Saturday, October 11, 2014

किशोर कुमार को याद करती हुईं फ़िल्म-जगत की तीन देवियाँ



स्मृतियों के स्वर - 11


किशोर कुमार को याद करती हुईं फ़िल्म-जगत की तीन देवियाँ






'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों के साक्षात्कार प्रस्तुत किये जाते थे, जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत की तमाम हस्तियों की कलात्मक ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकिया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ हमारे इस स्तम्भ के लिए, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर। इस स्तम्भ में हम और आप, साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। आज के इस अंक में प्रस्तुत है, हरफ़नमौला किशोर कुमार के बारे में फ़िल्म जगत की तीन अभिनेत्रियों द्वारा कहे हुए शब्द और किशोर दा से जुड़ी उनकी स्मृतियाँ। 13 अक्तुबर को किशोर कुमार की पुण्यतिथि है; किशोर दा को नमन करती है आज की यह प्रस्तुति। 
 

सूत्र : 'विविध भारती' के अलग-अलग कार्यक्रमों से संकलित


माला सिन्हा



"वो सबसे अच्छे कॉमेडियन, और एक बहुत अच्छे इंसान थे। मैंने उनके साथ दो हिन्दी फ़िल्मों में काम किया। एक था आइ. एस. जौहर का 'बेवकूफ़' और दूसरा एस. डी. नारंग का 'बम्बई का ठग'। सेट पे वो एक मिनट चुप नहीं बैठते थे। जैसे कोई स्प्रिंग लगा हो। हर डिरेक्टर की नकल करना, एस. डी. नारंग कैसे बात करते हैं, के. एन. सिंह की इतनी अच्छी नकल करते थे वो। टैप डान्स, मैंने उन जैसा किसी को करते हुए नहीं देखा। किशोर दा असली जीनियस थे। He was a great actor, वो जो दादा गये, सो गये, उन जैसा अब कोई नहीं आ सकता, कोई आनेवाला नहीं। उनका गाना, गाना जैसे नहीं लगता, जैसे कि वो बात कर रहे हैं, very very expressive। मुझे गाने के रेकॉर्डिंग्‍स पर जाने का शौक था। जब भी मुझे पता चलता कि कहीं पे रेकॉर्डिंग चल रही है, मैं वहाँ पहुँच जाती थी। एक बार 'महबून स्टुडियोस' में किशोर दा के किसी गाने की रेकॉर्डिंग में मैं पहुँच गई। रेकॉर्डिंग से पहले कोई भी सिंगर कुछ चीज़ों से परहेज़ करते हैं, जैसे कि ठंडा पानी, इमली वगेरह। तो किशोर दा ने कहा कि मेरे लिए लेमन सोडा ले आओ, वह भी बरफ़ डाल कर। मैंने उनसे जाके पूछा, "दादा, आप रेकॉर्डिंग्‍ के समय ठंडा पीने की ज़िद कर रहे हैं, गला ख़राब नहीं हो जायेगा?" तो उन्होंने कहा कि अरे ये सब वहम है, जिसको उपरवाले का देन है, उसे कुछ नहीं होता। इतना ज़िंदादिल इंसान मैंने कहीं और नहीं देखा।"


शशिकला 


"'करोड़पति' हमारे घर की फ़िल्म थी। इसमें मैं थी, और हमारे किशोर कुमार थे। म्युज़िक था शंकर-जयकिशन का। लेकिन फ़िल्म बिल्कुल नहीं चली। गाने भी नहीं चले। शंकर-जयकिशन के होने के बावजूद नहीं चले। हम कहते थे कि 'करोड़पति' बनाते-बनाते हम कंगालपति बन गये। किशोर दा, उन दिनों में, मेरा ख़याल है सिर्फ़ तीन या चार आर्टिस्ट टॉप में थे - दिलीप कुमार, राज कपूर, देव आनन्द और किशोर कुमार। उनसे मिलना बहुत मुश्किल का काम था। टाइम देते थे, पर मिलते नहीं थे। टाइम देते थे, पर कभी नहीं आते थे। बिल्कुल शैतान बच्चे की तरह। आपको मैं उनका आख़िरी क़िस्सा सुनाती हूँ। फ़िल्म तो बन गई, फ़्लॉप भी हो गई, चली नहीं, ये सब हुआ, एक दिन मुझे फ़ोन आता है उनका कि शशि, तुम मुझे मिलने आओ। तो मैं गई अपने फ़्रेन्ड के साथ मिलने के लिए। तो बात कर रहे हैं, मुझे हार्ट-अटैक हो गया, ऐसा हुआ, वैसा हुआ, और अचानक मुझे आवाज़ आती है, 'टाइम अप, टाइम अप, टाइम अप'। मैं तो घबरा गई, मैंने कहा कि अरे यह आवाज़ कहाँ से आ रही है? हँसने लगे, हा हा हा, पता है मैं हार्ट का पेशण्ट हूँ न, इसलिए यहाँ पे एक रेकॉर्डिंग करके रखी है, पाँच मिनट से ज़्यादा किसी से बात नहीं करनी है। मैंने कहा कि किशोर दा, आपने मुझे डरा ही दिया बिल्कुल, और बहुत ईमोशनल थे। मेरा ख़याल है, very emotional person। उनके तो कितने क़िस्से हैं, जितना सुनाये तो कम है, पर बहुत ही अच्छे, बहुत ही कमाल के आर्टिस्ट, जीनियस भी कहना चाहिए, देखिये गाने भी उन्होंने कितने अच्छे लिखे, म्युज़िक भी कितना अच्छा दिया, गाते तो अच्छा थे ही।"


लीना चन्दावरकर



"किशोर जी में जो एक बच्चा था, वह बच्चा उनके साथ ही रहता था, और वह आख़िर तक था। आशा जी को भी आप पूछिये कि किस तरह से वो... मैं शुरू शुरू में थोड़ा डर गई थी क्योंकि ये क्या करते हैं हरकतें न! और ऐसे डराते थे! मैंने उनके बारे में बहुत कुछ सुन रखा था, जब मैं फ़िल्मों में काम कर रही थी। कहीं न कहीं से उनका ज़िक्र आ ही जाता था। रवैल साहब, 'महबूब की मेहन्दी' के सेट पे, सब उनकी बातें कर रहे थे। किशोर जी के बारे में तो सबसे दिलचस्प टॉपिक होता था। तो 'शराफ़त' फ़िल्म में उन्होंने काम किया था रवैल साहब के साथ। राजकुमार जी, मीना जी। तो मैं वहाँ पे नयी थी तो सुनती थी इंटरेस्ट लेके कि क्या बातें हो रही हैं और ये सब सीनियर आर्टिस्ट्स हैं। तो बाद में (उनसे शादी होने के बाद) मुझे मालूम हुआ कि सब बढ़ा-चढ़ा कर बोलते थे। किशोर जी को मैंने ऐसा कभी नहीं देखा। बहुत ही बैलेन्स्ड इंसान थे, उनको थोड़ा सा था कि लोगों को दिखाये कि मैं पागलपन करता हूँ। उनको मज़ा आता था। दादामुनि थे न, अशोक कुमार जी, दादामुनि को वो कहते थे कि दादामुनि, तुम सयाने बन के फँस जाते हो, मैं पागल बन के बच जाता हूँ। क्योंकि एक दिन बर्थडे था उनका और उन्होंने किसी को इनवाइट नहीं किया था, और पता भी नहीं था कि खाना बनाना है कि क्या करना है! हम लोग गये थे, हमको तो पता था कि दादामुनि का बर्थडे है। भाभी ने हमारे लिए पूरी-तरकारी, उनको मालूम था कि इनकी क्या पसन्द है। बुलाने की क्या ज़रूरत है, सबको पता था कि दादामुनि का बर्थडे है तो करीबी लोग आने लगे। एक एक करके आने लगे और बैठ गये। किशोर जी भी बैठे हैं और एक दम, गाना भी गा रहे हैं। सुनाये जा रहे हैं, सबको मज़ा आ रहा है। तो खाने का वक़्त आ गया, डिनर। खाना भी बनाया था। लेकिन इतने लोग आ गये कि इतने लोगों का खाना है नहीं घर में। भाभी परेशान, बाद में कैसे भी करके मैनेज किया, होटल वगेरह से मँगवा के। हम इतने परेशान थे कि अभी ऑर्डर करेंगे, फिर दस लोग आ जायेंगे तो क्या होगा? क्योंकि रात हो चली थी। तो दादामुनि ने अन्दर आके मुझसे कहा कि अब क्या होगा, मैंने इतने लोगों को इनवाइट तो नहीं किया था, तेरी भाभी इतने लोगों का कैसे खाना बनायेगी? तो किशोर दा बड़ा मज़ा ले रहे थे। बोले कि तुम बड़े सयाने हो ना, इसलिये फँस जाते हो, मैं तो पागल हूँ, मैं बच जाता हूँ। दादामुनि ने कहा कि तू तो कंजूस है। तो किशोर जी ने कहा कि नहीं नहीं मैं कंजूस नहीं हूँ, लेकिन तुमको करना पड़ेगा, इस तरह से कोई उनको बोले तो अच्छा नहीं लगता था, कहते हैं न 'rules and regulations', उनको लगता था कि हर एक को आज़ादी मिलनी चाहिये। कोई ऐबनॉर्मल बीहेव नहीं करेंगे, लेकिन अगर कोई उनसे कहे तो ये करना पड़ेगा।"


