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Saturday, August 22, 2015

BAATON BAATON MEIN-11: INTERVIEW OF LYRICIST PT. NARENDRA SHARMA'S DAUGHTER SMT. LAVANYA SHAH

बातों बातों में - 11

गीतकार पंडित नरेन्द्र शर्मा की पुत्री श्रीमती लावण्या शाह से सुजॉय चटर्जी की बातचीत


"दर भी था, थी दीवारें भी, माँ, तुमसे घर घर कहलाया..."  




नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रॄंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज अगस्त 2015 के चौथे शनिवार के दिन प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध कवि, गीतकार, भाषाविद, दार्शनिक और आयुर्वेद के ज्ञाता पंडित नरेन्द्र शर्मा की पुत्री श्रीमती लावण्या शाह से की गई हमारी लम्बी बातचीत के सम्पादित अंश।    




लावण्या जी, आपका बहुत बहुत स्वागत है, नमस्कार!

नमस्ते, सुजॉय भाई, आपका आभार जो आपने आज मुझे याद किया।

यह हमारा सौभाग्य है आपको पाना, और आप से आपके पापाजी, यानी पंडित जी के बारे में जानना। यूं तो आप ने उनके बारे में अपने ब्लॉगों में या साक्षात्कारों में कई बार बताया भी है, आज के इस साक्षात्कार में हम आपसे पंडित जी की शख्सियत के कुछ अनछुये पहलुओं के बारे में भी जानना चाहेंगे। सबसे पहले यह बताइए पंडित जी के पारिवारिक पार्श्व के बारे में। ऐसे महान शख़्स के माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी कौन थे, उनके क्या व्यवसाय थे? 

पूज्य पापा जी का जन्म उत्तर प्रदेश प्रांत के ज़िला बुलंदशहर, खुर्जा, ग्राम जहाँगीरपुर में हुआ, जो अब ग्रेटर नॉयडा कहलाता है। तारीख थी फरवरी की 28, जी हाँ, लीप-यीअर में 29 दिन होते हैं, उस के ठीक 1 दिन पहले सन 1913 में। उनका संयुक्त परिवार था, भारद्वाज वंश का था, व्यवसाय से पटवारी कहलाते थे। घर को स्वामी पाडा कहा जाता था जो तीन मंजिल की हवेलीनुमा थी। जहाँ मेरे दादाजी स्व. पूर्णलाल शर्मा तथा उनकी धर्मपत्नी मेरी दादी जी स्व. गंगा देवी जी अपने चचेरे भाई व परिवार के अन्य सदस्यों के साथ आबाद थे। उनके खेत थे, अब भी हैं और फलों की बाडी भी थी। खुशहाल, समृद्ध परिवार था जहाँ एक प्रतिभावान बालक का जन्म हुआ और दूर के एक चाचाजी जिन्हें रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानियाँ पढ़ने का शौक था, उन्होंने बालक का नामकरण किया और शिशु को "नरेंद्र" नाम दिया!

वाह!

किसे खबर थी कि "नरेंद्र शर्मा" का नाम एक दिन भारतवर्ष में एक सुप्रसिद्ध गीतकार और कवि के रूप में पहचाना जाएगा? पर ऐसे ही एक परिवार में, बालक नरेंद्र पलकर बड़े हुए थे।

पंडित जी के परिवार का माहौल किस तरह का था जब वो छोटे थे? क्या घर पर काव्य, साहित्य, गीत-संगीत आदि का माहौल था? किस तरह से यह बीज पंडित जी के अंदर अंकुरित हुई? 

पापा से ही सुना है और उन्होंने अपनी पुस्तक "मुठ्ठी बंद रहस्य" में अपने पिताजी श्री पूर्ण लाल शर्मा जी को समर्पित करते हुए लिखा है कि 'पिता की तबीयत अस्वस्थ थी और बालक पिता की असहाय स्थिति को देख रहा था ..' चार साल की उमर में बालक नरेंद्र के सर से पिता का साया हट गया था और बड़े ताऊजी श्री गणपत भाई साहब ने, नरेंद्र को अपने साथ कर लिया और बहुत लाड प्यार से शिक्षा दी और घर की स्त्रियों के पास अधिक न रहने देते हुए उसे आरंभिक शिक्षा दी थी। एक कविता है पापा जी की ..'हर लिया क्यूं शैशव नादान'।

हर लिया क्यों शैशव नादान?
शुद्ध सलिल सा मेरा जीवन,
दुग्ध फेन-सा था अमूल्य मन,
तृष्णा का संसार नहीं था,
उर रहस्य का भार नहीं था,
स्नेह-सखा था, नन्दन कानन
था क्रीडास्थल मेरा पावन;
भोलापन भूषण आनन का
इन्दु वही जीवन-प्रांगण का
हाय! कहाँ वह लीन हो गया
विधु मेरा छविमान?
हर लिया क्यों शैशव नादान?

निर्झर-सा स्वछन्द विहग-सा,
शुभ्र शरद के स्वच्छ दिवस-सा,
अधरों पर स्वप्निल-सस्मिति-सा,
हिम पर क्रीड़ित स्वर्ण-रश्मि-सा,
मेरा शैशव! मधुर बालपन!
बादल-सा मृदु-मन कोमल-तन।
हा अप्राप्य-धन! स्वर्ग-स्वर्ण-कन
कौन ले गया नल-पट खग बन?
कहाँ अलक्षित लोक बसाया?
किस नभ में अनजान!
हर लिया क्यों शैशव नादान?

जग में जब अस्तित्व नहीं था,
जीवन जब था मलयानिल-सा
अति लघु पुष्प, वायु पर पर-सा,
स्वार्थ-रहित के अरमानों-सा,
चिन्ता-द्वेष-रहित-वन-पशु-सा
ज्ञान-शून्य क्रीड़ामय मन था,
स्वर्गिक, स्वप्निल जीवन-क्रीड़ा
छीन ले गया दे उर-पीड़ा
कपटी कनक-काम-मृग बन कर
किस मग हा! अनजान?
हर लिया क्यों शैशव नादान?


बहुत सुंदर, बहुत सुंदर!

भारत के संयुक्त परिवारों में अकसर हमारे पौराणिक ग्रंथों का पाठ जैसे रामायण होता ही है और सुसंस्कार और परिवार की सुद्रढ़ परम्पराएं भारतीयता के साथ सच्ची मानवता के आदर्श भी बालक मन में उत्पन्न करते हुए, स्थायी बन जाते हैं, वैसा ही बालक नरेंद्र के पितृहीन परिवार के लाड दुलार भरे वातावरण में हुआ था।

पंडित जी की शिक्षा-दीक्षा कैसे शुरु हुई?

शिक्षा घर पर ही आरम्भ हुई, फिर नरेंद्र को सीधे बड़ी कक्षा में दाखिला मिल गया और स्कूल के शिक्षक नरेंद्र की प्रतिभा व कुशाग्र बुद्धि से चकित तो थे पर बड़े प्रसन्न भी थे।

आगे की शिक्षा उन्होंने कहाँ से प्राप्त की?

प्रारम्भिक शिक्षा खुर्जा में हुई। इलाहाबाद विश्वविध्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में MA करने के बाद, कुछ वर्ष आनन्द भवन में 'अखिल भारतीय कॉंग्रेज़ कमिटी के हिंदी विभाग से जुड़े और नज़रबंद किये गए। देवली जेल में भूख हड़ताल से (14 दिनों तक) जब बीमार हालत में रिहा किए गए तब गाँव, मेरी दादीजी गंगादेवी से मिलने गये। वहीं से भगवती बाबू ("चित्रलेखा" के प्रसिद्ध लेखक) के आग्रह से बम्बई आ बसे। वहीं गुजराती कन्या सुशीला से वरिष्ठ सुकवि श्री पंत जी के आग्रह से व आशीर्वाद से पाणिग्रहण संस्कार सम्पन्न हुए। बारात में हिंदी साहित्य जगत और फिल्म जगत की महत्त्वपूर्ण हस्तियाँ हाजिर थीं - दक्षिण भारत से स्वर-कोकिला सुब्बुलक्षमीजी, सुरैयाजी, दिलीप कुमार, अशोक कुमार, अमृतलाल नागर व श्रीमती प्रतिभा नागरजी, भगवती बाबू, सपत्नीक अनिल बिश्वासजी, गुरुदत्त जी, चेतनानन्दजी, देवानन्दजी इत्यादि .. और जैसी बारात थी उसी प्रकार 19 वे रास्ते पर स्थित उनका आवास डॉ. जयरामनजी के शब्दों में कहूँ तो "हिंदी साहित्य का तीर्थ-स्थान" बम्बई जैसे महानगर में एक शीतल सुखद धाम मेँ परिवर्तित हो गया।

लावण्या जी, हम बात कर रहे हैं पंडित जी की शिक्षा के बारे में। कवि, साहित्यिक, गीतकार, दार्शनिक - ये सब तो फिर भी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, लेकिन आयुर्वेद तो बिल्कुल ही अलग शास्त्र है, जो चिकित्सा-विज्ञान में आता है। यह बताइए कि पंडित जी ने आयुर्वेद की शिक्षा कब और किस तरह से अर्जित की? क्या यह उनकी रुचि थी, क्या उन्होंने इसे व्यवसाय के तौर पर भी अपनाया, इस बारे में ज़रा विस्तार से बतायें। 

पूज्य पापा जी ने आयुर्वेद का ज्ञान किन गुरुओं की कृपा से पाया उनके बारे में बतलाती हूँ पर ये स्पष्ट कर दूं कि व्यवसाय की तरह कभी इस ज्ञान का उपयोग पापा जी ने नहीं किया था। हाँ, कई जान-पहचान के लोग आते तो उन्हें उपाय सुझाते और पापा ज्योतिष शास्त्र के भी प्रखर ज्ञाता थे, तो जन्म पत्रिका देखते हुए, कोई सुझाव उनके मन में आता तो बतला देते थे। हमारे बच्चों के जन्म के बाद भी उनके सुझाव से 'कुमार मंगल रस' शहद के साथ मिलाकर हमने पापा के सुझाव पर दी थी। आयुर्वेद के मर्मज्ञ और प्रखर ज्ञाता स्व. श्री मोटा भाई, जो दत्तात्रेय भगवान के परम उपासक थे, स्वयं बाल ब्रह्मचारी थे और मोटाभाई ने, पावन नदी नर्मदा के तट पर योग साधना की थी, वे पापा जी के गुरु-तुल्य थे, पापा जी उनसे मिलने अकसर सप्ताह में एक या दो शाम को जाया करते थे और उन्हीं से आयुर्वेद की कई गूढ़ चिकित्सा पद्धति के बारे में पापा जी ने सीखा था। मोटा भाई से कुछ वर्ष पूर्व, स्व. ढूंडीराज न्यायरत्न महर्षि विनोद जी से भी पापा का गहन संपर्क रहा था।

लावण्या जी, हमने सुना है कि पंडित जी 30 वर्ष की आयु में बम्बई आये थे भगवती चरण वर्मा के साथ। यह बताइए कि इससे पहले उनकी क्या क्या उपलब्धियाँ थी बतौर कवि और साहित्यिक। बम्बई आकर फ़िल्म जगत से जुड़ना क्यों ज़रूरी हो गया? 

पापा जी ने इंटरमीडीयेट की पढ़ाई खुरजा से की और आगे पढ़ने वे संस्कृति के गढ़, इलाहाबाद में आये और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी जोइन की। 19 वर्ष की आयु में, सन 1934 में प्रथम काव्य-संग्रह, "शूल - फूल" प्रकाशित हुआ। अपने बलबूते पर, एम्.ए. अंग्रेज़ी विषय लेकर, पास किया। 'अभ्युदय दैनिक समाचार पत्र' के सह सम्पादक पद पर काम किया। सन 1936 में "कर्ण - फूल" छपी, पर 1937 में "प्रभात - फेरी" काव्य संग्रह ने नरेंद्र शर्मा को कवि के रूप में शोहरत की बुलंदी पर पहुंचा दिया। काव्य-सम्मलेन में उसी पुस्तक की ये कविता जब पहली बार नरेंद्र शर्मा ने पढी तब, सात बार, 'वंस मोर' का शोर हुआ ...गीत है - "आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगें, आज से दो प्रेम योगी, अब वियोगी ही रहेंगें". और एक सुमधुर गीतकार के रूप में नरेंद्र शर्मा की पहचान बन गयी। इसी इलाहाबाद में, आनंद भवन मेँ, 'अखिल भारतीय कोँग्रेस कमिटि के हिंदी विभाग से जुडे, हिंदी सचिव भी रहे जिसके लिये पंडित जवाहरलाल नेहरू जी ने पापा जी को अखिल भारतीय कोंग्रेस कमिटी के दस्तावेजों को, जल्दी से अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद कर, भारत के कोने कोने तक पहुंचाने के काम में, उन्हे लगाया था। अब इस देशभक्ति का नतीजा ये हुआ के उस वक्त की अंग्रेज़ सरकार ने, पापा जी को, दो साल देवली जेल और राजस्थान जेल में कैद किया जहाँ नरेंद्र शर्मा ने 14 दिन का अनशन या भूख हड़ताल भी की थी और गोरे जेलरों ने जबरदस्ती सूप नलियों में भर के पिलाया और उन्हे जिंदा रखा। जब रिहा हुए तब गाँव गये, सारा गाँव वंदनवार सजाये, देशभक्त के स्वागत में झूम उठा! दादी जी स्व. गंगा देवी जी को एक सप्ताह बाद पता चला कि उनका बेटा, जेल में भूखा है तो उन्होंने भी एक हफ्ते भोजन नहीं किया। ऐसे कई नन्हे सिपाही महात्मा गांधी की आज़ादी की लड़ाई में, बलिदान देते रहे तब कहीं सन 1947 में भारत को पूर्ण स्वतंत्रता मिली थी। इस रोमांचक घटना का जिक्र करते हुए जनाब सादिक अली जी का लिखा अंग्रेज़ी आलेख देखें ..वे कहते हैं -- " Poet, late Pandit Narendra Sharma, was arrested without trial under the British Viceroy's Orders, for more than two years. His appointment to AICC was made by Pandit Jawaharlal Nehru. Pandit Narendra Sharma's photo along with then AICC members, is still there in Swaraj Bhavan, Allahabad."

