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Saturday, October 14, 2017

चित्रकथा - 40: किशोर कुमार को याद करती हुईं फ़िल्म जगत की पाँच अभिनेत्री और गायिकाएँ

अंक - 40

किशोर कुमार को याद करती हुईं फ़िल्म जगत की पाँच अभिनेत्री और गायिकाएँ


"बेक़रार दिल तू गाएजा..." 



दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत की इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकीया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। आज ’चित्रकथा’ के इस अंक में प्रस्तुत है हरफ़नमौला कलाकार किशोर कुमार के बारे में फ़िल्म जगत की कुछ अभिनेत्रियों व गायिकाओँ द्वारा कहे हुए शब्द और किशोर दा से जुड़ी उनकी स्मृतियाँ। कल 13 अक्तुबर को किशोर दा की पुण्यतिथि थी; अत: आज का यह अंख उन्ही को समर्पित करते हैं।



माला सिन्हा

"वो सबसे अच्छा कॉमेडियन, और एक बहुत अच्छे इंसान थे। मैंने उनके साथ दो हिन्दी फ़िल्मों में काम किया। एक था आइ. एस. जौहर का 'बेवकूफ़' और दूसरा एस. डी. नारंग का 'बम्बई का ठग'। सेट पे वो एक मिनट चुप नहीं बैठने का। जैसे कोई स्प्रिंग्‍ लगा हो! हर डिरेक्टर का नकल करना, एस. डी. नारंग कैसे बात करते हैं, के. एन. सिंह का इतना अच्छा नकल करते थे वो। टैप डान्स मैंने उन जैसा किसी को करते हुए नहीं देखा। किशोर दा असली जीनियस थे। He was a great actor, वो जो दादा गये, सो गये, उन जैसा अब कोई नहीं आ सकता, कोई आनेवाला नहीं। उनका गाना, गाना जैसे नहीं लगता, जैसे कि वो बात कर रहे हैं, very very expressive। मुझे गाने के रेकॉर्डिंग्‍स पर जाने का शौक था। जब भी मुझे पता चलता कि कहीं पे रेकॉर्डिंग्‍ चल रही है, मैं वहाँ पहुँच जाती थी। एक बार 'महबून स्टुडियोस' में किशोर दा के किसी गाने की रेकॉर्डिंग्‍ में मैं पहुँच गई। रेकॉर्डिंग्‍ से पहले कोई भी सिंगर कुछ चीज़ों से परहेज़ करते हैं, जैसे कि ठंडा पानी, इमली वगेरह। तो किशोर दा ने कहा कि मेरे लिए लेमन सोडा ले आओ, वह भी बरफ़ डाल कर। मैंने उनसे जाके पूछा, "दादा, आप रेकॉर्डिंग्‍ के समय ठंडा पीने की ज़िद कर रहे हैं, गला ख़राब नहीं हो जायेगा?" तो उन्होंने कहा कि अरे ये सब वहम है, जिसको उपरवाले का देन है, उसे कुछ नहीं होता। इतना ज़िंदा दिल इंसान मैंने कहीं और नहीं देखा।"



शशिकला

"'करोड़पति' हमारे घर की फ़िल्म थी। इसमें मैं थी, और हमारे किशोर कुमार थे। म्युज़िक था शंकर-जयकिशन का। लेकिन फ़िल्म बिल्कुल नहीं चली। गाने भी नहीं चले। शंकर-जयकिशन के होने के बावजूद नहीं चले। हम कहते थे कि 'करोड़पति' बनाते-बनाते हम कंगालपति बन गये। किशोर दा, उन दिनों में, मेरा ख़याल है सिर्फ़ तीन या चार आर्टिस्ट टॉप में थे - दिलीप कुमार, राज कपूर, देव आनन्द और किशोर कुमार। उनसे मिलना बहुत मुश्किल का काम था। टाइम देते थे, पर मिलते नहीं थे। टाइम देते थे, पर कभी नहीं आते थे। बिल्कुल शैतान बच्चे की तरह। आपको मैं उनका आख़िरी क़िस्सा सुनाती हूँ। फ़िल्म तो बन गई, फ़्लॉप भी हो गई, चली नहीं, ये सब हुआ, एक दिन मुझे फ़ोन आता है उनका कि शशि, तुम मुझे मिलने आओ। तो मैं गई अपने फ़्रेन्ड के साथ मिलने के लिए। तो बात कर रहे हैं, मुझे हार्ट-अटैक हो गया, ऐसा हुआ, वैसा हुआ, और अचानक मुझे आवाज़ आती है, 'टाइम अप, टाइम अप, टाइम अप'। मैं तो घबरा गई, मैंने कहा कि अरे यह आवाज़ कहाँ से आ रही है? हँसने लगे, हा हा हा, पता है मैं हार्ट का पेशण्ट हूँ न, इसलिए यहाँ पे एक रेकॉर्डिंग्‍ करके रखी है, पाँच मिनट से ज़्यादा किसी से बात नहीं करनी है। मैंने कहा कि किशोर दा, आपने मुझे डरा ही दिया बिल्कुल! और बहुत ईमोशनल थे मेरा ख़याल है, very emotional person। उनके तो कितने क़िस्से हैं, जितना सुनाये तो कम है, पर बहुत ही अच्छे, बहुत ही कमाल के आर्टिस्ट, जीनियस भी कहना चाहिए, देखिये गाने भी उन्होंने कितने अच्छे लिखे, म्युज़िक भी कितना अच्छा दिया, गाते तो अच्छा थे ही।"