कॉपीराइट: विविध भारती



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Sunday, October 5, 2014

‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...’ : SWARGOSHTHI – 188 : THUMARI BHAIRAVI



स्वरगोष्ठी – 188 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 7 : ठुमरी भैरवी

पण्डित भीमसेन और सहगल की आवाज़ में सुनिए लौकिक और आध्यात्मिक भाव का बोध कराती यह कालजयी ठुमरी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया के साप्ताहिक स्तम्भ स्वरगोष्ठी के मंच पर मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी साथी प्रस्तुतकर्त्ता संज्ञा टण्डन के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का अभिनन्दन करता हूँ। इन दिनों जारी हमारी श्रृंखला 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी के सातवें अंक में आज हम एक कालजयी पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी संस्करण के साथ उपस्थित हैं। इस श्रृंखला में आप कुछ ऐसी पारम्परिक ठुमरियों का रसास्वादन कर रहे हैं जिन्हें फिल्मों में कभी यथावत तो कभी परिवर्तित अन्तरे के साथ इस्तेमाल किया गया। फिल्मों मे शामिल ऐसी ठुमरियाँ अधिकतर पारम्परिक ठुमरियों से प्रभावित होती हैं। रेडियो प्लेबैक इण्डिया के कुछ स्तम्भ केवल श्रव्य माध्यम से प्रस्तुत किये जाते हैं तो कुछ स्तम्भ आलेख और चित्र, दृश्य माध्यम के साथ और गीत-संगीत श्रव्य माध्यम से प्रस्तुत होते हैं। इस श्रृंखला से हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। श्रृंखला के अंकों को हम प्रायोगिक रूप से दोनों माध्यमों में प्रस्तुत कर रहे हैं। रेडियो प्लेबैक इण्डिया की प्रमुख सहयोगी संज्ञा टण्डन की आवाज़ में पूरा आलेख और गीत-संगीत श्रव्य माध्यम से भी प्रस्तुत किया जा रहा है। हमारे इस प्रयोग पर आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिएगा। आज के अंक में हम अवध के नवाब वाजिद अली शाह की सुविख्यात ठुमरी- बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय... का गायन पारम्परिक और फिल्मी दोनों रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। ठुमरी का पारम्परिक गायन पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में और फिल्मी रूप, फिल्म स्ट्रीट सिंगर मेँ कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ में प्रस्तुत किया गया है। जिन पाठकों को देवनागरी लिपि पढ़ने मेँ असुविधा होती है उनके लिए संज्ञा टण्डन की आवाज़ मेँ प्रस्तुत आलेख और गीतों का श्रव्य रूप अवश्य रुचिकर होगा। 


नवाब वाजिद अली शाह
 चौथे से लेकर छठें दशक तक की हिन्दी फिल्मों के संगीतकारों ने राग आधारित गीतों का प्रयोग कुछ अधिक किया था। उन दिनों शास्त्रीय मंचों पर या ग्रामोफोन रेकार्ड के माध्यम से जो बन्दिशें, ठुमरी, दादरा आदि बेहद लोकप्रिय होती थीं, उन्हें फिल्मों में कभी-कभी यथावत और कभी अन्तरे बदल कर प्रयोग किये जाते रहे। चौथे दशक के कुछ संगीतकारों ने फिल्मों में परम्परागत ठुमरियों का बड़ा स्वाभाविक प्रयोग किया था। फिल्मों में आवाज़ के आगमन के इस पहले दौर में राग आधारित गीतों के गायन के लिए सर्वाधिक यश यदि किसी गायक को प्राप्त हुआ, तो वह कुन्दनलाल (के.एल.) सहगल ही थे। उन्होने 1938 में प्रदर्शित ‘न्यू थियेटर’ की फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ में शामिल पारम्परिक ठुमरी- ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...’ गाकर उसे कालजयी बना दिया। आज के अंक में हम आपसे भैरवी की इसी ठुमरी से जुड़े कुछ तथ्यों पर चर्चा करेंगे।

अवध के नवाब वाजिद अली शाह संगीत, नृत्य के प्रेमी और कला-संरक्षक के रूप में विख्यात थे। नवाब 1847 से 1856 तक अवध के शासक रहे। उनके शासनकाल में ही ठुमरी एक शैली के रूप में विकसित हुई थी। उन्हीं के प्रयासों से कथक नृत्य को एक अलग आयाम मिला और ठुमरी, कथक नृत्य का अभिन्न अंग बनी। नवाब ने 'कैसर' उपनाम से अनेक गद्य और पद्य की रचनाएँ भी की थी। इसके अलावा ‘अख्तर' उपनाम से दादरा, ख़याल, ग़ज़ल और ठुमरियों की भी रचना की थी। 7 फरवरी, 1856 को अंग्रेजों ने जब उन्हें सत्ता से बेदखल किया और बंगाल के मटियाबुर्ज नामक स्थान पर नज़रबन्द कर दिया तब उनका दर्द ठुमरी भैरवी –‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ में अभिव्यक्त हुआ। नवाब वाजिद अली शाह की यह ठुमरी इतनी लोकप्रिय हुई कि तत्कालीन और परवर्ती शायद ही कोई शास्त्रीय या उपशास्त्रीय गायक हो जिसने इस ठुमरी को न गाया हो। 1936 के लखनऊ संगीत सम्मलेन में जब उस्ताद फैयाज़ खाँ ने इस ठुमरी को गाया तो श्रोताओं की आँखों से आँसू निकल पड़े थे। इसी ठुमरी को पण्डित भीमसेन जोशी ने अनूठे अन्दाज़ में गाया, तो विदुषी गिरिजा देवी ने बोल-बनाव से इस ठुमरी का अध्यात्मिक पक्ष उभारा है। फिल्मों में भी इस ठुमरी के कई संस्करण उपलब्ध हैं। 1938 में बनी फिल्म 'स्ट्रीट सिंगर' में कुन्दनलाल सहगल के स्वरों में यह ठुमरी भैरवी सर्वाधिक लोकप्रिय हुई। लेकिन सहगल साहब की आवाज़ में यह ठुमरी सुनने से पहले हम प्रस्तुत कर रहे है, पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में इस ठुमरी का पारम्परिक अंदाज।  


ठुमरी भैरवी : ‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ : पण्डित भीमसेन जोशी 