बहुत ख़ूब! अच्छा, बम्बई कैसे आना हुआ उनका?
with Bhagwati Charan Verma

आपका कहना सही है कि भगवतीचरण वर्मा, 'चित्रलेखा ' के मशहूर उपन्यासकार नरेन्द्र शर्मा को अपने संग बम्बई ले आये थे। कारण था, फिल्म निर्माण संस्था "बॉम्बे टॉकीज" नायिका देविका रानी के पास आ गयी थी जब उनके पति हिमांशु राय का देहाँत हो गया और देविका रानी को, अच्छे गीतकार, पटकथा लेख़क, कलाकार सभी की जरूरत हुई। भगवती बाबू को, गीतकार नरेंद्र शर्मा को बोम्बे टाकीज़ के काम के लिये ले आने का आदेश हुआ था और नरेंद्र शर्मा के जीवन की कहानी का अगला चैप्टर यहीं से आगे बढा।

पंडित जी का लिखा पहला गीत पारुल घोष की आवाज़ में 1943 की फ़िल्म 'हमारी बात' का, "मैं उनकी बन जाऊँ रे" बहुत लोकप्रिय हुआ था। क्योंकि यह उनका पहला पहला गीत था, उन्होंने आपको इसके बारे में ज़रूर बताया होगा। तो हम भी आपसे जानना चाहेंगे उनके फ़िल्म जगत में पदार्पण के बारे में, इस पहली फ़िल्म के बारे में, इस पहले मशहूर गीत के बारे में।

पापा ने बतलाया था कि फिल्म 'हमारी बात' के लिए लिखा सबसे पहला गीत 'ऐ बादे सबा, इठलाती न आ...' उन्होंने इस ख्याल से इलाहाबाद से बंबई आ रही ट्रेन में ही लिख रखा था कि हिन्दी फिल्मों में उर्दू अलफ़ाज़ लिए गीत जरूरी है, जैसा उस वक्त का ट्रेंड था, तो वही गीत पहले चित्रपट के लिए लिखा गया और 'हमारी बात' में अनिल बिस्वास जी ने स्वरबद्ध किया और गायिका पारुल घोष ने गाया। पारुल घोष, मशहूर बांसुरी वादक श्री पन्नालाल घोष की पत्नी थीं और भारतीय चित्रपट संगीत के भीष्म पितामह श्री अनिल बिस्वास की बहन। जब यह गीत बना तब मेरा जन्म भी नहीं हुआ था पर आज इस गीत को सुनती हूँ तब भी बड़ा मीठा, बेहद सुरीला लगता है। एक वाकया याद आ रहा है, हमारे पडौसी फिल्म कलाकार जयराज जी के घर श्री राज कपूर आये थे और बार बार इसी गीत की एक पंक्ति गा रहे थे, 'दूर खड़ी शरमाऊँ, मैं मन ही मन अंग लगाऊँ, दूर खडी शरमाऊँ, मैं, उनकी बन जाऊं रे, मैं उनकी बन जाऊं' और इसी से मिलते जुलते शब्द यश राज की फिल्म 'दिल तो पागल है' में भी सुने 'दूर खडी शरमाये, आय हाय', तो प्रेम की बातें तब भी और अब भी ऐसे ही दीवानगी भरी होती रहीं हैं और होतीं रहेंगीं ..जब तक 'प्रेम', रहेगा ये गीत भी अमर रहेगा।

बहुत सुंदर! और पंडित जी ने भी लिखा था कि "मेरे पास मेरा प्रेम है"। अच्छा लावण्या जी, यह बताइए कि 'बॉम्बे टॉकीज़' के साथ वो कैसे जुड़े? क्या उनकी कोई जान-पहचान थी? किस तरह से उन्होंने अपना क़दम जमाया इस कंपनी में? 

पापा के एक और गहरे मित्र रहे मशहूर कथाकार श्री अमृतलाल नागर : उनका लिखा पढ़ें| नागर जी चाचा जी लिखते हैं ...
"एक साल बाद श्रद्धेय भगवती बाबू भी "बोम्बे टाकीज़" के आमंत्रण पर बम्बई पहुँच गये, तब हमारे दिन बहुत अच्छे कटने लगे। प्राय: हर शाम दोनोँ कालिज स्ट्रीट स्थित, स्व. डॉ. मोतीचंद्र जी के यहाँ बैठेकेँ जमाने लगे। तब तक भगवती बाबू का परिवार बम्बई नहीँ आया था और वह, कालिज स्ट्रीट के पास ही माटुंगा के एक मकान की तीसरी मंजिल मेँ रहते थे। एक दिन डॉक्टर साहब के घर से लौटते हुए उन्होँने मुझे बतलाया कि वह एक दो दिन के बाद इलाहाबाद जाने वाले हैँ। "अरे गुरु, यह इलाहाबाद का प्रोग्राम एकाएक कैसे बन गया ?" "अरे भाई, मिसेज रोय (देविका रानी रोय) ने मुझसे कहा है कि, मैँ किसी अच्छे गीतकार को यहाँ ले आऊँ! नरेन्द्र जेल से छूट आया है और मैँ समझता हूँ कि वही ऐसा अकेला गीतकार है जो प्रदीप से शायद टक्कर ले सके!' सुनकर मैँ बहुत प्रसन्न हुआ प्रदीप जी तब तक, बोम्बे टोकीज़ से ही सम्बद्ध थे "कंगन", "बंधन" और "नया संसार" फिल्मोँ से उन्होँने बंबई की फिल्मी दुनिया मेँ चमत्कारिक ख्याति अर्जित कर ली थी, लेकिन इस बात से कुछ पहले ही वह बोम्बे टोकीज़ मेँ काम करने वाले एक गुट के साथ अलग हो गए थे। इस गुट ने "फिल्मिस्तान" नामक एक नई संस्था स्थापित कर ली थी - कंपनी के अन्य लोगोँ के हट जाने से देविका रानी को अधिक चिँता नहीँ थी, किंतु, ख्यातनामा अशोक कुमार और प्रदीप जी के हट जाने से वे बहुत चिँतित थीँ - कंपनी के तत्कालीन डायरेक्टर श्री धरम्सी ने अशोक कुमार की कमी युसूफ ख़ान नामक एक नवयुवक को लाकर पूरी कर दी! युसूफ का नया नाम, "दिलीप कुमार" रखा गया, (यह नाम भी पापा ने ही सुझाया था - एक और नाम 'जहाँगीर' भी चुना था पर पापा जी ने कहा था कि युसूफ, दिलीप कुमार नाम तुम्हे बहुत फलेगा - (ज्योतिष के हिसाब से) और आज सारी दुनिया इस नाम को पहचानती है। किंतु प्रदीप जी की टक्कर के गीतकार के अभाव से श्रीमती राय बहुत परेशान थीँ। इसलिये उन्होँने भगवती बाबू से यह आग्रह किया था एक नये शुद्ध हिंदी जानने वाले गीतकार को खोज लाने का।

किसी भी सफल इंसान के पीछे किसी महिला का हाथ होता है, ऐसी पुरानी कहावत है। आपके विचार में आपकी माताजी का कितना योगदान है पंडित जी की सफलता के पीछे? अपनी माताजी की शख़्सीयत के बारे में विस्तार से बतायें।
with his better half

मेरी माँ, श्रीमती सुशीला नरेंद्र शर्मा, कलाकार थीं। चार साल हलदनकर इंस्टिट्यूट में चित्रकला सीख कर बेहतरीन आयल कलर और वाटर कलर के चित्र बनाया करती थीं। हमारे घर की दीवारों को उनके चित्रोँ ने सजाया। उस सुन्दर, परम सुशील, सर्वगुण संपन्न माँ के लिये, पापा का गीत गाती हूँ - "दर भी था, थीं दीवारें भी, माँ, तुमसे, घर घर कहलाया!" यह कम लोग जानते हैं के सुशीला गोदीवाला संगीत निर्देशक गायक अविनाश व्यास के ग्रुप में गाया भी करतीं थीं; रेडियो आर्टिस्ट थीं और अनुपम सुन्दरी थीं - हरी हरी, अंगूर सी आँखें, तीखे नैन नक्श, उजला गोरा रंग और इतनी सौम्यता और गरिमा कि स्वयं श्री सुमित्रानंदन पन्त जी ने सुशीला को दुल्हन के जोड़े में सजा हुआ देख कहा था, "शायद दुष्यंत राजा की शकुन्तला भी ऐसी ही होगी"। पन्त जी तो हैं हिंदी के महाकवि! मैं, अम्मा की बेटी हूँ! जिस माँ की छाया तले अपना जीवन संवारा वो तो ऐसी देवी माँ को श्रद्धा से अश्रू पूरित नयनों से प्रणाम ही कर सकती है। कितना प्यार दुलार देकर अपनी फुलवारी सी गृहस्थी को अम्मा ने सींचा था। पापा जी तो भोले शम्भू थे, दिन दुनिया की चिंता से विरक्त सन्यासी - सद गृहस्थ! अम्मा ही थी जो नमक, धान, भोजन, सुख सुविधा का जुगाड़ करतीं, साक्षात अम्बिका भवानी सी हमारी रक्षा करती, हमें सारे काम सिखलाती, खपती, थकती पर कभी घर की शांति को बिखरने न दिया, न कभी पापा से कुछ माँगा। अगर कोई नई साड़ी आ जाती तो हम तीन बहनों के लिये सहेज कर रख देतीं। ऐसी निस्पृह स्त्री मैंने और नहीं देखी और हमेशा सादा कपड़ों में अम्मा महारानी से सुन्दर और दिव्य लगतीं थीं। अम्मा की बगिया के सारे सुगंधी फूल, नारियल के पेड़, फलों के पेड़ उसी के लगाए हुए आज भी छाया दे रहे हैं पर अम्मा नहीं रहीं, यादें रह गयीं, बस!

बहुत खी सुंदर तरीके से आपने अपनी माताजी का वर्णन किया, हम भी भावुक हो गए हैं। लावण्या जी, फ़िल्म जगत के किन किन कलाकारों के साथ आपके परिवार का पारिवारिक सम्बंध रहा है? इसमें एक नाम लता मंगेशकर जी का अवश्य है । लता जी के साथ आपके पारिवारिक सम्बन्ध बारे में हम विस्तार से जानना चाहेंगे।
with the Melody Queen

स्वर साम्राज्ञी सुश्री लता मंगेशकर जी हमारे परिवार की बड़ी दीदी हैं। दीदी, पापा जी से निर्माता निर्देशक विनायक राव जी [जो मशहूर तारिका नंदा जी के पिताजी थे] उन के यहाँ दीदी जब काम किया करतीं थीं उसी दौरान सबसे पहली बार मिले थे ..फिर मुझे याद आता है मैं छोटी ही थी तब दीदी घर आयीं थीं, फिर मुलाकातें होती रहीं बाहर काम के लिये, बंबई फिल्म निर्माण का मुख्य केंद्र है तो कहीं न कहीं मुलाक़ात हो ही जाया करती थी।

लावण्या जी, एक तरफ़ आपके पिता, पंडित जी, और दूसरी तरफ़ स्वर-साम्राज्ञी लता जी। ऐसे महान दो कलाकारों का स्पर्श आपको जीवन में मिला, जो मैं समझता हूँ कि इस तरह का सौभाग्य बहुत कम लोगों को नसीब है। 

पापाजी और दीदी, दो ऐसे इंसान हैं जिनसे मिलने के बाद मुझे ज़िंदगी के रास्तों पे आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा मिली है। संघर्ष का नाम ही जीवन है। कोई भी इसका अपवाद नहीं- सत्चरित्र का संबल, अपने भीतर की चेतना को प्रखर रखे हुए किस तरह अंधेरों से लड़ना और पथ में कांटे बिछे हों या फूल, उन पर पग धरते हुए, आगे ही बढ़ते जाना ये शायद मैंने इन दो व्यक्तियों से सीखा। उनका सान्निध्य मुझे यह सिखला गया कि अपने में रही कमजोरियों से किस तरह स्वयं लड़ना जरुरी है- उनके उदाहरण से हमें इंसान के अच्छे गुणों में विश्वास पैदा करवाता है। पापा जी का लेखन, गीत, साहित्य और कला के प्रति उनका समर्पण और दीदी का संगीत, कला और परिश्रम करने का उत्साह, मुझे बहुत बड़ी शिक्षा दे गया। उन दोनों की ये कला के प्रति लगन और अनुदान सराहने लायक है ही, परन्तु उससे भी गहरा था उनका इंसानियत से भरापूरा स्वरूप जो शायद कला के क्षेत्र से भी ज्यादा विस्तृत था। दोनों ही व्यक्ति ऐसे जिनमें इंसानियत का धर्म कूट-कूट कर भरा हुआ मैंने बार बार देखा और महसूस किया । जैसे सुवर्ण शुद्ध होता है, उसे किसी भी रूप में उठालो, वह समान रूप से दमकता मिलेगा वैसे ही दोनों को मैंने हर अनुभव में पाया। जिसके कारण आज दूरी होते हुए भी इतना गहरा सम्मान मेरे भीतर बैठ गया है कि दूरी महज एक शारीरिक परिस्थिती रह गयी है। ये शब्द फिर भी असमर्थ हैं मेरे भावों को आकार देने में।

पंडित जी से सम्बंधित कुछ यादगार घटनाओं के बारे में बताइए। वो घटनाएँ या संस्मरण जो भुलाये नहीं भूलते। 
The Father-Daughter duo

हम बच्चे दोपहरी मेँ जब सारे बड़े सो रहे थे, पड़ोस के माणिक दादा के घर से कच्चे पक्के आम तोड़ कर किलकारियाँ भर रहे थे कि अचानक, पापाजी वहाँ आ पहुँचे, गरज कर कहा, "अरे! यह आम पूछे बिना क्योँ तोड़े? जाओ, जाकर माफी माँगो और फल लौटा दो"। एक तो चोरी करते पकड़े गए और उपर से माफी माँगनी पडी!!! पर अपने और पराये का भेद आज तक भूल नही पाए, यही उनकी शिक्षा थी। एक और बताती हूँ,  मेरी उम्र होगी कोई 8 या 9 साल की। पापाजी ने कवि शिरोमणि कवि कालिदास की कृति " मेघदूत " से पढ़ने को कहा। संस्कृत कठिन थी परँतु, जहाँ कहीँ , मैँ लड़खड़ाती, वे मेरा उच्चारण शुद्ध कर देते। आज, पूजा करते समय, हर श्लोक के साथ ये पल याद आते हैँ। एक और सुनिए, मेरी बिटिया, सिंदूर के जन्म के बाद जब भी रात को उठती, पापा, मेरे पास सहारा देते, मिल जाते, मुझसे कहते, "बेटा, मैँ हूँ, यहाँ"। आज मेरी बिटिया की प्रसूति के बाद, यही वात्सल्य उड़ेलते समय, पापाजी की निश्छल, प्रेममय वाणी और स्पर्श का अनुभव हो जाता है। जीवन अतीत के गर्भ से उदित होकर, भविष्य को संजोता आगे बढ रहा है।

पंडित जी ने जहाँ एक तरफ़ कविताएँ, साहित्य, और फ़िल्मी गीत लिखे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ ग़ैर फ़िल्मी भक्ति रचनाएं, ख़ास कर माता को समर्पित बहुत से गीत लिखे हैं, उनके लेखनी के इस पक्ष के बारे में भी बताइए। क्या वो अंदर से भी उतने ही धार्मिक थे? आध्यात्मिक थे? कैसी शख़्सीयत थी उनकी? 

