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Thursday, November 17, 2011

काहे मेरे राजा तुझे निन्दिया न आए...शृंखला की अंतिम लोरी कुमार सानु की आवाज़ में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 790/2011/230

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार! आज इस स्तंभ में प्रस्तुत है लघु शृंखला 'चंदन का पलना, रेशम की डोरी' का अन्तिम अंक। अब तक इस शृंखला में आपने जिन गायकों की गाई लोरियाँ सुनी, वो थे चितलकर, तलत महमूद, हेमन्त कुमार, मन्ना डे, मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, किशोर कुमार, येसुदास और तलत अज़ीज़। आज इस शृंखला का समापन हम करने जा रहे हैं गायक कुमार सानू की आवाज़ से, और साथ मे हैं अनुराधा पौडवाल। १९९१ की फ़िल्म 'जान की कसम' की यह लोरी है "सो जा चुप हो जा...काहे मेरे राजा तुझे निन्दिया न आए, डैडी तेरा जागे तुझे लोरियाँ सुनाये"। जावेद रियाज़ निर्मित व सुशील मलिक निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे कृष्णा, साथी गांगुली, सुरेश ओबेरोय प्रमुख। फ़िल्म में संगीत था नदीम श्रवण का और गीत लिखे समीर नें। दोस्तों, यह वह दौर था कि जब टी-सीरीज़, नदीम श्रवण, समीर, अनुराधा पौडवाल की टीम पूरी तरह से फ़िल्म-संगीत के मैदान में छायी हुई थी, और एक के बाद एक म्युज़िकल फ़िल्में बनती चली जा रही थीं। गुलशन कुमार की हत्या के बाद ही जाकर यह दौर ख़त्म हुई और अलका याज्ञ्निक अनुराधा पौडवाल से आगे निकल गईं। उस दौर की कई फ़िल्में तो ऐसी थीं कि फ़िल्म ज़्यादा नहीं चली, पर उनके गानें चारों तरफ़ गूंजे और ख़ूब गूंजे। 'जान की कसम' भी एक ऐसी ही फ़िल्म थी जिसके गीत ख़ूब चर्चित हुए जैसे कि "जो हम न मिलेंगे तो गुल न खिलेंगे", "I just called you to say I love you", "चम चम चमके चाँदनी चौबारे पे" और "बरसात हो रही है, बरसात होने दे", तथा आज का प्रस्तुत गीत भी।

फ़िल्मी लोरियों की बात करते हुए इस शृंखला में हम ४० के दशक से ९० के दशक में पहुँच गए। पर अफ़सोस की बात यह है कि आज के दौर में फ़िल्मी लोरियों का चलन बन्द ही हो गया है। फ़िल्म 'अनाड़ी' में एक लोरी थी "छोटी सी प्यारी नन्ही सी आई कोई परी" जिसे अलका और उदित नें अलग अलग गाया था। फिर २००४ की शाहरुख़ ख़ान की फ़िल्म 'स्वदेस' में एक उदित-साधना की गाई एक लोरी थी "आहिस्ता आहिस्ता निन्दिया तू आ", २००६ की फ़िल्म 'फ़ैमिली' में भी सोना महापात्र की आवाज़ में एक लोरी थी "लोरी लोरी लोरी"। इस तरह से यदा-कदा कोई लोरी सुनाई दे जाती है, पर संख्या में बिल्कुल नगण्य है। यह सच है कि आजकल फ़िल्मों की कहानी असल ज़िन्दगी के करीब आ गई है, और नाटकीयता कम हो गई है। पर यह लोरियों के न होने का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि लोरियाँ तो असल ज़िन्दगी में आज भी जारी है। आज भी माँ-बाप रात को जाग जाग कर अपने बच्चों को सुलाने के लिए लोरियाँ गाते हैं, और सिर्फ़ हमारे यहाँ ही नहीं, पूरे विश्व भर में। तो फिर फ़िल्मों की कहानियों में लोरी की गुंजाइश क्यों ख़त्म हो गई? काश कि फ़िल्मों में पहली जैसी मासूमियत वापस लौट आये और एक बार फिर से कोमल, मखमली, मेलोडियस लोरियाँ श्रोताओं को सुनने को मिले। इसी आशा के साथ अब मुझे, यानी सुजॉय चटर्जी को 'चंदन का पलना, रेशम की डोरी' शृंखला को समाप्त करने की अनुमति दीजिए, और आप सुनिए आज की यह लोरी। यह शॄंखला आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा टिप्पणी में या oig@hindyugm.com पर ईमेल भेज कर। नमस्कार!



आज की चर्चा -बचपन के दिनों की वो कौन सी लोरी है जो आपको आज भी गुदगुदा जाती है हमें बताएं

पिछले अंक में


खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, November 16, 2011

घर के उजियारे सो जा रे....याद है "डैडी" की ये लोरी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 789/2011/229

'चंदन का पलना, रेशम की डोरी' - पुरुष गायकों की गाई फ़िल्मी लोरियों पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला की नवी कड़ी में आप सभी का मैं, सुजॉय चटर्जी, साथी सजीव सारथी के साथ फिर एक बार स्वागत करता हूँ। आज की कड़ी के लिए हमनें जिस गीत को चुना है वह है १९८९ की फ़िल्म 'डैडी' का। फ़िल्म की कहानी पिता-पुत्री के रिश्ते की कहानी है। यह कहानी है पूजा की जिसे जवान होने पर पता चलता है कि उसका पिता ज़िन्दा है, जो एक शराबी है। पूजा किस तरह से उनकी ज़िन्दगी को बदलती है, कैसे शराब से उसे मुक्त करवाती है, यही है इस फ़िल्म की कहानी। बहुत ही मर्मस्पर्शी कहानी है इस फ़िल्म की। पूजा को उसके नाना-नानी पाल-पोस कर बड़ा करते हैं और उसे अपनी मम्मी-डैडी के बारे में कुछ भी मालूम नहीं। उसके नाना, कान्ताप्रसाद के अनुसार उसके डैडी की मृत्यु हो चुकी है। पर जब पूजा बड़ी होती है तब उसे टेलीफ़ोन कॉल्स आने लगते हैं जो केवल 'आइ लव यू' कह कर कॉल काट देता है। कान्ताप्रसाद को जब आनन्द नामक कॉलर का पता चलता है तो उसे पिटवा देते हैं और पूजा से न मिलने की धमकी देते हैं। पर एक दिन जब पूजा का एक बदमाश इज़्ज़त लूटने की कोशिश करता है तो आनन्द उसकी जान बचाता है और पूजा को पता चल जाता है यह बदसूरत और शराबी आनन्द ही उसका पिता है। पूजा और आनन्द की ज़िन्दगी किस तरह से मोड़ लेती है, यही है इस फ़िल्म की कहानी।

