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Sunday, February 2, 2020

राग भटियार : SWARGOSHTHI - 454 : RAG BHATIYAR






स्वरगोष्ठी – 454 में आज

मारवा थाट के राग - 3 : राग भटियार

पं. रविशंकर से सितार पर भटियार की दो रचनाएँ और पं. राजन मिश्र व एस. जानकी से फिल्मी गीत सुनिए




पण्डित रविशंकर
पण्डित राजन मिश्र
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला “मारवा थाट के राग” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से छठा थाट मारवा है। इस श्रृंखला में हम मारवा थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए पहले इस श्रृंखला में हम मारवा थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। आज के अंक में मारवा थाट के जन्य राग भटियार पर चर्चा करेंगे। आज श्रृंखला की तीसरी कड़ी में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर से सितार पर राग भटियार की अवतारणा का रसास्वादन कराएंगे और फिर इसी राग पर आधारित एक फिल्मी गीत पण्डित राजन मिश्र और एस. जानकी के स्वर में सुनवाएँगे। 1985 में प्रदर्शित फिल्म “सुर संगम” से वसन्त देव का लिखा और लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का संगीतबद्ध किया एक गीत; “आयो प्रभात सब मिल गाओ...” का रसास्वादन भी आप करेंगे।


राग भटियार में कोमल ऋषभ और दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। आरोह में निषाद स्वर का अल्प प्रयोग किया जाता है। यह मारवा थाट का सम्पूर्ण जाति का जन्य राग है। अधिकतर विद्वान इस राग को बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते हैं। बिलावल थाट का राग मानने का कारण है कि इस राग में शुद्ध मध्यम स्वर प्रधान होता है, जबकि राग मारवा में शुद्ध मध्यम का प्रयोग होता ही नहीं। स्वरूप की दृष्टि से भी यह मारवा के निकट भी नहीं है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यह रात्रि के अन्तिम प्रहर विशेष रूप से प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश काल में गाया और बजाया जाने वाला राग है। प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश रागों में कोमल ऋषभ तथा शुद्ध गान्धार होने के साथ ही मध्यम भी शुद्ध रहता है। इसमें तीव्र मध्यम का प्रयोग अवश्य होता है, किन्तु अल्प। अवरोह के स्वर वक्रगति से लिये जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि यह पाँचवीं शताब्दी के राजा भर्तृहरि की राग रचना है। उत्तरांग प्रधान यह राग भंखार के काफी निकट होता है। राग भंखार में पंचम स्वर पर ठहराव दिया जाता है, जबकि राग भटियार में शुद्ध मध्यम पर। राग भटियार वक्र जाति का राग है। इसमें षडज स्वर से सीधे धैवत पर जाते हैं, जो अत्यन्त मनोहारी होता है। यह राग गम्भीर, दार्शनिक भाव और जीवन के उल्लास की अभिव्यक्ति देने में पूर्ण समर्थ है। राग भटियार का एक शास्त्रोक्त और प्रयोगधर्मी स्वरूप का अनुभव कराने के लिए अब हम आपको विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर से सितार पर दो रचनाएँ सुनवा रहे हैं। पहली रचना मध्यलय तीनताल में और दूसरी द्रुत एकताल में निबद्ध है। तबला संगति पण्डित कुमार बोस ने की है।

राग भटियार : सितार पर मध्यलय तीनताल और द्रुत एकताल की दो रचनाएँ : पण्डित रविशंकर


एस. जानकी
आठवें दशक से ही फिल्म संगीत की प्रवृत्तियों में काफी बदलाव आ चुका था। नौवें दशक के फिल्म संगीत में रागदारी संगीत का समावेश एक उल्लेखनीय घटना मानी जाने लगी थी। ऐसे ही माहौल मे 1985 में दो फिल्में “सुर संगम” और “उत्सव” प्रदर्शित हुई थी, जिसके संगीत में रागों का सहाता लिया गया यहा। यह भी उल्लेखनीय है कि इन दोनों फिल्मों के संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल थे। फिल्मों में लम्बे समय तक लोकप्रिय संगीत देने के लिए लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का योगदान सराहनीय रहा है। 1963 की फिल्म “पारसमणि” से फिल्म संगीतकार के रूप में पदार्पण करने वाली इस संगीतकार जोड़ी ने शुरुआती दौर की निम्नस्तरीय स्टंट फिल्मों में भी राग आधारित धुनें बना कर अपनी पैठ बनाई थी। उस दौर में उनकी फिल्में भले ही न चली हो, किन्तु उसका संगीत खूब लोकप्रिय हुआ। इसके बाद उनकी फिल्मों में लोक संगीत और लोकप्रिय सुगम संगीत के साथ ही राग आधारित धुनों का सहारा भी लिया गया था। “सुर संगम” में उन्होने तत्कालीन प्रचलित फिल्म संगीत की प्रवृत्तियों के विपरीत संगीत दिया था। इस फिल्म के प्रायः सभी गीत विभिन्न रागों का आधार लिये हुए थे। यही नहीं फिल्म में मुख्य चरित्र के लिए उन्होने किसी फिल्मी पार्श्वगायक को नहीं बल्कि सुप्रसिद्ध शास्त्रीय युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र बन्धुओं में से एक राजन मिश्र का सहयोग लिया। फिल्म ‘सुर संगम’ में राग आधारित संगीत देना एक अनिवार्यता थी। दरअसल यह फिल्म दक्षिण भारतीय फिल्म ‘शंकराभरणम्’ का हिन्दी रूपान्तरण थी। फिल्म में मुख्य चरित्र संगीतज्ञ पण्डित शिवशंकर शास्त्री थे, जो संगीत की शुचिता और मर्यादा के प्रबल पक्षधर थे। अपने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शास्त्री जी मानव के बीच कोई भेद नहीं मानते थे। ऐसे विषय के लिए राग आधारित संगीत की आवश्यकता थी। फिल्म में राग मालकौंस पर आधारित गीत- ‘आए सुर के पंछी आए...’, राग भूपाली और देशकार पर आधारित गीत- ‘जाऊँ तोरे चरणकमल पर वारी...”, राग भैरवी के सुरों में- ‘धन्यभाग सेवा का अवसर पाया...’ जैसे आकर्षक गीत पण्डित राजन मिश्र की आवाज़ में थे। परन्तु इस फिल्म का जो गीत लेकर आज हम उपस्थित हुए हैं, वह राग भटियार के सुरों में पिरोया गीत- ‘आयो प्रभात सब मिल गाओ...’ है। इस गीत में पण्डित राजन मिश्र के साथ दक्षिण भारत की सुप्रसिद्ध गायिका एस. जानकी के स्वर भी शामिल है। गीतकार वसन्त देव का लिखा यह गीत संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने राग भटियार में निबद्ध किया है। आप इस अनूठे फिल्मी गीत में राग का अनुभव कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति प्रदान कीजिए।

राग भटियार : “आयो प्रभात सब मिल गाओ...” : पण्डित राजन मिश्र और एस. जानकी



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 454वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1959 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 460वें अंक की पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायक/गायिका के युगल स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 8 फरवरी, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली कौततार स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 456 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 452वें अंक में हमने आपसे 1960 में प्रदर्शित फिल्म “मुगल-ए-आज़म” से एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – सोहनी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दीपचन्दी तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, रायपुर, छत्तीसगढ़ से राजश्री श्रीवास्तव, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को दो दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “मारवा थाट के राग” की तीसरी कड़ी में आज आपने मारवा थाट के जन्य राग भटियार का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर से सितार पर इस राग में निबद्ध रचना का रसास्वादन किया। राग भटियार के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए सुप्रसिद्ध फिल्म “सुर संगम” का एक गीत प्रस्तुत किया, जिसे पण्डित राजन मिश्र और एस. जानकी ने स्वर दिया है। फिल्म के संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल हैं। अगले अंक में हम मारवा थाट के एक अन्य जन्य राग का परिचय प्रस्तुत करेंगे। कुछ तकनीकी समस्या के कारण अपने फेसबुक के मित्र समूह पर हम “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग भटियार : SWARGOSHTHI - 454 : RAG BHATIYAR : 2 फरवरी, 2020 

