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Monday, May 17, 2010

संगीत के आकाश में अपनी चमक फैलाने को आतुर एक और नन्हा सितारा - पी. भाविनी

लगभग ७ वर्ष पूर्व की बात है मैं ग्वालियर में ’उदभव’ संस्था द्वारा आयोजित ’राज्य स्तरीय गायन प्रतियोगिता- सुर ताल’ में निर्णायक के रूप में गया था उस दिन वहाँ राज्य भर से लगभग ३०० प्रतियोगी आए हुए थे, जिसमें ५ साल से लेकर ५० साल तक के गायक गायिकाएं शामिल थे। कुछ प्रतियोगियों के बाद मंच पर एक ७ वर्ष की बच्ची ने प्रवेश किया। मंच पर आने के पश्चात उसने जगजीत सिंह की एक ग़ज़ल गाना प्रारम्भ किया। उसकी उम्र को देखते हुए उसकी गायकी, स्वर, ताल तथा शब्दों का उच्चारण सुन कर हम निर्णायक तथा सभी दर्शक मंत्र मुग्ध हो रहे थे। प्रतियोगिता में स्वयं की पसंद के गीत गाने के पश्चात एक गीत निर्णायकों की पंसद का भी सुनाना था। मैंनें उसके कोन्फिडेन्स को देख कर उसे एक कठिन गीत फ़िल्म ’माचिस’ का लता जी का ’पानी पानी रे भरे पानी रे, नैनों में नीन्दे भर जा’ गाने को कहा। उस बच्ची ने जब यह गीत समाप्त किया तो इस गीत की जो बारीकियाँ थी उस को उस बच्ची ने जिस तरह से निभाया मैं समझ नहीं पा रहा था कि उसकी प्रशंसा में क्या कहूँ। फ़िर कुछ दो तीन साल बाद एक दिन जीटीवी के कार्यक्रम ’सारेगामापा’ देखते समय उस कार्यक्रम के प्रतियोगियों में वह बच्ची दिखाई दी। निर्णायक थे भप्पी लहरी, अभिजीत और अलका याग्निक। उस कार्यक्रम में तो वह अपनी जगह नही बना पाई किन्तु उसका हौसला देख कर महसूस हो रहा था कि एक न एक दिन वह जरूर नाम कमाएगी और वह मौका शीघ्र ही आगया। स्टार टीवी का ’अमूल वॉयस ऑफ इण्डिया मम्मी के सुपर स्टार’ कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ और वह बच्ची वहाँ भी अपनी गायकी की खुशबू बिखेरने को तैयार थी। एक लम्बी प्रतिस्पर्धा के पश्चात प्रतियोगिता के निर्णायक शुभा मुदगल, शंकर महादेवन और संगीतकार विशाल और शेखर ने उस प्रतियोगिता के दस लाख रुपए इनाम की विजेता का नाम घोषित किया तो वह कोई और नही वरन वही नन्ही गायिका यानि पी, भाविनी ही थी। आइए आज आपकी मुलाकात करवाते है उस उभरती हुई गायिका पी. भाविनी से जो आजकल भोपाल में रहती है।

शरद- हाय भाविनी! हिन्दयुग्म पर तुम्हारा स्वागत है।
भाविनी- नमस्ते अंकल! यह मेरा सौभाग्य है कि ’हिन्दयुग्म’ के पाठकों से मुझे मिलने का अवसर आपने दिया। हिन्दयुग्म के माध्यम से ही आजकल में Audacity पर अपने गीतों को रिकॊर्ड करना सीख रही हूँ। बहुत ही आसान तथा उपयोगी है यह।