लीना चन्दावरकर

"किशोर जी में जो एक बच्चा था, वह बच्चा उनके साथ ही रहता था, और वह आख़िर तक था। आशा जी को भी आप पूछिये कि किस तरह से वो... मैं शुरू शुरू में थोड़ा डर गई थी क्योंकि ये क्या करते हैं हरकतें न! और ऐसे डराते थे! मैंने उनके बारे में बहुत कुछ सुन रखा था, जब मैं फ़िल्मों में काम कर रही थी। कहीं न कहीं से उनका ज़िक्र आ ही जाता था। रवैल साहब, 'महबूब की मेहन्दी' के सेट पे, सब उनकी बातें कर रहे थे। किशोर जी के बारे में तो सबसे दिलचस्प टॉपिक होता था। तो 'शराफ़त' फ़िल्म में उन्होंने काम किया था रवैल साहब के साथ। राजकुमार जी, मीना जी। तो मैं वहाँ पे नयी थी तो सुनती थी इंटरेस्ट लेके कि क्या बातें हो रही हैं और ये सब सीनियर आर्टिस्ट्स हैं। तो बाद में (उनसे शादी होने के बाद) मुझे मालूम हुआ कि सब बढ़ा-चढ़ा कर बोलते थे। किशोर जी को मैंने ऐसा कभी नहीं देखा। बहुत ही बैलेन्स्ड इंसान थे, उनको थोड़ा सा था कि लोगों को दिखाये कि मैं पागलपन करता हूँ। उनको मज़ा आता था। दादामुनि थे न, अशोक कुमार जी, दादामुनि को वो कहते थे कि दादामुनि, तुम सयाने बन के फँस जाते हो, मैं पागल बन के बच जाता हूँ। क्योंकि एक दिन बर्थडे था उनका और उन्होंने किसी को इनवाइट नहीं किया था, और पता भी नहीं था कि खाना बनाना है कि क्या करना है! हम लोग गये थे, हमको तो पता था कि दादामुनि का बर्थडे है। भाभी ने हमारे लिए पूरी-तरकारी, उनको मालूम था कि इनकी क्या पसन्द है। बुलाने की क्या ज़रूरत है, सबको पता था कि दादामुनि का बर्थडे है तो करीबी लोग आने लगे। एक एक करके आने लगे और बैठ गये। किशोर जी भी बैठे हैं और एक दम, गाना भी गा रहे हैं। सुनाये जा रहे हैं, सबको मज़ा आ रहा है। तो खाने का वक़्त आ गया, डिनर। खाना भी बनाया था। लेकिन इतने लोग आ गये कि इतने लोगों का खाना है नहीं घर में। भाभी परेशान, बाद में कैसे भी करके मैनेज किया, होटल वगेरह से मँगवा के। हम इतने परेशान थे कि अभी ऑर्डर करेंगे, फिर दस लोग आ जायेंगे तो क्या होगा? क्योंकि रात हो चली थी। तो दादामुनि ने अन्दर आके मुझसे कहा कि अब क्या होगा, मैंने इतने लोगों को इनवाइट तो नहीं किया था, तेरी भाभी इतने लोगों का कैसे खाना बनायेगी? तो किशोर दा बड़ा मज़ा ले रहे थे। बोले कि तुम बड़े सयाने हो ना, इसलिये फँस जाते हो, मैं तो पागल हूँ, मैं बच जाता हूँ। दादामुनि ने कहा कि तू तो कंजूस है। तो किशोर जी ने कहा कि नहीं नहीं मैं कंजूस नहीं हूँ, लेकिन तुमको करना पड़ेगा, इस तरह से कोई उनको बोले तो अच्छा नहीं लगता था, कहते हैं न 'rules and regulations', उनको लगता था कि हर एक को आज़ादी मिलनी चाहिये। कोई ऐबनॉर्मल बीहेव नहीं करेंगे, लेकिन अगर कोई उनसे कहे तो ये करना पड़ेगा।"



सुलक्षणा पण्डित

जब सुलक्षणा पण्डित को एक साक्षात्कार में यह पूछा गया कि उन्होंने किशोर दा के साथ ’दूर का राही’ फ़िल्म में एक कालजयी गीत "बेक़रार दिल" गाया है, इसके बारे में वो कुछ बताएँ, तब सुलक्षणा जी ने कहा - "oh my God, उस गाने में किशोर दा ने मुझे बहुत चिढ़ाया था। उन्होंने कहा, "नहीं तुम बेक़रारे बोलोगी"; मैंने कहा, "मैं बेक़रार बोलूंगी।" उन्होंने फिर कहा कि नहीं तुम "बेक़रारे" कहोगी। तो मैं बोली कि नहीं, मैं "बेक़रार" ही बोलूंगी। तो ऐसे करते करते हम स्टुडियो पहुँचे - फ़िल्म सेन्टर। वहाँ पर रेखा भी थीं। योगिता बाली भी थीं, तो किशोर दा तो किशोर दा, बोले कि इस लड़की को हटाओ यहाँ से, नहीं तो परदा लगा दो, बहुत देखती है मुझे। तो ये सब करने के बाद इस तरह से "बेक़रार दिल" हमने साथ में गाया।" सुलक्षणा जी से जब आगे पूछा गया कि यह गाना कितनी देर में रेकॉर्ड हुआ था, तो उन्होंने बताया, "मैं आपको बताऊँ, "बेक़रार दिल" सिर्फ़ दो बार गाया गया था, तो किशोर दा की माँगें कि ये लगा दो, परदा लगा दो, लड़कियों को भगा दो, और मैं भी खड़ी हुई थी वहाँ पे, अब मैं कुछ बोलूंगी तो...पर काफ़ी जब ऐसा होने लगा तो मैंने बोला, "देखिए, आप इतना क्यों कर रहे हैं, हम लोग तो ऐसे नहीं"। "तेरे को मालूम चलेगा क्या है"। फिर मैंने गाना गाया उनके साथ, और किशोर कुमार तो धनी हैं हर चीज़ के, म्युज़िक डिरेक्टर वो हैं, ऐक्टर वो हैं, राइटर वो हैं, फ़िल्ममेकर वो हैं, क्या नहीं हैं वो, हर चीज़ से भरपूर, सराफ़ा एक आर्टिस्ट नज़र आता है उनमें। उमर में वो मेरे पंडित जसराज जी जैसे ही थे लेकिन अन्दर से बच्चे, और बातें करना अपने पत्तों से, अपने गार्डन से, रोज़ अपना घर बदलना, बिगाड़ना, कभी झोपड़ी बना देते थे, इतना सा, टाइम ज़रा भी नहीं लेते थे वो। मैंने उनके साथ हज़ारों स्टेज शोज़ भी किए हैं और इतना मज़ा भी आया, इतना कुछ सीखा भी है उनसे, बहुत कमाल के हैं, किशोर कुमार दोबारा पैदा नहीं हुआ।"



