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Sunday, August 26, 2012

उस्ताद विलायत खाँ : ८५वें जन्मदिवस पर एक स्वरांजलि


स्वरगोष्ठी – ८५ में आज

जिनके सितार-तंत्र बजते ही नहीं गाते भी थे

‘स्वरगोष्ठी’ के एक नये अंक के साथ, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, दो दिन बाद अर्थात २८अगस्त को भारतीय संगीत-जगत के विश्वविख्यात सितार-वादक उस्ताद विलायत खाँ का ८५वाँ जन्म-दिवस है। इस अवसर पर आज हम इस महान कलासाधक के व्यक्तित्व और कृतित्व का स्मरण करने के साथ उनकी कुछ विशिष्ट रचनाओं का रसास्वादन भी करेंगे।

न्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त सितारनवाज उस्ताद विलायत खाँ का जन्म २८अगस्त, १९२८ को तत्कालीन पूर्वी बंगाल के गौरीपुर नामक स्थान पर एक संगीतकार परिवार में हुआ था। उनके पिता उस्ताद इनायत खाँ अपने समय के न केवल सुरबहार और सितार के विख्यात वादक थे, बल्कि सितार वाद्य को विकसित रूप देने में भी उनका अनूठा योगदान था। उस्ताद विलायत खाँ के अनुसार सितार वाद्य प्राचीन वीणा का ही परिवर्तित रूप है। इनके पितामह (दादा) उस्ताद इमदाद खाँ अपने समय के रुद्रवीणा-वादक थे। उन्हीं के मन में सबसे पहले सितार में तरब के तारों को जोड़ने का विचार आया था, किन्तु इसे पूरा किया, विलायत खाँ के पिता इनायत खाँ ने। उन्होने संगीत-वाद्यों के निर्माता कन्हाई लाल के माध्यम से इस स्वप्न को साकार किया। सितार के ऊपरी हिस्से पर दूसरा तुम्बा लगाने का श्रेय भी इन्हें है।

उस्ताद विलायत खाँ की आरम्भिक संगीत-शिक्षा उनके पिता इनायत खाँ साहब से प्राप्त हुई थी। परन्तु जब वे मात्र १२ वर्ष के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया। बाद में उनके चाचा वाहीद खाँ ने उन्हें सितार-वादन की शिक्षा दी। नाना बन्दे हुसेन खाँ और मामू जिन्दे हुसेन खाँ से उन्हें गायन की शिक्षा प्राप्त हुई। इनकी शिक्षा के प्रभाव से ही आगे चल कर उस्ताद विलायत खाँ ने गायकी अंग में अपने सितार-वादन को विकसित किया। आइए यहाँ थोड़ा रुक कर उनके सितार-वादन का एक उत्कृष्ट उदाहरण सुनते हैं। आपके लिए हमने सबसे पहले उस्ताद विलायत खाँ का बजाया राग शंकरा चुना है। बिलावल थाट, षाडव जाति के इस राग में खाँ साहब द्वारा तीनताल में प्रस्तुत एक मधुर रचना और अन्त में अति द्रुत लय में झाला वादन का रसास्वादन आप भी करें। राग शंकरा की एक अत्यन्त प्रचलित बन्दिश है- ‘अब मोरी आली कैसे धरूँ धीर...’। खाँ साहब का वादन सुनते जाइए और साथ-साथ यह बन्दिश भी गुनगुनाते जाइए।

राग शंकरा : उस्ताद विलायत खाँ



उस्ताद विलायत खाँ के सितार-वादन में तंत्रकारी कौशल के साथ-साथ गायकी अंग की स्पष्ट झलक मिलती है। सितार वाद्य को गायकी अंग से जोड़ कर उन्होने अपनी एक नई वादन शैली का सूत्रपात किया था। वादन करते समय उनके मिज़राब के आघात से ‘दा’ के स्थान पर ‘आ’ की ध्वनि का स्पष्ट आभास होता है। उनका यह प्रयोग, वादन को गायकी अंग से जोड़ देता है। खाँ साहब ने सितार के तारों में भी प्रयोग किए थे। सबसे पहले उन्होने सितार के जोड़ी के तारॉ में से एक तार निकाल कर एक पंचम स्वर का तार जोड़ा। पहले उनके सितार में पाँच तार हुआ करते थे। बाद में एक और तार जोड़ कर संख्या छह कर दी थी। अपने वाद्य और वादन शैली के विकास के लिए वे निरन्तर प्रयोगशील रहे। एक अवसर पर उन्होने स्वीकार भी किया था कि वर्षों के अनुभव के बावजूद अपने हर कार्यक्रम को एक चुनौती के रूप में लेते थे और मंच पर जाने से पहले दुआ माँगते थे कि इस इम्तहान में भी वो अव्वल पास हों। आइए अब आप सुनिए, उस्ताद विलायत खाँ का बजाया, राग गारा। इस रचना में तबला संगति उस्ताद ज़ाकिर हुसेन ने की है।