भाविनी के गाये कुछ गीत


एक वीडियो परफॉरमेंस


भाविनी की निजी वेबसाइट पर इनसी जुड़ी बहुत सी सामग्री है। एक बार ज़रूर जायें।
शरद- तुमने इतनी छोटी उम्र में ही स्टार टीवी का कार्यक्रम’ अमूल वॊयस ऒफ इण्डिया मम्मी के सुपर स्टार’ जीत कर अच्छा खासा नाम कमा लिया और बहुत छोटी उम्र से ही मंचों पर गा रही हो लेकिन तुमने अपने गायन की शुरुआत कब प्रारम्भ की तथा तुम्हे किसने प्रेरित किया।
भाविनी - मेरा जन्म १७ फरवरी १९९७ को जबलपुर में हुआ था ।मैं जब ४ साल की थी उस समय भी घर में जगजीत सिंह और चित्रा सिंह जी की ग़ज़लें गुनगुनाया करती थी उनको सुनकर मेरी मम्मी ने सोचा कि जब इसको अभी से गाने का शौक है तो इसको संगीत के क्षैत्र में ही कुछ करना चाहिए। जब मैं ६-७ साल की थी तब मैनें अपना पहला कार्यक्रम संगम कला ग्रुप की प्रतियोगिता में दिया जहाँ पर मैंने ’दिल ने कहा चुपके से, ये क्या हुआ चुपके से’ गाया जिसे गाकर मुझे बहुत आनन्द आया और सबने मेरी खूब प्रशंसा की। मेरी नानीजी ने मुझे संगीत के क्षैत्र में ही आगे बढ़्ने के लिए प्रेरित किया तथा उन्ही के आशीर्वाद के कारण मुझे बहुत से पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।

शरद- जब तुम्हारी मन्ज़िल संगीत ही है तो क्या तुम संगीत की शिक्षा भी ले रही हो?
भाविनी- हाँ! मैंने ८ साल की उम्र से ही ग्वालियर में श्री नवीन हाल्वे तथा श्री सुधीर शर्मा जी से संगीत की शिक्षा लेना प्रारम्भ कर दिया था और अब भोपाल में श्री जितेन्द्र शर्मा जी और कीर्ति सूद से सीख रही हूँ। मैं प्रतिदिन २ घन्टे शास्त्रीय संगीत तथा २ घन्टे सुगम संगीत का रियाज़ करती हूँ।

शरद- अपनी इस संगीत यात्रा के बारे में हमारे पाठकों को थोडा और बताओ।
भाविनी- जब मैं ७-८ साल की थी तब मैंनें ग्वालियर में ’उदभव’ संस्था की प्रतियोगिता ’सुर-ताल’ में हिस्सा लिया जहाँ मैं लगातार तीन वर्षों तक विजेता रही । इन तीन वर्षों में उस प्रतियोगिता के निर्णायक साधना सरगम जी, ग़ज़ल गायक चन्दन दास तथा डॊ, रोशन भारती तथा आपने मेरी भरपूर प्रशंषा की तथा मुझे अपना आशीर्वाद प्रदान किया। ९ साल की उम्र में मुझे जीटीवी के सारेगामापा में गाने का मौका मिला जहाँ अभिजीत जी, शान, भप्पी लहरी जी तथा अलका याग्निक ने भी मेरी गायकी को अत्यधिक सराहा। मैं बहुत भाग्यशाली हूँ की उस कार्यक्रम में मुझे आशा भोषले जी से भी मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तथा उन्होंने भी मुझे अपना आशीर्वाद प्रदान किया। इसके बाद मैं स्टार टीवी के कार्यक्रम ’अमूल वॊयस ऒफ इण्डिया मम्मी के सुपर स्टार’ की कडे़ मुकाबले में विजेता बनी तथा उस प्रतियोगिता के निर्णायक शुभा मुदगल, शंकर महादेवन तथा संगीतकार विशाल और शेखर जी का भरपूर प्यार मिला। इसके साथ ही मैं’तानसेन संगीत अकादमी सम्मान’ तथा इन्दौर में’ ’एम,पी.स्मार्ट आइडल’ सम्मान से भी सम्मानित हो चुकी हूँ।

