Showing posts with label shreya ghoshal. Show all posts
Showing posts with label shreya ghoshal. Show all posts

Friday, June 2, 2017

गीत अतीत 15 || हर गीत की एक कहानी होती है || कारे कारे बदरा || ब्लू माउंटेन्स || सुनील सिरवैया

Geet Ateet 15
Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
Kaarey Kaarey Badra
Blue Mountains
(Monty Sharma, Shreya Ghoshal, Yatharth Ratnum)
Sunil Sirvaiya- Lyricist

"गीत के आरंभ में जो सरगम है, वो मोंटी जी ने वहीँ स्टूडियो में रिकॉर्डिंग के दौरान ही स्वरबद्ध किया..." - सुनील सिरवैया 
जानिये फिल्म ब्लू माउंटेन्स के गीत "कारे कारे बदरा" के बनने की कहानी गीतकार सुनील सिरवैया से, संगीत है मोंटी शर्मा का और आवाजें हैं श्रेया घोषाल और यथार्थ रत्नम की... प्ले पर क्लिक करे और सुनें ....



डाउनलोड कर के सुनें यहाँ से....

सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -

Saturday, March 7, 2015

"हैंगोवर तेरी यादों का..." - क्यों सोनू निगम नहीं गा सके इस गीत को?


एक गीत सौ कहानियाँ - 54
 

हैंगओवर  तेरी यादों का...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तंभ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 54 वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'किक' के मशहूर गीत "हैंगओवर तेरी यादों का" से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें। 



"चांदी की डाल पर सोने का मोर..."
किसी फ़िल्मी गीत की सफलता में केवल गायक, गीतकार और संगीतकार की सफलता ही छुपी नहीं होती, बल्कि उस अभिनेता की सफलता भी छुपी होती है जिन पर वह गीत फ़िल्माया गया होता है। और यही कारण है कि कई अभिनेता अपने उपर फ़िल्माये जाने वाले गीतों को लेकर बहुत सचेतन होते हैं। गुज़रे ज़माने के नायकों में दो नाम हैं शम्मी कपूर और राजेश खन्ना, जो अपने फ़िल्मों के गीतों को लेकर बहुत सीरियस हुआ करते थे। सुनने में आता है कि ये दोनों अभिनेता गीतों के सिटिंग्पर पहुँच जाया करते थे और गीत की रचना प्रक्रिया में पूर्ण रूप से भाग भी लेते थे, अपने सुझाव देते थे। और यही वजह है कि शम्मी कपूर और राजेश खन्ना की फ़िल्मों के गाने सदा हिट हो जाया करते। फ़िल्म भले चले न चले, गानें ज़रूर चल पड़ते थे। नए ज़माने में एक नाम है सलमान ख़ान का जो अपनी फ़िल्मों के गीत-संगीत में गहन रुचि रखते हैं। 1990 और 2000 के दशकों में उनकी फ़िल्मों के गानें अपनी मेलडी के लिए लोगों में बेहद पॉपुलर हुआ करते थे, पर इस नए दशक में उनकी जितनी फ़िल्में आईं, उनके गीतों में मेलडी से ज़्यादा मसाला पाया जाने लगा है। इससे यह अहसास होता है कि अब सलमान ख़ान चाहते हैं कि ये गानें पब्लिक और यंग्जेनरेशन की ज़ुबाँ पर तुरन्त चढ़ जाये और डान्स पार्टियों की शान बनें। इस होड़ में मेलडी को शायद कम महत्व दिया जाने लगा है उनकी फ़िल्मों के गीतों में आजकल। ख़ैर, हाल में उनकी फ़िल्म आई 'किक' जिसके गाने इन दिनों धूम मचा रहे हैं उनकी पिछली फ़िल्मों ही की तरह। मिका सिंह का गाया "जुम्मे की रात है" नंबर वन पर है तो सलमान ख़ान का गाया "हैंगोवर तेरी यादों का" भी अपना जादू चला रहा है। यह सलमान ख़ान का गाया पहला गाना नहीं है। उन्होंने इससे पहले साल 1999 में फ़िल्म 'हेलो ब्रदर' में "चांदी की डाल पर सोने का मोर" गाया था। उस बार भले उनका उस गीत को गाना पूर्वनिर्धारित था, पर 'किक' का यह गीत उनकी झोली में अचानक ही आ गया।

बात कुछ इस तरह की थी कि "हैंगोवर" गीत के लिए सबसे पहले सोनू निगम को मौका दिया गया था। संगीतकार मीत ब्रदर्स अनजान और गीतकार कुमार ने निर्माता निर्देशक साजिद नडियाडवाला को सोनू निगम और श्रेया घोषाल का नाम सुझाया। साजिद ने हामी भी भर दी। गाना रिहर्स होकर सोनू की आवाज़ में रेकॉर्ड भी हो गया। पर होनी को कुछ और ही मंज़ूर था। साजिद ने किस वजह से सोनू के गाये गीत को रद्द करने का फ़ैसला लिया यह स्पष्ट होता है सोनू निगम के Times of India' दिए हुए एक साक्षात्कार में। सोनू कहते हैं, "amendment के महीनों बीत जाने के बाद भी लोग अब तक यह नहीं समझ पाए हैं कि Copyright Act में हम किस चीज़ के लिए लड़ाई लड़ रहे थे। सब मुझसे पूछते हैं, "तो आप म्युज़िक डिरेक्टर्स से रॉयल्टी ले रहे हैं?" जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था। कोई भी गायक किसी प्रोड्युसर या कम्पोज़र से रॉयल्टी नहीं ले सकता। 2012 में जो नया अमेन्डमेन्ट आया उसके अनुसार अगर किसी गायक का गाया गीत किसी सार्वजनिक स्थान पर बजाया जाता है जैसे कि रेस्तोराँ, लिफ़्ट, प्लेन आदि, तो उस गायक को 'पर्फ़ॉर्मैन्स रॉयल्टी' मिलनी चाहिए। यह रॉयल्टी गायक को सीधे नहीं बल्कि India Singers Rights Association (ISRA) को दी जायेगी, जो गायक तक पहुँचायेगी। अगर म्युज़िक कम्पोज़र का पैसा है, उसे रखो तुम अपने पास। मैं किसी और से ले रहा हूँ और कम्पोज़र को उससे भी प्रॉबलेम है। अब यह मेरी समझ नहीं आती। यह बस एक ईगो इश्यु बन गया है। हर कोई कॉनट्रैक्ट के नियमों और कानूनी मसलों से डरते हैं। कोई न कोई क्लॉज़ डाल देंगे जिसकी वजह से हम सिंगर्स, कम्पोज़र्स और लिरिसिस्ट्स जाल में फँस जाते हैं। इस बात पर बहस हर किसी ने किया पर मैं टारगेट बना क्योंकि मैं चुप नहीं रहा। और इस वजह से मेरे गाने डब होने शुरु हो गए। मेरे गाये हुए गाने दूसरे गायकों से दोबारा डब करवाये जाने लगे। ये "हैंगोवर" जो सलमान ने गाया है, वह पहले मैंने गाया था। मुझे इससे कोई प्रॉब्लेम नहीं, पर मैं ऐसा कोई कॉनट्रैक्ट साइन नहीं करना चाहता जो ग़ैर-कानूनी हो और जिसका कोई मतलब न बनता हो। पर एक कॉनट्रैक्ट्स बदल रहे हैं, और हाल में मैंने दो गीत गाये हैं।" इस तरह से सोनू का गाया "हैंगोवर" दोबारा सलमान की आवाज़ में रेकॉर्ड हुआ, और इसी तरह से फ़िल्म 'मैं तेरा हीरो' में भी सोनू का गाया "ग़लत बात है" री-डब किया गया जावेद अली की आवाज़ में।

मीत ब्रदर्स अनजान
अब सवाल यह उठता है कि "हैंगोवर" के लिए अगर सोनू नहीं तो फिर सलमान ही क्यों? क्यों नहीं किसी और प्रतिष्ठित गायक से गवाया गया यह गीत? बात दरसल ऐसी हुई कि सोनू के गाये गीत को शामिल ना किए जाने के बाद नए गायक की तलाश शुरू हुई, ऐसे में एक दिन सलमान ख़ान युंही इस गीत को गा रहे थे। उन्हें यह गीत गाता देख साजिद नडियाडवाला के मन में यह विचार आया कि क्यों न इसे सल्लु मियाँ से ही गवा लिया जाए। जैसे ही जनता को यह पता चलेगा कि सलमान ने इस गीत को गाया है, तो वह गीत तो वैसे ही हिट हो जाएगा। साजिद ने जब यह बात संगीतकार मीत ब्रदर्स अनजान को बताई तो मीत ब्रदर्स को भी सुझाव सही लगा। फिर शुरू हुआ सलमान को मनाने का काम। सलमान ने साफ़ कह दिया कि उन्हें कोई गाना-वाना नहीं आता और अगर सोनू नहीं तो किसी और गायक से इसे गवा लिया जाए। पर सब के समझाने पर और यह विश्वास दिलाने पर कि Melodyn और Antares जैसे सॉफ़्टवेर के द्वारा उनके गाए गीत को बिल्कुल सुरीला बनाया जा सकता है, सलमान मान गए। श्रेया घोषाल तो अपना हिस्सा पहले गा ही चुकी थीं, सलमान ख़ान ने भी गाया, और जब पूरा गाना बन कर मार्केट में आया तो तुरन्त हिट हो गया। Melodyn और Antares के ज़रिए अब कोई भी गाना गा सकता है। यहाँ तक कि गायक सिर्फ़ बोलों को पढ़ भी दे तो भी वो इनके ज़रिए सुरों में ढाल दिया जा सकता है। अत: अब प्रश्न यह उठता है कि क्या भविष्य में फ़िल्मी पार्श्वगायन के लिए गायकों की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी? अगर आवाज़ अच्छी है तो कोई भी पार्श्वगायक बन सकता है। पता नहीं यह अच्छा हो रहा है या ग़लत! पर सोनू निगम के साथ जो हुआ वह अच्छा नहीं था, इतना हम ज़रूर कह सकते हैं। बस इतनी सी है इस गीत के पीछे की दास्तान। लीजिए, अब आप वही गीत सुनिए।

फिल्म किक : 'हैंगओवर तेरी यादों का...' : सलमान खाँ और श्रेया घोषाल : गीतकार - कुमार 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Tuesday, May 31, 2011

गुरूदेव की "नौका डूबी" को "कशमकश" में तब्दील करके लाए हैं संजॉय-राजा..शब्दों का साथ दिया है गुलज़ार ने

Taaza Sur Taal (TST) - 15/2011 - KASHMAKASH (NAUKA DOOBI)

कभी-कभार कुछ ऐसी फिल्में बन जाती हैं, कुछ ऐसे गीत तैयार हो जाते हैं, जिनके बारे में आप लिखना तो बहुत चाहते हैं, लेकिन अपने आप को इस लायक नहीं समझते कि थोड़ा भी विश्लेषण कर सकें। आपके मन में हमेशा यह डर समाया रहता है कि अपनी नासमझी की वज़ह से कहीं आप उन्हें कमतर न आंक जाएँ। फिर आप उन फिल्मों या गीतों पर शोध शुरू करते हैं और कोशिश करते हैं कि जितनी ज्यादा जानकारी जमा हो सके इकट्ठा कर लें, ताकि आपके पास कही गई बातों का समर्थन करने के लिए कुछ तो हो। इन मौकों पर अमूमन ऐसा भी होता है कि आपकी पसंद अगर सही मुकाम पर पहुँच न पा रही हो तो भी आप पसंद को एक जोड़ का धक्का देते हैं और नकारात्मक सोच-विचार को बाहर का रास्ता दिखा देते हैं। अंतत: या तो आप संतुष्ट होकर लौटते हैं या फिर एक खलिश-सी दिल में रह जाती है कि इस चीज़ को सही से समझ नहीं पाया।

आज की फिल्म भी कुछ वैसी है.. गुरूदेव रवींद्रनाथ टैगोर की लिखी कहानी "नौका डूबी" पर उसी नाम से बनाई गई बांग्ला फिल्म का हिंदी रूपांतरण है "कशमकश"। इस फिल्म के सभी गाने रवींद्र-संगीत पर आधारित हैं। फिल्म में ४ हिन्दी गाने हैं जिन्हें लिखा है गुलज़ार साहब ने और पाँचवां गाना एक सुप्रसिद्ध बांग्ला गाना है, जिसे अब तक कई सारे फ़नकार अपनी आवाज़ दे चुके हैं। फिल्म में संगीत दिया है संजॉय दास और राजा नारायण देब की जोड़ी ने। इन दोनों ने चिर-परिचित रवींद्र संगीत में अपनी कला का मिश्रण कर गानों को नए रूप में ढालने की यथा=संभव सफ़ल कोशिश की है। चलिए तो सीधे-सीधे गानों की ओर रुख करते हैं।

फिल्म का पहला गना है "मनवा भागे रे"। "सौ-सौ तागे रे".. ऐसी पंक्तियों को सुनकर हीं गुलज़ार साहब के होने का बोध हो जाता है। ऊपर से श्रेया घोषाल की सुमधुर आवाज़, जिसका कोई तोड़ नहीं है। पवन झा जी से मालूम हुआ है कि यह गाना रवींद्र संगीत के मूल गीत "खेलाघर बांधते लेगेची" पर आधारित है। वाद्य-संयोजन बेहतरीन है। बोल कैसे हैं.. आप खुद देख लें:

मनवा आगे भागे रे,
बाँधूं सौ-सौ तागे रे,
ख्वाबों से खेल रहा है,
सोए जागे रे..