फिल्म 'स्ट्रीट सिंगर' में कुन्दनलाल सहगल
चौथे और पाँचवें दशक की फिल्मों में रागदारी संगीत की उन रचनाओं को शामिल करने का चलन था जिन्हें संगीत के मंच पर अथवा ग्रामोफोन रेकार्ड के माध्यम से लोकप्रियता मिली हो। फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ में इस ठुमरी को शामिल करने का उद्येश्य भी सम्भवतः यही रहा होगा। परन्तु किसे पता था कि लोकप्रियता की कसौटी पर यह फिल्मी संस्करण, मूल पारम्परिक ठुमरी की तुलना में कहीं अधिक चर्चित हो जाएगा। इस ठुमरी का साहित्य दो भावों की सृष्टि करता है। इसका एक लौकिक भाव है और दूसरा आध्यात्मिक। फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ में सहगल द्वारा प्रस्तुत इस ठुमरी को अपार लोकप्रियता मिली, वहीं उन्होने इस गीत में दो बड़ी ग़लतियाँ भी की है। इस बारे में उदयपुर के ‘राजस्थान साहित्य अकादमी’ द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘मधुमती’ में एक लेख प्रकाशित हुआ था जिसके कुछ अंश हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।

“बहुधा कुछ उक्तियाँ, फिकरे या उदाहरण लोककण्ठ में इस प्रकार समा जाते हैं कि कभी-कभी तो उनका आगा-पीछा ही समझ में नहीं आता, कभी यह ध्यान में नहीं आता कि वह उदाहरण ही गलत है, कभी उसके अर्थ का अनर्थ होता रहता है और पीढी-दर-पीढी हम उस भ्रान्ति को ढोते रहते हैं जो लोककण्ठ में आ बसी है। ‘देहरी भई बिदेस...’ भी ऐसा ही उदाहरण है जो कभी था नहीं, किन्तु सुप्रसिद्ध गायक कुन्दनलाल सहगल द्वारा गायी गई कालजयी ठुमरी में भ्रमवश इस प्रकार गा दिये जाने के कारण ऐसा फैला कि इसे गलत बतलाने वाला पागल समझे जाने के खतरे से शायद ही बच पाये।

पुरानी पीढी के वयोवृद्ध गायकों को तो शायद मालूम ही होगा कि वाजिद अली शाह की शरीर और आत्मा के प्रतीकों को लेकर लिखी रूपकात्मक ठुमरी ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...’ सदियों से प्रचलित है जिसके बोल लोककण्ठ में समा गये हैं– ‘चार कहार मिलि डोलिया उठावै मोरा अपना पराया छूटो जाय...’ आदि। उसमें यह भी रूपकात्मक उक्ति है– ‘देहरी तो परबत भई, अँगना भयो बिदेस, लै बाबुल घर आपनो मैं चली पिया के देस...’। जैसे पर्वत उलाँघना दूभर हो जाता है वैसे ही विदेश में ब्याही बेटी से फिर देहरी नहीं उलाँघी जाएगी, बाबुल का आँगन बिदेस बन जाएगा। यही सही भी है, बिदेस होना आँगन के साथ ही फबता है, देहरी के साथ नहीं, वह तो उलाँघी जाती है, परबत उलाँघा नहीं जा सकता, अतः उसकी उपमा देहरी को दी गई। हुआ यह कि गायक शिरोमणि कुन्दनलाल सहगल किसी कारणवश बिना स्क्रिप्ट के अपनी धुन में इसे यूँ गा गये ‘अँगना तो पर्वत भया देहरी भई बिदेस...’ और उनकी गायी यह ठुमरी कालजयी हो गई। सब उसे ही उद्धृत करेंगे। बेचारे वाजिद अली शाह को कल्पना भी नहीं हो सकती थी कि बीसवीं सदी में उसकी उक्ति का पाठान्तर ऐसा चल पड़ेगा कि उसे ही मूल समझ लिया जाएगा। सहगल साहब तो ‘चार कहार मिल मोरी डोलिया सजावैं...’ भी गा गये जबकि कहार डोली उठाने के लिए लगाये जाते हैं, सजाती तो सखियाँ हैं। हो गया होगा यह संयोगवश ही अन्यथा हम तो कालजयी गायक सहगल के परम- प्रशंसक हैं।”

वर्ष 1938 में ‘न्यू थियेटर’ द्वारा निर्मित फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ के निर्देशक फणी मजुमदार थे। फिल्म के संगीत निर्देशक रायचन्द्र (आर.सी.) बोराल ने अवध के नवाब वाजिद अली शाह की इस कृति के लिए कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ को चुना। फिल्म में सहगल साहब ने अपनी गायी इस ठुमरी पर स्वयं अभिनय किया है। उनके साथ अभिनेत्री कानन देवी हैं। हालाँकि उस समय पार्श्वगायन की शुरुआत हो चुकी थी, परन्तु फिल्म निर्देशक फणी मजुमदार ने गलियों में पूरे आर्केस्ट्रा के साथ इस ठुमरी की सजीव रिकार्डिंग और फिल्मांकन किया था। एक ट्रक के सहारे माइक्रोफोन सहगल साहब के निकट लटकाया गया था और चलते-चलते यह ठुमरी और दृश्य रिकार्ड हुआ था। सहगल ने भैरवी के स्वरों का जितना शुद्ध रूप इस ठुमरी गीत में किया है, फिल्म संगीत में उतना शुद्ध रूप कम ही पाया जाता है। आप सुनिए, कुन्दनलाल सहगल के स्वरों में यह ठुमरी।


ठुमरी भैरवी : ‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ : कुन्दनलाल सहगल : फिल्म – स्ट्रीट सिंगर




और अब प्रस्तुत है, इस श्रृंखला 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के सातवें अंक के आलेख और गीतों का समन्वित श्रव्य संस्करण। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार की सक्रिय सदस्य संज्ञा टण्डन ने अपनी भावपूर्ण आवाज़ से सुसज्जित किया है। आप इस प्रस्तुति का रसास्वादन कीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ठुमरी भैरवी : ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...’ : फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 7 : वाचक स्वर – संज्ञा टण्डन




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 188वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक पुरानी ठुमरी का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 190वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस ठुमरी अंश में आपको किस राग की झलक मिलती है?

2 – इस गीतांश में किस ताल का प्रयोग हुआ है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 190वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 186वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको विश्वविख्यात गायक पण्डित भीमसेन जोशी जी की बुलन्द गायकी का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए इसी अंक में प्रस्तुत पारम्परिक ठुमरी का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ठुमरी की स्थायी की पंक्ति है- 'बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...'।  इस अंक की पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर मिन्नेसोटा, अमेरिका से दिनेश कृष्णजोइस, जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


कुछ अपनी कुछ आपकी

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है हमारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’। इस श्रृंखला में हमने एक नया प्रयोग किया है। ‘स्वरगोष्ठी’ के परम्परागत आलेख, चित्र और गीत-संगीत के आडियो रूप के साथ-साथ सम्पूर्ण आलेख, गीतों के साथ श्रव्य माध्यम से भी प्रस्तुत किया जा रहा है। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा? हमें अवश्य लिखिएगा। हमारे अनेक पाठक हर सप्ताह अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। आप भी इस अंक पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। आप अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों की हम प्रतीक्षा करेंगे।

वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Saturday, October 4, 2014

"मेरो गाम काठा पारे...", सफ़ेद-क्रान्ति की ही तरह यह गीत भी पहुँचा था देश के कोने कोने तक


एक गीत सौ कहानियाँ - 42
 

‘मेरो गाम काठा पारे...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ से, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ - 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 42-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'मंथन' के यादगार गीत "मेरो गाम काठा पारे..." के बारे में।


