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Sunday, June 12, 2016

राग पीलू : SWARGOSHTHI – 274 : RAG PILU




स्वरगोष्ठी – 274 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 7 : मदन मोहन और लता का सुरीला संगम

‘मैंने रंग ली आज चुनरिया, सजना तोरे रंग में...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ जारी है। श्रृंखला की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी दे रहे हैं। श्रृंखला की सातवीं कड़ी में आज हम आपको राग पीलू के स्वरों में पिरोये गए 1966 में प्रदर्शित फिल्म ‘दुल्हन एक रात की’ से राग पीलू पर आधारित एक गीत का रसास्वादन कराएँगे। इस राग आधारित गीत को स्वर दिया है, मदन मोहन की मुहबोली बहन, सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका लता मंगेशकर ने। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग पीलू के स्वर में निबद्ध फिल्म ‘दुल्हन एक रात की’ के इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम विश्वविख्यात सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खाँ का सरोद पर बजाया राग पीलू की एक रसपूर्ण रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं। 


दन मोहन द्वारा स्वरबद्ध राग आधारित फ़िल्मी गीतों की इस श्रृंखला की आज की कड़ी में फिर एक बार लता मंगेशकर और मदन मोहन का सुरीला संगम प्रस्तुत है। अपने मदन भ‍इया को याद करती हुईं लता जी कहती हैं - "ज़रा यह सुनिए कि उनको संगीत की कितनी बड़ी देन थी। आमद का यह हाल था कि बस हारमोनियम लेकर बैठते और धुन चुटकियों में बन जाती। कभी मोटर चलाते हुए, कभी लिफ़्ट पर उपर या नीचे आते हुए भी उनकी धुन तैयार हो जाती। मदन भ‍इया एक दो साल मिलिटरी में थे, और शायद इसी वजह से उनके बरताव में एक उपरी सख़्ती हुआ करती थी। कई बार बड़े रफ़ से लगते थे। बातें खरी खरी मुँह पर सुना देते थे। प्यार भी उनका यूँ होता था कि बस हाथ उठाया और धम से मार दिया। मगर यह सख़्ती सिर्फ़ उपर की थी, अन्दर से तो वे बड़े भावुक थे और बड़े नर्म थे। यह नरमी, यह भावुकता कभी कभी अपनी झलक दिखला जाती थी दिल को छू लेने वाली धुनों में ढल कर। बड़े खुद्दार थे मदन भ‍इया। अपने आदर्शों को वो न किसी के सामने झुकने देते थे, न दबने देते थे। ’वो कौन थी’ के गीतों की सफलता पर मुमकिन था कि उन्हें एक बहुत बड़ा अवार्ड मिले। कुछ लोग उनके पास आए और उस अवार्ड के लिए उनसे सौदा करना चाहा। मदन भ‍इया ने साफ़ इनकार कर दिया। वह अवार्ड मदन भ‍इया को नहीं मिला और ना मिलने पर जब मैंने अफ़सोस ज़ाहिर किया तो वो कहने लगे कि मेरे लिए क्या यह कम अवार्ड है कि तुम्हे अफ़सोस हुआ!" आज हम लता और मदन मोहन जोड़ी की जिस रचना को प्रस्तुत कर रहे हैं उसे हमने चुना है 1966 की फ़िल्म ’दुल्हन एक रात की’ से - "मैंने रंग ली आज चुनरिया सजना तोरे रंग में..." जिसे लिखा था राजा मेंहदी अली ख़ाँ ने और फ़िल्माया गया था अभिनेत्री नूतन पर। गीत आधारित है राग पीलू पर और ताल है कहरवा।

आप सभी ने यह महसूस किया होगा कि मदन मोहन की अधिकतर रचनाओं में सितार के बेहद सुरीले टुकड़े सुनाई देते हैं, गीत के शुरुआत में या अन्तराल संगीत के दौरान। आज के प्रस्तुत गीत में भी सितार कई जगहों पर सुनाई देता है। ये तमाम सितार के टुकड़े इतने सुरीले क्यों न हो जब इन्हें बजाने वाले हों उस्ताद रईस ख़ाँ जैसे सितार वादक। मदन जी के गीतों में ख़ाँ साहब का सितार पहली बार सुनाई दिया था 1964 की फ़िल्म 'पूजा के फूल' के गीत "मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है" में। ख़ाँ साहब उस्ताद विलायत ख़ाँ साहब के भतीजे थे। विलायत ख़ाँ साहब मदन जी के दोस्त हुआ करते थे। इस तरह से रईस ख़ाँ मदन मोहन के सम्पर्क में आये और मदन जी के गीतों को चार चाँद लगाया। "नैनों में बदरा छाए...", "रस्म-ए-उल्फ़त को निभाएँ..." जैसे कई गीतों में सितार बेहद ख़ूबसूरत बन पड़ा है। मदन मोहन सितार से इस तरह जज़्बाती रूप से जुड़े थे और ख़ास तौर से रईस ख़ाँ के साथ उनकी ट्यूनिंग कुछ ऐसी जमी थी कि 1974 में जब किसी ग़लतफ़हमी की वजह से एक दूसरे से दोनो अलग हो गये तब मदन मोहन ने अपने गीतों में सितार का प्रयोग ही बन्द कर दिया। वो इतने ही हताश हुए थे। इस वजह से मदन मोहन के अन्तिम दो वर्षों, अर्थात 1974 और 1975 में 'मौसम', 'साहिब बहादुर' आदि फ़िल्मों के गीतों में हमें सितार सुनने को नहीं मिले। यह भी उल्लेखनीय तथ्य है कि हाल ही में मदन मोहन की पुत्री संगीता जी ने मुझे स्वयं बताया कि बाद में मदन मोहन जी ने उस्ताद शमीम अहमद से ख़ुद सितार सीखा और अपनी आख़िर की कुछ फ़िल्मों में शमीम अहमद साहब से बजवाया। अब कुछ बातें इस गीत के गीतकार राजा मेंहदी अली ख़ाँ साहब की। राजा साहब और मदन जी की जोड़ी के बारे में मदन जी के छोटे पुत्र समीर कोहली बताते हैं, "राजा साहब भी पिताजी के बहुत अच्छे दोस्त थे। ’आँखें’ (1950, ’अदा’ (1951) और ’मदहोश’ (1951) के बाद एक लम्बे अरसे के बाद दोनों साथ में ’अनपढ़’ (1962) में काम कर रहे थे। ’अनपढ़’ से पहले राजा साहब ज़्यादातर हास्य गीत लिखा करते थे, पर ’अनपढ़’ के गीतों के बाद वो गम्भीर शायरी की वजह से मशहूर हो गए। बहुत जल्दी उनका निधन हो गया ’जब याद किसी की आती है’ (1966) का शीर्षक गीत लिखने के बाद ही। मदन जी का राजा साहब के लिए दिल में क्या जगह थी इसका पता चलता है एक घटना से। पिताजी समय के बड़े पाबन्द हुआ करते थे, फिर भी एक बार एक पत्रकार-सम्मेलन (press conference) में वो देर से पहुँचे। इस बात पर एक पत्रकार ने उनसे इस देरी का कारण पूछा तो उनका जवाब था कि मैं घर से समय पर ही चला था। रास्ते में मुझे राजा साहब की कब्र दिख गई और मैं अपने आप को रोक नहीं सका। मैं वहाँ दो मिनट के लिए रुका, उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दी। इस वजह से मुझे देर हो गई, इसके लिए आप सब मुझे क्षमा करें।" अब आप राजा मेंहदी अली खाँ का लिखा, मदन मोहन का संगीतबद्ध किया और लता मंगेशकर का गाया, फिल्म ‘दुल्हन एक रात की’ का वही गीत सुनिए।