शरद- उस मुकाबले को जीतने के बाद इस क्षैत्र में तुम्हारी और क्या क्या उपलब्धियाँ रहीं हैं?
भाविनी- इस मुकाबले के पहले और बाद में मैनें कुछ और अच्छे कार्यक्रम किए हैं तथा मैं अपने गायन के साथ साथ अपनी पढ़ाई पर भी एकाग्रचित्त हो कर पूरा पूरा ध्यान देती हूँ। मैं संगीत एवं पढाई में संतुलन बनाए रखती हूँ। जब भी मेरे स्कूल चलते हैं मेरा पूरा ध्यान पढाई पर रहता है उसके बाद कुछ समय निकाल कर संगीत की तैयारी भी कर लेती हूँ। वर्तमान में मैं भोपाल के देहली पब्लिक स्कूल की छात्रा हूँ। मेरे द्वारा दिए गए कार्यक्रमों, मुझे मिले हुए सम्मान, फोटोज़ तथा मेरे द्वारा गाए गए गीतों के वीडियोज़ और कवर वर्ज़न आप मेरी वेब साइट www.pbhavini.com पर देख सकते हैं ।

शरद- आज जब संगीत का स्वरूप एकदम बदल गया तुम अपने कार्यक्रमों में अधिकांश पुराने गीत ही गाती हो इसका क्या कारण है?
भाविनी - मुझे पुराने फिल्मी गीत बहुत पसन्द हैं क्योंकि उनकी धुन बहुत मैलोडियस होती है, उनके शब्द भी इतने अच्छे होते है कि उनका असर एक लम्बे समय तक बरकरार रहता है तथा वे हमारे दिल को छू जाते हैं। मेरा ऐसा मानना है कि यदि पुराने गीतों को अच्छी तरह से गा लिया जाए तो नए गीत आसानी से गाए जा सकते हैं। मैं अपना आदर्श लताजी, आशाजी, जगजीत सिंह, चित्रा सिंह तथा मदन मोहन जी को मानती हूँ । मेरे परिवार के सदस्य मुझे बहुत प्यार करते है तथा संगीत के क्षैत्र में आगे बढ़्ने के लिए मेरी हर संभव सहायता करते हैं। इसके साथ ही मुझे देश विदेश के अनेक लोगों का भरपूर प्यार मिल रहा है। मेरा परिवार मुम्बई में बसने का भी विचार कर रहा है। मेरी अभिलाषा एक अच्छी गायिका बनने की है, देखिए कोशिश कहाँ तक सफल होती है।

शरद- जाते जाते कभी कोई ऐसा वाकया याद आ रहा हो जिसे पाठकों को बताना चाहती हो?
भाविनी- हाँ । मेरा कोटा शहर के राष्ट्रीय दशहरे मेले में कार्यक्रम था। मेले की एक भारी भीड़ के सामने जब मैनें गाना प्रारम्भ किया तो एक के बाद एक गीत गाती ही चली जा रही थी और लोग तालियाँ बजाए जा रहे थे। उस दिन मैनें अपनी पहली सिटिंग में ही लगातार १४ गीत एक साथ गाए उसके बाद ही दूसरे कलाकारों की बारी आई।

शरद- बहुत बहुत बधाई भाविनी! ईश्वर से कामना है कि तुम दिन दूनी रात चौगनी उन्नति करो और संगीत के क्षैत्र में तुम्हारा नाम बहुत रोशन हो।
भाविनी- धन्यवाद! मैं हिन्दयुग्म परिवार की बहुत आभारी हूँ जिसके माध्यम से मुझे अपनी बात कहने का मौका मिला ।

