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Saturday, September 17, 2016

"तुम जो आओ तो प्यार आ जाए...", कैसा कम्युनिकेशन गैप हुआ था गीतकार योगेश और संगीतकार रॉबिन बनर्जी के बीच?



एक गीत सौ कहानियाँ - 92
'तुम जो आओ तो प्यार आ जाए ...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 92-वीं कड़ी में आज जानिए 1962 की फ़िल्म ’सखी रॉबिन’ के मशहूर गीत "तुम जो आओ तो प्यार आ जाए..." के बारे में जिसे मन्ना डे और सुमन कल्याणपुर ने गाया था। बोल योगेश के और संगीत रॉबिन बनर्जी का। 

गीतकार योगेश
खनऊ के रहने वाले योगेश गौड़, यानी कि गीतकार योगेश पिता की मृत्यु के बाद भाग्य आजमाने और काम की तलाश में चले आए बम्बई। प्रसिद्ध लेखक बृजेन्द्र गौड़ उनके रिश्तेदार थे, इस वजह से उनसे जाकर मिले। लेकिन बृजेन्द्र गौड़ से योगेश को कोई मदद नहीं मिली। अलबत्ता गौड़ साहब के असिस्टैण्ट ने ज़रूर लेखन की बारीकियाँ सीखने में उनकी मदद की। चीज़ें समझ आईं तो योगेश भी लिखने की कोशिशें करने लगे। उन्हें एक-आध फ़िल्मों में गाना लिखने का मौक़ा मिला। लेकिन ये वो फ़िल्में थीं जो कभी पूरी तरह से बन ही नहीं पाई। फिर एक दिन योगेश की मुलाक़ात हुई संगीतकार रॉबिन बनर्जी से। रॉबिन बनर्जी ने योगेश की रचनाएँ सुनी, बहुत प्रभावित हुए, और उन्होंने योगेश को रोज़ाना सुबह उनके घर रियाज़ करने के वक़्त आने को कहा। अब योगेश रोज़ाना रॉबिन बनर्जी के घर पहुँच जाते। बैठकें होती, और इन बैठकों में योगेश रॉबिन बनर्जी की धुनें सुनते और रॉबिन बनर्जी योगेश की कविताएँ और गीत सुनते। लेकिन यह सिलसिला कई दिनों तक चलने के बावजूद कुछ बात बन नहीं पा रही थी और बेचैनी थी कि बढ़ती ही जा रही थी। बेचैनी इसलिए कि अभी तक रॉबिन बनर्जी ने योगेश की उन रचनाओँ पर एक भी धुन नहीं बनाई थी जिन रचनाओं से रॉबिन बनर्जी प्रभावित हो गए थे। आख़िर एक रोज़ योगेश ने रॉबिन बनर्जी से पूछ ही डाला, "दादा, आप मेरे गीतों पर धुन कब बनाएँगे?" रॉबिन बनर्जी चौंक गए। उल्टा उन्होंने योगेश से ही सवाल दाग डाला, "अरे इतने दिनों से तुम यहाँ आ रहे हो, मैं रोज़ नई नई धुनें सुना रहा हूँ, और तुमने आज तक एक भी धुन पर गीत नहीं लिखा?" तब जाकर योगेश को समझ आई कि अमूमन फ़िल्म जगत में धुन पहले बनाई जाती है और उस धुन पर गीत या शब्द बाद में लिखे जाते हैं। दरसल रॉबिन बनर्जी ने योगेश को बुलाया ही इसलिए था कि वो कम्पोज़िशन सुनें और उसके हिसाब से बोल लिखे, गीत लिखे। और योगेश इस उम्मीद में बैठे रहे कि आज नहीं तो कल जो मैंने पहले से ही लिख रखा है, उसकी वो धुन बनाएँगे। यह था कम्युनिकेशन गैप। बहरहाल इसके बाद यह गैप गैप नहीं रहा, दोनों की ग़लतफ़हमी दूर हुई और रॉबिन बनर्जी द्वारा स्वरबद्ध फ़िल्म ’सखी रॉबिन’ से योगेश का करीअर शुरु हुआ।



रॉबिन बनर्जी का शुमार कमचर्चित संगीतकारों में होता है। 50 के दशक के अन्त से लेकर 70 के दशक के मध्य तक वो सक्रीय थे फ़िल्म जगत में। लेकिन अधिकतर स्टण्ट फ़िल्मों में संगीत देने का ही उन्हें मौक़े मिले, जिस वजह से वो कभी भी पहली श्रेणी के संगीतकारों में शामिल नहीं हो सके। संगीत देने के साथ साथ वो एक अच्छे गायक भी रहे। उनके संगीत से सजी उल्लेखनीय रचनाएँ हैं "तुम जो आओ तो प्यार आ जाए" (’सखी रॉबिन’, 1962), "देश का प्यारा सबका दुलारा" (’मासूम’, 1960, "दग़ाबाज़ क्यों तूने" (’वज़िर-ए-आज़म’, 1961), "आँखों आँखों में" ('Marvel Man', 1964) आदि। गायक के रूप में उनके कुछ परिचित गानें हैं "इधर तो आ" (’Tarzan And Kingkong' 1965), "ये नशा क्या हुआ है" (’फिर आया तूफ़ान’, 1973) और दो गीत 1964 की फ़िल्म ’हुकुम का इक्का’ के - "चोरी चोरी गली मोरी" और "किया है हुस्न को बदनाम"। उनके करीअर का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत वही है जो योगेश का लिखा पहला गीत है, यानी कि फ़िल्म ’सखी रॉबिन’ का "तुम जो आओ तो प्यार आ जाए, ज़िन्दगी में बहार आ जाए"। इसे मन्ना डे और सुमन कल्याणपुर ने गाया था। 60 के दशक में कम बजट की फ़िल्मों के निर्माताओं और संगीतकारों के लिए लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ें पाना ख़्वाब समान हुआ करता था। मन्ना डे की भी यह नाराज़गी रही कि बड़ी बजट की फ़िल्मों में उन्हें केवल शास्त्रीय राग आधारित गीत गाने के लिए ही बुलवाए जाते या फिर किसी बूढ़े किरदार पर फ़िल्माये जाने वाले गीत के लिए। लेकिन उन्हें कम बजट की फ़िल्मों में नायक पर फ़िल्माए जाने वाले बहुत से गीत मिले और यह गीत उन्हीं में से एक है। 

