Wednesday, July 13, 2016

"मेरी बदकिस्मती रही कि मैं पंचम के साथ कभी काम नहीं कर पाया" - अमित खन्ना (पार्ट 01) :एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है (19)

Amit Khanna 
भारतीय सिने जगत के एक लीजेंड हैं अमित खन्ना, फिल्म लेखन, निर्माण, निर्देशन, संगीत, टेलिविज़न, साहित्य, शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो फिल्म निर्माण से जुड़ा जिसमें अमित जी का उल्लेखनीय दखल न हो. आज के हमारे कार्यक्रम में हमारे मेहमान हैं, अमित खन्ना जी, जो आपके लिए लेकर आये हैं उनके लिखे कुछ चुनिदा गीतों का नजराना, साथ ही सुनें उन गीतों से जुड़े कुछ खट्टे मीठे अनुभव, जानिए क्यों अमित जी कभी पंचम के साथ काम नहीं कर पाए, और जानिये कि देव साहब का दिया वो कौन सा अमूल्य मंत्र है जिसमें अमित जी को हमेशा ही जवान बनाये रखा है.



एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें 

Tuesday, July 12, 2016

पापा जब बच्चे थे - अशोक भाटिया

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में सौरभ शर्मा की मार्मिक कथा "नदी, जो झील बन गई" का वाचन सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं, अशोक भाटिया की लघुकथा पापा जब बच्चे थे, अनुराग शर्मा के स्वर में। पुनर्जन्म लेते एक नगर की मार्मिक कथा को दो मित्रों के पत्राचार के माध्यम से सौरभ ने बहुत खूबसूरती से प्रस्तुत किया है।

इस लघुकथा पापा जब बच्चे थे का मूल गद्य द्वैभाषिक मासिक पत्रिका सेतु पर उपलब्ध है। लघुकथा का कुल प्रसारण समय 3 मिनट 54 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



अम्बाला छावनी में जन्मे अशोक भाटिया की मुख्य कृतियाँ: जंगल में आदमी, अँधेरे में आँख (लघुकथा-संग्रह), लोकल विद्वान (व्यंग्य), समकालीन हिंदी लघुकथा (आलोचना) के अलावा 'निर्वाचित लघुकथाएं' और 'नींव के नायक' हैं।

विविध: 'समुद्र का संसार' पुस्तक पर हरियाणा साहित्य अकादमी का पुस्तक पुरस्कार। 'भीतर का सच' लघुकथा और 'चक्रव्यूह' नाटक पर लघु फ़िल्में।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी कहानी


" बेटी के आत्मविश्वास को चार चाँद लग गए।”
 (अशोक भाटिया की कथा "पापा जब बच्चे थे" से एक अंश)


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पापा जब बच्चे थे MP3

#Fourteenth Story, papa jab bachche the: Ashok Bhatia /Hindi Audio Book/2016/14. Voice: Anurag Sharma

Sunday, July 10, 2016

राग मधुवन्ती : SWARGOSHTHI – 278 : RAG MADHUVANTI



स्वरगोष्ठी – 278 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 11 : पुण्यतिथि पर सुरीला स्मरण

“रस्म-ए-उल्फ़त को निभाएँ तो निभाएँ कैसे...”



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ जारी है। अब हम श्रृंखला के समापन की ओर अग्रसर हैं। श्रृंखला की ग्यारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी दे रहे हैं। आगामी 14 जुलाई को मदन मोहन की पुण्यतिथि पड़ रही है। इस अवसर पर हम उनकी स्मृतियों को नमन करते है और उन्हीं के एक उल्लेखनीय गीत के माध्यम से उनका स्मरण कर रहे हैं। श्रृंखला की ग्यारहवीं कड़ी में आज हम आपको राग मधुवन्ती के स्वरों में पिरोये गए 1973 में प्रदर्शित फिल्म ‘दिल की राहें’ से एक सुमधुर गीत का रसास्वादन कराएँगे। इस राग आधारित गीत को स्वर दिया है, लता मंगेशकर ने। गीत से पहले स्वयं मदन मोहन की आवाज़ में हम उनका एक वक्तव्य भी सुनवा रहे हैं। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग मधुवन्ती के स्वरों पर आधारित इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम सुप्रसिद्ध वायलिन वादिका विदुषी एन. राजम्, उनकी सुपुत्री संगीता शंकर तथा दोनों नातिन, रागिनी और नंदिनी का समवेत रूप से बजाया राग मधुवन्ती की तीनताल में निबद्ध एक सुमधुर रचना भी दृश्य रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।