पापा जी दार्शनिक, विचारशील, तरुण व्यक्ति और प्रखर बुद्धिजीवी रहे। धार्मिक तो वे थे ही पर भारतीय वांग्मय, पुराण, वेद, धर्म ग्रन्थ के अध्येता थे। कईयों का अनुभव है और लोग कहते थे 'नरेंद्र शर्मा चलता फिरता विश्व कोष है'। 'राम चरित मानस' को पढ़ते और आंसू बहाते भी देखा है। उनका धर्म , सच्ची मानवता थी। सभी को एक समान आदर दिया करते चाहे वो आनेवाला महाराणा मेवाड़ हो या हमारे घर कपड़े लेने आनेवाला हमारा इस्त्रीवाला हो। हमारी बाई को चिट्ठी बांच कर सुनाते और घंटों existansilism इस गूढ़ विषय पे वे बोलते। बी.बी.सी सुनते और मारग्रेट थेचर को चुनाव लड़ने की शुभ तारीख भी उन्होंने बतलाई थी, हाँ सच! और मैडम जीती थीं! वे पूरी बंबई, पैदल या लोकल ट्रेन से या बस से घूम आते। दूरदर्शन पे संगीत का प्रोग्राम रेकॉर्ड करवा के सहजता से घर पर बतियाते। कभी कोई पर्चा या नोट नहीं रखते। किसी भी विषय पे साधिकार, सुन्दर बोलते। पंडित नेहरू के निधन पर भी 'रनिंग्‍कमेंट्री' की थी। भारत माता के प्रति अगाध प्रेम व श्रद्धा थी जो उनकी कविताओं में स्पष्ट है। उन्होँने "कदली वन " काव्य -सँग्रह की "देश मेरे" शीर्षक कविता में कहा है - "दीर्घजीवी देश मेरे, तू, विषद वट वृक्ष है"। पापा जी का धर्म आडम्बरहीन और मानवतावादी था सर्वोदय और ' सर्वे भवन्तु सुखिन ' का उद्घोष लिये था।

अपने पापाजी के लिखे फ़िल्मी रचनाओं में अगर पाँच गीत हम चुनने के लिए कहें, तो आप कौन कौन से गीतों को चुनेगी? 

यूं तो मुझे उनके लिखे सभी गीत बहुत पसंद हैं, पर आपने पाँच के लिये कहा है तो मैं इन्हें चुनती हूँ। पहला, "ज्योति कलश छलके", गायिका लतादीदी, संगीत सुधीर फडके जी, शब्द पं. नरेंद्र शर्मा। दूसरा, "सत्यम शिवम् सुंदरम", गायिका लतादीदी, लक्ष्मीकांत प्यारे लाल जी का संगीत, शब्द पापा के। तीसरा, "नाच रे मयूरा", विविध भारती का सर्व प्रथम प्रसार-गीत, स्वर श्री मन्ना डे, संगीत अनिल बिस्वास जी और शब्द पंडित नरेंद्र शर्मा के। चौथा, "स्वागतम शुभ स्वागतम", स्वागत गान एशियाड खेलों के उदघाटन पर संगीत पंडित रवि शंकर जी, शब्द पापा जी पंडित नरेंद्र शर्मा के। और पाँचवाँ गीत "नैना दीवाने, एक नहीं माने, करे मनमानी माने ना...", गायिका सुरैया जी और संगीत श्री एस डी बर्मन तथा शब्द नरेंद्र शर्मा फिल्म "अफसर" जो देवानन्द जी के "नवकेतन बेनर" की प्रथम पेशकश थी।

और अब एक अंतिम सवाल, पंडित नरेन्द्र शर्मा एक ऐसी शख़्सीयत का नाम है जिनके व्यक्तित्व और उपलब्धियों का मूल्यांकन शब्दों में संभव नहीं। लेकिन फिर भी हम आपसे जानना चाहेंगे कि अगर केवल एक वाक्य में आपको अपने पापाजी के बारे में कुछ कहना हो तो आप किस तरह से उनकी शख़्सीयत का व्याख्यान करेंगी?

मैं मानती हूँ कि हर एक इंसान ईश्वर की अप्रतिम कृति है। हम ईश्वर के अंश हैं शायद, ईश्वर को कविता, गीत व संगीत बेहद प्रिय हैं! सबसे अलग, सबसे विशिष्ट हैं हम सभी। जैसे हमारे फिंगर प्रिंट सब से अलग होते हैं। पर पापा जी, पंडित नरेंद्र शर्मा के लिये एक वाक्य में कहूं तो यही कहूंगी - 'न भूतो न भविष्यति' ! एक अद्वितीय व्यक्तित्व के धनी, जो आजीवन सर्वथा साधारण और सहज बने रहे शायद यही उनकी तपस्या का फल था और उनकी आत्मा का अंतिम चरण ...अंतिम सोपान ...

बहुत बहुत धन्यवाद लावण्या जी आपका, 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की तरफ़ से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ, अपनी व्यस्त जीवन से समय निकालकर आपने हमें समय दिया, और पंडित जी के बारे में इतनी जानकारी दी जो शायद उनके चाहने वालों को मालूम नहीं होगी। बहुत बहुत धन्यवाद, नमस्कार! 

सुजॉय भाई, आपके अनेक इंटरव्यू पढ़ कर खुश हुई हूँ और 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ हिन्दी भाषा के प्रति समर्पित होकर महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। समग्र सम्पादक मंडल व पूरी टीम को मेरे सस्नेह आशीष। आपको मेरे सच्चे मन से कहे धन्यवाद, बड़ी लम्बी बातचीत हो गयी। आप सब को समय देने के लिये भी शुक्रिया, फिर मिलेंगें, नमस्ते!


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी soojoi_india@yahoo.co.in पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





Saturday, October 12, 2013

आज विशेष प्रस्तुति दुर्गा महाअष्टमी पर



नवरात्रि पर्व पर विशेष प्रस्तुति 

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः 



प्रिय मित्रों, इन दिनों पूरे देश में नवरात्रि पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है। दस दिनों के इस महाउत्सव का आज आठवाँ दिन है। इस दिन की महत्ता का अनुभव करते हुए हम आज के निर्धारित स्तम्भ 'सिने पहेली' के स्थान पर यह विशेष अंक प्रस्तुत कर रहे हैं। 'सिने पहेली' का अगला अंक अब अगले शनिवार को प्रकाशित होगा। जिन प्रतियोगियों ने पिछली पहेली का अभी तक जवाब नहीं भेजा है, वो अपना जवाब हमें बृहस्पतिवार शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं। 
'सिने पहेली' के स्थान पर श्री श्री दुर्गा महाअष्टमी के पवित्र उपलक्ष्य पर आइए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के आर्काइव से एक अनमोल पोस्ट का दोबारा स्वाद लें, जो 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' के अन्तर्गत 16 दिसम्बर 2010 को प्रकाशित किया गया था।



लावण्या शाह
दोस्तों, हमने महान कवि, दार्शनिक और गीतकार पण्डित नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री श्रीमती लावण्या शाह जी से सम्पर्क किया कि वो अपने पिताजी के बारे में हमें कुछ बताएँ जिन्हें हम अपने पाठकों के साथ बाँट सकें। तब लावण्या जी ने ही यह सुझाव दिया कि क्यों ना नवरात्रि के पावन पर्व पर पण्डित जी द्वारा संयोजित देवी माँ के कुछ भजन प्रस्तुत किए जाएँ। लावण्या जी के हम आभारी हैं कि उन्होंने हमारे इस निवेदन को स्वीकार किया और ईमेल के माध्यम से हमें माँ दुर्गा के विविध रूपों के बारे में लिख भेजा और साथ ही पण्डित जी के भजनों के बारे में बताया। तो आइए अब पढ़ते हैं लावण्या जी का भेजा आलेख। 



ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके 
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोस्तुते। 
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता 
नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः। 


माँ दुर्गा के अनेक नाम

माता पार्वती , उमा , महेश्वरी, दुर्गा , कालिका, शिवा , महिषासुरमर्दिनी , सती , कात्यायनी, अम्बिका, भवानी, अम्बा , गौरी , कल्याणी, विंध्यवासिनी, चामुन्डी, वाराही , भैरवी, काली, ज्वालामुखी, बगलामुखी, धूम्रेश्वरी, वैष्णोदेवी , जगधात्री, जगदम्बिके, श्री, जगन्मयी, परमेश्वरी, त्रिपुरसुन्दरी ,जगात्सारा, जगादान्द्कारिणी, जगाद्विघंदासिनी ,भावंता, साध्वी, दुख्दारिद्र्य्नाशिनी, चतुर्वर्ग्प्रदा, विधात्री, पुर्णेँदुवदना, निलावाणी, पार्वती, सर्वमँगला,सर्वसम्पत्प्रदा,शिवपूज्या,शिवप्रिता, सर्वविध्यामयी, कोमलाँगी, विधात्री, नीलमेघवर्णा, विप्रचित्ता, मदोन्मत्ता, मातंगी, देवी , खडगहस्ता, भयँकरी,पद्मा, कालरात्रि, शिवरुपिणी, स्वधा, स्वाहा, शारदेन्दुसुमनप्रभा, शरद्`ज्योत्सना, मुक्त्केशी, नन्दा, गायत्री , सावित्री, लक्ष्मी , अलंकार, संयुक्ता, व्याघ्रचर्मावृत्ता, मध्या, महापरा, पवित्रा, परमा, महामाया, महोदया, इत्यादि देवी भगवती के अनेक नाम हैं।


भारत में देवी के शक्तिपीठ 

1- कामरूप पीठ
2- काशिका पीठ
3- नैपल्पिथ
4- रौद्र-पर्वत
5- कश्मीर पीठ
6- कान्यकुब्ज पीठ
7- पूर्णागिरी पीठ
8- अर्बुदाचल पीठ
9- अमृतकेश्वर पीठ
10- कैलास पीठ
11- शिव पीठ
12- केदार पीठ
13- भृगु पीठ
14- कामकोटी पीठ
15- चन्द्रपुर पीठ
16- ज्वालामुखी
17- उज्जयिनी पीठ इत्यादि

लता मंगेशकर और पं. नरेन्द्र शर्मा 
भारत के हर प्रान्त में देवी के विविध स्वरुप की पूजा होती है और भारत के कई शहर देवी के स्वरुप की आराधना के प्रमुख केन्द्र हैं। शक्तिपूजा की अधिष्ठात्री दुर्गा देवी पूरे बंगाल की आराध्या काली कलकत्ते वाली "काली" भी हैं और गुजरात की अम्बा माँ भी हैं। पंजाब की जालन्धरी देवी भी वही हैं तो विन्ध्य गुफा की विन्ध्यवासिनी भी वही माता रानी हैं जो जम्मू में वैष्णोदेवी कहलाती हैं। त्रिकुट पर्बत पर भी माँ का डेरा है। आसाम (असम) मेँ तांत्रिक पूजन मेँ कामाख्या मन्दिर बेजोड है। दक्षिण में वे कामाक्षी के मन्दिर में विराजमान हैं और चामुण्डी पर्वत पर भी वही हैं। शैलपुत्री के रूप में वे पर्बताधिराज हिमालय की पुत्री पार्वती कहलाती हैं। भारत के शिखर से लेकर पगनख तक आकर, कन्याकुमारी की कन्या के रुप में भी वही पूजी जाती हैं। महाराष्ट्र की गणपति की मैया गौरी भी वही हैं। गुजरात के गरबे और रास के नृत्य में 9 दिवस और 9 रात्रि को माता अम्बिके का आह्वान करते हैं। शिवाजी की वीर भवानी रण में विजय दिलवाने वाली वही हैं। गुजरात में, माँ खोडीयार स्वरूप से माता पूजी जातीं हैं। आइये देवी माँ की भक्ति में डूब जाएँ और स्वरसाम्राज्ञी सुश्री लता मंगेशकर के गाये ये भजन सुनिए, शब्द संयोजन पण्डित नरेन्द्र शर्मा (मेरे पिताजी) का है और संगीत से संवारा है पण्डित ह्रदयनाथ मंगेशकर जी ने ! ऐल्बम का नाम है- 'महिमा माँ जगदम्बा की'। 



आपको हमारी आज की यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमारे ई-मेल आईडी- radioplaybackindia@live.com या cine.paheli@yahoo.com पर अवश्य लिखिए।

आलेख : लावण्या शाह
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

Tuesday, May 15, 2012

ब्लोग्गर्स चोयिस में आज लावण्या शाह की पसंद

व्
धीर , गंभीर, सजग, बाह्यमुखी, सौन्दर्य से भारी लावण्या शाह जी को कौन साहित्यकार ब्लॉगर नहीं जानता, गीतकार/कवि पंडित नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री और लता जी की मुहँ बोली बहिन हैं ये. चलिए आज जानते हैं उनकी पसंद के ख़ास 3 गाने कौन से हैं- 

1 ) Satyam Shivam Sunderam ( Title song ) 
Singer : Lata ji : 
Lyricist : Pt. Narendra Sharma 
MD : Laxmikant / Pyarelal 
Raj Kapoor Production




2 ) Nain Diwane Ek nahee mane Film : Afsar
AFSAR was first film produced by Dev Anand after
 forming Navketan wirh his brothers Chetan and Vijay Anand 
Singer : Suraiya Jamaal Sheikh (June 15, 1929 - January 31, 2004) 
was a singer and actress in Indian films, and was popularly known as 
Suraiya in the film industry. 
She became a superstar in the 1940s and 50s during the time when actors sang their own songs.
Music By : S D Burman..Link : 



3 ) Baje Re Muraliya Baje 
This music is supreme combination,Bharat Ratna - Lata Mangeshkar,
Bharat Ratna Pt Bhimsen Joshi and Music direction by SHrinivas Khale
lyrics ; Pandit Narendra Sharma 
Jai Shri Krishna !! 
Pandit Bhim Sen Joshi ji & Lata Mangeshker didiji 

Saturday, June 25, 2011

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 47 "मेरे पास मेरा प्रेम है"

पंडित नरेन्द्र शर्मा की सुपुत्री लावण्या शाह से लम्बी बातचीत
भाग १
भाग २

अब आगे...