महेश भट्ट की इस फ़िल्म के माध्यम से पूजा भट्ट नें फ़िल्म के मैदान में कदम रखा था। डैडी की भूमिका में थे अनुपम खेर। बड़ी ख़ूबसूरत फ़िल्म है 'डैडी' और इस फ़िल्म के लिए अनुपम खेर को उस साल सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के 'फ़िल्मफ़ेयर क्रिटिक्स अवार्ड' से सम्मानित किया गया था। सूरज सनीम को सर्वश्रेष्ठ संवाद का 'फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड' से नवाज़ा गया था। और दोस्तों, सूरज सनीम नें ही इस फ़िल्म के तमाम गानें लिखे थे जिन्हें ख़ूब सराहना मिली। ख़ास तौर से तलत अज़ीज़ के गाये दो गीत - "आइना मुझसे मेरी पहली सी सूरत माँगे, मेरे अपने मेरे होने की निशानी माँगे" और "घर के उजियारे सो जा रे, डैडी तेरा जागे तू सो जा रे"। और यही दूसरा गीत, जो कि एक लोरी है, आज के अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं। 'डैडी' के संगीतकार थे राजेश रोशन। राजेश रोशन की अन्य फ़िल्मों के संगीत से बिल्कुल भिन्न है 'डैडी' का संगीत। एक कलात्मक फ़िल्म में जिस तरह का संगीत होना चाहिए, राजेश जी नें बिल्कुल वैसा संगीत इस फ़िल्म के लिए तैयार किया था। और तलत अज़ीज़ की आवाज़ भी अनुपम खेर पर सटीक बैठी है। शायद जगजीत सिंह की आवाज़ भी सही रहती। अच्छा दोस्तों, जगजीत सिंह से याद आया कि तलत अज़ीज़ का पहला ऐल्बम, जो १९७९ में जारी हुआ था, उसका शीर्षक था 'Jagjit Singh presents Talat Aziz'। इस ऐल्बम तलत के लिए एक स्टेपिंग् स्टोन था, जिसे ख़ूब मकबूलियत हासिल हुई। मूलत: एक ग़ज़ल गायक, तलत अज़ीज़ नें कुछ गिनी-चुनी फ़िल्मों में भी पार्श्वगायन किया है जिनमें शामिल हैं 'उमरावजान', 'बाज़ार', 'औरत औरत औरत', 'धुन' और 'डैडी'। तो आइए सुना जाए तलत अज़ीज़ की मुलायम आवाज़ में इस लोरी को।



पहचानें अगला गीत, इस सूत्र के माध्यम से -
आज की पहली बिल्कुल सीधे सीधे पूछ रहे हैं। कुमार सानू और अनुराधा पौडवाल की गाई हुई एकमात्र फ़िल्मी लोरी है यह, बताइए कौन सी है?

पिछले अंक में


खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, November 15, 2011

ज़िन्दगी महक जाती है....जब सुरीली आवाज़ को येसुदास की और हो लोरी का वात्सल्य

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 788/2011/228

मस्कार दोस्तों! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आजकल आप आनन्द ले रहे हैं पुरुष गायकों द्वारा गाई हुई फ़िल्मी लोरियों की, और शृंखला है 'चंदन का पलना, रेशम की डोरी'। किसी भी बच्चे के सर से माँ और बाप में से किसी का भी अगर साया उठ जाये, तो वह बच्चा बड़ा ही अभागा होता है। माँ का प्यार एक तरह का होता है, और पिता का प्यार दूसरी तरह का। दोनों की समान अहमियत होती है बच्चे के विकास में। लेकिन हर बच्चा तो किस्मतवाला नहीं होता न! किसी को माँ नसीब नहीं होता तो किसी को पिता। माँ के अभाव में पिता को पिता और माँ, दोनों की भूमिकाएँ निभानी पड़ती हैं। ऐसी सिचुएशन कई बार हमारी फ़िल्मों में भी देखी गई है। आज हम जिस गीत को सुनने जा रहे हैं उसकी कहानी भी इसी तरह की है। गोविंदा पर फ़िल्माई यह लोरी है 'हत्या' फ़िल्म की - "ज़िन्दगी महक जाती है, हर नज़र बहक जाती है, न जाने किस बगिया का फूल है तू मेरे प्यारे, आ रा रो आ रा रो"। गायक हैं येसुदास और साथ में आवाज़ लता जी की है जो उस मातृहीन बच्चे के सपने में उसकी माँ की भूमिका में गाती हैं। दोस्तों, येसुदास और लोरी की जब साथ-साथ बात चलती है तो सबसे पहले जिस लोरी की याद आती है वह है फ़िल्म 'सदमा' की "सुरमई अखियों में नन्हा मुन्ना एक सपना दे जा रे"। लेकिन क्योंकि हम इस लोरी को पहले ही सुनवा चुके हैं, इसलिए हमनें 'हत्या' फ़िल्म की लोरी चुनी। येसुदास की आवाज़ भी इतनी कोमल है कि उनकी आवाज़ में कोई लोरी सुनना एक अदभुत अनुभव होता है। यह हैरत की ही बात है कि उनसे और भी लोरियाँ क्यों नहीं गवाई गई!