राग गारा : उस्ताद विलायत खाँ



उस्ताद विलायत खाँ की उम्र तब मात्र बारह वर्ष थी जब उनके वालिद उस्ताद इनायत खाँ का इंतकाल हुआ था। आगे की संगीत-शिक्षा नाना बन्दे हुसेन खाँ और मामू जिन्दे हुसेन खाँ ने उन्हें दी। यह गायकों का घराना था। आरम्भ में विलायत खाँ का झुकाव गायन की ओर ही था, किन्तु उनकी माँ ने उन्हें अपनी खानदानी परम्परा निभाने के लिए प्रेरित किया। गायन की ओर उनके झुकाव के कारण ही आगे चल कर उन्होने अपने वाद्य को गायकी अंग के अनुकूल परिवर्तित करने का सफल प्रयास किया। यही नहीं, अपने मंच-प्रदर्शन के दौरान प्रायः गाने भी लगते थे। १९९३ में लन्दन के रॉयल फेस्टिवल हॉल में आयोजित एक कार्यक्रम में खाँ साहब ने राग हमीर के वादन के दौरान पूरी बन्दिश का गायन भी प्रस्तुत कर दिया था। लीजिए आप भी सुनिए।

राग हमीर : ‘अचानक मोहें पिया आके जगाये...’ : उस्ताद विलायत खाँ राग 



उस्ताद विलायत खाँ ने कुछेक विश्वविख्यात फिल्मों में भी संगीत दिया था। १९५८ में निर्मित सत्यजीत रे की बांग्ला फिल्म ‘जलसाघर’, १९६९ में मर्चेन्ट आइवरी की फिल्म ‘दि गुरु’ और १९७६ में मधुसूदन कुमार द्वारा निर्मित हिन्दी फिल्म ‘कादम्बरी’, उस्ताद विलायत खाँ के संगीत से सुसज्जित था। वे वास्तव में सरल, सहज और सच्चे कलासाधक थे। जन्मदिवस के अवसर पर उनकी स्मृतियों को यह स्वरांजलि अर्पित करते हुए हम सब स्वयं को गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। आइए, ‘स्वरगोष्ठी’ की आज की कड़ी को विराम देने से पहले संगीत-मंच की परम्परा का निर्वहन करते हुए, उस्ताद विलायत खाँ द्वारा प्रस्तुत राग भैरवी की मधुर रचना सुनवाते है। इसे सुन कर आपका मन उन्नीसवीं शताब्दी के महान संगीतज्ञ और रचनाकार कुँवरश्याम की बेहद चर्चित ठुमरी- ‘बाट चलत मोरी चुनरी रंग डारी श्याम...’ गुनगुनाने का अवश्य करेगा।

राग भैरवी : उस्ताद विलायत खाँ



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की आज की संगीत-पहेली में हम पूर्व की भाँति संगीत प्रस्तुति का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछेंगे। ९०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी श्रृंखला के विजेता होंगे।


१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह तराना किस राग में निबद्ध है?

२ - इस गीत की गायिका के स्वर आपने शास्त्रीय मंच के अलावा अनेकानेक बार सुना है। तो देर किस बात की, गायिका का नाम हमें लिख भेजें।
आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ८७वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ८३वें अंक में हमने आपको पण्डित विनायक राव पटवर्धन के स्वर में एक दुर्लभ बन्दिश का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जयन्ती अथवा जयन्त मल्हार और दूसरे का सही उत्तर है- तीनताल। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर एकमात्र प्रतिभागी, जबलपुर की क्षिति तिवारी ने ही दिया है। मीरजापुर (उ.प्र.) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने राग का नाम पहचानने में भूल की, अतः उन्हें एक अंक से ही सन्तोष करना होगा। विजेताओं को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ की विभिन्न कड़ियों को तैयार कराते समय हम आपके सुझावों और फरमाइशों का पूरा ध्यान रखते हैं। तो देर किस बात की, आज ही अपने सुझाव हमें मेल करें। ‘स्वरगोष्ठी’ के कई संगीत-प्रेमी और कलासाधक स्वयं अपना या अपनी पसन्द का आडियो हमें निरन्तर भेज रहे है और हम विभिन्न कड़ियों में हम उनका इस्तेमाल भी कर रहे हैं। यदि आपको कोई संगीत-रचना प्रिय हो और आप उसे सुनना चाहते हों तो आज ही अपनी फरमाइश हमें मेल कर दें। इसके साथ ही यदि आप इनसे सम्बन्धित आडियो ‘स्वरगोष्ठी’ के माध्यम से संगीत-प्रेमियों के बीच साझा करना चाहते हों तो अपना आडियो क्लिप MP3 रूप में भेज दें। हम आपकी फरमाइश को और आपके भेजे आडियो क्लिप को ‘स्वरगोष्ठी’ आगामी किसी अंक में शामिल करने का हर-सम्भव प्रयास करेंगे। आगामी अंक में हम एक ऐसी संगीत-साधिका के बारे में चर्चा करेंगे, जिन्हें आपने शास्त्रीय संगीत के मंच पर शायद न देखा हो, किन्तु वे बेहद लोकप्रिय हैं। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित अपनी इस गोष्ठी में आप हमारे सहभागी बनिए। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, March 18, 2012

चैत्र मास और चैती का रंग

स्वरगोष्ठी – ६२ में आज

‘सेजिया से सइयाँ रूठि गइलें हो रामा.....’