अलका यागनिक

13 अक्टुबर 1987 के दिन किशोर कुमार इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह गए थे। इसी दिन रेकॉर्ड हुआ था फ़िल्म ’बटवारा’ का गीत "तेरे वास्ते रे ढोला नैन म्हारे जागे रे जागे, तू म्हारो कोण लागे" जिसे अलका यागनिक, अनुराधा पौडवाल और कविता कृष्णमूर्ती ने गाया था। इस गीत की रेकॉर्डिंग् से जुड़ी एक दुखद याद के बारे में अलका यागनिक ने एक साक्षात्कार में बताया था। तीनों गायिकाएँ तैयार थीं, दवाब भी था उन पर क्योंकि तीनों में उन दिनों प्रतियोगिता थी। इसलिए इस दवाब में थीं कि कहीं मुझसे इस गीत में कोई ग़लती ना हो जाए! गीत रेकॉर्ड हो गया, तीनों गायिकाएँ काँच के कमरे से बाहर आ गईं। लक्ष्मी-प्यारे भी उनकी तरफ़ चले आ रहे थे कन्डक्टिंग् रूम की तरफ़ से, पर किसी के चेहरे पर कोई मुस्कुराहट नहीं थी जो आम तौर पर होता है अगर गीत अच्छा रेकॉर्ड हो जाए तो। लक्ष्मी-प्यारे के उतरे हुए चेहरे देख कर तीनों गायिकाएँ घबरा गईं यह सोच कर कि कहीं उनसे कोई ग़लती तो नहीं हो गई इस गीत में? पास आने पर अलका याज्ञनिक ने प्यारेलाल जी से पूछा कि क्या बात है? प्यारेलाल जी ने बताया, "किशोर दा नहीं रहे!" दिन था 13 अक्टुबर 1987। इसी दिन किशोर दा चले गए और इसी दिन रेकॉर्ड हुआ था ’बटवारा’ का यह गीत, हालाँकि फ़िल्म 1989 में रिलीज़ हुई थी।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Monday, August 7, 2017

फिल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड 01 || किशोर कुमार


Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 01 
Kishore Kumar 

फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के पहले एपिसोड में सुनिए कहानी किशोर कुमार की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....

Sunday, July 17, 2016

राग अल्हैया बिलावल : SWARGOSHTHI – 279 : RAG ALHAIYA BILAWAL




स्वरगोष्ठी – 279 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 12 : समापन कड़ी में खुशहाली का माहौल

“भोर आई गया अँधियारा सारे जग में हुआ उजियारा...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच जारी हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की यह समापन कड़ी है। श्रृंखला की बारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हमने मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा की और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी भी दी। श्रृंखला की बारहवीं कड़ी में आज हम आपको राग अल्हैया बिलावल के स्वरों में पिरोये गए 1972 में प्रदर्शित फिल्म ‘बावर्ची’ से एक सुमधुर, उल्लास से परिपूर्ण गीत का रसास्वादन कराएँगे। इस राग आधारित गीत को स्वर दिया है, मन्ना डे, लक्ष्मी शंकर, निर्मला देवी, किशोर कुमार और हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग अल्हैया बिलावल के स्वरों पर आधारित इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर और उनकी शिष्याओ के स्वरों में राग अल्हैया बिलावल में निबद्ध एक सुमधुर रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं।


दन मोहन उन गिने-चुने संगीतकारों में से थे जो नए-नए प्रयोग करने से नहीं कतराते थे। शास्त्रीय रागों को लेकर तरह-तरह के प्रयोग मदन मोहन ने किए जो उनके गीतों में साफ़ झलकता है। उदाहरण के तौर पर फ़िल्म ’बावर्ची’ का गीत ही ले लीजिए "भोर आई गया अँधियारा..."। यह गीत आधारित है राग अल्हैया बिलावल पर। इस फ़िल्म के बनते समय तक शायद ऐसा कोई भी हिन्दी फ़िल्मी गीत नहीं था जो इस राग पर आधारित हो। अल्हैया बिलावल एक प्रात:कालीन राग (सुबह 6 से 9 बजे तक गाया जाने वाला राग) होने की वजह से मुमकिन था कि इसका प्रयोग संगीतकार अपने गीतों में करते क्योंकि प्रात:काल के बहुत से गीत फ़िल्मों में आ चुके थे। पर शायद किसी ने भी इस राग को नहीं अपनाया, या फिर यूँ कहें कि अपना नहीं सके। मदन मोहन ने इस ओर पहल किया और अल्हैया बिलावल को गले लगाया। ’बावर्ची’ फ़िल्म में एक सिचुएशन ऐसी थी कि सुबह के वक़्त संयुक्त परिवार में चहल-पहल शुरु हुई है, पिताजी के चरण-स्पर्ष हो रहे हैं, सुबह की चाय पी जा रही है, बावर्ची अपने काम पे लगा है, संगीतकार बेटा अपने सुर लगा रहा है, घर की बेटियाँ घर के काम-काज में लगी हैं। इस सिचुएशन के लिए गीत बनाना आसान काम नहीं था। पर मदन मोहन ने एक ऐसे गीत की रचना कर दी कि इस तरह का यह आजतक का एकमात्र गीत बन कर रह गया है। बावर्ची बने फ़िल्म के नायक राजेश खन्ना के लिए मन्ना डे की आवाज़ ली गई जो इस गीत के मुख्य गायक हैं, जो बिखरते हुए उस परिवार को एक डोर में बाँधे रखने के लिए इस गीत में सबको शामिल कर लेते हैं। पिता हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय का पार्श्वगायन उन्होंने ख़ुद ही किया, संगीतकार बेटे (असरानी) को आवाज़ दी किशोर कुमार ने, और घर की दो बेटियों (जया भादुड़ी और उषा किरण) के लिए आवाज़ें दीं शास्त्रीय-संगीत की शीर्ष की दो गायिकाओं ने। ये हैं लक्ष्मी शंकर और निर्मला देवी। कैफ़ी आजमी ने गीत लिखा और नृत्य निर्देशन के लिए चुना गया गोपीकृष्ण को। कलाकारों के इस अद्वितीय आयोजन ने इस गीत को अमर बना दिया। और मदन मोहन ने केवल अल्हैया बिलावल ही नहीं, इस गीत के अलग-अलग अंश के लिए अलग-अलग रागों का प्रयोग किया। "भोर आई गया अंधियारा" का मूल स्थायी और अन्तरा राग अल्हैया बिलावल है। परन्तु अलग-अलग अन्तरों में राग मारु विहाग, नट भैरव, धनाश्री और हंसध्वनि की झलक भी मिलती है। हर बदले हुए राग के अन्तरे के बाद राग अल्हैया बिलावल में निबद्ध स्थायी की पंक्तियाँ वापस आती हैं।