'हत्या' १९८८ की फ़िल्म थी जिसका निर्माण व निर्देशन कीर्ति कुमार नें किया था, जो गोविंदा के भाई हैं। गोविंदा, नीलम, राज किरण, अनुपम खेर प्रमुख अभिनीत इस फ़िल्म में संगीत था बप्पी लाहिड़ी का और गीत लिखे इंदीवर नें। फ़िल्म सुपरहिट हुई और इसके गीत भी ख़ूब चले थे। आज की लोरी के अलावा इस फ़िल्म के अन्य चर्चित गीत थे "मैं प्यार का पुजारी मुझे प्यार चाहिए" (मोहम्मद अज़ीज़, सपना मुखर्जी), "आप को अगर ज़रूरत है" (आशा, किशोर), "मैं तो सबका मेरा न कोई" (कीर्ति कुमार), और "प्यार मिलेगा यार मिलेगा" (कीर्ति कुमार)। 'हत्या' एक म्युज़िकल थ्रिलर फ़िल्म थी, इसकी कहानी भी एक बच्चे के इर्द-गिर्द घूमती है जिसनें अपनी माँ-बाप की हत्या अपनी आँखों से देखी है। राजा एक गूंगा और बधीर बच्चा है जिसनें हत्या होते देख लिया, और उसके बाद उसकी आँखों के सामने उसकी माँ की भी हत्या कर दी गई। राजा वहाँ से किसी तरह भाग निकला पर बेघर, बेसहारा होकर रह गया। किस्मत इतनी ज़रूर अच्छी थी कि उसे सागर (गोविंदा) नामक एक पेण्टर मिल गया। सागर की पत्नी और बच्चे की मौत हो गई थी और वो एक अकेलेपन से भरी ज़िन्दगी जी रहा था। ऐसे में सागर के जीवन का एक ही लक्ष्य रह गया इस गूंगे-बहरे बच्चे को पाल-पोस कर बड़ा करना। लेकिन वो हत्यारे राजा की तलाश में थे क्योंकि वही एक चश्मदीद गवाह था उनके कूकर्मों का। सागर को भी धीरे धीरे पता चला उस हत्या के बारे में। पर कातिलों नें सागर को ही फँसा दिया और सागर की जेल हो गई। सागर जेल से बाहर आकर मर्डर मिस्ट्री को सॉल्व किया। आइए सुनते हैं यह लोरी जिसमें सागर राजा को सुला रहे हैं और राजा को अपनी माँ की याद आ रही है। माँ की भूमिका में है अंजना मुमताज़, जो बच्चे के सपने में आकर गाती है "ज़मीं पे रहूँ या फ़लक पर तेरे आसपास हूँ मैं, दुआओं का साया बन कर तेरे साथ-साथ हूँ मैं"। सुनते हैं यह सुन्दर लोरी।



पहचानें अगला गीत, इस सूत्र के माध्यम से -
पिता-पुत्री के रिश्ते की कहानी पर बनी इस फ़िल्म को क्रिटिकल अक्लेम मिली थी। पर्दे पर जिन अभिनेता-अभिनेत्री नें बाप-बेटी के रिश्ते को साकार किया, उसी जोड़ी नें एक अन्य फ़िल्म में भी बाप-बेटी का रिश्ता निभाया था जिसमें आमिर ख़ान नायक थे। राजेश रोशन स्वरबद्ध किस लोरी की हम बात कर रहे हैं?

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खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


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Monday, November 14, 2011

आ री आजा, निन्दिया तू ले चल कहीं....बाल दिवस पर किशोर दा लाये एक मीठी लोरी बच्चों के लिए

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 787/2011/227

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी नियमित व अनियमित श्रोता-पाठकों को हमारा सप्रेम नमस्कार! आज १४ नवंबर है, भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहरलाल नेहरु का जन्मदिन, जिसे हम सब 'बाल-दिवस' के रूप में मनाते हैं। संयोग देखिए कि इन दिनों हम जिस शृंखला को प्रस्तुत कर रहे हैं, उसका भी बच्चों के साथ ही ज़्यादा ताल्लुख़ है। पुरुष गायकों द्वारा गाई हुई फ़िल्मी लोरियों पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'चंदन का पलना, रेशम की डोरी' की सातवीं कड़ी में आज हम लेकर आये हैं किशोर कुमार की आवाज़ में फ़िल्म 'कुवारा बाप' की लोरी "आ री आजा, निन्दिया तू ले चल कहीं, उड़नखटोले में, दूर, दूर, दूर, यहाँ से दूर"। साथ में लता जी की आवाज़ भी शामिल है। जहाँ किशोर दा की आवाज़ सजी है महमूद पर, लता जी नें एक बालकलाकार का पार्श्वगायन किया है। फ़िल्म के संगीतकार थे राजेश रोशन और इस लोरी को लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी। १९७४ में बनी 'कुंवारा बाप' के नायक थे महमूद। फ़िल्म के शीर्षक से ज़ाहिर है कि महमूद नें इसमें कुंवारे बाप की भूमिका निभाई होगी और इस तरह से इस लोरी की फ़िल्म में अहमियत बढ़ जाती है। यूं तो महमूद हास्य चरित्रों के लिए जाने जाते हैं, पर इस फ़िल्म में उन्होंने वह मर्मस्पर्शी अभिनय किया कि दर्शकों को रुलाकर छोड़ा। दोस्तों, मुझे महमूद के अभिनय वाली एक और फ़िल्म याद आ रही है जिसमें भी किशोर दा और लता जी की गाई हुई एक लोरी थी। फ़िल्म 'लाखों में एक' और गीत के बोल "चंदा ओ चंदा, किसने चुराई तेरी मेरी निन्दिया, जागे सारी रैना, तेरे मेरे नैना"। इस लोरी का एक लता सोलो वर्ज़न भी है।