राग पीलू : ‘मैंने रंग ली आज चुनरिया, सजना तेरे रंग में...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – दुल्हन एक रात की


राग पीलू का सम्बन्ध काफी थाट से जोड़ा जाता है। आमतौर पर इस राग के आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित किया जाता है। अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इसलिए राग की जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर प्रयोग होते हैं। इस राग में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वर के कोमल और शुद्ध, दोनों रूप का प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन-वादन का समय दिन का तीसरा प्रहर माना गया है। इस राग के प्रयोग करते समय प्रायः अन्य कई रागों की छाया दिखाई देती है, इसीलिए राग पीलू को संकीर्ण जाति का राग कहा जाता है। यह चंचल प्रकृति का और श्रृंगार रस की सृष्टि करने वाला राग है। इस राग में अधिकतर ठुमरी, दादरा, टप्पा, गीत, भजन आदि का गायन बेहद लोकप्रिय है। फिल्मी गीतों में भी इस राग का प्रयोग अधिक किया गया है। इस राग में ध्रुपद और विलम्बित खयाल का प्रचलन नहीं है। राग पीलू पूर्वांग प्रधान राग है। इसमे पूर्वांग के स्वर इतने प्रमुख रहते हैं कि प्रायः गायक या वादक मध्यम स्वर को अपना षडज मान कर गाते-बजाते हैं, जिससे मंद्र सप्तक के स्वरों में सरलता से विचरण किया जा सके। राग पीलू के गायन-वादन का समय यद्यपि दिन का तीसरा प्रहर निर्धारित किया गया है, किन्तु परम्परागत रूप से यह सार्वकालिक राग हो गया है। ठुमरी अंग का राग होने से किसी भी गायन-वादन की सभा के अन्त में पीलू की ठुमरी, दादरा या सुगम संगीत से कार्यक्रम के समापन की परम्परा बन गई है। अब आप विश्वविख्यात सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खाँ से सरोद पर राग पीलू की एक रसपूर्ण रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति प्रदान कीजिए।


राग पीलू : सरोद पर दादरा ताल की रचना : उस्ताद अमजद अली खाँ




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 274वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक बार पुनः संगीतकार मदन मोहन के संगीत से सजे एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन का आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत के गायक को पहचान सकते हैं? हमे गायक का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 18 जून, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 276वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 272 की संगीत पहेली में हमने आपको मदन मोहन के संगीत निर्देशन में बनी और 1950 में प्रदर्शित फिल्म ‘आँखें’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – पहाड़ी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है – ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायिका – मीना कपूर

इस बार की पहेली में चार प्रतिभागियों ने सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं - चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया। इन सभी विजेताओं ने दो-दो अंक अर्जित किये है। सभी विजेता प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में जारी हमारी श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की आज की कड़ी में आपने राग पीलू का परिचय प्राप्त किया। इस श्रृंखला में हम फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। राग पीलू के बारे में कोटा, राजस्थान के तुलसी राम वर्मा ने हमसे अनुरोध किया था। आज के अंक में हमने श्री वर्मा के अनुरोध पर आपको राग पीलू की जानकारी दी। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी 
 प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



 