Sunday, June 17, 2018

राग मधुवन्ती : SWARGOSHTHI – 374 : RAG MADHUVANTI






स्वरगोष्ठी – 374 में आज

राग से रोगोपचार – 3 : तीसरे प्रहर का राग मधुवन्ती

चरम सीमा तक पहुँची निराशा और चिन्ताविकृति को दूर करने में सहयोगी है राग मधुवन्ती




पण्डित रविशंकर
लता मंगेशकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, इस श्रृंखला के लेखक, संगीतज्ञ और इसराज तथा मयूरवीणा के सुविख्यात वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मानव का शरीर प्रकृत की अनुपम देन है। बाहरी वातावरण के प्रतिकूल प्रभाव से मानव के तन और मन में प्रायः कुछ विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इन विकृतियों को दूर करने के लिए हम विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की शरण में जाते हैं। पूरे विश्व में रोगोपचार की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित है। भारत में हजारों वर्षों से योग से रोगोपचार की परम्परा जारी है। प्राणायाम का तो पूरा आधार ही श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होता है। संगीत में स्वरोच्चार भी श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होते हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। इन्हीं स्वरों के संयोजन से राग की उत्पत्ति होती है। स्वर-योग या श्रव्य माध्यम से गायन या वादन के सुरीले, भावप्रधान और प्रभावकारी नाद अर्थात संगीत हमारे मस्तिष्क के संवेदनशील भागों में प्रवेश करता है। मस्तिष्क में नाद के प्रभाव का विश्लेषण होता है। ग्राह्य और उपयोगी नाद को मस्तिष्क सुरक्षित कर लेता है जहाँ नाद की परमाणु ऊर्जा के प्रभाव से सशक्त और उत्तम कोटि के हारमोन्स का सृजन होता है। यह हारमोन्स शरीर की समस्त कोशिकाओं में व्याप्त हो जाता है। इसकी ऊर्जा से अनेक मानसिक और मनोदैहिक समस्याओं का उपचार सम्भव हो सकता है। इसके साथ ही चिकित्सक के सुझावानुसार औषधियों का सेवन भी आवश्यक हो सकता है। मन की शान्ति, सकारात्मक तथा मृदु संवेदना और भक्ति में एकाग्रता के लिए राग भैरवी के कोमल स्वर प्रभावकारी सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार विविध रागों के गातन-वादन के माध्यम से प्रातःकाल से रात्रिकालीन परिवेश में प्रभावकारी होता है। अलग-अलग स्वर-भावों और गीत के साहित्य के रसों के अनुसार उत्पन्न सशक्त भाव-प्रवाह के द्वारा डिप्रेशन, तनाव, चिन्ताविकृति आदि मानसिक समस्याओं का उपचार सम्भव है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न रागो के स्वरो से उत्पन्न प्रभावों का क्रमशः विवेचन कर रहे हैं। श्रृंखला के तीसरे अंक में आज हम राग मधुवन्ती के स्वरो से विभिन्न रोगों के उपचार पर चर्चा करेंगे और आपको राग मधुवन्ती में सितार पर एक रचना सुनवाएँगे जिसे पण्डित रविशंकर ने प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार लता मंगेशकर के स्वर में राग मधुवन्ती पर आधारित फिल्म “दिल की राहें” का एक गीत भी प्रस्तुत करेंगे।



राग मधुवन्ती में कोमल गान्धार, तीव्र माध्यम, शुद्ध निषाद, शुद्ध धैवत और शुद्ध ऋषभ का प्रयोग होता है। इसके आरोह के स्वर हैं; नि, सा, ग॒, म॑, प, नि, सां और अवरोह के स्वर हैं; सां, नि, ध, प, म॑, ग॒, रे, सा। राग मुल्तानी के कोमल ऋषभ और कोमल धैवत स्वरों को शुद्ध स्वरों में परिवर्तित किया जाए तो राग मधुवन्ती का दर्शन होता है। इस राग के स्वर; ग॒, म॑, प, ग॒, व्यक्ति को निराशा का अनुभव कराने के पश्चात; ग॒, रे, सा स्वर उम्मीद का बोध कराते हैं। दिन के पूर्वाह्न और मध्याह्न में काफी परिश्रम करने के बाद भी जब निराशा दिखाई पड़ती है, मनोबल डगमगाने लगता है, तब मधुवन्ती के स्वर उसे दिलासा और सहानुभूति प्रदान करके सही दिशा दिखाते हैं और मनोबल को सशक्त करते हैं। इसके गायन और वादन का सटीक समय दिन में 3 बजे से 3-30 बजे तक है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। व्यक्ति का डिप्रेशन, चिन्ताविकृति और निराशा जब चरम सीमा पर हो तो राग मधुवन्ती के गायन, वादन अथवा श्रवण का सेवन यदि कराया जाए तो अवश्य शान्ति मिलेगी। इस राग के स्वर पीड़ित की असामान्य मनःस्थिति रूपी बर्फ को अपनी शीतल आँच से धीरे-धीरे पिघला देंगे और उसे शान्ति मिलेगी। उपचार की यह प्रक्रिया कम से कम एक माह तक जारी रखें। आइए, अब हम आपको सितार पर बजाया राग मधुवन्ती की एक रचना सुनवाते हैं। विश्वविख्यात संगीतज्ञ और सितार वादक पण्डित रविशंकर ने इसे प्रस्तुत किया है।

राग मधुवन्ती : सितार पर आलापचारी और गत : पण्डित रविशंकर


राग मधुवन्ती का सम्बन्ध तोड़ी थाट से मान लिया जाता है। इसमें गान्धार स्वर कोमल, मध्यम स्वर तीव्र और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित होता है तथा अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इसलिए इस राग की जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। राग मधुवन्ती का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। इसके गायन और वादन का समय दिन के तीसरे प्रहर में माना जाता है। राग मधुवन्ती एक नया राग है, जिसकी रचना राग मुल्तानी में ऋषभ और धैवत स्वर को कोमल से शुद्ध करने से हुई है। वर्तमान समय में यह राग मुल्तानी की अपेक्षा अधिक लोकप्रिय है। राग मुल्तानी के समान इस राग में भी मन्द्र निषाद स्वर से आगे बढ़ते समय गान्धार स्वर पर मध्यम स्वर का कण लेने के बाद ही ऊपर बढ़ते हैं। इस राग के वादी-संवादी और गायन-वादन समय में विरोधाभास है। वादी-संवादी की दृष्टि से यह उत्तरांग प्रधान राग होना चाहिए, किन्तु गायन समय की दृष्टि से यह पूर्वांग प्रधान राग है। राग की रंजकता बढ़ाने के लिए कभी-कभी अवरोहात्मक स्वरों में कोमल निषाद का अल्प प्रयोग कर लिया जाता है। थाट की दृष्टि यह दस थाट में से किसी भी थाट के अनुकूल नहीं है, फिर भी इसे तोड़ी थाट का राग मान लिया गया है। दक्षिण भारतीय संगीत प्रणाली में राग मधुवन्ती धर्मावती मेल के उपयुक्त है। कुछ विद्वान इसे राग अम्बिका नाम से भी पुकारते हैं। अब हम आपको वर्ष 1973 में प्रदर्शित फिल्म “दिल की राहें” से राग मधुवन्ती पर आधारित एक गीत लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। गीतकार नक्श लायलपुरी के लिखे इस गीत के संगीतकार मदन मोहन हैं। गीत के आरम्भ में मदन मोहन की आवाज़ में गीत की भावाभिव्यक्ति प्रस्तुत की गई है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग मधुवन्ती : “रस्म-ए-उल्फ़त को निभाएँ तो निभाएँ कैसे...” : लता मंगेशकर : फिल्म – दिल की राहें