उधर गायिकाओं में सुमन कल्याणपुर को ’ग़रीबों की लता’ कहा जाता था। यह उल्लेखनीय तथ्य है कि रॉबिन
मन्ना डे और सुमन कल्याणपुर
बनर्जी ने अपने करीअर में कभी भी लता से कोई गीत नहीं गवाया (या यह भी संभव है कि उन्हें मौक़ा नहीं मिला)। उनकी 95% गीत सुमन कल्याणपुर ने गाए। प्रस्तुत गीत मन्ना डे के दिल के बहुत करीब था, तभी तो विविध भारती के ’विशेष जयमाला’ कार्यक्रम में उन्होंने इसे चुना और गीत पेश करते हुए कहा - "अब एक ऐसे म्युज़िक डिरेक्टर मुझे याद आ रहे हैं जिन्होंने बहुत धिक फ़िल्मों में म्युज़िक तो नहीं दिया, लेकिन जो भी काम किया अच्छे ढंग से किया। इस म्युज़िक डिरेक्टर का नाम है रॉबिन बनर्जी। मैंने एक युगल गीत रॉबिन के निर्देशन में गाया था फ़िल्म ’सखी रॉबिन’ के लिए। बहुत मधुर है यह गीत जिसे मेरे साथ सुमन कल्याणपुर जी ने गाया है। सुमन जी का भी जवाब नहीं है, बड़ी अच्छी गायिका हैं, बहुत समझ कर गाती हैं। इतनी अच्छी गायिका की आवाज़ में आजकल नए फ़िल्मों के गाने सुनाई नहीं देते।" मन्ना डे ने सुमन कल्याणपुर के साथ बहुत से युगल गीत गाए हैं। इसी साल अर्थात् 1962 में दत्ताराम के संगीत में इस जोड़ी ने गाया फ़िल्म ’नीली आँखें’ का गीत "ये नशीली हवा, छा रहा है नशा"। दत्ताराम के लिए पहली बार 1960 में मन्ना दा और सुमन जी ने फ़िल्म ’श्रीमान सत्यवादी’ में "भीगी हवाओं में, तेरी अदाओं में" गाया था। वैसे मन्ना-सुमन का गाया पहला डुएट 1958 की फ़िल्म ’अल-हिलाल’ में था "बिगड़ी है बात बना दे" और "तुम हो दिल के चोर"; संगीतकार थे बुलो सी. रानी। उसके बाद 1961 में ’ज़िन्दगी और ख़्वाब’ में इनका गाया "न जाने कहाँ तुम थे, न जाने कहाँ हम थे" बेहद लोकप्रिय हुआ था। यह भी दत्ताराम की ही रचना थी। मीना कुमारी पर फ़िल्माया यह गीत सुन कर बहुत से लोगों को यह धोखा भी हो गया कि यह लता मंगेशकर की आवाज़ है। 1961 में ही संगीतकार बाबुल ने भी इस जोड़ी से फ़िल्म ’रेशमी रूमाल’ में गवाया "आँख में शोख़ी, लब पे तबस्सुम"। और दत्ताराम ने फिर एक बार 1963 में इनसे गवाया फ़िल्म ’जब से तुम्हें देखा है’ में "ये दिन, दिन हैं ख़ुशी के, आजा रे आजा मेरे साथी ज़िन्दगी के"। 1962 में ’सखी रॉबिन’ के अलावा मन्ना-सुमन ने ’रॉकेट गर्ल’ फ़िल्म में भी एक गीत गाया था "आजा चले पिया चाँद वाले देस में", संगीत था चित्रगुप्त का। 1966 में ’अफ़साना’, 1971 में ’जाने अनजाने’, 1975 में ’दफ़ा 302' और 1978 में ’काला आदमी’ जैसी फ़िल्मों में भी मन्ना डे और सुमन कल्याणपुर के गाये युगल गीत थे।

और अब इस गीत को सुनते हैं जो रंजन और शालिनी पर फ़िल्माया गया था।


अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, June 19, 2016

राग छायानट : SWARGOSHTHI – 275 : RAG CHHAYANAT



स्वरगोष्ठी – 275 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 8 : जन्मदिन पर विशेष प्रस्तुति

‘बाद मुद्दत के ये घड़ी आई, आप आए तो ज़िन्दगी आई...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ जारी है। श्रृंखला की आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी दे रहे हैं। इस सप्ताह 25 जून को मदन मोहन का 93वाँ जन्मदिन है। इस उपलक्ष्य में हम श्रृंखला की आठवीं कड़ी में आज हम आपको राग छायानट के स्वरों में पिरोये गए 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘जहाँआरा’ से एक गीत का रसास्वादन कराएँगे। इस राग आधारित युगलगीत को स्वर दिया है, मोहम्मद रफी और सुमन कल्याणपुर ने। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग छायानट के स्वर में निबद्ध फिल्म ‘जहाँआरा’ के इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे के स्वरों में राग छायानट की मध्यलय का एक खयाल भी प्रस्तुत कर रहे हैं। 



संगीतकार मदन मोहन का जन्म 25 जून, 1924 को हुआ था। इस तिथि के अनुसार आगामी 25 जून को उनका 93वाँ जन्मदिन है। इस अवसर के लिए आज हम मदन मोहन का राग छायानट में पिरोया एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। मदन मोहन द्वारा शास्त्रीय-संगीत पर आधारित फ़िल्मी गीतों की इस शृंखला की आठवीं कड़ी में आज बारी मोहम्मद रफ़ी और सुमन कल्याणपुर के गाए हुए एक युगल गीत की। फ़िल्म है ’जहाँआरा’। मदन मोहन को ’जहाँआरा’ के गीत-संगीत पर बहुत गर्व था। इस फ़िल्म को लेकर वो बहुत ज़्यादा उत्साहित थे। इस उत्साह का कारण यह था कि इस फ़िल्म में हर तरह के गीत रचने का उनके पास सुयोग था। ग़ज़ल, नज़्म, मुजरा, शास्त्रीय-संगीत आधारित गीत, प्यार भरा युगल गीत, ये सब फ़िल्म की कहानी के अनुरूप इस फ़िल्म में डाले जा सकते थे। इसलिए बड़े उत्साह के साथ मदन मोहन ने गीतकार राजेन्द्र कृष्ण के साथ इस फ़िल्म के गीत-संगीत पर काम करना शुरु किया। कुल नौ गीत बने, एक से बढ़ कर एक, एक से एक लाजवाब। इनमें से तीन गीत तलत महमूद की एकल आवाज़ में, दो गीत लता की एकल आवाज़ में, एक रफ़ी की एकल आवाज़ में, एक लता-तलत युगल, एक लता-आशा युगल और एक रफ़ी-सुमन युगल गीत थे। "वो चुप रहें तो मेरे दिल के दाग़ जलते हैं...", "फिर वही शाम वही ग़म वही तनहाई है...", "मैं तेरी नज़र का सुरूर हूँ...", "ऐ सनम आज यह क़सम खायें..." और "जब जब तुम्हे भुलाया तुम और याद आए..." जैसे गीतों ने धूम मचा दिये चारों तरफ़। इसी फ़िल्म के लिए मदन मोहन ने एक ऐसी क़व्वाली भी सोची थी जिसे वो चार मंगेशकर बहनों (लता, आशा, उषा, मीना) से गवा कर एक इतिहास रचना चाहते थे। मदन मोहन की पुत्री संगीता के अनुसार इस क़व्वाली की रेकॉर्डिंग् भी हुई थी, पर आश्चर्य की बात यह है कि ना तो इस अनोखी क़व्वाली को फ़िल्म में शामिल किया गया और ना ही इसे ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर उतारा गया, और आज कहीं भी इसकी कोई प्रति उपलब्ध नहीं है। रसिक श्रोताओं के लिए चार मंगेशकर बहनों की गाई एकमात्र फ़िल्मी क़व्वाली की क्या अहमियत है यह बताने की ज़रूरत नहीं। ख़ैर, मदन मोहन को लगा कि नौ गीतों से सजा यह अल्बम एक कम्प्लीट अल्बम है, विविधता और स्तर, दोनों क़ायम है एक एक गीत में। पर दुर्भाग्यवश इस फ़िल्म का वही हाल हुआ जो मदन मोहन की ज़्यादातर फ़िल्मों का हुआ करता था। ’जहाँआरा’ एक ही सप्ताह पूरी कर सिनेमाघरों से उतर गई। मदन मोहन को विश्वास था कि कम से कम इन गीतों के ज़रिए इस फ़िल्म को सफलता मिलेगी, पर ऐसा नहीं हुआ। वो बहुत निराश हुए थे।