भारतीय संगीत की कई ऐसी लोक-शैलियाँ हैं, जिनका प्रयोग उपशास्त्रीय संगीत में भी किया जाता है। होली पर्व के बाद, आरम्भ होने वाले चैत्र से ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो जाता है। इस परिवेश में पूरे उत्तर भारत में चैती-गायन आरम्भ हो जाता है। गाँव की चौपालों से लेकर मेलों में, मंदिरों में चैती के स्वर गूँजने लगते हैं।

‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करता हूँ। मित्रों, भारतीय संगीत के अक्षय भण्डार में ऋतु-प्रधान गीत-संगीत का महत्त्वपूर्ण स्थान है। बसन्त ऋतु से आरम्भ होकर पावस ऋतु की समाप्ति तक देश के हर क्षेत्र और हर आंचलिक बोलियों में, प्रकृति के हर बदलाव को रेखांकित करते ग्राम्य-गीतों का खजाना है। होलिका-दहन के अगले दिन से ही भारतीय पंचांग का चैत्र मास आरम्भ हो जाता है। प्रकृति में ग्रीष्म का प्रभाव बढ़ने लगता है और खेतों में कृषक का श्रम सार्थक नज़र आने लगता है। ऐसे परिवेश में जनजीवन उल्लास से परिपूर्ण होकर गा उठता है। उत्तर भारत में इस गीत को चैती, चैता या घाटो के नाम से जाना जाता है। चैती गीतों की प्रकृति-प्रेरित धुनें, इनका श्रृंगार रस से ओतप्रोत साहित्य और चाँचर ताल के स्पन्दन में निबद्ध होने के कारण यह लोक-गायकों के साथ-साथ उपशास्त्रीय गायक-वादकों के बीच भी समान रूप लोकप्रिय है। आइए, सबसे पहले आपको सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पण्डित छन्नूलाल मिश्र के स्वरों में एक परम्परागत चैती सुनवाते है, जिसमें आपको संगीत की दोनों शैलियों का परिचय मिलेगा। पण्डित जी ने चैती गायन के साथ-साथ इन गीतों की विशेषताओं पर चर्चा भी की है।

चैती : ‘सेजिया से सइयाँ रूठि गइलें हो रामा...’ : स्वर – पण्डित छन्नूलाल मिश्र

चैती गीतों का मूल स्रोत तो लोक संगीत ही है, किन्तु स्वर, लय और ताल की कुछ विशेषताओं के कारण उपशास्त्रीय संगीत में भी बेहद लोकप्रिय है। इन गीतों के वर्ण्य-विषय में श्रृंगार रस के संयोग और वियोग, दोनों पक्ष प्रमुख होते हैं। अनेक चैती गीतों में भक्ति-रस की प्रधानता भी होती है। चैत्र मास की नौमी तिथि को राम-जन्म का पर्व मनाया जाता है। इसके साथ ही बासन्ती नवरात्र के पहले दिन भारतीय पंचांग के नए वर्ष का आरम्भ भी होता है। इसलिए चैती गीतों में राम-जन्म, राम की बाल लीला, शक्ति-स्वरूपा देवी दुर्गा तथा नए संवत के आरम्भ का उल्लास भी होता है। इन गीतों को जब महिला या पुरुष एकल रूप में गाते हैं तो इसे 'चैती' कहा जाता है, परन्तु जब समूह या दल बना कर गाया जाता है तो इसे 'चैता' कहा जाता है। इस गायकी का एक और प्रकार है जिसे 'घाटो' कहते हैं। 'घाटो' की धुन 'चैती' से थोड़ी भिन्न हो जाती है। इसकी उठान बहुत ऊँची होती है और केवल पुरुष वर्ग ही इसे समूह में गाते हैं। आइए, अब हम आपको सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपांडे की शिष्या धनाश्री घैसस के स्वरों में बनारसी अंदाज़ की एक मोहक चैती सुनवाते हैं।

चैती : ‘नैहर से केहु नाहीं अइले हो रामा...’ : स्वर - धनाश्री घैसस



चैती गीतों की प्रचलित धुनों का जब सांगीतिक विश्लेषण किया जाता है तो हमे स्पष्ट अनुभव होता है कि प्राचीन चैती-धुन के स्वरों और राग बिलावल के स्वरों में पर्याप्त समानता है। आजकल गायी जाने वाली चैती में तीव्र मध्यम के प्रयोग की अधिकता के कारण यह राग यमनी बिलावल की अनुभूति कराता है। उपशास्त्रीय स्वरूप में चैती-गायन प्रायः राग तिलक कामोद के स्वरों में भी किया जाता है। परम्परागत लोक-संगीत के रूप में चैती गीतों का गायन चाँचर ताल में होता है, जबकि पूरब अंग की अधिकतर ठुमरियाँ १४ मात्रा के दीपचंदी ताल में निबद्ध होती हैं। दोनों तालों की मात्राओं में समानता के कारण भी चैती गीत लोक और उपशास्त्रीय, दोनों स्वरूपों में लोकप्रिय है। आइए, अब वाद्य-संगीत के माध्यम से चैती का आनन्द प्राप्त किया जाए। हम आपको वाद्य संगीत के दो दिग्गज कलासाधकों- उस्ताद विलायत खाँ और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ द्वारा सितार और शहनाई पर की गई जुगलबंदी सुनवाते है। कहरवा ताल के लोच के साथ सितार और शहनाई पर बजाई गई इस मोहक चैती का आप आनन्द लीजिए और मुझे आज यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए। अगले अंक में भी हम चैती गीतों पर चर्चा जारी रखेंगे।