Sunday, February 7, 2016

राग श्यामकल्याण : SWARGOSHTHI – 256 : RAG SHYAM KALYAN




स्वरगोष्ठी – 256 में आज

दोनों मध्यम स्वर वाले राग – 4 : राग श्यामकल्याण

उस्ताद अमजद अली खाँ और किशोर कुमार से सुनिए श्यामकल्याण की प्रस्तुतियाँ



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों की चर्चा कर रहे हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। संगीत के सात स्वरों में ‘मध्यम’ एक महत्त्वपूर्ण स्वर होता है। हमारे संगीत में मध्यम स्वर के दो रूप प्रयोग किये जाते हैं। स्वर का पहला रूप शुद्ध मध्यम कहलाता है। 22 श्रुतियों में दसवाँ श्रुति स्थान शुद्ध मध्यम का होता है। मध्यम का दूसरा रूप तीव्र या विकृत मध्यम कहलाता है, जिसका स्थान बारहवीं श्रुति पर होता है। शास्त्रकारों ने रागों के समय-निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किये हैं। इन्हीं में से एक सिद्धान्त है, “अध्वदर्शक स्वर”। इस सिद्धान्त के अनुसार राग का मध्यम स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार राग में यदि तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति हो तो वह राग दिन और रात्रि के पूर्वार्द्ध में गाया-बजाया जाएगा। अर्थात, तीव्र मध्यम स्वर वाले राग 12 बजे दिन से रात्रि 12 बजे के बीच ही गाये-बजाए जा सकते हैं। इसी प्रकार राग में यदि शुद्ध मध्यम स्वर हो तो वह राग रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच का अर्थात उत्तरार्द्ध का राग माना गया। कुछ राग ऐसे भी हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वर प्रयोग होते हैं। इस श्रृंखला में हम ऐसे ही रागों की चर्चा करेंगे। श्रृंखला की चौथी कड़ी में आज हम राग श्यामकल्याण के स्वरूप की चर्चा करेंगे। साथ ही इस राग में पहले सरोद वाद्य पर उस्ताद अमजद अली खाँ की एक रचना प्रस्तुत करेंगे और इसी राग पर आधारित फिल्म ‘दर्द का रिश्ता’ का एक गीत गायक किशोर कुमार की आवाज़ में सुनवाएँगे।


चढ़ते धैवत त्याग कर, दोनों मध्यम मान,
स-म वादी-संवादी सों, क़हत श्यामकल्याण।

दोनों मध्यम स्वरों से युक्त राग श्यामकल्याण हमारी श्रृंखला, ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ की चौथी कड़ी का राग है। तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति के कारण इस राग को कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाता है। आरोह में गान्धार और धैवत स्वर वर्जित होता है तथा अवरोह में सभी सातो स्वर प्रयोग किये जाते हैं। दोनों मध्यम के अलावा शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाने के कारण राग श्यामकल्याण की जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। राग के आरोह में तीव्र मध्यम और अवरोह में दोनों मध्यम स्वरो का प्रयोग किया जाता है। इसका वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। श्रृंखला के पिछले रागों की तरह राग श्यामकल्याण का गायन-वादन भी पाँचवें प्रहर अर्थात रात्रि के प्रथम प्रहर में किया जाता है।

उस्ताद अमजद अली खाँ
अब हम आपको राग श्यामकल्याण का उदाहरण सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद अमजद अली खाँ द्वारा सरोद पर बजाया यही राग सुनवाते हैं। विश्वविख्यात संगीतज्ञ और सरोद-वादक उस्ताद अमजद अली खाँ का जन्म 9 अक्टूबर, 1945 को ग्वालियर में संगीत के सेनिया बंगश घराने की छठी पीढ़ी में हुआ था। संगीत इन्हें विरासत में प्राप्त हुआ था। इनके पिता उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ ग्वालियर राज-दरबार में प्रतिष्ठित संगीतज्ञ थे। इस घराने के संगीतज्ञों ने ही ईरान के लोकवाद्य ‘रबाब’ को भारतीय संगीत के अनुकूल परिवर्द्धित कर ‘सरोद’ नामकरण किया था। अमजद अली अपने पिता हाफ़िज़ अली के सबसे छोटे पुत्र हैं। उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ ने परिवार के सबसे छोटे और सर्वप्रिय सन्तान को बहुत छोटी उम्र में ही संगीत-शिक्षा देना आरम्भ कर दिया था। मात्र बारह वर्ष की आयु में एकल सरोद-वादन का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया था। एक छोटे से बालक की सरोद पर अनूठी लयकारी और तंत्रकारी सुन कर दिग्गज संगीतज्ञ दंग रह गए। उस्ताद अमजद अली खाँ को बचपन में ही सरोद से ऐसा लगाव हुआ कि युवावस्था तक आते-आते एक श्रेष्ठ सरोद-वादक के रूप में पहचाने जाने लगे। उन्होने सरोद-वादन की शैली में विकास के लिए कई प्रयोग किये। उनका एक महत्त्वपूर्ण प्रयोग यह है कि सरोद के तारों को उँगलियों के सिरे से बजाने के स्थान पर नाखून से बजाना। सितार की भाँति सरोद में स्वरों के पर्दे नहीं होते, इसीलिए जब उँगलियों के सिरे के स्थान पर नाखूनों से इसे बजाया जाता है तब स्वरों की स्पष्टता और मधुरता बढ़ जाती है। अब आप सरोद पर बजाया राग श्यामकल्याण सुनिए। रचना के आरम्भ में आप राग का समृद्ध आलाप और फिर तीनताल में एक आकर्षक गत सुनेगे।