Sunday, August 30, 2009

पॉडकास्ट कवि सम्मलेन - अगस्त 2009

इंटरनेटीय कवियों की इंटरनेटीय गोष्ठी

Rashmi Prabha
रश्मि प्रभा
Khushboo
खुश्बू
यदि आप पुराने लोगों से बात करें तो वे बतायेंगे कि भारत में एक समय कॉफी हाउसों की चहल-पहल का होता था। कविता-रसज्ञों के घरों पर हो रही कहानियों-कविताओं, गाने-बजाने, बहसों की लघु गोष्ठियों का होता था। जैसे-जैसे तकनीक ने हर किसी को उपभोक्ता बना दिया, हम ग्लोबल गाँव के ऐसे वाशिंदे हो गये जो मोबाइल से अमेरिका के अपने परिचित से तो जुड़ गया, लेकिन अपने इर्द-गिर्द से दूर हो गया।

लेकिन वे ही बुजुर्ग एक और बात भी कहते हैं कि हर चीज़ के दो इस्तेमाल होते हैं। चाकू से गर्दन काटिए या सब्जी काटिए, आपके ऊपर है। हमने भी इस तकनीक का सदुपयोग करने के ही संकल्प के साथ पॉडकास्ट कवि सम्मेलन की नींव रखी थी, ताकि वक़्त की मार झेल रहे कवियों को एक सांझा मंच मिले। जब श्रोता ऑनलाइन हो गया तो कवि क्यों नहीं। इस संकल्पना को मूर्त रूप देने में डॉ॰ मृदुल कीर्ति ने हमारा बहुत सहयोग दिया। हर अंक में नये विचारों ने नये दरवाजे खोले और इस आयोजन की सुगंध चहुँओर फैलने लगी।

रश्मि प्रभा के संचालन सम्हालने के बाद हर अंक में नये प्रयोग होने लगे और नये-नये कवियों का इससे जुड़ना हुआ। खुश्बू से मल्टीमीडिया के माध्यम से इसे जन-सामान्य तक पहुँचाने में हमें मदद मिली। हमें लगता है कि हमारे कहने से अधिक आने वाले समय में यह आयोजन अपनी उपयोगिता खुद सिद्ध करेगा। फिलहाल आप सुनें अगस्त माह का पॉडकास्ट कवि सम्मेलन।



प्रतिभागी कवि- सरस्वती प्रसाद, रश्मि स्वरुप, हेमंत कुमार, कवि कुलवंत, पूनम श्रीवास्तव, रेणु सिन्हा, शन्नो अग्रवाल, मंजुश्री, शरद तैलंग, नीलम प्रभा, शिखा वार्ष्णेय, ओम आर्य, विवेक रंजन श्रीवास्तव, प्रो.सी.बी श्रीवास्तव, प्रीती मेहता, किरण सिन्धु, दीपाली आब, चिराग जैन।

नोट - अगले माह यानी सितम्बर पॉडकास्ट कवि सम्मलेन के लिए सभी प्रतिभागी कवियों के लिए हमने एक थीम निर्धारित किया है. दुर्गा पूजा करीब है और आपने अपनी कलम की धार से "शक्ति" को जगाना है जी हाँ आपका थीम है - "शक्ति". हमारी कोशिश रहेगी कि आपकी कविताओं पर एक वीडियो का भी निर्माण करें. तो फिर देर किस बात की अपनी कलम की "शक्ति" को अपनी बुलंद आवाज़ के माध्यम से हम तक पहुँचायें आज ही.

संचालन- रश्मि प्रभा

तकनीक- खुश्बू


यदि आप इसे सुविधानुसार सुनना चाहते हैं तो कृपया नीचे के लिंकों से डाउनलोड करें-
ऑडियोWMAMP3