दन मोहन ने आज के इस गीत के बारे में एक बार कहा था - "मैं यह समझता हूँ कि हर फ़नकार का जज़्बाती होना ज़रूरी है, क्योंकि अगर उसमें इन्सानियत का जज़्बा नहीं है, तो वो सही फ़नकार नहीं हो सकता। भगवान ने कुछ फ़नकारों को ज़्यादा ही जज़्बाती बनाया है। यह गाना मुझे बहुत पसन्द है, बहुत ख़ूबसूरती से गाया गया है, सुन के कुछ एक अजीब सी कैफ़ियततारी होती है। दर्द भरा गाना है, पर दर्द भी इन्सान की ज़िन्दगी का हिस्सा है। इससे इन्सान कब तक दूर भाग सकता है?", ये शब्द निकले थे संगीतकार मदन मोहन के मुख से विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में फ़िल्म 'दिल की राहें' की ग़ज़ल "रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें तो निभायें कैसे..." सुनवाने से पहले। मदन मोहन के फ़िल्मी गीतों व ग़ज़लों की बात करें तो ऐसा अक्सर हुआ कि वो फ़िल्में नहीं चली पर उन फ़िल्मों को आज तक अगर लोगों ने याद रखा तो सिर्फ़ और सिर्फ़ उनके गीतों की वजह से। केवल 70 के दशक की ही अगर बात करें तो 'महाराजा', 'दस्तक', 'माँ का आँचल', 'हँसते ज़ख़्म', 'मौसम' और 'दिल की राहें' कुछ ऐसी फ़िल्में हैं जो बॉक्स ऑफ़िस पर ज़्यादा कमाल नहीं दिखा सके, पर आज इन फ़िल्मों के ज़िक्र पर सबसे पहले इनके गानें याद आते हैं। मदन मोहन की मौसिक़ी और लता मंगेशकर की आवाज़ में जितनी भी ग़ज़लें बनीं हैं, वो सभी एक से बढ़ कर एक है, और उन्हें सुनते हुए ऐसा लगता है कि जैसे ये जन्नत में बन कर धरती पर उतारे गये हैं। इन ग़ज़लों का पूरा श्रेय मदन मोहन और लता जी को दे दें और इनके शायरों को याद न करें, यह बहुत बड़ी ग़लत बात जो जायेगी। राजा मेंहदी अली ख़ाँ, राजेन्द्र कृष्ण और मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे ग़ज़लों को मदन मोहन ने सबसे ज़्यादा स्वरबद्ध किया। पर 1973 में दो फ़िल्में ऐसी आयीं जिनमें बतौर गीतकार नक्श लायलपुरी साहब ने कमान सम्भाली। ये फ़िल्में थीं 'प्रभात' और 'दिल की राहें'। फ़िल्म 'प्रभात' में लता के गाये कई गीत थे जिनमें सबसे ज़्यादा उल्लेखनीय है मुजरा गीत "साक़िया क़रीब आ, नज़र मिला..." और फ़िल्म 'दिल की राहें' के गीतों और ग़ज़लों के तो क्या कहने। मन्ना डे और उषा मंगेशकर की युगल आवाज़ों में "अपने सुरों में मेरे सुरों को बसा लो, मेरा गीत अमर हो जाये..." और लता मंगेशकर की गायी फिल्म 'दिल की राहें' की दो श्रेष्ठ रचनाएँ थीं। इन दो फ़िल्मों के अलावा नक्श साहब ने मदन जी के साथ एक और फ़िल्म के लिए भी गीत लिखे पर वह फ़िल्म नहीं बनी।

"रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें..." ग़ज़ल के बनने की कहानी चौंकाने वाली है। हुआ यूँ कि एक सिचुएशन पर गीत लिखने के लिए मदन मोहन ने नक्श लायलपुरी को एक धुन दे दी थी और नक्श साहब को गीत लिख कर रविवार की सुबह मदन जी के घर ले जाना था। और वह गीत अगले दिन (सोमवार) को रेकॉर्ड होना था क्योंकि लता जी ने डेट दे रखी थी। तो नक्श साहब गीत लिख कर मदन मोहन के घर पहुँचे रविवार सुबह 11 बजे। उनका लिखा हुआ गीत मदन जी ने पढ़ा और उनसे कहा कि फ़िल्म के निर्माता (सुल्तान एच. दुर्रानी और एस. कौसर) ने कहा है कि उन्हें अपनी फ़िल्म में मदन मोहन से एक ग़ज़ल चाहिये। अगर मदन मोहन के साथ ग़ज़ल नहीं बनायी तो फिर क्या काम किया, ऐसा निर्माता महोदय ने मदन मोहन से कहा है। तो अब मदन जी भी चाहते हैं कि उसी धुन पर नक्श साहब एक ग़ज़ल लिख दे। अब नक्श साहब मदन जी को ना भी नहीं कह सकते थे, वो दुविधा में पड़ गये। यह तनाव भी था कि अगले ही दिन रेकॉर्ड करना है, अगर लिख ना सके तो क्या होगा! लता जी की डेट बेकार हो जाएगी, वगेरह-वगेरह। ये सब सोचते-सोचते वो मदन जी के घर से बाहर निकल आये। उन्होंने घड़ी देखा, सुबह के 11 बज रहे थे। उन्होंने सोचा कि अगर वो पेडर रोड से मुलुंड वापस जाकर लिखेंगे तो काफ़ी समय बरबाद हो जायेगा, और फिर वापस भी आना है, इसलिए वो चौपाटी में फुटपाथ के एक कोने में जाकर बैठ गए और मन ही मन सोचने लगे कि इतने कम समय में लिखें तो लिखें कैसे, गीत को ग़ज़ल बनायें तो बनायें कैसे, इस मुसीबत से निकले तो निकले कैसे? और ये सब सोचते-सोचते उनके मुख से निकल पड़े कि रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें तो निभायें कैसे। बस, कलम चलने लगी, कभी रुकती, कभी चलती, कभी वो सोचते, कभी मुस्कुराते, ऐसा करते-करते ग़ज़ल पूरी हो गई। और शाम 4 बजे नक्श साहब जा पहुँचे मदन मोहन जी के घर। अगले दिन ग़ज़ल रेकॉर्ड हो गई। लता और मदन मोहन जोड़ी के ग़ज़लों के बारे में तो सब जानते थे, इस बार नक्श साहब की भी ख़ूब तारीफ हुईं। नक्श साहब ने एक मुलाक़ात में बताया था कि बरसों बाद मदन मोहन जी की याद में मुम्बई के चेम्बुर में एक कार्यक्रम आयोजित हुआ था जिसमें नक्श साहब को भी आमन्त्रित किया गया था। जब इस ग़ज़ल को बजाया गया, तब किसी ने कहा कि "रस्म-ए-उल्फ़त..." के बाद और कोई गाना मत बजाना।

