अवसर पाने के लिए संघर्षरत थीं। उन्हीं दिनों मदनमोहन भी अपनी रेडियो की नौकरी छोड़ कर फिल्मों में प्रवेश का मार्ग खोज रहे थे। यूँतो उनके पिता रायबहादुर चुन्नीलाल तत्कालीन फिल्म जगत के प्रतिष्ठित व्यक्तित्व थे, किन्तु मदनमोहन अपनी प्रतिभा के बल पर ही फिल्म संगीत के क्षेत्र में अपना स्थान बनाना चाहते थे। उन्हीं दिनों संगीतकार गुलाम हैदर फिल्म ‘शहीद’ के लिए नई आवाज़ खोज रहे थे। उन्होने स्वर-परीक्षा के लिए मदनमोहन और लता मंगेशकर की आवाज़ों में एक युगल गीत रिकार्ड किया। एस. मुखर्जी ने इस रिकार्डिंग को सुन कर दोनों आवाज़ों को खारिज कर दिया। उन्हें क्या पता था कि आगे चल कर इनमें से एक आवाज़ विश्वविख्यात गायिका का और दूसरी आवाज़ उच्चकोटि के संगीतकार की है। आगे चल कर मदनमोहन और उनकी मुँहबोली बहन लता मंगेशकर की जोड़ी ने फिल्म संगीत जगत को अनेक मधुर गीतों से समृद्ध किया। 1950 में मदनमोहन के संगीत निर्देशन में बनी देवेन्द्र गोयल की फिल्म ‘आँखें’ का संगीत काफी लोकप्रिय हुआ, किन्तु इन गीतों में लता मंगेशकर की आवाज़ नहीं थी। फिल्म में मीना कपूर, शमशाद बेगम और मुकेश की आवाज़ें थी। फिल्म ‘शहीद’ के लिए की गई स्वर-परीक्षा के दौरान मदनमोहन ने लता मंगेशकर से वादा किया था कि अपनी पहली फिल्म में वे लता से गीत गवाएंगे, किन्तु अपनी पहली फिल्म ‘आंखे’ में वे अपना संकल्प पूरा न कर सके। परन्तु 1951 में बनी देवेंद्र गोयल की ही अगली फिल्म ‘अदा’ में मदनमोहन और लता मंगेशकर का साथ हुआ और यह साथ लम्बी अवधि तक जारी रहा। इस दौरान लता मंगेशकर ने मदनमोहन के संगीत निर्देशन में अनेक उत्कृष्ट गीत गाये। मदनमोहन के संगीत से सजा दूसरा गीत, जो हम प्रस्तुत कर रहे हैं, वह एक युगल गीत है। 1959 में प्रदर्शित फिल्म ‘चाचा ज़िन्दाबाद’ में मदनमोहन का संगीत था। इस फिल्म के गीतों में भी उन्होने रागों का आधार लिया और आकर्षक संगीत रचनाओं का सृजन किया। फिल्म में राग ललित के स्वरों में पिरोया एक मधुर गीत- ‘प्रीतम दरश दिखाओ...’ था, जिसे मन्ना डे और लता मंगेशकर ने स्वर दिया। आइए, तीनताल मे निबद्ध यह गीत सुनते हैं। 


राग ललित : ‘प्रीतम दरश दिखाओ...’ : स्वर – मन्ना डे और लता मंगेशकर : संगीत – मदनमोहन : फिल्म – चाचा ज़िन्दाबाद





मदनमोहन को ‘गजलों का बादशाह’ कहा जाता है। नौशाद जैसे वरिष्ठ संगीतकार भी उनकी गज़लों के प्रशंसक रहे हैं। मदनमोहन के संगीतबद्ध अधिकतर गजलों में पुरुष कण्ठस्वर तलत महमूद के और नारी स्वर के लिए तो एकमात्र लता मंगेशकर ही थीं। पिछले दिनों हमारे साथी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी ने अपने ‘एक गीत सौ कहानियाँ’ स्तम्भ में मदनमोहन के गज़लों की विशेषताओं को रेखांकित किया था। (पढ़ने और सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें) मदनमोहन के स्वरबद्ध गज़लों को अन्य पार्श्वगायकों ने भी गाया है, किन्तु तलत महमूद के स्वर में उनकी गज़लें कुछ अधिक मुखर हुई हैं। मदनमोहन के गीतकारों में राजेन्द्र कृष्ण और राजा मेंहदी अली खाँ के गीतों को जनसामान्य ने खूब सराहा। उनके संगीत में सितार का श्रेष्ठतम उपयोग हुआ। इसके लिए उस्ताद रईस खाँ ने उनके सर्वाधिक गीतों में सितार बजाया था। इसके अलावा कुछेक गीतों में बाँसुरी वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया और सन्तूर वादक पण्डित शिवकुमार शर्मा जैसे दिग्गज संगीतज्ञों का योगदान मिलता है। मदनमोहन द्वारा संगीतबद्ध पहली फिल्म ‘आँखें’ में पार्श्वगायक मुकेश ने सदाबहार गीत- ‘प्रीत लगाके मैंने ये फल पाया...’ गाया था। एक लम्बे अन्तराल के बाद मुकेश की वापिसी मदनमोहन के साथ फिल्म ‘दुनिया न माने’ में हुई। इसके बाद 1961 में प्रदर्शित फिल्म ‘संजोग’ में मुकेश ने मदनमोहन के संगीत निर्देशन में एक बेहद गम्भीर और असरदार गीत- ‘भूली हुई यादों मुझे इतना न सताओ...’ गाया। मदनमोहन ने यह गीत राग कल्याण अर्थात यमन के स्वरों में बाँधा था। फिल्मों में प्रायः राग आधारित गीतों को तैयार करने वाले संगीतकारों ने प्रायः मुकेश को प्राथमिकता देने में परहेज किया, किन्तु मदनमोहन ने मुकेश की गायकी से रागानुकूल तत्त्वों को किस प्रकार उभारा है, यह अनुभव आप गीत सुन कर स्वयं कर सकते हैं। तीव्र मध्यम के साथ सभी शुद्ध स्वरों वाले राग यमन के गायन-वादन का उपयुक्त समय गोधूलि बेला अर्थात पाँचवें प्रहर का आरम्भिक समय होता है। गीत में उदासी का जो भाव है वह यमन के स्वरों में खूब उभरता है। मुकेश ने दादरा ताल में निबद्ध इस गीत को पूरी संवेदना के साथ गाया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग यमन : ‘भूली हुई यादों मुझे इतना न सताओ...’ : स्वर – मुकेश : संगीत – मदनमोहन : फिल्म – संजोग 






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 173वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वाद्य संगीत प्रस्तुति का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 180वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमें उसका नाम लिख भेजिए।

2 – यह संगीत रचना किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 175वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 171वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘अनारकली’ से एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- गायक हेमन्त कुमार। सुनवाए गए गीतांश में केवल हेमन्त कुमार की आवाज़ है, किन्तु पूरा गीत हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर ने युगल रूप में गाया है। पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग बागेश्री। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, चंडीगढ़ के हरकीरत सिंह तथा पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात




मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर ‘व्यक्तित्व’ शीर्षक से जारी श्रृंखला के आज के अंक में हमने यशस्वी फिल्म संगीतकार मदनमोहन के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा की है। इसके साथ ही उनके राग आधारित कुछ गीतों की रंजकता का अनुभव भी किया। आप भी यदि ऐसे किसी संगीतकार की जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पते पर भेज दें। अपने पाठको/श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित/प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

Saturday, June 21, 2014

"कल तेरी बज़्म से दीवाना चला जायेगा...", क्या अपने अन्तिम समय का आभास हो चला था शक़ील बदायूंनी को?