आप भी इस कवि सम्मेलन का हिस्सा बनें

1॰ अपनी साफ आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके भेजें।
2॰ जिस कविता की रिकॉर्डिंग आप भेज रहे हैं, उसे लिखित रूप में भी भेजें।
3॰ अधिकतम 10 वाक्यों का अपना परिचय भेजें, जिसमें पेशा, स्थान, अभिरूचियाँ ज़रूर अंकित करें।
4॰ अपना फोन नं॰ भी भेजें ताकि आवश्यकता पड़ने पर हम तुरंत संपर्क कर सकें।
5॰ कवितायें भेजते समय कृपया ध्यान रखें कि वे 128 kbps स्टीरेओ mp3 फॉर्मेट में हों और पृष्ठभूमि में कोई संगीत न हो।
6॰ उपर्युक्त सामग्री भेजने के लिए ईमेल पता- podcast.hindyugm@gmail.com
7. सितम्बर 2009 अंक के लिए कविता की रिकॉर्डिंग भेजने की आखिरी तिथि- 18 सितम्बर 2009
8. सितम्बर 2009 अंक का पॉडकास्ट सम्मेलन रविवार, 27 सितम्बर 2009 को प्रसारित होगा।


रिकॉर्डिंग करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। हमारे ऑनलाइन ट्यूटोरियल की मदद से आप सहज ही रिकॉर्डिंग कर सकेंगे। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

# Podcast Kavi Sammelan. Part 14. Month: August 2009.
कॉपीराइट सूचना: हिंद-युग्म और उसके सभी सह-संस्थानों पर प्रकाशित और प्रसारित रचनाओं, सामग्रियों पर रचनाकार और हिन्द-युग्म का सर्वाधिकार सुरक्षित है।

Thursday, October 23, 2008

लिटिल टेररिस्ट

हिन्दी ब्लॉग पर पहली बार ऑस्कर नामांकित फ़िल्म

आवाज़ पर हमने समसामयिक विषयों पर आधारित संगीत विडीयो और लघु फिल्मों को प्रर्दशित करने की नई शुरुआत की है. इस शृंखला में अब तक आप देख चुके हैं डी लैब द्वारा निर्मित आतंकवाद पर बना एक संगीत विडीयो और छायाकार कवि मनुज मेहता की दिल्ली के रेड लाइट इलाके पर बनी संवेदनशील लघु फ़िल्म. जल्दी ही हम नये फिल्मकारों की नई प्रस्तुतियां आपके समक्ष समीक्षा हेतु लेकर हाज़िर होंगे.

आज हम जिस लघु फ़िल्म को यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं वह लगभग ३ साल पहले आई थी और कह सकते हैं कि हिंदुस्तान में लघु फिल्मों की एक नई परम्परा की शुरआत इसी फ़िल्म से हुई थी. मात्र १५-१६ मिनट में यह फ़िल्म इतना कुछ कह जाती है जितना कभी-कभी हमारी ३-३.५ घंटे की व्यवसायिक फिल्में नही कह पाती. अगर टीम का हर सदस्य अपने काम में दक्ष हो तो सीमित संसाधनों से भी वो सब हासिल किया जा सकता है जिसे पाने की चाह हर फिल्मकार करता है. इस फ़िल्म का हर पक्ष बेहतरीन है, फ़िर चाहे वो छायांकन हो, या संपादन, पार्श्व संगीत हो या निर्देशन, अदाकारी हो संवाद लेखन, इतने सुंदर अंदाज़ में विषय को परोसा गया है कि देखने वाला हतप्रभ रह जाता है. फ़िल्म के निर्माता, निर्देशक, लेखक और संपादक अश्विन कुमार ने जो करिश्मा किया उसने दुनिया भर के फ़िल्म समीक्षकों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा. फ़िल्म ऑस्कर एकेडमी अवार्ड के लिए नामांकित हुई २००५ में और फ़िर यूरोपियन एकेडमी सम्मान के लिए भी नामांकित हुई. तेहरान अन्तरराष्ट्रीय लघु फ़िल्म समारोह में ग्रैंड प्राइज़ पाया तो फ्लान्डेर्स में बहतरीन फ़िल्म का सम्मान. मोंटेरियल विश्व फ़िल्म प्रतियोगिता में प्रथम रही तो मेनहेटन में बेस्ट फ़िल्म चुनीं गयी. इसके आलावा भी बहुत से पुरस्कार इस फ़िल्म की झोली में आए. सबसे अच्छी बात ये हुई कि इस फ़िल्म ने नये फिल्मकारों के लिए रास्ते खोल दिए. उनमें यह विश्वास जगा दिया कि अपनी कला को दुनिया तक पहुँचाने के लिए अब वह बड़े निर्मातों के रहमो करम पर निर्भर नही हैं. यह काम अब वह अपने सीमित संसाधनों का इस्तेमाल कर भी कर सकते हैं. पर उत्कृष्टता पाने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ेगी, यह बात भी इस फ़िल्म के माध्यम से हम समझ सकते हैं. दरअसल ये फ़िल्म फिल्मकारी से जुड़े हर तकनीकी व्यक्ति के लिए जो कि इस माध्यम में अपना विस्तार देखता हो, एक वर्कशॉप के सामान है. शायद इसी उद्देश्य से इसे अपलोड किया गया है ब्लॉगर पर जसप्रीत द्वारा. हम चाहेंगे कि फ़िल्म कला से जुडा हमारा हर अतिथि यदि अब तक इस फ़िल्म को देखने से वंचित रहा हो तो इसे यहाँ अवश्य देखें और सीखें. इस फ़िल्म का एक एक फ्रेम आपको बहुत कुछ सिखा सकता है. साथ ही अश्विन कुमार तक हमारे माध्यम से अपनी शुभकामनायें अवश्य पहुंचायें.