'कुंवारा बाप' की कहानी अज़ीज़ क़ैसी की लिखी हुई है और फ़िल्म का निर्देशन महमूद नें ही किया था। इस फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि महेश (महमूद) एक साइकिल रिक्शा चालक है जिसे अपने माँ-बाप की कोई जानकारी नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण का वह उपासक है और एक जुग्गी झोपड़ी में रहता है। शीला (मनोरमा) नामक लड़की से उसकी दोस्ती है जो घर घर बाई का काम करती है, और जिसे वो एक दिन शादी करना चाहता है। पर कालू दादा (भूषण तिवारी) की गन्दी नज़र शीला पर है। एक रात महेश घर लौट रहा था कि उसे एक मन्दिर के बाहर एक छोटा बच्चा दिखाई दिया। वो इधर-उधर उसके परिवारवालों को ढूंढ़ा, मन्दिर के पुजारी से भी पूछा, पुलिस को भी सूचित किया, पर कहीं से भी उस बच्चे के माँ-बाप का पता न चल सका। न चाहते हुए भी हालात कुछ ऐसे बन गए कि उस बच्चे को उसे गले से लगाना ही पड़ा, पर उसके आस-पड़ोस वाले महेश के बच्चे के गोद लेने के ख़िलाफ़ थे। महेश भी बच्चे से नफ़रत करने लगा। वो उस बच्चे की तरफ़ ध्यान नहीं दिया करता, और इस तरह से बच्चा पोलियो का शिकार हो गया। इस घटना नें महेश के दिल पर असर किया और उसके दिल में बच्चे के लिए प्यार उमड़ पड़ा। उस बच्चे का नाम उसने हिन्दुस्तान रखा, उसका इलाज शुरु करवाया, उसे क्रच दिलवाये, और तमाम मुसीबतों से लड़ते हुए उसे बिशॉप कॉटन जुनियर कॉलेज में भर्ती करवाया। १२ साल बाद हिन्दुस्तान जब बड़ा हुआ, तब उसे हड्डी के एक ऑपरेशन की ज़रूरत आन पड़ी जिसके लिए महेश को १००० रुपय का बन्दोपस्त करना था। उसने पैसा इकट्ठा करने के लिए दारा से कुश्ती लड़ने और एक रिकशा रेस में भाग लेने का फ़ैसला किया, पर दारा और कालू नें उसे बुरी तरह पीटा। महेश रात-दिन काम करने लगा, पर इससे पहले कि वो पैसे जमा कर पाता, पुलिस इन्स्पेक्टर रमेश (विनोद खन्ना) ने उसे गिरफ़्तार कर लिया हिन्दुस्तान को अगवा करने के जुर्म में। रमेश और राधा (भारती) के अनुसार हिन्दुस्तान के जन्मदाता वो दोनों हैं। अदालत में मुकद्दमा चलता है और फ़िल्म का क्या अंजाम होता है, वह आप कभी फ़िल्म को ख़ुद ही देख कर जान लीजिएगा। इस कहानी को पढ़ कर आप समझ चुके होंगे कि इस लोरी की फ़िल्म में क्या अहमियत होगी। तो आइए सुना जाये किशोर दा की आवाज़ महेश पर और लता जी की आवाज़ हिन्दुस्तान पर।



पहचानें अगला गीत, इस सूत्र के माध्यम से -
कल की लोरी एक डुएट है। जिस गायक-गायिका जोड़ी नें इसे गाया, उस जोड़ी नें साथ में बहुत ज़्यादा गीत नहीं गाये हैं, पर राकेश रोशन और जया प्रदा अभिनीत एक अन्य फ़िल्म में इस जोड़ी के गाये गीत लोकप्रिय हुए थे। बताइए गोविंदा पर फ़िल्माई हुई किस लोरी की हम बात कर रहे हैं और राकेश रोशन-जया प्रदा के उस अन्य फ़िल्म का नाम क्या है?

पिछले अंक में
कल की हमारी शृंखला का सीरियल नंबर था ७८६, क्या किसी ने गौर किया

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


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Sunday, November 13, 2011

लल्ला लल्ला लोरी....जब सुनाने की नौबत आये तो यही लोरी बरबस होंठों पे आये

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 786/2011/226

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक और नई सप्ताह के साथ हम उपस्थित हैं, मैं सुजॉय चटर्जी, साथी सजीव सारथी के साथ, आप सभी का इस सुरीले सफ़र में फिर एक बार स्वागत करते हैं। आमतौर पर बच्चों के साथ माँ के रिश्ते को ज़्यादा अहमियत दी जाती है, फ़िल्मों में भी माँ और बच्चे के रिश्ते को ज़्यादा साकार किया गया है। पर कई फ़िल्में ऐसी भी बनीं जिनमें पिता-पुत्र या पिता-पुत्री के सम्बंध को पर्दे पर साकार किया गया। ऐसी कई फ़िल्मों में पिता द्वारा गाई लोरियाँ भी रखी गईं, हालाँकि संख्या में ये बहुत कम हैं। पर इन लोरियों के माध्यम से गीतकारों नें वो सब जज़्बात, वो सब मनोभाव भरें जो एक पिता के मन में होता है अपने बच्चे के लिए। ऐसी ही कुछ लाजवाब पुरुष लोरियों को लेकर इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में जारी है लघु शृंखला 'चंदन का पलना, रेशम की डोरी', जिसमें आप दस लोरियाँ सुन रहे हैं दस अलग अलग गायकों के गाये हुए। अब तक आपनें चितलकर, तलत महमूद, हेमन्त कुमार, मन्ना डे और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ें सुनी। और ये लोरियाँ केवल पाँच अलग गायक ही नहीं, बल्कि पाँच अलग गीतकारों के लिखे और पाँच अलग संगीतकारों द्वारा स्वरबद्ध किए हुए थे। ये गीतकार-संगीतकार जोड़ियाँ हैं राजेन्द्र कृष्ण - सी. रामचन्द्र, ख़ुमार बाराबंकवी - नाशाद, शक़ील - नौशाद, प्रेम धवन - रवि, और शैलेन्द्र - शंकर-जयकिशन। ५० और ६० के दशकों के बाद आज हम ७० के दशक में क़दम रखते हुए आपको सुनवाने जा रहे हैं गायक की मुकेश की गाई हुई लोरी और इसमें गीतकार-संगीतकार जोड़ी है आनन्द बक्शी - राहुल देव बर्मन। १९७७ की फ़िल्म 'मुक्ति' की यह कालजयी लोरी है "लल्ला लल्ला लोरी, दूध की कटोरी, दूध में बताशा, मुन्नी करे तमाशा"।