एक गीत सौ कहानियाँ - 34
 

‘आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले...’



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 34-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'राम और श्याम' के गीत "आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले" के बारे में। 



जावेद बदायूंनी
हिन्दी सिने संगीत जगत में गीतकार-संगीतकार जोड़ियों की परम्परा कोई नई बात नहीं है। शुरुआती दौर से लेकर आज तक यह परम्परा जारी है, पर व्यावसायिक सम्बन्ध के साथ-साथ पारिवारिक सम्बन्ध भी इन जोड़ियों में हो, ऐसा हर जोड़ी में नहीं देखा गया। गीतकार शक़ील बदायूंनी और संगीतकार नौशाद की जोड़ी एक ऐसी जोड़ी थी जो केवल गीतों के बनने तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि एक दूसरे के सुख-दुख में, एक दूसरे के परिवार की सहायता के लिए हमेशा तत्पर रही। शक़ील और नौशाद की दोस्ती की मिसाल सच्ची दोस्ती की मिसाल है, जिसे शक़ील के इन्तकाल के बाद भी नौशाद ने निभाया। शक़ील साहब के बेटे जावेद बदायूंनी ने फ़ेसबुक के माध्यम से मुझे एक बार बताया था कि किस प्रकार शक़ील साहब की मौत के बाद भी नौशाद साहब उनके घर पर समय-समय पर आया करते और उनके परिवार के सभी सदस्यों का हालचाल पूछते। उन्हीं के शब्दों में- “शक़ील साहब और नौशाद साहब वेयर ग्रेटेस्ट फ़्रेण्ड्स! यह हक़ीक़त है कि शक़ील साहब नौशाद साहब के साथ अपने परिवार से भी ज़्यादा वक़्त बिताया करते थे। दोनों की आपस की ट्यूनिंग ग़ज़ब की थी और यह ट्यूनिंग इनके गीतों से साफ़ झलकती है। शक़ील साहब के गुज़र जाने के बाद भी नौशाद साहब हमारे घर आते रहते थे और हमारी हौसला अफ़ज़ाई करते थे। यहाँ तक कि नौशाद साहब हमें बताते थे कि ग़ज़ल और नज़्म किस तरह से पढ़ी जाती है और मैं जो कुछ भी लिखता था, वो उन्हें सुधार दिया करते थे।” मजरूह सुल्तानपुरी और ख़ुमार बाराबंकवी की ही तरह नौशाद और ए.आर. कारदार ने किसी मुशायरे में शक़ील बदायूनी को कलाम पढ़ते सुना और उन्हें भी अपने साथ कर लिया। शक़ील – नौशाद की जोड़ी फ़िल्म जगत की एक प्रसिद्ध गीतकार – संगीतकार जोड़ी रही है। फ़िल्म ‘दर्द’ के सभी 10 गीत लिखते हुए शक़ील ने अपने फ़िल्मी गीत लेखन के पारी की शुरुआत की। शक़ील के आने के बाद और शक़ील की मृत्यु से पहले नौशाद ने अपने फ़िल्मी सफ़र में केवल एक फ़िल्म ऐसी की जिसके गानें शक़ील ने नहीं लिखे। बड़े ही वफ़ादारी के साथ नौशाद ने शक़ील का साथ निभाया।

नौशाद, रफ़ी और शक़ील
फ़िल्म 'राम और श्याम' के इस गीत "आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले" को अगर करीब से महसूस करना हो तो शक़ील साहब के जीवन के अन्तिम समय की तरफ़ झाँकना होगा कि किन हालातों में उन्होंने यह गीत लिखा था। यह बात है सन् 1967-68 की। शक़ील बदायूंनी की उम्र केवल 50 वर्ष की थी कि टी.बी जैसी भयानक बीमारी ने उन्हें जकड़ लिया। उनकी वित्तीय अवस्था उतनी मज़बूत नहीं थी कि वो अपना इलाज किसी बेहतरीन अस्पताल में करवाते। टी.बी. की संक्रामकता के चलते उन्हें पंचगनी स्थित एक सैनिटोरियम में भेज दिया गया इलाज के लिए। नौशाद साहब को जैसे ही इस बात का पता चला कि शक़ील साहब बीमार हैं और उनके पास इलाज के लिए पर्याप्त धन नहीं है, उन्हें बहुत ज़्यादा तकलीफ़ हुई, दुख हुआ। नौशाद साहब को पता था कि शक़ील साहब इतने ख़ुद्दार इंसान हैं कि किसी से पैसे वो नहीं लेंगे, यहाँ तक कि नौशाद से भी नहीं। इसलिए नौशाद साहब ने एक दूसरा रास्ता इख़्तियार किया। वो पहुँच गये कुछ फ़िल्म निर्माताओं के पास और शक़ील साहब की हालत का ब्योरा देते हुए उनके लिए हासिल कर लिए तीन फ़िल्मों में गीत लिखने का कॉण्ट्रैक्ट। यही नहीं, उस समय शक़ील किसी फ़िल्म के लिए जितने रकम लिया करते थे, उससे दस गुना ज़्यादा रकम पर नौशाद ने उन फ़िल्म निर्माताओं को राज़ी करवाया। उसके बाद नौशाद ख़ुद जा पहुँचे पंचगनी जहाँ शक़ील का इलाज चल रहा था। जैसे ही उन्होंने शक़ील को उन तीन फ़िल्मों में गाने लिखने और पेमेण्ट की रकम के बारे में बताया तो शक़ील समझ गये कि उन पर अहसान किया जा रहा है। और उन्होंने नौशाद साहब से वो फ़िल्में वापस कर आने को कहा। पर नौशाद साहब ने भी अब ज़िद पकड़ ली और शक़ील साहब को गाने लिखने पर मजबूर किया। जानते हैं ये तीन फ़िल्में कौन सी थीं? 'राम और श्याम', 'आदमी', और 'संघर्ष'। फ़िल्म 'राम और श्याम' के इस ख़ास गीत "आज की रात मेरे" शक़ील बदायूंनी ने पंचगनी के अस्पताल के बेड पर बैठे-बैठे लिखा था। अपनी दिन-ब-दिन ढलती जा रही ज़िन्दगी को देख कर उन्हें शायद यह अहसास हो चला था कि अब वो ज़्यादा दिन ज़िन्दा नहीं रहेंगे, कि उनका अन्तिम समय अब आ चला है, शायद इसीलिए उन्होंने इस गीत में लिखा कि "कल तेरी बज़्म से दीवाना चला जायेगा, शम्मा रह जायेगी परवाना चला जायेगा, आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले"। 