सुमन कल्याणपुर और मुहम्मद रफी 
अब बात ’जहाँआरा’ के उस गीत की जिसे आज हमने चुना है। राग छायानट और कहरवा ताल पर आधारित मोहम्मद रफ़ी और सुमन कल्याणपुर की आवाज़ों में यह गीत है "बाद मुद्दत के यह घड़ी आई, आप आए तो ज़िन्दगी आई..."। यह उन चार-पाँच सालों का वह दौर था जब रॉयल्टी वाले मामले में मतभेद की वजह से रफ़ी साहब और लता जी साथ में नहीं गा रहे थे। इस बात को लेकर और ख़ास कर इस गीत को लेकर मदन मोहन दुविधा में पड़ गए कि अब क्या होगा, यह गीत तो उन्होंने इन दो गायकों को ध्यान में रख कर बनाया है, और वो अपने इन दो मनपसन्द गायकों से ही यह गीत गवाना चाहते थे। पर लता जी और रफ़ी साहब वाली बात इतनी बढ़ चुकी थी कि इनमें से कोई राज़ी नहीं थे एक दूसरे के साथ गाने के लिए। इस वजह से 60 के दशक के मध्य भाग के अधिकतर युगलगीत मदन मोहन ने दूसरे गायकों से गवाए। अगर लता किसी गीत के लिए अत्यावश्यक होती तो वो मन्ना डे, तलत महमूद या महेन्द्र कपूर को लेते (जैसा कि ’सुहागन’, ’वो कौन थी’, ’दुल्हन एक रात की’ और ’जहाँआरा’ में उन्होंने किया) और अगर रफ़ी साहब किसी गीत के लिए ज़रूरी होते तो गायिकाओं में आशा भोसले (’नीला आकाश’, ’नींद हमारी ख़्वाब तुम्हारे’) या सुमन कल्याणपुर (’ग़ज़ल’, ’जहाँआरा’) को लिया जाता। प्रस्तुत गीत में रफ़ी साहब के उपस्थिति की ज़रूरत के मद्देनज़र मदन जी ने लता जी से इस बात का ज़िक्र किया और उनकी जगह सुमन कल्याणपुर से इस गीत को गवाने का निर्णय लिया। सुमन कल्याणपुर की गायकी से मदन जी ख़ुश हुए और फ़िल्म ’गज़ल’ में भी उनसे गीत गवाया। लीजिए, अब आप वही युगलगीत सुनिए।


राग छायानट : ‘बाद मुद्दत के ये घड़ी आई...’ : मुहम्मद रफी और सुमन कल्याणपुर : फिल्म – जहाँआरा


वीणा सहस्त्रबुद्धे
राग छायानट का उल्लेख अनेक प्राचीन ग्रन्थों, जैसे- राग लक्षण, संगीत सारामृत, संगीत पारिजात आदि में मिलता है। परन्तु इन ग्राथों में राग छायानट का जो स्वरूप वर्णित किया गया है, वह आधुनिक छायानट से भिन्न है। अहोबल रचित ग्रन्थ ‘संगीत पारिजात’ में राग छायानट का जैसा स्वरूप दिया गया है वह आधुनिक छायानट के स्वरूप से थोड़ा समान है। राग छायानट का स्वरूप राग छाया और राग नट के मेल से बना है। इसमें सा रे, रे ग म प तथा सा रे सा, नट के और परे, रे ग म प, ग म रे सा, छाया राग के अंग हैं। परन्तु वर्तमान में छायानट का संयुक्त रूप इतना अधिक प्रचलित है कि बहुत कम संगीतज्ञों का ध्यान इसके दो मूल रागों पर जाता है। राग छायानट में इन दो रागों का मेल तो है ही, राग को गाते-बजाते समय कई अन्य रागों का आभास भी होता है, जैसे - अल्हैया बिलावल, कामोद और केदार। राग छायानट की उत्पत्ति कल्याण थाट से मानी जाती है। इस राग में दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग की जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है, अर्थात आरोह और अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में शुद्ध मध्यम और अवरोह शुद्ध और तीव्र, दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग होता है। राग छायानट का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। रात्रि के प्रथम प्रहर में इस राग का गायन-वादन सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। राग छायानट के स्वरूप को समझने के लिए अब हम इस राग में कण्ठ-संगीत की एक रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। देश की सुविख्यात गायिका विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे राग छायानट में मध्यलय का खयाल प्रस्तुत कर रही हैं। रचना तीनताल में निबद्ध है, जिसके बोल हैं- ‘सन्देशवा पिया से मोरा कहियों जाय...’। आप इस खयाल रचना का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति प्रदान कीजिए।


राग छायानट : ‘सन्देशवा पिया से मोरा कहियों जाय...’ : विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 275वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक बार पुनः मदन मोहन के राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 25 जून, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 277वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 273 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1966 में प्रदर्शित फिल्म ‘दुल्हन एक रात की’ से राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – पीलू, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायिका – लता मंगेशकर

इस बार की संगीत पहेली में चार प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। ये विजेता हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल। सभी चारो विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ का रसास्वादन कर रहे हैं। इस श्रृंखला में हम फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। आज की इस कड़ी में हमने आपसे राग छायानट के बारे में चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को श्रृंखला की एक एक नई कड़ी के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 