मदन मोहन के बारे में गीतकार और शायर नक्श लायलपुरी के क्या विचार हैं, उन्हीं के शब्दों में पढ़िये - "उनसे मिलने से पहले मैंने जो कुछ भी सुन रखा था मदन मोहन के बारे में, कि वो शॉर्ट-टेम्पर्ड हैं, वगेरह-वगेरह, वो सब ग़लत बातें हैं। वो ऐसे पहले संगीतकार थे जिन्होंने मेरे सर पर कभी पहाड़ नहीं रखा। वो गीतकारों और शायरों को छूट देते थे। वो किसी सिटिंग्‍ में ज़्यादा से ज़्यादा 20 मिनट बैठते और मुझे कभी भी किसी गीत को पूरा करने के लिए कभी समय की पाबन्दी नहीं दी। निर्माता जब किसी धुन को सिलेक्ट कर लेते थे, तब मदन जी मुझे बुलाते और समझाते। वो समय के बड़े पाबन्द थे और अगर कोई देर से आया तो वो ग़ुस्सा हो जाते थे। किसी गीत को कम्पोज़ करने के लिए वो 10 मिनट का समय लेते थे। लेकिन जब कोई निर्माता उन्हें साइन करवाने आते तो वो उनसे एक महीने का समय माँग लेते ताकि उन्हें अपना मनपसन्द स्टुडियो, मनपसन्द कलाकार और साज़िन्दों से डेट्स मिल जाये। इन सब चीज़ों के लिए वो किसी की ख़ुशामद करना बिल्कुल पसन्द नहीं करते थे। स्टुडियो, साज़िन्दे और गायक तय हो जाने पर वो पाँच-छह गीत एक के बाद एक रेकॉर्ड कर लेते, एक गीत प्रति दिन के हिसाब से।" नक्श लायलपुरी के उस मुलाक़ात में उन्होंने यह बताया कि मदन मोहन फ़िल्म 'लैला मजनूं' में नक्श साहब को बतौर गीतकार लेना चाहते थे। मदन मोहन साहिर लुधियानवी को नहीं लेना चाहते थे क्योंकि साहिर अपने गीतों में फेर-बदल बिल्कुल पसन्द नहीं करते और उधर मदन मोहन की आदत थी कि हर गीत में कुछ न कुछ फेर-बदल कर देते थे। पर 'लैला मजनूं' के निर्माता एच. एस. रवैल साहिर के पक्ष में थे, और मदन जी को झुकना पड़ा क्योंकि उन्हें उस वक़्त पैसों को सख़्त ज़रूरत थी अपने लोनावला के बंगले के निर्माण के लिए। 'लैला मजनूं' के रिलीज़ के बाद मदन मोहन जब नक्श लायलपुरी से मिले तो उनसे कहा कि वो 'लैला मजनूं' से भी बड़े फ़िल्म में नक्श साहब से गीत लिखवायेंगे, पर वह दिन आने से पहले ही मदन जी अचानक इस दुनिया को छोड़ कर चले गये। उसी मुलाक़ात में जब नक्श साहब से यह पूछा गया कि मदन जी का कौन सा गीत उन्हें सर्वाधिक पसन्द है, तो उन्होंने फ़िल्म 'अनपढ़' के "आपकी नज़रों ने समझा..." गीत की तरफ़ इशारा किया। नक्श साहब ने यह भी बताया कि इसी गीत के मीटर पर उन्होंने फ़िल्म 'दिल की राहें' में ही एक गीत लिखा था "आप की बातें करें या अपना अफ़साना कहें, होश में दोनो नहीं हैं किसको दीवाना कहें..."। पर "रस्म-ए-उल्फ़त" ही ज़्यादा मशहूर हुआ।


राग मधुवन्ती : “रस्म-ए-उलफत को निभाएँ तो निभाएँ कैसे...” : लता मंगेशकर : फिल्म – दिल की राहें