दिन गया जैसे रूठा-रूठा,
शाम है अंजानी,
पुराने पल जी रहा है,
आँखें पानी-पानी..


दूसरा गाना है हरिहरण की आवाज़ में "खोया क्या जो पाया हीं नहीं।" आजतक लोग यही कहते आए हैं कि हाथों की लकीरों में किस्मत की कहानी गढी जाती है, लेकिन यहाँ पर गुलज़ार साहन निराशा का ऐसा माहौल गढते हैं कि अब तक की सारी दलीलों को नकार देते हैं। वे सीधे-सीधे इस बात का ऐलान करते हैं कि हथेलियों पर फ़क़त लकीरें हैं और कुछ नहीं, इन पर कुदरत की कोई कारीगरी नहीं। अपनी बात के समर्थन में वे भगवदगीता की उस पंक्ति का सहारा लेते हैं, जिसमें कहा गया है कि "तुमने क्या पाया था, जो तुमने खो दिया।" हरिहरण अपनी आवाज़ से इस दर्द को और भी ज्यादा अंदर तक ठेल जाते हैं और सीधे-सीधे दिल पर वार होता है। बखूबी तरीके से चुने गए वाद्यों की कारस्तानी इस दर्द को दूना कर देती है।

खोया क्या जो पाया हीं नहीं,
खाली हाथ की लकीरें हैं,
कल जो आयेगा, कल जो जा चुका..

बीता-बीता बीत चुका है,
फिर से पल-पल बीत रहा है..

तारे सारे रात-रात हैं,
दिन आए तो खाली अंबर,
आँख में सपना रह जाता है..


तीसरे गाने ("तेरी सीमाएँ") के साथ पधारती हैं श्रेया घोषाल। इनकी मीठी आवाज़ के बारे में जितना कहा जाए उतना कम होगा। ये जितने आराम से हँसी-खुशी वाले गीत गा लेती हैं, उतने हीं आराम से ग़म और दर्द के गीतों को निबाहती हैं। भले हीं संगीत कितना भी धीमा क्यों न हो, पता हीं नहीं चलता कि इन्हें किसी शब्द को खींचना पड़ रहा है। ऐसा हीं मज़ा लता दीदी के गीतों को सुनकर आया करता था (है)। अब जैसे इसी गीत को ले लीजिए - "मुक्ति को पाना है".. "मुक्ति" शब्द में अटकने की बड़ी संभावनाएँ थीं, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.. इसके लिए श्रेया घोषाल के साथ-साथ संगीतकारों की भी तारीफ़ करनी होगी। पहली मर्तबा मैंने जब इस गीत को सुना तो "मुक्ति" का इस्तेमाल मुझे कुछ अटपटा-सा लगा.. गुलज़ार साहब के नज़्मों में इस शब्द की कल्पना की जा सकती है, लेकिन गीत में? नहीं!! फिर मुझे ध्यान आया कि गुलज़ार साहब ने गुरूदेव के बांग्ला गीतों की तर्ज़ पर इस फिल्म के गीत लिखे हैं और बांग्ला गानों में ऐसे शब्द बहुतायत में नज़र आते हैं। यहाँ यह बात जाननी ज़रूरी है कि गुलज़ार साहब ने गीतों का अनुवाद नहीं किया, बल्कि वही माहौल बरकरार रखने की कोशिश की है।

तेरी सीमाएँ कोई नहीं हैं,
बहते जाना है, बहते जाना है..

तेरे होते दर्द नहीं था,
दिन का चेहरा ज़र्द नहीं था,
तुझसे रूठके मरते रहना है..

तुझको पाना, तुझको छूना,
मुक्ति का पाना है..


अब हम आ पहुँचे हैं चौथे गाने के पास, जो है "नाव मेरी"। एक बंगाली गायिका के बाद बारी है दूसरी बंगालन की यानि कि "मधुश्री" की। इनका साथ दिया है हरिहरण ने। इस गाने में गुलज़ार साहब अपनी दार्शनिक सोच के शीर्ष पर नज़र आते हैं। पहले तो वे कहते हैं कि सागरों में घाट नहीं होते, इसलिए तुम्हें बहते जाना है.. तुम्हारा ठहराव कहीं नहीं। और अंत होते-होते इस बात का खुलासा कर देते हैं कि तुम्हारे लिए किनारा किसी छोर पर नहीं, बल्कि तलछट में है.. तुम डूब जाओ तो शायद तुम्हें किनारा नसीब हो जाओ। इन पंक्तियों का बड़ा हीं गहरा अर्थ है। आप जब तक अपने आप को किसी रिश्ते की सतह पर रखते हैं और कोशिश करते हैं कि वह रिश्ता आपको अपना मान ले, तब तक आप भुलावे में जी रहे होते हैं। फिर या तो आपको एक रिश्ते से दूसरे रिश्ते की ओर बढना होता है या फिर ऐसे हीं किसी रिश्ते की सच्चाईयों में डूब जाना होता है। अगर आप डूब गए तो वह रिश्ता और आप एक हो चुके होते हैं, जिसे कोई जुदा नहीं कर सकता। इसलिए डूब जाने से हीं किनारा नसीब होगा ना कि किसी जगह सतह पर ठहरने से। संभव है कि गुलज़ार साहब ने कुछ और अर्थ सोचकर यह गाना लिखा हो (मैंने अभी तक फिल्म नहीं देखी, इसलिए यकीनन कह नहीं सकता), लेकिन मेरे हिसाब से यह अर्थ भी सटीक बैठता है।

नाव मेरी ठहरे जाने कहाँ!
घाट होते नहीं.. सागरों में कहीं..

दूर नहीं है कोई किनारा,
सागर जाती है हर धारा..

डूब के शायद इस नौका को,
मिल जाए किनारा..


इस फिल्म का अंतिम गाना है "आनंद-लोके मंगल-लोके", जिसे गाया है सुदेशना चटर्जी और साथियों ने। हिंदी रूपांतरण में बांग्ला गाने को यथारूप रखने से ज़ाहिर होता है कि निर्माता-निर्देशक ने गुरूदेव को श्रद्धांजलि अर्पित करने का प्रयास किया है। रवींद्र संगीत में आधुनिक वाद्य-यंत्रों का प्रयोग एक सफ़ल प्रयोग बन पड़ा है। भले हीं इसमें बांग्ला भाषा के शब्द हैं, लेकिन संगीत-संयोजन और गायिका की स्पष्ट आवाज़ के कारण गैर-बांग्लाभाषी भी इसे कम-से-कम एक बार सुन सकते हैं। मुझे जितनी बांग्ला आती है, उस हिसाब से यह कह सकता हूँ कि "सत्य-सुंदर" से गुहार लगाई जा रही है कि इस आनंद-लोक, इस मंगल-लोक में पधारें और स्नेह, प्रेम, दया और भक्ति का वरदान दें ताकि हम सबके प्राण कोमल हो सकें। आगे के बोल मुझे कुछ कठिन लगे, इसलिए न तो उन्हें यहाँ उपलब्ध करा पाया और ना हीं उनका अर्थ समझ/समझा पा रहा हूँ।

आनंद लोके मंगल लोके,
बिराजो सत्य-सुंदर..
स्नेह-प्रेम-दया-भक्ति,
कोमल करे प्राण..


तो ये थे "कशमकश" के पाँच गाने। आज के ढिंचाक जमाने में शांत और सरल गानों की कमी जिन किन्हीं को खल रही होगी, उनके लिए यह एलबम "टेलर-मेड" है। हिन्दी फिल्मों के ये दोनों संगीतकार नए हैं, लेकिन इनकी शुरूआत कमज़ोर नहीं कही जा सकती। इन दोनों के लिए तो यह सौभाग्य की बात है कि इन्हें रवींद्र संगीत पर काम करने का अवसर मिला और इनकी धुनों पर गुलज़ार साहब ने बोल लिखे। हाँ मुझे यहाँ गुलज़ार साहब से थोड़ी-सी शिकायत है। यूँ तो आप हर गाने में उपमाओं और "नई सोचों" की लड़ी लगा देते हैं और विरले हीं अपनी पंक्तियों को दुहराते हैं.. फिर ऐसा क्यों है कि "कशमकश" के गानों में "दुहराव-तिहराव" की भरमार है और हर गाने में एक या दो हीं नए ख़्याल हैं। यह मेरी नाराज़गी है अपने "आदर्श" से... आप लोग इस "बहकावे" में मत बहकिएगा। आप तो इन गानों का आनंद लें।

चलिए तो इस बातचीत को यहीं विराम देते हैं। आज की समीक्षा आपको कैसी लगी, ज़रूर बताईयेगा। अगले हफ़्ते फिर मुलाकात होगी। नमस्कार!

आवाज़ रेटिंग - 7.5/10

एक और बात: इस एलबम के सारे गाने आप यहाँ पर सुन सकते हैं।




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Tuesday, January 18, 2011

"यमला पगला दीवाना" का रंग चढाने में कामयाब हुए "चढा दे रंग" वाले अली परवेज़ मेहदी.. साथ है "टिंकू जिया" भी

Taaza Sur Taal 02/2011 - Yamla Pagla Deewana

"अपने तो अपने होते हैं" शायद यही सोच लेकर अपना चिर-परिचित देवल परिवार "अपने" के बाद अपनी तिकड़ी लेकर हम सब के सामने फिर से हाजिर हुआ है और इस बार उनका नारा है "यमला पगला दीवाना"। फिल्म पिछले शुक्रवार को रीलिज हो चुकी है और जनता को खूब पसंद भी आ रही है। यह तो होना हीं था, जबकि तीनों देवल अपना-अपना जान-पहचाना अंदाज़ लेकर परदे पर नज़र आ रहे हों। "गरम-धरम" , "जट सन्नी" और "सोल्ज़र बॉबी"... दर्शकों को इतना कुछ एक हीं पैकेट में मिले तो और किस चीज़ की चाह बची रहेगी... हाँ एक चीज़ तो है और वो है संगीत.. अगर संगीत मन का नहीं हुआ तो मज़े में थोड़ी-सी खलल पड़ सकती है। चूँकि यह एक पंजाबी फिल्म है, इसलिए इससे पंजाबी फ़्लेवर की उम्मीद तो की हीं जा सकती है। अब यह देखना रह जाता है कि फ़िल्म इस "फ़्रंट" पर कितनी सफ़ल हुई है। तो चलिए आज की "संगीत-समीक्षा" की शुरूआत करते हैं।

"यमला पगला दीवाना" में गीतकारों-संगीतकारों और गायक-गायिकाओं की एक भीड़-सी जमा है। पहले संगीतकारों की बात करते हैं। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल (ओरिजनल "मैं जट यमला पगला दीवाना" .. फिल्म "प्रतिज्ञा" से), अनु मलिक, संदेश सांडिल्य, नौमान जावेद, आर०डी०बी० एवं राहुल बी० सेठ.. इन सारे संगीतकारों ने फिल्म के गानों की कमान संभाली है और इनके संगीत पर जिन्होंने बोल लिखे हैं वे हैं: आनंद बक्षी (ओरिजनल "मैं जट यमला पगला दीवाना"), धर्मेन्द्र (जी हाँ, अपने धरम पा जी भी अब गीतकार हो गए हैं, इन्होंने फिल्म में "कड्ड के बोतल" नाम का गाना लिखा है), इरशाद कामिल, नौमान जावेद, राहुल बी० सेठ एवं आर०डी०बी०।

इस बार से हमने निर्णय लिया है कि हम फिल्म के सारे गाने नहीं सुनवाएँगे, बस वही सुनवाएँगे एलबम का सर्वश्रेष्ठ गाना हो या कि जिसे जनता बहुत पसंद कर रही हो। इसी बात को ध्यान में रखते हुए, आईये हम और आप सुनते हैं "अली परवेज़ मेहदी" की आवाज़ों में "चढा दे रंग":

Chadha de rang



Chadha de rang (Sad version)



हमारा यह सौभाग्य है कि हमें "परवेज़ मेहदी" से कुछ सवाल-जवाब करने का मौका हासिल हुआ। हमारे अपने "सजीव जी" ने इनसे "ई-मेल" के द्वारा कुछ सवाल पूछे, जिनका बड़े हीं प्यार से परवेज़ भाई ने जवाब दिया। यह रही वो बातचीत:

आवाज़: परवेज़ भाई फिल्म "यमला पगला दीवाना" में हम आपका गाना सुनने जा रहे हैं, हमारे श्रोताओं को बताएँ कि कैसा रहा आपका अनुभव इस गीत का।

अली परवेज़: निर्माता-निर्देशक समीर कार्णिक और देवल परिवार के लिए काम करने में बड़ा मज़ा आया, बॉलीवुड के लिए यह मेरा पहला गाना है। मैंने इस गाने के लिए इतनी बड़ी सफ़लता की उम्मीद नहीं की थी, आम लोगों को गाना अच्छा लगा हीं है लेकिन गाने के समझदार लोगों से भी वाह-वाह मिली है..और वो मेरे लिए सबसे ज्यादा खुशी की बात है।

आवाज़: जी सही कहा आपने। अच्छा यह बताईये कि इस गीत को राहत साहब ने भी गाया है, लेकिन एलबम में आपकी आवाज़ को पहली तरजीह दी गई है, इससे बेहतर सम्मान की बात क्या हो सकती है.. आप इस बारे में क्या सोचते हैं।

अली परवेज़: राहत साहब के बारे में जो भी कहूँ वो कम होगा। उनको कौन नहीं जानता, उनको किसने नहीं सुना, ये तो मेरी खुश-नसीबी है कि मुझे भी वो हीं गाना गाने का मौका मिला जो उनसे गवाया गया था। अब मुझे क्यों पहली तरजीह दी गई है, इसे जनता से बेहतर भला कौन बता पाएगा?