Sunday, April 24, 2016

रसभरी चैती : SWARGOSHTHI – 267 : CHAITI SONGS




स्वरगोष्ठी – 267 में आज

होली और चैती के रंग – 5 : कुछ पुरानी चैती

‘यही ठइयाँ मोतिया हेराय गइलें रामा कहवाँ मैं ढूँढू ...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला – ‘होली और चैती के रंग’ की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम ऋतु के अनुकूल भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों और रचनाओं की चर्चा कर रहे हैं, जिन्हें ग्रीष्मऋतु के शुरुआती परिवेश में गाने-बजाने की परम्परा है। भारतीय समाज में अधिकतर उत्सव और पर्वों का निर्धारण ऋतु परिवर्तन के साथ होता है। शीत और ग्रीष्म ऋतु की सन्धिबेला में मनाया जाने वाला पर्व- होलिकोत्सव और चैत्रोत्सव प्रकारान्तर से पूरे देश में आयोजित होता है। यह उल्लास और उमंग का, रस और रंगों का, गायन-वादन और नर्तन का पर्व है। भारतीय संगीत की कई ऐसी लोक-शैलियाँ हैं, जिनका प्रयोग उपशास्त्रीय संगीत में भी किया जाता है। होली पर्व के बाद, आरम्भ होने वाले चैत्र से ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो जाता है। इस परिवेश में पूरे उत्तर भारत में चैती-गायन आरम्भ हो जाता है। गाँव की चौपालों से लेकर मेलों में, मन्दिरों में, यहाँ तक कि शास्त्रीय संगीत के मंचों पर भी चैती के स्वर गूँजने लगते हैं। पिछले अंक में हमने चैती लोक संगीत का उपशास्त्रीय कलाकारों द्वारा प्रस्तुतीकरण किया था। आज के अंक में हम चैती गीतों की कुछ प्राचीन गायकी का रसास्वादन आपको कराएंगे। आज हम आपको चैती गीत की एक शताब्दी से अधिक प्राचीन गायकी का अनुभव अपने समय की सुप्रसिद्ध गायिका अच्छन बाई के स्वरों से कराएंगे। इसके अलावा लगभग छः दशक पूर्व बुजुर्गों से सुनी चैती, उपशास्त्रीय गायिका निर्मला देवी से और 1963-64 में बनी भोजपुरी फिल्म ‘बिदेशिया’ में शामिल एक चैती गीत भी पार्श्वगायिका सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। 


शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक और फिल्म संगीत की चर्चाओं पर केन्द्रित हमारी-आपकी इस अन्तरंग साप्ताहिक गोष्ठी में आज हम पुनः चैती गीतों पर चर्चा करेंगे। अपने पिछले अंक से हमने शास्त्रीय और उपशास्त्रीय कलाकारों की स्वरों में चैत्र मास में गायी जाने वाली लोक संगीत की शैली ‘चैती’ प्रस्तुत की थी। यूँ तो चैती लोक संगीत की शैली है, किन्तु ठुमरी अंग में ढल कर यह और भी रसपूर्ण हो जाती है। आज हम आपसे पुराने ग्रामोफोन रिकार्ड और फिल्मों में चैती के प्रयोग पर चर्चा कर रहे हैं। भारत में ग्रामोफोन रिकार्ड के निर्माण का आरम्भ 1902 से हुआ था। पहले ग्रामोफोन रिकार्ड में उस समय की मशहूर गायिका गौहर जान की आवाज़ थी। संगीत की रिकार्डिंग के प्रारम्भिक दौर में ग्रामोफोन कम्पनी को बड़ी कठिनाई से गायिकाएँ उपलब्ध हो पातीं थीं। प्रारम्भ में व्यावसायिक गायिकाएँ ठुमरी, दादरा, कजरी, चैती आदि रिकार्ड कराती थीं। 1902 से गौहर जान ने जो सिलसिला आरम्भ किया था, 1910 तक लगभग पाँच सौ व्यावसायिक गायिकाओं ने अपनी आवाज़ रिकार्ड कराई। इन्हीं में एक किशोर आयु की गायिका अच्छन बाई भी थीं, जिनके गीत 1908 में ग्रामोफोन कम्पनी ने रिकार्ड किये थे। अच्छन बाई के रिकार्ड की उन दिनों धूम मच गई थी। उस दौर में अच्छन बाई के स्वर में बने रिकार्ड में से आज मात्र तीन रिकार्ड उपलब्ध हैं, जिनसे उनकी गायन-प्रतिभा का सहज ही अनुभव हो जाता है। इन तीन रिकार्ड में से एक में अच्छन बाई ने पुराने अंदाज़ की मोहक चैती गायी थी। आज हम आपको एक शताब्दी से अधिक पुरानी शैली की उसी चैती का रसास्वादन कराते हैं। गायिका ने चैती के एक अन्तरे में उर्दू के शे’र भी कहे हैं।


प्राचीन चैती : ‘कौने बनवा रे फूलेला...’ : स्वर – अच्छन बाई



यह मान्यता है की प्रकृतिजनित, नैसर्गिक रूप से लोक कलाएँ पहले उपजीं, परम्परागत रूप में उनका क्रमिक विकास हुआ और अपनी उच्चतम गुणवत्ता के कारण ये शास्त्रीय रूप में ढल गईं। प्रदर्शनकारी कलाओं पर भरतमुनि प्रवर्तित ग्रन्थ 'नाट्यशास्त्र' को पंचमवेद माना जाता है। नाट्यशास्त्र के प्रथम भाग, पंचम अध्याय के श्लोक संख्या 57 में ग्रन्थकार ने स्वीकार किया है कि लोक जीवन में उपस्थित तत्वों को नियमों में बाँध कर ही शास्त्र प्रवर्तित होता है। श्लोक का अर्थ है कि इस चर-अचर में उपस्थित जो भी दृश्य-अदृश्य विधाएँ, शिल्प, गतियाँ और चेष्टाएँ हैं, वह सब शास्त्र रचना के मूल तत्त्व हैं।" चैती गीतों के लोकरंजक-स्वरुप तथा स्वर और ताल पक्ष के चुम्बकीय गुण के कारण ही उपशास्त्रीय संगीत में यह स्थान पा सका। लोक परम्परा में चैती 14 मात्रा के चाँचर ताल में गायी जाती है, जिसके बीच-बीच में कहरवा ताल का प्रयोग होता है। पूरब अंग के बोल-बनाव की ठुमरी भी 14 मात्रा के दीपचन्दी ताल में निबद्ध होती है और गीत के अन्तिम हिस्से में कहरवा की लग्गी का प्रयोग होता है। सम्भवतः चैती के इन्हीं गुणों ने ही उपशास्त्रीय गायक-वादकों को इसके प्रति आकर्षित किया होगा। आइए अब हम आपको एक ऐसी चैती सुनवाते हैं, जिसे फिल्म जगत से जुड़ी अपने समय की सुप्रसिद्ध उपशास्त्रीय गायिका निर्मला देवी ने स्वर दिया है। निर्मला देवी ने उपशास्त्रीय मंचों पर ही नहीं बल्कि फिल्मी पार्श्वगायन के क्षेत्र में भी खूब यश प्राप्त किया था। आज के विख्यात फिल्म अभिनेता गोविन्दा गायिका निर्मला देवी और अरुण आहूजा के सुपुत्र हैं। उनकी गायी इस चैती में आपको लोक और शास्त्रीय, दोनों रंग की अनुभूति होगी।