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार, और स्वागत है आप सभी का इस 'शनिवार विशेषांक' में। पिछले दो सप्ताह से आप इसमें आनंद ले रहे हैं सुप्रसिद्ध कवि, साहित्यकार और गीतकार पंडित नरेन्द्र शर्मा की सुपुत्री श्रीमती लावण्या शाह से की गई हमारी बातचीत का। पहले भाग में पंडित जी के पारिवारिक पार्श्व और शुरुआती दिनों का हाल आपनें जाना। और दूसरी कड़ी में लावण्या जी नें बताया कि किस तरह से उनके पिता का बम्बई आना हुआ और फ़िल्म-जगत में किस तरह से उनका पदार्पण हुआ। आइए बातचीत आगे बढ़ाते हैं। प्रस्तुत है लघु शृंखला 'मेरे पास मेरा प्रेम है' की तीसरी कड़ी।

सुजॉय - लावण्या जी, 'हिंद-युग्म आवाज़' पर आपका हम स्वागत करते हैं, नमस्कार!

लावण्या जी - नमस्ते!

सुजॉय - लावण्या जी, फ़िल्म जगत के किन किन कलाकारों के साथ आपके परिवार का पारिवारिक सम्बंध रहा है? इसमें एक नाम लता मंगेशकर जी का अवश्य है । लता जी के साथ आपके पारिवारिक संबम्ध के बारे में हम विस्तार से जानना चाहेंगे।

लावण्या जी - स्वर साम्राज्ञी सुश्री लता मंगेशकर जी, हमारे परवार की बड़ी दीदी हैं| दीदी, पापा जी से निर्माता निर्देशक विनायक राव जी [जो मशहूर तारिका नंदा जी के पिताजी थे] उन के यहां दीदी जब् काम किया करतीं थीं उसी दौरान सबसे पहली बार मिले थे ..फिर मुझे याद आता है मैं छोटी ही थी तब दीदी घर आयीं थीं| फिर मुलाकातें होतीं रहीं बाहर काम के लिये, बंबई फिल्म निर्माण का मुख्य केंद्र है तो कहीं न कहीं मुलाक़ात हो ही जाया करती थी।

सुजॉय - लावण्या जी, हम आपसे लता जी और पंडित जी के बारे में जानेंगे, लेकिन उससे पहले हम अपने पाठकों के लिए यहाँ पर आपके द्वारा लिये लता जी के एक इंटरव्यु के कुछ अंश प्रस्तुत करना चाहेंगे। लता जी बता रही हैं पंडित नरेन्द्र शर्मा से अपनी पहली मुलाक़ात के बारे में। जब लावण्या जी नें उनसे पूछा कि पापाजी से उनकी पहली मुलाक़ात कब और कैसे हुई थी, तो लता जी नें बताया -

लता जी - "मुझे लगता है शायद १९४५ में, मास्टर विनायक के यहाँ मैं काम करती थी, और उनके घर हम रहते थे, मैं और मेरी बहन मीना। तो पंडित जी और उनके साथ, कोई और हिंदी के कवि थे, शायद अमृतलाल नागर, ये दोनों वहाँ आये थे, विनायकराव जी के वहाँ। और फ़र्स्ट टाइम विनायक जी नें मुझसे कहा कि तुम इनसे मिलो और इनको गाना सुनाओ। मैंने उस वक़्त पापा को गाना सुनाया था। फिर उन्होंने विनायकराव के साथ काम किया था, और गानें मेरे होते थे, ऐसे मैं उनको मिला करती थी वहाँ पे। और जब भी मिलती थी, पता नहीं कैसे मालूम था उनको, शायद मेरी पत्रिका उनके पास थी, मुझे मेरा भविष्य बताया करते थे। अभी ये करो, अभी ये नहीं करो, अभी टाइम अच्छा नहीं है, इस तरह से। लेकिन हम लोग हमेशा ही मिलते थे ऐसा नहीं था। जव विनायकराव की डेथ हुई और मैंने '४७ में प्लेबैक देना शुरु किया, तब पापा मुझे कभी कभी मिलते थे, पर मेरा उनके घर आना जाना या उनके घर में कौन हैं, ये मुझे कुछ मालूम नहीं था। पर उनके बातचीत करने का ढंग, मैं कहूँगी, भारतीय संस्कृति का जैसे एक चलता-फिरता पुतला मुझे लगता था। मैं सोचती थी कि कितने अच्छे हैं, इनकी हर बात कितनी अच्छी है, रहन-सहन कितना अच्छा है, क्योंकि मेरे पिताजी भी इसी तरह रहते थे न? कि मतलब धोती पहनना, कोट, और वह टोपी, मतलब, बड़ी सात्विक विचार और वो सब बात मुझे उनमें नज़र आती थी कि वो कुछ अलग हट कर हैं। इस तरह से हम कभी कभी मिलते थे, मैं कभी कभी उनके गानें गाती थी। फिर वो रेडिओ में थे, उन्होंने वहाँ 'विविध भारती' को नाम दिया। तो वहाँ भी दो एक मरतबा मैं मिली हूँ। उसके बाद, अनिल बिस्वास जी थे, उनके यहाँ मैं जाती थी, तब मुझे पता चला कि पंडित नरेन्द्र शर्मा अनिल दा के यहाँ आते हैं। और हर सण्डे को या कोई दिन था जब पापा अनिल दा को रामायण सुनाया करते थे। और वो सब लोग वहाँ बैठ के रामायण सुना करते थे। उसमें एक दो आदमी ऐसे भी थे जो मुसलिम थे, कवि थे, तो वो भी आते थे। फिर.... मुझे साल तो याद नहीं, '४८ होगा या.... अनिल दा नें दो गानें मेरे रेडिओ के लिए रेकॉर्ड किए थे जो पंडित जी के लिखे थे। एक था "रख दिया नभशून्य में" और दूसरा था "युग की संध्या"। इस तरह से पापा के साथ मेरा थोड़ा-थोड़ा परिचय बढ़ रहा था। ज़्यादा जो उनके साथ मेरा ये हुआ, वह यह था कि मैंने उनके साथ जाके भगवद गीता रेकॉर्ड किया। पर यह बहुत बाद की बात है, शायद १९६७ होगा। पापा नें मुझे चिट्ठी लिखी, और उसमें यह लिखा कि ये बड़ा अच्छा काम कर रही है, भगवद गीता गा रही है, और इसी तरह से आप अपना चालू रखें काम तो मुझे बड़ी ख़ुशी होगी। और फिर वो मिलने आये मुझे घर। मैं उनसे मिली, उन्हें चाय दी, और मुझे बड़ी ख़ुशी हुई कि भगवद गीता का जो पंद्रहवाँ अध्याय मैंने किया था, एक तो पापा का ख़त आया था, और एक आया था देशमुख, जो हमारे 'फ़ाइनन्स मिनिस्टर' थे, उनका, क्योंकि संस्कृत वो भी बहुत अच्छा जानते थे। तो पापा बैठे, सुना रेकॉर्ड, और फिर घर गए। अचानक कैसे मुझे, कुछ बातें याद आ जाती हैं कुछ नहीं, पापा के साथ मैं काम तो नहीं कर रही थी, वो तो रेडिओ में थे, कहीं न कहीं हम मिलते थे, फिर एक दिन मैं उनके घर गई। और फिर सिलसिला इस तरह बढ़ा कि फिर मैं रोज़ ही उनके घर जाने लगी। और मेरी रेकॉर्डिंग्‍ उनके घर के बहुत नज़दीक होती थी। तो मैं महबूब स्टुडिओ से रेकॉर्डिंग्‍ करके उनके यहाँ जाती थी, फिर भाभी से मिलती थी। बेटियों से मिलना होता था, बेटा था, ज़्यादा मेरा बेटियों के साथ बनती थी और पापा के साथ भी बैठ के बातें किया करती थीं। कभी कभी मैं कपड़े ले आती थी और वहाँ रहती थी, साथ में सो भी जाते थे नीचे गद्दे डाल के, बाहर का जो सिटिंग्‍ रूम था, वहीं पे सो जाते थे।

फ़ोटो-१: दीदी और पापा

सुजॉय - ये तो थी लता जी के संस्मरण। आगे लता जी नें और भी बहुत सारी बातें बताईं, जो हम भविष्य के लिए सुरक्षित रखते हुए लावण्या जी के बातचीत पर वापस आते हैं। लावण्या जी, एक तरफ़ आपके पिता, पंडित जी, और दूसरी तरफ़ स्व्र-साम्राज्ञी लता जी। ऐसे महान दो कलाकारों का स्पर्श आपको जीवन में मिला, जो मैं समझता हूँ कि इस तरह का सौभाग्य बहुत कम लोगों को नसीब है।

लावण्या जी - पापाजी और दीदी, दो ऐसे इंसान हैं जिनसे मिलने के बाद मुझे ज़िंदगी के रास्तों पे आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा मिली है। सँघर्ष का नाम ही जीवन है। कोई भी इसका अपवाद नहीं- सत्चरित्र का संबल, अपने भीतर की चेतना को प्रखर रखे हुए किस तरह अंधेरों से लड़ना और पथ में कांटे बिछे हों या फूल, उन पर पग धरते हुए, आगे ही बढ़ते जाना ये शायद मैंने इन दो व्यक्तियों से सीखा। उनका सान्निध्य मुझे ये सिखला गया कि अपने में रही कमजोरियों से किस तरह स्वयं लड़ना जरुरी है- उनके उदाहरण से हमें इंसान के अच्छे गुणों में विश्वास पैदा करवाता है। पापा जी का लेखन, गीत, साहित्य और कला के प्रति उनका समर्पण और दीदी का संगीत, कला और परिश्रम करने का उत्साह, मुझे बहुत बड़ी शिक्षा दे गया। उन दोनों की ये कला के प्रति लगन और अनुदान सराहने लायक है ही, परन्तु उससे भी गहरा था उनका इंसानियत से भरापूरा स्वरूप जो शायद कला के क्षेत्र से भी ज्यादा विस्तृत था। दोनों ही व्यक्ति ऐसे जिनमें इंसानियत का धर्म कूट-कूट कर भरा हुआ मैंने बार बार देखा और महसूस किया । जैसे सुवर्ण शुद्ध होता है, उसे किसी भी रूप में उठालो, वह समान रूप से दमकता मिलेगा वैसे ही दोनों को मैंने हर अनुभव में पाया। जिसके कारण आज दूरी होते हुए भी इतना गहरा सम्मान मेरे भीतर बैठ गया है कि दूरी महज एक शारीरिक परिस्थिती रह गयी है। ये शब्द फिर भी असमर्थ हैं मेरे भावों को आकार देने में।

सुजॉय - वाह! अच्छा लावण्या जी, पंडित जी और लता जी के बीच पिता-पुत्री का सम्बंध था। इस सम्बंध को आपने किस तरह से महसूस किया, इसके बारे में कुछ बतायें।

लावण्या जी - हम ३ बहनें थीं - सबसे बड़ी वासवी, फिर मैं, लावण्या और मेरे बाद बांधवी। हाँ, हमारे ताऊजी की बिटिया गायत्री दीदी भी सबसे बड़ी दीदी थीं जो हमारे साथ-साथ अम्मा और पापाजी की छत्रछाया में पलकर बड़ी हुईं। पर सबसे बड़ी दीदी, लता दीदी ही थीं- उनके पिता पण्डित दीनानाथ मंगेशकर जी के देहांत के बाद १२ वर्ष की नन्ही सी लडकी के कन्धों पे मंगेशकर परिवार का भार आ पड़ा था जिसे मेरी दीदी ने बहादुरी से स्वीकार कर लिया और असीम प्रेम दिया अपने बाई बहनों को जिनके बारे में, ये सारे किस्से मशहूर हैं। पत्र पत्रिकाओं में आ भी गए हैं--उनकी मुलाक़ात, पापा से, मास्टर विनायक राव जो सिने तारिका नंदा के पिता थे, के घर पर हुई थी- पापा को याद है दीदी ने "मैं बन के चिड़िया, गाऊँ चुन चुन चुन" ऐसे शब्दों वाला एक गीत पापा को सुनाया था और तभी से दोनों को एक-दूसरे के प्रति आदर और स्नेह पनपा--- दीदी जान गयी थीं पापा उनके शुभचिंतक हैं- संत स्वभाव के गृहस्थ कवि के पवित्र हृदय को समझ पायी थीं दीदी और शायद उन्हें अपने बिछुडे पिता की छवि दिखलाई दी थी। वे हमारे खार के घर पर आयी थीं जब हम सब बच्चे अभी शिशु अवस्था में थे और दीदी अपनी संघर्ष यात्रा के पड़ाव एक के बाद एक, सफलता से जीत रहीं थीं-- संगीत ही उनका जीवन था-गीत साँसों के तार पर सजते और वे बंबई की उस समय की लोकल ट्रेन से स्टूडियो पहुंचतीं जहाँ रात देर से ही अकसर गीत का ध्वनि-मुद्रण सम्पन्न किया जाता चूंकि बंबई का शोर-शराबा शाम होने पे थमता- दीदी से एक बार सुन कर आज दोहराने वाली ये बात है! कई बार वे भूखी ही, बाहर पड़ी किसी बेंच पे सुस्ता लेती थीं, इंतजार करते हुए ये सोचतीं "कब गाना गाऊंगी पैसे मिलेंगें और घर पे माई और बहन और छोटा भाई इंतजार करते होंगें, उनके पास पहुँचकर आराम करूंगी!" दीदी के लिए माई कुरमुरों से भरा कटोरा ढक कर रख देती थी जिसे दीदी खा लेती थीं पानी के गिलास के साथ सटक के! आज भी कहीं कुरमुरा देख लेती हैं उसे मुठ्ठी भर खाए बिना वे आगे नहीं बढ़ पातीं :-)

सुजॉय - लावण्या जी, ऐसा कोई संसमरण है कि पिता अपनी पुत्री पर नाराज़ हो गए थे, यानी कि पंडित जी लता जी पर नाराज़ हुए थे?