आवाज़: अपने अब तक के संगीत-सफ़र के बारे में भी संक्षेप में कुछ कहें।

अली परवेज़: जनाब परवेज़ मेहदी साहब मेरे वालिद थे, और वो हीं मेरे सबसे बड़े गुरू थे और मेरे सबसे बड़े आलोचक भी.. वो हीं मेरे गुणों के पारखी थे। उनका अपना घराना था, अपनी गायकी थी... बस मैं उनकी बनाई हुई इस संगीत की राह पर कुछ सुरीला सफ़र तमाम करूँ, यही अल्लाह से दुआ करता हूँ।

आवाज़: यमला पगला दीवाना के गाने इन दिनों खूब लोकप्रिय हो रहे हैं। क्या आपको फिल्म के कलाकारों या क्रू से मिलने का मौका मिला है कभी?

अली परवेज़: नहीं, मुझे कास्ट से मिलने का मौका नहीं मिला, क्योंकि मैं यू०एस०ए० में सेटल्ड हूँ, और मैंने अपने स्टुडियो में गाना रिकार्ड किया था।

आवाज़: प्राईवेट एलबम्स के बारे में आपके क्या विचार हैं, क्या आप खुद किसी एलबम पर काम कर रहे हैं? आने वाले समय में किन फ़िल्मों में हम आपको सुन पाएँगे?

अली परवेज़: मेरे ख़्याल में हर फ़नकार को कम से कम एक मौका प्राईवेट एलबम बनाने का ज़रूर मिलना चाहिए, क्योंकि उसमें कलाकार को अपनी सोच (प्रतिभा) दिखाने का मौका मिलता है और उसकी गायकी के अलग-अलग रंग दिखते हैं। एलबम कोई फ़िल्म नहीं होता, इसमें कोई स्टोरी-लाईन नहीं होती, इसलिए फ़नकार अपने मन का करने के लिए आज़ाद होता है। इंशा-अल्लाह हम लोग कुछ प्रोजेट्स पर काम कर रहे हैं, जो आपके सामने बहुत हीं जल्द आएँगे।

आवाज़: परवेज़ भाई, आपने हमें समय दिया, इसके लिए आपका हम तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करते हैं।

अली परवेज़: आपका भी शुक्रिया!

फिल्म के सर्वश्रेष्ठ गानों के बाद आईये हम सुनते हैं "जनता की पसंद"। ललित पंडित द्वारा संगीतबद्ध और उन्हीं के लिखे हुए "मुन्नी बदनाम", इसी तरह "विशाल-शेखर" द्वारा संगीतबद्ध और विशाल की हीं लेखनी से उपजे "शीला की जवानी" के बाद शायद यह ट्रेंड निकल आया है कि एक ऐसा आईटम गाना तो ज़रूर हीं होना चाहिए जिसे संगीतकार हीं अपने शब्द दे। शायद इसी सोच ने इस फिल्म में "टिंकु जिया" को जन्म दिया है। इस गाने के कर्ता-धर्ता "अनु मलिक" हैं और "मुन्नी बदनाम" की सफ़लता को भुनाने के लिए इन्होंने "उसी" गायिका को माईक थमा दी है। जी हाँ, इस गाने में आवाज़ें हैं ममता शर्मा और जावेद अली की। यह गाना सुनने में उतना खास नहीं लगता, लेकिन परदे पर इसे देखकर सीटियाँ ज़रुर बज उठती हैं। अब चूँकि गाना मक़बूल हो चुका है, इसलिए हमने भी सोचा कि इसे आपके कानों तक पहुँचा दिया जाए।

Tinku Jiya



हमारी राय – फ़िल्म जनता को भले हीं बेहद पसंद आई हो, लेकिन संगीत के स्तर पर यह मात खा गई। दो-एक गानों को छोड़कर संगीत में खासा दम नहीं है। वैसे बॉलीवुड को "अली परवेज़ मेहदी" के रूप में एक बेहतरीन गायक हासिल हुआ है। उम्मीद और दुआ करते हैं कि ये हमें आगे भी सुनने को मिलेंगे। इन्हीं बातों के साथ आईये आज की समीक्षा पर विराम लगाते हैं। धन्यवाद!



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Tuesday, December 14, 2010

मिर्च, ब्रेक के बाद, तेरा क्या होगा जॉनी, नो प्रोब्लम और इसी लाईफ़ में के गानों के साथ हाज़िर है इस साल की आखिरी समीक्षा

हम हरबार किसी एक या किन्ही दो फिल्मों के गानों की समीक्षा करते थे और इस कारण से कई सारी फिल्में हमसे छूटती चली गईं। अब चूँकि अगले मंगलवार से हम दो हफ़्तों के लिए अपने "ताजा सुर ताल" का रंग कुछ अलग-सा रखने वाले हैं, इसलिए आज हीं हमें बची हुई फिल्मों को निपटाना होगा। हमने निर्णय लिया है कि हम चार-फिल्मों के चुनिंदा एक या दो गाने आपको सुनवाएँगे और उस फिल्म के गाने मिला-जुलाकर कैसे बन पड़े हैं (और किन लोगों ने बनाया है), वह आपको बताएँगे। तो चलिए इस बदले हुए हुलिये में आज की समीक्षा की शुरूआत करते हैं।

आज की पहली फिल्म है "ब्रेक के बाद"। इस फिल्म में संगीत दिया है विशाल-शेखर ने और बोल लिखे हैं प्रसून जोशी ने। बहुत दिनों के बाद प्रसून जोशी की वापसी हुई है हिन्दी फिल्मों में... और मैं यही कहूँगा कि अपने बोल से वे इस बार भी निराश नहीं करते। अलग तरह के शब्द लिखने में इनकी महारत है और कुछ गानों में इसकी झलक भी नज़र आती है, हाँ लेकिन वह कमाल जो उन्होंने "लंदन ड्रीम्स" में किया था, उसकी थोड़ी कमी दिखी। बस एक गाना "धूप के मकान-सा" में उनका सिक्का पूरी तरह से जमा है। वैसे गाने में संगीत और गायकी की भी उतनी हीं ज़रूरत होती है और यह तो सभी जानते हैं कि विशाल-शेखर किस तरह का संगीत रचते हैं। यहाँ भी उनकी वही छाप नज़र आती है। जो उनका संगीत पसंद करते हैं (जैसे कि मैं करता हूँ), उन्हें इस फिल्म के गाने भी पसंद आएँगे, ऐसा मेरा यकीन है। चलिए तो आपको इस फिल्म से दो गाने सुनवाते हैं। पहला गाना है एलिस्सा मेन्डोंसा (शंकर-एहसान-लॉय की तिकड़ी में से लॉय की सुपुत्री) एवं विशाल दादलानी की आवाज़ों में "अधूरे" , वहीं दूसरा गाना है नीरज श्रीधर, विशाल, शेखर एवं रिस डिसूजा की आवाज़ों में "अजब लहर"।

अधूरे


अजब लहर


"ब्रेक के बाद" के बाद आईये सुनते हैं फिल्म "तेरा क्या होगा जॉनी" के गानों को। यह फिल्म आने के पहले हीं सूर्खियों में आ चुकी है.. क्योंकि यह कई महिने पहले हीं "लीक" हो गई थी.. कईयों ने इसे "पाईरेटेड सीडीज" पर देख भी लिया है (मैंने नहीं :) )। फिल्म के नाम और इसके मुख्य कलाकार (नील नीतिन मुकेश) को देखा जाए तो यह "जॉनी गद्दार" का सिक़्वेल लगती है, लेकिन चूँकि इन दोनों के निर्देशक अलग-अलग हैं (जॊनी गद्दार: श्रीराम राघवन, तेरा क्या होगा जॉनी: सुधीर मिश्रा) तो यह माना जा सकता है कि दोनों की कहानियों में कोई समानता नहीं होगी। इस फिल्म में संगीत है पंकज अवस्थी एवं अली अज़मत का और बोल लिखे हैं नीलेश मिश्रा ,जुनैद वसी, अली अज़मत , सुरेंद्र चतुर्वेदी, सबीर ज़ाफ़र एवं संदीप नाथ ने। अभी हम आपको जो दो गाने सुनाने जा रहे हैं, उनमें पंकज अवस्थी की "लीक से हटकर" आवाज़ है, जो गीतकारों की कविताओं में चार चाँद लगा देती है। पहला गाना है "सुरेंद्र चतुर्वेदी" का लिखा "शब को रोज़" एवं दूसरा है "नीलेश मिश्रा" का लिखा "लहरों ने कहा"। ये रहे वो दो गाने:

शब को रोज़


लहरों ने कहा


अगली फिल्म है "विनय शुक्ला" की "मिर्च"। विनय अपनी फिल्म "गॉडमदर" के कारण प्रख्यात हैं। अपनी इस नई फिल्म में विनय ने "लिंग-समानता" (जेंडर-इक़्विलटी) एवं "वुमन सेक्सुवलिटी" को केंद्र में रखा है। उनका कहना है कि उन्हें यह फिल्म बनाने की प्रेरणा पंचतंत्र की कुछ कहानियों को पढने के बाद मिली। इस फिल्म के मुख्य कलाकार हैं "कोंकणा सेन शर्मा, राईमा सेन, सहाना गोस्वामी, इला अरूण, श्रेयस तालपड़े एवं बोमन ईरानी"। जहाँ तक संगीत की बात है तो कई सालों बाद मोंटी शर्मा बॉलीवुड की मुख्य धारा में लौटे हैं। अपनी वापसी में वे कितने सफ़ल हुए हैं, यह तो आप गाने सुनकर हीं कह सकते हैं। फिल्म में गाने लिखे हैं जावेद अख्तर साहब ने। इस फिल्म का एक गाना तो ट्रेलर आते हीं मक़बूल हो चुका है। चलिए, हम आपको पहले वही गाना सुनाते हैं (कारे कारे बदरा), जिसमें आवाज़ है शंकर महादेवन की। दूसरा गाना जो हम आपको सुनवाने वाले हैं, उसे स्वर दिया है ईला अरूण, पंडित गिरीश चट्टोपाध्याय एवं चारू सेमवाल ने। जिस तरह यह फिल्म बाकी फिल्मों से कुछ हटकर है, वही बात इसके गानों के बारे में भी कही जा सकती है। आप खुद सुने:

कारे कारे बदरा


मोरा सैंयां


आज की अंतिम दो फिल्में हैं राजश्री प्रोडक्शन्स की "इसी लाईफ़ में" एवं "अनिल कपूर प्रोडक्शन्स" कि "नो प्रोब्लम"। पहले का निर्देशन किया है विधि कासलीवाल ने तो दूसरे का अनीस बज़्मी ने। फिल्म कितनी मज़ेदार है या कितनी होगी, यह तो फिल्म देखने पर हीं जाना जा सकता है, लेकिन जहाँ तक गानों की बात है तो मुझे इन दोनों के गानों में कोई खासा दम नहीं दिखा। "मीत ब्रदर्स " एवं "अंजान अंकित" "इसी लाईफ़ के" के कुछ गानों में अपनी छाप छोड़ने में सफल हुए हैं, लेकिन यह बात "नो प्रोब्लम" के "प्रीतम", "साजिद-वाजिद" या "आनंद राज आनंद" के लिए नहीं की जा सकती। चलिए तो हम सुनते हैं "मनोज मुंतसिर" का लिखा मोहित चौहान और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में "इसी उमर में"



और "नो प्रोब्लम" से प्रीतम द्वारा संगीतबद्ध मास्टर सलीम, कल्पना एवं हार्ड कौर की आवाज़ों में कुमार का लिखा "शकीरा":



आज हमने कुछ अच्छे, कुछ ठीक-ठाक गाने सुने। आपको कौन-कौन-से गाने पसंद आए, ज़रूर लिखकर बताईयेगा। और हाँ, "ताजा सुर ताल" की अगली दो कड़ियों का ज़रूर इंतज़ार करें, आपके लिए कुछ खास हम संजोकर लाने वाले हैं। इसी वायदे के साथ अलविदा कहने का वक़्त आ गया है। धन्यवाद!