चैती गीत : ‘यही ठइयाँ मोतिया हेरा गइल रामा...’ : गायिका निर्मला देवी



सुमन कल्याणपुर
चैत्र मास के गीतों की तीन अंकों की इस श्रृंखला का समापन हम एक फिल्मी चैती गीत से करेंगे। हमारे कई पाठकों ने इस गीत की फरमाइश की है। वर्ष 1964 में भोजपुरी बोली में फिल्म ‘बिदेशिया’ का प्रदर्शन हुआ था। टिकट खिड़की पर यह फिल्म बेहद सफल हुई थी। दरअसल यह फिल्म पूर्वांचल के तत्कालीन ग्रामीण भारत का यथार्थ चित्रण था। फिल्म में छुआ-छूत की कुप्रथा का जम कर लताड़ लगाई गई थी। इस चैती गीत का प्रयोग इसी भोजपुरी फिल्म ‘बिदेशिया’ में किया गया था, जिसके गीतकार राममूर्ति चतुर्वेदी और संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी थे। चैती गीत का यह एक नया प्रयोग माना जाएगा। फिल्म में जिस प्रकार इसका प्रयोग हुआ है, वह लोक-नाट्य नौटंकी के रूप में है। आप सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में चैती का यह अनूठा प्रयोग सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।


फिल्म – बिदेशिया : 'बनि जईहों बन के जोगिनियाँ हो रामा...' : स्वर – सुमन कल्याणपुर




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 267वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 270वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस गीत में किस राग का आभास हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत के गायक की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 30 अप्रैल, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 269वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 265 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘गोदान’ से चैती गीत शैली पर आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न में हमने हमेशा पूछे जाने ‘राग’ के स्थान पर गीत की ‘शैली’ के बारे में सवाल किया था। दो प्रतिभागियों को छोड़ कर सभी ने इस प्रश्न के उत्तर में ‘राग – तिलक कामोद’ लिखा है। वास्तव में राग के सवाल पर यह उत्तर सही है, परन्तु शैली के सवाल पर यह गलत है। पहेली के सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि प्रश्न को खूब ध्यान से पढ़ा करें। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- शैली – चैती, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – दीपचंदी और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायक – मुकेश

इस बार की संगीत पहेली में दो प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों का, दो प्रतिभागियों ने तीन में से दो सही उत्तर देकर और एक प्रतिभागी ने एक सही उत्तर देकर विजेता बने हैं। ये विजेता हैं - पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, और चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल ने दो-दो अंक अर्जित किए है। हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने इस बार मात्र एक अंक अर्जित किया है। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप पर्व और ऋतु के अनुकूल श्रृंखला ‘होली और चैती के रंग’ का रसास्वादन कर रहे थे। श्रृंखला का यह समापन अंक था। अगले अंक से हम अनेक संगीत-प्रेमियों के आग्रह पर फिल्म संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर एक नई श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं। हमे पूर्ण विश्वास है कि आप सब संगीत-प्रेमी इस नई श्रृंखला का स्वागत करेंगे। आप भी अपने विचार, सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को नई श्रृंखला के एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




Sunday, July 5, 2015

गौड़ मल्हार : SWARGOSHTHI – 226 : GAUD MALHAR


स्वरगोष्ठी – 226 में आज


रंग मल्हार के – 3 : राग गौड़ मल्हार


‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’। श्रृंखला के तीसरे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा कर रहे हैं। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। श्रृंखला की इस तीसरी कड़ी में आज हम आपसे राग गौड़ मल्हार के बारे में चर्चा करेंगे। आज के अंक में सुविख्यात गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में हम इस राग की एक मोहक बन्दिश प्रस्तुत करेंगे, जिसके बोल हैं- ‘गरजत बरसत भीजत आई लो…’। इसके साथ ही फिल्म संगीतकार रोशन का स्वरबद्ध किया इस राग पर आधारित दो गीत भी सुनवाएँगे।



ल्हार अंग के रागों की श्रृंखला में पिछले दो अंकों में आपने मेघ मल्हार और मियाँ मल्हार रागों की स्वर-वर्षा का आनन्द प्राप्त किया। इस श्रृंखला में आज हम आपके लिए लेकर आए है, राग गौड़ मल्हार। पावस ऋतु का यह एक ऐसा राग है जिसके गायन-वादन से सावन मास की प्रकृति का सजीव चित्रण तो किया ही जा सकता है, साथ ही ऐसे परिवेश में उपजने वाली मानवीय संवेदनाओं की सार्थक अभिव्यक्ति भी इस राग के माध्यम से की जा सकती है। आकाश पर कभी मेघ छा जाते हैं तो कभी आकाश मेघरहित हो जाता है। इस राग के स्वर-समूह उल्लास, प्रसन्नता, शान्ति और मिलन की लालसा का भाव जागृत करते हैं। मिलन की आतुरता को उत्प्रेरित करने में यह राग समर्थ होता है। राग गौड़ मल्हार में गौड़ और मल्हार अंग का अत्यन्त आकर्षक मेल होता है। वक्र सम्पूर्ण जाति के इस राग में दोनों निषाद स्वरों का प्रयोग किया जाता है। अन्य सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस राग में गान्धार स्वर का अत्यन्त विशिष्ट प्रयोग किया जाता है। राग गौड़ मल्हार को कुछ गायक-वादक खमाज थाट के अन्तर्गत, तो अधिकतर इसे काफी थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित रामाश्रय झा इस राग को विलावल थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते थे।

राग गौड़ मल्हार की कुछ विशेषताओं की चर्चा करते हुए संगीत-शिक्षक और संगीत विषयक कई पुस्तकों के लेखक पण्डित मिलन देवनाथ जी ने बताया कि इस राग के आरोह में शुद्ध गान्धार के साथ शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। जो गायक-वादक कोमल गान्धार का प्रयोग करते हैं वे इस राग को काफी थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। श्री देवनाथ ने बताया कि इस राग में मध्यम पर न्यास करना और ऋषभ-पंचम की संगति आवश्यक होती है। यह प्रयोग मल्हार अंग का परिचायक होता है। उन्होने बताया कि गौड़ मल्हार में पण्डित विद्याधर व्यास और विदुषी किशोरी अमोनकर ने नि(कोमल),ध,नि,सा (मियाँ मल्हार) का जैसा मोहक परम्परागत प्रयोग किया है, वह सुनने योग्य है। आइए अब हम आपको राग गौड़ मल्हार की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध गायिका मालिनी राजुरकर के स्वरों में सुनवाते हैं। उन्होने द्रुत तीनताल में इसे एक अलग ही रस-रंग में प्रस्तुत किया है।


राग गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : विदुषी मालिनी राजुरकर