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 374वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको छठे दशक की एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 380वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस उस्ताद गायक के स्वर है।?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 23 जून, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 376वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 372वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1971 में प्रदर्शित फिल्म “शर्मीली” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – पटदीप, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – रूपकताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी महत्त्वाकांक्षी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की तीसरी कड़ी में आपने कुछ शारीरिक और मनोशारीरिक रोगों के उपचार में सहयोगी राग मधुवन्ती का परिचय प्राप्त किया और इस राग में पिरोया पंडित रविशंकर के सितार पर आलापचारी और एक गत का रसास्वादन किया। इसके साथ ही इसी राग पर आधारित फिल्म “दिल की राहें” का एक फिल्मी गीत कोकिलकण्ठी लता मंगेशकर के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : पं. श्रीकुमार मिश्र   
सम्पादन व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग मधुवन्ती : SWARGOSHTHI – 374 : RAG MADHUVANTI : 17 जून, 2018

Sunday, June 25, 2017

राग कामोद : SWARGOSHTHI – 323 : RAG KAMOD




स्वरगोष्ठी – 323 में आज

संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन – 9 : राग कामोद

रोशन की जन्मशती वर्ष में मिश्र बन्धुओं और लता मंगेशकर से कामोद की बन्दिश सुनिए




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की जारी श्रृंखला “संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन” की नौवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम फिल्म जगत में 1948 से लेकर 1967 तक सक्रिय रहे संगीतकार रोशन के राग आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। रोशन ने भारतीय फिल्मों में हर प्रकार का संगीत दिया है, किन्तु राग आधारित गीत और कव्वालियों को स्वरबद्ध करने में उन्हें विशिष्टता प्राप्त थी। भारतीय फिल्मों में राग आधारित गीतों को स्वरबद्ध करने में संगीतकार नौशाद और मदन मोहन के साथ रोशन का नाम भी चर्चित है। इस श्रृंखला में हम आपको संगीतकार रोशन के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों में से कुछ गीतों को चुन कर सुनवा रहे हैं और इनके रागों पर चर्चा भी कर रहे हैं। इस परिश्रमी संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। 14 जुलाई 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के परिवार में जन्मे रोशन का रूझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे की और न होकर संगीत की ओर था। संगीत की ओर रूझान के कारण वह अक्सर फिल्म देखने जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने एक फिल्म ‘पूरन भगत’ देखी। इस फिल्म में पार्श्वगायक सहगल की आवाज में एक भजन उन्हें काफी पसन्द आया। इस भजन से वह इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने यह फिल्म कई बार देख डाली। ग्यारह वर्ष की उम्र आते-आते उनका रूझान संगीत की ओर हो गया और वह पण्डित मनोहर बर्वे से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मनोहर बर्वे स्टेज के कार्यक्रम को भी संचालित किया करते थे। उनके साथ रोशन ने देशभर में हो रहे स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मंच पर जाकर मनोहर बर्वे जब कहते कि “अब मैं आपके सामने देश का सबसे बडा गवैया पेश करने जा रहा हूँ” तो रोशन मायूस हो जाते क्योंकि “गवैया” शब्द उन्हें पसन्द नहीं था। उन दिनों तक रोशन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि गायक बना जाये या फिर संगीतकार। कुछ समय के बाद रोशन घर छोडकर लखनऊ चले गये और पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी द्वारा स्थापित मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में प्रवेश ले लिया और कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के मार्गदर्शन में विधिवत संगीत की शिक्षा लेने लगे। पाँच वर्ष तक संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह मैहर चले आये और उस्ताद अलाउदीन खान से संगीत की शिक्षा लेने लगे। एक दिन अलाउदीन खान ने रोशन से पूछा “तुम दिन में कितने घण्टे रियाज करते हो। ” रोशन ने गर्व के साथ कहा ‘दिन में दो घण्टे और शाम को दो घण्टे”, यह सुनकर अलाउदीन बोले “यदि तुम पूरे दिन में आठ घण्टे रियाज नहीं कर सकते हो तो अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से चले जाओ”। रोशन को यह बात चुभ गयी और उन्होंने लगन के साथ रियाज करना शुरू कर दिया। शीघ्र ही उनकी मेहनत रंग आई और उन्होंने सुरों के उतार चढ़ाव की बारीकियों को सीख लिया। इन सबके बीच रोशन ने उस्ताद बुन्दु खान से सांरगी की शिक्षा भी ली। उन्होंने वर्ष 1940 में दिल्ली रेडियो केंद्र के संगीत विभाग में बतौर संगीतकार अपने कैरियर की शुरूआत की। बाद में उन्होंने आकाशवाणी से प्रसारित कई कार्यक्रमों में बतौर हाउस कम्पोजर भी काम किया। वर्ष 1948 में फिल्मी संगीतकार बनने का सपना लेकर रोशन दिल्ली से मुम्बई आ गये। श्रृंखला की नौवीं कड़ी में आज हमने 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘चित्रलेखा’ का एक खयालनुमा गीत चुना है, जिसे रोशन ने राग कामोद में निबद्ध किया है। यह गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में प्रस्तुत है। इसके साथ ही हम इसी राग में एक खयाल पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।



लता मंगेशकर
रोशन ने अपनी कई फिल्मों में रागों की बन्दिशों को फिल्मी गीत के रूप में शामिल किया था। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में हमने राग गौड़ मल्हार की एक बन्दिश आपके लिए प्रस्तुत कर चुके हैं। आज की कड़ी में भी हम आपको रोशन द्वारा चुनी गई राग कामोद की बन्दिश का रसास्वादन करा रहे हैं। यह राग कामोद की एक परंपरागत बन्दिश है, उसका उपयोग फिल्म में भी हुआ है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा के चर्चित कथानक ‘चित्रलेखा’ पर आधारित 1964 में इसी नाम से फिल्म बनी थी, जिसमें यह बन्दिश शामिल की गई थी। फिल्म के गीतकार साहिर लुधियानवी हैं, जिन्होने राग कामोद की मूल पारम्परिक बन्दिश की स्थायी के शब्दों को यथावत रखते हुए अन्तरों में परिवर्तन किया है। फिल्म में यह गीत लता मंगेशकर ने रोशन के संगीत निर्देशन में गाया था। संगीतकार रोशन ने साहिर का यह गीत राग कामोद के स्वरों में संगीतबद्ध किया है। फिल्म ‘चित्रलेखा’ के गीतों में लोकप्रियता के साथ-साथ रचनात्मकता का गुण भी उपस्थित है। फिल्म में रोशन के स्वरबद्ध किये कई लाजवाब गीत हैं। साहिर लुधियानवी और रोशन की जोड़ी ने -“संसार से भागे फिरते हो, भगवान को तुम क्या पाओगे...” सुन कर यह कहना कठिन है कि साहिर लुधियानवी के शब्द प्रभावी हैं या रोशन की धुन। मुहम्मद रफी की आवाज़ में राग यमन कल्याण पर आधारित गीत –“मन रे तू काहे न धीर धरे...”, राग कलावती पर आधारित और आशा भोसले व उषा मंगेशकर के स्वरों में –“काहे तरसाए जियरा...”, लता मंगेशकर की आवाज़ में –“सखी री मेरा मन उलझे तन डोले...” रंजकता की दृष्टि से श्रेष्ठ रचनाएँ हैं। इसी फिल्म में रोशन ने राग कामोद की एक पारम्परिक बन्दिश को थोड़े शाब्दिक परिवर्तन के साथ फिल्मी गीत का रूप दिया था। मूल बन्दिश के अन्तरे की पंक्तियाँ हैं –“चमक बिजुरी मेहा बरसे...” जबकि फिल्म गीत का अन्तरा है –“अलकों में कुण्डल डालो और देह सुगन्ध बसा लों...”। मूल बन्दिश वर्षा ऋतु का गीत है जबकि साहिर लुधियानवी ने इसे श्रृंगार रस प्रधान गीत बना दिया। अब आप लता मंगेशकर की आवाज़ में राग कामोद की इस खयाल रचना का फिल्मी रूप सुनिए।

राग कामोद : ‘एरी जाने न दूँगी...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – चित्रलेखा