Tuesday, November 23, 2010

सुजॉय जी को शादी का तोहफ़ा देने आ गए हैं सलीम-सुलेमान और अमिताभ भट्टाचार्य "बैंड बाजा बारात" के साथ

अभी वक़्त है अपने नियमित ताज़ा सुर ताल का.. ताज़ा सुर ताल यानि कि टी एस टी, जिसके मेजबान मुख्य रूप से सुजॉय जी हुआ करते हैं। मुख्य रूप से इसलिए कहा क्योंकि हर मंगलवार के दिन समीक्षा के दौरान उनसे बातचीत होती है, अब ये बातचीत मैं करूँ या फिर सजीव जी करें... पिछली मर्तबा ये बागडोर सजीव जी ने संभाली थी और उसके पहले कई हफ़्तों तक बातचीत का वो सिरा मेरे हाथ में था.. लेकिन दूसरा सिरा हमेशा हीं सुजॉय जी थामे रहते हैं। आज के दिन और आज के बाद दो-तीन और हफ़्तों तक स्थिति अलग-सी रहने वाली है। ऐसा इसलिए है क्योंकि सुजॉय जी घर गए हुए हैं.. अपनी ज़िंदगी के उस सिरे को संभालने जिसका दूसरा सिरा उनकी अर्धांगिनी के हाथों में है। जी हाँ, कल हीं सुजॉय जी की शादी थी। शादी बड़ी धूमधाम से हुई और होती भी क्यों नहीं, जब हम सब दोस्तों और शुभचिंतकों की दुआएँ उनके साथ थीं। हम सब तक की तरफ़ से सुजॉय जी को शादी की शुभकामनाएँ, बधाईयाँ एवं बहुत-बहुत प्यार .. (बड़ों की तरफ़ से आशीर्वाद भी).. हम नहीं चाहते थे कि इन मंगल घड़ियों में उन्हें थोड़ा भी तंग किया जाए, इसलिए कुछ हफ़्तों तक ताज़ा सुर ताल मैं अकेले हीं (या फिर कभी-कभार सजीव जी के साथ) हीं संभालने वाला हूँ। आपसे उसी प्रोत्साहन की उम्मीद रहेगी, जो सुजॉय जी को हासिल होती है। धन्यवाद! चलिए तो इन्हीं बातों के साथ आज की समीक्षा का शुभारंभ करते हैं।

इसे इत्तेफ़ाक़ हीं कहेंगे कि शादी की बातें करते-करते हम जिस फिल्म की समीक्षा करने जा रहे हैं, वह फिल्म भी शादियों को हीं ध्यान में रख कर बनी है। यशराज बैनर्स के तहत आने वाली इस फिल्म का निर्देशन किया है मनीष शर्मा ने, कहानी भी उन्हीं की है, जबकि पटकथा लिखी है हबीब फैजल ने। फिल्म के मुख्य कलाकार हैं अनुष्का शर्मा और रणवीर सिंह। फिल्म १० दिसम्बर २०१० को रीलिज होने वाली है। इस फिल्म में संगीत है पार्श्व-संगीत के दम पर हिन्दी-फिल्मों में अपनी पहचान बनाने वाले "सलीम-सुलेमान" बंधुओं का और गीत लिखे हैं "अमित त्रिवेदी" के खासम-खास "अमिताभ भट्टाचार्य" ने (देव-डी, उड़ान)।

फिल्म का पहला गाना है "ऐं वैं.. ऐं वैं".. आवाज़ें हैं सलीम मर्चैंट और सुनिधि चौहान की। गाने की धुन ऐसी है कि पहली बार में हीं आपके मन पर छा जाए और संयोजन भी कमाल का है। गीत सुनकर डान्स-फ्लोर पर उतरने को जी करने लगता है। चूंकि गाने के माध्य्म से पंजाबी माहौल तैयार किया गया है, इसलिए पार्श्व में बैंजो और बांसुरी को आराम से महसूस किया जा सकता है। अमिताभ के बोल बाकी नियमित पंजाबी गानों (भांगड़ा) से काफी अलग हैं। "चाय में डुबोया बिस्किट हो गया" या फिर "गुड़ देखा, मक्खी वहीं फिट हो गया".. जैसी पंक्तियाँ विरले हीं सुनने को मिलती है। मुझे यह गाना बेहद भाया। इस गाने का एक "दिल्ली क्लब मिक्स" भी है, जिसमें मास्टर सलीम ने सलीम मर्चैंट का स्थान लिया है। मास्टर सलीम के आने से "माँ दा लाडला" वाली फिलिंग आ जाती है। थोड़ी कोशिश करने पर आप आवाज़ में इस परिवर्तन को महसूस कर सकते हैं। दोनों हीं गाने अच्छे हैं।

गीत - ऐं वैं


गीत - ऐं वैं (दिल्ली क्लब मिक्स)


अब बढते हैं अगले गाने की ओर। यह गाना है "तरकीबें", जिसे गाया है बेन्नी दयाल ने और उनका बेहतरीन तरीके साथ दिया है सलीम मर्चैंट ने। सलीम-सुलेमान और बेन्नी दयाल की जोड़ी "पॉकेट में रॉकेट" के बाद एक बार फिर साथ आई है। कहीं कहीं यह गाना उसी गाने का एक्सटेंशन लगता है। बेन्नी दयाल एक बार फिर सफल हुए हैं, अपनी आवाज़ का जादू चलाने में। लेकिन मेरे हिसाब से इस गाने की सबसे खूबसूरत बात है, इसके बोल। "अनकन्वेशनल राईटिंग" की अगर बात आएगी, तो इस गाने को उसमें जरूर शुमार किया जाएगा। "कंघी हैं तरकीबें" या फिर "हौसलें सेंक ले" जैसे विचार आपको सोचने पर और सोचकर खुश होने पर मजबूर करते हैं।

गीत - तरकीबें


अगला गाना है "श्रेया घोषाल" की आवाज़ में "आधा इश्क़"। आजकल यह कहावत चल पड़ी है कि श्रेया कभी गलत नहीं हो सकती और श्रेया का गाया गाना कभी बुरा नहीं हो सकता। तो फिर "आधा इश्क़" को खूबसूरत होना हीं है। कुछ लोग इसलिए परेशान हैं कि "आधा इश्क़" भी कुछ होता है क्या?.. उन लोगों को शायद यह पता नहीं कि एकतरफ़ा इश्क़ तो आधा हीं हुआ ना.. यह मेरा ख्याल है, लेकिन ख्याल कोई भी हो.. जब ज़िंदगी "दस ग्राम" की हो सकती है तो इश्क़ "आधा" क्यों नहीं हो सकता। क्या कहते हैं आप लोग?

गीत - आधा इश्क़


चलिए तो बात को आगे बढागे हुए एलबम के चौथे गाने की ओर आते हैं। यह गाना है बेन्नी दयाल और हिमानी कपूर की आवाज़ो में "दम-दम"। इस गाने को सुनने के बाद मुझे यही लगा कि सलीम-सुलेमान ने "दम" भरे गाने के लिए बेन्नी को चुनकर गलती कर दी। गाने में जब तक अंतरा नहीं आता, तब तक दम जैसी कोई बात हीं नज़र नहीं आती। अब जबकि इस गाने को एक आईटम सॉंग जैसा होना है तो आवाज़ से भी वो जोश झलकना चाहिए ना। अंतरे के पहले (यानि कि मुखरे में) धुन भी थोड़ी सुस्त है। अंतरे में यह गाना जोर पकड़ता है, लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है। "दम-दम" में दम नहीं है मेरे भाई!! "दम-दम" का एक सूफ़ी-मिक्स है जिसे सुखविंदर ने गाया है.. सभी जानते हैं कि "जोश" का दूसरा नाम है "सुखविंदर" और ऊपर से मिक्स यानि कि "पेसी ट्युन" तो सूफ़ी-मिक्स हर मामले में बढिया है "दम-दम" से। मेरी यही चाहत है कि फिल्म में "सूफ़ी-मिक्स" हो, तभी मज़ा आएगा।

गीत - दम दम


गीत - दम दम (सूफ़ी मिक्स)


अगले गाने "मितरा" में गायकी की कमान संभाली है खुद अमिताभ भट्टाचार्य ने और उनका साथ दिया है सलीम मर्चैंट ने। यह गाना हर मामले में बेहतरीन है। इस गाने में "अमित त्रिवेदी" की झलक मिलती है, शायद इसीलिए अमिताभ भी माईक के पीछे आने को राजी हुए हैं। सलीम की आवाज़ हर तरह के गाने में काम करती है, इसलिए वे यहाँ भी अपना असर छोड़ जाते हैं। मितरा के बाद बारी है एक नियमित भांगड़े की, जो हर पंजाबी शादी के लिए एक रस्म-सा माना जाता है। लेकिन यह भांगड़ा दूसरे पंजाबी भांगड़ों से थोड़ा अलग है। इस भांगड़े का नाम यूँ तो "बारी बरसी" हीं है, लेकिन इसमें "खट के" कोई हीर या रांझा नहीं लाते, बल्कि "पिज़्ज़ा" , "गोंद" और "खजूर" लाते हैं। इस गाने को सुनकर आप अपने पेट और मुँह पर हाथ रखकर "हँसी" रोकने की कोशिश करेंगे तो वहीं अपनी कदमों को काबू में रखकर यह कोशिश करेंगे कि कहीं "नाच न निकल जाए"। चूँकि यह गाना मस्ती के लिए बना है और एक नियमित पैटर्न पर बना है, इसलिए इसे अच्छा या खराब निर्धारित करने का कोई तुक नहीं बनता। चलिए तो अब सुनते हैं "मितरा" और "बारी बरसी"।

गीत - मितरा


गीत - बारी बरसी


कुल मिलाकर मुझे "सलीम-सुलेमान" की यह पेशकश अच्छी लगी। आप इस समीक्षा से कितना इत्तेफ़ाक़ रखते हैं, यह ज़रूर बताईयेगा। अगली बार मिलने के वादे के साथ आपका यह दोस्त आपसे विदा लेता है। चलते-चलते इस फिल्म का "थीम सॉंग" सुन लेते हैं, जिसे गाया है सलीम मर्चैंट और श्रद्धा पंडित ने। छोटा-सा गाना है, लेकिन चूँकि यह थीम है तो मेरे हिसाब से फिल्म में एक से ज्यादा बार बजेगा जरूर।



आवाज़ की राय में

चुस्त-दुरुस्त गीत: तरकीबें और मितरा

लुंज-पुंज गीत: दम-दम

Tuesday, November 2, 2010

ऐक्शन रिप्ले के सहारे इरशाद कामिल और प्रीतम ने बाकी गीतकार-संगीतकार जोड़ियों को बड़े हीं जोर का झटका दिया

ताज़ा सुर ताल ४२/२०१०


सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' की एक और कड़ी के साथ हम हाज़िर हैं, और आप सभी का हार्दिक स्वागत है इस साप्ताहिक स्तंभ में! विश्व दीपक जी, पता है जब भी मैं इस स्तंभ के लिए आप से बातचीत का सिलसिला शुरु करता हूँ तो मुझे क्या याद आता है?

विश्व दीपक - अरे पहले मुझे सभी को नमस्ते तो कह लेने दो! सभी पाठकों व श्रोताओं को मेरा नमस्कार और सुजॊय, आप को भी! हाँ, अब बताइए आप को किस बात की याद आती है।

सुजॊय - जब मैं छोटा था, और गुवाहाटी में रहता था, तो उस ज़माने में तो फ़िल्मी गानें केवल रेडियो पर ही सुनाई देते थे, तभी से मुझे रेडियो सुनने में और ख़ास कर फ़िल्म संगीत में दिलचस्पी हुई। तो आकाशवाणी के गुवाहाटी केन्द्र से द्पहर के वक़्त दो घंटे के लिए सैनिक भाइयों का कार्यक्रम हुआ करता था (आज भी होता है) , जिसके अंतर्गत कई दैनिक, साप्ताहिक और मासिक कार्यक्रम प्रस्तुत होते थे फ़िल्मी गीतों के, कुछ कुछ विविध भारती अंदाज़ के। तो हर शुक्रवार के दिन एक कार्यक्रम आता था 'एक ही फ़िल्म के गीत', जिसमें किसी नए फ़िल्म के सभी गीत बजाए जाते थे। तो गर्मी की छुट्टियों में या कभी भी जब शुक्रवार को स्कूल की छुट्टी हो, उस 'एक ही फ़िल्म के गीत' कार्यक्रम को सुनने के लिए मैं और मेरा बड़े भाई बेसबरी से इंतज़ार करते थे। और कार्यक्रम शुरु होने पर जब उद्‍घोषक कहते कि "आज की फ़िल्म है...", उस वक़्त तो जैसे उत्तेजना चरम सीमा तक पहूँच जाया करती थी कि कौन सी फ़िल्म के गानें बजने वाले हैं। मुझे अब भी याद है कि हम किस तरह से ख़ुश हुए थे जिस दिन 'हीरो' फ़िल्म के गानें हमने पहली बार सुने थे उसी कार्यक्रम में।

विश्व दीपक - बहुत ही ख़ूबसूरत यादें हैं, और मैं भी महसूस कर सकता हूँ। उन दिनों मनोरंजन के साधन केवल रेडियो ही हुआ करता था, जिसकी वजह से रेडियो की लोकप्रियता बहुत ज़्यादा थी। अब बस यही कह सकते हैं कि विज्ञान ने हमें दिया है वेग, पर हमसे छीन लिया है आवेग।

सुजॊय - वाह! क्या बात कही है आपने! हाँ, तो मैं यही कह रहा था कि आज 'ताज़ा सुर ताल' प्रस्तुत करते हुए मुझे ऐसा लगता है कि मैं भी उन्हीं उद्‍घोषकों की तरह किसी नए फ़िल्म के गानें लेकर आता हूँ, कार्यक्रम वही एक ही फ़िल्म का है, लेकिन श्रोता से अब मैं एक प्रस्तुतकर्ता बन गया हूँ। चलिए अब बताया जाये कि आज हम कौन सी नई फ़िल्म के गीत लेकर उपस्थित हुए हैं।

विश्व दीपक - दरअसल, आज हम ज़रा हल्के फुल्के मूड में हैं। इसलिए ना तो आज किसी क़िस्म का सूफ़ी गीत बजेगा, और ना ही कोई दर्शन का गीत। आज तो बस मस्ती भरे अंदाज़ में सुनिए अक्षय कुमार और ऐश्वर्या राय बच्चन की नई नवेली फ़िल्म 'ऐक्शन रीप्ले' के गीत। विपुल शाह निर्देशित इस फ़िल्म में गीतकार - सगीतकार जोड़ी के रूप में हैं इरशाद कामिल और प्रीतम। अन्य मुख्य कलाकारों में शामिल हैं रणधीर कपूर, किरण खेर, ओम पुरी, नेहा धुपिया और आदित्य रॊय कपूर।