लिटिल टेररिस्ट - कहानी सार

फ़िल्म की कहानी सीमा पर बसे दो गाँवों के जीवन पर आधारित है जिनके बीच संबंध सिर्फ़ तनाव के हैं.

ये उन दो मुल्कों की सीमा है जो कभी एक हुआ करते थे. एक ओर राजस्थान का एक गाँव है और दूसरी ओर, ज़ाहिर है, पाकिस्तान का एक गाँव.

दोनों देशों के बीच कँटीले तारों की बाड़ लगा दी गई है. बाड़ के उस पार बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं लेकिन गेंद बाड़ को कहाँ जानती समझती है. उछली और इस पार चली आई. गेंद को यह भी नहीं मालूम कि वहाँ बारुदी सुरंगें बिछी हुई हैं.

एक बच्चा है. बमुश्किल दस साल का. उसने बाड़ के नीचे से थोड़ी सी रेत हटाई और एक देश की सीमा लाँघ कर दूसरे देश में आ गया लेकिन अचानक सायरन बजने लगे और गोलियाँ बरसने लगीं.

बच्चा भारतीय सीमा में है और सेना के जवान घर-घर की तलाशी ले रहे हैं कि सीमा पार से कोई 'आतंकवादी' घुस आया है.

बच्चा एक रहम दिल मास्टर के साथ उसके घर पहुँच गया है लेकिन वह कुछ हक़ीक़तों से भी वाकिफ़ होता है.

मास्टर की भतीजी उस बच्चे मुसलमान होने पर चौंकती है और उसे घर में घुसने से मना कर देती है.

मुसलमान होने के आश्चर्य, तिरस्कार और भय के बीच एक झोंका गुज़रता है इंसानियत का.

सेना से बचाने के लिए उसके सिर के बाल साफ़ कर दिए गए हैं, एक चुटिया रख दी गई और नया नाम दे दिया गया - जवाहरलाल.

लेकिन जो दीवार इनसानों ने खड़ी की है वो अक्सर इंसानियत पर भारी पड़ती है.

उस ज़मीन पर जहाँ लोग रात-दिन 'पधारो म्हारो देस' गाते हैं वहीं एक कड़वी सच्चाई मुँह बाए खड़ी है. वो लड़की जिसे जमाल यानी जवाहरलाल आपा कहता है उस मिट्टी के बर्तन को इसलिए तोड़ देती है क्योंकि उसमें एक मुसलमान ने खाना खाया है.