नौशाद साहब अपने जीवन के अन्त तक जब भी इस गीत को सुनते थे, उनकी आँखों में आँसू आ जाते थे शक़ील को याद करके। उन्हें ऐसा लगता था, उन्हें यह महसूस होता था कि शक़ील ने यह गीत उन्हीं को ही लिखा है नायिका की आड़ लेकर। नौशाद साहब ने बड़े मन से इस गीत को राग पहाड़ी, कहरवा ताल में बाँधा था। जिस तरह से शक़ील ने नौशाद साहब को अपनी ग़रीबी के बारे में नहीं बताया, अपना अन्तिम समय आने के बारे में नहीं बताया और चुपचाप पंचगनी के अस्पताल में चले गये, और जिस तरह से नौशाद उन पर तरस खाकर उनके लिए दस गुना ज़्यादा फ़ीस का इन्तज़ाम कर लाये, और शक़ील साहब के मना करने के बावजूद ज़बरदस्ती इन तीन फ़िल्मों को दस गुना ज़्यादा रकम में करने का ज़िद किया, ये सब बातें शक़ील को अन्दर ही अन्दर खाये जा रहा था, और उनके दिल की यही कश्मकश इस गीत के एक अन्तरे में फूट पड़ी- "मैंने चाहा कि बता दूँ मेरी हक़ीक़त अपनी, तू ने लेकिन न मेरा राज़-ए-मोहब्बत समझा, मेरी उलझन मेरी हालात यहाँ तक पहुँचे, तेरी आँखों ने मेरे प्यार को नफ़रत समझा, अब तेरी राह से बेगाना चला जायेगा, शम्मा रह जायेगी परवाना चला जायेगा..."। और अपने दिल की सलामी दे कर यह परवाना 20 अप्रैल 1970 को सचमुच दुनिया के इस बज़्म से हमेशा हमेशा के लिए चला गया, और नौशाद साहब के दिल में गूंजने लगे ये बोल-

तू मेरा साथ न दे राह-ए-मोहब्बत में सनम,
चलते चलते मैं किसी राह पे मुड़ जाऊँगा।
कहकशां चाँद सितारे तेरे चूमेंगे क़दम,
तेरे रस्ते की मैं एक धूल हूँ उड़ जाऊँगा।
साथ मेरे मेरा अफ़साना चला जायेगा,
कल तेरी बज़्म से दीवाना चला जायेगा,
शम्मा रह जायेगी परवाना चला जायेगा।


फिल्म - राम और श्याम : 'आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले...' : गायक - मुहम्मद रफी : संगीत - नौशाद : गीत - शकील बदायूँनी


 

अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Sunday, June 15, 2014

हेमन्त कुमार : शास्त्रीय, लोक और रवीन्द्र संगीत के अनूठे शिल्पी



स्वरगोष्ठी – 172 में आज

व्यक्तित्व – 2 : हेमन्त कुमार मुखोपाध्याय उपाख्य हेमन्त मुखर्जी

‘जाग दर्द-ए-इश्क जाग, दिल को बेकरार कर..’






‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ की दूसरी कड़ी में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी लघु श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ में हम आपसे संगीत के कुछ ऐसे साधकों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं जिन्होंने मंच अथवा विभिन्न प्रसारण माध्यमों पर प्रदर्शन से इतर संगीत के प्रचार, प्रसार, शिक्षा, संरक्षण या अभिलेखीकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान किया है। इस श्रृंखला में हम फिल्मों के ऐसे संगीतकारों की भी चर्चा करेंगे जिन्होंने लीक से हट कर कार्य किया। हमारी आज की कड़ी के व्यक्तित्व हैं, बांग्ला और हिन्दी फिल्म के यशस्वी गायक और संगीतकार, हेमन्त कुमार मुखोपाध्याय जिन्हें हिन्दी फिल्मों के क्षेत्र में हम हेमन्त कुमार के नाम से जानते और याद करते है। बांग्ला और हिन्दी फिल्म संगीत जगत पर पूरे 45 वर्षों तक छाए रहने वाले हेमन्त कुमार ने अपने राग आधारित संगीत, लोक और रवीन्द्र संगीत की रचनाओं से फिल्म संगीत को समृद्ध किया। आज के अंक में हम उनके शास्त्रीय राग आधारित रचनाओं के सन्दर्भ में उनकी गायक और संगीतकार की भूमिका को रेखांकित करेंगे। यह भी सुखद संयोग है कि कल ही अर्थात 16 जून को हेमन्त कुमार का 95वाँ जन्मदिवस भी है। इस अवसर पर ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार की ओर से इस महान संगीत साधक की स्मृतियों को सादर नमन है।





भारतीय फिल्म संगीत के बहुआयामी कलासाधकों की सूची में पार्श्वगायक और संगीतकार हेमन्त कुमार का नाम शिखर पर अंकित है। बाँग्ला और हिन्दी के गीतों के गायन और संगीतबद्ध करने में समान रूप से दक्ष हेमन्त कुमार का जन्म 16 जून, 1920 को बनारस स्थित उनके ननिहाल में हुआ था। उनकी शिक्षा-दीक्षा बंगाल में हुई। परिवार में संगीत का शौक तो था, किन्तु इसे व्यवसाय के तौर पर अपनाने के लिए कोई भी सहमत नहीं था। बालक हेमन्त के स्कूल से प्रायः यह शिकायत मिलती थी कि उनकी रुचि पढ़ाई की ओर कम और गाने में अधिक है। पिता के एक मित्र सुभाष मुखर्जी की सहायता से मात्र 13 वर्ष की आयु में रेडियो के बाल कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर मिलने लगा। कुछ बड़े होने पर हेमन्त कुमार को कोलम्बिया कम्पनी के लिए रवीन्द्र संगीत रिकार्ड करने का अवसर मिला। कम्पनी के संगीत निर्देशक शैलेन दासगुप्त को उनका गायन इतना पसन्द आया कि एक वर्ष में हेमन्त कुमार के बारह रिकार्ड प्रकाशित किये। आगे चल कर हेमन्त कुमार, संगीतकार शैलेन दासगुप्त के सहायक बने और पहली बार बाँग्ला फिल्म ‘निमाई संन्यास’ में उन्हे पार्श्वगायन का अवसर मिला। वर्ष 1944 में उन्हें पं. अमरनाथ के संगीत निर्देशन में पहली बार हिन्दी फिल्म ‘इरादा’ में दो गीत गाने का अवसर मिला। अगले वर्ष ही हेमन्त कुमार को बाँग्ला फिल्म ‘पूर्वराग’ में संगीत निर्देशन का दायित्व मिल गया। इसके बाद उन्होने अनेक छोटी-बड़ी बाँग्ला फिल्मों का संगीत निर्देशन किया। परन्तु 1951 में हेमेन गुप्ता की बाँग्ला फिल्म ‘आनन्दमठ’ में हेमन्त कुमार का संगीत अत्यन्त लोकप्रिय हुआ। फिल्म की सफलता से उत्साहित होकर इसी वर्ष ‘आनन्दमठ’ का हिन्दी संस्करण भी बनाया गया। इस संस्करण में भी हेमन्त कुमार का संगीत था। बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय की अमर रचना ‘वन्देमातरम्’ की विलक्षण धुन और गायन के कारण हेमन्त कुमार की हिन्दी फिल्मों के क्षेत्र में पार्श्वगायक के रूप में धाक जम गई। सचिनदेव बर्मन, सी. रामचन्द्र जैसे प्रतिष्ठित संगीतकारों के निर्देशन में हेमन्त कुमार के गाये अनेक गीत लोकप्रियता और गुणबत्ता की दृष्टि से शिखर पर रहे। आइए, अब हम आपको संगीतकार सी. रामचन्द्र के संगीत निर्देशन में हेमन्त कुमार का गाया एक सदाबहार गीत सुनवाते हैं। 1953 में प्रदर्शित, सी. रामचन्द्र के राग आधारित गीतों से सुसज्जित फिल्म ‘अनारकली’ में हेमन्त कुमार ने राग बागेश्री पर आधारित एक मनमोहक गीत गाया था। दादरा ताल में निबद्ध यह एक युगलगीत है, जिसमें हेमन्त कुमार का साथ लता मंगेशकर ने दिया है।