राग श्यामकल्याण : सरोद पर आलाप और तीनताल की गत : उस्ताद अमजद अली खाँ



राहुलदेव बर्मन और किशोर कुमार
राग श्यामकल्याण, राग कल्याण का ही एक प्रकार है, यह इसके नाम से ही स्पष्ट है। राग के नाम से ऐसा प्रतीत होता है, मानो यह दो रागों- श्याम और कल्याण के मेल से बना है। किन्तु ऐसा नहीं है। दरअसल इस राग में राग कामोद और कल्याण का सुन्दर मिश्रण होता है। राग के अवरोह में गान्धार का अल्प और वक्र प्रयोग किया जाता है। पूर्वांग में कामोद अंग कम करने के लिए गान्धार का अल्प प्रयोग किया जाता है। प्रत्येक आलाप के अन्त में ग म रे स्वरो का प्रयोग होता है। इस राग में निषाद स्वर का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। यद्यपि धैवत वर्जित माना जाता है, किन्तु निषाद पर धैवत का कण दिया जाता है। यह कण कल्याण रागांग का सूचक है। वादी स्वर पंचम होने से यह उत्तरांग प्रधान राग होना चाहिए, किन्तु वास्तव में यह पूर्वांग प्रधान होता है। इसीलिए कुछ विद्वान राग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम तथा कुछ विद्वान ऋषभ स्वर को वादी और पंचम को संवादी मानते हैं। राग को शुद्ध सारंग से बचाने के लिए अवरोह में गान्धार का प्रयोग तथा कामोद से बचाने के लिए निषाद स्वर को बढ़ाते है। आज हमने राग श्यामकल्याण पर आधारित फिल्मी गीत के रूप में 1983 में प्रदर्शित फिल्म ‘दर्द का रिश्ता’ से एक गीत का चुनाव किया है। इस गीत के संगीतकार राहुलदेव बर्मन हैं और इसे हरफनमौला पार्श्वगायक किशोर कुमार ने स्वर दिया है। दादरा ताल में निबद्ध इस गीत के बोल हैं- ‘यूँ नींद से वो जान-ए-चमन जाग उठी है...’। आप यह गीत सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। और हाँ, नीचे की पहेली को सुलझाना न भूलिएगा।


राग श्यामकल्याण : ‘यूँ नींद से वो जान-ए-चमन...’ : किशोर कुमार : फिल्म - दर्द का रिश्ता 




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 256वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग पर आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 260वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आभास हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत के गायक का नाम हमे बता सकते हैं?

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 13 फरवरी, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 258वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 254 की संगीत पहेली में हमने आपको 1969 में प्रदर्शित फिल्म ‘तलाश’ से राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग छायानट, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल सितारखानी अथवा पंजाबी ठेका और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक – मन्ना डे

इस बार की पहेली में कुल चार प्रतिभागियों ने सही उत्तर दिया है। हमारे नियमित प्रतिभागी विजेता हैं- जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इससे पूर्व पहेली क्रमांक 253 के विजेताओं की सूची में औरंगाबाद, महाराष्ट्र के नारायण सिंह हजारी के नाम की घोषणा पहेली की औपचारिकता पूर्ण न होने से हम नहीं कर सके थे। नारायण जी संगीत पहेली में पहली बार प्रतिभागी बने और विजयी हुए। हम उनका हार्दिक अभिनन्दन करते हैं और आशा करते हैं कि भविष्य में भी अपनी सहभागिता निभाएंगे।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी श्रृंखला ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ का रसास्वादन कर रहे हैं। श्रृंखला के चौथे अंक में हमने आपसे राग श्यामकल्याण पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। इस बार हम अपने दो पाठको, जेसिका मेनेजेस और विश्वनाथ ओक ने हमें सन्देश भेजा है, जिसे हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे है।

JESSICA MENEZES - Thanks so much for your wonderful posts explaining about the various Ragas with beautiful examples. itni khoobsoorti se hamari jaankaari badhaane ke liye bahut bahut dhanywaad.

VISHWANATH OKE - Must apprteciate your dedication in regularly sharing these posts every Sunday. Very useful ones. Keep it up.

‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें शीघ्र भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Sunday, October 18, 2015

सरोद और अमजद अली : SWARGOSHTHI – 240 : SAROD & AMJAD ALI



स्वरगोष्ठी – 240 में आज

संगीत के शिखर पर – 1 : सरोद वादन

सरोद वादन में अप्रतिम उस्ताद अमजद अली खाँ



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ हो रही हमारी नई श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीतानुरागियों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनकी प्रस्तुतियों की चर्चा करेंगे। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर उनके व्यक्तित्व और उनकी कृतियों को प्रस्तुत करेंगे। आज श्रृंखला की पहली कड़ी में हम अत्यन्त लोकप्रिय तंत्रवाद्य सरोद और इसके विश्वविख्यात वादक उस्ताद अमजद अली खाँ के व्यक्तित्व तथा कृतित्व की संक्षिप्त चर्चा करेंगे और उनका बजाया राग श्याम कल्याण, कामोद और भैरवी की रचनाएँ सुनेगे।




संगीत रत्नाकर’ ग्रन्थ के अनुसार भारतीय संगीत के वाद्ययंत्रों को चार मुख्य वर्ग- तत्, सुषिर, अवनद्ध और घन में बांटा गया है। जिन वाद्यों में ताँत या तार से ध्वनि उत्पन्न होती है उन्हें तत् वाद्य कहा जाता है। जैसे- सितार, सरोद, गिटार, सारंगी, वायलिन आदि। आगे चल कर तत् श्रेणी के वाद्यों को वादन शैली में भिन्नता के कारण दो भागों में बाँटा जाता है। कुछ तत् वाद्ययंत्र गज या कमानी द्वारा वाद्य के तारों पर रगड़ कर बजाया जाता है। इस श्रेणी के व्वाद्ययंत्रों में सारंगी, वायलिन, इसराज, दिलरुबा, चेलो आदि आते हैं। दूसरी श्रेणी में वाद्ययंत्रों के तारों पर मिज़राब, जवा या उँगलियों से आघात करके बजाया जाता है। इस श्रेणी में वीणा, सुरबहार, सितार, सरोद, गिटार आदि वाद्य रखे गए हैं। सरोद वाद्य इसी श्रेणी का है। आधुनिक सरोद प्राचीन वाद्य ‘रबाब’ का संशोधित और विकसित रूप है। आज की ‘स्वरगोष्ठी में हम सरोद और उसके अप्रतिम साधक और वादक उस्ताद अमजद अली खाँ पर चर्चा कर रहे हैं।