चैती धुन : सितार-शहनाई जुगलबंदी : उस्ताद विलायत खाँ और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ


आज की पहेली

आज की ‘संगीत-पहेली’ में हम आपको सुनवा रहे हैं, लगभग आधी शताब्दी पहले की एक हिन्दी फिल्म ‘गोदान’ से लिये गए गीत का अंश, जिसकी संगीत-रचना एक विश्वविख्यात संगीतज्ञ ने की थी। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ७०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक-श्रोता हमारी दूसरी श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।



१ – किस संगीतकार ने इस गीत की धुन बनाई है? संगीतकार का नाम बताइए।

२ – यह गीत किस राग पर आधारित है? राग का नाम बताइए।


आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ६४वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा admin@radioplaybackindia.com पर भी अपना सन्देश भेज सकते हैं।

आपकी बात

‘स्वरगोष्ठी’ के ६०वें अंक में हमने आपको ठुमरी अंग में एक फिल्मी गीत का अंश सुनवाया था और आपसे गीत की गायिका का नाम तथा राग का नाम पूछा था, जिस पर यह गीत आधारित है। दोनों प्रश्नों के क्रमशः सही उत्तर हैं- गायिका आरती अंकलीकर और राग पीलू। दोनों पश्नों का सही उत्तर देने वाले पाठक हैं- बैंगलुरु के पंकज मुकेश और इन्दौर की क्षिति तिवारी। इन पाठकों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से बधाई। संगीत-प्रेमी राधाकिशन, लेखक और संगीत समीक्षक मुकेश गर्ग और नृत्यांगना स्वाति वांग्नू तिवारी ने इस अंक की सराहना की है। इनके साथ-साथ फेसबुक के उन सभी पाठकों/श्रोताओं का भी हम आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होने ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक को पसन्द किया।

‘संगीत-पहेली’ की प्रथम श्रृंखला के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ५१वें से लेकर ६०वें अंक तक की पहेली में सर्वाधिक ११ अंक अर्जित कर इन्दौर की क्षिति तिवारी प्रथम श्रृंखला की विजेता बन गईं हैं। ५ अंक पाकर बैंगलुरु के पंकज मुकेश ने दूसरा और ४-४ अंक लेकर पटना की अर्चना टण्डन व मीरजापुर, उत्तरप्रदेश के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने संयुक्त रूप से तीसरा स्थान प्राप्त किया है। सभी विजेताओं को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।
झरोखा अगले अंक का

‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में हमने चैती गीतों के उपशास्त्रीय स्वरूप को प्रदर्शित करने का प्रयास किया है। अगले अंक में हम चैती गीतों के कुछ और उदाहरण प्रस्तुत करेंगे। साथ ही चैती गीतों के साहित्य पर भी हम आपसे चर्चा करेंगे। पूर्व की भाँति रविवार की सुबह ९-३० बजे हम आपसे यहीं मिलेंगे। तब तक के लिए हमें विराम लेने की अनुमति दीजिए।

कृष्णमोहन मिश्र

Sunday, November 14, 2010

अम्बर की एक पाक सुराही....अमृता प्रीतम की कलम का जादू और आशा के स्वरों की खुशबू

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 526/2010/226

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! आज रविवार की शाम, यानी कि 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई सप्ताह का शुभारंभ। पिछले हफ़्ते हमने शुरु की थी लघु शृंखला 'दिल की कलम से', जिसके तहत हिंदी साहित्यकारों द्वारा लिखे फ़िल्मी गीत हम आपको सुनवा रहे हैं। अब तक हमने इस शृंखला में जिन साहित्यकारों को शामिल किया है, वो हैं पंडित नरेन्द्र शर्मा, वीरेन्द्र मिश्र, गोपालसिंह नेपाली, बालकवि बैरागी, और गोपालदास नीरज। आज हम जिस साहित्यकार की बात करने जा रहे हैं, वो हैं मशहूर लेखिका व कवयित्री अमृता प्रीतम। मानव मन की जो अभिव्यक्ति होती है, उन्हें वर्णन करना बड़ा मुश्किल होता है। लेकिन अमृता प्रीतम द्वारा लिखे साहित्य को अगर हम ध्यान से पढ़ें तो पायेंगे कि किस सहजता से उन्होंने बड़ी से बड़ी बात कह डाली है, जिन्हें हम केवल महसूस ही कर सकते हैं। उनकी लेखनी तो जैसे फूल पर ठहरी हुई ओस की बूंदें हैं। ३१ अगस्त १९१९ को जन्मीं अमृता प्रीतम पंजाब की पहली मशहूर कवयित्री और लेखिका हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित होने वाली वो पहली महिला हैं और राष्ट्रपति से पद्मश्री प्राप्त करने वालीं प्रथम पंजाबी लेखिका। युं तो उन्होंने पंजाबी में ही अधिकतर लिखा है, पर हिंदी साहित्य में भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई हैं। १९३५ में अमृता कौर ने प्रीतम सिंह से विवाह किया, जो लाहोर के विख्यात अनारकली बाज़ार के एक नामी व्यापारी थे। १९६० में अमृता प्रीतम अपने पति को छोड़ कर साहिर लुधियानवी के पास चली गईं। उनकी साहिर के साथ इस प्रेम कहानी को उन्होंने अपनी आत्मकथा 'रसीदी टिकट' में व्यक्त की हैं। जब साहिर साहब की ज़िंदगी में एक दूसरी औरत ने प्रवेश कर लिया, तब अमृता साहिर को छोड़ नामचीन आर्टिस्ट और लेखक इमरोज़ के पास चली गईं। अपनी ज़िंदगी के आख़िरी ४० साल वो इमरोज़ के साथ गुज़ारीं, जिन्होंने अमृता के ज़्यादातर किताबों के कवर डिज़ाइन किए। अमृता प्रीतम और इमरोज़ का युगल-जीवन एक किताब का विषय भी बना, अमृता इमरोज़: ए लव स्टोरी। अमृता प्रीतम ३१ अक्तुबर २००५ को एक लम्बी बीमारी के बाद इस दुनिया से चल बसीं।