सुजॊय - इससे पहले कि गीतों का सिलसिला शुरु करें, मैं यह याद दिलाना चाहूँगा कि विपुल शाह की थोड़ी कम ही चर्चा होती है, लेकिन इन्होंने बहुत सी कामियाब और म्युज़िकल फ़िल्में दी हैं और अपने लिए एक सम्माननीय स्थान इस इण्डस्ट्री में बना लिया है। विपुल शाह और अक्षय कुमार की जोड़ी भी ख़ूब रंग लायी है, जैसे कि 'वक़्त', 'नमस्ते लंदन', 'सिंह इज़ किंग्' और 'लंदन ड्रीम्स' जैसी फ़िल्मों में। विपुल शाह निर्मित और अनीज़ बाज़्मी निर्देशित रोमांटिक कॊमेडी 'सिंह इज़ किंग्' में प्रीतम के सुपरहिट संगीत से ख़ुश होकर विपुल ने अपनी इस अगली रोमांटिक कॊमेडी के संगीत के लिए प्रीतम को चुना है।

विश्व दीपक - फ़िल्म की कहानी के हिसाब से फ़िल्म में ७० के दशक के संगीत की छाया होनी थी। दरअसल इस फ़िल्म की कहानी भी बेहद अजीब-ओ-ग़रीब है। इस फ़िल्म में आदित्य रॊय कपूर अपने माता पिता (ऐश्वर्या और अक्षय), जिनकी एक दूसरे से शादी नहीं हो पायी थी, टाइम मशीन में बैठ कर ७० के दशक में पहूँच जाता है और अपने माता पिता का मिलन करवाता है। तो इतनी जानकारी के बाद आइए अब पहला गीत सुन ही लिया जाए।

गीत - ज़ोर का झटका


सुजॊय - वाक़ई ज़ोर का झटका था! फ़ुल एनर्जी के साथ दलेर मेहंदी और रीचा शर्मा ने इस गीत को गाया है और आजकल यह गीत लोकप्रियता की सीढियाँ चढ़ता जा रहा है। शादी के नुकसानों को लेकर कई हास्य गीत बनें हैं, यह गीत उसी श्रेणी में आता है, और पूरी टीम ने ही अच्छा अंजाम दिया है गीत को।

विश्व दीपक - बड़ा ही संक्रामक रीदम है गीत का। कुछ कुछ "चोर बाज़ारी" गीत की तरह लगता है शुरु शुरु में, लेकिन बाद में प्रीतम ने गीत का रुख़ दूसरी ओर ही मोड़ दिया है। दलेर मेहंदी की गायकी के तो क्या कहने, और रीचा शर्मा के गले की हरकतों से तो सभी वाक़ीफ़ ही हैं। इन दोनों के अलावा मास्टर सलीम ने भी अपनी आवाज़ दी है इस गीत में कुछ और मसाला डालने के लिए।

सुजॊय - इस मस्ती भरे गीत के बाद अब एक रोमांटिक गीत, उस ७० के दशक के स्टाइल का हो जाए! गायिका हैं श्रेया घोषाल।

गीत - ओ बेख़बर


विश्व दीपक - बड़ा ही मीठा, सुरीला गीत था श्रेया की आवाज़ में। प्रीतम के संगीत की विशेषता यही है कि वो पूरी तरह से व्यावसायिक हैं, जिसे कहते हैं 'ट्रुली प्रोफ़ेशनल'। जिस तरह का संगीत आप उनसे माँगेंगे, वो बिलकुल उसी तरह का गीत आपको बनाकर दे देंगे। पीछले साल प्रीतम का ट्रैक रेकॊर्ड सब से उपर था, इस साल भी शायद उनका ही नाम सब से उपर रहेगा। ख़ैर, इस गीत की बात करें तो एक टिपिकल यश चोपड़ा फ़िल्म के गीत की तरह सुनाई देता है, बस लता जी की जगह अब श्रेया घोषाल है।

सुजॊय - मुझे तो इस गीत को सुनते हुए लग रहा था जैसे फूलों भरी वादियों, बर्फ़ीली पहाड़ियों, हरे भरे खेतों और झीलों में यह फ़िल्माया गया होगा। गानें का रंग रूप तो आधुनिक ही है, लेकिन एक उस ज़माने की बात भी कहीं ना कहीं छुपी हुई है। ऐश्वर्या के सौंदर्य को कॊम्प्लीमेण्ट करता यह गीत लोगों के दिलों को छू सकेगा, हम तो ऐसी ही उम्मीद करेंगे। ऐश्वर्या - श्रेया कम्बिनेशन में फ़िल्म 'गुरु' का गीत "बरसो रे मेघा मेघा" जिस तरह से लोकप्रिय हुआ था, इस गीत से भी वह उम्मीद रखी जा सकती है।

विश्व दीपक - चलिए अब बढ़ते हैं तीसरे गीत की ओर। इस बार सेवेंटीज़ के रेट्रो शैली का एक गीत "नखरे", जिसे आप एक कैम्पस छेड़-छाड़ सॊंग् भी कह सकते हैं।

गीत - नखरे


सुजॊय - "लड़की जो बनती प्रेमिका, बैण्ड बजाये चैन का, उड़ जाता सर्कीट ब्रेन का, पटरी पे बैठा आदमी, देखे रास्ता ट्रेन का"। कमाल के ख़यालात हैं इरशाद साहब के, जिनके लेखनी की दाद देनी ही पड़ेगी! और संगीत में प्रीतम ने कमाल तो किया ही है। गाने में आवाज़ फ़्रण्कोयस कास्तलीनो का था, जिन्हें आजकल हिंदी के एल्विस प्रेस्ली कहा जा रहा है। एक फ़ुल्टू रॊक-एन-रोल पार्टी सॊंग जिसे सुन कर झूमने को दिल करता है।

विश्व दीपक - अक्षय कुमार के मशहूर संवाद "आवाज़ नीचे" को गीत के शुरुवाती हिस्से में सुना जा सकता है। गीत के ऒरकेस्ट्रेशन की बात करें तो गीटार और पर्क्युशन का ज़बरदस्त इस्तेमाल प्रीतम ने किया है, और गीत के मूड और स्थान-काल-पात्र के साथ पूरा पोरा न्याय किया है।

सुजॊय - अच्छा विश्व दीपक जी, पिछली बार आपने किसी हिंदी फ़िल्म में होली गीत कब देखी थी याद है कुछ आपको?

विश्व दीपक - मेरा ख़याल है कि विपुल शाह की ही फ़िल्म 'वक़्त' में "डू मी एक फ़ेवर लेट्स प्ले होली" और 'बाग़बान' में "होली खेले रघुवीरा अवध में" ही होने चाहिए। वैसे आप के सवाल से ख़याल आया कि ७० के दशक में जिस तरह से होली गीत फ़िल्मों के लिए बनते थे, और जिस तरह से फ़िल्माये जाते थे, उनमें कुछ और ही बात होती थी। फ़िल्मी गीतों से धीरे धीरे विविधता ख़त्म होती जा रही है, ख़ास कर त्योहारों के गीत को बंद ही हो गये हैं। ख़ैर, होली गीत की बात चली है तो 'ऐक्शन रीप्ले' में भी एक होली गीत की गुंजाइश रखी गई है, आइए उसी गीत को सुन लिया जाए।

गीत - छान के मोहल्ला


सुजॊय - ऐश्वर्या और नेहा धुपिया पर फ़िल्माया गया यह गीत सुनिधि चौहान और ऋतु पाठक की आवाज़ों में था। पूर्णत: देसी फ़्लेवर का गाना था, लेकिन प्रीतम ने इस बात का पूरा पूरा ध्यान रखा कि यह एक आइटम सॊंग् होते हुए भी ऐश्वर्या पर फ़िल्माया जा रहा है, इसलिए एक तरह ही शालीनता भी बरक़रार रखी है।

विश्व दीपक - इरशाद कामिल लगता है गुलज़ार साहब के नक्श-ए-क़दम पर चल निकले हैं इस गीत में, जब वो लिखते हैं कि "जली तो, बुझी ना, क़सम से कोयला हो गई मैं"। इस तरह की उपमाएँ गुलज़ार साहब ही देते आये हैं। देखना यह है कि क्या यह गीत भी "डू मी एक फ़ेवर" की तरह चार्टबस्टर बन पाता है या नहीं।

सुजॊय - चार गानें हमने सुन लिए, और एक बात आपने ग़ौर की होगी कि इनमें ७० के दशक के रंग को लाने की कोशिश तो की गई है, लेकिन हर गीत एक दूसरे से अलग है। हम इस ऐल्बम के करीब करीब बीचो बीच आ पहुँचे हैं, यानी कि ९ गीतों में से ४ गीत सुन चुके हैं। तो आइए बिना कोई कमर्शियल ब्रेक लिए सुनते हैं 'ऐक्शन रीप्ले' का पाँचवाँ गीत।

गीत - तेरा मेरा प्यार


विश्व दीपक - कुल्लू मनाली की स्वर्गीक सुंदरता इस गीत के फ़िल्मांकन की ख़ासीयत है, और इस गीत को सुनने के बाद समझ में आता है कि विपुल शाह ने करीब करीब एक साल तक क्यों इंतेज़ार किया वहाँ के मौसम में सुधार का। पहाड़ी लोक गीत की छाया लिए इस गीत में अगर प्रीतम के भट्ट कैम्प की शैली सुनाई देती है तो कुछ कुछ रहमान का अंदाज़ भी महसूस होता है।

सुजॊय - बिलकुल मुझे भी यह गीत ईमरान हाश्मी टाइप का गीत लगा। कार्तिक, महालक्ष्मी और अंतरा मित्र की आवाज़ों में यह रोमांटिक गीत का भी अपना मज़ा है। और आपने कुल्लू मनाली का ज़िक्र छेड़ कर तो जैसे मुझे रोहतांग पास की पहाड़ियों में वापस ले गए जहाँ पर मैं अपने मम्मी डैडी के साथ दो साल पहले दशहरे के समय गया था। रोहतांग पास के समिट पर ऐसी बर्फ़ीली हवाएँ कि एक मिनट आप खड़े नहीं रह सकते। वहाँ से वापस आने के बाद ऐसा लगा कि जैसे किसी सपनो की दुनिया से घूम कर वापस आ रहे हों। मेरी मम्मी का एक्स्प्रेशन कुछ युं था कि "अब मुझे कहीं और घूमने जाने की चाहत ही नहीं रही"। ऐसा है कुल्लू मनाली।

विश्व दीपक - चलिए अब कुल्लू मनाली से पंजाब की धरती पर आ उतरते हैं, और सुनते हैं मीका की आवाज़ में "धक धक धक"।

गीत - धक धक धक


सुजॊय - प्रीतम के गायक चयन के बारे में हम कुछ दिन पहले ही बात कर चुके हैं। आज फिर से दोहरा रहे हैं कि प्रीतम यह भली भाँति जानते हैं कि कौन सा गीत किस गायक से गवाना है। और जब गीत बनकर बाहर आता है तो हमें यह मानना ही पड़ता है कि इस गीत के लिए चुना हुआ गायक ही सार्थक हैं उस गीत के लिए।

विश्व दीपक - इकतारा की धुनें, उसके बाद फिर धिनचक रीदम, कुल मिलाकर एक मस्ती भरा गीत। इस गीत के लिए भी थम्प्स अप ही देंगे। चलिए अब लुका छुपी का खेल भी खेल लिया जाए। अगर आपको याद हो तो फ़िल्म 'ड्रीम गर्ल' में एक गाना था "छुपा छुपी खेलें आओ", और अमिताभ बच्चन की फ़िल्म 'दो अंजाने' में भी "लुक छुप लुक छुप जाओ ना" गीत था। ये दोनों ही गानें बच्चों को केन्द्र में रख कर लिखे और फ़िल्माये गये थे। लेकिन 'ऐक्शन रीप्ले' का "लुक छुप" एक मस्ती और धमाल से लवरेज़ गीत है जिसे के. के और तुल्सी कुमार ने गाया है, जो आजकल अपने अपने करीयर में पूरे फ़ॊर्म में हैं।

सुजॊय - ७० के दशक के संगीत की बात है तो कुछ हद तक ऋषी कपूर के नृत्य गीतों की छाया इस गीत में पड़ती हुई सी लगती है। चलिए सुनते हैं।

गीत - लुक छुप जाना


विश्व दीपक - आपने ग़ौर किया कि मुखड़े का इस्तेमाल अंतरे में भी हुआ है, और यही चीज़ शायद गीत को भीड़ से अलग करती है। तालियों, सिन्थेसाइज़र, ग्रुंजे गीटार और स्टेडियम रॊक के रम्ग इस गीत में भरे गये हैं। ७० के नहीं, बल्कि मैं यह कहूँगा कि अर्ली से लेके मिड एइटीज़ का प्रभाव है इस गीत के संगीत में।

सुजॊय - रॊक मूड को बरकरार रखते हुए अब बारी है सूरज जगन के आवाज़ की, गीत है "आइ ऐम डॊग गॊन क्रेज़ी"। सूरज जगन आज के अग्रणी रॊक गायकों में से एक हैं, लेकिन इस गीत में ऐसा लगता है कि जैसे उन्होंने आवाज़ को दबाया हुआ है। इस ऐल्बम के हिसाब से मुझे तो यह गीत थोड़ा ढीला लगा, देखते हैं हमारे श्रोताओं के क्या विचार हैं।

विश्व दीपक - ६० और ७० के दशकों में बनने वाले रॊक गीतों का अंदाज़ लाने की कोशिश है इस गीत में। यहाँ पे यह बताना ज़रूरी है कि प्रीतम ही वो संगीतकार हैं जिन्होंने हार्ड रॊक को बैण्ड शोज़ से निकालकर हिंदी फ़िल्म संगीत की मुख्य धारा में शामिल करवाया 'गैंगस्टर' और 'लाइफ़ इन ए मेट्रो' जैसी फ़िल्मों के ज़रिये। आइए सुनते हैं...