विश्वविख्यात संगीतज्ञ और सरोद-वादक उस्ताद अमजद अली खाँ का जन्म 9 अक्टूबर, 1945 को ग्वालियर में संगीत के सेनिया बंगश घराने की छठी पीढ़ी में हुआ था। संगीत इन्हें विरासत में प्राप्त हुआ था। इनके पिता उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ ग्वालियर राज-दरबार में प्रतिष्ठित संगीतज्ञ थे। इस घराने के संगीतज्ञों ने ही ईरान के लोकवाद्य ‘रबाब’ को भारतीय संगीत के अनुकूल परिवर्द्धित कर ‘सरोद’ नामकरण किया। अमजद अली अपने पिता हाफ़िज़ अली के सबसे छोटे पुत्र हैं। उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ ने परिवार के सबसे छोटे और सर्वप्रिय सन्तान को बहुत छोटी उम्र में ही संगीत-शिक्षा देना आरम्भ कर दिया था। मात्र बारह वर्ष की आयु में एकल सरोद-वादन का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया था। एक छोटे से बालक की सरोद पर अनूठी लयकारी और तंत्रकारी सुन कर दिग्गज संगीतज्ञ दंग रह गए। उस्ताद अमजद अली खाँ और उनके सरोद पर चर्चा जारी रहेगी, आइए, उस्ताद के सरोद-वादन का एक उदाहरण सुनते हैं। उस्ताद अमजद अली खाँ प्रस्तुत कर रहे हैं, कल्याण थाट का राग ‘श्याम कल्याण’। इस राग में दोनों मध्यम स्वर प्रयोग किये जाते हैं और आरोह में धैवत स्वर वर्जित होता है। रचना मध्यलय तीनताल में निबद्ध है।



राग श्याम कल्याण : मध्यलय तीनताल की रचन : उस्ताद अमजद अली खाँ




उस्ताद अमजद अली खाँ को बचपन में ही सरोद से ऐसा लगाव हुआ कि युवावस्था तक आते-आते एक श्रेष्ठ सरोद-वादक के रूप में पहचाने जाने लगे। उन्होने सरोद-वादन की शैली में विकास के लिए कई प्रयोग किये। उनका एक महत्त्वपूर्ण प्रयोग यह है कि सरोद के तारों को उँगलियों के सिरे से बजाने के स्थान पर नाखून से बजाना। सितार की भाँति सरोद में स्वरों के पर्दे नहीं होते, इसीलिए जब उँगलियों के सिरे के स्थान पर नाखूनों से इसे बजाया जाता है तब स्वरों की स्पष्टता और मधुरता बढ़ जाती है। अब आप सरोद पर बजाया राग ‘कामोद’ सुनिए। राग कामोद कल्याण थाट और सम्पूर्ण जाति का राग है। इस राग में भी दोनों मध्यम स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। रात्रि के प्रथम प्रहर में इस राग का गायन-वादन सुखदायी होता है। आप उस्ताद अमजद अली खाँ का बजाया, चाँचर या दीपचन्दी ताल में निबद्ध यह रचना सुनिए।


राग कामोद : चाँचर ताल में निबद्ध रचना : उस्ताद अमजद अली खाँ




युवावस्था में ही उस्ताद अमजद अली खाँ ने सरोद-वादन में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर ली थी। 1971 में उन्होने द्वितीय एशियाई अन्तर्राष्ट्रीय संगीत-सम्मेलन में भाग लेकर ‘रोस्टम पुरस्कार’ प्राप्त किया था। यह सम्मेलन यूनेस्को की ओर से पेरिस में आयोजित किया गया था, जिसमें उन्होने ‘आकाशवाणी’ के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया था। अमजद अली ने यह पुरस्कार मात्र 26 वर्ष की आयु में प्रपट किया था, जबकि इससे पूर्व 1969 में यही ‘रोस्टम पुरस्कार’ उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ को शहनाई-वादन के लिए प्राप्त हो चुका था। 1963 में मात्र 18 वर्ष की आयु में उन्होने पहली अमेरिका यात्रा की थी। इस यात्रा में पण्डित बिरजू महाराज के नृत्य-दल की प्रस्तुति के साथ अमजद अली खाँ का सरोद-वादन भी हुआ था। इस यात्रा का सबसे उल्लेखनीय पक्ष यह था कि खाँ साहब के सरोद-वादन में पण्डित बिरजू महाराज ने तबला संगति की थी और खाँ साहब ने बिरजू महाराज की कथक संरचनाओं में सरोद की संगति की थी। उस्ताद अमजद अली खाँ ने देश-विदेश के अनेक महत्त्वपूर्ण संगीत केन्द्रों में प्रदर्शन कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया है। इनमें कुछ प्रमुख हैं- रायल अल्बर्ट हाल, रायल फेस्टिवल हाल, केनेडी सेंटर, हाउस ऑफ कामन्स, फ़्रंकफ़र्ट का मोजर्ट हाल, शिकागो सिंफनी सेंटर, आस्ट्रेलिया के सेंट जेम्स पैलेस और ओपेरा हाउस आदि। खाँ साहब अनेकानेक पुरस्कारों और सम्मानों से अलंकृत किये जा चुके हैं। इनमें कुछ प्रमुख सम्मान हैं- भारत सरकार द्वारा प्रदत्त ‘पद्मश्री’ और ‘पद्मभूषण’ सम्मान, संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार, तानसेन सम्मान, यूनेस्को पुरस्कार, यूनिसेफ का राष्ट्रीय राजदूत सम्मान आदि। वर्तमान में उस्ताद अमजद अली खाँ के दो पुत्र, अमान और अयान सहित देश-विदेश के अनेक शिष्य सरोद वादन की पताका फहरा रहे हैं। अब हम उस्ताद अमजद अली खाँ द्वारा सरोद पर प्रस्तुत राग ‘भैरवी’ में एक दादरा सुनवाते हैं। आप यह दादरा सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भैरवी : दादरा में रचना : उस्ताद अमजद अली खाँ