राग बागेश्री, दादरा ताल : ‘जाग दर्द-ए-इश्क़ जाग...’ हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर : संगीत – सी. रामचन्द्र : गीत – राजेन्द्र कृष्ण : फिल्म - अनारकली  




हिन्दी फिल्मों में पार्श्वगायक के रूप में अपनी पहचान बना लेने के बावजूद हेमन्त कुमार को एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में स्वयं को स्थापित करना अभी बाकी था। ‘आनन्दमठ’ का संगीत उत्कृष्ट स्तर का होने के बावजूद काफी समय तक उन्हें कोई ऐसी फिल्म नहीं मिली जिसके माध्यम से वे अपनी प्रतिभा दिखा सकें। इस बीच उन्हें फिल्मिस्तान की ‘शर्त’ और ‘सम्राट’ तथा हेमेन गुप्ता द्वारा निर्देशित फिल्म ‘फेरी’ के लिए संगीत निर्देशन का अवसर मिला, किन्तु ये फिल्में कुछ विशेष चली नहीं, यद्यपि फिल्म ‘शर्त’ के गीत उत्कृष्ट स्तर के थे। निराशा के इन क्षणों में 1954 में उन्हें फिल्मिस्तान की फिल्म ‘नागिन’ का संगीत तैयार करने का अवसर मिला। इस फिल्म के गीत जनसामान्य के बीच इतना लोकप्रिय हुआ कि हेमन्त कुमार फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान हो गए। फिल्म ‘नागिन’ के संगीत के लिए हेमन्त कुमार को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया था। इसके बाद उनकी एक और सफलतम फिल्म ‘जागृति’ आई, जिसमें गीतकार प्रदीप के गाये गीत ‘आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिन्दुस्तान की...’ सहित अन्य गीतों ने गली-गली में धूम मचा दी थी। इन दो फिल्मों की आशातीत सफलता से संगीत निर्देशक के रूप में हेमन्त कुमार की माँग बढ़ गई थी। सामाजिक सरोकार की फिल्मों के साथ कुछ धार्मिक फिल्मों के संगीत निर्देशन का अवसर उन्हें मिलने लगा। वर्ष 1955 में शक्ति सामन्त निर्देशित ‘बहू’, सत्येन बोस निर्देशित ‘बन्दिश’, ‘लगन’ के साथ फिल्मिस्तान की भक्ति फिल्म ‘भागवत महिमा’ में उनके संगीत को सराहा गया। इसी प्रकार 1956 में हेमन्त कुमार ने ‘अनजान’, एस.डी. नारंग निर्देशित ‘अरब का सौदागर’, ‘बन्धन’, ‘ताज’ और ‘एक ही रास्ता’ फिल्मों में संगीत दिया था। अभी तक उन्होने अपने गीतों को भारतीय मेलोडी, बंगाल व उत्तर प्रदेश की लोकधुनों और भक्तिसंगीत की प्रचलित धुनों से सजाया था। हेमन्त कुमार के कुछ गीतों में भारतीय संगीत के रागों का स्पर्श भले ही परिलक्षित होता हो किन्तु सप्रयास राग का आधार देकर किसी गीत की धुन को तैयार करने की प्रवृत्ति 1956 की फिल्म ‘एक ही रास्ता’ में नज़र आती है। बी.आर. चोपड़ा ने अपनी इस फिल्म में संगीतकार के रूप में हेमन्त कुमार को चुना। फिल्म में अभिनेत्री मीना कुमारी पर द्रुत लय का एक नृत्य फिल्माना था। इस नृत्यगीत की रचना मजरूह सुल्तानपुरी ने की और हेमन्त कुमार ने भैरवी राग के स्वरों का आधार देकर गीत की धुन बनाई। द्रुत लय के कहरवा ताल का लोच गीत को द्विगुणित बनाता है। गीत को स्वयं हेमन्त कुमार ने स्वर दिया था। यह गीत हेमन्त कुमार के सदाबहार गीतों का सिरमौर है। आइए , अब आप हेमन्त कुमार का संगीतबद्ध किया और गाया यह गीत आप भी सुनिए।


राग भैरवी, कहरवा ताल : ‘चली गोरी पी के मिलन को चली...’ स्वर और संगीत – हेमन्त कुमार : गीत – मजरूह सुल्तानपुरी : फिल्म - एक ही रास्ता




हेमन्त कुमार के सांगीतिक जीवन में छठाँ दशक सर्वाधिक उल्लेखनीय रहा है। इस पूरे दशक में फिल्म संगीत की बदलती प्रवृत्तियों का सहज अध्ययन उनके संगीत के माध्यम से किया जा सकता है। उनके शुरुआती दौर के संगीत में भारी-भरकम वाद्यों की भीड़ नहीं थी। फिल्म ‘नागिन’ की सफलतम धुनों में भी बाँसुरी, वायलिन, इसराज, और सारंगी के अलावा बीन की ध्वनि के विकल्प के तौर पर क्लेवायलिन का मोहक प्रयोग हुआ है। आगे चल कर आनन्द जी के साथ संगीतकार जोड़ी बनाने वाले कल्याण जी उन दिनों हेमन्त कुमार के सहायक थे और क्लेवायलिन से बीन की ध्वनि का वादन उन्होने ही किया था। हेमन्त कुमार के सांगीतिक जीवन का पहला पड़ाव यदि फिल्म ‘आनन्दमठ’ को माना जाए तो ‘नागिन’ इस यात्रा का दूसरा सुखद पड़ाव है। ‘नागिन’ के बाद काफी समय तक उनके गीतों की धुनों में नृत्यात्मक तत्त्व बने रहे। थिरकन से युक्त लय गीत के भावों की अनुगूँज उनके अधिकतर गीतों में उपस्थित है। इसी दशक में वह आधुनिक वाद्यवृन्द का उपयोग भी अपने गीतों में करने लगे थे। पियानो का सुंदर उपयोग उनके इस दौर के गीतों में मिलता है। गायक और संगीतकार के रूप में न केवल हिन्दी फिल्मों में बल्कि बाँग्ला फिल्मों में भी वे समान रूप से व्यस्त रहे। कभी-कभी तो उनकी सुबह मुम्बई में तो शाम कोलकाता में बीतती थी। कुछेक गीतों में पाश्चात्य धुनों की नकल भी परिलक्षित होती है, किन्तु आदि से अन्त तक के प्रायः सभी गीतों में हेमन्त कुमार की विशेष शैली उपस्थित मिलती है। उन्होने शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा ग्रहण नहीं की, किन्तु अनेक गीतों में उनका रागों का ज्ञान स्पष्ट रूप से झलकता है। इस कड़ी के अन्त में हम आपको हेमन्त कुमार का संगीतबद्ध किया एक ऐसा गीत सुनवाते है जिसमें नृत्यत्मकता है, प्रकृति अर्थात लोक का स्पर्श है, रागानुकूल तानों का समावेश है, ताल का लोच है और इन सब विशेषताओं के साथ ठुमरी अंग का मोहक स्पर्श भी है। 1957 में प्रतिष्ठित फिल्म निर्माण संस्था ए.वी.एम. की फिल्म ‘मिस मेरी’ प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म में हेमन्त कुमार का संगीत एकदम अनूठा था और उपरोक्त सभी गुणों से अलंकृत था। इसी फिल्म का एक गीत हमने आपके लिए चुना है। गीत के बोल हैं- ‘सखि री सुन बोले पपीहा उस पार...’। राजेन्द्र कृष्ण के लिखे गीत को हेमन्त कुमार ने तीनताल में निबद्ध किया है। गीत लता मंगेशकर और आशा भोसले के युगल स्वरों में है। इस गीत में राग मिश्र खमाज की छाया है। इस रचना में ठुमरी अंग का स्पर्श भी किया गया है। कुल मिला कर इस गीत में हेमन्त कुमार के प्रायः सभी सांगीतिक गुणों का समावेश नज़र आता है। आप यह मधुर गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग मिश्र खमाज, तीनताल : ‘सखि री सुन बोले पपीहा उस पार...’ लता मंगेशकर और आशा भोसले : संगीत – हेमन्त कुमार : गीत – राजेन्द्र कृष्ण : फिल्म - मिस मेरी