लेकिन रात के साए में मास्टर जी और उसकी भतीजी उसे सीमा पार छोड़ आते हैं...वहाँ जमाल की माँ उसका इंतज़ार कर रही है.

जाने से पहले बच्चा मास्टर और उसकी भतीजी से लिपट जाता है.

उधर अपने बच्चे को सर मुंडाए देख परेशान माँ को भी एक बार ग़ुस्सा आ जाता है और वह उसे पीटने लगती है.

लेकिन बच्चा हँस रहा है....पता नहीं किस पर....उस कंटीली बाड़ पर या फिर उन पर जो उस कंटीली बाड़ के दोनों ओर खड़े अपने इनसान होने की हक़ीकत को भुला बैठे हैं.

कुल 15 मिनट की इस फ़िल्म को देखकर ऐसा लगता नहीं कि इसमें एक भी दृश्य अतिरिक्त है.

एक छोटे से बच्चे के चेहरे पर भय, विस्मय और प्रेम सब कुछ इस तरह उभरता कि कुछ देर के लिए सिहरन पैदा हो जाती है.

फ़िल्म दोनों ओर की कुछ सामाजिक कुरीतियों को भी निशाना बनाती है.

फ़िल्म को देखने के लिए प्ले पर क्लिक करें.



इस फ़िल्म को आप इस लिंक पर भी देख सकते हैं.

चित्र - अश्विन कुमार
साभार - ब्लोग्गेर्स विडियो

Tuesday, October 14, 2008

राकेश खंडेलवाल की पुस्तक के विमोचन-समारोह के वीडियो-अंश

साथ में समीरलाल, राकेश खंडेलवाल, रजनी भार्गव, अनूप भार्गव, घनश्याम गुप्ता और डॉ॰ सत्यपाल आनंद का काव्य-पाठ


शनिवार ११ अक्टूबर २००८ को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि राकेश खंडेलवाल के कविता संग्रह 'अंधेरी रात का सूरज' का एक साथ तीन जगहों से विमोचन हुआ। पहला तो पुस्तक के प्रकाशक पंकज सुबीर के शहर सीहोर में, दूसरा इसी मंच पर आम श्रोताओं द्वारा और तीसरा वाशिंगटन डीसी में। इस ब्लॉग पर आप विमोचन और काव्य पाठ का आनंद तो ले ही चुके हैं। आज हम लाये हैं, अनूप भार्गव की मदद से तैयार वाशिंगटन समारोह के कुछ वीडियो-अंश।

डॉ॰ सत्यपाल आनन्द जी राकेश जी के बारे में अपने विचार रखते हुए



पुस्तक का विमोचन करते हुए डॉ॰ सत्यपाल आनंद



घनश्याम गुप्ता जी काव्य पाठ



घनश्याम गुप्ता जी काव्य पाठ - २



समीर लाल काव्य पाठ



डॉ. सत्यपाल आनन्द काव्य पाठ



रजनी भार्गव का काव्य-पाठ



अनूप भार्गव का काव्य-पाठ



'अंधेरी रात का सूरज' (कविता-संग्रह) के विमोचन समारोह में काव्य पाठ करते राकेश खंडेलवाल



यदि आपने अभी तक खुद के हाथों इस कविता-संग्रह का विमोचन नहीं किया तो यहाँ क्लिक करके अवश्य करें।

Friday, September 5, 2008

कहने को हासिल सारा जहाँ था...

दूसरे सत्र के १० वें गीत और उसके विडियो का विश्वव्यापी उदघाटन आज.

चलते चलते हम संगीत के इस नए सत्र की दसवीं कड़ी तक पहुँच गए, अब तक के हमारे इस आयोजन को श्रोताओं ने जिस तरह प्यार दिया है, उससे हमारे हौसले निश्चित रूप से बुलंद हुए है. तभी शायद हम इस दसवें गीत के साथ एक नया इतिहास रचने जा रहे हैं, आज ये नया गीत न सिर्फ़ आप सुन पाएंगे, बल्कि देख भी पाएंगे, यानि "खुशमिजाज़ मिट्टी" युग्म का पहला गीत है जो ऑडियो और विडियो दोनों रूपों में आज ओपन हो रहा है.