गीत - आइ ऐम डॉग गॊन क्रेज़ी


सुजॊय - और अब हम पहूँच गये हैं 'ऐक्शन रीप्ले' फ़िल्म के नौवें और अंतिम गीत पर। श्रेया घोषाल की आवाज़ में नृत्य गीत "बाकी मैं भूल गई" प्यार का इज़हार करने वाले गीतों की श्रेणी में आता है, जिसमें नायिका अपनी दीवानगी ज़ाहिर करती है और उसका इक़रार करती है। प्रीतम विविधता का परिचय देते हुए मुखड़े और अंतरे की रीदम को बिलकुल अलग रखा है।

विश्व दीपक - वैसे इस गीत का प्रेरणा स्रोत हैं एक मिडल-ईस्टर्ण नंबर है, और फ़ीरोज़ ख़ान की फ़िल्मों में इस तरह के संगीत का इस्तेमाल सुना गया है। कुल मिलाकर यही कह सकते हैं कि इस ऐल्बम का एक सुखांत हुआ है। चलिए यह गीत सुन लेते हैं।

गीत - बाकी मैं भूल गई


सुजॊय - इन तमाम गीतों को सुनने के बाद मेरी अदालत यह फ़ैसला देती है कि 'ऐक्शन रीप्ले' के गीतों को बार बार रीप्ले किया जाए और सुना जाए। मेलडी और मस्ती का संगम है 'ऐक्शन रीप्ले' का ऐल्बम। प्रीतम, इरशाद कामिल और तमाम गायक गायिकाओं को मेरी तरफ़ से थम्प अप! 'चुस्त-दुरुस्त गीत' और 'लुंज पुंज गीत' तो विश्व दीपक जी अभी बताएँगे, लेकिन मुझसे अगर पूछा जाए कि वह एक गीत कौन सा है जो इस ऐल्बम का सर्वोत्तम है, तो मेरा वोट "ओ बेख़बर" को ही जाएगा।

विश्व दीपक - आपकी पसंद से हमारी पसंद जुदा कैसे हो सकती है सुजॉय जी। आपने "ओ बेखबर" को वोट दिया है तो मैं उसे हीं आज का "चुस्त-दुरुस्त" गीत घोषित करता हूँ। वैसे इस फिल्म के सभी गाने अच्छे हैं। मज़ेदार बात तो ये है कि इस दिवाली को जिन दो बड़ी फिल्मों में टक्कर है वे हैं "ऐक्शन रिप्ले" और "गोलमाल ३" और दोनों में हीं संगीत प्रीतम दा का है। अगर आप दोनों फिल्मों के गानें सुनें तो आपको लगेगा कि प्रीतम दा ने अपना ज्यादा प्यार "ऐक्शन रिप्ले" को दिया है और "गोलमाल ३" को जल्दी में निपटा-सा दिया है। खैर ये तो निर्माता-निर्देशक पर निर्भर करता है कि वे किसी संगीतकार या गीतकार से किस तरह का काम लेते हैं। मैं तो बस इतना हीं कह सकता हूँ कि विपुल शाह इस काम में सफल साबित हुए हैं। चलिए तो इन्हीं बातों के साथ आज की बैठक समाप्त करते हैं। जाते-जाते सुजॉय जी आपको और सभी मित्रों को दिपावली की अग्रिम शुभकामनाएँ।

आवाज़ की राय में

चुस्त-दुरुस्त गीत: ओ बेख़बर

लुंज-पुंज गीत: आइ ऐम डॉग गॊन क्रेज़ी

Tuesday, October 12, 2010

कैलाश खेर की सूफियाना आवाज़ है "अ फ़्लैट" मे तो वहीं ज़िंदगी से भरे कुछ गीत हैं "लाइफ़ एक्सप्रेस" में

ताज़ा सुर ताल ३९/२०१०


विश्व दीपक - 'ताज़ा सुर ताल' के सभी श्रोताओं व पाठकों को मेरा नमस्कार और सुजॊय जी, आपको भी!

सुजॊय - नमस्कार! विश्व दीपक जी, आज भी हम पिछले हफ़्ते की तरह दो फ़िल्में लेकर हाज़िर हुए हैं। साल के इन अंतिम महीनो में बहुत सी फ़िल्में प्रदर्शित होती हैं, और इसीलिए बहुत से नए फ़िल्मों के गानें इन दिनों जारी हो रहे हैं। ऐसे में ज़रूरी हो गया है कि जहाँ तक सभव हो हम दो दो फ़िल्मों के गानें इकट्ठे सुनवाएँ। आज के लिए जिन दो फ़िल्मों को हमने चुना है, उनमें एक है ख़ौफ़ और मौत के करीब एक कहानी, और दूसरी है ज़िंदगी से लवरेज़। अच्छा विश्व दीपक जी, क्या आप भूत प्रेत पर यकीन रखते हैं?

विश्व दीपक - देखिए, यह एक ऐसा विषय है कि जिस पर घण्टों तक बहस की जा सकती है। बस इतना कह सकता हूँ कि गीता में यही कहा गया है कि आत्मा अजर और अमर है, वह केवल शरीर बदलता रहता है। वैज्ञानिक दृष्टि से इसका क्या एक्स्प्लेनेशन है, यह तो विज्ञान ही बता सकता है।

सुजॊय - चलिए इतन बताइए कि फ़िल्मी आत्माओं के बारे में आपके क्या विचार हैं?

विश्व दीपक - हाँ, यह एक मज़ेदार सवाल आपने पूछा है। एक पुरानी हवेली, धुंद, पूनम का पूरा चाँद, पेड़ों पर सूखी टहनियाँ, सूखे पत्तों की सरसराहट, एक बूढ़ा चौकीदार जिसकी उम्र का अंदाज़ा लगा पाना किसी के बस की बात नहीं, ये सब हॊरर फ़िल्मों की बेसिक ज़रूरतें हैं। फ़िल्मी आत्माएँ रात के ठीक १२ बजे वाक पर निकलती हैं। वैसे आजकल उन्हें बहुत से टी.वी चैनलों पर रोज़ देखा जा सकता है और उन्हें भरपूर काम मिलने लगा है। फ़िल्मी आत्माओं को अपने बालों को बांधना गवारा नहीं होता, उन्हें खुला छोड़ना ही ज़्यादा पसंद है। एक और ख़ास बात यह कि फ़िल्मी आत्माओं को गीत संगीत में ज़बरदस्त रुचि होती है। बड़े ही सुर में गाती हैं, दिन भर घंटों रियाज़ करने के बाद रात १२ बजे ओपन एयर में अपनी गायकी के जल्वे प्रस्तुत करने निकल पड़ती हैं।

सुजॊय - वाह, क्या सही पहचाना है आपने! मैं भी कुछ जोड़ दूँ इसमें? फ़िल्मी और तेलीविज़न आत्माओं का पसंदीदा रंग होता है सफ़ीद। जॊरजेट उनकी पसंदीदा साड़ी है और एक नहीं बहुत सी होती हैं। तभी तो बरसों बरस भटकने के बावजूद हर रोज़ उनकी साड़ी उतनी ही सफ़ेद दिखाई देती है कि जैसे किसी डिटरजेण्ट का ऐड कर रही हों। मोमबत्ती का बड़ा योगदान है इन आत्माओं के जीवन में। आधुनिक रोशनी के सरंजाम उन्हें पसंद ही नहीं है।

विश्व दीपक - सुजॊय, फ़िल्मी आत्माओं की हमने बहुत खिंचाई कर ली, अब इस मज़ाक को विराम देते हुए सीरियस हो जाते हैं और अपने पाठकों को बता देते हैं कि आज की पहली फ़िल्म है 'अ फ़्लैट'। यह लेटेस्ट हॊरर फ़िल्म है अंजुम रिज़्वी की, जिसे निर्देशित किया है हेमन्त मधुकर ने। जिम्मी शेरगिल, संजय सुरी, हज़ेल, कावेरी झा और सचिन खेड़ेकर। बप्पी लाहिड़ी के सुपुत्र बप्पा लाहिड़ी का संगीत है इस फ़िल्म में, और फ़िल्म में गानें लिखे हैं विराग मिश्र ने। तो आइए पहला गाना सुनते हैं कैलाश खेर और सुज़ेन डी'मेलो की आवाज़ों में।

गीत - मीठा सा इश्क़ लगे, कड़वी जुदाई


सुजॊय - "मीठा सा इश्क़ लगे, कड़वी जुदाई, यार मेरा सच्चा लागे, झूठी ख़ुदाई, चांदनी ने तन पे मेरे चादर बिचाई, ओढ़ा जो तूने मुझको सांस लौट आई", विराग मिश्र के ये बोलों में वाक़ई जान है। विराग मिश्र क नाम सुनते ही मुझे यकायक कवि वीरेन्द्र मिश्र की याद आ गई। कहीं ये उनके सुपुत्र तो नहीं! ख़ैर, इन दिनों राहत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ ही ज़्यादा सुनाई दे रही थी, कैलाश खेर कहीं दूर से हो गए थे। बहुत दिनों के बाद इनकी आवाज़ सुन कर अच्चा लगा। कैलाश की आवाज़ में कुछ ऐसी बात है कि सीधे दिल पर असर करती है।

विश्व दीपक - गीत के ओपेनिंग म्युज़िक में सस्पेन्स झलकता है। यानी कि जिसे हम हौंटिंग नोट कहते हैं। सुज़ेन की आवाज़ भी इस गीत के फ़्युज़न मूड के साथ चलती है, और एक सस्पेन्स और हॊरर का अंदाज़ भी उसमें महसूस किया जा सकता है। इस गीत के दो रीमिक्स वर्ज़न भी है, 'अनप्लग्ड' और 'पार्टीमैप मिक्स'।

सुजॊय - आइए अब फ़िल्म का दूसरा गाना सुना जाए जिसे सोनू निगम, तुल्सी कुमार, राजा हसन और अदिती सिंह शर्मा ने गाया है। बोल हैं "दिल कशी"।

गीत - दिल कशी


विश्व दीपक - सोनू निगम का नाम किसी भी ऐल्बम पर देख कर दिल को चैन मिलता है कि चलो कम से कम एक गाना तो इस ऐल्बम में ज़रूर सुनने लायक होगा। और सोनू हर बार सब की उम्मीदों पर खरे उतरते हैं। कशिश भरे गीतों को वो बड़ा ख़ूबसूरत अंजाम देते हैं। और आजकल तो वो चुनिंदे गीत ही गा रहे हैं, इसलिए सुनने वालों की उम्मीदें उन पर लगी रहती हैं और इंतज़ार भी रहता है उनके गीतों का। तुलसी कुमार, जिनसे हिमेश रेशम्मिया ने बहुत से गानें गवाये हैं, उन्हें इस गीत में सोनू के साथ गाने का मौका मिला और उनका पोरशन भी कम नहीं है इस गीत में।

सुजॊय - लेकिन राजा हसन और अदिती सिंह शर्मा को गीत के शुरुआत में ही सुना जा सकता है। गीत की बात करें तो यह पूरी तरह से सोनू का गीत है और उनका जो एक स्टाइल है टिपिकल नशीले अंदाज़ में गाने का, इस गीत में भी वही अंदाज़-ए-बयाँ है। सोनू के इस जौनर के गानें अगर आपको पसंद आते हैं तो यह गीत भी ज़रूर पसंद आयेगा।

विश्व दीपक - फ़िल्म का तीसरा गाना है सुनिधि चौहान, राजा हसन, और बप्पा लाहिड़ी की आवाज़ों में, "चल हल्के हल्के"।

गीत - चल हल्के हल्के


सुजॊय - पूर्णत: सुनिधि चौहान का यह गीत है, राजा और बप्पा ने तो बस सहगायकों की भूमिका निभाई है। एक मस्त गाना जो एक जवान चुलबुली लड़की गाती है जो अपने मन के साथ चलती है और बाहरी दुनिया के किसी चीज़ के बारे में नहीं सोचती। ठीक ठाक गाना है, कोई नयी या ख़ास बात नज़र नहीं आई।

विश्व दीपक - अब तक तीन गानें हमने सुनें, लेकिन कोई भी गाना ऐसा नहीं महसूस हुआ जो एक लम्बी रेस का घोड़ा साबित हो सके। सभी गानें अच्छे हैं, लेकिन वह बात नहीं जिसे सुनने वाले कैच कर ले और गाने को कामयाबी की बुलंदी तक पहुँचाए। लेकिन यह याद रखते हुए कि बप्पा ने अभी अपना करीयर शुरु ही किया है, तो चलिए उन्हें यह मौका तो दे ही दिया जा सकता है। फ़िल्म का अंतिम गीत अब सुनने जा रहे हैं श्रेया घोषाल की आवाज़ में।