राजन और साजन मिश्र
आज के अंक में हम आपसे दोनों मध्यम स्वरों से युक्त राग कामोद पर चर्चा कर रहे हैं। कल्याण थाट और कल्याण अंग से संचालित होने वाले इस राग को कुछ गायक प्राचीन ग्रन्थकारों के आधार पर बिलावल थाट के अन्तर्गत भी मानते हैं। औड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। तीव्र मध्यम का अल्प प्रयोग केवल आरोह में पंचम के साथ और शुद्ध मध्यम का प्रयोग आरोह और अवरोह दोनों में किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग कामोद के आरोह के स्वर हैं- सा रे प म(तीव्र) प ध प नि ध सां तथा अवरोह के स्वर हैं- सां नि ध प म(तीव्र) प ध प ग म(शुद्ध) रे सा। राग वर्गीकरण के प्राचीन सिद्धान्तों के अनुसार राग कामोद को राग दीपक की पत्नी माना जाता है। इस राग का गायन-वादन पाँचवें प्रहर अर्थात रात्रि के प्रथम प्रहर में किया जाता है। श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए कामोद आदर्श राग है। इस राग में ऋषभ-पंचम स्वरों की संगति अधिक होती है। ऋषभ से पंचम को जाते समय सर्वप्रथम मध्यम से मींड़युक्त झटके के साथ ऋषभ स्वर पर आते हैं और फिर पंचम को जाते हैं। यह ध्यान रखना चाहिए कि इस प्रक्रिया में पंचम के साथ ऋषभ की संगति कभी न हो। राग हमीर और केदार के समान राग कामोद में भी कभी-कभी कोमल निषाद का प्रयोग अवरोह में राग की रंजकता बढ़ाने के लिए किया जाता है। राग कामोद में गान्धार का प्रयोग कभी भी सपाट नहीं बल्कि वक्र प्रयोग होता है। राग हमीर और केदार इसके समप्रकृति राग हैं। राग हमीर के समान कामोद राग के वादी और संवादी स्वर रागों के समय सिद्धान्त की दृष्टि से खरा नहीं उतरता। रागों के समय सिद्धान्त के अनुसार जो राग दिन के पूर्व अंग में उपयोग किये जाते हैं, उनका वादी स्वर सप्तक के पूर्व अंग में होना चाहिए। कामोद राग को इस नियम का अपवाद माना गया है, क्योंकि यह रात्रि के प्रथम प्रहर गाया जाता है और इसका वादी स्वर पंचम है। यह स्वर सप्तक के उत्तरांग का एक स्वर है। अब आपको इस राग की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध युगल गायक पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र की आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। राग कामोद की यह अत्यन्त प्रचलित परम्परागत रचना है, जिसके बोल हैं- ‘ए री जाने न दूँगी...’। इस प्रस्तुति में तबला संगति सुधीर पाण्डेय ने और हारमोनियम संगति महमूद धौलपुरी ने की है। अब आप पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वरों में राग कामोद की इस पारम्परिक रचना को सुनिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग कामोद : ‘एरी जाने न दूँगी...’ : पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र 




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 323वें अंक की पहेली में आज हम आपको वर्ष 1965 में प्रदशित रोशन की एक पुरानी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 330वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत के इस अंश में आपको किस राग का आधार परिलक्षित हो रहा है?

2 – रचना के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है?

3 – यह किस मशहूर पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 1 जुलाई, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 325वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 321वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘दिल ही तो है’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – मन्ना डे

इस अंक की पहेली में हमारे सभी पाँच नियमित प्रतिभागियों ने दो-दो अंक अपने खाते में जोड़ लिये हैं। वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी इस सप्ताह के विजेता हैं। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ के इस नौवें अंक में हमने आपके लिए राग कामोद पर आधारित फिल्म ‘आम्रपाली’ से रोशन के एक गीत और इस राग की शास्त्रीय संरचना पर चर्चा की और इस राग का एक परम्परागत उदाहरण पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वरों में प्रस्तुत किया। 'स्वरगोष्ठी' के 322वें  अंक में हमने राग भैरवी की चर्चा की थी। इस अंक में आपको राग भैरवी पर आधारित एक कालजयी गीत का रसास्वादन कराया गया था। हमारी एक नियमित पाठक और श्रोता पेंसिलवेनिया, अमेरिका की विजया राजकोटिया ने उसी गीत के सितार वादन का एक वीडियो भेजा है। गीत -"लागा चुनरी में दाग..." को सितार पर चन्द्रशेखर फानसे और उनके शिष्य प्रस्तुत कर रहे हैं। आप पहले यह संगीत सुनिए। 


रोशन के संगीत पर चर्चा के लिए हमने फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। हम इन दोनों विद्वानों का आभार प्रकट करते हैं। आगामी अंक में हम भारतीय संगीत जगत के सुविख्यात संगीतकार रोशन के एक अन्य राग आधारित गीत पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, May 13, 2017

चित्रकथा - 18: उस्ताद रईस ख़ाँ के सितार का फ़िल्म संगीत में योगदान


अंक - 18

उस्ताद रईस ख़ाँ के सितार का फ़िल्म संगीत में योगदान

"मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है.." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 


6 मई को सुप्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद रईस ख़ाँ साहब के निधन हो जाने से सितार जगत का एक उज्ज्वल नक्षत्र अस्त हो गया। शास्त्रीय संगीत जगत में उनका जितना योगदान रहा है, वैसा ही योगदान उन्होंने सिने संगीत जगत में भी दिया है। उनके सितार के टुकड़ों से सजे हिन्दी फ़िल्मी गीत जैसे खिल उठते थे। आइए आज ’चित्रकथा’ में उस्ताद रईस ख़ाँ साहब को याद करते हुए उन हिन्दी फ़िल्मी गीतों की बातें करें जिनमें उन्होंने अपने सितार और उंगलियों के जादू चलाए थे। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है उस्ताद रईस ख़ाँ साहब की पुण्य स्मृति को।




उस्ताद रईस ख़ाँ
(25 नवंबर 1939 - 6 मई 2017)

2017 का वर्ष सितार जगत के लिए अब तक एक दुर्भाग्यपूर्ण वर्ष रहा है। 4 जनवरी को उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ, 12 अप्रैल को पंडित जयराम आचार्य, और अब 6 मई को उस्ताद रईस ख़ाँ साहब। सितार जगत के तीन तीन उज्वल नक्षत्र अस्त हो गए एक के बाद एक, और पैदा हो गया एक महाशून्य शास्त्रीय संगीत जगत में। हलीम जाफ़र ख़ाँ और जयराम आचार्य ही की तरह रईस ख़ाँ साहब का भी फ़िल्म संगीत में महत्वपूर्ण योगदान रहा। हालाँकि संगीतकार मदन मोहन के साथ ख़ाँ साहब ने सबसे उम्दा काम किया, और क्यों ना करते, दोनों जिगरी दोस्त जो थे, लेकिन अन्य संगीतकारों के लिए भी ख़ाँ साहब ने सितार बजाया और गीतों के अन्तराल संगीत को ऐसा सुरीला अंजाम दिया कि इन तमाम गीतों की इन सितार की ध्वनियों के बग़ैर कल्पना भी नहीं की जा सकती। सितार के इन स्वर्गिक ध्वनियों को अगर इन गीतों से निकाल दिया जाए तो शायद इन गीतों की आत्माएँ ही चली जाएँगी। 1964 की फ़िल्म ’ग़ज़ल’ की ग़ज़ल "नग़मा-ओ-शेर की सौग़ात किसे पेश करूँ" में साहिर के बोल, मदन मोहन की तर्ज़, और लता मंगेशकर की आवाज़ के साथ-साथ उस्ताद रईस ख़ान के सितार के टुकड़ों ने इस ग़ज़ल को अमर बना दिया। इसके इन्टरल्युड्स में सारंगी और वायलिन तो थे ही, पर सबसे ज़्यादा प्रॉमिनेन्स ख़ाँ साहब के सितार को ही मिला। 1966 की फ़िल्म ’मेरा साया’ में तो जैसे ख़ाँ साहब का सितार अपने पूरे शबाब पर था। "नैनों में बदरा छाये" का शुरुआती संगीत से भला कौन अंजान है! राजस्थान के किसी जलमहल का दृश्य है, सुनिल दत्त महल के छत पर धूप में लेटे हैं, छत से चारों तरफ़ झील के नज़ारे हैं। ऐसे में संतूर की ध्वनियाँ बजने लगती हैं और जल्द ही संतूर पर सितार के चमत्कारी तानें हावी हो जाते हैं। और फिर सितार पर शुरुआती धुन बजने के बाद गीत शुरु होता है "नैनों में बदरा छाए, बिजली सी चमके हाए"। इस गीत को सुनते हुए अगर यह शुरुआती संगीत ही न सुन पाए तो जैसे यह सुनना अधूरा ही रह गया। इन्टरल्युड्स में भी क्या ख़ूब संतूर और सितार की जुगलबन्दी है, जैसे कोई स्वर्गिक अनुभूति हो रही हो! जानकारी के लिए बता दें कि इस गीत में संतूर पंडित शिव कुमार शर्मा ने बजाया था। 1967 की फ़िल्म ’दुल्हन एक रात की’ के गीत "मैंने रंग ली आज चुनरिया सजना तोरे रंग में" में ख़ाँ साहब के सितार का जादू सुनाई देता है। नायिका को प्रेम हो गया है, इस सिचुएशन में यह गीत शुरु होता है सितार के एक पीस से। ख़ाँ साहब ने इस पीस के ज़रिए नायिका के मन के भाव को ऐसे उजागर किया है कि पीस सुनते ही जैसे नायिका का दिल हमें दिखाई देने लगता है। इस गीत के इन्टरल्युड्स और गीत के अन्त में भी सितार के पीसेस हैं, और अन्त में तो गीत के मुखड़े की धुन ही सितार पर बजती है। इसी फ़िल्म का अन्य गीत है "सपनों में अगर तुम मेरे आओ तो सो जाऊँ"। लता जी की आवाज़ में इस लोरी की शुरुआत ख़ाँ साहब के सितार से होती है। अन्तराल संगीत में सितार के साथ-साथ अन्य वाद्यों का भी प्रयोग हुआ है, पर सितार के टुकड़ों को सुनते हुए यकीन हो जाता है कि ज़रूर किसी उस्ताद की उंगलियाँ चली होंगी।