80 का दशक कलात्मक फ़िल्मों का स्वर्ण-युग रहा। जिन फ़िल्मकारों ने इस जौनर को अपनी अर्थपूर्ण फ़िल्मों से समृद्ध किया, उनमें से एक नाम है श्याम बेनेगल का। उनकी 1977 की फ़िल्म 'मंथन' सफ़ेद-क्रान्ति (Operation Flood - The White Revolution) पर बनी थी। देश के कोने-कोने तक हर घर में रोज़ दूध पहुँचे, हर बच्चे को दूध नसीब हो, समूचे देश भर में दूध की नदियाँ बहने लगे, दूध की प्रचुरता हो, यही उद्देश्य था सफ़ेद-क्रान्ति का। फ़िल्म की कहानी डॉ. वर्गिस कुरिएन और श्याम बेनेगल ने संयुक्त रूप से लिखी थी। बताना ज़रूरी है कि कुरिएन भारत के सफ़ेद-क्रान्ति के जनक माने जाते हैं। फ़िल्म की पृष्ठभूमि कुछ इस तरह से थी कि गुजरात के खेड़ा ज़िले के कुछ गरीब कृषकों की सोच को सामाजिक कार्यकर्ता त्रिभुवनदास पटेल ने अंजाम दिया और स्थापित हुआ Kaira District Co-operative Milk Producers' Union और जल्दी ही यह गुजरात के अन्य ज़िलों में भी शुरू हो गया जिसने एक आन्दोलन का रूप ले लिया। इसी शुरुआत से आगे चल कर स्थापना हुई डेरी कौपरेटिव 'अमूल' की, गुजरात के आनन्द इलाके में। साल था 1946, और आगे चल कर इस कौपरेटिव में करीब 26 लाख लोगों की भागीदारी हुई। 1970 में इसने 'सफ़ेद-क्रान्ति' की शुरुआत कर दी अपना राष्ट्रव्यापी दूध-ग्रिड बनाकर, और 1973 में बनी ‘Gujarat Co-operative Milk Marketing Federation Ltd.(GCMMF)। इसी संस्था के कुल 5,00,000 सदस्यों ने 2 रुपये प्रति सदस्य योगदान देकर 'मंथन' फ़िल्म को प्रोड्यूस किया, और जब यह फ़िल्म रिलीज़ हुई तो ट्रक भर भर कर गाँव वाले आये "अपनी" इस फ़िल्म को देखने के लिए। एक कलात्मक और ग़ैर-व्यावसायिक फ़िल्म होते हुए भी इस फ़िल्म ने बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाबी के झंडे गाड़ दिये, जो फ़िल्म इतिहास में एक मिसाल है। स्मिता पाटिल, गिरीश करनाड, नसीरुद्दीन शाह, कुलभूषण खरबन्दा, अमरीश पुरी प्रमुख अभिनीत 'मंथन' को 1978 में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला; साथ ही सर्वश्रेष्ठ पटकथा का राष्ट्रीय पुरस्कार भी इस फ़िल्म के लिए विजय तेन्दुलकर को ही मिला। भारत की तरफ़ से ऑस्कर के लिए भी यही फ़िल्म मनोनीत हुआ। फ़िल्म के लोकप्रिय गीत "मेरो गाम काठा पारे..." के लिए गायिका प्रीति सागर को सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार दिया गया। इस गीत को बाद में 'अमूल' कम्पनी ने अपने विज्ञापन के लिए प्रयोग किया। गुजराती लोक-धुन की छाया लिये इस गीत में एक महिला के अपने प्रेमी को देखने की आस को दर्शाया गया है। 'अमूल' के विज्ञापन में इस गीत के साथ-साथ स्मिता पाटिल भी नज़र आती हैं और साथ ही स्क्रीन पर नज़र आते हैं ये शब्द - “Every morning 17 lac women across 9,000 villages, bringing in milk worth Rs.4 crores, are now celebrating their economic independence. Thanks to the co-operative movement called Amul.”

वनराज भाटिया
फ़िल्म 'मंथन' के संगीतकार थे कलात्मक फ़िल्मों में संगीत देने के लिए मशहूर वनराज भाटिया। गायिका प्रीति सागर भी उन्हीं की खोज थी। विविध भारती के एक साक्षात्कार में जब उनसे पूछा गया कि प्रीति सागर को उन्होंने कैसे खोजा, तो उन्होंने बताया कि प्रीति की माँ ऐन्जेला वनराज जी की क्लासमेट हुआ करती थीं 'न्यू ईरा स्कूल' में। उसके बाद कॉलेज में भी, यहाँ तक कि एम.ए तक दोनो क्लासमेट रहे। इस तरह से वो प्रीति के सम्पर्क में आये। कम बजट की फ़िल्में होने की वजह से वनराज भाटिया ने प्रीति सागर से कई गीत गवाये और प्रीति की अलग हट कर आवाज़ ने हर गीत में एक अलग ही चमक पैदा की। 'मंथन' के इस गीत के बारे में भी वनराज भाटिया ने उस साक्षात्कार में बताया था। "शुरू-शुरू में इस फ़िल्म के लिए किसी गीत की योजना नहीं थी। केवल पार्श्व-संगीत की ही योजना था। पर फ़िल्म के स्क्रिप्ट राइटर सत्यदेव दुबे ने कहा कि कम से कम एक गीत ज़रूर होना चाहिये फ़िल्म में। तब जाकर मैंने एक गीत कम्पोज़ की। यह एक प्रेरित गीत था, an inspired song। मैं, प्रीति और उसकी बहन नीति एक दिन दोपहर को बैठ गये और इस गीत की रचना शुरु हुई। हम तीनो ने मिल कर इस गीत के बोल भी लिखे और गीत को डेवेलप करते गये। नीति ने बोलों को पॉलिश किया। जब गीत बन कर बाहर आया तो मध्यप्रदेश के लोगों ने कहा कि यह उनकी भाषा है, गुजरातियों ने कहा कि यह उनकी भाषा है, राजस्थानियों ने कहा कि यह उनकी भाषा है। पर सच्चाई यही है कि यह स्टुडियो की भाषा थी। जब हमने यह गीत बनाया तो इसका इस्तेमाल फ़िल्म में बतौर पार्श्वसंगीत के रूप में होना था। यह गीत फ़िल्म में कुल सात बार बजता है। ओपेनिंग सीक्वेन्स में 1.5 मिनट के लिए जिसमें नामावली दिखाई जाती है। मैंने पूछा कि टाइटल म्युज़िक 1.5 मिनट का कैसे हो सकता है क्योंकि श्याम बेनेगल उसमें एक अन्तरा भी चाहते थे। मैंने कहा कि अन्तरा कैसे फ़िट होगा इधर? उन्होंने मुझसे गीत का लय बढ़ाकर अन्तरा शामिल करने का सुझाव दिया। और यही वजह है कि इस शुरुआती संस्करण में गीत की रफ़्तार थोड़ी तेज़ है। और फ़िल्मांकन में तेज़ रफ़्तार से जाती हुई ट्रेन के सीन से मैच भी हो गया। उसके बाद स्पीड स्वाभाविक कर दिया जाता है जब गिरिश करनाड जाने लगते हैं और नायिका दौड़ती हुई आती है, उस वक़्त पूरा गीत सही स्पीड में आ जाता है।" वनराज भाटिया ने आगे बताया कि यह किसी लोक गीत की धुन नहीं है, बल्कि उन्होंने ही इसे लोक गीत जैसा कम्पोज़ किया है। उन्हें यह बिल्कुल आभास नहीं था कि यह गीत इतना बड़ा हिट सिद्ध होगा। इस गीत में उन्होंने केवल चार सारंगियों का इस्तेमाल किया था बस।