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 240वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको भारतीय संगीत की एक मशहूर गायिका द्वारा प्रस्तुत कण्ठ-संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग में निबद्ध है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गीतांश में गायिका के स्वरों को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 24 अक्टूबर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 242वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 238 की संगीत पहेली में हमने 1959 में प्रदर्शित फिल्म ‘चाचा ज़िन्दाबाद’ से मदन मोहन का संगीतबद्ध एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग ललित, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- मन्ना डे और लता मंगेशकर। 

इस बार की पहेली में करवार, कर्नाटक से सुधीर हेगड़े, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने सही उत्तर दिये हैं। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 



मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ का यह पहला अंक था। अगले अंक में हम भारतीय संगीत की किसी अन्य विधा के किसी शिखर व्यक्तित्व के कृतित्व पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, October 13, 2013

‘जय जय हे जगदम्बे माता...’ : नवरात्र पर विशेष

स्वरगोष्ठी – 140 में आज

रागों में भक्तिरस – 8

राग यमन में सांध्य-वन्दन के स्वर 

   
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीत-रसिकों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम भारतीय संगीत के सर्वाधिक लोकप्रिय राग कल्याण अर्थात यमन पर चर्चा करेंगे। आपके समक्ष इस राग के भक्तिरस के पक्ष को स्पष्ट करने के लिए दो रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। पहले आप सुनेंगे 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘गंगा की लहरें’ से शक्तिस्वरूपा देवी दुर्गा की प्रशस्ति करता एक आरती गीत। आज के अंक में यह भक्तिगीत इसलिए भी प्रासंगिक है कि आज पूरे देश में शारदीय नवरात्र पर्व के नवें दिन देवी के मातृ-स्वरूप की आराधना पूरी आस्था के साथ की जा रही है। इसके साथ ही विश्वविख्यात सरोद-वादक उस्ताद अमजद अली खाँ का बजाया राग यमन भी हम प्रस्तुत करेंगे। यहाँ यह रेखांकित करना भी आवश्यक है कि बीते 9 सितम्बर को इस महान सरोद-वादक का 69वाँ जन्मदिन मनाया गया।


लता मंगेशकर और चित्रगुप्त 
हिन्दी फिल्म संगीत के समृद्ध भण्डार से यदि राग आधारित गीतों का चयन करना हो तो सर्वाधिक संख्या राग यमन, भैरवी और पहाड़ी पर आधारित गीतों की मिलेगी। राग यमन प्रायः सभी संगीतकारों का प्रिय राग रहा है। आज शारदीय नवरात्र के मातृनवमी के दिन हम आपको राग यमन पर आधारित एक फिल्मी आराधना गीत सुनवा रहे हैं। 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘गंगा की लहरें’ का गीत- ‘जय जय हे जगदम्बे माता...’ राग यमन पर आधारित है। इसके संगीतकार चित्रगुप्त ने राग यमन के स्वरों को लेकर अत्यन्त सहज-सरल धुन में गीत को बाँधा है। राग यमन गोधूलि बेला अर्थात रात्रि के प्रथम प्रहर के आरम्भ के समय का राग है। तीव्र मध्यम के साथ सभी शुद्ध स्वरों वाला सम्पूर्ण जाति का यह राग कल्याण थाट का आश्रय राग माना जाता है। प्राचीन ग्रन्थों में इस राग का नाम कल्याण ही बताया गया है। विद्वानों के अनुसार प्राचीन काल में भारत से यह राग पर्शिया पहुँचा, जहाँ इसे यमन नाम मिला। मुगलकाल से इसका यमन अथवा इमन नाम प्रचलित हुआ। दक्षिण भारतीय पद्यति में यह राग कल्याणी नाम से जाना जाता है। राग यमन अथवा कल्याण के आरोह में षडज और पंचम का प्रयोग बहुत प्रबल नहीं होता। निषाद स्वर प्रबल होने और ऋषभ स्वर शुद्ध होने से पुकार का भाव तथा भक्ति और करुण रस की सहज अभिव्यक्ति होती है। जैसा कि उल्लेख किया गया कि इस राग में तीव्र मध्यम के साथ शेष सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग किया जाता है। परन्तु यदि तीव्र मध्यम के स्थान पर शुद्ध मध्यम का प्रयोग किया जाए तो यह राग बिलावल हो जाता है। अवरोह में यदि दोनों मध्यम का प्रयोग कर दिया जाए तो यह यमन कल्याण राग हो जाता है। यदि राग यमन के शुद्ध निषाद के स्थान पर कोमल निषाद का प्रयोग कर दिया जाए तो राग वाचस्पति की अनुभूति कराता है। राग यमन की स्वर-रचना के कारण ही फिल्म ‘गंगा की लहरें’ के इस गीत में भक्त के पुकार का भाव स्पष्ट रूप से मुखरित होता है। कहरवा ताल के ठेके पर लता मंगेशकर ने इस आराधना गीत को भक्तिरस से परिपूर्ण कर दिया है।


राग यमन : ‘जय जय हे जगदम्बे माता...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – गंगा की लहरें 


राग कल्याण अर्थात यमन यद्यपि संगीत शिक्षा का प्रारम्भिक राग माना जाता है किन्तु यह गम्भीर राग है और इसमें कल्पनापूर्ण विस्तार की अनन्त सम्भावना भी उपस्थित है। गायन के साथ ही वाद्य संगीत पर भी राग यमन खूब खिलता है। सरोद जैसे गम्भीर गमकयुक्त वाद्य पर इस राग की सार्थक अनुभूति के लिए अब हम आपको विश्वविख्यात सरोदवादक उस्ताद अमजद अली खाँ द्वारा प्रस्तुत राग यमन सुनवाते हैं। यह उल्लेख हम ऊपर कर चुके हैं कि इस सप्ताह 9 अक्तूबर को उस्ताद अमजद अली खाँ का 69वाँ जन्मदिवस था। इस अवसर के लिए हम उन्हें ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ देते हैं और उनके व्यक्तित्व के कुछ प्रेरक पलों को याद करते हैं।