हिंदी फ़िल्म 'कादम्बरी' में अमृता प्रीतम ने एक गीत लिखा था, "अम्बर की एक पाक सुराही, बादल का एक जाम उठाकर"। कहते हैं सौ सुन्हार की, और एक लुहार की, यही बात हम अमृता प्रीतम के लिए भी कह सकते हैं। बस उनका लिखा यह एक गीत दूसरे गीतकारों के लिखे कई कई गीतों पर साफ़ साफ़ भारी पड़ता है। आज हम इसी ख़ूबसूरत गीत को सुनेंगे, और बार बार सुनेंगे। 'कादम्बरी' १९७६ की एक समानांतर फ़िल्म थी जिसका निर्माण किया था मधुसुदन कुमार ने और निर्देशक थे एच. के. वर्मा। फ़िल्म में शबाना आज़्मी, विजय अरोड़ा, चांद उस्मानी, जीत उपेन्द्र, अपर्णा चौधरी प्रमुख ने अभिनय किया था। फ़िल्म में संगीत दिया था शास्त्रीय संगीत की मशहूर हस्ती उस्ताद विलायत ख़ान ने। इस फ़िल्म में आशा भोसले के अलावा अजीत सिंह ने भी गीत गाए हैं। 'कादम्बरी' तो व्यावसायिक दृष्टि से चली नहीं, लेकिन आज इस गीत की वजह से इस फ़िल्म का नाम लोगों के ज़हन में बाक़ी है। दोस्तों, जो गीत मुझे बेहद बेहद पसंद होते हैं, उनके बोलों को टंकित करने में मुझे अलग ही आनंद आता है। ऐसा करते हुए मुझे ऐसा लगता है कि जैसे मैं उस गीत को एक अलग ही अंदाज़ में जी रहा हूँ। लीजिए इस गीत के बोल ये लिख रहा हूँ -

अम्बर की एक पाक़ सुराही,
बादल का एक जाम उठाकर,
घूंट चांदनी पी है हमने,
बात कुफ़्र की की है हमने।

कैसे इसका कर्ज़ चुकाएँ,
माँग के अपनी मौत के हाथों,
उमर की सूली सी है हमने,
बात कुफ़्र की की है हमने।

अपना इसमें कुछ भी नहीं है,
दो दिल जलते उसकी अमानत,
उसको वही तो दी है हमने,
बात कुफ़्र की की है हमने।

आशा भोसले ने क्या ख़ूब गाया है इस गीत को। इस आलेख को लिखते हुए जब मैं यह गीत सुन रहा हूँ तो आलेख के ख़त्म होने तक ध्यान आया कि इस गीत को मैं पिछले २० मिनट में ६ बार सुन चुका हूँ, फिर भी दिल नही भर रहा। आख़िर क्या ख़ास बात है इस गीत में? मुझे तो समझ नहीं आया। अगर आप बता सकें तो बताइएगा ज़रूर...



क्या आप जानते हैं...
कि उस्ताद विलायत ख़ान ने १९५१ की फ़िल्म 'मदहोश' का बैकग्राउण्ड म्युज़िक तैयार किया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०७ /शृंखला ०३
ये है गीत का आरंभिक शेर-


अतिरिक्त सूत्र - रफ़ी साहब की आवाज़ है गीत में

सवाल १ - गीतकार कवि कौन है यहाँ - २ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्यामकान्त जी, अमित जी और बिट्टू जी आप तीनों को बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, May 12, 2010

जो खुद को आज़ाद कहे, वो सबसे बड़ा झूठा है... अनीला की आवाज़ में सुनिए क़तील साहब का बेबाकपन