प्रीति सागर
गायिका प्रीति सागर यह मानती हैं कि यह गीत आज भी उनकी पहचान है और इस गीत ने ही उन्हें अपने चाहनेवालों का बेशुमार प्यार दिया है। "जब हम इस गीत को रेकॉर्ड कर रहे थे, उस समय हमें इतना सा भी अनुमान नहीं था कि यह इतना पॉपुलर होगा। मुझे याद है कि मैं स्टुडियो में 'मंथन' के निर्देशक श्याम बेनेगल और संगीतकार वनराज भाटिया के साथ थी। गीत के बोल कुछ ठीक नहीं जम रहे थे, वनराज जी को अच्छा नहीं लग रहा था। तब मेरी बहन नीति, जो अब अमरीका में है और उस वक़्त वो केवल 15 साल की थी, वो भी हमारे साथ स्टुडियो में बैठी थी। श्याम बाबू ने नीति को गीत के बोलों को लिखने के लिए कहा। इस तरह से नीति ने अपना पहला फ़िल्मी गीत लिखा गुजराती और हिन्दी में, और उस साल फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड्स में भी मनोनित हुई, आनन्द बक्शी और गुलज़ार जैसे स्तम्भ गीतकारों के साथ", प्रीति सागर ने एक साक्षात्कार में बताया। पुरस्कार गुलज़ार साहब को मिला था "दो दीवाने शहर में" गीत के लिए। प्रीति सागर के लिए इस गीत से जुड़ा सबसे ज़्यादा गर्व करने का मुहूर्त वह था जब उन्होंने इस गीत को प्रिन्स चार्ल्स के लिए गाया था। इस घटना को याद करते हुए उन्होंने कहा, "जब प्रिन्स चार्ल्स भारत आये थे 1982 में, उन्होंने 'मंथन' देखी और मेरा गीत उन्हें बहुत पसन्द आया। वो आनन्द गाँव में डॉ. कुरिएन के फ़ार्म में गये और वहीं कुरिएन साहब ने मुझे बुलाया था इस गीत को प्रिन्स चार्ल्स के सामने बैठ कर गाने के लिए। मैं वहाँ गई और गीत गाया, और प्रिन्स चार्ल्स ने मेरी काफ़ी सराहना की।" मिट्टी की ख़ुशबू लिये यह गीत आज भी उतना ही ताज़ा है जितना उस ज़माने में था। क्या है वजह, इसका आप ही कीजिये मंथन। सुनिए, यही उल्लेखनीय गीत-

फिल्म - मन्थन : 'मेरो गाम काठा पारे...'  : गायिका - प्रीति सागर : संगीत - वनराज भाटिया 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, September 28, 2014

‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ...’ : SWARGOSHTHI – 187 : THUMARI BHAIRAVI, KHAMAJ AND ADANA




स्वरगोष्ठी – 187 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 6 : ठुमरी भैरवी, खमाज और अड़ाना


लता जी के जन्मदिन पर शुभकामनाओं सहित समर्पित है उन्हीं की गायी ठुमरी 

‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ...’
 





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी साथी प्रस्तुतकर्त्ता संज्ञा टण्डन के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का अभिनन्दन करता हूँ। आज ‘भारतरत्न’ की उपाधि से अलंकृत, विश्वविख्यात कोकिलकंठी गायिका लता मंगेशकर की 85वीं वर्षगाँठ है। इस अवसर पर ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार अपने हजारों पाठकों और श्रोताओं के साथ लता जी का हार्दिक अभिनन्दन करता है। इन दिनों हमारी जारी श्रृंखला 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के छठे अंक में आज हमने एक ऐसी पारम्परिक ठुमरी का चयन किया है, जिसके पारम्परिक स्वरूप को अपने समय की सुविख्यात गायिकाओं- रसूलन बाई और रोशनआरा बेगम ने स्वर दिया है, तो इसी ठुमरी के परिमार्जित फिल्मी संस्करण को लता मंगेशकर ने अनूठे अंदाज से प्रस्तुत किया है। आज लता जी के जन्मदिवस पर इसी ठुमरी के माध्यम से हम उन्हें शुभकामनाएँ देते हैं। इस श्रृंखला में आप कुछ ऐसी पारम्परिक ठुमरियों का रसास्वादन कर रहे हैं जिन्हें फिल्मों में कभी यथावत तो कभी परिवर्तित अन्तरे के साथ इस्तेमाल किया गया। फिल्मों मे शामिल ऐसी ठुमरियाँ अधिकतर पारम्परिक ठुमरियों से प्रभावित होती हैं। इस श्रृंखला के अंकों को हम प्रायोगिक रूप से श्रव्य माध्यम में भी प्रस्तुत कर रहे हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की प्रमुख सहयोगी संज्ञा टण्डन की आवाज़ में पूरा आलेख और गीत-संगीत श्रव्य माध्यम से भी प्रस्तुत किया जा रहा है। हमारे इस प्रयोग पर आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिएगा। आज के अंक हम आपको एक श्रृंगाररस प्रधान ठुमरी– ‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ...’ का गायन तीन भिन्न रागों, भैरवी, खमाज और अड़ाना में सुनवा रहे हैं। 

 


रोशनआरा बेगम
रसूलन बाई 
'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ श्रृंखला के अन्तर्गत इन दिनों हम कुछ ऐसी पारम्परिक ठुमरियों पर चर्चा कर रहे हैं, जिन्हें पूरा मान-सम्मान देते हुए फिल्मों में शामिल किया गया और इन ठुमरियों को भरपूर लोकप्रियता भी मिली। अब तक आपने जो पारम्परिक ठुमरियाँ और उनके फिल्मों में किये गए प्रयोगों का रसास्वादन किया है, उनमें रागों की समानता थी, अर्थात, मूल ठुमरी जिस राग में थी, फिल्मी ठुमरी भी उसी राग में बँधी हुई थी। परन्तु आज के अंक में हमने जिस ठुमरी का चयन किया है, वह मूल पारम्परिक ठुमरी तो राग भैरवी में निबद्ध है, किन्तु उसी ठुमरी का फिल्मी प्रयोग राग अड़ाना में है। हमारी आज की ठुमरी है- ‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ साँवरिया...’। इस ठुमरी को सुप्रसिद्ध गायिका रसूलन बाई ने भैरवी में गाया है तो गायिका रोशन आरा बेगम ने राग खमाज में और लता मंगेशकर ने फिल्म ‘सौतेला भाई’ में राग अड़ाना का स्पर्श किया है। मान-मनुहार की इस श्रृंगारप्रधान ठुमरी को सुनने से पहले पूरब अंग की ठुमरियों की कुछ विशेषताओं के बारे में हम आपसे कुछ चर्चा करना चाहते हैं।

ठुमरी गायन के दो प्रकार हैं, पहला है बन्दिश अथवा बोल-बाँट की ठुमरी और दूसरा प्रकार है, बोल-बनाव की ठुमरी। 1856 में अंग्रेजों द्वारा नवाब वाजिद अली शाह को कलकत्ते के मटियाबुर्ज नामक स्थान पर नज़रबन्द कर दिये जाने के बाद ठुमरी का केन्द्र लखनऊ से स्थानान्तरित होकर बनारस हो गया था। बोल-बनाव की ठुमरियों का विकास बनारस के संगीत परिवेश में हुआ। इस प्रकार की ठुमरियों में शब्द बहुत कम होते हैं और यह विलम्बित लय से शुरू होती हैं। इनमें स्वरों के प्रसार की बहुत गुंजाइश होती है। छोटी-छोटी मुरकियाँ, खटके, मींड आदि का प्रयोग ठुमरी की गुणबत्ता को बढाता है। कुशल गायक ठुमरी के शब्दों से अभिनय कराते हैं। गायक कलाकार ठुमरी के कुछ शब्दों को लेकर अलग-अलग भावपूर्ण अन्दाज़ में प्रस्तुत करते हैं और अन्त में कहरवा ताल की लग्गी के साथ ठुमरी समाप्त होती है। ठुमरी के इस भाग में तबला संगतिकार को अपनी प्रतिभा दिखाने का भरपूर मौका मिलता है। बात जब बोल-बनाव ठुमरी की हो तो रसूलन बाई का ज़िक्र आवश्यक है। आज की यह ठुमरी हम उन्हीं की आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। उन्होने यह ठुमरी राग भैरवी में प्रस्तुत की है।