गायक मुकेश की आवाज़ भी बहुत ही कोमल है और लोरियों के लिए तो बिल्कुल पर्फ़ेक्ट। उनकी गाई फ़िल्म 'मिलन' की लोरी "राम करे ऐसा हो जाए, मेरी निन्दिया तोहे मिल जाए" हम जितनी भी बार सुनें एक अद्भुत अनुभव होता है। इसी तरह से 'मुक्ति' की यह लोरी भी अपने ज़माने का हिट गीत रहा है। शशि कपूर पर ज़्यादातर किशोर कुमार और रफ़ी साहब की आवाज़ ही सजी है, पर कई फ़िल्मों में मुकेश नें उनका पार्श्वगायन किया है जैसे कि 'मुक्ति', 'दिल ने पुकारा', 'माइ लव' आदि। 'मुक्ति' फ़िल्म की तमाम जानकारियाँ हमनें उस अंक में दिया था जिसमें हमनें मुकेश का ही गाया "सुहानी चाँदनी रातें हमें सोने नहीं देती" गीत सुनवाया था। आज बस इस लोरी की बात करते हैं। इस लोरी के भी दो संस्करण है; मुकेश वाले संसकरण का मिज़ाज हँसमुख है जिसमें पिता अपनी पुत्री को प्यार करते हुए यह लोरी गाते हैं, जबकि लता जी वाला संस्करण सैड वर्ज़न है। पिता के बिछड़ जाने के बाद जब बच्चा अपनी माँ से पापा कब आयेंगे पूछता है, तो उसे सम्भालते हुए, सुलाते हुए माँ उसी लोरी को गाती हैं, पर "मुन्नी करे तमाशा" के जगह पर बोल हो जाते हैं "जीवन खेल तमाशा"। दोनों ही संस्करण अपने आप में उत्कृष्ट है। क्योंकि इस शृंखला में हम गायकों की गाई लोरियाँ बजा रहे हैं, इसलिए लता जी वाला संस्करण हम फिर कभी सुनवाने की कोशिश करेंगे अगर सम्भव हो सका तो। आइए मुकेश की कोमल आवाज़ में सुनें यह लोरी।



पहचानें अगला गीत, इस सूत्र के माध्यम से -
मूलत: एक हास्य अभिनेता पर फ़िल्माई यह लोरी है, जो इस फ़िल्म के नायक भी हैं, पर यह फ़िल्म हास्य फ़िल्म नहीं बल्कि एक मर्मस्पर्शी फ़िल्म है। जिस बच्चे के लिए यह लोरी गाई जा रही है, उसका फ़िल्म में नाम है 'हिन्दुस्तान'। बताइए किस फ़िल्म के लोरी की बात हो रही है?

पिछले अंक में
अमित जी सवाल तो पढ़िए ध्यान से

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


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Thursday, November 10, 2011

आज कल में ढल गया....रफ़ी साहब की आवाज़ में लोरी का वात्सल्य

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 785/2011/225

मस्कार! 'चंदन का पलना, रेशम की डोरी' की पाँचवी कड़ी में आज आवाज़ रफ़ी साहब की। दोस्तों, रफ़ी साहब और लोरी का जब साथ-साथ ज़िक्र हो तो सबसे पहले जो दो गीत याद आते हैं वो हैं फ़िल्म 'ब्रह्मचारी' का "मैं गाऊँ तुम सो जाओ" और फ़िल्म 'बेटी-बेटे' का "आज कल में ढल गया दिन हुआ तमाम"। दोनों ही मास्टरपीसेस हैं अपनी अपनी जगह और मज़े की बात तो यह है कि दोनों ही शैलेन्द्र नें लिखे हैं और संगीत दिया है शंकर जयकिशन नें। बस इतना ज़रूर है कि 'ब्रह्मचारी' के गीत को व्यवसायिक कामयाबी ज़्यादा मिली, जबकि स्तर की बात करें तो 'बेटी-बेटे' का गीत ज़्यादा बेहतर लगता है। मैं बड़ा परेशान हो गया कि इन दोनों में से किस लोरी को चुना जाये, अन्त में "आज कल में ढल गया" के पक्ष में ही मन बना लिया। इस लोरी की सब से ख़ास बात यह है कि इसमें रफ़ी साहब नें हर एक शब्द में जान डाल दी है, आत्मा डाल दी है। और एस.जे. के ऑरकेस्ट्रेशन की भी क्या तारीफ़ करें! और शैलेन्द्र का काव्य, उफ़! गायक, गीतकार, और संगीतकार, तीनों के टीमवर्क नें इस लोरी को उस मुकाम तक पहुँचाया है कि इसमें किसी तरह का नुक्स निकाल पाना असंभव है। वायलिन और पियानो की ध्वनियों से शुरु हो कर इस गीत को रफ़ी साहब आगे बढ़ाते हैं "आज कल में ढल गया, दिन हुआ तमाम, तू भी सो जा सो गई रंग भरी शाम"।

गीत के अंतरों में लाइन दो बार गाई जाती है, पहली बार रफ़ी साहब नें सीधे सीधे गाया है जबकि दोहराव करते वक़्त उसमें इस तरह से जज़्बात भरे हैं कि जो उनके तरह का कोई भावुक गायक ही गा सकता है। शैलेन्द्र के लेखन की बात करें तो "नींद कह रही है चल, मेरी बाहें थाम" में कितना सुन्दर मानवीकरण किया है उन्होंने। इस लोरी के एक अंतरे में पंक्ति है "जी रहे हैं फिर भी हम सिर्फ़ कल की आस पर"। ठीक इसी तरह के बोल उन्होंने "मैं गाऊँ तुम सो जाओ" में भी लिखा था - "पर जग बदला, बदलेगी एक दिन तक़दीर हमारी, कल तुम जब आँखें खोलोगे, तब होगा उजियारा"। इसी उम्मीद पर, इसी आशा पर तो दुनिया टिकी हुई है। शैलेन्द्र अपने इन्हीं सरल पर गहरे अर्थ वाले बोलों के लिए याद किए जाते रहे हैं। और रफ़ी साहब इस लोरी को समाप्त करते हुए "जिनके आहटें सुनी, जाने किसके थे क़दम" को इस तरह से गाया है कि जो किसी भी गायक के लिए एक लेसन है कि किस तरह से धुन पर नियंत्रण रखते हुए दर्द को उजागर करना चाहिए। इस लोरी के कुल तीन संस्करण फ़िल्म में है। पहला रफ़ी साहब का एकल, दूसरा लता जी का एकल जो एक बच्चे पर फ़िल्माया गया है, और तीसरा रफ़ी और लता का डुएट है जो सुनिल दत्त और जमुना (फ़िल्म की नायिका) पर फ़िल्माया गया है। आज हम सुनने जा रहे हैं रफ़ी साहब का एकल संस्करण। आइए आनन्द लें रफ़ी साहब की आवाज़ में वात्सल्य रस का।



पहचानें अगला गीत, इस सूत्र के माध्यम से -
मुकेश की आवाज़ में इस फ़िल्म का एक अन्य गीत 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में बज चुका है। इस लोरी का एक सैड वर्ज़न लता जी की आवाज़ में भी है। बताइए फ़िल्म का नाम।