अपने उसूलों पर चलने की वजह से 70 के दशक में मदन मोहन के साथ कई फ़िल्मकारों ने काम करना बन्द कर दिया था। हालाँकि उनके अन्तिम कुछ वर्षों में उन्होंने ॠषीकेश मुखर्जी (बावर्ची), गुलज़ार (कोशिश, मौसम), चेतन आनन्द (हँसते ज़ख़्म) और एच. एस. रवैल (लैला मजनूं) के साथ काम किया, पर उनके लिए रेकॉर्डिंग् स्टुडियो में तारीख़ मिलना भी मुश्किल हो रहा था। नए संगीतकारों की फ़ौज 60 के दशक के अन्तिम भाग से आ चुकी थी जिनके पास बहुत सी फ़िल्में थीं और वो महीनों तक अच्छे रेकॉर्डिंग् स्टुडियोज़ (जैसे कि तारदेव, फ़िल्म सेन्टर, महबूब) को बुक करवा लेते थे जिस वजह से जब मदन जी को ज़रूरत पड़ती स्टुडियो की, तो उन्हें नहीं मिल पाता। इस तरह से उनकी रेकॉर्डिंग् कई महीनों के लिए टल जाती और इस तरह से वो पिछड़ते जा रहे थे। ख़ैर, वापस आते हैं ’बावर्ची’ पर। इस फ़िल्म में कुल छह गीत थे। एक गीत की हमने चर्चा की, अन्य पाँच गीत भी रागों अथवा लोक संगीत पर आधारित थे। मन्ना डे की एकल आवाज़ में "तुम बिन जीवन कैसा जीवन..." के पहले अन्तरे में राग हेमन्त की झलक है। इसी प्रकार लक्ष्मी शंकर की आवाज़ में "काहे कान्हा करत बरजोरी...", में भी राग का स्पर्श है। कुमारी फ़ैयाज़ की आवाज़ में "पहले चोरी फिर सीनाज़ोरी..." में मराठी लोक संगीत लावणी का रंग है। मदन मोहन की फ़िल्म हो और लता मंगेशकर का कोई गीत ना हो कैसे हो सकता है भला। इस फ़िल्म में दो गीत लता जी से गवाये गए - "मोरे नैना बहाये नीर...", और दूसरा गीत है "मस्त पवन डोले रे..."। इस दूसरे गीत को फ़िल्म में नहीं शामिल किया गया, इसका मदन मोहन को अफ़सोस रहा। उनके साथ ऐसा कई बार हुआ। एडिटिंग् की कैंची उनके कई सुन्दर गीतों पर चल गई और गीत फ़िल्म से बाहर हो गया। कुछ उदाहरण - "खेलो ना मेरे दिल से..." (हक़ीक़त), "चिराग़ दिल का जलाओ बहुत अन्धेरा है..." (चिराग़), "दुनिया बनाने वाले..." (हिन्दुस्तान की क़सम), "मस्त पवन डोले रे..." (बावर्ची)। ’हीर रांझा’ में "मेरी दुनिया में तुम आयी..." शुरु-शुरु में फ़िल्म में नहीं था, कुछ सप्ताह बाद इसे जोड़ा गया था, पर साथ ही "तेरे कूचे में..." को हटा दिया गया। ’हँसते ज़ख़्म’ में "आज सोचा तो आँसू भर आए..." गीत को बहुत सप्ताह बीत जाने के बाद जोड़ा गया था। इन सारी जानकारियों के बाद अब समय है फ़िल्म ’बावर्ची’ के "भोर आई गया अँधियारा..." गीत को सुनने के साथ-साथ देखने का।


राग अल्हैया बिलावल : "भोर आई गया अँधियारा..." : मन्ना डे और साथी : फिल्म – बावर्ची


राग अल्हैया बिलावल का सम्बन्ध बिलावल थाट से माना गया है और इस थाट के आश्रय राग बिलावल का ही एक प्रकार है। इस राग के आरोह में मध्यम स्वर वर्जित होता है और अवरोह में सातो स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इस कारण इस राग की जाति षाड़व-सम्पूर्ण होती है। आरोह में शुद्ध और अवरोह में दोनों निषाद प्रयोग किये जाते है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। राग अल्हैया बिलावल के गायन-वादन का समय दिन का प्रथम प्रहर होता है। राग के आरोह में ऋषभ और अवरोह में गान्धार स्वर का अधिकतर वक्र प्रयोग किया जाता है। शुद्ध निषाद स्वर का प्रयोग आरोह में और कोमल निषाद का अल्प प्रयोग केवल अवरोह में दो धैवत के बीच में किया जाता है। राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। यह उत्तरांग प्रधान राग है, अर्थात इसका वादी स्वर सप्तक के उत्तरांग में आता है। इस राग का चलन भी सप्तक के उत्तरांग में और तार सप्तक में अधिक किया जाता है। आजकल राग अल्हैया बिलावल का प्रचार इतना अधिक बढ़ गया है केवल बिलावल कह देने से लोग अल्हैया बिलावल ही समझते हैं, जबकि राग बिलावल और अल्हैया बिलावल दो अलग-अलग राग हैं। राग अल्हैया बिलावल के वास्तविक स्वरूप का अनुभव करने के लिए अब हम आपको 16 मात्रा में निबद्ध एक खयाल सुनवा रहे हैं। इसे प्रस्तुत कर रही हैं, जयपुर अतरौली घराने के गायकी में दक्ष विदुषी किशोरी अमोनकर। इस गायन में उनकी शिष्याओं का योगदान भी है। राग अल्हैया बिलावल की इस बन्दिश के बोल हैं – ‘कवन बतरिया गैलो माई...’। आप यह रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक के साथ जारी श्रृंखला को भी यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग अल्हैया बिलावल : ‘कवन बतरिया गैलो माई...’ विदुषी किशोरी अमोनकर