उस्ताद रईस ख़ाँ साहब उस्ताद विलायत ख़ाँ साहब के भतीजे थे। विलायत ख़ाँ साहब मदन जी के दोस्त हुआ करते थे। इस तरह से रईस ख़ाँ मदन मोहन के सम्पर्क में आये और पहली बार सन 1964 की फ़िल्म 'पूजा के फूल' के गीत "मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है" में सितार बजाया था। विविध भारती के लोकप्रिय कार्यक्रम 'उजाले उनकी यादों के' के शीर्षक संगीत में इसी गीत के शुरुआती संगीत का अंश सुनाई देता है जिसे रईस ख़ाँ साहब ने बजाया था। "मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है..." की कहानी। गाना रेकॉर्ड हो चुका था और मदन मोहन इस गाने से बहुत ख़ुश भी थे। फिर ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने इस गाने को दोबारा रेकॉर्ड करने का फ़ैसला ले लिया? इस गीत में छोटे-छोटे इन्टरल्यूड्स रईस ख़ान ने बजाए। पर मुख्य रूप से पंडित शिव कुमार शर्मा के सन्तूर को बहुत प्रॉमिनेन्टली इस्तमाल किया गया। रेकॉर्डिंग् हो गई, सबकुछ सही हो गया। अब हुआ यूं कि एक दिन मदन मोहन ने यह गाना रईस ख़ान को दोबारा सुनवाया। गाने का टेप बज रहा था, तभी रईस ख़ान ने अपना सितार उठाया, और गाने के साथ सितार छेड़ने लगे। इस बार नए नए इन्टरल्यूड्स बजने लगे। नई सुर, नई तरकीबें। रईस ख़ान के सितार से इस तरह के सुर सुन कर मदन मोहन का दिल हो गया बाग़-बाग़। उन्होंने फ़ौरन AVM Productions को फ़ोन लगाया और कहा कि वो इस गाने को दोबारा रेकॉर्ड करना चाहते हैं। मदन मोहन रईस ख़ान के बजाए सितार के पीसेस से इतना मुतासिर हो गए कि जिस गाने को रेकॉर्ड करके मुतमाइन थे, उस गाने को एक बार फिर से रेकॉर्ड करने की ठान ली।

लता और मदन मोहन की ग़ज़लों को ख़ाँ साहब ने ख़ूबसूरत जामा तो पहनाया ही, कुछ रफ़ी साहब और मदन जी के नग़मों को भी उन्होंने सँवारा। 1967 की फ़िल्म ’नौनिहाल’ की ग़ज़ल "तुम्हारी ज़ुल्फ़ के साये में शाम कर लूँगा" के इन्टरल्युड्स में क्रम से वायलीन, सारंगी और सितार के पीसेस सुनाई पड़ते हैं, जिनमें सितार वाला हिस्सा सबसे लम्बा। मदन मोहन का यह सितार से इश्क़ और ख़ाँ साहब के हुनर पे ऐतबार का ही नतीजा था। 1969 की फ़िल्म ’चिराग़’ में "छायी बरखा बहार पड़े अंगना फुहार" एक दीर्घ गीत है जिसकी अवधि 7 मिनट से उपर है। इस गीत के दीर्घ शुरुआती संगीत में सितार नहीं है, पर पहले अन्तराल संगीत में ख़ाँ साहब तशरीफ़ लाते हैं और क्या ख़ूब लाते हैं! इसी तरह से 1970 की फ़िल्म ’हीर रांझा’ के ग़मज़दा नग़मे "दो दिल टूटे दो दिल हारे" में भी ख़ाँ साहब के सुन्दर सितार का प्रयोग हुआ है। 1970 में ’दस्तक’ फ़िल्म की ग़ज़ल "हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह" एक और कालजयी रचना है। वीणा और सितार की क्या ख़ूबसूरत समावेश है इस ग़ज़ल में। ख़ाँ साहब के सितार के इन्टरल्युड़्स ऐसे प्रॉमिनेन्टली उभर कर सामने आते हैं कि ग़ज़ल के बोल और गायकी को सीधा सीधा टक्कर देते हैं। इससे पहले जितनी रचनाओं की हमने बात की, उन सब में सारंगी, संतूर और वायलीन भी शामिल थे, पर ’दस्तक’ की यह ग़ज़ल पूर्णत: सितार पर आधारित है, हाँ, पार्श्व में वीणा का आधार ज़रूर है। इसी फ़िल्म की शास्त्रीय रचना "बैयाँ ना धरो हो बलमा" भी एक कालजयी गीत है और फ़िल्म-संगीत के शास्त्रीय आधारित गीतों में इसका शुमार शीर्ष के गीतों में होता है। और इस गीत में भी ख़ाँ साहब का सितार कूट कूट कर भरा हुआ है। सितार और तबला, बस! कितनी सीधी, कितनी सरल रचना है, वाद्यों का कुंभ नहीं, गायकी में कोई दिखावा नहीं, सुन्दर काव्यात्मक बोल, और क्या चाहिए एक सुरीले गीत में। 1973 में ’हँसते ज़ख़्म’ फ़िल्म की ग़ज़ल "आज सोचा तो आँसू भर आए" शुरु होती है उस्ताद रईस ख़ाँ साहब के सितार के एक उदासी भरे तान से। ग़मज़दा इस ग़ज़ल के इन्टरल्युड़्स में मूड को बरकरार रखते हुए एक ऐसा दर्द भरा सुर छेड़ा जो बिल्कुल जैसे कलेजा चीर कर रख देता है। एक और ख़ास बात यह कि इस ग़ज़ल के तीन इन्टरल्युड्स में उन्होंने अलग अलग धु्ने बजाई है। एक और उल्लेखनीय लता - मदन मोहन गीत है जो किसी फ़िल्म में तो नहीं जा सका लेकिन 2009 में जारी ’तेरे बग़ैर’ ऐल्बम में इसे शामिल किया गया। राजेन्द्र कृष्ण का लिखा यह गीत है "खिले कमल सी काया तेरी"। इस गीत में ख़ाँ साहब ने सितार ने उतनी ही शहद घोली जितनी लता जी की आवाज़ ने। सुरीली आवाज़ और सुरीले साज़ का इससे बेहतर जुगलबन्दी कुछ और नहीं हो सकती।