डॉ. एन. राजम् अपनी पुत्री संगीता शंकर और नातिनें नंदिनी और रागिनी के साथ
राग मधुवन्ती को तोड़ी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग की जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है, क्योंकि इसके आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इस राग में कोमल गान्धार, तीव्र मध्यम तथा शेष सभी शुद्ध स्वर प्रयोग होते हैं। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित है। राग मधुवन्ती का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। इसके गायन-वादन का उपयुक्त समय दिन का तीसरा प्रहर माना जाता है। यह राग कर्नाटक संगीत के 29वें मेलकर्त्ता राग धर्मावती के समतुल्य है। राग मधुवन्ती बहुत प्राचीन राग नहीं है। जानकारों के अनुसार इस राग की रचना मैहर घराने के विख्यात संगीतज्ञ उस्ताद अली अकबर खाँ ने की थी। स्वयं अली अकबर और पण्डित रविशंकर ने इस राग को ख्याति दिलाई। राग मुल्तानी के ऋषभ और धैवत स्वरों के कोमल रूप को शुद्ध स्वर में परिवर्तित कर देने से राग मधुवन्ती का स्वरूप बनता है। मुल्तानी के समान राग मधुवन्ती में मन्द्र निषाद से आगे बढ़ते समय गान्धार पर मध्यम स्वर का कण लेकर आगे बढ़ते हैं। राग मधुवन्ती के वादी-संवादी स्वरों और गायन समय में परस्पर विरोध है। वादी-संवादी स्वरों की दृष्टि से यह उत्तरांग प्रधान राग होना चाहिए, परन्तु गायन समय की दृष्टि से यह पूर्वांग प्रधान राग है। थाट की दृष्टि से यह राग दस थाट में से किसी भी थाट के उपयुक्त नहीं है। विद्वानो ने न जाने क्यों इसे तोड़ी थाट के अन्तर्गत मान लिया है। व्यांकटमखी द्वारा निर्धारित 72 मेल में से यह धर्मावती मेल के सर्वाधिक अनुकूल है। कुछ विद्वान इस राग को अम्बिका नाम से भी पुकारते हैं, किन्तु यह मधुवन्ती नामसे अधिक लोकप्रिय है। राग मधुवन्ती के यथार्थ स्वरूप का परिचय देने के लिए आज हमने वायलिन वाद्य को चुना है। वायलिन पर गायकी अंग में राग मधुवन्ती प्रस्तुत कर रही हैं, विश्वविख्यात विदुषी डॉक्टर एन. राजम् अपनी सुपुत्री संगीता शंकर और नातिने नन्दिनी और रागिनी के साथ। विदुषी एन. राजम् के गुरु पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर ग्वालियर घराने के थे, इसलिए स्वयं को इसी घराने की शिष्या मानतीं हैं। घरानॉ के सम्बन्ध में उनका मत है कि कलाकार को किसी एक ही घराने में बाँध कर नहीं रखा जा सकता। संगीत के कलाकार को हर घराने की अच्छाइयों का अनुकरण करना चाहिए। घरानों की प्राचीन परम्परा के अनुसार तीन पीढ़ियों तक यदि विधा की विशेषता कायम रहे तो प्रथम पीढ़ी के नाम से घराना स्वतः स्थापित हो जाता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो आने वाले समय में राजम् जी के नाम से भी यदि एक नए घराने का नामकरण हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। डॉ. राजम् को प्रारम्भिक शिक्षा अपने पिता पण्डित नारायण अय्यर से मिली। उनके बड़े भाई पण्डित टी.एन. कृष्णन् कर्नाटक संगीत पद्यति के प्रतिष्ठित और शीर्षस्थ वायलिन-वादक रहे हैं। डॉ. राजम् की एक भतीजी विदुषी कला रामनाथ वर्तमान में विख्यात वायलिन-वादिका हैं। राजम् जी की सुपुत्री और शिष्या संगीता शंकर अपनी माँ की शैली में ही गायकी अंग में वादन कर रहीं हैं। यही नहीं संगीता की दो बेटियाँ अर्थात डॉ. राजम् की नातिनें- नन्दिनी और रागिनी भी अपनी माँ और नानी के साथ मंच पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रही हैं। अब हम आपको एक ही परिवार की इन चार कलाकारों का समवेत वायलिन वादन का वीडियो दिखाते हैं। आप इस वीडियो का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने देने की अनुमति दीजिए।


राग मधुवन्ती : गायकी अंग में वायलिन वादन : एन. राजम्, संगीता शंकर, नन्दिनी और रागिनी





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 278वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक बार पुनः संगीतकार मदन मोहन के संगीत से सजे एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन का आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में पुरुष कण्ठ-स्वर को पहचानिए और हमे इस गायक का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 17 जुलाई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 276 की संगीत पहेली में हमने आपको मदन मोहन के संगीत निर्देशन में बनी और 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘आशियाना’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – केदार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है – ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक – तलत महमूद

इस बार की पहेली में छः प्रतिभागियों ने सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं - चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हमारे एक नये प्रतिभागी दिलीप देशपाण्डे। इन सभी विजेताओं ने दो-दो अंक अर्जित किये है। सभी विजेता प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में जारी हमारी श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की आज की कड़ी में आपने राग मधुवन्ती का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में हम फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। हमारी अगली श्रृंखला “वर्षा ऋतु के राग” विषय पर आधारित होगी। इस श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव या फरमाइश ऊपर दिये गए ई-मेल पते पर शीघ्र भेजिए। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