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 172वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 180वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत का यह अंश सुन कर राग पहचाइए और हमे राग का नाम बताइए।

2 – इस गीत के गायक कलाकार को पहचानिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 174वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली और श्रृंखला के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 170वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको वरिष्ठ संगीतज्ञ पण्डित विश्वनाथ श्रीखण्डे की आवाज़ में गायी ठुमरी का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- ठुमरी शैली और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग मिश्र खमाज। इस अंक के दोनों प्रश्नों के सही उत्तर चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। यह हमारी 170वीं कड़ी की पहेली का परिणाम था। इसी के साथ वर्ष 2014 की दूसरी श्रृंखला का परिणाम भी स्पष्ट हो गया है। इस श्रृंखला के विजेता और उनके प्राप्तांक इस प्रकार रहे।

1- डी. हरिणा माधवी, हैदराबाद – 20 अंक प्रथम

2- क्षिति तिवारी, जबलपुर – 20 अंक प्रथम

3- हरकीरत सिंह, चंडीगढ़ – 16 अंक द्वितीय

4- विजया राजकोटिया, पेंसिलवानिया, अमेरिका – 8 अंक तृतीय

आप सभी श्रृंखला विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सम्पादक मण्डल की ओर से हार्दिक बधाई।





अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपसे सुप्रसिद्ध फिल्म संगीतकार हेमन्त कुमार के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा की। अगले अंक में भी हम एक और फिल्म संगीत के विख्यात संगीतकार की सांगीतिक कृतियों की चर्चा करेंगे। यह अंक आपको कैसा लगा, हमें अवश्य बताइए। आप भी अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों की प्रतीक्षा करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Saturday, June 14, 2014

संगीतकार जयदेव को याद करते हुए कुछ गायक और संगीतकार



स्मृतियों के स्वर - 03

जयदेव को याद करते हुए कुछ गायक और संगीतकार



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकीया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ हमारे इस स्तंभ में, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर, जिसमें हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। तो आइये आज इसकी तीसरी कड़ी में जानें सुप्रसिद्ध संगीतकार जयदेव के बारे में उन्हीं के दोस्त व संगीतकार बृजभूषण तथा उनके द्वारा अवसर पाने वाले कुछ पार्श्वगायकों से।


संगीतकार जयदेव

संगीतकार बृजभूषण ने जयदेव को बहुत करीब से जाना है। वो न केवल जयदेव जी के अच्छे दोस्त हैं, बल्कि वो उनके गुरुभाई भी हैं।

बृजभूषण:

पंडित अमरनाथ के सबसे बड़े जो उनके शिष्य हैं, वो हम दोनों पर महरबान थे, इस तरह से मैं और जयदेव गुरुभाई थे। मैं जब बम्बई में नया-नया आया, अकेला भी था, मैं एक होटल में ठहरा हुआ था। जब जयदेव को इस बात का पता चला तो मुझ पर बहुत गुस्सा हुए और कहा कि चलो मेरे घर। मुझे उनको बहुत करीब से देखने का मौका मिला है। फ़ोक, क्लासिकल और भक्ति संगीत पर उन्हें ज़बरदस्त दखल हासिल था। उन्होंने अनेक अच्छे लोगों को सुना है, कॉनफ़रेन्सेस में भी गये। उनके संगीत की विशेषता है कि एक लूप-सिस्टम मिलता है उनके गानों में, जैसे कि "मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया"। हर मेलडी में उनका एक सिग्नेचर रहता था, हर गीत में अपना अलग छाप छोड़ देते थे। वो एस. डी. बर्मन के सहायक थे। चेतन आनन्द ने उन्हें 'किनारे किनारे' और 'अंजलि' में संगीत देने का मौका दिया। बहुत ज़माने के बाद उन पर नज़र पड़ी। ऐसी बहुत सी धुनें हैं जिन्हें जयदेव ने बनाये पर एस. डी. बर्मन के नाम से गए। Inspite of S D Burman's influence on him, जब देव आनन्द ने उन्हें चान्स दिया 'हम दोनो' में, वो अपना अलग स्टाइल लेकर आये। स्लो हो या फ़ास्ट, हर गाने में एक इण्डियन कलर और मेलडी रहता था, that were rich in Hindustani flavour. वो बहुत ही सीधे सादे आदमी थे, कोई दिखावा या शो-ऑफ़ नहीं था, कभी चीप हरकतें नहीं की, कुर्ता-पजामा पहनते थे। उनका कोई भी रिश्तेदार नहीं था, अकेले रहते थे। लेकिन दोस्त इतने ज़्यादा थे कि हमेशा उनके घर में ताँता लगा रहता था, स्ट्रगलर्स बैठे रहते थे। ख़य्याम साहब से भी उनकी दोस्ती हो गई। दोनो ने मिल कर, यानी कि जयदेव वर्मा और ख़य्याम ने मिल कर एक फ़िल्म में संगीत भी दिया था 'शर्मा जी वर्मा जी' के नाम से। आख़िर के दिनों में वो बहुत परेशान थे अपने हाउस ओनर की वजह से, but Government of Maharashtra was kind enough to provide him a place, पर ज़्यादा दिनों तक वो इसका आनन्द नहीं उठा सके।



फ़िल्म 'गमन' में जयदेव ने उभरती गायिका छाया गांगुली को मौका दिया पहली बार फ़िल्म में गाने का और "आपकी याद आती रही रात भर" गा कर छाया गांगुली को मिला उस साल का 'Best Female Playback Singer' का Filmfare Award.