1973 की फ़िल्म ’दिल की राहें’ की ग़ज़ल "रस्म-ए-उल्‍फत को निभाएं तो निभाएं कैसे में रईस खां साहब का सितार फिर एक बार अपने पूरे शबाब पर है। मदन मोहन सितार से इस तरह जज़्बाती रूप से जुड़े थे और ख़ास तौर से रईस ख़ाँ के साथ उनकी टीमिंग्‍ कुछ ऐसी जमी थी कि 1974 में जब किसी ग़लत फ़हमी की वजह से एक दूसरे से दोनो अलग हो गये तब मदन मोहन ने अपने गीतों में सितार का प्रयोग ही बन्द कर दिया हमेशा के लिए। वो इतने ही हताश हुए थे। इस वजह से मदन मोहन के अन्तिम दो वर्षों, अर्थात्‍ 1974 और 1975 में 'मौसम', 'साहिब बहादुर' आदि फ़िल्मों के गीतों में हमें सितार सुनने को नहीं मिले। नक्श साहब की ख़ुशक़िस्मती थी कि 1973 में 'दिल की राहें' बन गई और उनकी इस अमर ग़ज़ल को रईस ख़ाँ साहब के सितार ने चार चाँद लगाये। "रस्म-ए-उल्फ़त" के अलग अलग अन्तरों  के इन्टरल्युड्स में सितार के अलग अलग तरह के टुकड़ों ने जैसे इस ग़ज़ल को ज़ेवर पहना दिए हों। जब ये टुकड़े बजते हैं तब ऐसा लगता है जैसे कोई कॉनसर्ट सुन रहे हों! इस ग़ज़ल के आख़िर में जिस तेज़ रफ़्तार में ख़ाँ साहब की उंगलियाँ सितार पर चलती हैं, क्या समा बंध जाता है, क्या कलाकारी है, क्या हुनर है, वाह! हाल ही में मदन मोहन की पुत्री संगीता जी से पता चला कि बाद में मदन मोहन जी ने उस्ताद शमिम अहमद ख़ाँ से सितार सीखा और अपनी आख़िर की कुछ फ़िल्मों में अहमद साहब से बजवाया। लेकिन ऐसा क्या हुआ था कि उस्ताद रईस ख़ाँ साहब के साथ मदन जी की बरसों की जोड़ी, बरसों की दोस्ती टूट गई? हुआ यूं कि एक मोड़ पर मदन मोहन को यह लगने लगा कि उनकी महफ़िलों में रईस ख़ान का सिर्फ़ दोस्ती की ख़ातिर सितार बजाना ठीक नहीं है। रईस ख़ान को वो इस तरह बुला कर, सितर बजवा कर दोस्ती का ग़लत फ़ायदा उठा रहे हैं। इसलिए उन्होंने रईस ख़ान को उनका वाजिब मेहनताना देने की सोची। मगर परेशानी यह थी कि अपने दोस्त से पैसों की बात कैसे करे? सो उन्होंने 1973 की एक महफ़िल के बाद अपने मैनेजर से कहा कि वो ख़ान साहब से उनकी फ़ीस के बारे में पूछेंगे। मैनेजर ने रईस ख़ान से पूछा। रईस ख़ान ने उस वक़्त तो कुछ नहीं कहा, मगर उन्हें यह बात बहुत चुभ गई और उन्होंने इसे अपना अपमान मान लिया। अपने दोस्त मदन मोहन से वो इस तरह की उम्मीद नहीं कर रहे थे। रईस ख़ान जितने बेहतरीन कलाकार थे उतने ही तुनक मिज़ाज भी थे। वो चुपचाप बैठने वाले नहीं थे। बात चुभ गई थी। उन्होंने कुछ दिन बाद मदन मोहन को फ़ोन किया और कहा कि उनके एक दोस्त के घर में एक शादी है और शादी के जलसे में गाने के लिए आपको बुलाया है। "तो मदन भाई, आप कितने पैसे लेंगे?" अब चौंकने की बारी मदन मोहन की थी। बहुत अजीब लगा मदन मोहन को कि रईस ख़ान ने उन जैसे कलाकार को शादी में गाने के लिए कह कर उनकी तौहीन कर रहा है। यह तौहीन अब मदन मोह बर्दाश्त नहीं कर सके। बस यहीं से दोनो के मन में ऐसी खटास पड़ी कि इन दोनों अज़ीम फ़नकारों का साथ सदा के लिए ख़त्म हो गया।

ऐसा नहीं कि उस्ताद रईस ख़ाँ साहब ने केवल मदन मोहन की रचनाओं में ही सितार का अमूल्य योगदान दिया हो। 1961 की फ़िल्म ’गंगा जमुना’ में नौशाद साहब का संगीत था। लता जी की आवाज़ में "ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे साजना मोरे कान का बाला" बेहद लोकप्रिय रहा। गीत के शुरुआती संगीत में ख़ाँ साहब का सितार गीत का मूड तैयार कर देता है। अन्तराल संगीत में बांसुरी के साथ सितार का संगम भी बेहद दिलकश बन पड़ा है इस गीत में। 1972 में जब ’पाक़ीज़ा’ में ग़ुलाम मोहम्मद साहब के इन्तकाल के बाद नौशाद साहब फ़िल्म का संगीत पूरा कर रहे थे, तब पार्श्व-संगीत और शीर्षक-संगीत के लिए ख़ाँ साहब को ही चुना। क़रीब क़रीब चार मिनट का शीर्षक संगीत घुंघरू और तबले से शुरु ज़रूर होती है, लेकिन जल्दी ही ख़ाँ साहब का सितार हर अन्य वाद्य पर हावी हो जाता है। क्या फिरी हैं उनकी उंगलियाँ सितार पर, वाह! सारंगी, संतूर, घुंघरू और तबले के साथ सितार की यह महफ़िल फ़िल्म के नग़मों और ग़ज़लों से कम दिलकश नहीं है। और फिर सोने पे सुहागा, इस शीर्षक संगीत के मध्य भाग से लता जी की आवाज़ में आलाप और ताल गायन है जो इस पूरे आयोजन पे चार चाँद लगा देती है।

ओ. पी. नय्यर एक ऐसे संगीत रहे जिनके गीतों में आधुनिक शैली के होते हुए भी आत्मा हिन्दुस्तानी संगीत की ही रही और उन्होंने पाश्चात्य साज़ों के साथ-साथ भारतीय वाद्यों का भी बहुतायत में प्रयोग किया। 1962 की फ़िल्म ’एक मुसाफ़िर एक हसीना’ का गीत "आप यूंही अगर हमसे मिलते रहे, देखिए एक दिन प्यार हो जाएगा" रफ़ी-आशा का एक यादगार डुएट है। इस गीत में सबसे उल्लेखनीय वाद्य हैं सारंगी और सितार, जिसे रईस ख़ाँ साहब ने बजाया था।  "कैसी जादूगरी की अरे जादूगर" इस गीत की एक पंक्ति है; इस पंक्ति को सुनते हुए मन में यह ख़याल आता है कि यह शायद ख़ाँ साहब को ही कहा गया है। गीत के एक अन्तराल संगीत में पंख फैला कर एक मोर को नाचते हुए दिखाया जाता है जिसके पार्श्व में ख़ाँ साहब का सितार बज रहा है। मोर के साथ-साथ जैसे सितार की ध्वनियाँ भी झूम रही हैं। 1964 की फ़िल्म ’कशमीर की कली’ में एक बार फिर नय्यर साहब ने ख़ाँ साहब के सितार से सजाया "इशारों इशारों में दिल लेने वाले" गीत को। अन्तरालों में सितार और घुंघरू का एक साथ प्रयोग हुआ है। ये सभी टुकड़े जैसे इन गीतों की पहचान हैं। और नय्यर साहब के गीतों की यह ख़ासियत भी है कि उनके गीतों में हर साज़ और हर टुकड़ा बहुत ही प्रॉमिनेन्ट सुनाई देता है। इसी तरह से 1965 की फ़िल्म ’मेरे सनम’ का आशा भोसले का गाया सदाबहार गीत "जाइए आप कहाँ जाएंगी" में भी ख़ाँ साहब का सितार है। शुरुआती धुन में संतूर है, लेकिन अन्तराल संगीत में सितार के वो टुकड़े हैं जो इस गीत की पहचान भी हैं। 