उस्ताद अमजद अली खाँ 
वर्तमान में उस्ताद अमजद अली खाँ सरोद-वादकों की सूची में शिखर पर हैं और ‘सरोद-सम्राट’ की उपाधि से विभूषित हैं। 9 अक्तूबर, 1945 को ग्वालियर में संगीत के सेनिया बंगश घराने की छठी पीढ़ी में जन्म लेने वाले अमजद अली खाँ को संगीत विरासत में प्राप्त हुआ था। इनके पिता उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ ग्वालियर राज-दरबार में प्रतिष्ठित संगीतज्ञ थे। इस घराने के संगीतज्ञों ने ही ईरान के लोकवाद्य ‘रबाब’ को भारतीय संगीत के अनुकूल परिवर्द्धित कर ‘सरोद’ नाम दिया। अमजद अली अपने पिता हाफ़िज़ अली के सबसे छोटे पुत्र हैं। उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ ने परिवार के सबसे छोटे और सर्वप्रिय सन्तान को बहुत छोटी उम्र से ही संगीत की शिक्षा देना आरम्भ कर दिया था। मात्र बारह वर्ष की आयु में ही उनके एकल सरोद-वादन का सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ था। एक छोटे से बालक की अनूठी लयकारी और तंत्रकारी सुन कर दिग्गज संगीतज्ञ दंग रह गए थे। युवावस्था तक आते-आते वे एक श्रेष्ठ वादक के रूप में पहचाने जाने लगे। उन्होने सरोद की वादन-शैली में कई प्रयोग किये। उनका एक महत्त्वपूर्ण प्रयोग यह है कि सरोद के तारों को उँगलियों के सिरे से बजाने के स्थान पर नाखून से बजाना। सितार की भाँति सरोद में स्वरों के पर्दे नहीं होते, इसीलिए जब उँगलियों के सिरे के स्थान पर नाखूनों से इसे बजाया जाता है तब स्वरों की स्पष्टता और मधुरता बढ़ जाती है।

उस्ताद अमजद अली खाँ ने अनेक नये रागों की रचना भी की है। ये नवसृजित राग हैं- किरणरंजनी, हरिप्रिया कान्हड़ा, शिवांजलि, श्यामश्री, सुहाग भैरव, ललितध्वनि, अमीरी तोड़ी, जवाहर मंजरी, और बापूकौंस। वर्तमान में उस्ताद अमजद अली खाँ संगीत जगत के सर्वश्रेष्ठ सरोद-वादक हैं। उनके वादन में इकहरी तानें, गमक, खयाल की बढ़त का काम अत्यन्त आकर्षक होता है। आइए, अब हम आपको सरोद पर खाँ साहब का बजाया राग यमन में भक्तिरस से परिपूर्ण एक मोहक रचना सुनवाते हैं। यह प्रस्तुति सात मात्रा के रूपक ताल में निबद्ध है। आप इस प्रस्तुति का रसास्वादन करें और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग यमन : सरोद पर रूपक ताल की रचना : उस्ताद अमजद अली खाँ 



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 140वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक भक्तिपद का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यह चौथे सेगमेंट की समापन पहेली है। इस अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – इस भक्तिपद के अंश में आपको किस राग के दर्शन हो रहे हैं?

2 – गीत के गायक-स्वर को पहचानिए और हमें उनका नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 142वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 138वें अंक की पहेली में हमने आपको डॉ. एन. राजम् का वायलिन पर गायकी अंग में प्रस्तुत मीरा के एक पद का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मालकौंस और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ‘पग घुँघरू बाँध कर नाची रे...’। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का आज का यह अंक पिछले रविवार को हम प्रस्तुत न कर सके, इसके लिए हमें खेद है। आइए, आज हम उस कड़ी का रसास्वादन करते हैं। जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपसे राग यमन के भक्तिरस के पक्ष पर चर्चा की। आगामी अंक में हम एक और भक्तिरस प्रधान राग में गूँथी रचनाएँ लेकर उपस्थित होंगे। अगले अंक में इस लघु श्रृंखला की नौवीं कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की प्रतीक्षा करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Sunday, February 10, 2013

पाँचवें प्रहर के कुछ आकर्षक राग



स्वरगोष्ठी – 107 में आज
राग और प्रहर – 5

शाम के अन्धकार को प्रकाशित करते राग


‘स्वरगोष्ठी’ के 107वें अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का इस मंच पर हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, पिछले रविवार को इस स्तम्भ का अगला अंक मैं अपनी पारिवारिक व्यस्तता के कारण प्रस्तुत नहीं कर सका था। आज के अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं, पाँचवें प्रहर के कुछ मधुर रागों में चुनी हुई रचनाएँ। तीन-तीन घण्टों की अवधि में विभाजित दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहरों के रूप में पहचाना जाता है। इनमें पाँचवाँ प्रहर अर्थात रात्रि का पहला प्रहर, सूर्यास्त के बाद से लेकर रात्रि लगभग नौ बजे तक की अवधि को माना जाता है। इस प्रहर में गाये-बजाए जाने वाले राग गहराते अन्धकार में प्रकाश के विस्तार की अनुभूति कराते हैं। आज के अंक में हम ऐसे ही कुछ रागों पर आपसे चर्चा करेंगे।