फिल्मों में राग गौड़ मल्हार का प्रयोग बहुत कम किया गया है। रोशन और बसन्त देसाई, दो ऐसे फिल्म संगीतकार हुए हैं, जिन्होने इस राग का बेहतर इस्तेमाल अपनी फिल्मों में किया है। पार्श्वगायक मुकेश ने 1951 में फिल्म ‘मल्हार’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के संगीतकार रोशन थे। फिल्म के शीर्षक संगीत के रूप में रोशन ने राग गौड़ मल्हार की उसी बन्दिश का चुनाव किया, जिसे अभी आपने विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में सुना है। लता मंगेशकर ने फिल्म में शामिल इस बन्दिश को स्वर दिया था। अच्छे संगीत के बावजूद फिल्म ‘मल्हार’ व्यावसायिक रूप से असफल रही और गीत भी अनसुने रह गए। लगभग एक दशक बाद रोशन ने इसी धुन का 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘बरसात की रात’ में थोड़े शाब्दिक फेर-बदल के साथ दोबारा प्रयोग किया। फिल्म के गीतकार साहिर लुधियानवी ने स्थायी और अन्तरे के शब्दों में बदलाव किये थे। जबकि फिल्म ‘मल्हार’ में गीत के शब्द पारम्परिक बन्दिश के अनुकूल थे। फिल्म ‘मल्हार’ और ‘बरसात की रात’ में शामिल राग गौड़ मल्हार के स्वरों में पिरोये दोनों गीतों का प्रयोग फिल्मों के शीर्षक संगीत के रूप में किया गया था। लगभग एक दशक बाद फिल्म ‘बरसात की रात’ और उसका संगीत, दोनों व्यावसायिक दृष्ठि से बेहद सफल सिद्ध हुआ। आपको हम दोनों फिल्मों के गीत सुनवाते है। पहले आप लता मंगेशकर की आवाज़ में फिल्म ‘मल्हार’ का और फिर सुमन कल्याणपुर और कमल बरोट के युगल स्वरों में फिल्म ‘बरसात की रात’ का गीत सुनिए, जिसमें रोशन ने राग गौड़ मल्हार के स्वरों का प्रयोग कर गीत को सदाबहार बना दिया। आप इन गीतों को सुनिए और मुझे आज के अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : लता मंगेशकर : फिल्म - मल्हार




राग गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत सावन...’ : सुमन कल्याणपुर व कमल बरोट : फिल्म -बरसात की रात





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 226वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको सुप्रसिद्ध गायक की आवाज़ में प्रस्तुत खयाल का एक अंश सुनवा रहे हैं। इस गीत के अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 230वें अंक के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में किस राग की झलक है?

2 – गीत के अंश में प्रयोग किये गए ताल को ध्यान से सुनिए और हमें ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत के गायक को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 11 जुलाई, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 228वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 224 की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद राशिद खाँ की आवाज़ में प्रस्तुत राग मियाँ की मल्हार की एक बन्दिश का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा गया था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मियाँ की मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक उस्ताद राशिद खाँ। 

 इस बार पहेली में हमारी नियमित प्रतिभागियों में से वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया ने एक प्रश्न का सही उत्तर दिया है। उन्हें एक अंक दिया जा रहा है। अन्य प्रतिभागियों में पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने तीनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये हैं। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’ जारी है। आज के अंक में आपने राग गौड़ मल्हार का रसास्वादन किया। श्रृंखला के आगामी अंकों में हम आपको मल्हार अंग के अन्य रागों को सुनवाएँगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी पिछली श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Sunday, July 20, 2014

‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : SWARGOSHTHI – 177 : Raag Gaud Malhar




स्वरगोष्ठी – 177 में आज


वर्षा ऋतु के राग और रंग – 3 : राग गौड़ मल्हार


'...सावन आइलों लाल चुनरिया देहों मंगाय...'  





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के एक और सुहाने, हरियाले और रिमझिम फुहारों से युक्त अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र उपस्थित हूँ। इस मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के राग और रंग’ की दूसरी कड़ी में एक बार पुनः आप सभी संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन है। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम वर्षा ऋतु के राग, रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत का आनन्द प्राप्त कर रहे हैं। हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की पिछली दो कड़ियों हमने आपसे राग मेघ मल्हार और मियाँ की मल्हार पर चर्चा की थी। आज के अंक में हम मल्हार अंग के ही एक और मनमोहक राग गौड़ मल्हार पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में सुविख्यात गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में इस राग की एक मोहक बन्दिश प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही फिल्म संगीतकार रोशन का स्वरबद्ध किया इस राग पर आधारित दो गीत भी सुनवाएँगे। 
 



ल्हार अंग के रागों की श्रृंखला में पिछले दो अंकों में आपने मेघ मल्हार और मियाँ मल्हार रागों की स्वर-वर्षा का आनन्द प्राप्त किया। इस श्रृंखला में आज हम आपके लिए लेकर आए है, राग गौड़ मल्हार। पावस ऋतु का यह एक ऐसा राग है जिसके गायन-वादन से सावन मास की प्रकृति का सजीव चित्रण तो किया ही जा सकता है, साथ ही ऐसे परिवेश में उपजने वाली मानवीय संवेदनाओं की सार्थक अभिव्यक्ति भी इस राग के माध्यम से की जा सकती है। आकाश पर कभी मेघ छा जाते हैं तो कभी आकाश मेघरहित हो जाता है। इस राग के स्वर-समूह उल्लास, प्रसन्नता, शान्ति और मिलन की लालसा का भाव जागृत करते हैं। मिलन की आतुरता को उत्प्रेरित करने में यह राग समर्थ होता है। आज के अंक में हम आपको ऐसे ही भावों से युक्त कुछ मोहक रचनाएँ सुनवाएँगे। साथ ही राग गौड़ मल्हार के स्वरूप के बारे में संक्षिप्त जानकारी भी आपसे बाँटेंगे।

राग गौड़ मल्हार में गौड़ और मल्हार अंग का अत्यन्त आकर्षक मेल होता है। वक्र सम्पूर्ण जाति के इस राग में दोनों निषाद स्वरों का प्रयोग किया जाता है। अन्य सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस राग में गान्धार स्वर का अत्यन्त विशिष्ट प्रयोग किया जाता है। राग गौड़ मल्हार को कुछ गायक-वादक खमाज थाट के अन्तर्गत, तो कुछ इसे काफी थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित रामाश्रय झा इस राग को विलावल थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते थे। राग गौड़ मल्हार की कुछ विशेषताओं की चर्चा करते हुए संगीत-शिक्षक और संगीत विषयक कई पुस्तकों के लेखक मिलन देवनाथ जी ने बताया कि इस राग के आरोह में शुद्ध गान्धार के साथ शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। जो गायक-वादक कोमल गान्धार का प्रयोग करते हैं वे इस राग को काफी थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। श्री देवनाथ ने बताया कि इस राग में मध्यम पर न्यास करना और ऋषभ-पंचम की संगति आवश्यक होती है। यह प्रयोग मल्हार अंग का परिचायक होता है। उन्होने बताया कि गौड़ मल्हार में पण्डित विद्याधर व्यास और विदुषी किशोरी अमोनकर ने नि(कोमल),ध,नि,सा (मियाँ मल्हार) का जैसा मोहक परम्परागत प्रयोग किया है, वह सुनने योग्य है। आइए अब हम आपको राग गौड़ मल्हार की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध गायिका मालिनी राजुरकर के स्वरों में सुनवाते हैं। उन्होने द्रुत तीनताल में इसे एक अलग ही रस-रंग में प्रस्तुत किया है।