ठुमरी भैरवी : ‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ...’ : स्वर - रसूलन बाई



इसी ठुमरी को जानी-मानी गायिका रोशनआरा बेगम ने भी अपना स्वर दिया है, किन्तु उन्होने इसे राग खमाज के स्वरों में गाया है। रोशनआरा बेगम, किराना घराने के शीर्षस्थ गायक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की भतीजी थीं। आज की ठुमरी ‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ साँवरिया...’, रोशनआरा बेगम के स्वरों में भी अत्यन्त लोकप्रिय हुई थी, परन्तु उन्होने इसे राग खमाज के स्वरों में गाया था। लीजिए उनकी गायी यह ठुमरी आप भी सुनिए।

ठुमरी खमाज : ‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ...’ : स्वर - रोशनआरा बेगम 





इसी ठुमरी का प्रयोग संगीतकार अनिल विश्वास ने 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘सौतेला भाई’ में किया था। महेश कौल द्वारा निर्देशित इस फिल्म के नायक गुरुदत्त थे। अनिल विश्वास ने इस ठुमरी को फिल्म के एक ऐसे प्रसंग के लिए तैयार किया था, जब नायक का सौतेला छोटा भाई अपने कुछ बिगड़ैल दोस्तों के साथ तवायफ के कोठे पर पहुँचता है। कोठे पर दो नर्तकियाँ मुजरे के रूप में इस ठुमरी पर नृत्य करती है। अनिल विश्वास ने ठुमरी का स्थायी तो परम्परागत रूप में ही रखा, किन्तु अन्तरे की कुछ पंक्तियों को गीतकार शैलेन्द्र से लिखवाया था। उन्होने मूल भैरवी की ठुमरी के स्वरों में भी परिवर्तन किया और बेहद चंचल प्रवृत्ति के राग अड़ाना के स्वरों में और एक ताल में बाँधा। फिल्म ‘सौतेला भाई’ में प्रयुक्त इस ठुमरी को स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने अपने आकर्षक स्वरों से सजाया है। इस गीत में विशेष उल्लेखनीय यह है कि फिल्म के दृश्य में दोनो नर्तकियाँ बारी-बारी से गीत गाती हैं किन्तु दोनों के लिए स्वर लता जी का ही है। लीजिए, लता मंगेशकर से सुनिए फिल्म ‘सौतेला भाई’ की यह ठुमरी।


राग अड़ाना : ‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ...’ : स्वर - लता मंगेशकर : फिल्म – सौतेला भाई 




अब प्रस्तुत है, इस श्रृंखला- 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के सातवें अंक के ठुमरी –‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ...’ के आलेख और ठुमरी गीतों का समन्वित श्रव्य संस्करण। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार की सक्रिय सदस्य संज्ञा टण्डन ने अपनी भावपूर्ण आवाज़ से सुसज्जित किया है। आप इस प्रस्तुति का रसास्वादन कीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ठुमरी भैरवी, खमाज और अड़ाना : ‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ...’ : फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 6 : वाचक स्वर – संज्ञा टण्डन





आज की पहेली


लता मंगेशकर के जन्मदिवस पर ‘स्वरगोष्ठी’ के 187वें अंक की विशेष पहेली में आज हम आपको एक अत्यन्त प्रचलित खयाल रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 190वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।   


1 – यह छोटा खयाल किस राग में निबद्ध है?

2 – यह रचना किस गायिका की आवाज़ में है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 185वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ की आवाज़ में एक पारम्परिक ठुमरी का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ। इस अंक की पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह, और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।



कुछ अपनी कुछ आपकी 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी प्रयोग पर चर्चा कर रहे हैं। इस लघु श्रृंखला में हम एक नया प्रयोग भी कर रहे हैं। आपको ‘स्वरगोष्ठी’ का यह स्वरूप कैसा लगा? हमें अवश्य बताइएगा। ‘स्वरगोष्ठी’ के 185वें अंक टिप्पणी करते हुए हमारे एक पाठक / श्रोता सुनील बाजपेयी ने लिखा है-

Sunil Bajpai : वाह!...अतिमन !... सुन्दर, मस्तिष्क व शरीर को ‘ठुमका’ देने वाली इन भाव एवं रस से परिपूर्ण शास्त्रीय रचनाओं का प्रसंशनीय प्रस्तुतीकरण है ये!!... ‘स्वरगोष्ठी’ की संकल्पना कर उसे ऐसा स्वरूप देने और उसमें योगदान करने वाले सभी संस्कृतिनिष्ठ विद्वतजन को अनेकानेक आभार और साधुवाद!!!...

आप भी यदि भारतीय संगीत के किसी विषय में कोई जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पर भेज दें। अपने पाठको / श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित / प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।

वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Saturday, September 27, 2014

महेन्द्र कपूर की पुण्यतिथि पर बेटे रोहन कपूर से सुजॉय चटर्जी की बातचीत



स्मृतियों के स्वर - 10




महेन्द्र कपूर की पुण्यतिथि पर बेटे रोहन कपूर से सुजॉय चटर्जी की एक छोटी सी मुलाक़ात





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकीया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ हमारे इस स्तंभ में, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर, जिसमें हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। आज की प्रस्तुति आकाशवाणी या दूरदर्शन की प्रस्तुति नहीं है, बल्कि यह रेडियो प्लेबैक इण्डिया की निजी प्रस्तुति है। गायक महेन्द्र कपूर के बेटे रोहन कपूर से की गई छोटी सी बातचीत पर आधारित है आज का यह अंक। आज 27 सितंबर, गायक महेन्द्र कपूर की पुण्यतिथि पर उन्हें नमन!




यह साक्षात्कार वर्ष 2011 में लिया गया था


सुजॉय - रोहन जी, जब हर साल 26 जनवरी और 15 अगस्त के दिन पूरा राष्ट्र "मेरे देश की धरती" और "है प्रीत जहाँ की रीत सदा" जैसे गीतों पर डोलती है, और आप ख़ुद भी इन गीतों को इन राष्ट्रीय पर्वों पर अपने आसपास के हर जगह से सुनते हैं, तो किस तरह के भाव, कैसे विचार आपके मन में उत्पन्न होते हैं? 

रोहन - उनकी आवाज़ को सुनना तो हमेशा ही एक थ्रिलिंग् एक्स्पीरिएन्स रहता है, लेकिन ये दो दिन मेरे लिये बचपन से ही बहुत ख़ास दिन रहे हैं। उनकी जोशिली और बुलंद आवाज़ उनकी मातृभूमि के लिये उनके दिल में अगाध प्रेम और देशभक्ति की भावनाओं को उजागर करते हैं। और उनकी इसी ख़ासियत ने उन्हें 'वॉयस ऑफ़ इण्डिया' का ख़िताब दिलवाया था। वो एक सच्चे देशभक्त थे और मुझे नहीं लगता कि उनमें जितनी देशभक्ति की भावना थी, वो किसी और लीडर में होगी।

सुजॉय - महेन्द्र कपूर जी एक बहुत ही मृदुभाषी और मितभाषी व्यक्ति थे, बिल्कुल अपने गुरु रफ़ी साहब की तरह। आप ने एक पिता के रूप में उन्हें कैसा पाया? किस तरह के सम्बन्ध थे आप दोनों में? मित्र जैसी या थोड़ी औपचारिक्ता भी थी उस रिश्ते में?

रोहन - 'He was a human par excellence'। अगर मैं यह कहूँ कि वो मेरे सब से निकट के दोस्त थे तो ग़लत ना होगा। I was more a friend to him than anybody on planet earth। हम दुनिया भर में साथ साथ शोज़ करने जाया करते थे और मेरे ख़याल से हमने एक साथ हज़ारों की संख्या में शोज़ किये होंगे। वो बहुत ही मिलनसार और इमानदार इंसान थे, जिनकी झलक उनके सभी रिश्तों में साफ़ मिलती थी।

सुजॉय - क्या कभी उन्होंने आपके बचपन में आपको डाँटा हो या मारा हो जैसे बच्चों को उनके माता-पिता कभी कभार मार भी देते हैं? या कोई ऐसी घटना कि जब उन्होंने आपकी बहुत सराहना की हो?