छाया गांगुली:

इससे पहले मुझे ग़ज़ल गाने का कोई तजुर्बा नहीं था। इस अवार्ड से मुझे प्रोत्साहन मिला और अच्छे से अच्छा गाने का। यह उन्हीं की मेहनत और कोशिश का परिणाम है। उसी साल 1979 को 'गमन' के लिए 'Best Music Director' का भी अवार्ड उन्हें मिला। मैंने कभी सोचा नहीं था कि एक दिन मैं फ़िल्म में गायूंगी क्योंकि उस तरह से कभी सोचा नहीं था। वो बहुत ही उदार, जेण्टल और सॉफ़्ट-स्पोकेन थे। नये कलाकारों का हौसला बढ़ाते थे। उन्हें साहित्य, संगीत और कविता से बहुत लगाव था। गीत की एक पंक्ति को लेकर सिंगर से अलग-अलग तरह से उसे गवाते थे। उनके पास जाने से ऐसा लगता है कि नर्वस हो जाऊंगी। उनका घर मेरे ऑफ़िस के नज़दीक ही था। आकाशवाणी में काम करती थी। तो उनका जब बुलावा आया तो पहले दिन तो मैं गई भी नहीं। फिर दूसरे दिन उनके ऐसिस्टैण्ट प्यारेलाल जी बुलाने आये थे। तब मैं गई। वो सामने वाले से इस तरह बात करते थे that he will make you feel very much at ease. उनके संगीत में भारतीय संगीत की मेलडी भी है, साथ ही मांड की लोकशैली भी झलकती है। कहीं न कहीं उनके गीतों में भक्ति रस भी मिल जाता है। मेरा एक ऐल्बम निकला था 'भक्ति सुधा' के नाम से जिसमें उनके भजन थे। उच्चारण सीखने के लिए वो मुझे पंडित नरेन्द्र शर्मा के पास ले गये। उन्हें साहित्य का ज्ञान था, पर फिर भी वो मुझे पंडित जी के पास ले गये ताकि मुझे उनसे सीखने का मौका मिले। उनसे बहुत कुछ सीखने का मुझे मौका मिला।



गायक हरिहरण की आज एक अलग पहचान है, एक अलग मुकाम हासिल कर चुके हैं। पर उनकी प्रतिभा को पहली बार पहचान कर जयदेव ने ही फ़िल्म संगीत में उन्हें पहला ब्रेक दिया था।

हरिहरण:

जयदेव जी का मेरे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। वो मेरे friend, philosopher and guide थे। 1977 में पहली बार मैं उनसे मिला एक कम्पीटिशन में जिसमें वो जज बने थे। वहाँ से मैं उन्हें जानता हूँ। He has treated me as a son. उनका पर्सोनलिटी एक था, वही delicacy and sensitivity जो उनके गीतों में हमें मिलता है, वैसे ही वो आदमी थे, बहुत ही अच्छे और नरम-दिल। मैंने उनके साथ तीन-चार साल काम किया। गाना सीखना, रेकॉर्डिंग्स पर जाना, उन्हें ऐसिस्ट करना, रिहर्सल्स कण्डक्ट करवाना। उन्होंने ही मुझे लाइफ़ की फिलोसोफ़ी सिखायी कि what is life about? He was a magnanimous human-being, बिल्कुल फ़कीर थे। न कुछ लेना न कुछ देना, बस अपने काम से काम रखते थे, लोगों से प्यार करना, संगीत से प्यार करना, बस! 'गमन' में गवाने से पहले उन्होंने मुझसे कहा कि हरि, तुम अच्छा गा लेते हो, रिहर्सल्स करो, तुम हो मद्रासी, अभी उर्दू सीखो। मैं भी चाँद बाला, अभी गुज़र गईं हैं वो, उनसे मैं उर्दू सीखने लगा। जयदेव जी से टाइमली ऐडवाइस मिलने से मुझे सही दिशा मिली। मुज़फ़्फ़र अली ने जब 'गमन' बनाया तो उन्होंने नये नये सिंगर्स को चान्स दिया। उस समय नये लोगों को चान्स मिलना बहुत मुश्किल था क्योंकि बड़े-बड़े सिंगर्स मौजूद थे। इस फ़िल्म में मेरा गीत था "अजीब सानिहा मुझ पर गुज़र गया यारों"। मैंने उनसे पूछा कि यह 'सानिहा' का क्या मतलब है? उन्होंने कहा कि सानिहा मतलब हादसा। मुझे पहले गीत में ही उर्दू में गाने का मौका मिला, यह पूरा उर्दू ही था। मेरी मम्मी आयी थीं रेकॉर्डिंग्‍ पर, फ़िर्स्ट टेक ही ओ.के हो गया। जयदेव जी बहुत ख़ुश हुए। इस गीत के लिए एक-दोन दिन रियाज़ करवाया था। यह अच्छी बात है, इससे गाना याद हो जाता है जिससे इफ़ेक्ट अच्छा होता था, वरना गाने को अपनाने में वक़्त लगता है, रियाज़ करने से अच्छा रहता है।



छाया गांगुली और हरिहरण के साथ-साथ फ़िल्म 'गमन' में एक और गायक ने फ़िल्म संगीत में क़दम रखा। ये हैं सुरेश वाडकर, जो जयदेव से बहुत प्रभावित हैं।

सुरेश वाडकर:

पापाजी ने बहुत मेलोडियस काम किया, ख़ूबसूरत ख़ूबसूरत गाने दिये श्रोताओं के लिए। मैं भाग्यशाली हूँ कि मैंने उनको ऐसिस्ट किया 6/8 महीने। 'सुर सिंगार प्रतियोगिता' जीतने के बाद मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिला। वो मेरे गुरुजी के क्लोज़ फ़्रेण्ड्स में थे। मेरे गुरुजी थे पंडित जियालाल बसन्त, लाहोर से वो उनके करीबी दोस्त थे। पापाजी ने मेरे गुरुजी से कहा कि इसे मेरे पास भेजो, एक्स्पीरियन्स हो जायेगा कि गाना कैसे बनता है, एक अच्छा अनुभव हो जायेगा। मैं गया उनके पास, वहीं पे मेरी लताजी से जान पहचान हो गई। उस समय वो फ़िल्म 'तुम्हारे लिए' का गाना "तुम्हे देखती हूँ" के लिए आया करती थीं। मुझे वहाँ मज़ा आता था, कभी रिदम सेक्शन, कभी सिटिंग्स में जाया करता, तबला लेकर उनके साथ बैठता, कैसे गाना बनता है, शायर भी होते थे वहाँ, फिर गाना बनने के बाद अरेंजमेण्ट कैसे किया जाता है, ये सब मैंने देखा और सीखा। पापाजी भी मुझसे बहुत प्यार करते थे, बिल्कुल अपने बेटे की तरह। सीने में जलन" यह ग़ज़ल बनने से पहले ही मैं थोड़ा बिज़ी हो गया था। उन्होंने मुझसे कहा कि अपने करीयर पे ध्यान दो, इस गाने के बाद उन्होंने कहा कि तुम गाओगे मेरे लिए। मुझे इतनी ख़ुशी हुई कि जिस संगीतकार को बचपन से सुना करता था, अब मैं उन्हीं के गीत गा रहा हूँ। बस एक ही गाना मैंने उनका गाया "सीने में जलन"। पापाजी मेलोडी का बहुत ज़्यादा ध्यान रखते थे। जितने भी बुज़ुर्ग संगीतकार हैं, वो अपने गीतों में हमेशा मेलोडी को ज़िन्दा रखते थे। अभी का ज़माना अलग है, लोगों को जैसा पसन्द है वैसा ही बन रहा है। आज का म्युज़िक भी अच्छा है, बस ज़्यादा ऑरकेस्ट्रेशन है, मेलोडी कम है। आज लोगों को हर गाने में नाचना ज़रूरी है। जयदेव जी और उनके जो कन्टेम्पोररीज़ थे, उनके गीतों में फ़ोक का एक रंग होता था मीठा मीठा सा, गीत क्लासीक़ी और मेलोडी भरा होता था, गाने में चैलेंज हमेशा होता था। पापाजी की सांस थोड़ी कम थी। इसको ध्यान में रख कर गाना बनाते थे कमाल का। "मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया" में छोटे-छोटे टुकड़ों में इतना अच्छा लगता है। गाना शुरु होते ही लगता है कि यह तो पापाजी का गाना है। उनकी पहचान, उनका स्टैम्प उनके गाने में होता था। मैं बहुत भाग्यशाली रहा, उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला।