1966 के वर्ष में रईस ख़ाँ साहब के सितार से सजे बहुत से गीत बने जिनमें से मदन मोहन की रचनाओं का ज़िक्र हम कर चुके हैं। इस वर्ष संगीतकार ख़य्याम के संगीत से सजी फ़िल्म आई ’आख़िरी ख़त’। फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत था "बहारों मेरा जीवन भी सँवारो"। पूरे गीत में सितार छाया हुआ है। मुखड़े में "बहारों" और "मेरा" शब्दों के बीच में सितार के छोटे टुकड़े का क्या सुन्दर प्रयोग हुआ है। अन्तराल संगीत में सितार और बांसुरी का सुन्दर संगम है। शंकर-जयकिशन के संगीत में पौराणिक विषय पर बनी फ़िल्म ’आम्रपाली’ को अपने गीत-संगीत के लिए याद किया जाता है। "तुम्हें याद करते करते जाएगी रैन सारी" गीत की जितनी तारीफ़ें की जाए कम होगी। क्या बोल, क्या धुन, क्या गायकी, क्या जज़्बात, सब लाजवाब; और उस पर उस्ताद ख़ाँ साहब के सितार का नशा जो अन्तरालों को एक अलग ही मुकाम तक लेकर गया है। यह संगीत जैसे स्वर्ग में रचा गया हो! ख़ाँ साहब के सितार ने हर जज़्बात को साकार किया है। कभी झूमते हुए मोर का उत्साह, कभी नए नए प्यार होने की ख़ुशी, और कभी बिरहा का दर्द, हर मौके के गीत में ख़ाँ साहब के सितार ने इतिहास रचा है। इसी वर्ष शंकर-जयकिशन के ही संगीत वाले एक और फ़िल्म ’तीसरी क़सम’ के एक गीत में ख़ाँ साहब का सितार सुनाई पड़ा। "सजनवा बैरी हो गए हमार" में मुकेश की आवाज़ ने जो दर्द पैदा की थी, उससे टक्कर लेकर ख़ाँ साहब के सितार ने भी दर्द भरे ऐसे तान छेड़े कि जिसने गीत के भाव, गीत के बोलों और गायकी को कॉम्प्लिमेण्ट किया।

संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनन्दजी ने भी ख़ाँ साहब के सितार को अपने गीतों में जगह दी। 1968 की कालजयी फ़िल्म ’सरस्वती चन्द्र’ के यादगार गीत "चंदन सा बदन चंचल चितवन" के शुरुआती संगीत में सितार का पीस इस गीत के पहचान और विशेषता है। इस गीत के दो संस्करण हैं और दोनों में उन्होंने दोनो में अलग अलग तरीक़े से सितार के सुरों को पिरोया है। संगीतकार जयदेव के सुरीले संगीत में 1977 की फ़िल्म ’आंदोलन’ में मीराबाई की लिखी एक सुन्दर रचना थी "पिया को मिलन कैसे होए री मैं जानु नाही"। नीतू सिंह पर फ़िल्माया यह ख़ूबसूरत गीत और भी ज़्यादा ख़ूबसूरत बन पड़ा ख़ाँ साहब के दीर्घ सितार के टुकड़ों से। जयदेव के गीतों में हमें अनर्थक साज़ों की भीड़ नहीं मिलती, एक या दो साज़ों को लेकर उनकी सीधी सरल रचनाएँ सुनने वालों के दिलों में घर कर लेती है। आशा भोसले की आवाज़ में यह रचना भी उन्हीं गीतों में से एक है। मूलत: सितार पर आधारित यह रचना दर्द भरा होते हुए भी बेहद आकर्षक और सुरीला है। 

70 के दशक में धूम मचाने वाले संगीतकारों में एक नाम लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल का है। 1971 की फ़िल्म ’महबूब की मेहन्दी’ आज केवल इसके गीतों के लिए याद की जाती है। फ़िल्म के लगभग सभी गीत मक़बूल हुए, जिनमें लता-रफ़ी के डुएट "इतना तो याद है मुझे कि उनसे मुलाक़ात हुई" को एल.पी के श्रेष्ठ लता-रफ़ी डुएट्स में गिना जाता है। बहुत कम लोगों को मालूम है कि इस लोकप्रिय गीत में भी उस्ताद रईस ख़ाँ साहब के सितार के टुकड़े थे। ख़ास कर गीत के दूसरे अन्तराल संगीत में लीना चन्दावरकर जब नृत्य कर रही है तब नृत्य-संगीत के रूप में ख़ाँ साहब का सितार ही बज रहा होता है। ख़ाँ साहब का पेशा भले सितार रहा है, लेकिन कई बार उन्होंने अपने सितार वादन के लिए निर्माता से अपनी पारिश्रमिक नहीं ली। ऐसा ही एक क़िस्सा जुड़ा है ’सत्यम शिवम् सुन्दरम्’ फ़िल्म के साथ। बात यह हुई कि एक सीन के लिए लक्ष्मी-प्यारे को उचित पार्श्व-संगीत नहीं सूझ रहा था। सीन शायद आपको याद हो, जब ज़ीनत अमान सुबह सुबह जलप्रपात के नीचे चल कर जाती हैं शशि कपूर से मिलने। उस समय वहाँ ख़ाँ साहब मौजूद थे जिन्होंने सितार पर एक पीस बजा कर सुनाया जिसे सुन कर राज कपूर सहित सभी लोग वाह वाह कर उठे। ’सत्यम शिवम सुन्दरम’ फ़िल्म के तमाम गीतों में भी ख़ाँ साहब के सुमधुर सितार की ध्वनियाँ शहद घोलती हुई सी लगती है। यह 1978 की फ़िल्म थी और इसी वर्ष लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के संगीत से सजी एक और फ़िल्म आई थी ’बदलते रिश्ते’। इसमें लता मंगेशकर और महेन्द्र कपूर का गाया एक शास्त्रीय संगीत आधारित रचना थी "मेरी साँसों को जो महका रही है"। गीत के पहले अन्तराल संगीत में अगर संतूर है तो दूसरे अन्तराल में मुख्यत: वायलिन है, लेकिन तीसरे अन्तराल में ख़ाँ साहब के सितार की लहरियाँ जैसे गीत का रुख़ ही मोड़ देती हैं। 

70 के दशक में ख़ाँ साहब ने शास्त्रीय संगीत के कॉनसर्ट्स में बजाना कुछ कम कर दिया था। लेकिन 80 के दशक के आते ही वो फिर एक बार उस तरफ़ सक्रीय हो उठे जब उस्ताद अली अकबर ख़ाँ साहब ने उन्हें अमरीका के कैलिफ़ोर्निया में बजाने के लिए आमन्त्रित किया। रईस ख़ाँ साहब हिन्दी फ़िल्मों से धीरे धीरे सन्यास ले लिए। 1979 में उन्होंने चौथी शादी की पाक़िस्तानी गायिका बिलक़ीस ख़ानुम से और 1986 वो उनके साथ पाक़िस्तान जा कर बस गए। आज ख़ाँ साहब हमारे बीच नहीं हैं। उनके बजाए सितार के तमाम कॉन्सर्ट्स की रेकॉर्डिंग्स और स्टुडियो रेकॉर्डिंग्स तो हमारे पास हैं ही, इनके साथ-साथ वो तमाम फ़िल्मी गीत भी हैं जिन्हें उनके सितार ने चार चाँद लगाए। उस्ताद रईस ख़ाँ की पुण्य स्मृति को ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ का नमन!