पाँचवें प्रहर के रागों में आज हम सबसे पहले राग कामोद पर चर्चा करेंगे। कल्याण थाट और कल्याण अंग से संचालित होने वाले इस राग को कुछ विद्वान काफी थाट के अंतर्गत भी मानते हैं। औड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। अवरोह में दोनों मध्यम का और शेष सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। राग वर्गीकरण के प्राचीन सिद्धान्तों के अनुसार राग कामोद को राग दीपक की पत्नी माना जाता है। अब आपको इस राग पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। सुप्रसिद्ध उपन्यासकार भगवतीचरण वर्मा की कालजयी कृति ‘चित्रलेखा’ पर 1964 में इसी नाम से फिल्म का निर्माण हुआ था। फिल्म के संगीतकार रोशन थे। उन्होने फिल्म का एक गीत- ‘ए री जाने ना दूँगी...’ राग कामोद पर आधारित स्वरबद्ध किया था। सितारखानी ताल में निबद्ध यह गीत लता मंगेशकर के स्वरों में श्रृंगार रस की सार्थक अनुभूति कराता है। लीजिए, आप यह मोहक गीत सुनिए।


राग कामोद : फिल्म चित्रलेखा : ‘ए री जाने ना दूँगी...’ : लता मंगेशकर 



पाँचवें प्रहर में गाये-बजाए जाने वाले रागों में एक सदाबहार राग है- ‘पूरिया धनाश्री’। यह राग पूर्वी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वरों के इस राग में तीव्र मध्यम, कोमल ऋषभ और कोमल धैवत सहित शेष शुद्ध स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। राग पूरिया धनाश्री में लगने वाले स्वर राग श्री में भी प्रयोग किए जाते हैं, किन्तु इसका चलन भिन्न होता है। आपको राग पूरिया धनाश्री का आकर्षक उदाहरण सुनवाने के लिए आज हमने सरोद वाद्य चुना है। भरपूर गमक से युक्त इस वाद्य पर राग पूरिया धनाश्री में तीनताल की एक मोहक रचना प्रस्तुत कर रहे हैं, विश्वविख्यात सरोद-वादक उस्ताद अमजद अली खाँ। यह रचना उनके पिता और गुरु उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ की है।


राग पूरिया धनाश्री : सरोद पर मध्य लय तीनताल की गत : उस्ताद अमजद अली खाँ



एक अत्यन्त प्रचलित राग है भूपाली, जिसे राग भूप भी कहा जाता है। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हम पाँचवें प्रहर के कुछ रागों पर चर्चा कर रहे हैं। भूपाली इस प्रहर का एक प्रमुख राग है। यह राग कर्नाटक संगीत के राग मोहनम् के समतुल्य है। कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला यह राग औड़व-औड़व जाति का होता है। इसमें मध्यम और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। राग भूपाली का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। यह पूर्वांग प्रधान राग है। राग देशकार में भी इन्हीं स्वरों का प्रयोग होता है, किन्तु उत्तरांग प्रधान होने के कारण यह भूपाली से अलग हो जाता है। आज हम आपको राग भूपाली में सितार वादन सुनवाते हैं। जाने-माने सितारनवाज उस्ताद शाहिद परवेज़ राग भूपाली में सितार पर तीनताल की गत और झाला प्रस्तुत कर रहे हैं। तबला संगति वाराणसी के रामकुमार मिश्र ने की है।


राग भूपाली : सितार पर तीनताल की गत और झाला : उस्ताद शाहिद परवेज़ 



आज के इस अंक में हम पाँचवें प्रहर अर्थात रात्रि के पहले प्रहर के कुछ रागों की चर्चा कर रहे हैं। आजकल संगीत की अधिकतर सभाओं के आयोजन का यही समय होता है। इसी कारण इस प्रहर के राग संगीत-प्रेमियों के बीच अधिक लोकप्रिय हैं। ऐसा ही एक अत्यन्त लोकप्रिय राग है, यमन। प्राचीन संगीत के ग्रन्थों में इस राग का नाम कल्याण कहा गया है। इसका यमन नाम मुगल शासनकाल में प्रचलित हुआ। कर्नाटक संगीत का राग कल्याणी इसके समतुल्य है। इसे कल्याण थाट का आश्रय राग माना गया है। सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति के इस राग में मध्यम स्वर तीव्र और शेष सभी स्वर शुद्ध लगते हैं। इस राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के अवरोह में यदि दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाए तो यह राग यमन कल्याण कहलाता है। यदि आरोह-अवरोह में तीव्र मध्यम के स्थान पर शुद्ध मध्यम का प्रयोग का दिया जाए तो यह राग बिलावल तथा यदि शुद्ध निषाद के स्थान पर कोमल निषाद का प्रयोग कर दिया जाए तो यह राग वाचस्पति की अनुभूति कराने लगता है। आज इस राग में हम आपको एक अत्यन्त आकर्षक तराना सुनवाते हैं, जिस प्रस्तुत कर रही हैं, विदुषी मालिनी राजुरकर। यह तराना द्रुत एकताल में निबद्ध है। आप यह तराना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।


राग यमन : द्रुत एकताल का तराना : विदुषी मालिनी राजुरकर



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 107वीं संगीत पहेली में हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 110वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 109वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 105वें अंक में हमने आपको फिल्म ‘हमदर्द’ से राग गौड़ सारंग पर आधारित एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग गौड़ सारंग और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- तीनताल। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, बैंगलुरु के पंकज मुकेश, जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी और मिनिसोटा, अमेरिका से दिनेश कृष्णजोइस ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों ‘राग और प्रहर’ शीर्षक से लघु श्रृंखला जारी है। श्रृंखला के आगामी अंक में हम आपके लिए दिन के छठें प्रहर अर्थात रात्रि के दूसरे प्रहर में गाये-बजाए जाने वाले कुछ आकर्षक रागों की प्रस्तुतियाँ लेकर उपस्थित होंगे। आप हमारे आगामी अंकों के लिए आठवें प्रहर तक के प्रचलित रागों और इन रागों में निबद्ध अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों को पूरा सम्मान देंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सब संगीत-रसिकों की हम प्रतीक्षा करेंगे। 

कृष्णमोहन मिश्र 


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