राग गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : विदुषी मालिनी राजुरकर : द्रुत तीनताल





फिल्मों में राग गौड़ मल्हार का प्रयोग बहुत कम किया गया है। रोशन और बसन्त देसाई, दो ऐसे फिल्म संगीतकार हुए हैं, जिन्होने इस राग का बेहतर इस्तेमाल अपनी फिल्मों में किया है। पार्श्वगायक मुकेश ने 1951 में फिल्म ‘मल्हार’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के संगीतकार रोशन थे। फिल्म के शीर्षक संगीत के रूप में रोशन ने राग गौड़ मल्हार की उसी बन्दिश का चुनाव किया, जिसे अभी आपने विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में सुना है। लता मंगेशकर ने फिल्म में शामिल इस बन्दिश को स्वर दिया था। अच्छे संगीत के बावजूद फिल्म ‘मल्हार’ व्यावसायिक रूप से असफल रही और गीत भी अनसुने रह गए। लगभग एक दशक बाद रोशन ने इसी धुन का 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘बरसात की रात’ में थोड़े शाब्दिक फेर-बदल के साथ दोबारा प्रयोग किया। फिल्म के गीतकार साहिर लुधियानवी ने स्थायी और अन्तरे के शब्दों में बदलाव किए थे। जबकि फिल्म ‘मल्हार’ में गीत के शब्द पारम्परिक बन्दिश के अनुकूल थे। फिल्म ‘मल्हार’ और ‘बरसात की रात’ में शामिल राग गौड़ मल्हार के स्वरों में पिरोये दोनों गीतों का प्रयोग फिल्मों के शीर्षक संगीत के रूप में किया गया था। लगभग एक दशक बाद रोशन ने फिल्म ‘बरसात की रात’ में उसी धुन को दोहराया। फिल्म और उसका संगीत, दोनों व्यावसायिक दृष्ठि से बेहद सफल सिद्ध हुआ। आपको हम दोनों फिल्मों के गीत सुनवाते है। पहले आप लता मंगेशकर की आवाज़ में फिल्म ‘मल्हार’ का और फिर सुमन कल्याणपुर और कमल बरोट के युगल स्वरों में फिल्म ‘बरसात की रात’ का गीत सुनवाते हैं, जिसमें रोशन ने राग गौड़ मल्हार के स्वरों का प्रयोग कर गीत को सदाबहार बना दिया। आप इन गीतों को सुनिए और मुझे आज के अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग - गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : लता मंगेशकर : फिल्म - मल्हार : संगीत – रोशन





राग - गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत सावन आयो रे...’ : सुमन कल्याणपुर और कमल बरोट : फिल्म – बरसात की रात : संगीत – रोशन






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 177वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक द्रुत खयाल रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 180वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।




1- खयाल के इस अंश को सुन कर गायक की आवाज़ को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

2 – यह संगीत रचना किस राग में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 179वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 175वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वर में राग मियाँ की मल्हार के खयाल का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका किशोरी अमोनकर और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग मियाँ मल्हार। इस अंक की पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात




मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम ऋतु के अनुकूल रागों अर्थात वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों पर चर्चा कर रहे हैं। अगले अंक में एक और वर्षाकालीन राग पर आपसे चर्चा करेंगे। आप भी यदि भारतीय संगीत के किसी विषय में कोई जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पर भेज दें। अपने पाठको/श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित/प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।




प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, December 15, 2013

विविध रागों में निबद्ध मीरा का एक भक्तिपद


स्वरगोष्ठी – 146 में आज

रागों में भक्तिरस – 14

‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय...’ 



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की चौदहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी श्रृंखला के अन्तर्गत अब तक हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर चुके हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम कुछ बदलाव लाने का प्रयास कर रहे हैं। आज हम आपको भक्त कवयित्री मीराबाई का एक भजन प्रस्तुत करेंगे जिसे अलग-अलग गायिकाओं के स्वरों में और विभिन्न रागों में पिरोया गया है। हम आपको मीरा का यह कृष्णभक्ति से परिपूर्ण पद क्रमशः गायिका वाणी जयराम, लता मंगेशकर, गीता दत्त और सुमन कल्याणपुर की आवाज़ों में सुनवाएँगे। एक ही भजन को चार अलग-अलग आवाज़ों और धुनों में सुन कर आपको भजन की भावभिव्यक्ति और रस की ग्राह्यता में अन्तर करने का अवसर भी मिलेगा।   



भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा रही है। इस संगीत परम्परा में जड़ता नहीं है। यह तो गोमुख से निरन्तर निकलने वाली वह पवित्र धारा है जिसके मार्ग में अनेक धाराएँ मिलती है और इस मुख्य धारा में विलीन हो जाती हैं। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। परन्तु भक्तिरस की धारा जो वैदिक युग में समाहित हुई, वह अविच्छिन्न रूप से आज भी जारी है। आज भारतीय उपमहाद्वीप में संगीत की जितनी भी शैलियाँ प्रचलित हैं, इनका क्रमिक विकास प्राचीन वैदिक संगीत से ही हुआ है। 15वीं और 16वीं शताब्दी में संगीत के विकास में भक्त कवियों का भरपूर योगदान था। इस काल में सूरदास, मीराबाई, गोस्वामी तुलसीदास, कबीर, पुण्डरीक विट्ठल आदि ऐसे भक्तकवि हुए जिन्होने भक्तिकाल में साहित्य के साथ-साथ संगीत को भी प्रतिष्ठित किया। इनका प्रभाव आज भी साहित्य और संगीत के क्षेत्र में कायम है। इनमें से आज हम भक्त कवयित्री मीराबाई के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे। मीरा का जन्म 1498ई. में माना जाता है। मीरा राजस्थान के मेड़ता राज परिवार की राजकुमारी थीं। सात वर्ष की आयु में एक महात्मा ने उन्हें श्रीकृष्ण की एक मूर्ति दी। कृष्ण के उस स्वरूप पर वे इतनी मुग्ध हो गईं कि उन्हें अपना आराध्य और पति मान लिया। 1516ई. में मीरा का विवाह चित्तौड़ के शासक राणा सांगा के पुत्र भोजराज के साथ हुआ। परन्तु कृष्णभक्ति के प्रति समर्पित रहने और साधु-संतों के बीच समय व्यतीत करने के कारण उनका गृहस्थ जीवन कभी भी सफल नहीं रहा। मीरा वैष्णव भक्ति धारा की प्रमुख कवयित्री मानी जाती है। उनके रचे हुए लगभग 1300 पद हमे आज भी उपलब्ध हैं। उनके पदों में राजस्थानी बोली के साथ ब्रज भाषा का मिश्रण है। कुछ विद्वान मानते हैं कि मीरा के भक्तिकाव्य पर उनके समकालीन संगीत सम्राट तानसेन, चित्तौड़ के गुरु रविदास और गोस्वामी तुलसीदास का प्रभाव है। उनके रचे असंख्य पदों में से आज के अंक के लिए हमने जो पद चुना है, वह है- ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय...’। इस पद के चार संस्करण हम प्रस्तुत कर रहे हैं। सबसे पहले प्रस्तुत है, गीतकार गुलज़ार द्वारा 1979 में निर्मित फिल्म ‘मीरा’ में शामिल यह भक्ति रचना। फिल्म का संगीत निर्देशन विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर ने किया था। पण्डित जी ने मीरा के इस पद में निहित करुणा मिश्रित भक्तिभाव की अभिव्यक्ति के लिए राग तोड़ी के स्वरों का चयन किया था। राग तोड़ी की चर्चा से पहले आप यह पद गायिका वाणी जयराम की आवाज़ में सुनिए और करुण और भक्तिरस के मिश्रण की अनुभूति कीजिए। रचना रूपक ताल में निबद्ध है।