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८३

स महफ़िल में बस गज़ल की बातें होनी चाहिए, हम यह बात मानते हैं, लेकिन आज हालात कुछ ऐसे हैं कि हमसे रहा नहीं जा रहा। भारतीय क्रिकेट टीम ट्वेंटी-ट्वेंटी के विश्व कप से बाहर हो गई... बाहर होना तो एक बात है, यहाँ तो इस टीम ने पूरी तरह से घुटने टेक दिए। तीनों के तीनों मैच रेत की तरह मुट्ठी से गंवा दिए। सीरिज से पहले तो हज़ार तरह के वादे किए गए थे लेकिन आखिरकार हुआ क्या.. पिछली साल की तरह हीं बेरंग लौट आई यह टीम। एक ऐसे देश में जहाँ क्रिकेट को धर्म माना जाता है, वहाँ धर्म की इस तरह क्षति हो तो एक आस्तिक क्या करे.... उसके दिल को ठेस तो लगेगी हीं। लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं। कुछ दिनों तक इस हार को याद रखेंगे फिर उसी जोश उसी खरोश के साथ भारतीय टीम के अगले मैच को देखने के लिए तैयार हो जाएँगे। हम हैं हीं ऐसे... लेकिन इन्हीं कुछ दिनों के दरम्यान जितने भी पल, जितने भी घंटे हैं, हमारे लिए वो तो ग़मगीन हीं गुजरेंगे ना। और फिर इसी दौरान आपको अगर ग़ज़ल की महफ़िल सजानी हो तो माशा-अल्लाह.... आपका तो भगवान हीं मालिक है। हमारी आज की मन:स्थिति सौ फ़ीसदी ऐसी हीं है। समझ नहीं आ रहा कि हार का ग़म व्यक्त करें या फिर आज की गज़ल में छुपे भाव। कहाँ से शुरू करें.... इसका कुछ अता-पता हीं नहीं है। लेकिन बात यह है कि हमारी महफ़िल हमारे जीवन का एक अंग है, इसलिए इसे नज़र-अंदाज़ करने का तो सवाल हीं नहीं उठता। यानि कि महफ़िल सजेगी ज़रूर.. भले हीं आज जोश कुछ कम हो, लेकिन जज्बा कम न होगा। तो चलिए हम इस महफ़िल की विधिवत शुरुआत करते हैं।

आज की महफ़िल जिस नज़्म, जिस नगमा के नाम है, उसे हमने "बियोन्ड लव" एलबम से लिया है। इस एलबम की सारी नज़्मों और गज़लों में संगीत सतीश शर्मा का है। उस्ताद बिलायत खान के सुपुत्र सुप्रसिद्ध सितार-वादक सुजात खान ने इस एलबम में अपनी आवाज़ और सितार का कमाल दिखाया है। इतना होने के बावजूद कुछ ऐसा है, जो इस एलबम को दूसरे एलबमों से अलग करता है। किसी भी कविता-प्रेमी के लिए अजीब और अनूठी बात होती है - एक कवि/कवयित्री की आवाज़ में दूसरे किसी शायर की नज़्मों की रिकार्डिंग। जी हाँ, इस एलबम में ऐसी कई सारी नज़्में हैं, जिसे अमेरिका में रहने वाली पाकिस्तानी लेखिका और कवयित्री अनीला अरशद ने अपनी आवाज़ दी है। आज की नज़्म उन्हीं कई सारी नज़्मों में से एक है। इस नज़्म की बात करने से पहले हम आपको इस एलबम की सारी गज़लों/नज़्मों का ब्योरा देना चाहेंगे।

१) कोई पूछे है - सुजात खान
२) प्यार के काफ़िले - सुजात खान
३) ये तारों भरी रात - सुजात खान, अनीला अरशद
४) पिंजरा कब टूटा है - अनीला अरशद
५) मेरे मचले हुए ख्वाबों का महकता है चमन - सुजात खान
६) ऐ मेरे प्यार की खुशबू - अनीला अरशद
७) जवानी के नगमे - सुजात खान, अनीला अरशद

"एक कवयित्री की आवाज़ में किसी दूसरे शायर की नज़्मे" - यह कहने पर आप समझ हीं गए होंगे कि ये सारी गज़लें/नज़्में अनीला की नहीं हैं.. तो फिर कौन है इस रचनाओं का रचयिता। हमने अब तक इस शायर की लिखी तीन-चार गज़लें महफ़िल में पेश की हैं। ये गज़लें कौन-कौन-सी हैं, यह पता करना आपका काम है। इस बहाने आपका रिवीजन भी हो जाएगा। अहा! कहाँ चले? ढूँढने? अरे भाई.... पहले उस शायर का नाम तो जान लीजिए.. क्या कहा? जानते हैं। सही है.. आप तो हमसे भी आगे निकले। हम्म्म..... इतना खुश मत होईये.. हम जानते हैं कि आपको उस शायर का नाम कहाँ से मालूम हुआ है। हमने हीं तो उनका नाम इस आलेख के शीर्षक में डाला है.. जी हाँ, हम "क़तील शिफ़ाई" की हीं बात कर रहे हैं। "बियोन्ड लव" में सारी की सारी गज़लें/नज़्में इन्हीं की लिखी हुई हैं। अब चूँकि क़तील साहब के बारे में ढेर सारी बातें पहले हीं हो चुकी हैं, इसलिए उन्हें दुहराने से कोई फ़ायदा नहीं। लेकिन हाँ, हम उनका लिखा यह शेर तो देख हीं सकते हैं:

मैनें पूछा पहला पत्थर मुझ पर कौन उठायेगा
आई इक आवाज़ कि तू जिसका मोहसिन कहलायेगा


क़तील साहब की बातें न होंगी, यह माना, लेकिन अनीला? ये कौन हैं..कहाँ से हैं.... क्या करती हैं....यह तो जाना हीं जा सकता है। आगे की पंक्तियों में हम अनीला के बारे में विस्तार से चर्चा करने जा रहे हैं। हमने इन पंक्तियों का अनुवाद हिन्दी में करने की कोशिश की, लेकिन हमें ऐसे ढेर सारे शब्द मिलें जिनका हिन्दी में भाषांतरण आसान न था। इसलिए अंतत: हमने यह निर्णय लिया कि क्यों न इसे अंग्रेजी में हीं आपके सामने रख दिया जाए। वैसे भी एक वाक्य अपनी मूल भाषा में हीं ज्यादा सटीक होता है।

Aneela Arshad is a Certified Hypnotherapist, Reiki Master, Teacher and Healer. She owns and operates a Holistic Medical facility in New York where she has, by the grace of God, successfully healed many people suffering from stress, depression, sleep disorders and other related emotional illnesses. She is also an Author, Poet, Playwright and a Screenplay Writer aspiring to spread peace through her writings. Currently, the president of The Arch, a New York based Non-Profit, Cultural Organization; she hopes to reach out to the world through Art and Theatre, thereby bridging the gaps of diversity.

Her first book, The Bounty of Allah was published in 1999 by the Crossroads publishing company. She has written three screenplays, two of which, Where Spirits Soar and The Right and the Wrong, were bought by Nivelli International films. Nightmare at Uch Sharif is in the pre-production phase. She has also produced two plays, Mogul E Azam The Great Mogul and Amir Khusro in 2001 and 2003. She was nominated by the Sub-Continent Peace foundation to receive a proclamation and a Key to the City of Jersey City for her literary endeavors and the passion to address the crimes against women, particularly Muslim women.

THE SILENT LAMEN, her latest work, an anthology of which many poems have been published in various magazines, is a collection of poems based on the true stories of women whose voices have been stifled in a world where being a woman is a curse unto itself. This anthology lays bare the warped reality of women trapped beneath the rubble of a crumbling civilization. It voices the misery of tormented spirits crying out for help.

हमने "बियोन्ड लव" के बारे में जान लिया, अनीला की बातें हो गईं... इस दौरान सुजात खान भी चर्चा का विषय बने.... और तो और हमने क़तील साहब की कातिलाना शायरी भी याद कर ली..... तो फिर आज की नज़्म सुनने-सुनाने में देर करने का कोई कारण नहीं बनता। तो लीजिए पेश-ए-खिदमत है अनीला की झनकार भरी आवाज़ में वह नज़्म, जो क़तील साहब की बेबाकी का बेजोर उदाहरण है:

पिंजरा कब टूटा है,
कैदी कब छूटा है,
जो खुद को आज़ाद कहे,
वो सबसे बड़ा झूठा है।

जहन किसी का उलझा हुआ है,
माज़ी की ज़ंज़ीरों में,
घिरा हुआ है कोई हाल के
रंगारंग जजीरों में,
किसी को मुस्तकबिल के कुछ
सैयादों ने लूटा है।

इन्सानों की मजबूरी
हालात से जब टकराती है,
बहुत बड़ा एक कैदखाना
ये दुनिया बन जाती है,
इस दुनिया के बाग में
शूली जैसा हर ___ है।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "उफ़क/उफ़ुक" और शेर कुछ यूँ था-

दूर् उफ़क पर् चमकती हुई क़तरा क़तरा
गिर रही है तेरी दिलदार नज़र की शबनम

इस शब्द के साथ सबसे पहले महफ़िल में हाज़िर हुए "शरद जी"। यह रहा आपका स्वरचित शेर:

उफ़क का ज़िक्र ज़माने में जब भी होता है
ज़मीं को देख देख आसमान रोता है ।

शरद जी के बाद महफ़िल की शोभा बनीं शन्नो जी। आपने यह शेर पेश किया:

उफ़ुक के पार एक और जहाँ होता है
जहाँ न कोई जमी न आसमां होता है. (यह शेर शरद जी से थोड़ा-थोड़ा प्रेरित-सा लग रहा है.. है ना? :) )

मंजु जी, उफ़ुक पर जमीं और आसमान के मिलने के सच को आपने इस शेर में बखूबी दर्शाया है:

जमाना वरदान कहे या शाप ,
उफ़ुक-सा हम दोनों का साथ .