आपकी बात

’चित्रकथा’ के पिछले दो अंकों में हमने गीतकार नक़्श ल्यालपुरी के लिखे मुजरों पर लेख प्रकाशित की थी जिस पर हमें हमारे पाठकों की प्रतिक्रिया प्राप्त हुई हैं। आदियोग जी ने इस लेख को "शानदार" कह कर टिप्पणी की है तो रमेश शर्मा जी लिखते हैं - "बेहतरीन... नायाब मोतियों का संग्रह... हार्दिक बधाई स्वीकारिए!" संज्ञा टंडन जी लिखती हैं - "ग़ज़ब का शोध सुजॉय जी। धन्यवाद इस शानदार जानकारी के लिए।" और सर्वोपरि नक़्श साहब के सुपुत्रा राजन ल्यालपुरी जी ने इस लेख पर कहा है - "मैंने पहला भाग पढ़ा है, बहुत अच्छा है और सही जानकारी है।"


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, December 18, 2016

राग हमीर : SWARGOSHTHI – 297 : RAG HAMIR




स्वरगोष्ठी – 297 में आज

नौशाद के गीतों में राग-दर्शन – 10 : राग हमीर का रंग

“मधुबन में राधिका नाचे रे, गिरधर की मुरलिया बाजे...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” की दसवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज के अंक में हम आपसे राग हमीर पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला में हम भारतीय फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान नौशाद अली के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला का समापन हम अगले सप्ताह 25 दिसम्बर को नौशाद अली की 98वीं जयन्ती के अवसर पर करेंगे। 25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता वाहिद अली घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करते थे। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठते, साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। फिल्म प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ करता था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए माया नगरी बम्बई की ओर रुख किया।



नौशाद और  मोहम्मद  रफी
ज हम आपको नौशाद द्वारा राग हमीर के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाते है। यह गीत 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘कोहिनूर’ से लिया गया है। इसका संगीत नौशाद ने तैयार किया किया है और इसे उनके सर्वप्रिय गायक मोहम्मद रफी ने स्वर दिया है। नौशाद का संगीतकार जीवन 1939-40 से शुरू हुआ था। 1944 में एक फिल्म ‘पहले आप’ बनी थी। इस फिल्म में मोहम्मद रफी को पहली बार गाने का अवसर मिला था। यह गीत था –‘हिंदुस्तान के हम हैं हिंदुस्तान हमारा...’। इस गीत में श्याम, दुर्रानी और रफी के साथ अन्य आवाज़ें भी थी। इस गीत के बाद से लेकर मोहम्मद रफी के अन्तिम समय तक नौशाद के सर्वप्रिय गायक बने रहे। नौशाद के संगीत निर्देशन में मोहम्मद रफी ने अनेक राग आधारित गीत गाये हैं। इन्हीं में से फिल्म कोहिनूर का यह गीत भी है। गीत में राग हमीर के स्वरों का असरदार ढंग से पालन किया गया है। परदे पर यह गीत दिलीप कुमार पर फिल्माया गया है। गीत में एक स्थान पर द्रुत लय में मोहम्मद रफी को आकार में तानें लेनी थी, परन्तु यह मुश्किल काम वे कर नहीं पा रहे थे। नौशाद ने तानों का यह काम सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद अमीर खाँ से सम्पन्न कराया। गीत में सुप्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र खाँ का योगदान भी रहा। लीजिए, अब आप शकील बदायूनी का लिखा, तीनताल में निबद्ध यही गीत सुनिए, जिसके बोल हैं –‘मधुबन में राधिका नाचे रे...’

राग हमीर : ‘मधुबन में राधिका नाचे रे...’ : मोहम्मद रफी और उस्ताद अमीर खाँ : फिल्म कोहिनूर



उस्ताद  विलायत  खाँ
दिन के पाँचवें प्रहर या रात्रि के पहले प्रहर में गाने-बजाने वाला, दोनों मध्यम स्वर से युक्त एक राग है, हमीर। मूलतः राग हमीर दक्षिण भारतीय संगीत पद्यति से इसी नाम से उत्तर भारतीय संगीत में प्रचलित राग के समतुल्य है। राग हमीर को कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग में दोनों मध्यम का प्रयोग होने और तीव्र मध्यम का अल्प प्रयोग होने के कारण कुछ प्राचीन ग्रन्थकार और कुछ आधुनिक संगीतज्ञ इसे बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते हैं। ऐसा मानना तर्कसंगत भी है, क्योंकि इस राग का स्वरूप राग बिलावल से मिलता-जुलता है। किन्तु अधिकांश विद्वान राग हमीर को कल्याण थाट-जन्य ही मानते हैं। इस राग में दोनों मध्यम स्वर के साथ शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते है। राग की जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है, अर्थात आरोह और अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। यहाँ भी रागों के गायन-वादन के समय सिद्धान्त और व्यवहार में विरोधाभास है। समय सिद्धान्त के अनुसार जिन रागों का वादी स्वर पूर्व अंग का होता है उस राग को दिन के पूर्वांग अर्थात मध्याह्न 12 बजे से मध्यरात्रि 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाना चाहिए। इसी प्रकार जिन रागों का वादी स्वर उत्तर अंग का हो उसे दिन के उत्तरांग में अर्थात मध्यरात्रि 12 से मध्याह्न 12 बजे के बीच प्रस्तुत किया जाना चाहिए। परन्तु राग हमीर का वादी स्वर धैवत है, अर्थात उत्तर अंग का स्वर है। स्वर सिद्धांत के अनुसार इस राग को दिन के उत्तरांग में गाया-बजाना जाना चाहिए। परन्तु राग हमीर रात्रि के पहले प्रहर में अर्थात दिन के पूर्वांग में गाया-बजाया जाता है। सिद्धान्त और व्यवहार में परस्पर विरोधी होते हुए राग हमीर को समय सिद्धान्त का अपवाद मान लिया गया है। अब हम आपको राग हमीर का गायन और सितार वादन सुनवाते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं अद्वितीय सितार वादक उस्ताद विलायत खाँ। संगीत-प्रेमी जानते हैं कि उस्ताद विलायत जब अपनी कोई मनपसन्द बन्दिश बजाते थे तब प्रायः वह उस बन्दिश का गायन भी किया करते थे। इस रिकार्डिंग में राग हमीर की एक बन्दिश – “अचानक मोहें पिया के जगाए...” बजाने के साथ-साथ उन्होने इसका मधुर गायन भी प्रस्तुत किया है। आप यह बन्दिश सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग हमीर : गायन और सितार वादन : “अचानक मोहें पिया के जगाए...” : उस्ताद विलायत खाँ



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 297वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको 1962 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। इस पहेली के सम्पन्न होने के उपरान्त जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा। नये वर्ष 2017 के पहले और दूसरे अंक में हम 2016 की पहेली के महाविजेताओं और उनकी प्रस्तुतियों से आपका परिचय कराएँगे।





1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि आपको किस राग की अनुभूति हो रही है?

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – आप इस गीत मुख्य गायिका के स्वर को पहचान कर उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 24 दिसम्बर, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 299वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 295 वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1960 में प्रदर्शित लोकप्रिय फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ से राग पर केन्द्रित गीत का एक अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – सोहनी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – दीपचन्दी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है – स्वर – उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ

इस बार की पहेली के प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

 मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में अपने सैकड़ों पाठकों के अनुरोध पर जारी हमारी ताज़ा लघु श्रृंखला “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” के इस अंक में हमने आपको सुनवाने के लिए राग हमीर पर चर्चा की। इस श्रृंखला के लिए हमने संगीतकार नौशाद के आरम्भिक दो दशकों की फिल्मों के गीत चुने हैं। श्रृंखला के आलेख को तैयार करने में हमने फिल्म संगीत के जाने-माने इतिहासकार और हमारे सहयोगी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी के आलेख और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। गीतों के चयन के लिए हमने अपने पाठकों की फरमाइश का ध्यान रखा है। यदि आप भी किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को श्रृंखला की समापन कड़ी के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

यो प्लेबैक इण्डिया 


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