सुजॊय - "प्यार इतना ना कर" भी एक प्रेडिक्टेबल ट्रैक है। "ज़रा ज़रा बहकता है" जौनर का गाना है और श्रेया तो ऐसे गानें गाती ही रहती हैं, शायद इसीलिए मैंने "प्रेडिक्टेबल" शब्द का इस्तेमाल किया। चलिए आप ख़ुद ही सुनिए और अपनी राय दीजिए।

गीत - प्यार इतना ना कर


विश्व दीपक - एक बात आपने नोटिस की सुजॊय, कि 'अ फ़्लैट' एक हॊरर फ़िल्म है, लेकिन इसमें कोई भी गीत उस तरह का नहीं है। अब तक जितने भी इस तरह की फ़िल्में बनी हैं, सब में कम से कम एक गीत तो ऐसा ज़रूर होता है जो फ़िल्म के शीर्षक के साथ चलता है। ख़ैर, हॊरर, ख़ौफ़, और मौत के चंगुल से बाहर निकलकर आइए अब हम बैठते हैं 'लाइफ़ एक्स्प्रेस' में।

सुजॊय - 'लाइफ़ एक्स्प्रेस' एक कम बजट फ़िल्म है जिसमें संगीत है रूप कुमार राठौड़ का। इसलिए इस ऐल्बम से कुछ सुरीलेपन की उम्मीद ज़रूर की जा सकती है। संजय कलाटे निर्मित इस फ़िल्म के निर्देशक हैं अनूप दास और गीतकार हैं शक़ील आज़्मी। फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं रितुपर्णा सेनगुप्ता, दिव्या दत्ता, किरण जंगियानी, यशपाल शर्मा। फ़िल्म का पहला गाना सुनते हैं उदित नारायण और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में।

गीत - फीकी फीकी सी लगे ज़िंदगी


विश्व दीपक - सुंदर कम्पोज़िशन और एक टिपिकल उदित - अल्का डुएट। माफ़ कीजिएगा, अल्का नहीं, बल्कि अब श्रेया आ गई हैं।

सुजॊय - वैसे श्रेया को पूरा सम्मान देते हुए मैं यह कहना चाहूँगा कि इस गीत में उदित जी के साथ अल्का याज्ञ्निक की आवाज़ ज़्यादा मेल खाती, और जैसे ९० का वह ज़माना भी याद आ जाता!

विश्व दीपक - गीत के बारे में यही कह सकता हूँ कि एक आम रोमांटिक डुएट है, स्वीट ऐण्ड सिम्पल, लेकिन इस तरह के गानें पहले भी बहुत बने हैं। कुछ कुछ 'कोई मिल गया' के शीर्षक गीत की तरह प्रतीत होता है।

सुजॊय - फ़िल्म का दूसरा गीत है स्वयं रूप कुमार राठौड़ की आवाज़ में।

गीत - थोड़ी सी कमी रह जाती है


विश्व दीपक - बहुत ही सुंदर कम्पोज़िशन, दर्द भी है, दर्शन भी है, रोमांस भी है, गीत के बोल ज़रूर "थोड़ी सी कमी रह जाती है" है, लेकिन गीत में कोई भी कमी नज़र नहीं आई।

सुजॊय - वाह, क्या बात कही है आपने! सही में मैं भी रूप कुमार राठौड़ से कुछ इसी तरह के एक गीत की उम्मीद कर रहा था इस ऐल्बम में। संगीत के साथ साथ उन्होंने अपनी आवाज़ से इस गीत को पूर्णता को पहुँचाया है। शायद इसीलिए उन्होंने इसे गाया होगा ताक़ि वो जिस तरह से चाहते थे, उसी तरह का अंजाम इस गीत को मिले।

विश्व दीपक - रूप साहब एक अच्छे गायक तो हैं ही, उन्होंने कुछ फ़िल्मों में इससे पहले भी संगीत दे चुके हैं, जिनमें शामिल हैं - 'वो तेरा नाम था' (२००४), 'मधोशी' (२००४), और 'ज़हर' (२००५)। आइए अब आगे बढ़ा जाए और सुनते हैं जगजीत सिंह की आवाज़ में एक प्रार्थना, "फूल खिला दे शाख़ों पर"।

गीत - फूल खिला दे शाख़ों पर


सुजॊय - बहुत ही गहराई और गंभीर सुनाई दी जगजीत साहब की आवाज़, और इस गीत को ऐसी ही आवाज़ की ज़रूरत थी इसमें कोई शक़ नहीं है। इस गीत के लिए जगजीत सिंह को चुनने के लिए रूप कुमार राठौड़ को दाद देनी ही पड़ेगी। कम से कम साज़ों के इस्तेमाल से इस गीत में और ज़्यादा असर पैदा हो गई है। इस गीत में वायलिन पर जो पीस बार बार आता है, उसी धुन का इस्तेमाल पहले किसी गीत में हो चुका है, लेकिन मुझे बिल्कुल याद नहीं आ रहा कि कौन सा गाना है। शायद अल्का याज्ञ्निक का गाया कोई गाना है।

विश्व दीपक - बोल भी बहुत अच्छे लिखे हैं शक़ील साहब ने। "वक़्त बड़ा दुखदायक है, पापी है संसार बहुत, निर्धन को धनवान बना, निर्बल को बल दे मालिक, कोहरा कोहरा सर्दी है काँप रहा है पूरा गाँव, दिन को तपता सूरज दे रात को कम्बल दे मालिक, बैलों को एक गठरी गाँस इंसानों को दो रोटी, खेतों को भर दे गेहूँ से, काँधों को हल दे मालिक, हाथ सभी के काले हैं, नज़रें सब की पीली हैं, सीना ढाम्प दुपट्टे से सर को आँचल दे मालिक"। ज़िंदगी की बेसिक ज़रूरतों की याचना मालिक से किया जा रहा है इस गीत में। बहुत सुंदर!!!

सुजॊय - और अब आज की प्रस्तुति का अंतिम गीत समूह स्वरों में। यह एक लोरी है, लेकिन कुछ अलग क़िस्म का है। आम तौर पर लोरी में कम से कम साज़ों का इस्तेमाल होता है क्योंकि निंदिया रानी को दावत दी जा रही होती है। लेकिन इस समूह लोरी में रीदम का भी इस्तेमाल किया गया है। सुंदर कम्पोज़िशन है।

विश्व दीपक - "झूले झूले पालना, बन्नी झूले पालना, उड़ ना जाए उड़न खटोला, धीरे से उछालना"। सुनते हैं....

गीत - झूले झूले पालना


सुजॊय - 'अ फ़्लैट' और 'लाइफ़ एक्स्प्रेस' के गानें हमने सुनें। 'अ फ़्लैट' की बात करें, तो एक ही गीत जो मुझे अच्छा लगा वह है कैलाश खेर का गाया "मीठा सा इश्क़ लगे"। और जहाँ तक 'लाइफ़ एक्स्प्रेस' की बात है, इस फ़िल्म के सभी गानें जो हमने सुनें, मुझे अच्छे लगे हैं। जैसा कि आपने कहा था पिछले हफ़्ते, हम रेटिंग का सिल्सिला भी समाप्त करते हैं। लेकिन हम अपने सभी श्रोता व पाठकों से निवेदन कर रहे हैं कि इन नये गीतों को भी सुनें और टिप्पणी में अपनी राय लिखें।

विश्व दीपक - सुजॉय जी, मैंने रेटिंग का सिलसिला समाप्त करने की मांग एक खास वज़ह से की थी। अक्सर ऐसा होता है कि अगर किसी एलबम का एक हीं गाना अच्छा हो तो पूरे एलबम की रेटिंग बहुत नीचे चली जाती है और उस स्थिति में पाठक/श्रोता की नज़र में एलबम का मोल बड़ा हीं कम हो जाता है। अब चूँकि हमारी रेटिंग ३ से ४.५ के बीच हीं होती थी तो जिस एलबम को ३ मिले, वह एलबम बाकियों से निस्संदेह कमजोर होगा। और हम तो कई सारे एलबमों को ३ की रेटिंग दिया करते थे, यानि सब के सब कमजोर। अब कमजोर एलबम पर कौन-सा श्रोता अपना समय नष्ट करना चाहेगा। फिर तो हमारी सारी की सारी मेहनत मिट्टी में हीं मिल गई। हम चाहते थे कि श्रोता अपने विचार रखे, लेकिन विचार तो तब हीं आएँगे ना, जब कोई उन गानों को सुनेगा। बस यही सोचकर मैंने आपसे, सजीव जी से और सभी श्रोताओं से रेटिंग हटाने/हटवाने की दरख्वास्त की थी। आप से और सजीव जी से हरी झंडी पाकर मुझे बहुत खुशी हो रही है। जब मैंने सजीव जी से इस बात का ज़िक्र किया तो उन्होंने मेरी मांग पर मुहर लगाने के साथ-साथ एक सलाह भी दी। उनका कहना था कि अगर हम श्रोताओं को इतना बता दें कि कौन-सा गीत सबसे अच्छा है और कौन-सा सबसे कमजोर तो श्रोताओं को एक सिलसिलेवार ढंग से गीत सुनने में सहूलियत होगी। श्रोता सबसे अच्छा गीत सबसे पहले सुनकर अपने दिन की बड़ी हीं खूबसूरत शुरूआत कर सकता है। मुझे उनका ख्याल बड़ा हीं नेक लगा। और इसी कारण से मैं आज के उन दो गीतों को "चुस्त-दुरुस्त गीत" और "लुंज-पुंज गीत" के तमगों से नवाज़ते हुए नीचे पेश कर रहा हूँ। यह निर्णय मैंने बड़ी जल्दी में ले लिया है, इसलिए सुजॉय जी आपसे और सभी श्रोताओं से मेरा यह आग्रह है कि यह जरूर बताएँ कि रेटिंग हटाकर "आवाज़ की राय में" शुरू करने का निर्णय कितना सही है और कितना गलत। चलिए तो इन्हीं बातों के साथ मैं आज़ की समीक्षा के समाप्त होने की विधिवत घोषणा करता हूँ। अगली कड़ी में फिर से मुलाकात होगी।

आवाज़ की राय में

चुस्त-दुरुस्त गीत: फूल खिला दे शाखों पर

लुंज-पुंज गीत: चल हल्के हल्के

Tuesday, October 5, 2010

"क्रूक" में कुमार के साथ तो "आक्रोश" में इरशाद कामिल के साथ मेलोडी किंग प्रीतम की जोड़ी के क्या कहने!!

ताज़ा सुर ताल ३८/२०१०


सुजॊय - दोस्तों, नमस्कार, स्वागत है आप सभी का इस हफ़्ते के 'ताज़ा सुर ताल' में। विश्व दीपक जी, इस बार के लिए मैंने दो फ़िल्में चुनी हैं, और ये फ़िल्में हैं 'क्रूक' और 'आक्रोश'।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, क्या कोई कारण है इन दोनों को इकट्ठे चुनने के पीछे?

सुजॊय - जी हाँ, मैं बस उसी पे आ रहा था। एक नहीं बल्कि दो दो समानताएँ हैं इन दोनों फ़िल्मों में। एक तो यह कि दोनों के संगीतकार हैं प्रीतम। और उससे भी बड़ी समानता यह है कि इन दोनों की कहानी दो ज्वलंत सामयिक विषयों पर केन्द्रित है। जहाँ एक तरफ़ 'क्रूक' की कहानी आधारित है हाल में ऒस्ट्रेलिया में हुए भारतीयों पर हमले पर, वहीं दूसरी तरफ़ 'आक्रोश' केन्द्रित है हरियाणा में आये दिन हो रहे ऒनर किलिंग्स की घटनाओं पर।

विश्व दीपक - वाक़ई ये दो आज के दौर की दो गम्भीर समस्यायें हैं। तो शुरु किया जाए 'क्रूक' के साथ। मुकेश भट्ट निर्मित और मोहित सूरी निर्देशित 'क्रूक' के मुख्य कलाकार हैं इमरान हाश्मी, अर्जुन बजवा और नेहा शर्मा। प्रीतम का संगीत और कुमार के गीत। पहला गीत सुनते हैं "छल्ला इण्डिया तों आया"। पूरी तरह से पंजाबी फ़्लेवर का गाना है जिसे गाया है बब्बु मान और सुज़ेन डी'मेलो ने। पंजाबी भंगड़ा के साथ वेस्टर्ण फ़्युज़न में प्रीतम को महारथ हासिल है। "मौजा ही मौजा", "नगाड़ा", "दिल बोले हड़िप्पा" के बाद अब "छल्ला"।

सुजॊय - तो आइए इस थिरकन भरे गीत से आज के इस प्रस्तुति की शुरुआत की जाये।

गीत - छल्ला


सुजॊय - 'क्रूक' का दूसरा गीत है "मेरे बिना" जिसे गाया है निखिल डी'सूज़ा ने। अब तक निखिल की आवाज़ कई गायकों वाले गीतों में ही ली गयी थी जिसकी वजह से उनकी आवाज़ को अलग से पहचानने का मौका अब तक हमें नहीं मिल सका था। लेकिन इस गीत में केवल उन्ही की आवाज़ है। जिस तरह से जावेद अली और कार्तिक आजकल कामयाबी के पायदान चढ़ते जा रहे हैं, लगता है निखिल के भी अच्छे दिन उन्हें बाहें पसार कर बुला रहे हैं।

विश्व दीपक - गीत की बात करें तो इस गीत में रॊक इन्फ़्लुएन्स है और एक सॊफ़्ट रोमांटिक नंबर है यह। शुरु शुरु में इस गीत को सुनते हुए कोई ख़ास बात नज़र नहीं आती, लेकिन गीत के ख़तम होते होते थोड़ी सी हमदर्दी होने लगती है इस गीत के साथ। निखिल ने अच्छा गाया है और क्योंकि उनका यह पहला एकल गाना है, तो उन्हें हमें मुबारक़बाद देनी ही चाहिए। वेल डन निखिल!