रोहन - सराहना भी बहुत की और उतनी ही संख्या है उनकी नाराज़गी भी की। वो ख़ुद भी बहुत अनुशासित थे और हम सब से भी हमारी आदतों और पढ़ाई में उसी अनुशासन की उम्मीद रखते थे। लेकिन इसके बाहर वो बहुत ही मज़ाकिया और हँसमुख और मिलनसार इंसान थे। वो कभी शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते थे डाँटने के लिए, उनका चेहरा ही काफ़ी होता था मुझे और मेरी बहनों को सतर्क करने के लिए।

सुजॉय - जब आप छोटे थे, या जब बड़े हो रहे थे, क्या वो चाहते थे कि आप भी उनकी तरह एक गायक बनें?

रोहन - Probably in my subconscience …yes, but never dared to tell him that I wanted to... बल्कि जब मैं नौ साल का था, तब उन्होंने ही मुझे गाने के लिए प्रोत्साहित किया और मैं उनके साथ साउथ अफ़्रीका में स्टेज पर गाने लगा।

सुजॉय - आप अपने पिता पर गर्व करते होंगे, और गर्व होनी ही चाहिए। लेकिन क्या आपको वाकई लगता है कि इस इण्ड्रस्ट्री ने उन्हें वो सब कुछ दिया है जिसके वो सही मायनो में हकदार थे?

रोहन - वो हमेशा यही मानते थे कि किसी को जीवन में जो कुछ भी मिलना है, वो सब उपरवाला निर्धारित करता है, और हम कोई नहीं होते उसकी इच्छा को चैलेंज करने वाले। इसलिए यह सवाल ही अर्थहीन है कि वो क्या चाहते थे या उन्हे क्या मिला या नहीं मिला।

सुजॉय - महेन्द्र कपूर जी से जुड़ी कोई ख़ास घटना याद आती है आपको जो आप हमारे पाठकों के साथ बाँटना चाहें?

रोहन - मैं हमेशा उनके साथ उनकी रेकॊर्डिंग्स पर जाया करता था बचपन से ही। ऐसी ही एक रेकॊर्डिंग् की बात बताता हूँ। संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के लिए रेकॊर्डिंग् थी, फ़िल्म 'क्रान्ति' का गीत "दुर्गा है मेरी माँ, अम्बे है मेरी माँ"। महबूब स्टुडिओज़ में रेकॊर्डिंग् हो रही थी। यह एक मुश्किल गाना था जिसे बहुत ऊँचे पट्टे पर गाना था और ऒर्केस्ट्रा भी काफ़ी भारी भरकम था। जब रेकॊर्डिंग् OK हो गई, और वो बाहर निकले तो लक्ष्मी-प्यारे जी और मनोज कुमार जी, सबके मुख से उनके लिए तारीफ़ों के पुल बांधे नहीं बंध रहे थे। वो लगातार उनकी तारीफ़ें करते गये और पिता जी एम्बैरेस होते रहे। जैसे ही हम कार में बैठे वापस घर जाने के लिए, वो कार को सीधे हनुमान जी के मंदिर में लेके गये और ईश्वर को धन्यवाद दिया। वो हमेशा कहा करते थे कि यह ईश्वर की शक्ति या कृपा ही है जो हमें हमारे काम को अच्छा बनाने में मदद करता है। It’s the Devine Grace which gives you excellence in your work. 

सुजॉय - रोहन जी, बस आख़िरी सवाल। वह कौन सा एक गीत है महेन्द्र कपूर जी का गाया हुआ जो आपको सब से ज़्यादा पसंद है? या जिसे आप सब से ज़्यादा गुनगुनाया करते हैं?

रोहन - किसी एक गीत का नाम लेना तो असम्भव है, लेकिन हाँ, कुछ गीत जो मुझे बेहद पसंद है, उनके नाम गिनाता हूँ। "चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों", "अंधेरे में जो बैठे हैं, नज़र उन पर भी कुछ डालो, अरे ओ रोशनी वालों", लता जी के साथ उनका गाया "आकाश पे दो तारे", आशा जी के साथ "रफ़्ता रफ़्ता आप मेरे दिल के महमाँ हो गये", और यकीनन "मेरे देश की धरती"।

सुजॉय - रोहन जी, बहुत अच्छा लगा, आपने अपने पिता और महान गायक महेन्द्र कपूर जी की शख्सियत के बारे में हमें बताया, बहुत बहुत धन्यवाद आपका। फिर किसी दिन आपसे और भी बातें हम करना चाहेंगे। मैं अपनी तरफ़ से, और हमारे तमाम पाठकों व श्रोताओं की तरफ़ से आपका आभार व्यक्त करता हूँ, नमस्कार। 

रोहन - बहुत बहुत शुक्रिया आपका।



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Sunday, September 21, 2014

‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’ : SWARGOSHTHI – 186 : THUMARI BHAIRAVI



स्वरगोष्ठी – 186 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 5 : ठुमरी भैरवी


लता जी को जन्मदिन के उपलक्ष्य में समर्पित है उन्हीं की गायी श्रृंगार रस से अभिसिंचित ठुमरी- ‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’ 





जन्मदिन पर शताधिक शुभकामना 
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के पाँचवें अंक में आज हम फिर एक और पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी संस्करण के साथ उपस्थित हैं। इस श्रृंखला में आप सुन रहे हैं, कुछ ऐसी पारम्परिक ठुमरियाँ, जिन्हें फिल्मों में पूरे आन, बान और शान के साथ शामिल किया गया। इस स्तम्भ के वाहक कृष्णमोहन मिश्र और संज्ञा टण्डन की ओर से आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन है। यह पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित श्रृंखला का परिमार्जित रूप है। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के कुछ स्तम्भ केवल श्रव्य माध्यम से प्रस्तुत किये जाते हैं तो कुछ स्तम्भ आलेख और चित्र, दृश्य माध्यम के साथ और गीत-संगीत श्रव्य माध्यम से प्रस्तुत होते हैं। इस श्रृंखला से हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। श्रृंखला के अंकों को हम प्रायोगिक रूप से दोनों माध्यमों में प्रस्तुत कर रहे हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की प्रमुख सहयोगी संज्ञा टण्डन की आवाज़ में पूरा आलेख और गीत-संगीत श्रव्य माध्यम से भी प्रस्तुत किया जा रहा है। हमारे इस प्रयोग पर आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिएगा। आज का यह अंक हम विश्वविख्यात गायिका लता मंगेशकर को उनके जन्मदिन (28 सितम्बर) से ठीक एक सप्ताह पूर्व उन्हें शुभकामनाएँ देते हुए प्रस्तुत कर रहे हैं। 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘बाजूबन्द’ में उन्होने एक पारम्परिक ठुमरी ‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’ का थोड़े परिवर्तन के साथ मोहक गायन प्रस्तुत किया था। इस ठुमरी के माध्यम से हम उन्हें जन्मदिन की अग्रिम बधाई देते हैं। इसके साथ ही इस ठुमरी का पारम्परिक गायन हम उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ और पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में भी प्रस्तुत कर रहे हैं। 