नीरज जी, महफ़िल में आने, महफ़िल को पसंद करने और हमें एक गलती से अवगत कराने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। उम्मीद करता हूँ कि आप आगे भी इसी तरह हमारा साथ देते रहेंगे। हाँ, गुमशुदा शब्द पर शेर कहना मत भूलिएगा। :)

सीमा जी, शायद आपको ध्यान में रखकर हीं किसी गीतकार ने यह कहा था -"देर से आई, दूर से आई... वादा तो निभाया।" वादा निभाने का शुक्रिया। ये रहे आपके शेर:

उड़ते-उड़ते आस का पंछी दूर उफ़क़ में डूब गया
रोते-रोते बैठ गई आवाज़ किसी सौदाई की (क़तील शिफ़ाई)

हद-ए-उफ़क़ पे शाम थी ख़ेमे में मुंतज़र
आँसू का इक पहाड़-सा हाइल नज़र में था (वज़ीर आग़ा)

अवनींद्र जी, महफ़िल से कितना भी दूर जाईये, महफ़िल आपको खींच हीं लाएगी :) और आने पर यह शेर..कमाल है!!

तराश ले अपनी रूह को उफक की मानिंद
अँधेरा जहाँ है सवेरा भी वहीँ है !!

अवध जी, गुलज़ार साहब की यह नज़्म याद दिलाने के लिए आपका तह-ए-दिल से आभार। कुछ पंक्तियाँ पेश-ए-खिदमत हैं:

मौत तू एक कविता है.
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको.
ज़र्द सा चेहरा लिए जब चाँद उफक तक पहुंचे.
दिन अभी पानी में हो और रात किनारे के करीब.

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Thursday, January 15, 2009

जब मुझे विचित्र वीणा वादन हेतु मिला आदरणीय स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी का आशीर्वाद

(पहले अंक से आगे...)

शाम के यही कोई आठ बजे का समय था, बनारस में गंगा मैया झूम झूम कर बह रही थी और कई युवा संगीत कलाकारों को शब्द, स्वर और लय की सरिता में खो जाने के लिए प्रोत्साहित कर रही थी, नगर के एक सभागार में 'आकाशवाणी संगीत प्रतियोगिता' के विजेताओ का संगीत प्रदर्शन हो रहा था, मैं मंच पर विचित्र वीणा लेकर बैठी, श्रोताओं की पहली पंक्ति में ही श्रद्धेय स्वर्गीय किशन महाराज जी को देखा और दोनों हाथ जोड़ कर उन्हें नमस्कार किया, तत्पश्चात वीणा वादन शुरू किया, जैसे ही वादन समाप्त समाप्त हुआ, आदरणीय स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी मंच पर आए, अपना हाथ मेरे सर पर रखा और कहा "अच्छा बजा रही हो, खूब बजाओ "। उनका यह आशीर्वाद और फ़िर उनके हाथ से स्वर्ण पदक पाकर मेरी संगीत साधना सफल हो गई, जीवन का वह क्षण मेरे लिए अविस्मर्णीय हैं ।

कई बार कई संगीत समारोह में उनका तबला सुनने का अवसर भी मुझे प्राप्त हुआ, उनका तबला चतुर्मिखी था, तबले की सारी बातें उसमे शामिल थी, लव और स्याही का वे सूझबूझ से प्रयोग करते थे, उनके उठान, कायदे रेलों और परनो की विशिष्ट पहचान थी । उन्होंने तबले में गणित के महत्व को समझाया, वे किसी भी मात्रा से तिहाई शुरू कर सम पर खत्म् करते थे, जो की अत्यन्त ही कठिन हैं । प्रचलित तालो के अतिरिक्त वे अष्ट मंगल, जैत जय, पंचम सवारी, लक्ष्मी और गणेश तालों का वादन भी बहुत सुगमता और सुंदरता से करते थे. तबले के कई घरानों की रचनाओ का उनके पास समृद्ध भण्डार था ।

आदरणीय पंडित रवि शंकर, उस्ताद बड़े गुलाम अली खान साहब, पंडित भीमसेन जोशी जी के साथ ही, आदरणीय शम्भू महाराज, सितारा देवी आदि के साथ उन्होंने संगत की । देश विदेश की कई संगीत सभाओ में तबला वादन की प्रस्तुति देकर तबले का प्रेम श्रोताओ के ह्रदय में अचल स्थापित किया ।

लय भास्कर, संगती सम्राट, काशी स्वर गंगा सम्मान, संगीत नाटक अकादमी सम्मान, ताल चिंतामणि, लय चक्रवती, उस्ताद हाफिज़ अली खान व अन्य कई सम्मानों के साथ पद्मश्री व पद्मभूषण अलंकरण से उन्हें नवाजा गया ।

वे ३ सितम्बर १९२३ की आधी रात को ही इस धरती पर आए थे और चार मई २००८ की आधी रात को ही वे इस धरती को छोड़, स्वर्ग की सभा में देवों के साथ संगत करने हमेशा के लिए चले गए। उनके जाने से हमने एक युगजयी संगीत दिग्गज को खो दिया, पर उनका आशीर्वाद हम सभी के साथ हमेशा हैं, इस बात से थोड़ा धैर्य मिलता हैं । आदरणीय स्वर्गीय किशन महाराज जी को मेरी भावपूर्ण श्रद्धांजलि -

देखिये उस्ताद विलायत खान के साथ राग दरबारी में संगत करते पंडित किशन महाराज जी को -



कविता छिब्बर द्वारा प्रस्तुत पंडित जी को दी गई ये श्रद्धाजंली भी तीन खंडों में है...देखें यहाँ, यहाँ और यहाँ.

प्रस्तुति - वीणा साधिका,
राधिका
(राधिका बुधकर)

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