लावण्या जी - हमारे पड़ौसी थे जयराज जी, वे भी सिने कलाकार थे और तेलगु, आन्ध्र प्रदेश से बंबई आ बसे थे। उनकी पत्नी सावित्री आंटी, पंजाबी थीं। उनके घर फ्रीज था, सो जब भी कोई मेहमान आता, हम बरफ मांग लाते। शरबत बनाने में ये काम पहले करना होता था और हम ये काम खुशी-खुशी किया करते थे। पर जयराज जी की एक बिटिया को हमारा अकसर इस तरह बर्फ मांगने आना पसंद नही था। एकाध बार उसने ऐसा भी कहा था "आ गए भिखारी बर्फ मांगने!" जिसे हमने अनसुना कर दिया। आख़िर हमारे मेहमान का हमें उस वक्त ज्यादा ख़याल था, ना कि ऐसी बातों का !! बंबई की गर्म, तपती हुई जमीन पे नंगे पैर, इस तरह दौड़ कर बर्फ लाते देख लिया था हमें दीदी नें और उनका मन पसीज गया ! इसका नतीजा ये हुआ के एक दिन मैं कॉलिज से लौट रही थी, बस से उतर कर, चल कर घर आ रही थी। देखती क्या हूँ कि हमारे घर के बाहर एक टेंपो खड़ा है जिसपे एक फ्रिज रखा हुआ है रस्सियों से बंधा हुआ। तेज क़दमों से घर पहुँची, वहाँ पापा, नाराज, पीठ पर हाथ बांधे खड़े थे। अम्मा फिर जयराज जी के घर-दीदी का फोन आया था-वहाँ बात करने आ-जा रहीं थीं ! फोन हमारे घर पर भी था, पर वो सरकारी था जिसका इस्तेमाल पापा जी सिर्फ़ काम के लिए ही करते थे और कई फोन हमें, जयराज जी के घर रिसीव करने दौड़ कर जाना पड़ता था। दीदी, अम्मा से मिन्नतें कर रहीं थीं "पापा से कहो ना भाभी, फ्रीज का बुरा ना मानें। मेरे भाई-बहन आस-पड़ौस से बर्फ मांगते हैं ये मुझे अच्छा नहीं लगता- छोटा सा ही है ये फ्रीज ..जैसा केमिस्ट दवाई रखने के लिए रखते हैं ... ".अम्मा पापा को समझा रही थीं -- पापा को बुरा लगा था -- वे मिट्टी के घडों से ही पानी पीने के आदी थे। ऐसा माहौल था मानो गांधी बापू के आश्रम में फ्रीज पहुँच गया हो!! पापा भी ऐसे ही थे। उन्हें क्या जरुरत होने लगी भला ऐसे आधुनिक उपकरणों की? वे एक आदर्श गांधीवादी थे। सादा जीवन ऊंचे विचार जीनेवाले, आडम्बर से सर्वदा दूर रहनेवाले, सीधे सादे, सरल मन के इंसान ! खैर! कई अनुनय के बाद अम्मा ने, किसी तरह दीदी की बात रखते हुए फ्रीज को घर में आने दिया और आज भी वह, वहीं पे है, शायद मरम्मत की ज़रूरत हो, पर चल रहा है!

सुजॉय - इस तरह से दीदी आप सब की ज़िंदगियों से जैसे घुलमिल गईं। फिर जब आप बहनों की शादी हुई होगी, तब लता जी नें किस तरह से आपक सब को आशिर्वाद दिया?

लावण्या जी - हमारी शादियाँ हुईं तब भी दीदी बनारसी साडियां लेकर आ पहुँचीं। अम्मा से कहने लगीं, "भाभी, लड़कियों को सम्पन्न घरों से रिश्ते आए हैं। मेरे पापा कहाँ से इतना खर्च करेंगें? रख लो ..ससुराल जाएँगीं, वहाँ सबके सामने अच्छा दिखेगा"। कहना न होगा हम सभी रो रहे थे और देख रहे थे दीदी को जिन्होंने उमरभर शादी नहीं की पर अपनी छोटी बहनों की शादियाँ सम्पन्न हों उसके लिए साड़ियां लेकर हाजिर थीं! ममता का ये रूप, आज भी आँखें नम कर रहा है। मेरी दीदी ऐसी ही हैं। भारत कोकिला और भारत रत्ना भी वे हैं ही, मुझे उनका ये ममता भरा रूप ही याद रहता है। फिर पापा की ६०वीं साल गिरह आयी, दीदी को बहुत उत्साह था, कहने लगीं, "मैं एक प्रोग्राम दूंगीं, जो भी पैसा इकट्ठा होगा, पापा को भेंट करूंगी।" पापा को जब इस बात का पता लगा वे नाराज हो गए, कहा- "मेरी बेटी हो, अगर मेरा जन्मदिन मनाना है, घर पर आओ, साथ भोजन करेंगें, अगर मुझे इस तरह पैसे दिए, मैं तुम सब को छोड़ कर काशी चला जाऊंगा, मत बांधो मुझे माया के फेर में।"

सुजॉय - देखिए लावण्या जी, इस बात पर मुझे फिर से वही गीत याद आ गया, "तुम्हे बांधने के लिए मेरे पास और क्या है मेरा प्रेम है"। अच्छा उसके बाद क्या हुआ, प्रोग्राम हुआ था?

लावण्या जी - उसके बाद प्रोग्राम नहीं हुआ, हमने साथ मिलकर, अम्मा के हाथ से बना उत्तम भोजन खाया और पापा अति प्रसन्न हुए। आज भी यादों का काफिला चल पड़ा है और आँखें नम हैं ...इन लोगों जैसे विलक्षण व्यक्तियों से, जीवन को सहजता से जीने का, उसे सहेज कर, अपने कर्तव्य पालन करने के साथ, इंसानियत न खोने का पाठ सीखा है उसे मेरे जीवन में कहाँ तक जी पाई हूँ, ये अंदेशा नहीं है फिर भी कोशिश जारी है .........

सुजॉय - बहुत सुंदर लावण्या जी! आपसे बातचीत का सिलसिला अगले हफ़्ते भी जारी रहेगा, फ़िल्हाल आइए सुना जाये पंडित जी का लिखा और लता जी का गाया एक यादगार गीत। बताइए कौन सा गीत बजाया जाये?

लावण्या जी - "ज्योति कलश छलके"

गीत - "ज्योति कलश छलके" (भाभी की चूड़ियाँ)


तो ये था आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेषांक'। अगले हफ़्ते इसी शृंखला की चौथी कड़ी के साथ मैं वापस आऊँगा, तब तक कृष्णमोहन जी के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नियमीत कड़ियों में ठुमरी-आधारित फ़िल्मी गीतों का आनंद लेते रहिएगा, नमस्कार!

Saturday, June 18, 2011

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 46 - "मेरे पास मेरा प्रेम है"

पंडित नरेन्द्र शर्मा की सुपुत्री लावण्या शाह से लम्बी बातचीत - भाग-2
पहले पढ़ें भाग १

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और स्वागत है आप सभी का 'शनिवार विशेषांक' में। पिछले शनिवार से हमनें इसमें शुरु की है शृंखला 'मेरे पास मेरा प्रेम है', जो कि केन्द्रित है सुप्रसिद्ध कवि, साहित्यकार और गीतकार पंडित नरेन्द्र शर्मा की सुपुत्री श्रीमती लावण्या शाह से की गई हमारी बातचीत पर। आइए आज प्रस्तुत है इस शृंखला की दूसरी कड़ी।

सुजॉय - लावण्या जी, एक बार फिर हम आपका स्वागत करते है 'आवाज़' पर, नमस्कार!

लावण्या जी - नमस्ते!

सुजॉय - लावण्या जी, पिछले हफ़्ते हमारी बातचीत आकर रुकी थी पंडित जी के आयुर्वेद ज्ञान की चर्चा पर। साथ ही आपनें पंडित जी के शुरुआती दिनों के बारे में बताया था। आज बातचीत हम शुरु करते हैं उस मोड़ से जहाँ पंडित जी मुंबई आ पहुँचते हैं। हमने सुना है कि पंडित जी ३० वर्ष की आयु में बम्बई आये थे भगवती चरण वर्मा के साथ। यह बताइए कि इससे पहले उनकी क्या क्या उपलब्धियाँ थी बतौर कवि और साहित्यिक। बम्बई आकर फ़िल्म जगत से जुड़ना क्यों ज़रूरी हो गया?

लावण्या जी - पापा जी ने इंटरमीडीयेट की पढाई खुरजा से की और आगे पढने वे संस्कृति के गढ़, इलाहाबाद मे आये और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी जोइन की। १९ वर्ष की आयु मे, सन १९३४ मे प्रथम काव्य-संग्रह, "शूल - फूल" प्रकाशित हुआ। अपने बलबूते पर, एम्.ए. अंग्रेज़ी विषय लेकर, पास किया। 'अभ्युदय दैनिक समाचार पत्र' के सह सम्पादक पद पर काम किया। सन १९३६ मे "कर्ण - फूल" छपी, पर १९३७ मे "प्रभात - फेरी" काव्य संग्रह ने नरेंद्र शर्मा को कवि के रूप मे शोहरत की बुलंदी पर पहुंचा दिया। काव्य-सम्मलेन मे उसी पुस्तक की ये कविता जब पहली बार नरेंद्र शर्मा ने पढी तब, सात बार, 'वंस मोर' का शोर हुआ ...गीत है - "आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगें, आज से दो प्रेम योगी, अब वियोगी ही रहेंगें".

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और एक सुमधुर गीतकार के रूप मे नरेंद्र शर्मा की पहचान बन गयी। इसी इलाहाबाद मे, आनंद भवन मेँ, 'अखिल भारतीय कोँग्रेस कमिटि के हिंदी विभाग से जुडे, हिंदी सचिव भी रहे जिसके लिये पंडित जवाहरलाल नेहरू जी ने पापा जी को अखिल भारतीय कोंग्रेस कमिटी के दस्तावेजों को, जलदी से अंग्रेज़ी से हिंदी मे अनुवाद कर, भारत के कोने कोने तक पहुंचाने के काम मे, उन्हे लगाया था। अब इस देश भक्ति का नतीजा ये हुआ के उस वक्त की अंग्रेज़ सरकार ने, पापा जी को, २ साल देवली जेल और राजस्थान जेल मे कैद किया जहां नरेंद्र शर्मा ने १४ दिन का अनशन या भूख हड़ताल भी की थी और गोरे जेलरों ने जबरदस्ती सूप नलियों मे भर के पिलाया और उन्हे जिंदा रखा। जब रिहा हुए तब गाँव गये, सारा गाँव बंदनवार सजाये, देश भक्त के स्वागत मे झूम उठा! दादी जी स्व. गंगा देवी जी को १ सप्ताह बाद पता चला के उनका बेटा, जेल मे भूखा है तो उन्होंने भी १ हफ्ते भोजन नहीं किया। ऐसे कई नन्हे सिपाही महात्मा गांधी की आज़ादी की लड़ाई मे, बलिदान देते रहे तब कहीं सन १९४७ मे भारत को पूर्ण स्वतंत्रता मिली थी।

सुजॉय - वाह! बहुत सुंदर!

लावण्या जी - इस रोमांचक घटना का जिक्र करते हुए जनाब सादिक अली जी का लिखा अंग्रेज़ी आलेख देखें ..वे कहते हैं -- "Poet, late Pandit Narendra Sharma, was arrested without trial under the British Viceroy's Orders, for more than two years. His appointment to AICC was made by Pandit Jawaharlal Nehru. Pandit Narendra Sharma's photo along with then AICC members, is still there in Swaraj Bhavan, Allahabad."

लिंक :

सुजॉय - बम्बई कैसे आना हुआ उनका?