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 279वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको सात दशक पुरानी फिल्म से लिये गए एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – ताल के लिए गीत में किस तालवाद्य का प्रयोग किया गया है? हमें उस तालवाद्य का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 23 जुलाई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 281वें अंक में प्रकाशित किया जाएगा। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 277 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1973 में प्रदर्शित फिल्म ‘दिल की राहें’ से राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – मधुवन्ती, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायिका – लता मंगेशकर

इस बार की संगीत पहेली में पाँच प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। ये विजेता हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी पाँच विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में जारी हमारी श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की आज यह समापन कड़ी है। आज की कड़ी में आपने राग अल्हैया बिलावल का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए हमने प्रस्तुत किया। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी, हमें लिखिए। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। हमारी अगली श्रृंखला “वर्षा ऋतु के राग” विषय पर आधारित होगी। इस श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव या फरमाइश ऊपर दिये गए ई-मेल पते पर शीघ्र भेजिए। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख  : सुजॉय चटर्जी  
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




Saturday, May 16, 2015

"छू कर मेरे मन को...", क्यों राजेश रोशन को अपने पैसे से इस गीत को रेकॉर्ड करना पड़ा?


एक गीत सौ कहानियाँ - 59

 

छू कर मेरे मन को...’ 





रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 59-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म ’याराना’ के मशहूर गीत "छू कर मेरे मन को, किया तूने क्या इशारा..." के बारे में जिसे किशोर कुमार ने गाया था। 

रबीन्द्र संगीत की धुनों पर आधारित हिन्दी फ़िल्मी गीतों की परम्परा बहुत पुरानी है। 30 के दशक से ही संगीतकार, ख़ास कर बंगाली संगीतकार, रबीन्द्र संगीत से प्ररणा लेकर फ़िल्मी गीत रचते रहे हैं। पंकज मल्लिक, कमल दासगुप्ता, अनिल बिस्वास, सचिन देव बर्मन, हेमन्त कुमार से लेकर बप्पी लाहिड़ी तक यह परम्परा जारी रही है। ये सभी बंगाली संगीतकारों के नाम हमने गिनाए। एक और संगीतकार हैं जिन्हें 100% बंगाली तो नहीं कह सकते, पर हाँ 50% ज़रूर बंगाली हैं। राजेश रोशन वह नाम है, उनकी माँ इरा रोशन बंगाली थीं और इस तरह से बंगाल के सुरीले संगीत की धारा उनके नसों में भी बही है। राजेश रोशन ने भी कई बार रबीन्द्र संगीत को आधार बना कर फ़िल्मी गीत रचे हैं। इनमें से सबसे प्रमुख गीत रहा है 1981 की फ़िल्म ’याराना’ का, "छू कर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा..." जो आधारित है "तोमार होलो शुरू, आमा होलो शारा" पर। निस्सन्देह यह गीत बेहद कामयाब रहा और आज भी अक्सर रेडियो पर सुनाई दे जाता है, पर राजेश रोशन से एक बड़ी भूल हो गई थी। दरअसल बात ऐसी थी कि रबीन्द्र संगीत का अधिकार शान्तिनिकेतन के विश्वभारती विश्वविद्यालय के पास सुरक्षित थी, जिसका अर्थ यह है कि किसी भी कलाकार को रबीन्द्र संगीत का इस्तेमाल करने के लिए विश्वभारती से अनुमति लेनी पड़ती थी। पर प्रस्तुत गीत के लिए ना राजेश रोशन ने अनुमति ली और ना ही ’याराना’ फ़िल्म के निर्माता ने। नतीजा यह हुआ कि फ़िल्म के रिलीज़ होने तक किसी को भनक तक नहीं पड़ी कि ऐसा कोई गीत बन रहा है। जैसे ही फ़िल्म रिलीज़ हुई और कलकत्ता के थिएटर में लोग इसे देखने पहुँचे, इस गीत को सुनते ही लोग भड़क उठे। बंगाल में कविगुरू की क्या अहमियत और सम्मान है यह हम सभी जानते हैं। कविगुरु की धुन का बिना अनुमति के हिन्दी फ़िल्मी गीत में सुनाई दे जाना बंगाल के लोगों को अच्छा नहीं लगा, और इसका विरोध प्रदर्शन हुआ। कई सिनेमाघरों में तोड़-फोड़ भे हुए जिससे फ़िल्म को थिएटरों से उतारना पड़ा। मामला ज़रूरत से ज़्यादा बिगड़ता देख ’याराना’ फ़िल्म के निर्माता और राजेश रोशन ने माफ़ी माँगी और विश्वभारती को क्षमा याचना का पत्र भेज कर विवाद को ख़त्म किया। राजेश रोशन के हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी कि इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी बिल्कुल इसी धुन और मीटर का इस्तेमाल कर कुछ वर्षों बाद (1986 में) एक और गीत बनाया फ़िल्म ’मक्कार’ के लिए। किशोर कुमार की ही आवाज़ में यह गीत था "तू ही मेरा सपना, तू ही मेरी मंज़िल"। 1998 में फ़िल्म ’युगपुरुष’ फ़िल्म में एक बार राजेश रोशन ने रबीन्द्र संगीत "पागला हावा बादोल दिने" पर आधारित गीत बनाया "बंधन खुला पंछी उड़ा"।