 


Saturday, July 9, 2016

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 14: धर्मेन्द्र


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 14
 
धर्मेन्द्र



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक केन्द्रित है सुपरस्टार धर्मेन्द्र पर।

  
फ़िल्म जगत की कुछ सफलता की कहानियाँ इस तरह की होती हैं जिन्हें पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे कि वह
कहानी हक़ीक़त ना होकर कोई सपना हो। ऐसी ही कहानी है अभिनेता सुपरस्टार धर्मेन्द्र की। पंजाब के लुधियाना ज़िले के एक छोटे से गाँव नसरली में एक बहुत ही साधारण परिवार में जन्म हुआ धरम सिंह देओल का। पिता केवल किशन सिंह देओल एक स्कूल हेडमास्टर थे। ऐसे परिवार का बेटा अगर फ़िल्मों में जाना चाहे तो घर पर क्या माहौल होगा इसका अन्दाज़ा लगाना मुश्किल काम नहीं। धरम सिंह के पिता भी अन्य पिताओं की तरह अपने बेटे के लिए उच्च शिक्षा के सपने देखते थे। लेकिन धरम की कोमल आँखें एक असंभव स्वप्न देखने लगीं। उनके दिमाग़ में एक अभिनेता बनने का ख़याल घर कर गई। बिना कुछ सोचे-समझे वो अपने इस सपने में तरह तरह के रंग भरने लगे। उन दिनों एक सामान्य परिवार के लड़के के लिए फ़िल्मों में प्रवेश करना आसान काम नहीं था। पर जिसकी हर साँस में फ़िल्मों की ख़ुशबू समाया हो, उसे कोई कब तक रोक सकता है भला! कक्षा-VIII तक धरम ने कोई फ़िल्म ही नहीं देख रखी थी। फ़िल्म और सिनेमा उनके लिए किसी स्वपनलोक से कम नहीं था। माता-पिता बेहद सख़्त होने की वजह से उन्हें फ़िल्म देखने की अनुमति नहीं थी। एक बार जब उनके दोस्त एक फ़िल्म देख कर वापस आकर बहुत उत्तेजित दिख रहे थे, तब धरम ने उनसे पूछा कि आख़िर फ़िल्म में होता क्या है? उनके दोस्त ज़्यादा कुछ बता तो नहीं सके, बस इतना कहा कि फ़िल्म में तसवीरें बोलती हैं! कक्षा-IX में पहुँचने पर उन्हें ’शहीद’ फ़िल्म देखने की घर से अनुमति मिली। उसमें दिलीप कुमार का अभिनय देख कर धरम सिंह देओल हैरान रह गए। उन्होंने सोचा, "ये सुन्दर जगत भला कौन सा है? यह स्वर्ग कहाँ स्थित है? मैं भी उसका हिस्सा बनना चाहता हूँ!" जैसे जैसे वो जवान होते गए, फ़िल्मों का नशा उनके सर चढ़ कर बोलने लगा।

एक बार उन्हें ख़बर मिली कि ’फ़िल्मफ़ेअर’ कंपनी एक ’टैलेण्ट हण्ट’ प्रतियोगिता करने वाली है नए चेहरों के
लिए। अपने पिता से छुपा कर, लेकिन अपनी माँ को बता कर, धरम ने फ़िल्मफ़ेअर का फ़ॉर्म भर दिया और बम्बई के लिए पोस्ट कर दिया। पंजाब दा गबरू जवान होने की वजह से प्रथम दौर में उनका चुनाव होना तो लाज़मी था। बुलावा आया बम्बई से प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए। और क़िस्मत का खेल ही कहिए, या उनका रूप-रंग, या अभिनय के लिए उनकी तड़प, धरम सिंह देओल वह प्रतियोगिता जीत गए। लेकिन महज़ यह प्रतियोगिता जीतने की वजह से उनके पीछे निर्माताओं की लाइन नहीं लग गई। अब बारी थी उनके फ़िल्म जगत में दाख़िले के संघर्ष की। पंजाब के उस हरियाली भरे स्वस्थ वातावरण से सीधे बम्बई के दूषित और अपरिचित वातावरण में घुल-मिल जाने के लिए उन्हें काफ़ी वक़्त लगा। उपर से आर्थिक संकट। बहुत से दिन ऐसे गुज़रे जब उन्हें पेट भर खाना तक नसीब न हुआ। केवल पानी पी कर न जाने कितनी रातों को वो सो गए! दिन में स्टुडियोज़ के चक्कर, निर्माताओं से गुज़ारिश, अनुनय-विनय, और रात को फिर से वही ख़्वाब, वही सपना, जो उन्हें थकने नहीं देता था। पैसों की कमी की वजह से कई बार उनके लिए स्टुडियो जाना तक संभव नहीं होता था। एक बार उन्हें ऑडिशन के लिए बुलाया गया, पर जब निर्माता ने ऑडिशन के बाद उनके टैक्सी का किराया देने से इनकार कर दिया, तो वो बहुत नाराज़ हुए थे। ऐसे में शशि कपूर, जो वहाँ मौजूद थे, उन्होंने धरम को अपने साथ अपने घर ले गए और उन्हें भर पेट खाना भी खिलाया। एक वर्ष तक इस तरह की उधार की ज़िन्दगी जीने के बाद ज़िन्दगी मुस्कुराई और उन्हें उनकी पहली फ़िल्म मिली ’दिल भी तेरा हम भी तेरे’। और धरम सिंह देओल बन गए धर्मेन्द्र। बाकी इतिहास है! धरमेन्द्र की यह कहानी हमें यह सिखाती है कि कोई असंभव सपना देखना कोई बुरी बात नहीं। पर उस सपने को साकार करने के लिए मन में दृढ़ संकल्प, आत्मविश्वास और मेहनत करने का जसबा होना चाहिए, फिर सफलता झक मार कर क़दम चूमेगी!




आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 

खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



Thursday, July 7, 2016

आज की महफ़िल में सुनिए क्यों संगीतकार खय्याम दस वर्ष की छोटी उम्र में घर से भाग गए?

खय्याम 
महफ़िल ए कहकशाँ 8



दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज सुनिए आशा भोंसले की गाई और खय्याम साहब द्वारा संगीतबद्ध यह ग़ज़ल |


मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे 
स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी





Wednesday, July 6, 2016

"संगीत से जुड़े सभी लोग एक बड़े परिवार के जैसे हैं" -श्रध्दा भिलावे : एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है (18)

फिल्म संगीत जगत में महिलाओं का दखल अधिकतर पार्श्व गायन तक ही सीमित है. गीतकार और संगीतकार श्रेणी में मात्र गिनती की इतनी ही महिलायें हैं, जितनी हम उँगलियों पे गिन सके. ऐसे में एक युवा कवियित्री का गीत लेखन की दुनिया में आना एक शुभ संकेत है. लीजिये आज मिलिए गीतकारा श्रध्दा भिलावे से, जिन्होंने हाल ही में प्रदर्शित फिल्म "सेवन अवर्स टू गो" से गीत लेखन की शुरुआत की है. मिलिए श्रध्दा भिलावे से और जानिये उनकी इस पहली फिल्म का अनुभव. 


एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें 

Sunday, July 3, 2016

राग केदार : SWARGOSHTHI – 277 : RAG KEDAR और विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे को श्रद्धांजलि




स्वरगोष्ठी – 277 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 10 : जब राज कपूर की आवाज़ बने तलत साहब

‘मैं पागल मेरा मनवा पागल, पागल मेरी प्रीत रे...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ जारी है। श्रृंखला की दसवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी दे रहे हैं। गत 25 जून को हमने मदन मोहन का 93वाँ जन्मदिन मनाया। श्रृंखला की दसवीं कड़ी में आज हम आपको राग केदार के स्वरों में पिरोये गए 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘आशियाना’ से एक सुमधुर गीत का रसास्वादन कराएँगे। इस राग आधारित गीत को स्वर दिया है, तलत महमूद ने। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग केदार स्वरों पर आधारित इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी शुभा मुद्गल के स्वरों में राग केदार में निबद्ध तीनताल की एक सुमधुर बन्दिश भी प्रस्तुत कर रहे हैं।


मदन मोहन और तलत महमूद
"हालाँकि संगीत के सिद्धान्तों का ज्ञान और बुनियादी नियमों के बारे में जानना बहुत ज़रूरी है, पर यह ज़रूरी नहीं कि जिस किसी ने भी ये बातें सीख ली वो संगीत में मास्टर बन गया। संगीत को परम्परागत तरीके से किसी गुरु के चरणों में बैठ कर सीखा जाए यह ज़रूरी नहीं। मेरा ख़याल है कि संगीत कानों से भी सीखा जा सकता है अगर किसी में सीखने की मन से आकांक्षा हो तो। संगीत एक ऐसी कला है जिसे अनिच्छुक छात्रों के अन्दर ज़बरदस्ती प्रवेश नहीं कराया जा सकता किसी पाठ्यक्रम के माध्यम से। जो संगीत के लिए पागल है, वही इसमें महारथ हासिल कर सकता है। संगीत के दिग्गजों के साथ काम करने की वजह से मुझे संगीत शिक्षा को करीब से ग्रहण करने और इसे समझने का मौक़ा मिला। बहुत आसानी पर स्पष्ट तरीके से संगीत ने मुझे चारों ओर से जकड़ लिया। मुझे नहीं मालूम कब और कैसे मेरी कानों में संगीत की लहरियाँ प्रतिध्वनित होने लगी जो मैं रोज़ सुना करता था। और इसी तरीक़े से मैंने वास्तव में संगीत सीखा।" मदन मोहन के इन शब्दों का सार हम सब की समझ में आ गया होगा। आइए अब आते हैं आज के गीत पर। आज हमने चुना है तलत महमूद की आवाज़ में राग केदार पर आधारित और ताल कहरवा में निबद्ध फ़िल्म ’आशियाना’ का मशहूर गीत "मैं पागल मेरा मनवा पागल..."। मदन मोहन तलत साहब के ग़ज़ल गायकी से वाक़िफ़ थे और लखनऊ के अपने शुरुआती दिनों से ही एक दूसरे को जानते-पहचानते थे। मदन मोहन के फ़िल्म-संगीत सफ़र के शुरुआती सालों में तलत महमूद ने उनके लिए कई गीत गाए। यह सच है कि जब बाद के वर्षों में रफ़ी साहब की इण्डस्ट्री में बहुत ज़्यादा डिमाण्ड हो गई थी तब तलत साहब को उनकी तुलना में कम गाने मिलने लगे थे, तब फ़िल्म ’जहाँआरा’ के निर्देशक ने फ़िल्म के सभी गीत रफ़ी साहब की आवाज़ में रेकॉर्ड करने का सुझाव मदन मोहन को दिया। पर मदन मोहन इस बात पर अन्त तक अड़े रहे कि तलत इस फ़िल्म में कम से कम तीन गीत ज़रूर गाएँगे और बाक़ी गीत रफ़ी गाएँगे। इस बात पर उन्होंने स्वेच्छा से फ़िल्म छोड़ने का प्रस्ताव तक दे दिया निर्माता को। तब जाकर निर्माता ओम प्रकाश जी ने मदन जी को आश्वस्त किया, और मदन जी ने तलत साहब से "फिर वही शाम...", "तेरी आँख के आँसू..." और "मैं तेरी नज़र का सुरूर हूँ..." गवाया जो तलत साहब के करीअर में भी मील के पत्थर सिद्ध हुए।