लावण्या जी - आपका कहना सही है के भगवती चरण वर्मा, 'चित्रलेखा ' के मशहूर उपन्यासकार नरेन्द्र शर्मा को अपने संग बम्बई ले आये थे। कारण था, फिल्म निर्माण संस्था "बॉम्बे टॉकीस" नायिका देविका रानी के पास आ गयी थी जब उनके पति हिमांशु राय का देहांत हो गया और देविका रानी को, अच्छे गीतकार, पट कथा लेख़क, कलाकार सभी की जरूरत हुई। भगवती बाबू को, गीतकार नरेंद्र शर्मा को बोम्बे टाकीज़ के काम के लिये ले आने का आदेश हुआ था और नरेंद्र शर्मा के जीवन की कहानी का अगला चैप्टर यहीं से आगे बढा।

फ़ोटो: Magic of Black & WhitePapaji @ Allahabad with Famous writer Bhagwati Charan Vermaji

सुजॉय - पंडित जी का लिखा पहला गीत पारुल घोष की आवाज़ में १९४३ की फ़िल्म 'हमारी बात' का, "मैं उनकी बन जाऊँ रे" बहुत लोकप्रिय हुआ था। क्योंकि यह उनका पहला पहला गीत था, उन्होंने आपको इसके बारे में ज़रूर बताया होगा। तो हम भी आपसे जानना चाहेंगे उनके फ़िल्म जगत में पदार्पण के बारे में, इस पहली फ़िल्म के बारे में, इस पहले मशहूर गीत के बारे में।

लावण्या जी - पापा ने बतलाया था कि फिल्म 'हमारी बात' के लिए लिखा सबसे पहला गीत 'ऐ बादे सबा, इठलाती न आ...' उन्होंने इस ख्याल से इलाहाबाद से बंबई आ रही ट्रेन मे ही लिखा रखा था कि हिन्दी फिल्मों मे उर्दू अलफ़ाज़ लिए गीत जूरूरी है, जैसा उस वक्त का ट्रेंड था, तो वही गीत पहले चित्रपट के लिए लिखा गया और 'हमारी बात' मे अनिल बिस्वास जी ने स्वरबद्ध किया और गायिका पारुल घोष ने गाया। आप इस सुमधुर गीत 'मैं उनकी बन जाऊं रे' को सुनवा दें; पारुल घोष, मशहूर बांसुरी वादक श्री पन्ना लाल घोष की पत्नी थीं और भारतीय चित्रपट संगीत के भीष्म पितामह श्री अनिल दा अनिल बिस्वास की बहन। जब यह गीत बना तब मेरा जन्म भी नहीं हुआ था पर आज इस गीत को सुनती हूँ तब भी बड़ा मीठा, बेहद सुरीला लगता है।

सुजॉय - ज़रूर इस गीत को हम आज की कड़ी के अंत में सुनवायेंगे, बहरहाल आप इस गीत से जुड़ी कुछ और बात बता सकती हैं?

लावण्या जी - एक वाकया याद आ रहा है, हमारे पडौसी फिल्म कलाकार जयराज जी के घर श्री राज कपूर आये थे और बार बार इसी गीत की एक पंक्ति गा रहे थे, 'दूर खड़ी शरमाऊँ, मैं मन ही मन अंग लगाऊँ, दूर खडी शरमाऊँ, मैं, उनकी बन जाऊं रे, मैं उनकी बन जाऊं' और इसी से मिलते जुलते शब्द यश राज की फिल्म 'दिल तो पागल है' मे भी सुने 'दूर खडी शरमाये, आय हाय', तो प्रेम की बातें तब भी और अब भी ऐसे ही दीवानगी भरी होती रहीं हैं और होतीं रहेंगीं ..जब तक 'प्रेम', रहेगा ये गीत भी अमर रहेगा।

सुजॉय - बहुत सुंदर! और पंडित जी ने भी लिखा था कि "मेरे पास मेरा प्रेम है"। अच्छा लावण्या जी, यह बताइए कि 'बॉम्बे टॉकीज़' के साथ वो कैसे जुड़े? क्या उनकी कोई जान-पहचान थी? किस तरह से उन्होंने अपना क़दम जमाया इस कंपनी में?

लावण्या जी - पापा के एक और गहरे मित्र रहे मशहूर कथाकार श्री अमृत लाल नागर : उनका लिखा पढ़ें -

नागर जी चाचा जी लिखते हैं ...

"एक साल बाद श्रद्धेय भगवती बाबू भी "बोम्बे टाकीज़" के आमंत्रण पर बम्बई पहुँच गये, तब हमारे दिन बहुत अच्छे कटने लगे। प्राय: हर शाम दोनोँ कालिज स्ट्रीट स्थित, स्व. डॉ. मोतीचंद्र जी के यहाँ बैठेकेँ जमाने लगे। तब तक भगवती बाबू का परिवार बम्बई नहीँ आया था और वह, कालिज स्ट्रीट के पास ही माटुंगा के एक मकान की तीसरी मंजिल मेँ रहते थे। एक दिन डॉक्टर साहब के घर से लौटते हुए उन्होँने मुझे बतलाया कि वह एक दो दिन के बाद इलाहाबाद जाने वाले हैँ। "अरे गुरु, यह इलाहाबाद का प्रोग्राम एकाएक कैसे बन गया ?" "अरे भाई, मिसेज रोय (देविका रानी रोय) ने मुझसे कहा है कि, मैँ किसी अच्छे गीतकार को यहाँ ले आऊँ! नरेन्द्र जेल से छूट आया है और मैँ समझता हूँ कि वही ऐसा अकेला गीतकार है जो प्रदीप से शायद टक्कर ले सके!' सुनकर मैँ बहुत प्रसन्न हुआ प्रदीप जी तब तक, बोम्बे टोकीज़ से ही सम्बद्ध थे "कंगन, बंधन" और "नया संसार" फिल्मोँ से उन्होँने बंबई की फिल्मी दुनिया मेँ चमत्कारिक ख्याति अर्जित कर ली थी, लेकिन इस बात के से कुछ पहले ही वह बोम्बे टोकीज़ मेँ काम करने वाले एक गुट के साथ अलग हो गए थे। इस गुट ने "फिल्मीस्तान" नामक एक नई संस्था स्थापित कर ली थी - कंपनी के अन्य लोगोँ के हट जाने से देविका रानी को अधिक चिँता नहीँ थी, किंतु, ख्यातनामा अशोक कुमार और प्रदीप जी के हट जाने से वे बहुत चिँतित थीँ - कंपनी के तत्कालीन डायरेक्टर श्री धरम्सी ने अशोक कुमार की कमी युसूफ ख़ान नामक एक नवयुवक को लाकर पूरी कर दी! युसूफ का नया नाम, "दिलीप कुमार" रखा गया, (यह नाम भी पापा ने ही सुझाया था - एक और नाम 'जहांगीर' भी चुना था पर पापा जी ने कहा था कि युसूफ, दिलीप कुमार नाम तुम्हे बहुत फलेगा - (ज्योतिष के हिसाब से) और आज सारी दुनिया इस नाम को पहचानती है। किंतु प्रदीप जी की टक्कर के गीतकार के अभाव से श्रीमती राय बहुत परेशान थीँ। इसलिये उन्होँने भगवती बाबू से यह आग्रह किया था एक नये शुद्ध हिंदी जानने वाले गीतकार को खोज लाने का। इस बारे में आप और विस्तृत रूप से नीचे दिये गये लिंक्स में पढ़ सकते हैं।

http://antarman-antarman.blogspot.com/2007/05/blog-post_1748.html

http://antarman-antarman.blogspot.com/2007/05/blog-post_24.html

http://antarman-antarman.blogspot.com/2007/05/blog-post_12.html

सुजॉय - किसी भी सफल इंसान के पीछे किसी महिला का हाथ होता है, ऐसी पुरानी कहावत है। आपके विचार में आपकी माताजी का कितना योगदान है पंडित जी की सफलता के पीछे? अपनी माताजी की शख़्सीयत के बारे में विस्तार से बतायें।

लावण्या जी - मेरी माँ, श्रीमती सुशीला नरेंद्र शर्मा, कलाकार थीं। ४ साल हलदनकर इंस्टिट्यूट मे चित्रकला सीख कर बेहतरीन आयल कलर और वाटर कलर के चित्र बनाया करतीं थीं। हमारे घर की दीवारों को उनके चित्रोँ ने सजाया। उस सुन्दर, परम सुशील, सर्वगुण संपन्न मा के लिये, पापा का गीत गाती हूँ - "दर भी था, थीं दीवारें भी, माँ, तुमसे, घर घर कहलाया!"

सुजॉय - आइए इस गीत को यूट्युब पर सुनते हैं:



फ़ोटो-२: श्रीमती सुशीला नरेन्द्र शर्मा की तसवीर

लावण्या जी - ये एक चित्र जो मुझे बहुत प्रिय है। और ये कम लोग जानते हैं के सुशीला गोदीवाला संगीत निर्देशक गायक अविनाश व्यास के ग्रुप मे गाया भी करतीं थीं; रेडियो आर्टिस्ट थीं और अनुपम सुन्दरी थीं - हरी हरी, अंगूर सी आँखें, तीखे नैन नक्श, उजला गोरा रंग और इतनी सौम्यता और गरिमा कि स्वयं श्री सुमित्रानंदन पन्त जी ने सुशीला को दुल्हन के जोड़े मे सजा हुआ देख कहा था, "शायद दुष्यंत राजा की शकुन्तला भी ऐसी ही होगी"। पन्त जी तो हैं हिंदी के महाकवि! मैं, अम्मा की बेटी हूँ! जिस माँ की छाया तले अपना जीवन संवारा वो तो ऐसी देवी मा को श्रद्धा से अश्रू पूरित नयनों से प्रणाम ही कर सकती है। कितना प्यार दुलार देकर अपनी फुलवारी सी गृहस्थी को अम्मा ने सींचा था। पापा जी तो भोले शम्भू थे, दिन दुनिया की चिंता से विरक्त सन्यासी - सद गृहस्थ! अम्मा ही थी जो नमक, धान, भोजन, सुख सुविधा का जुगाड़ करतीं, साक्षात अम्बिका भवानी सी हमारी रक्षा करती, हमे सारे काम सीख्लाती, खपती, थकती पर कभी घर की शांति को बिखरने न दिया, न कभी पापा से कुछ माँगा। अगर कोई नयी साड़ी आ जाती तो हम ३ बहनों के लिये सहेज कर रख देतीं। ऐसी निस्पृह स्त्री मैंने और नहीं देखी और हमेशा सादा कपड़ों मे अम्मा महारानी से सुन्दर और दिव्य लगतीं थीं। अम्मा की बगिया के सारे सुगंधी फूल, नारियल के पेड़, फलों के पेड़ उसी के लगाए हुए आज भी छाया दे रहे हैं पर अम्मा नहीं रहीं, यादें रह गयीं, बस!

सुजॉय - बहुत खी सुंदर तरीके से आपनें अपनी माताजी का वर्णन किया, हम भी भावुक हो गए हैं। क्योंकि माँ ही शुरुआत है और माँ पर ही सारी दुनिया समाप्त हो जाती है, इसलिए यहीं पर हम आज की बातचीत समाप्त करते हैं, और वादे के मुताबिक फ़िल्म 'हमारी बात' से पारुल घोष का गाया "मैं उनकी बन जाऊँ रे" सुनवाते हैं।

गीत - "मैं उनकी बन जाऊँ रे" (हमारी बात)


तो ये था पंडित नरेन्द्र शर्मा की सुपुत्री श्रीमती लावण्या शाह से की गई लम्बी बातचीत पर आधारित लघु शृंखला 'मेरे पास मेरा प्रेम है' की दूसरी कड़ी। बातचीत जारी रहेगी अगले सप्ताह भी। ज़रूर पधारियेगा, और आज के लिए मुझे अनुमति दीजिये, नमस्कार!

Saturday, June 11, 2011

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 45 "मेरे पास मेरा प्रेम है"

पंडित नरेन्द्र शर्मा की सुपुत्री लावण्या शाह से लम्बी बातचीत भाग-१

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और स्वागत है आप सभी का 'शनिवार विशेषांक' में। शनिवार की इस साप्ताहिक प्रस्तुति होती है ख़ास, आम प्रस्तुतियों से ज़रा हट के, जिसमे हम कभी साक्षात्कार, कभी विशेषालेख, और कभी आप ही के भेजे ई-मेल शामिल करते हैं। आज इस इस स्तंभ में हम शुरु कर रहे हैं फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध गीतकार, उत्तम साहित्यकार, कवि, दार्शनिक, आयुर्वेद के ज्ञाता और विविध भाषाओं के महारथी, स्व: पंडित नरेन्द्र शर्मा की सुपुत्री लावण्या शाह से की हुई लम्बी बातचीत पर आधारित लघु शृंखला 'मेरे पास मेरा प्रेम है'। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की पहली कड़ी। लावण्या जी से ईमेल के माध्यम से लम्बी बातचीत की है आपके इस दोस्त सुजॉय नें।

सुजॉय - लावण्या जी, आपका बहुत बहुत स्वागत है 'आवाज़' पर, नमस्कार!

लावण्या जी - नमस्ते, सुजॉय भाई, आपका व 'हिंद-युग्म' का आभार जो आपने आज मुझे याद किया।

सुजॉय - यह हमारा सौभाग्य है आपको पाना, और आप से आपके पापाजी, यानी पंडित जी के बारे में जानना। युं तो आप नें उनके बारे में अपने ब्लॉगों में या साक्षात्कारों में कई बार बताया भी है, इसलिए हम उन सब का दोहराव नहीं करना चाहते। हम सब से पहले चाहेंगे कि आप उन ब्लॉगों और वेबसाइटों के लिंक्स हमें बतायें जिनमें जाकर हम उन्हें पढ़ सकें।

लावण्या जी - हाँ, अक्सर मैं अपने ब्लॉग "लावण्यम - अंतर्मन" (http://www.lavanyashah.com) पे लिखती रही हूँ। और भी कुछ लिंक्स दे रही हूँ, समय निकालकर मेरे प्रयासों को पढ़ियेगा।

१ ) सुकवि श्री हरिवंश राय बच्चन जी का कहना सुनिए,http://www.lavanyashah.com/2007/11/blog-post_28.html
२ )http://www.lavanyashah.com/2008/06/blog-post_24.html
३ ) He is no more .....http://www.lavanyashah.com/2008/02/blog-post_08.html
४ )http://www.lavanyashah.com/2010/02/blog-post_10.html
५ )http://www.lavanyashah.com/2008/04/blog-post_29.html
६ )http://www.lavanyashah.com/2008/04/blog-post_24.html
७ )http://www.lavanyashah.com/2009/07/blog-post_12.html
८ )http://www.lavanyashah.com/2009/01/blog-post_12.html
9 )http://www.lavanyashah.com/2008/08/blog-post_30.html


सुजॉय - लावण्या जी, हम भी इन ब्लॉग्स को पढ़ेंगे और हम अपने पाठकों से भी अनुरोध करते हैं कि इनमें अपनी नज़र दौड़ायें, और पंडित जी के बारे में और निकटता से जानें। आज के इस साक्षात्कार में हम आपसे पंडित जी की शख्शियत के कुछ अनछुये पहलुओं के बारे में भी जानना चाहेंगे। सबसे पहले यह बताइए पंडित जी के पारिवारिक पार्श्व के बारे में। ऐसे महान शख़्स के माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी कौन थे, उनके क्या व्यवसाय थे?