ठुमरी भारतीय संगीत की वह रसपूर्ण शैली है, जिसमें स्वर और साहित्य का समान महत्त्व होता है। यह भावप्रधान और चपल चाल वाला गीत है। मुख्यतः यह श्रृंगार प्रधान गीत होता है; जिसमें लौकिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार का श्रृंगार उपस्थित होता है। इसीलिए ठुमरी में लोकगीत जैसी कोमल शब्दावली और अपेक्षाकृत हलके रागों का ही प्रयोग होता है। अधिकतर ठुमरियों के बोल अवधी, भोजपुरी अथवा ब्रजभाषा में होते हैं। कथक नृत्य में प्रयोग की जाने वाली अधिकतर ठुमरियाँ कृष्णलीला प्रधान होती हैं। शान्त, गम्भीर अथवा वैराग्य भावों की सृष्टि करने वाले रागों के बजाय चंचल रागों; जैसे पीलू, काफी, जोगिया, खमाज, भैरवी, तिलक कामोद, गारा, पहाड़ी, तिलंग आदि में ठुमरी गीतों को निबद्ध किया जाता है। ठुमरी गायन में त्रिताल, चाँचर, दीपचन्दी, जत, दादरा, कहरवा आदि तालों का प्रयोग होता है। आज के अंक में प्रस्तुत की जाने वाली भैरवी की श्रृंगार रस प्रधान ठुमरी है, जिसके बोल हैं- ‘साँवरिया ने जादू डारा, बाजूबन्द खुल खुल जाय...’। इस ठुमरी के बोल लोक साहित्य से प्रेरित है। अन्तरे की पंक्तियाँ हैं- ‘जादू की पुड़िया भर भर मारे, का करेगा वैद्य बेचारा...’। इस ठुमरी को अनेक गायक-गायिकाओं ने अपने स्वरों से सँवारा है। आज के अंक में हम आपको सबसे पहले यह ठुमरी उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ की आवाज़ में सुनवाएँगे। पटियाला कसूर घराने के सिरमौर, उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ पिछली शताब्दी के बेमिसाल गायक थे। अपनी बुलन्द गायकी के बल पर संगीत के मंचों पर लगभग आधी शताब्दी तक उन्होने अपनी बादशाहत को कायम रखा। पंजाब अंग की ठुमरियों के वे अप्रतिम गायक और सर्जक थे। लीजिए सुनिए, उनके स्वरों में प्रस्तुत श्रृंगार रस में डूबी यह ठुमरी। 


ठुमरी भैरवी : ‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ 




इस श्रृंगार रस प्रधान ठुमरी में लोकतत्व प्रमुख रूप से उभरता है। नायिका पर साँवरिया का ऐसा जादू सवार है कि वह अपना सुध-बुध खो बैठी है। हर समय नायक की चिन्ता में डूबी रहने वाली नायिका का शरीर इतना दुबला हो गया है कि उसके तमाम आभूषणों में से एक बाजूबन्द बार-बार स्वतः खुल कर गिर पड़ता है। साँवरिया के इस जादुई प्रभाव से नायिका को मुक्त कराने में वैद्य अर्थात चिकित्सक भी समर्थ नही है। ठुमरी के इस अनूठे भाव को एकदम अनूठे ढंग की गायकी से परिभाषित किया है, पण्डित भीमसेन जोशी ने। भारतीय संगीत की विविध विधाओं ध्रुवपद, खयाल, ख़याल, तराना, भजन, अभंग आदि शैलियों के माध्यम से सात दशकों तक पण्डित भीमसेन जोशी ने संगीत प्रेमियों को अपने स्वर के सम्मोहन में बाँधे रखा था। पण्डित जी की खरज भरी आवाज का वैशिष्ट्य जादुई रहा है। बन्दिश को वे जिस माधुर्य के साथ रूपान्तरित कर देते थे, वह अनुभव करने की चीज है। 'तान' को वे अपनी चेरी बनाकर अपने कण्ठ में नचाते रहे। उन्हें खयाल गायन के साथ-साथ ठुमरी, भजन और अभंग गायन में भी महारथ हासिल थी। आइए उनके कण्ठ-स्वर में सुनते हैं यही ठुमरी-  ‘साँवरिया ने जादू डारा, बाजूबन्द खुल खुल जाय...’


ठुमरी भैरवी : ‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’ : पण्डित भीमसेन जोशी




आज हम जिस गायन शैली को ठुमरी गीत के रूप में जानते हैं, उसे एक शैली के रूप में पहचान मिली, अवध के नवाबी दरबार में। उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अवध के नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में ठुमरी को नई पहचान तो मिली किन्तु इसका विकास बनारस के समृद्ध सांगीतिक परिवेश में हुआ। आज की ठुमरी ‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’ का उपयोग 1954 में ‘बाजूबन्द’ नाम से ही प्रदर्शित फिल्म में किया गया था। इस फिल्म के संगीतकार मोहम्मद शफ़ी थे। फिल्म के एक नृत्य प्रसंग में इस ठुमरी का प्रयोग किया गया था। रामानन्द सागर निर्देशित फिल्म ‘बाजूबन्द’ में एक कम चर्चित संगीतकार मोहम्मद शफ़ी ने भैरवी की इस ठुमरी को लता मंगेशकर से गवाया था। आप लता मंगेशकर जी को उनके जन्मदिन की बधाई देते हुए उन्हीं के मधुर स्वरों में यह ठुमरी सुनिए।


ठुमरी भैरवी : ‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’ : फिल्म बाजूबन्द : लता मंगेशकर : संगीत - मोहम्मद शफ़ी  




अब हम आज के इस आलेख और गीतों के समन्वित रूप को श्रव्य माध्यम में प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार की सक्रिय सदस्य संज्ञा टण्डन ने अपनी असरदार आवाज़ से सुसज्जित किया है। आप इस प्रस्तुति का रसास्वादन कीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ठुमरी भैरवी : ‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’ : फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 5 : वाचक स्वर – संज्ञा टण्डन 






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 186वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक बेहद मशहूर ठुमरी के अन्तरा का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 190वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – यह ठुमरी किस राग में निबद्ध है?

2 – ठुमरी के अन्तरा का यह अंश सुन कर इस प्रसिद्ध ठुमरी के स्थायी की पंक्ति बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 188वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 184वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको विदुषी परवीन सुलताना की आवाज़ में राग पहाड़ी की ठुमरी का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग पहाड़ी तथा पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका परवीन सुलताना। परवीन जी ने फिल्म ‘पाकीजा’ के लिए यह ठुमरी राग पहाड़ी के स्वरों में गाया है, जबकि विदुषी (डॉ.) प्रभा अत्रे सहित अन्य कलाकारों ने इसे पारम्परिक रूप से खमाज या मिश्र खमाज में गाया है। पहेली की हमारी नियमित प्रतिभागी हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने इसी भ्रम के कारण इस बार केवल दूसरे प्रश्न का उत्तर ही सही दिया है। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और मिन्नेसोटा, अमेरिका से दिनेश कृष्णजोइस ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


कुछ अपनी कुछ आपकी


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है हमारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’। इस श्रृंखला में हमने एक नया प्रयोग किया है। ‘स्वरगोष्ठी’ के परम्परागत आलेख, चित्र और गीत-संगीत के आडियो रूप के साथ-साथ सम्पूर्ण आलेख, गीतों के साथ श्रव्य माध्यम से भी प्रस्तुत किया जा रहा है। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा? हमें अपनी प्रतिक्रिया अवश्य लिखिएगा। 7 सितम्बर को प्रकाशित / प्रसारित ‘स्वरगोष्ठी’ के 183वें अंक के बारे में हमारे कई पाठकों / श्रोताओं ने कुछ सार्थक टिप्पणियाँ की है-

Sunil Bajpai – मोरे राजा ~ फुलवन गेंद से ~ ना मारो ~ लगत करेजवा में चोट ~ ~ फुल गेंदवा ना मारो ~ लगत करेजवा में चोट ~

Vijaya Rajkotia - Rasoolan bai is well known for Thumri singing. Thanks for posting.

Abhijeet Kondekar - Sheer delight to listen to this version, thanks for the post!

Ananth Rao - Phul gendavan na maro.....a lovely tumri. Thanks for sharing.

आप भी इस अंक पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। आप अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों की हम प्रतीक्षा करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