तलत महमूद
अब बातें ’आशियाना’ की। 1951 में फ़िल्म ’आँखें’ के संगीत की सफलता ने उसी साल मदन मोहन को जे. बी. एच. वाडिया की एक फ़िल्म दिला दी। फ़िल्म थी ’मदहोश’। इस फ़िल्म ने उनके सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी। मदन जी के ही शब्दों में - "जब मैं ’मदहोश’ पर काम कर रहा था, एक दिन वाडिया साहब हाज़िर हुए एक सिचुएशन के साथ जिसके लिए वो एक प्रभावशाली गीत चाहते थे जो एक धोखा देने वाले प्रेमी के जज़्बात बयाँ करे। राजा मेंहदी अली ख़ाँ फ़िल्म ’मदहोश’ के गीत लिख रहे थे। इस सिचुएशन को सुनते ही उन्होंने कहा कि इस तरह के भाव पर उन्होंने कुछ समय पहले एक गीत लिखा है, अगर सबको ठीक लगे तो यह गीत लिया जा सकता है। उन्होंने अपनी नोटबूक निकाली और गीत पढ़ने लगे। पाँच मिनट में मैंने गीत की धुन तैयार कर दी और वाडिया साहब को सुनाया। वो बहुत ख़ुश हुए और गीत भी बड़ा पॉपुलर हुआ। वह गीत था "मेरी याद में तुम ना आँसू बहाना..."। यह मदन मोहन और तलत महमूद की जोड़ी का पहला सुपरहिट गीत था। इसके बाद "आँसू" शब्द वाले कई तलत-मदन गीत बने। ‘मदहोश’ बनने के अगले ही साल 1952 में बनी फिल्म ’आशियाना’ जिसमें राज कपूर और नरगिस की जोड़ी थी। इस फ़िल्म के संगीत ने मदन मोहन को अव्वल दर्जे के संगीतकारों की श्रेणी में ला खड़ा किया। मदन मोहन के अनुसार यह उनकी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक है और ख़ास तौर से तलत महमूद का गाया "मैं पागल मेरा मनवा पागल..." उनके दिल के बहुत क़रीब है जिसे कम्पोज़ करने में उन्हें पूरा एक महीना लग गया था। संगीत की समझ रखने वाले राज कपूर भी ’आशियाना’ के गीत-संगीत से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कहा, "अगर मेरी फ़िल्मों में सिर्फ़ इस तरह का संगीत हो तो मैं अपनी फ़िल्मों को अनन्तकाल तक थिएटरों में चला सकता हूँ।" भले इस फ़िल्म के संगीत की बहुत तारीफ हुई, पर फ़िल्म बुरी तरह से पिट गई। बहुत वर्षों के बाद जब मदन मोहन की कुछ फ़िल्में दोबारा प्रद्रशित हुईं और अब की बार हिट हुईं, तब उन्हें शीर्ष के संगीतकार का दर्जा लोगों ने दिया। लीजिए, अब आप यही गीत सुनिए।