लावण्या जी - पूज्य पापा जी का जन्म उत्तर प्रदेश प्रांत के ज़िला बुलंद शहर, खुर्जा, ग्राम जहांगीरपुर मे हुआ, जो अब ग्रेटर नॉयडा कहलाता है। तारीख थी फरवरी की २८, जी हाँ, लीप-यीअर मे २९ दिन होते हैं, उस के ठीक १ दिन पहले सन १९१३ मे। उनका संयुक्त परिवार था, भारद्वाज वंश का था, व्यवसाय से पटवारी कहलाते थे। घर को स्वामी पाडा कहा जाता था जो ३ मंजिल की हवेलीनुमा थी। जहां मेरे दादाजी स्व. पूर्णलाल शर्मा तथा उनकी धर्मपत्नी मेरी दादी जी स्व. गंगा देवी जी अपने चचेरे भाई व परिवार के अन्य सदस्यों के साथ आबाद थे। उनके खेत थे, अब भी हैं और फलों की बाडी भी थी। खुशहाल, समृद्ध परिवार था जहां एक प्रतिभावान बालक का जन्म हुआ और दूर के एक चाचाजी जिन्हें रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानियां पढ़ने का शौक था, उन्होंने बालक का नामकरण किया और शिशु को "नरेंद्र" नाम दिया!

सुजॉय - वाह!

लावण्या जी - किसे खबर थी कि "नरेंद्र शर्मा" का नाम एक दिन भारतवर्ष मे एक सुप्रसिद्ध गीतकार और कवि के रूप मे पहचाना जाएगा? पर ऐसे ही एक परिवार मे, बालक नरेंद्र पलकर बड़े हुए थे।

सुजॉय - पंडित जी के परिवार का माहौल किस तरह का था जब वो छोटे थे? क्या घर पर काव्य, साहित्य, गीत-संगीत आदि का माहौल था? किस तरह से यह बीज पंडित जी के अंदर अंकुरित हुई?

लावण्या जी - पापा से ही सुना है और उन्होंने अपनी पुस्तक "मुठ्ठी बंद रहस्य" में अपने पिताजी श्री पूर्ण लाल शर्मा जी को समर्पित करते हुए लिखा है कि 'पिता की तबीयत अस्वस्थ थी और बालक पिता की असहाय स्थिति को देख रहा था ..' ४ साल की उमर मे बालक नरेंद्र के सर से पिता का साया हट गया था और बड़े ताऊजी श्री गणपत भाई साहब ने, नरेंद्र को अपने साथ कर लिया और बहुत लाड प्यार से शिक्षा दी और घर की स्त्रियों के पास अधिक न रहने देते हुए उसे आरंभिक शिक्षा दी थी। एक कविता है पापा जी की ..'हर लिया क्यूं शैशव नादान'।

हर लिया क्यों शैशव नादान?
शुद्ध सलिल सा मेरा जीवन,
दुग्ध फेन-सा था अमूल्य मन,
तृष्णा का संसार नहीं था,
उर रहस्य का भार नहीं था,
स्नेह-सखा था, नन्दन कानन
था क्रीडास्थल मेरा पावन;
भोलापन भूषण आनन का
इन्दु वही जीवन-प्रांगण का
हाय! कहाँ वह लीन हो गया
विधु मेरा छविमान?
हर लिया क्यों शैशव नादान?

निर्झर-सा स्वछन्द विहग-सा,
शुभ्र शरद के स्वच्छ दिवस-सा,
अधरों पर स्वप्निल-सस्मिति-सा,
हिम पर क्रीड़ित स्वर्ण-रश्मि-सा,
मेरा शैशव! मधुर बालपन!
बादल-सा मृदु-मन कोमल-तन।
हा अप्राप्य-धन! स्वर्ग-स्वर्ण-कन
कौन ले गया नल-पट खग बन?
कहाँ अलक्षित लोक बसाया?
किस नभ में अनजान!
हर लिया क्यों शैशव नादान?

जग में जब अस्तित्व नहीं था,
जीवन जब था मलयानिल-सा
अति लघु पुष्प, वायु पर पर-सा,
स्वार्थ-रहित के अरमानों-सा,
चिन्ता-द्वेष-रहित-वन-पशु-सा
ज्ञान-शून्य क्रीड़ामय मन था,
स्वर्गिक, स्वप्निल जीवन-क्रीड़ा
छीन ले गया दे उर-पीड़ा
कपटी कनक-काम-मृग बन कर
किस मग हा! अनजान?
हर लिया क्यों शैशव नादान?


...नरेन्द्र शर्मा
...१९३२
http://www.lavanyashah.com/2009/01/blog-post_08.html


सुजॉय - बहुत सुंदर, बहुत सुंदर!

लावण्या जी - भारत के संयुक्त परिवारों मे अकसर हमारे पौराणिक ग्रंथों का पाठ जैसे रामायण होता ही है और सुसंस्कार और परिवार की सुद्रढ़ परम्पराएं भारतीयता के साथ सच्ची मानवता के आदर्श भी बालक मन मे उत्पन्न करते हुए, स्थायी बन जाते हैं, वैसा ही बालक नरेंद्र के पितृहीन पर परिवार के लाड दुलार भरे वातावरण मे हुआ था। और हां हमारे घर पली बड़ी हुईं हमारे बड़े ताऊजी की पुत्री गायत्री दीदी के संस्मरण पढियेगा इस लिंक में:

http://www.lavanyashah.com/2007/09/blog-post_16.html


सुजॉय - वाह! इस संस्मरण में गायत्री दीदी नें कितनी सुंदरता से लिखा है कि...

"मनुष्य की माया और वृक्ष की छाया उसके साथी ही चली जाती है ", पूज्य चाचाजी ने यही कहा था एक बार मेरे पति स्व. श्री राकेश जी से ! आज उनकी यह बात रह -रह कर मन को कुरेदती है. पूज्य चाचाजी के चले जाने से हमारी तो रक्शारुपी "माया ' और छाया ' दोनोँ एक साथ चली गयीँ और हम असहाय और छटपटाते रह गये| जीवन की कुछ घटनायेँ , कुछ बातेँ बीत तो जातीँ हैँ किँतु, उन्हेँ भुलाया नहीँ जा सकता, जन्म - जन्म तक याद रखने को जी चाहता है. कुछ तो ऐसी है, जो बँबई के समुद्री ज्वारोँ मेँ धुल - धुल कर निखर गयी हैँ और शेष
ग्राम्य जीवन के गर्द मेँ दबी -दबी गँधमयी बनी हुईँ हैँ ! सच मानिए, मेरी अमर स्मृतियोँ का केन्द्रबिन्दु केवल मेरे दिवँगत पूज्य चाचाजी कविवर पं.नरेन्द्र शर्मा जी हैँ! अपने माता पिता से अल्पायु मेँ ही वियुक्त होने के लगभग ६ दशकोँ के उपरान्त यह परम कटु सत्य स्वीकार करना पडता है कि, मैँ अब अनाथ - पितृहिना हो गयी हूँ !

लावण्या जी - अधिक विस्तार से, पुस्तक 'शेष - अशेष' मे आप मेरी अम्मा श्रीमती सुशीला नरेद्र शर्मा के लिखे संस्मरण मे पढ़ सकते हैं। ये पुस्तक पापा के देहांत के बाद उनकी बड़ी पुत्री स्व. वासवी ने छपवाई थ। आज तो अम्मा, पापा और वासवी, ये तीनों ही अब नहीं रहे!

सुजॉय - ज़रूर पढ़ना चाहेंगे हम इस पुस्तक को, और हमारे पाठकों नें भी इसे नोट कर लिया होगा! अच्छा, पंडित जी की शिक्षा-दीक्षा कैसे शुरु हुई?

लावण्या जी - शिक्षा घर पर ही आरम्भ हुई, फिर नरेंद्र को सीधे बड़ी कक्षा मे दाखिला मिल गया और स्कूल के शिक्षक नरेंद्र की प्रतिभा व कुशाग्र बुद्धि से चकित तो थे पर बड़े प्रसन्न भी थे। उनकी एक कविता "मुट्ठी बंद रहस्य" से कुछ यूं है...

" सच्चा वीर "

वही सच्चा वीर है, जो हार कर हारा नहीं,
आत्म विक्रेता नहीं जो, बिरुद बंजारा नहीं!
जीत का ही आसरा है, जिन्ह के लिये,
जीत जाये वह भले ही, वीर बेचारा नहीं!

निहत्था रण मेँ अकेला, निराग्रह सत्याग्रही,
हृदय मेँ उसके अभय, भयभीत, हत्यारा नहीं,
कौन है वह वीर? मेरा देश भारत -वर्ष है!
प्यार जिसने किया सबको, किसी का प्यारा नहीं!


सुजॉय - वाह! बहुत ख़ूब! अच्छा आगे की शिक्षा उन्होंने कहाँ से प्राप्त की?

लावण्या जी - प्रारम्भिक शिक्षा खुर्जा में हुई। इलाहाबाद विश्वविध्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में MA करने के बाद, कुछ वर्ष आनन्द भवन में 'अखिल भारतीय कॉंग्रेज़ कमिटी के हिंदी विभाग से जुड़े और नज़रबंद किये गए। देवली जेल में भूख हड़ताल से (१४ दिनो तक) जब बीमार हालत में रिहा किए गए तब गाँव, मेरी दादीजी गंगादेवी से मिलने गये। वहीं से भगवती बाबू ("चित्रलेखा" के प्रसिद्ध लेखक) के आग्रह से बम्बई आ बसे। वहीं गुजराती कन्या सुशीला से वरिष्ठ सुकवि श्री पंत जी के आग्रह से व आशीर्वाद से पाणि ग्रहण संस्कार सम्पन्न हुए। बारात में हिंदी साहित्य जगत और फिल्म जगत की महत्त्वपूर्ण हस्तियाँ हाजिर थीं - दक्षिण भारत से स्वर-कोकिला सुब्बुलक्षमीजी, सुरैयाजी, दिलीप कुमार, अशोक कुमार, अमृतलाल नागर व श्रीमती प्रतिभा नागरजी, भगवती बाबू, सपत्नीक अनिल बिश्वासजी, गुरु दत्त जी, चेतनानन्दजी, देवाननदजी इत्यादी .. और जैसी बारात थी उसी प्रकार १९ वे रास्ते पर स्थित उनका आवास डॉ. जयरामनजी के शब्दों में कहूँ तो "हिंदी साहित्य का तीर्थ-स्थान" बम्बई जैसे महानगर में एक शीतल सुखद धाम मेँ परिवर्तित हो गया।

सुजॉय - लावण्या जी, हम बात कर रहे हैं पंडित जी की शिक्षा के बारे में। कवि, साहित्यिक, गीतकार, दार्शनिक - ये सब तो फिर भी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, लेकिन आयुर्वेद तो बिल्कुल ही अलग शास्त्र है, जो चिकित्सा-विज्ञान में आता है। यह बताइए कि पंडित जी नें आयुर्वेद की शिक्षा कब और किस तरह से अर्जित की? क्या यह उनकी रुचि थी, क्या उन्होंने इसे व्यवसाय के तौर पर भी अपनाया, इस बारे में ज़रा विस्तार से बतायें।

लावण्या जी - पूज्य पापा जी ने आयुर्वेद का ज्ञान किन गुरुओं की कृपा से पाया उनके बारे मे बतलाती हूँ पर ये स्पष्ट कर दूं कि व्यवसाय की तरह कभी इस ज्ञान का उपयोग पापा जी ने नहीं किया था। हां, कई जान-पहचान के लोग आते तो उन्हें उपाय सुझाते और पापा ज्योतिष शास्त्र के भी प्रखर ज्ञाता थे, तो जन्म पत्रिका देखते हुए, कोई सुझाव उनके मन मे आता तो बतला देते थे। हमारे बच्चों के जन्म के बाद भी उनके सुझाव से 'कुमार मंगल रस' शहद के साथ मिलाकर हमने पापा के सुझाव पर दी थी। आयुर्वेद के मर्मग्य और प्रखर ज्ञाता स्व. श्री मोटा भाई, जो दत्तात्रेय भगवान के परम उपासक थे, स्वयं बाल ब्रह्मचारी थे और मोटाभाई ने, पावन नदी नर्मदा के तट पर योग साधना की थी, वे पापा जी के गुरु-तुल्य थे, पापा जी उनसे मिलने अकसर सप्ताह मे एक या दो शाम को जाया करते थे और उन्हीं से आयुर्वेद की कई गूढ़ चिकित्सा पद्धति के बारे मे पापा जी ने सीखा था। मोटा भाई से कुछ वर्ष पूर्व, स्व. ढूंडीराज न्याय रत्न महर्षि विनोद जी से भी पापा का गहन संपर्क रहा था। इस बारे में और विस्तार से जानने के लिए आप इस लिंक पर जा सकते हैं:

http://www.aroundalibag.com/idols/vinod.html

सुजॉय - लावण्या जी, आज हम यहाँ आकर रुकते हैं, पंडित जी के सफ़र को हम अगले सप्ताह आगे बढ़ायेंगे, आज की यह प्रस्तुति समाप्त करने से पहले आइए पंडित जी का लिखा फ़िल्म 'रत्नघर' का वही गीत सुनते हैं, जो मुझे बेहद पसंद है, और जिस गीत के मुखड़े से मैंने इस शृंखला का नामकरण भी किया है, "तुम्हे बांधने के लिए मेरे पास और क्या मेरा प्रेम है, मेरा प्रेम है, मेरा प्रेम है"। इस गीत को हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर हिंदी साहित्यकारों द्वारा लिखे फ़िल्मी गीतों की लघु शृंखला 'दिल की कलम से' की पहली ही कड़ी में बजाया था, आइए इस कर्णप्रिय गीत को यहाँ दोबारा सुनें। आवाज़ है लता मंगेशकर की और धुन है सुधीर पड़के का।

लावण्या जी - ज़रूर सुनाइए।

गीत - तुम्हे बांधने के लिए मेरे पास और क्या है (रत्नघर)


तो ये था 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में शृंखला 'मेरे पास मेरा प्रेम है' की पहली कड़ी। कैसा लगा ज़रूर लिख भेजिएगा, टिप्पणी के अलावा oig@hindyugm.com के ईमेल पते पर भी आप अपने सुझाव और राय लिख सकते हैं। और हाँ, आप अपने जीवन के यादगार अनुभवों को भी हमारे साथ बांट सकते हैं इसी स्तंभ में। 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' ओल्ड इज़ गोल्ड का एक ऐसा सह-स्तंभ है, जिसे हम सजाते हैं आप ही के भेजे हुए ईमेलों से। तो इसी आशा के साथ कि आपके ईमेल हमें जल्द ही प्राप्त होंगे, आज हम आप से विदा लेते हैं। 'आवाज़' पर अगली प्रस्तुति होगी कल सुबह, सुमित के साथ 'सुर-संगम' पर ज़रूर पधारिएगा, नमस्कार!