सुजॊय - वैसे निखिल ने हाल ही में 'अंजाना अंजानी' का शीर्षक गीत भी गाया है। 'उड़ान' और 'आयेशा' में भी गीत गाये हैं। लेकिन यह उनका पहला सोलो ट्रैक है। आइए अब सुनते हैं इस गीत को।

गीत - मेरे बिना


विश्व दीपक - 'क्रूक' भट्ट कैम्प की फ़िल्म है और नायक हैं इमरान हाश्मी। तो ज़ाहिर है कि इसके गानें उसी स्टाइल के होंगे। वही यूथ अपील वाले इमरान टाइप के गानें। पिछले कुछ फ़िल्मों में इमरान ने ऒनस्क्रीन किस करना बंद कर दिया था और वो फ़िल्में कुछ ख़ास नहीं चली (वन्स अपॉन ए टाईम इन मुंबई को छोड़कर) शायद इसलिए वो इस बार 'क्रूक' में अपने उसी सिरियल किसर वाले अवतार में नज़र आयेंगे। ख़ैर, अगले गीत की बात की जाये। इस बार के.के की आवाज़। इमरान हाश्मी के फ़िल्मों में एक गीत के.के की आवाज़ में ज़रूर होता है क्योंकि के.के की आवाज़ में इमरान टाइप के गानें ख़ूब जँचते हैं।

सुजॊय - यह गीत है "तुझी में"। यह भी रॊक शैली में कम्पोज़ किया गाना है, लेकिन निखिल के मुक़ाबले के.के की दमदार आवाज़ को ध्यान में रखते हुए हार्डकोर रॊक का इस्तेमाल किया गया है। ड्रम्स और पियानो का ख़ूबसूरत संगम सुनने को मिलता है इस गीत में। लेकिन जो मुख्य साज़ है वह है १२ स्ट्रिंग वाला गिटार जो पूरे गीत में प्रधानता रखता है।

विश्व दीपक - यह सच है कि इस तरह के गानें प्रीतम पहले भी बना चुके हैं, लेकिन शायद अब तक हम इस अंदाज़ से उबे नहीं हैं, इसलिए अब भी इस तरह के गानें अच्छे लगते हैं। आइए सुनते हैं।

गीत - तुझी में


सुजॊय - और अब एक और गीत 'क्रूक' का हम सुनेंगे, फिर 'आक्रोश' की तरफ़ बढ़ेंगे। यह गीत है मोहित चौहान की आवाज़ में, "तुझको जो पाया"। इस गीत में अकोस्टिक गीटार मुख्य साज़ है, कोई रीदम नहीं है गाने में। मोहित चौहान की दिलकश आवाज़ से गीत में जान आयी है। दरसल यह गीत निखिल के गाये "मेरे बिना" गीत का ही एक दूसरा वर्ज़न है।

विश्व दीपक - इन दोनों की अगर तुलना करें तो मोहित चौहान की आवाज़ में जो गीत है वह ज़्यादा अच्छा सुनाई दे रहा है। मोहित चौहान का ताल्लुख़ हिमाचल की पहाड़ियों से है। और अजीब बात है कि उनकी आवाज़ में भी जैसे पहाड़ों जैसी शांति है, सुकून है। कम से कम साज़ों के इस्तेमाल वाले गीतों में मोहित की शुद्ध आवाज़ को सुन कर वाक़ई दिल को सुकून मिलता है। इस पीढ़ी के पार्श्व गायकों का प्रतिनिधित्व करने वालों में मोहित चौहान का नाम एक आवश्यक नाम है। लीजिए सुनिए इस गीत को।

गीत - तुझको जो पाया


सुजॊय - आइए अब बढ़ा जाये 'आक्रोश' की ओर। क्योंकि इस फ़िल्म की कहानी हरियाणा के ऒनर किलिंग्स पर है (लेकिन मेरे हिसाब से फिल्म यूपी, बिहार के किसी गाँव को ध्यान में रखकर फिल्माई गई है), शायद इसलिए इसका संगीत भी उसी अंदाज़ का है। प्रीतम के स्वरबद्ध इन गीतों को लिखा है इरशाद कामिल ने। अजय देवगन, अक्षय खन्ना और बिपाशा बासु अभिनीत इस फ़िल्म का एक आइटम नंबर आजकल टीवी चैनलों में ख़ूब सुनाई व दिखाई दे रहा है - "तेरे इसक से मीठा कुछ भी नहीं"।

विश्व दीपक - "मुन्नी बदनाम" के बाद अब "इसक से मीठा"। और इस बार ठुमके लगा रही हैं समीरा रेड्डी। लेकिन हाल के आइटम नंबर की बात करें तो अब भी गुलज़ार साहब के "बीड़ी जल‍इ ले" से मीठा कुछ भी नहीं। ख़ैर, आइए हम ख़ुद ही सुन कर यह निर्णय लें, इस गीत को गाया है कल्पना पटोवारी और अजय झिंग्रन ने। कल्पना यूँ तो असम से संबंध रखती है, लेकिन इन्हें प्रसिद्धि मिली भोजपुरी गानों से। "जा तार परदेश बलमुआ" और "ए गो नेमुआ" जैसे सुपरहिट भोजपुरी गानों को गाने वाली यह गायिका हाल में हीं सिंगिंग के एक रियालटी शो में असम का प्रतिनिधित्व करती नज़र आईं थी। जहाँ तक इस गाने की बात है तो यह पूर्णत: एक कमर्शियल आइटम नंबर है और फ़िल्म की कहानी के लिए इसकी ज़रूरत थी भी। तो आइए इस गीत को सुन ही लिया जाये।

गीत - तेरे इसक से मीठा कुछ भी नहीं


सुजॊय - अगला गीत ज़रा हट कर है। प्रीतम ने एक इंटरव्यु में कहा है कि उन्हें वो गानें कम्पोज़ करने में ज़्यादा अच्छे लगते है जिनमें मेलडी होता है। तो साहब इस बार उन्हें मेलडियस कम्पोज़िशन का मौका मिल ही गया। इस गीत में, जिसका शीर्षक है "सौदे बाज़ी", नवोदित गायक अनुपम आमोद ने अपनी आवाज़ दी है। प्रीतम की नये नये गायकों की खोज जारी है और इस बार वे अनुपम को ढूंढ़ लाये हैं। लगता है यह गीत अनुपम को दूर तक लेके जाएगा।

विश्व दीपक - वैसे इसी गीत का एक और वर्ज़न है जिसे जावेद अली से गवाया गया है। लेकिन आज हम अनुपम का स्वागत करते हुए उन्ही का गाया गीत सुनेंगे। पता नहीं इस गीत की धुन को सुनते हुए ऐसा लग रहा है कि जैसे इसी तरह की धुन का कोई और गाना पहले बन चुका है। शायद बाद में याद आ जाए!

सुजॊय - इस गीत की ख़ासियत है इसकी सादगी। भारतीय साज़ों की ध्वनियाँ सुनने को मिलती हैं भले ही सिन्थेसाइज़र पर तय्यार किया गया हो। सुनते हैं अनुपम आमोद की आवाज़।

गीत - सौदे बाज़ी


विश्व दीपक - आज के दौर के एक और गायक जो सूफ़ी गीतों में ख़ूब अपना नाम कमा रहे हैं, वो हैं अपने राहत फ़तेह अली ख़ान साहब। कैलाश खेर ने जो मुक़ाम हासिल किया था, आज वही मुकाम राहत साहब का है। इस फ़िल्म में भी उनका उन्ही के टाइप का एक गाना है "मन की मत पे मत चलियो ये जीते जी मरवा देगा"।

सुजॊय - सचमुच आज हर फ़िल्म में राहत साहब का एक गीत जैसे अनिवार्य हो गया है। क्योंकि आजकल वो 'छोटे उस्ताद' में नज़र आ रहे हैं, मैंने एक बात उनकी नोटिस की है कि वो बहुत ही विनम्र स्वभाव के हैं और बहुत ज़्यादा इमोशनल भी हैं। बात बात पे उनकी आँखों में आँसू आ जाते हैं। और बार बार वो लेजेन्डरी गायकों का ज़िक्र करते रहते हैं। इतनी सफलता के बावजूद उनके अंदर जो विनम्रता है, वो साफ़ झलकती है।

विश्व दीपक - "मन की मत पे मत चलियो", इरशाद कामिल ने यमक अलंकार का क्या ख़ूबसूरत इस्तेमाल किया है "मत" शब्द में। दो जगह "मत" आता है लेकिन अलग अलग अर्थ के साथ।

सुजॊय - ठीक वैसे ही जैसे रवीन्द्र जैन ने लिखा था "सजना है मुझे सजना के लिए" और "जल जो ना होता तो जग जाता जल"। तो आइए सुनते हैं राहत साहब की आवाज़ में "मन की मत"।

गीत - मन की मत पे मत


विश्व दीपक - और अब आज की प्रस्तुति का अंतिम गीत एक भक्ति रचना सुखविंदर सिंह की आवाज़ में "राम कथा", जिसमें रामायण के उस अध्याय का ज़िक्र है जिसमें भगवान राम ने रावण का वध कर सीता को मुक्त करवाया था। एक पौराणिक कथा के रूप में ही इस गीत में उसकी व्याख्या की गई है।

सुजॊय - देखना है कि फ़िल्म में इसका फ़िल्मांकन कैसे किया गया है। तब कहेंगे कि क्या "पल पल है भारी विपदा है आयी" के साथ इसका कोई टक्कर है या नहीं! आइए सुन लेते हैं यह गीत।

गीत - राम कथा


सुजॊय - हाँ तो दोस्तों, कैसे लगे इन दोनों फ़िल्मों के गानें? हमने दोनों फ़िल्मों के चार चार गानें आपको सुनवाये और एक एक गानें छोड़ दिये हैं, लेकिन आपको यकीन दि्ला दें कि उससे आप किसी अच्छे गीत से वंचित नहीं हुए हैं। अगर आप मेरी पसंद की बात करें तो 'क्रूक' का "तुझको जो पाया" (मोहित चौहान) और 'आक्रोश' का "मन की मत पे मत जाना" (राहत फ़तेह अली ख़ान) मुझे सब से ज़्यादा पसंद आये। बाक़ी गानें सो-सो लगे। रेटिंग की बात है तो मेरी तरफ़ से दोनों ऐल्बमों को ३ - ३ अंक।

विश्व दीपक - सुजॉय जी, मैं आपकी टिप्पणियों को सर-आँखों पर रखते हुए मैं आपके द्वारा दिए गए रेटिग्स को बरकरार रखता हूँ। जहाँ तक प्रीतम के संगीत की बात है तो वो हर बार हर फिल्म में ऐसे कुछ गाने जरूर देते हैं, जिन्हें श्रोताओं
का भरपूर प्यार नसीब होता है। दोनों फिल्मों में ऐसे एक्-दो गाने जरूर हैं। संगीत और इन्स्ट्रुमेन्ट्स के बारे में आपने तो लगभग सब कुछ हीं कह दिया है, इसलिए मैं थोड़ा "बोलों" का जिक्र करूँगा। "कुमार" और "इरशाद कामिल" दोनों हीं अलग तरह के गाने लिखने के लिए जाने जाते हैं। फिर भी अगर मुझसे पूछा जाए कि किसके गाने "अन-कन्वेशनल" होते हैं और दिल को ज्यादा छूते हैं तो मैं इरशाद भाई का नाम लूँगा। इरशाद भाई ने जहाँ एक तरफ "तू जाने ना" लिखकर एकतरफा प्यार करने वालों को एक एंथम दिया है, वहीं "न शहद, न शीरा, न शक्कर" लिखकर "नौटंकी" वाले गानों को कुछ नए शब्द मुहैया कराए हैं। मैं उनके शब्द-सामर्थ्य और शब्द-चयन का कायल हूँ। आने वाली फिल्मों में भी मैं उनसे ऐसे हीं नए शब्दों और बोलों की उम्मीद रखता हूँ। चलिए तो इन्हीं बातों के साथ आज की समीक्षा पर विराम लगाते हैं। उससे पहले सभी श्रोताओं के लिए एक सवाल/एक आग्रह/एक अपील: मैं चाहता हूँ कि हम समीक्षा में रेटिंग न दें, बल्कि बस इतना हीं लिख दिया करें कि कौन-सा गाना बहुत अच्छा है और कौन-सा थोड़ा कम। मैंने यह बात सुजॉय जी से भी कही है और उनके जवाब का इंतज़ार कर रहा हूँ। उनके जवाब के साथ-साथ मैं आप सबों की राय भी जानना चाहूँगा।

आवाज़ रेटिंग्स: क्रूक: ***, आक्रोश: ***

पाठको की रूचि में कमी होती देख आज से सवालों का सिलसिला(ट्रिविया) समाप्त किया जाता है.. सीमा जी, हमें मुआफ़ कीजिएगा, लेकिन आपके अलावा कहीं और से जवाब नहीं आता और आप भी पिछली कुछ कड़ियों में नदारद थीं, इसलिए सीने पर पत्थर रखकर हमें यह निर्णय लेना पड़ा :)

TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. 'लम्हा'।
२. "जियो, उठो, बढ़ो, जीतो"।
३. 'तलाश'।

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