राग केदार : “मैं पागल मेरा मनवा पागल...” : तलत महमूद : फिल्म – आशियाना


शुभा मुद्गल
भक्तिरस की अभिव्यक्ति के लिए केदार एक समर्थ राग है। कर्नाटक संगीत पद्यति में राग हमीर कल्याणी, राग केदार के समतुल्य है। औड़व-षाड़व जाति, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में छह स्वरों का प्रयोग होने वाला यह राग कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाता है। प्राचीन ग्रन्थकार राग केदार को बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते थे, आजकल अधिकतर गुणिजन इसे कल्याण थाट के अन्तर्गत मानते हैं। इस राग में दोनों मध्यम का प्रयोग होता है। शुद्ध मध्यम का प्रयोग आरोह और अवरोह दोनों में तथा तीव्र मध्यम का प्रयोग केवल अवरोह में किया जाता है। आरोह में ऋषभ और गान्धार स्वर और अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित होता है। कभी-कभी अवरोह में गान्धार स्वर का अनुलगन कण का प्रयोग कर लिया जाता है। राग केदार में तीव्र मध्यम आरोह में पंचम के साथ और शुद्ध मध्यम आरोह और अवरोह दोनों में प्रयोग किया जाता है। कभी-कभी अवरोह में धैवत से मध्यम को जाते समय मींड़ के साथ दोनों मध्यम एक साथ प्रयोग किया जाता है। यह प्रयोग रंजकता से परिपूर्ण होता है। राग हमीर के समान राग केदार में कभी-कभी अवरोह में मधुरता बढ़ाने के लिए कोमल निषाद विवादी स्वर के रूप में प्रयोग किया जाता है। राग का चलन वक्र होता है, किन्तु तानों में वक्रता का नियम शिथिल हो जाता है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस दृष्टि से यह उत्तरांग प्रधान राग होगा, क्योंकि मध्यम स्वर उत्तरांग का और षडज स्वर पूर्वांग का स्वर होता है। मध्यम स्वर का समावेश सप्तक के पूर्वांग में नहीं हो सकता। राग का एक नियम यह भी है कि वादी-संवादी दोनों स्वर सप्तक के एक अंग में नहीं हो सकते। इस दृष्टि से यह राग उत्तरांग प्रधान तथा दिन के उत्तर अंग में अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाना चाहिए। परन्तु राग केदार प्रचलन में इसके ठीक विपरीत रात्रि के पहले प्रहर में ही गाया-बजाया जाता है। राग केदार उपरोक्त नियम का अपवाद है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के पहले प्रहर में किया जाता है। राग केदार का स्पष्ट अनुभव करने के लिए अब हम आपको इस राग के स्वरों से अभिसिंचित एक सुमधुर बन्दिश सुनवा रहे हैं। यह खयाल रचना विख्यात गायिका विदुषी शुभा मुद्गल ने प्रस्तुत किया है। शुभा जी से आप तीनताल में निबद्ध राग केदार की यह रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग केदार : “काहे सुन्दरवा बोलो नाहिं...” : विदुषी शुभा मुद्गल




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 277वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक बार पुनः मदन मोहन के राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 9 जुलाई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 279वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 275 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1970 में प्रदर्शित फिल्म ‘दस्तक’ से राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – चारुकेशी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और सितारखानी तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायिका – लता मंगेशकर

इस बार की संगीत पहेली में पाँच प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। ये विजेता हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी पाँच विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

हार्दिक श्रद्धांजलि : विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे


खयाल, टप्पा और भजन की सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे का गत 29 जून को निधन हो गया। उनके निधन से ग्वालियर धराने की गायकी का एक सितारा अस्त हो गया। उनकी गायकी में ग्वालियर घराने के साथ-साथ जयपुर और किराना घराने की गायकी की झलक भी मिलती थी। उनका जन्म 14 सितम्बर 1948 को संगीतज्ञों के परिवार में हुआ था। उनके पिता पण्डित शंकर श्रीपाद बोड़स ग्वालियर घराने के विख्यात संगीतज्ञ और पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर के शिष्य थे। वीणा जी की संगीत-शिक्षा पहले अपने पिता से और बाद में अपने अग्रज पण्डित काशीनाथ बोड़स से प्राप्त हुई। आगे चल कर उन्हें वरिष्ठ संगीतज्ञों, पण्डित बलवन्तराव भट्ट, पण्डित वसन्त ठकार और पण्डित गजाननराव जोशी का मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। वर्ष 1968 में वीणा जी ने कानपुर विश्वविद्यालय से संगीत, संस्कृत और अँग्रेजी विषय से स्नातक, 1969 में अखिल भारतीय गन्धर्व मण्डल से संगीत में स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की। आगे चल कर 1979 में उन्होने कानपुर विश्वविद्यालय से संस्कृत में स्नातकोत्तर और 1988 में अखिल भारतीय गन्धर्व मण्डल से डॉक्ट्रेट की उपाधि अर्जित की। 1968 में उनका विवाह श्री हरि सहस्त्रबुद्धे से हुआ। वर्ष 1972 में वीणा जी को आकाशवाणी का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1993 में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से अलंकृत किया गया। 2013 का केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी का पुरस्कार जब भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने उन्हें प्रदान किया, उसी वर्ष वह एक असाध्य रोग से ग्रसित हो गई थीं। उन्हे पुरस्कार समारोह में व्हील चेयर पर ले जाया गया था। इसी रोग से ग्रसित होकर गत 29 जून को उनका निधन हो गया। निधन से लगभग दस दिन पूर्व ‘स्वरगोष्ठी’ के 275वें अंक का प्रकाशन 19 जून को किया गया था, जिसमें वीणा जी के स्वर में राग छायानट में निबद्ध खयाल प्रस्तुत किया गया था। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे की स्मृतियों को नमन करता है और उन्हे अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
अगले रविवार को श्रृंखला की एक एक नई कड़ी के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।  

शोध एवं आलेख : सुजॉय चटर्जी 
 प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



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