यह तो थी "छू कर मेरे मन को" के संगीत की दास्तान। अब आते हैं इसके बोलों पर। गीतकार अंजान के बेटे समीर उस समय अपने पिता के साथ मौजूद थे जब यह गीत लिखा जा रहा था। विविध भारती के एक साक्षात्कार में समीर ने इस गीत के बारे में कुछ ऐसा बताया था - "छूकर मेरे मन को...", अब देखिए इस गाने के पीछे भी एक बड़ी अजीब सी कहानी है, और मुझे याद है, मैं और पापा गाँव जा रहे थे; तो उनकी कैसेट पे दो गानों की ट्यून, एक तो उस फ़िल्म का टाइटल गाना "तेरे जैसा यार कहाँ..." और यह दूसरा गाना। टाइटल गाना तो उन्होंने रास्ते में ही कम्प्लीट कर लिया था पर यह गाना, उनको लग रहा था कि बहुत अच्छा ट्यून राजू ने दिया है, मैं कुछ अच्छा करना चाह रह हूँ। और उन्होंने मुखड़ा मुझे सुनाया "छू कर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा", मुझे लगा कि बहुत ख़ूबसूरत गाना बनेगा। मगर जब हम गाँव से आए और सिटिंग् हुई और रेकॉर्डिंग् पर जब गाना पहुँचा तो संजोग की बात थी कि रेकॉर्डिंग् में जाने से पहले तक प्रोड्युसर ने वह गाना नहीं सुना था। और रेकॉर्डिंग में जब प्रोड्युसर आया और उन्होंने जैसे ही गाना सुना तो बोले कि रेकॉर्डिंग् कैन्सल करो, मुझे यह गाना रेकॉर्ड नहीं करना है। उन्होंने कहा कि इतना बेकार गाना मैंने अपनी ज़िन्दगी में नहीं सुना, इतना ख़राब गाना राजू तुमने हमारी फ़िल्म के लिए बनाया है, मुझे यह गाना रेकॉर्ड नहीं करना है। अब राजेश रोशन का दिमाग़ उस ज़माने में, उनको ग़ुस्सा बहुत आता था, उन्होंने कहा कि गफ़्फ़ार भाई, उनका नाम था गफ़्फार नडियाडवाला, सोरज नडियाडवाला, हमीद नडियाडवाला, हमीद उसके प्रोड्युसर थे, हमीद यह फ़िल्म बना रहे थे, यह गाना रहे ना रहे, लेकिन यह गान मैं रेकॉर्ड करने जा रहा हूँ और तुम अभी इसी वक़्त इस रेकॉर्डिंग् स्टुडियो से निकल जाओ, मुझे तुम्हारी शकल नहीं देखनी है, तुमको यह गाना नहीं समझ में आएगा, मैं यह गाना रेकॉर्ड करूँगा, तुमको इसका पैसा भी नहीं देना है, मैं अपने पैसे से रेकॉर्ड करूँगा। और उस आदमी ने अपने पैसे से वह गाना रेकॉर्ड किया और गाना रेकॉर्ड होकर जब अमिताभ बच्चन तक पहुँचा तो उन्होंने यह बात कही कि अगर यह गाना नहीं होगा फ़िल्म में तो मैं यह फ़िल्म नहीं करूँगा। और वह गाना माइलस्टोन बना।" लीजिए, अब आप भी यह गाना सुन लीजिए।

फिल्म याराना : 'छूकर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा...' : किशोर कुमार : राजेश रोशन



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Saturday, November 1, 2014

"रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना" - कैसे बना था एक ही शॉट में फ़िल्माये जाने वाले हिन्दी सिनेमा का यह पहला गीत?


एक गीत सौ कहानियाँ - 44
 

रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना...





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 44-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'आराधना' के मशहूर गीत "रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना..." के बारे में।


'आराधना' कई कारणों से हिन्दी सिनेमा की एक बेहद महत्वपूर्ण फ़िल्म है। जहाँ एक तरफ़ इस फ़िल्म ने अभिनेता राजेश खन्ना को स्टार बना दिया, वहीं दूसरी ओर गायक किशोर कुमार के करीयर की गाड़ी को सुपरफ़ास्ट ट्रैक पर ला खड़ा किया। एक लो बजट फ़िल्म होते हुए भी इस फ़िल्म ने लाखों का मुनाफ़ा कमाया। फ़िल्म-संगीत के चलन की अगर बात करें तो यह एक ट्रेण्डसेटर फ़िल्म रही जिसने 70 के दशक के फ़िल्म-संगीत शैली की नीव रखी। कहने का मतलब है कि 'आराधना' के गीतों की जो स्टाइल थी, वही स्टाइल आगे चलकर 70 के दशक के फ़िल्मी गीतों की स्टाइल बनी। यही नहीं इस फ़िल्म में शर्मीला टैगोर ने साड़ी जिस स्टाइल से पहनी थी, उस ज़माने की लड़कियों ने भी उस स्टाइल को अपनाया। राजेश खन्ना, आनन्द बक्शी और राहुलदेव बर्मन की तिकड़ी भी इसी फ़िल्म से शुरू हुई (हालाँकि इस फ़िल्म के संगीतकार सचिनदेव बर्मन थे)। 'आराधना' रिलीज़ हुई थी 1969 में 'बान्द्रा टॉकीज़' में, और मद्रास के एक थिएटर में यह फ़िल्म लगातार दो साल चली थी। 'आराधना' के गीत-संगीत से जुड़ा एक दिलचस्प पहलू यह है कि रफ़ी और किशोर, दोनों ने कैसे एक ही नायक का पार्श्वगायन किया, जबकि उस ज़माने में एक फ़िल्म में एक नायक का पार्श्वगायन एक ही गायक करता था। इस मुद्दे पर दो थियरी सुनने को मिलती है जिसे हम इस लेख में उजागर करने जा रहे हैं। पहली थिअरी है ख़ुद शक्ति दा की जो उन्होंने विविधभारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में कहे थे। शक्ति दा के शब्दों में - "शुरू में यह तय हुआ था कि मोहम्मद रफ़ी इस फ़िल्म के सभी गीतों को गायेंगे। पर वो एक लम्बे वर्ल्ड टूर पर निकल गये, इसलिए आपस में बातचीत कर यह तय हुआ कि किशोर कुमार को इस फ़िल्म के गीतों को गाने के लिए लाया जाये। पर उस समय किशोर कुमार देव आनन्द के लिए पार्श्वगायन किया करते थे, इसलिए मैं श्योर नहीं था कि किशोर एक नये हीरो के लिए गायेगा या नहीं। मैंने किशोर को फ़ोन किया। वो तब तक अशोक कुमार के ज़रिये मेरा दोस्त बन चुका था। किशोर ने कहा कि वो देव आनन्द के लिए गाता है। तो मैंने कहा कि नख़रे क्यों कर रहा है, हो सकता है कि यह तुम्हारे लिए कुछ अच्छा हो जाये! किशोर राज़ी हो गया और इस तरह से पहला गाना रेकॉर्ड हुआ। एक एक करके तीन गाने रेकॉर्ड हो गये - "कोरा कागज़ था यह मन मेरा...", "मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू...." और "रूप तेरा मस्ताना..."। जब रफ़ी वर्ल्ड टूर से वापस आए तो उन्होंने बाक़ी के दो गीत गाये - "गुनगुना रहे हैं भँवरें...." और "बाग़ों में बहार है..."।"