ये हैं गायक भूपेन्द्र...

भूपेन्द्र:

उनका अनोखा संगीत था, कम्पोज़िशन की शैली ऑरिजिनल थी। अपने गीतों में वो पोएट्री की तह तक पहुँचते थे, हर तरह के कम्पोज़िशन को बख़ूबी अंजाम देते थे। उन्हें काम लेना आता था। कोई ज़ोर नहीं , कोई ज़बरदस्ती नहीं। वो उन संगीतकारों में से थे जो कहते थे कि आप अपनी तरह से समझकर क्या कर सकते हैं कीजिए। आज के संगीतकारों जैसे नहीं जिनको आप कुछ कह नहीं सकते। इससे हर गाने में चार चाँद लग जाता था। आर्टिस्ट को कभी वो डिस्टर्ब नहीं करते थे, बस एक या दो टेक में गाना ओ.के हो जाता था। मैंने के. ए. अब्बास की एक फ़िल्म में अपना पहला गाना गाया था, पर फ़िल्म 'घरौंदा' से मैं पॉपुलर हुआ। "एक अकेला इस शहर में", इस गीत को सुन कर लोगों को लगा होगा कि गाना मीटर में है। This song is a normal song like any other song, वो हर किस्म का गाना बना सकते थे। अगर जयदेव जी आज भी होते तो फ़िल्म संगीत की जो परिभाषा है, उसमें वो अपने आप को ऐडजस्ट कर लेते। I am proud of him, मुझे फ़क्र है उन पर।


सूत्र: विविध भारती, मुंबई
कार्य्रक्रम: सरगम के सितारे
प्रसारण तिथि: 5 जनवरी 2006

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ज़रूरी सूचना:: उपर्युक्त लेख 'विविध भारती' के कार्यक्रम का अंश है। इसके सभी अधिकार विविध भारती के पास सुरक्षित हैं। किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा इस प्रस्तुति का इस्तमाल व्यावसायिक रूप में करना कॉपीराइट कानून के ख़िलाफ़ होगा, जिसके लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ज़िम्मेदार नहीं होगा।



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Sunday, June 8, 2014

संगीत के प्रचार, प्रसार और संरक्षण में संलग्न एक साधक



स्वरगोष्ठी – 171 में आज

व्यक्तित्व – 1 : पण्डित विश्वनाथ श्रीखण्डे 

‘छवि दिखला जा बाँके साँवरिया ध्यान लगे मोहे तोरा...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, आपके प्रिय स्तम्भ की आज से एक नई लघु श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ आरम्भ हो रही है। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे संगीत-साधकों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे जिन्होंने मंच अथवा विभिन्न प्रसारण माध्यमों पर प्रदर्शन से इतर संगीत के प्रचार, प्रसार, शिक्षा, संरक्षण या अभिलेखीकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान किया है। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हम भारतीय संगीत के उच्चकोटि के कलाकार होने के साथ ही संगीत के शास्त्रीय और प्रायोगिक पक्ष के विद्वान पण्डित विश्वनाथ वि. श्रीखण्डे के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे। वर्ष 1983 से 1993 तक उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी में सचिव पद पर रहते हुए उन्होने भारतीय संगीत के प्रचार-प्रसार के साथ ही अभिलेखीकरण का उल्लेखनीय कार्य किया था। आज 80 वर्ष की आयु में भी वे संगीत विषयक विभिन्न कार्यों में सक्रिय हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के पाठकों के लिए सुपरिचित, इसराज और मयूर वीणा के सुप्रसिद्ध वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने श्रीखण्डे जी के व्यक्तित्व और कृतित्व का उल्लेख किया है। यह भी सुखद संयोग है कि श्रीखण्डे जी दो दिन बाद ही अर्थात 10 जून को अपनी आयु के 80 वर्ष पूर्ण कर 81वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। श्रीखण्डे जी को उनके 81वें जन्मदिवस पर ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ अर्पित करता है।

 


ह मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच से शास्त्रीय गायन के उच्चकोटि के कलाकार, संगीत के शास्त्रीय एवं प्रायोगिक पक्ष के मूर्धन्य विद्वान, संगीत के अभिलेखीकरण के विशेषज्ञ और संगीत संस्थाओं के योग्य प्रशासनिक अधिकारी पण्डित विश्वनाथ वि. श्रीखण्डे के व्यक्तित्व और कृतित्व के उल्लेख करने का अवसर मिला। मेरे लिए यह भी सौभाग्य का विषय है कि उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी मे 10 वर्षों तक श्रीखण्डे जी के साथ कार्य करने का अवसर भी मिला। इस अवधि में संगीत के इस बहुआयामी व्यक्तित्व के बारे में जो कुछ भी जान सका उसे आप सबके बीच बाँट रहा हूँ।