पिछले अंक में


खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, November 9, 2011

तुझे सूरज कहूँ या चन्दा...शायद आपके पिता ने भी कभी आपके लिए ये गाया होगा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 784/2011/224

मस्कार! दोस्तों, इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में हम प्रस्तुत कर रहे हैं लघु शृंखला 'चंदन का पलना, रेशम की डोरी'। इस शृंखला में आपनें बलराज साहनी पर फ़िल्माया तलत साहब का गाया फ़िल्म 'जवाब' का गीत सुना था। आज एक बार फिर बलराज साहब पर फ़िल्माई एक लोरी हम आपके लिए ले आये हैं, और इस बार आवाज़ है मन्ना डे की। एक समय ऐसा था जब किसी वयस्क चरित्र पर जब भी कोई गीत फ़िल्माया जाना होता तो संगीतकार और निर्माता मन्ना दा की खोज करते। इस बात का मन्ना दा नें एक साक्षात्कार में हँसते हुए ज़िक्र भी किया था कि मुझे बुड्ढों के लिए प्लेबैक करने को मिलते हैं। मन्ना दा की आवाज़ में कुछ ऐसी बात है कि नायक से ज़्यादा उनकी आवाज़ वयस्क चरित्रों पर फ़िट बैठती थी। लेकिन इससे उन्हें नुकसान कुछ नहीं हुआ, बल्कि कई अच्छे अच्छे अलग हट के गीत गाने को मिले। आज उनकी गाई जिस लोरी को हम सुनने जा रहे हैं, वह भी एक ऐसा ही अनमोल नग़मा है फ़िल्म-संगीत के धरोहर का। १९६९ की फ़िल्म 'एक फूल दो माली' का यह गीत है "तुझे सूरज कहूँ या चन्दा, तुझे दीप कहूँ या तारा, मेरा नाम करेगा रोशन जग में मेरा राजदुलारा"। प्रेम धवन के बोल और रवि का संगीत। इस गीत के बोल हैं तो बड़े साधारण, पर शायद हर माँ-बाप के दिल की आवाज़ है। हर माँ-बाप की यह उम्मीद होती है कि उसका बच्चा बड़ा हो कर बहुत नाम कमाये, उनका नाम रोशन करे। और यही बात इस गीत का मूल भाव है।

पिता-पुत्र के रिश्ते के इर्द-गिर्द घूमती 'एक फूल दो माली' देवेन्द्र गोयल की फ़िल्म थी, जिसमें बलराज साहनी, संजय ख़ान और साधना मुख्य भूमिकाओं में थे। बलराज साहनी को इस फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार के लिए नामांकन मिला था। फ़िल्म की भूमिका कुछ इस तरह की थी कि सोमना (साधना), एक ग़रीब लड़की, अपनी विधवा माँ लीला के साथ भारत-नेपाल बॉर्डर की किसी पहाड़ी में रहती हैं और सेब के बाग़ में काम करती है जिसका मालिक है कैलाश नाथ कौशल (बलराज साहनी)। कौशल पर्वतारोहण का एक स्कूल भी चलाता है जिसमें अमर कुमार (संजय ख़ान) एक विद्यार्थी है। सोमना और अमर मिलते हैं, प्यार होता है, और दोनों शादी करने ही वाले होते हैं कि एक तूफ़ान में अमर और सह-पर्वतारोहियों के मौत की ख़बर आती है। पर उस वक़्त सोमना गर्भवती हो चुकी होती हैं। उसे और उसके बच्चे को बचाने के लिए कौशल उससे शादी कर लेते हैं और बच्चे को अपना नाम देते हैं। ख़ुद पिता न बन पाने की वजह से उनका सोमना के बच्चे के साथ कुछ इस तरह का लगाव हो जाता है कि कोई कह ही नहीं सकता कि वो उस बच्चे का पिता नहीं है। पर नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। पाँच वर्ष बाद जब सोमना और कौशल अपने बेटे का छठा जनमदिन मना रहे होते हैं, उस पार्टी में अमर आ खड़ा होता है। आगे कहानी का क्या अंजाम होता है, यह तो आप ख़ुद ही देख लीजिएगा फ़िल्म की डी.वी.डी मँगवा कर, फ़िलहाल इस बेहद ख़ूबसूरत लोरी का आनन्द लीजिए मन्ना दा के स्वर में।



पहचानें अगला गीत, इस सूत्र के माध्यम से -
शैलेन्द्र, शंकर-जयकिशन और मोहम्मद रफ़ी के कम्बिनेशन की यह लोरी है, पर इसे शम्मी कपूर पर फ़िल्माई नहीं गई है। तो बताइए किस लोरी की हम बात कर रहे हैं? अतिरिक्त हिण्ट - इस लोरी के तीन संस्करण हैं - रफ़ी सोलो, लता सोलो, रफ़ी-लता डुएट।

पिछले अंक में
बहुत अच्छे उज्जवल

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


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Tuesday, November 8, 2011

चन्दन का पलना रेशम की डोरी....लोरी की मिठास और हेमंत दा की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 783/2011/223

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! इन दिनों इस स्तंभ में आप आनन्द ले रहे हैं पुरुष गायकों द्वारा गाई फ़िल्मी लोरियों से सजी इस लघु शृंखला 'चंदन का पलना, रेशम की डोरी' का। आज के अंक की लोरी भी यही है जिससे इस शृंखला का नाम रखा गया है। हेमन्त कुमार की गाई हुई १९५४ की फ़िल्म 'शबाब' की लोरी "चंदन का पलना, रेशम की डोरी, झुलना झुलाऊँ निन्दिया को तोरी"। शक़ील बदायूनी के बोल, नौशाद का संगीत। लोरी फ़िल्माई गई है भारत भूषण पर। वैसे इस लोरी के दो संस्करण हैं, पहला हेमन्त दा की एकल आवाज़ में और दूसरे में लता जी भी उनके साथ हैं। एकल संस्करण में महल का दृश्य है जिसमें गायक बने भारत भूषण इस लोरी को गाते हैं और पर्दे के उस पार कक्ष में नूतन बिस्तर में बैठी हैं। राजा और दासियाँ/ सहेलियाँ छुप-छुप कर यह दृश्य देख रहे हैं। मैंने फ़िल्म तो नहीं देखी पर इस गीत के विडियो को देख कर ऐसा लगता है जैसे नूतन को नींद न आने की बिमारी है और उन्हें सुलाने के लिए राजमहल में गायक को बुलाया गया है लोरी गाने के लिए। नूतन के सो जाते ही सहेलियाँ ख़ुशी से हंस पड़ती हैं।