सुबोध साठे की आवाज़ से हमारे, युग्म के श्रोता बखूबी परिचित हैं, लेकिन अब तक उन्होंने दूसरे संगीतकारों, जैसे ऋषि एस और सुभोजित आदि के लिए अपनी आवाज़ दी है, पर हम आपको बता दें, सुबोध ख़ुद भी एक संगीतकार हैं और अपनी वेब साईट पर दो हिन्दी और एक मराठी एल्बम ( बतौर संगीतकार/ गायक ) लॉन्च कर चुके हैं, युग्म के लिए ये उनका पहला स्वरबद्ध गीत है, जाहिर है आवाज़ भी उनकी अपनी है, संगीत संयोजन में उनका साथ निभाया है, पुणे के चैतन्य अड़कर ने. गीतकार हैं युग्म के एक और प्रतिष्टित कवि, गौरव सोलंकी, जिनका अंदाज़ अपने आप में सबसे जुदा है, तो आनंद लें इस ताजातरीन प्रस्तुति का, और अपने विचार टिप्पणियों के माध्यम से हम तक अवश्य पहुंचायें.


गीत को सुनने के लिए नीचे के प्लेयर पर क्लिक करें -





To listen to this brand new song, please click on the player below -




With this 10th song of the season, we are creating a new history, as this is the first song, which we are opening in audio and video format together. Subodh who sung many song for us before, this time handle the tough job of composing also, along with singing in his mesmerizing voice.


Song penned by another reputed poet from yugm family, Gaurav Solonki, while Chaitanya Adhker from Pune, helped with music arrangement. So now after hearing the audio watch here the video of "khushmizaz mitti".We hope you like this effort, feel free to post your comments about the song and its video so that we can better ourselves in accordance with your suggestions.

Other credits - (Regarding Video)

Video Direction - Subodh Sathe.
Camera - Navendu thosar, Pankaj Makhe.
Editing - Manoj Pidadi

Video of "khushmizaz mitti"



Lyrics - गीत के बोल


खुशमिजाज मिट्टी
पहले उदास थी
चाँदनी की चिट्ठी
अँधेरे के पास थी
सुस्त सुस्त शामें थीं,
सुबहें उनींदी
सूरज के होठों को उजाले की प्यास थी
कहने को हासिल सारा जहाँ था
तुम जो नहीं थे तो कुछ भी कहाँ था...

इधर था मोहल्ला नींदों का लेकिन
रातों में पागल सोता नहीं था
अजब सी थी हालत दिल की भी मेरे
हँसता नहीं था, रोता नहीं था
कहने को हासिल सारा जहाँ था
तुम जो नहीं थे तो कुछ भी कहाँ था...

बहुत डोर थी, बहुत थी पतंगें
मगर उड़ती कैसे, नहीं थी उमंगें
ऐसा हुआ था, दिल में कुँआ था
पानी का साया भी डूबा हुआ था
कहने को हासिल सारा जहाँ था
तुम जो नहीं थे तो कुछ भी कहाँ था...

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)




VBR MP364Kbps MP3Ogg Vorbis



SONG # 10, SEASON # 02, "KHUSHMIZAZ MITTI" (Khushmizas Mitti), OPENED ON 05/09/2008, AWAAZ, HIND YUGM.Music @ Hind Yugm, Where music is a passion.

ब्लॉग/वेबसाइट/ऑरकुट स्क्रैपबुक/माईस्पैस/फेसबुक में 'खुशमिज़ाज मिट्टी' का पोस्टर लगाकर नये कलाकारों को प्रोत्साहित कीजिए

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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