पं. श्रीखण्डे जी का जन्म उत्तर प्रदेश के जालौन जनपद स्थित उरई नामक एक छोटे नगर में 10 जून, 1934 को हुआ था। इनके पिता श्री विश्वास राव श्रीखण्डे ने इनकी सांगीतिक प्रतिभा को पहचान कर उरई के ही शिक्षक पं. प्रभुनाथ मिश्र से संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा दिलाई। इसके बाद इन्हें गायन की विविध विधाओं और क्लिष्ट रचनाओं की शिक्षा इलाहाबाद के प्रख्यात संगीतज्ञ पं. भोलानाथ भट्ट से प्राप्त हुई। शास्त्रीय गायन की उच्च शिक्षा विश्वविख्यात गायक उस्ताद अमीर खाँ (इन्दौर) से इन्हें प्राप्त हुई। उस्ताद अमीर खाँ की रागानुसार सटीक सुरलगाव, मीड़, कण, गमक, मुर्की आदि से युक्त स्वर प्रस्तार एवं अन्यान्य कलात्मक विशेषताओं को इन्होंने अपनी गायकी में आत्मसात किया। युवावस्था में ही अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर आपके गायन की भरपूर प्रशंसा हुई। वर्ष 1958 से 1967 तक आकाशवाणी के दिल्ली, नागपुर और हैदराबाद केन्द्रों पर प्रोड्यूसर के रूप में कार्य किया। 1967 से 1972 तक जम्मू कश्मीर के इन्स्टीच्यूट आफ म्यूजिक एंड फाइन आर्ट में प्रधानाचार्य रहे। 1975 से 1982 के बीच भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद की ओर से फीजी के सांस्कृतिक केन्द्र में और फिर उसके बाद मारीशस के महात्मा गाँधी संस्थान में निदेशक पद पर कार्य किया। 1983 में श्रीखण्डे जी ने उतार प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के सचिव पद पर कार्यभार ग्रहण किया और 1993 में यहीं से सेवानिवृत्त हुए। यहाँ प्रशासनिक दायित्व का निर्वहन करते हुए उन्होने अकादमी को अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति दिलायी। इस अवधि में उन्होने संगीत, नाटक और कथक नृत्य के प्रचार, प्रसार और विकास के अनेक नए कार्यक्रमों को मूर्तरूप दिया। इससे भी बढ़कर कम प्रचलित या लुप्तप्राय संगीत शैलियों का सर्वेक्षण, वैज्ञानिक ढंग से उनका संग्रह और अभिलेखीकरण करा कर अकादमी के अभिलेखागार को समृद्ध बनाने में श्रीखण्डे जी का योगदान स्तुत्य है।

आगे बढ्ने से पहले आइए, श्रीखण्डे जी के बहुआयामी व्यक्तित्व के शास्त्रीय गायक पक्ष का अवलोकन करते चलें। वर्तमान में श्रीखण्डे जी की आयु 80 वर्ष हो चुकी है। लगभग दो वर्ष पूर्व संगीत-प्रेमियों की एक बैठक में उन्होने राग बागेश्री का गायन प्रस्तुत किया था। अब हम आपको उसी प्रस्तुति का एक अंश सुनवाते हैं। पण्डित विश्वनाथ श्रीखण्डे द्वारा प्रस्तुत राग बागेश्री के खयाल की इस प्रस्तुति में तबला संगति अनिल खरे ने और वायलिन संगति श्रीपाद तिलक ने की है।


राग बागेश्री : खयाल तीनताल : ‘बलमा मोरी तोरे संग लागली प्रीत...’ : पण्डित विश्वनाथ श्रीखण्डे





श्रीखण्डे जी ने अकादमी के अभिलेखागार को समृद्ध करने के लिए शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम और लोक, सभी विधाओं के वरिष्ठ संगीतज्ञों को आमंत्रित कर उनकी रिकार्डिंग कराई। श्रीखण्डे जी ऐसे अन्वेषक हैं जो महासागर की अथाह गहराई में प्रवेश करके रत्नों को प्राप्त कर लेते हैं। शास्त्रीय और लोक संगीत के वाद्यों के विविध पक्षों से जुड़ी जानकारियों एवं दुर्लभ, पारम्परिक रचनाओं की खोज व उनकी रिकार्डिंग कराई और भावी पीढ़ियों के लिए सुलभ कराया। ध्रुवपद क्षेत्र में स्व. बालजी चतुर्वेदी, स्व. रामचतुर मलिक, स्व. सियाराम तिवारी, स्व. जिया मोहिउद्दीन डागर (रुद्रवीणा), खयाल गायन के क्षेत्र में स्व. काशीनाथ बोडस, स्व. हरिशंकर मिश्र, स्व. मल्लिकार्जुन मंसूर, स्व. जी.एन. नातू, स्व. के.जी. गिण्डे, स्व. रामाश्रय झा आदि, उपशास्त्रीय, सुगम और लोक संगीत के दिग्गज कलाकारों की रिकार्डिंग से अकादमी समृद्ध है। इसी प्रकार श्रीखण्डे जी ने वाद्य संगीत के वरिष्ठ कलाकारों को आमंत्रित कर उनकी वार्ता और प्रस्तुतियों की रिकार्डिंग कराई। अकादमी में संग्रहीत सांगीतिक सामग्री का अध्ययन कर अनेक शोधछात्र और अध्येता लाभान्वित हो चुके हैं। श्रीखण्डे जी ने अपने कार्यकाल में लगभग 3000 घण्टे की गुणात्मक महत्त्व की विविध पारम्परिक व दुर्लभ सामग्री का संग्रह कराया था।

अभिलेखागार को समृद्ध बनाने के अलावा श्रीखण्डे जी ने कई नए कार्यक्रमों का सूत्रपात और पहले से जारी कई कार्यक्रमों को विस्तार भी दिया था। इनमें अकादमी की सांस्कृतिक आदान-प्रदान योजना, सम्भागीय व प्रादेशिक संगीत प्रतियोगिता, कथक समारोह, नाट्य समारोह, कठपुतली समारोह, अवध संध्या आदि के आयोजन में उनकी दृष्टि की सराहना कलाप्रेमी आज भी करते हैं। कलाप्रेमियों से सीधे संवाद के लिए उन्होने कलामित्र योजना का आरम्भ भी किया था। कलासाधकों और कलाप्रेमियों के बीच उन्होने सेतु बनाने का सफल प्रयास किया। आइए, अब श्रीखण्डे जी की आवाज़ में एक ठुमरी सुनी जाए। पूरब अंग की मिश्र खमाज की इस ठुमरी में तबला संगति सतीश तारे ने और हारमोनियम संगति विवेक दातार ने की है। आप इस ठुमरी का रसास्वादन कीजिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ठुमरी मिश्र खमाज : ‘छवि दिखला जा बाँके साँवरिया ध्यान लगे मोहे तोरा...’ : पण्डित विश्वनाथ श्रीखण्डे






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 171वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक पुरानी फिल्म के बेहद लोकप्रिय गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 180वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश को सुन कर गायक कलाकार को पहचानिए और हमें उनका नाम लिख भेजिए।

2 – इस गीतांश में आपको किस राग का आधार दिख रहा है? राग का नाम लिखिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 173वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 169वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको तंत्रवाद्य सारंगी के लोक स्वरूप में वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राजस्थानी सारंगी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राजस्थान। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, चंडीगढ़ के हरकीरत सिंह तथा पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर ‘व्यक्तित्व’ शीर्षक से एक नवीन श्रृंखला आरम्भ हुई है। इस श्रृंखला में हम शास्त्रीय संगीत के कुछ ऐसे कलाकारों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं जिन्होंने मंच प्रदर्शन के अलावा अन्य क्षेत्रों में यश पाया है। अगले अंक में हम आपसे एक ऐसे संगीतकार की चर्चा करेंगे जिन्होंने फिल्म संगीत को रागों से सुसज्जित कर अपना योगदान किया है। आप भी यदि ऐसे किसी संगीतकार की जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पते पर भेज दें। अपने पाठको/श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित/प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।



आलेख : श्रीकुमार मिश्र  
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


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