दूसरी थिअरी का पता हमें चला अन्नु कपूर से, उन्ही के द्वारा प्रस्तुत 'सुहाना सफ़र' कार्यक्रम में। "उन दिनों यह प्रचलन था कि फ़िल्म के शुरू होने पर लौन्चिंग पैड के तौर पर फ़िल्म के दो गाने रेकॉर्ड होते थे, और गानो के रेकॉर्ड होने की ख़बर इंडस्ट्री के प्रचलित अख़्बार 'स्क्रीन' में छप जाती थी। फ़िल्म के गीतों को गाने के लिए सचिनदेव बर्मन की पहली पसन्द थे मोहम्मद रफ़ी साहब। और यही वजह थी कि उन्होंने फ़िल्म के दो गीत रफ़ी से गवाये। "गुनगुना रहे हैं ..." और "बाग़ों में बहार है..."। इससे पहले कि वो और गानों को रेकॉर्ड करवा पाते, दादा की तबीयत ख़राब हो गई, बीमार पड़ गये। हेल्थ के हाथों मजबूर दादा के संगीत की ज़िम्मेदारी आन पड़ी उनके बेटे पंचम के कन्धों पर। पंचम की किशोर कुमार से बहुत अच्छी दोस्ती थी। और वो किशोर कुमार को, ऐज़ ए सिंगर लाइक भी बहुत करते थे। लेकिन किशोर कुमार का उस वक़्त करीयर अच्छा नहीं चल रहा था। पंचम के दिमाग़ में यह बात बस गई और उन्होंने किशोर कुमार की आवाज़ को लेने का निर्णय ले डाला। पंचम का मानना था कि राजेश खन्ना एक नया आर्टिस्ट है जिसके उपर किशोर की आवाज़ बहुत फ़िट रहेगी। बहुत सारी चीज़ों का ध्यान रखते हुए, उनके अपने विचार होंगे, किशोर कुमार के साथ रिहर्सलें शुरू कर दी। पंचम के साथ "मेरे सपनों की रानी...", "कोरा कागज़ था..." और "रूप तेरा मस्ताना...", इन गानों की तैयारी करनी शुरू कर दी। जब गानों की फ़ाइनल रेकॉर्डिंग चल रही थी, तब पिताजी यानी सचिनदेव बर्मन की हालत में कुछ सुधार आ गया और वो फ़ाइनल रेकॉर्डिंग को सुनने स्टुडियो जा पहुँचे। वहाँ जाकर क्या देखते हैं कि किशोर गाना गा रहा है। पंचम से बोले कि ये तूने क्या किया? मैं रफ़ी से गाने गवाना चाहता था क्योंकि वो इंडस्ट्री की नम्बर वन आवाज़ है, डिस्ट्रिब्युटर्स और फ़ाइनन्सर्स की वो पहली पसन्द है, वैसे भी राजेश खन्ना की पहले आई तीन फ़िल्में फ़्लॉप हो चुकी हैं, कम से कम गानों की वजह से तो फ़िल्म प्रोमोट की जा सकती है। क्या तुझे रफ़ी की आवाज़ में रेकॉर्ड की हुई पहले दो गीतों में कोई कमी लगी है? पंचम ने बहुत शान्त भाव से उत्तर दिया कि आप सही कह रहे हैं बाबा, मैंने वो दोनो गीत सुने हैं, और कहीं से भी कमतर नहीं है। पर बचे हुए गीतों के लिए मुझे लगा कि किशोर की आवाज़ बहुत ऐप्ट और पर्फ़ेक्ट रहेगी। मैं चाहता हूँ कि एक बार आप सुनें और फिर कहें। सचिन दा ने जब किशोर की आवाज़ में वो तीनो गाने सुने तो ख़ुश हो गये। पंचम ने उनकी रॉ ट्युन्स को जिस फ़ैशन में फ़ाइनल टच किया था, वो सचमुच बेहतरीन था। गाने फ़ाइनली किशोर की ही आवाज़ में रेकॉर्ड हुए। जब फ़िल्म रिलीज़ हुई तो किशोर के गाये इन गीतों को बहुत कामयाबी मिली। और इस फ़िल्म के गीत "रूप तेरा मस्ताना..." के लिए किशोर कुमार को उस साल फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड भी मिला। और इस तरह से इसी फ़िल्म के साथ कमबैक हुआ किशोर कुमार का।"