दोस्तों, कल ही हम बात कर रहे थे कि जब भी फ़िल्मों में किसी पुरुष पर लोरी फ़िल्माने की बात आई, संगीतकार नें ऐसे गायक को चुना जिनकी आवाज़ मखमली हो, कोमल हो। हेमन्त कुमार भी एक ऐसे ही गायक रहे जिनकी आवाज़ गम्भीर होते हुए भी बेहद कोमल और मधुर है। नौशाद साहब नें हेमन्त कुमार को इस लोरी के लिए चुना और उस समय हेमन्त कुमार नवोदुत गायक थे बम्बई में। उन्होंने इसे इतनी ख़ूबसूरती के साथ गाया कि यह एक कालजयी लोरी बन गई है। इस लोरी के बारे में हेमन्त दा नें 'विविध भारती' के सम्भवत: 'जयमाला' कार्यक्रम में कहा था - "जब मैं १९५१ में बम्बई आया, नौशाद साहब उस वक़्त आइडील म्युज़िक डिरेक्टर थे। ऐसा सिन्सियरिटी, साधना देखा नहीं। रिदम के साथ-साथ मेलडी उन्होंने ही शुरु की थी, इसमें कोई शक़ नहीं। उन्होंने मुझे बुलाया और अपनी फ़िल्म 'शबाब' का एक गीत "ओ चंदन का पलना" गाने का ऑफ़र दिया। मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि नौशाद साहब नें मुझे गाने के लिए बुलाया है। राग पीलू पर आधारित यह गाना डुएट भी था और सोलो भी।" जी हाँ, डुएट वर्ज़न में लता जी हेमन्त दा के साथ हैं। लेकिन आज हम हेमन्त दा की एकल आवाज़ में इस लोरी का आनन्द लेने जा रहे हैं। तो प्रस्तुत है "चंदन का पलना, रेशम की डोरी..."।



पहचानें अगला गीत, इस सूत्र के माध्यम से -
संजय ख़ान और साधना अभिनीत एक फ़िल्म की यह लोरी है, पर लोरी इन दोनों में से किसी पर भी फ़िल्माई नहीं गई है। गायक वो हैं जिन्हें अफ़सोस रहा है कि केवल बूढ़े चरित्रों के लिए ही उनकी आवाज़ ज़्यादा ली गई। किस लोरी की हम बात कर रहे हैं?

पिछले अंक में
वाह अमित जी

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


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Monday, November 7, 2011

सो जा तू मेरे राजदुलारे सो जा...लोरी की जिद करते बच्चे पिता को भी माँ बना छोड़ते हैं

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 782/2011/222

'चंदन का पलना, रेशम की डोरी' - 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में कल से हमने शुरु की है पुरुष गायकों द्वारा गाई हुई फ़िल्मी लोरियों पर आधारित यह लघु शृंखला। लोरी, जिसे अंग्रेज़ी में ललाबाई (lullaby) कहते हैं। आइए इस 'ललाबाई' शब्द के उत्स को समझने की कोशिश करें। सन् १०७२ में टर्कीश लेखक महमूद अल-कशगरी नें अपनी किताब 'दीवानूल-लुगत अल-तुर्क' में टर्कीश लोरियों का उल्लेख किया है जिन्हें 'बालुबालु' कहा जाता है। ऐसी धारणा है कि 'बालुबालु' शब्द 'लिलिथ-बाई' (लिलिथ का अर्थ है अल्विदा) शब्द से आया है, जिसे 'लिलिथ-आबी' भी कहते हैं। जिउविश (Jewish) परम्परा में लिलिथ नाम का एक दानव था जो रात को आकर बच्चों के प्राण ले जाता था। लिलिथ से बच्चों को बचाने के लिए जिउविश लोग अपने घर के दीवार पर ताबीज़ टांग देते थे जिस पर लिखा होता था 'लिलिथ-आबी', यानि 'लिलिथ-बाई', यानि 'लिलिथ-अल्विदा'। इसी से अनुमान लगाया जाता है कि अंग्रेज़ी शब्द 'ललाबाई' भी 'लिलिथ-बाई' से ही आया होगा। और शायद यहीं से 'लोरी' शब्द भी आया होगा। है न दिलचस्प जानकारी! लोरी एक ऐसा गीत है जो यूनिवर्सल है, हर देश में, हर राज्य में, हर प्रान्त में, हर समुदाय में, हर घर में गाई जाती है। भारत के अलग अलग राज्यों में अलग अलग भाषाओं में लोरी का अलग अलग नाम है। असमीया में लोरी को 'निसुकोनी गीत' या 'धाईगीत' कहते हैं तो बंगला में 'घूमपाड़ानी गान' कहा जाता है; गुजराती में 'हल्लार्दु' तो कन्नड़ में 'जोगुला हाडु'; मराठी में 'अंगाई' और सिंधी में 'लोली' कहते हैं। दक्षिण भारत में मलयालम में 'थराट्टु पट्टू', तमिल में 'थालाट्टू' और तेलुगू में लोरी को 'लली पाटलू' कहा जाता है। दोस्तों, इन प्रादेशिक शब्दों को लिखने में अगर ग़लतियाँ हुईं हों तो क्षमा चाहूँगा।