Saturday, October 16, 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने - जब माँ दुर्गा के विविध रूपों से मिलवाया लावण्या जी ने

'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष - ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' के साथ हम हाज़िर हैं। जैसा कि नवरात्री और दुर्गा पूजा की धूम मची हुई है चारों तरफ़, और आज है महानवमी। यानी कि नवरात्री की अंतिम रात्री और दुर्गा पूजा का भी अंतिम दिन। कल विजयादशमी के दिन दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन से यह उत्सव सम्पन्न होता है। तो क्यों ना आज इस अंक में हम माता रानी की आराधना करें।

दोस्तों, हमने महान कवि, दार्शनिक और गीतकार पंडित नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री श्रीमती लावण्या शाह जी से सम्पर्क किया कि वो अपने पिताजी के बारे में हमें कुछ बताएँ जिन्हें हम अपने पाठकों के साथ बाँट सकें। तब लावण्या जी ने ही यह सुझाव दिया कि क्यों ना नवरात्री के पावन उपलक्ष्य पर पंडित जी द्वारा संयोजित देवी माँ के कुछ भजन प्रस्तुत किए जाएँ। लावण्या जी के हम आभारी हैं कि उन्होंने हमारे इस निवेदन को स्वीकारा और ईमेल के माध्यम से हमें माँ दुर्गा के विविध रूपों के बारे में लिख भेजा और साथ ही पंडित जी के भजनों के बारे में बताया। तो आइए अब पढ़ते हैं लावण्या जी का ईमेल।

**********************

ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके
शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते !!


**********************

या देवी सर्वभूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः||

माता पार्वती , उमा , महेश्वरी, दुर्गा , कालिका, शिवा , महिसासुरमर्दिनी , सती , कात्यायनी, अम्बिका, भवानी, अम्बा , गौरी , कल्याणी, विंध्यवासिनी, चामुन्डी, वाराही , भैरवी, काली, ज्वालामुखी, बगलामुखी, धूम्रेश्वरी, वैष्णोदेवी , जगधात्री, जगदम्बिके, श्री, जगन्मयी, परमेश्वरी, त्रिपुरसुन्दरी ,जगात्सारा, जगादान्द्कारिणी, जगाद्विघंदासिनी ,भावंता, साध्वी, दुख्दारिद्र्य्नाशिनी, चतुर्वर्ग्प्रदा, विधात्री, पुर्णेँदुवदना,

निलावाणी, पार्वती, सर्वमँगला,सर्वसम्पत्प्रदा,शिवपूज्या,शिवप्रिता, सर्वविध्यामयी, कोमलाँगी, विधात्री, नीलमेघवर्णा, विप्रचित्ता, मदोन्मत्ता, मातँगी

देवी , खडगहस्ता, भयँकरी,पद्मा, कालरात्रि, शिवरुपिणी, स्वधा, स्वाहा, शारदेन्दुसुमनप्रभा, शरद्`ज्योत्सना, मुक्त्केशी, नँदा, गायत्री , सावित्री, लक्ष्मी , अलँकार सँयुक्ता, व्याघ्रचर्मावृत्ता, मध्या, महापरा, पवित्रा, परमा, महामाया, महोदया, इत्यादी देवी भगवती के कई नाम हैँ|

समस्त भारत मेँ देवी के शक्ति पीठ हैँ -

१) कामरूप पीठ
२) काशिका पीठ
३) नैपल्पिथ
४) रौद्र -पर्वत
५) कश्मीर पीठ
६) कान्यकुब्ज पीठ
७) पूर्णागिरी पीठ
८) अर्बुदाचल पीठ
९) अमृत केश्वर पीठ
१०) कैलास पीठ
११) शिव पीठ
१२) केदार पीठ
१३) भृगु पीठ
१४) कामकोटी पीठ
१५) चंद्रपुर पीठ
१६) ज्वालामुखी
१७) उज्जयिनी पीठ इत्यादी

भारत के हर प्राँत मेँ देवी के विविध स्वरुप की पूजा होती है और भारत के कई शहर देवी के स्वरुप की आराधना के प्रमुख केन्द्र हैँ।

शक्ति पूजा की अधिष्ठात्री दुर्गा देवी पूरे बँगाल की आराध्या काली कलकत्ते वाली "काली" भी हैँ,
और गुजरात की अम्बा माँ भी हैँ,
पँजाब की जालन्धरी देवी भी वही हैँ
तो विन्ध्य गुफा की विन्ध्यवासिनी भी वही
माता रानी हैँ जो जम्मू मेँ वैष्णोदेवी कहलातीँ हैँ
और त्रिकुट पर्बत पर माँ का डेरा है ॥
आसाम मेँ ताँत्रिक पूजन मेँ कामाख्या मँदिर बेजोड है ॥
तो दक्षिण मेँ वे कामाक्षी के मँदिर मेँ विराजमान हैँ
और चामुण्डी परबत पर भी वही हैँ
शैलपुत्री के रुप मेँ वे पर्बताधिराज हिमालय की पुत्री पार्बती कहलातीँ हैँ
तो भारत के शिखर से पग नखतक आकर,
कन्याकुमारी की कन्या के रुप मेँ भी वही पूजी जातीँ हैँ ॥
महाराष्ट्र की गणपति की मैया गौरी भी वही हैँ
और गुजरात के गरबे और रास के नृत्य ९ दिवस और ९ रात्रि को
माता अम्बिके का आह्वान करते हैँ ..
शिवाजी की वीर भवानी रण मेँ युद्ध विजय दिलवाने वाली वही हैँ --
गुजरात में, माँ खोडीयार स्वरूप से माता पूजी जातीं हैं

आइये देवी माँ की भक्ति में डूब जाएँ स्वर साम्राज्ञी सुश्री लता मंगेशकर के गाये ये भजन सुनिए, शब्द संयोजन पण्डित नरेंद्र शर्मा (मेरे पिताजी) का है और संगीत से संवारा है पण्डित ह्रदयनाथ मंगेशकर जी ने ! ऐल्बम का नाम है : महिमा माँ जगदम्बा की !




- लावण्या

*****************************************************

तो ये था पंडिर नरेन्दर शर्मा जी की सुपुत्री श्रीमती लावण्या शाह जी के ईमेल पर आधारित आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड - ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने'। आप सभी को दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए आज आप से आज्ञा ले रहे हैं, नमस्कार!



प्रस्तुति: सुजॊय चटर्जी

Sunday, May 31, 2009

इस बार का कवि सम्मेलन रश्मि प्रभा के संग

सुनिए पॉडकास्टिंग के इस नए प्रयोग को

Rashmi Prabha
रश्मि प्रभा
नमस्कार!

दोस्तो, हम एक फिर हाज़िर हैं इस माह के आपके अंतिम रविवार और अंतिम दिन को इंद्रधनुषी बनाने के लिए। जी हाँ, आपको भी इसका पूरे एक महीने से इंतज़ार होगा। तो इंतज़ार की घड़िया ख़त्म। सुबह की चाय पियें और साथ ही साथ हमारे इस पॉडकास्ट कवि सम्मेलन का रस लेते रहें, जिसमें भावनाओं और अभिव्यक्तियों के विविध रंग समाहित हैं। सुबह की चाय के साथ ही क्यों, इसका आनंद शाम की शिकंजी के साथ भी लें।

पिछले महीने हमें रश्मि प्रभा के रूप में साहित्य-सेवा की एक नई किरण मिलीं हैं। कविता-मंच पर ये कविताएँ तो लिख ही रही हैं, इस बार के कवि-सम्मेलन के संयोजन का दायित्व भी इन्हीं ने सम्हाला है। और आगे भी अपनी ओर से बेहतरीन प्रयास करते रहने का वचन दिया है।

इस बार के कवि सम्मेलन की सबसे ख़ास बात यह है कि इस बार दुनिया के अलग-अलग कोनों से कुल 19 कवि हिस्सा ले रहे हैं। संचालिका को लेकर यह संख्या 20 हो जाती है। और यह इत्तेफाक ही है कि इस बार जहाँ 10 महिला कवयिता हैं, वहीं 10 पुरुष कवयिता। कम से कम इस स्तर पर रश्मि प्रभा स्त्री-पुरुष समानता के तत्व को मूर्त करने में सफल रही हैं। इस बार के कवि सम्मेलन की एक और ख़ास बात है, और वह यह कि 20 में से 11 कवि पहली बार इस आयोजन के भागीदार बने हैं। जुलाई 2008 में जब हमने इसे शुरू किया था, तभी से हमारा यही उद्देश्य था कि दुनिया से अलग-अलग स्थानों, मंचों, संस्थाओं इत्यादि के शब्दशिल्पी वर्चुअल स्पेस का यह मंच साँझा करें और हमे खुशी है कि इस दिशा में आंशिक तौर पर ही सही, सफल भी हो रहे हैं। पॉडकास्ट कवि सम्मेलन का यह 11वाँ आयोजन है। इसके प्रथम अंक में मात्र 8 कवियों ने भाग लिया था।

यह आयोजन एक प्रयोग है- तकनीक की सड़क पर भावनाओं की पटरी बिछाने का और उन भावनाओं के चालकों को बारी-बारी से मौका देने का ताकि यात्रा लम्बी हो। आप बिना थके साहित्य की यात्रा करते रहें। पॉडकास्ट कवि सम्मेलन की संकल्पना को मूर्त रूप देने का पूरा श्रेय हमारी तकनीकी टीम को जाता है। यह आयोजन आवाज़ के तकनीकी प्रमुख अनुराग शर्मा के मार्गदर्शन में फल-फूल रहा है। इस बार के आयोजन का तकनीकी संपादन हमसे नई-नई जुड़ी तकनीककर्मी खुश्बू ने किया है। हमें बहुत खुशी है कि उन्होंने अपना कीमती वक़्त निकालकर हमारा प्रोत्साहन किया है।

अब हम आपका अधिक वक़्त नहीं लेंगे, उपर्युक्त सारी बातें तभी सार्थक होंगी, जब आपको इस बार का कवि सम्मेलन पसंद आयेगा। कृपया सुने और अवश्य बतायें कि हम अपने प्रयास में कितने सफल हुए हैं-

नीचे के प्लेयर से सुनें:


प्रतिभागी कवि-सरस्वती प्रसाद, किरण सिन्धु, गौरव शर्मा, लावण्या शाह, स्वप्न मंजूषा 'शैल', मनुज मेहता, प्रो॰ सी॰ बी॰ श्रीवास्तव, ज्योत्सना पाण्डेय, प्रीति मेहता, कीर्ति (दीपाली आब), मनोज भावुक, शोभा महेन्द्रू, विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र', शारदा अरोरा, डॉ॰ अनिल चड्डा, एस कुमार शर्मा, कमलप्रीत सिंह, सत्यप्रसन्न और जगदीश रावतानी।

यह भाग डाउनलोड करें।


यह कवि सम्मेलन तकनीक के माध्यम से अलग-अलग स्थानों पर बैठे कवियों को एक वर्चुअल मंच पर एक साथ बिठाने की कोशिश है। यदि आप हमारे आने वाले पॉडकास्ट कवि सम्मलेन में भाग लेना चाहते हैं
1॰ अपनी आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके भेजें।
2॰ जिस कविता की रिकॉर्डिंग आप भेज रहे हैं, उसे लिखित रूप में भी भेजें।
3॰ अधिकतम 10 वाक्यों का अपना परिचय भेजें, जिसमें पेशा, स्थान, अभिरूचियाँ ज़रूर अंकित करें।
4॰ अपना फोन नं॰ भी भेजें ताकि आवश्यकता पड़ने पर हम तुरंत संपर्क कर सकें।
5॰ कवितायें भेजते समय कृपया ध्यान रखें कि वे 128 kbps स्टीरेओ mp3 फॉर्मेट में हों और पृष्ठभूमि में कोई संगीत न हो।
6॰ उपर्युक्त सामग्री भेजने के लिए ईमेल पता- podcast.hindyugm@gmail.com


पॉडकास्ट कवि सम्मेलन के अगले अंक का प्रसारण 28 जून 2009 को किया जायेगा और इसमें भाग लेने के लिए रिकॉर्डिंग भेजने की अन्तिम तिथि है 18 जून 2009

हम सभी कवियों से यह अनुरोध करते हैं कि अपनी आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके podcast.hindyugm@gmail.com पर भेजें। आपकी ऑनलाइन न रहने की स्थिति में भी हम आपकी आवाज़ का समुचित इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे।

रिकॉर्डिंग करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। हमारे ऑनलाइन ट्यूटोरियल की मदद से आप सहज ही रिकॉर्डिंग कर सकेंगे। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

# Podcast Kavi Sammelan. Part 11. Month: May 2009.
कॉपीराइट सूचना: हिंद-युग्म और उसके सभी सह-संस्थानों पर प्रकाशित और प्रसारित रचनाओं, सामग्रियों पर रचनाकार और हिन्द-युग्म का सर्वाधिकार सुरक्षित है।


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