राग तोड़ी : ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी...’ : वाणी जयराम ; फिल्म मीरा 



अभी आपने मीरा के इस पद की रसानुभूति राग तोड़ी के स्वरों में किया। अब थोड़ी चर्चा राग तोड़ी के विषय में कर ली जाए। राग तोड़ी इसी नाम के थाट तोड़ी से सम्बन्धित माना जाता है। इस राग में ऋषभ, गान्धार और धैवत स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। इसके साथ मध्यम स्वर तीव्र और निषाद स्वर शुद्ध प्रयोग होता है। इसके आरोह और अवरोह, दोनों में सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार इसकी जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार है। राग तोड़ी के गायन-वादन का सबसे उपयुक्त समय दिन का दूसरा प्रहर माना जाता है। करुण और भक्तिरस की अभिव्यक्ति के लिए यह उपयुक्त राग है।
आइए, मीरा का यही पद अब एक भिन्न रूप में सुनें। 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘नौबहार’ में इसी भक्तिपद को शामिल किया गया था। इसके संगीतकार थे रोशन और इसे स्वर दिया, सुप्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर ने। संगीतकार रोशन ने इस भक्तिपद को राग भीमपलासी के स्वरों में और कहरवा ताल में पिरोया था। राग भीमपलासी काफी थाट से सम्बन्धित है। इस राग में गान्धार और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित होता है। अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। इसकी जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इसके गायन-वादन का उपयुक्त समय दिन का तृतीय प्रहर होता है। राग भीमपलासी के स्वर भक्तिरस के साथ-साथ श्रृंगाररस की अभिव्यक्ति में समर्थ होते है। राग के इसी स्वभाव के कारण मीरा के इस पद की प्रस्तुति में भक्ति के साथ श्रृंगाररस की अनुभूति भी होगी। लीजिए, भजन का यह दूसरा संस्करण भी सुनिए।


राग भीमपलासी : ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी...’ : लता मंगेशकर : फिल्म नौबहार



मीरा के इसी पद का तीसरा संस्करण 1950 में प्रदर्शित फिल्म ‘जोगन’ में प्रयोग किया गया था। फिल्म में इस भक्तिपद का उपयोग काफी द्रुत लय में कीर्तन शैली में किया गया है। फिल्म के मुख्य कलाकार दिलीप कुमार, नरगिस, प्रतिमा देवी, पूर्णिमा, तबस्सुम आदि थे। अभिनेता राजेन्द्र कुमार की यह पहली फिल्म थी। भजन के इस संस्करण को सुनते समय कई रागों की झलक मिलती है। स्थायी में राग सिन्दूरा तो अन्तरे में राग झिंझोटी के दर्शन भी होते हैं। सामान्य रूप से इस गीत को राग मिश्र झिंझोटी पर आधारित कहा जा सकता है। फिल्म ‘जोगन’ में शामिल मीरा के इस पद को बुलो सी. रानी ने संगीतबद्ध किया था और गायिका गीता दत्त ने स्वर दिया था। इस प्रस्तुति के बाद इसी पद का चौथा स्वरूप भी आप सुनेगे। यह एक गैर फिल्मी संस्करण है, जिसे गायिका सुमन कल्याणपुर ने स्वर दिया है। मीरा के पारम्परिक अन्तरों के साथ इसे कृपशंकर तिवारी ने स्वरबद्ध किया है। इस प्रस्तुति में राग जोग की स्पष्ट झलक मिलती है। भारतीय संगीत का राग जोग भक्तिरस के साथ वैराग्य भाव का सृजन भी करता है। कर्नाटक संगीत पद्यति में राग नट इसके समतुल्य राग होता है। सम्पूर्ण जाति का यह राग पूर्वांग प्रधान होता है। आरोह में केवल शुद्ध गान्धार और अवरोह में शुद्ध और कोमल, दोनों गान्धार का प्रयोग किया जाता है। राग जोग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। रात्रि का दूसरा प्रहर इस राग के गायन-वादन का उपयुक्त समय माना जाता है। सुमन कल्याणपुर की इस प्रस्तुति में आपको मीरा के इसी पद में एक अन्य भाव का सृजन भी परिलक्षित होगा। आप मीरा के एक ही पद के इन संस्करणों की रसानुभूति कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग मिश्र झिंझोटी : ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी...’ : गीता दत्त : फिल्म जोगन




राग जोग : ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी...’ : सुमन कल्याणपुर : गैर फिल्मी भजन





आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 146वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक भक्ति रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यह पाँचवाँ और इस वर्ष का अन्तिम सेगमेंट है। 150वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – इस संगीत रचना के अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमे राग का नाम लिख भेजिए।

2 – इस रचना के स्वरों को ध्यान से सुनिए और हमे गायिका का नाम लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 148वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 144वीं कड़ी में हमने आपको विदुषी कला रामनाथ के वायलिन वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जोगिया और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वायलिन। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी के साथ-साथ हमारे एक नए पाठक/श्रोता चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपको राग तोड़ी, भीमपलासी, मिश्र झिंझोटी और जोग पर आधारित मीराबाई के एक पद का रसास्वादन कराया। आगामी अंक में आप मीरा के ही एक अन्य पद की अलग-अलग स्वरों में की गई प्रस्तुति का रसास्वादन कर सकेंगे। अगले अंक में इस लघु श्रृंखला की पन्द्रहवीं कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों की प्रतीक्षा करेंगे। 

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

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