और अब आज की लोरी। दोस्तों, यूं तो लोरी महिलाएँ गाती हैं, पर अगर पुरुषों से लोरियाँ गवाना हो तो इस बात का ज़रूर ध्यान रखा जाता है कि वह सुनने में कोमल, मुलायम लगे, सूदिंग लगे, जिससे बच्चा सो जाये। हर गायक की आवाज़ में लोरी सफल नहीं हो सकती। इसलिए फ़िल्मी संगीतकारों नें इस बात का ध्यान रखा है कि लोरियों के लिए ऐसे गायकों को चुना जाये जिनकी आवाज़ या तो मखमली हो या फिर वो ऐसे अंदाज़ में गायें कि सुनने में मुलायम लगे। आज हम जिस लोरी को सुनने जा रहे हैं उसे गाया है मखमली आवाज़ वाले तलत महमूद साहब नें। यह है १९५५ की फ़िल्म 'जवाब' की लोरी "सो जा तू मेरे राजदुलारे सो जा, चमके तेरी किस्मत के सितारे राजदुलारे सो जा"। गीतकार ख़ुमार बाराबंकवी की लिखी लोरी, जिसे स्वरबद्ध किया कमचर्चित संगीतकार नाशाद नें। 'इस्माइल फ़िल्म्स' के बैनर तले इस्माइल मेमन नें इस फ़िल्म का निर्माण व निर्देशन किया था और मुख्य भूमिकाओं में थे नासिर ख़ान, गीता बाली, जॉनी वाकर, मुकरी, अचला सचदेव, अशरफ़ ख़ान और बलराज साहनी। प्रस्तुत लोरी बलराज साहनी पर फ़िल्माया गई है। लोरी के शुरु होने से पहले बच्चा ज़िद करता है लोरी के लिए तो बलराज साहनी कहते हैं - "तू जीता मैं हारा, तू मुझे माँ बनाके ही छोड़ेगा"। तो आइए तलत साहब की मख़मली आवाज़ में सुनते हैं यह ख़ूबसूरत लोरी, पर ध्यान रहे, सो मत जाइएगा।



पहचानें अगला गीत, इस सूत्र के माध्यम से -
भारत भूषण गायक बने राजमहल में लोरी सुना रहे हैं रानी की भूमिका में नूतन को सुलाने के लिए और सखियाँ और राजा दूर से चोरी-चोरी नज़ारा देख रहे हैं। किस गायक की आवाज़ में है यह लोरी?

पिछले अंक में

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Sunday, November 6, 2011

धीरे से आजा री अँखियन में...सी रामचंद्र रचित एक कालजयी लोरी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 781/2011/221

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी रसिक श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! दोस्तों, ज़िन्दगी की शायद सबसे आनन्ददायक अनुभूति होती है माँ-बाप बनना। यह एक ऐसी ख़ुशी है जिसका शब्दों में बयान नहीं हो सकती। ईश्वर की परम कृपा से मुझे भी पिछले दिनों पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उस नन्हे के आने से जैसे ज़िन्दगी की धारा ही बदल गई। रात-रात जाग कर बच्चे को सुलाना कुछ और ही आनन्द प्रदान करती है। पुराने ज़माने में मायें लोरियाँ गा कर अपने बच्चों को सुलाती थीं, पर अब यह प्रथा केवल माओं तक सीमित नहीं रही। पिता भी समान रूप से घर के काम-काज में योगदान देते हुए बच्चों को सुलाने तक में अपना योगदान देते हैं। दोस्तों, अब तक लोरियों की तरफ़ मेरा ज़्यादा ध्यान नहीं जाता था, पर अब तो जैसे रातों को लोरियाँ याद कर कर गाने को जी चाहता है। इसी से मुझे ख़याल आया कि क्यों न 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में एक ऐसी शृंखला चलाई जाए जिसमें पुरुष गायकों द्वारा गाई हुई लोरियों को शामिल किए जाएँ। गायिकाओं द्वारा गाई लोरियों की तो फ़िल्मों में कोई कमी नहीं है, पर गायकों की लोरियाँ फ़िल्मों में बहुत ज़्यादा सुनने को नहीं मिला। तो आइए आज से प्रस्तुत है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'चंदन का पलना, रेशम की डोरी'। इस शृंखला में दस अलग अलग गायकों की आवाज़ों में आप सुनेंगे दस बेहतरीन फ़िल्मी लोरियाँ, जिन्हें सुनते हुए आप के अन्दर भी वात्सल्य रस का संचार होने लगेगा।

फ़िल्मों में पुरुष लोरियों की बात करें तो सबसे पुरानी और सुपरहिट लोरी जो याद आ रही है, वह है कुंदनलाल सहगल की गाई १९४० की फ़िल्म 'ज़िन्दगी' की लोरी "सो जा राजकुमारी सो जा, सो जा मैं बलिहारी सो जा"। सहगल साहब की मख़मली आवाज़ में इस लोरी की कुछ और ही अलग जगह है। इसके बाद १९४३ में अनिल बिस्वास के संगीत में अशोक कुमार नें फ़िल्म 'किस्मत' में गाई थी एक और कामयाब लोरी "धीरे धीरे आ रे बादल धीरे धीरे आ, मेरा बुलबुल सो रहा है, शोरगुल न मचा"। ये दोनों ही लोरियाँ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में हम बजा चुके हैं। इसलिए हम सीधे आ जाते हैं ५० के दशक में। 'चंदन का पलना, रेशम की डोरी' की पहली कड़ी में प्रस्तुत है चितलकर की आवाज़ में १९५१ की फ़िल्म 'अलबेला' की लोरी "धीरे से आजा री अँखियन में निन्दिया आजा री आजा, धीरे से आजा"। राजेन्द्र कृष्ण का लिखा गीत है और सी. रामचन्द्र का संगीत। इस लोरी के फ़िल्म में दो संस्करण हैं, एक लता जी की एकल आवाज़ में, और दूसरा एक डुएट था चितलकर और लता के युगल स्वरों में। रहमान और गीता बाली पर फ़िल्माई इस युगल लोरी का फ़िल्मांकन अलग हट के है। एक तरफ़ रहमान और गीता बाली कार में जाते हुए रहमान यह लोरी गाते हैं ख़ुश-मिज़ाज में और गीता बाली सुनते हुए सो जाती हैं। गीत के मध्य भाग में दूसरी तरफ़ बिमला कुमारी अपने पिता के साथ दिखती हैं दर्द भरे अंदाज़ में इस लोरी को गाती हुईं। इस तरह से एक ही लोरी में चितलकर ख़ुशी-ख़ुशी इसे गाते हैं जबकि लता जी वाला हिस्सा दर्दीला है। बहुत ही मशहूर लोरी है और सी. रामचन्द्र नें राग पीलू और दादरा ताल में कितना मीठा इसे कम्पोज़ किया है, आइए सुनते हैं इस कालजयी लोरी को।



अगला गीत पहचानें, हिंट ये है
तलत महमूद की मखमली आवाज़ में यह लोरी सज रही है उस अभिनेता पर जिन पर मन्ना डे की गाई हुई एक अन्य लोरी भी फ़िल्माई गई है। बताइए तलत महमूद की गाई यह कौन सी लोरी है?

पिछले अंक में

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