सचिन दा, शक्ति दा, राजेश खन्ना और पंचम
अब इन दोनों थिअरी में से कौन सी थिअरी सच है और कौन सी ग़लत, यह कह पाना मुश्किल है। पर एक बात जो सच है, वह यह कि "रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना..." गीत की जो कम्पोज़िशन दादा सचिनदेव बर्मन ने बनाई थी, उसमें उतना सेन्सुअसनेस नहीं था। सीन जितना बोल्ड था, उस हिसाब से गीत की धुन ठंडी थी। रिहर्सल करते समय किशोर कुमार ने इसमें अपना अंदाज़ डाल दिया, मुड़कियाँ कम कर दीं और अपनी आवाज़-ओ-अंदाज़ में ऐसी सेन्सुअस अपील ले आये कि सीन के साथ पर्फ़ेक्ट मैच कर गया। कहना ज़रूरी है कि फिर इसके बाद इस तरह का मेल सेन्सुअस गीत दूसरा नहीं बन पाया है। अब इस गीत के पिक्चराइज़ेशन की कहानी भी सुन लीजिये। शक्ति सामन्त अपने गीतों के पिक्चराइज़ेशन के बारे में रात को अपने कमरे में बैठ कर गीतों को सुनते हुए सोचा करते थे और पिक्चराइज़ेशन की प्लैनिंग किया करते थे। तो इस गीत को जैसे वो सुन रहे थे, अचानक से उनके दिमाग़ में यह ख़याल आया कि इस गीत को एक ही शॉट में फ़िल्माया जा सकता है। उन्होंने एक कागज़ लिया और उस पर A, B, C लिखा - A हीरो के लिए, B हीरोइन के लिए, C कैमरे के लिए, और अपने मन-मस्तिष्क में गीत का पूरा फ़िल्मांकन कर बैठे। शूटिंग के दिन उन्होंने एक राउन्ड ट्रॉली मँगवाया और 'फ़िल्मालय' स्टुडियो में इसकी शूटिंग शुरू की। शुरू शुरू में कुछ लोगों ने उनके इस विचार का विरोध किया था कि गीत को एक ही शॉट में फ़िल्माया जाये। किसी ने कहा भी था कि इसका दिमाग़ ख़राब हो गया है जो इतना अच्छा गाना एक ही शॉट में ले रहा है। तब शक्ति दा ने यह दलील दी कि जब रात को मैं यह गाना सुन रहा था तो समझ ही नहीं आया कि "कट" कहाँ पर बोलूँ? इस तरह से यह गीत हिन्दी सिनेमा का वह पहला गीत बना जो एक ही शॉट में फ़िल्माया गया था। बस इतनी सी ही थी इस गीत के बनने की कहानी।  लीजिए, अब आप वह गीत सुनिए।

फिल्म - आराधना : 'रूप तेरा मस्ताना प्यार मेरा दीवाना...' : किशोर कुमार : संगीत - सचिनदेव बर्मन : गीत - आनन्द बक्शी 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ'' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 


अपना मनपसन्द स्तम्भ पढ़ने के लिए दीजिए अपनी राय 



नए साल 2015 में शनिवार के नियमित स्तम्भ रूप में आप कौन सा स्तम्भ पढ़ना सबसे ज़्यादा पसन्द करेंगे?

1.  सिने पहेली (फ़िल्म सम्बन्धित पहेलियों की प्रतियोगिता)

2. एक गीत सौ कहानियाँ (फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया से जुड़े दिलचस्प क़िस्से)

3. स्मृतियों के स्वर (रेडियो (विविध भारती) साक्षात्कारों के अंश)

4. बातों बातों में (रेडियो प्लेबैक इण्डिया द्वारा लिये गए फ़िल्म व टीवी कलाकारों के साक्षात्कार)

5. बॉलीवुड विवाद (फ़िल्म जगत के मशहूर विवाद, वितर्क और मनमुटावों पर आधारित श्रृंखला)


अपनी राय नीचे टिप्पणी में अथवा cine.paheli@yahoo.com  पर अवश्य बताएँ। 







Sunday, June 29, 2014

सुरीली बाँसुरी के पर्याय पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया




स्वरगोष्ठी – 174 में आज

व्यक्तित्व – 4 : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया


‘देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए...’ 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ की चौथी कड़ी में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी लघु श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ के अन्तर्गत हम आपसे संगीत के कुछ असाधारण संगीत-साधकों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं, जिन्होंने मंच, विभिन्न प्रसारण माध्यमों अथवा फिल्म संगीत के क्षेत्र में लीक से हट कर उल्लेखनीय योगदान किया है। हमारी आज की कड़ी के व्यक्तित्व हैं, विश्वविख्यात बाँसुरी वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया, जिन्होने एक साधारण सी दिखने वाली बाँस की बाँसुरी के मोहक सुरों के बल पर पूरे विश्व में भारतीय संगीत की विजय-पताका को फहराया है। चौरसिया जी की बाँसुरी ने शास्त्रीय मंचों पर तो संगीत प्रेमियों को सम्मोहित किया ही है, फिल्म संगीत के प्रति भी उनका लगाव बना रहा। उन्होने सुप्रसिद्ध सन्तूर वादक पण्डित शिवकुमार शर्मा के साथ मिलकर शिव-हरि नाम से कई फिल्मों में संगीत निर्देशन भी किया है। आज के अंक में हम आपके लिए चौरसिया जी द्वारा प्रस्तुत राग हंसध्वनि की एक रचना, बंगाल की एक चर्चित लोक धुन और शिव-हरि के रूप में रचे बेहद सफल फिल्म ‘सिलसिला’ का एक गीत भी प्रस्तुत करेंगे। यह भी उल्लेखनीय है कि इसी सप्ताह 1 जुलाई को पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया अपनी आयु के 77 वर्ष पूर्ण कर 78वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार इस महान संगीत-साधक को जन्मदिवस के उपलक्ष्य में शत-शत मंगलकामनाएँ अर्पित करता है।
 



भारतीय संगीत के अनेक साधकों ने विश्व-संगीत के मंच पर अपने संगीत की उत्कृष्ठता को सिद्ध किया है। इन्हीं में एक नाम बाँसुरी वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया का भी शामिल है। बाँसुरी वादक पण्डित पन्नालाल घोष (1911-1960) ने इस वाद्य को लोकमंच से शास्त्रीय संगीत के मंच पर प्रतिष्ठित करने का जो प्रयास किया था, पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया ने उसे पूर्णता दी। यह भी आश्चर्यजनक है कि ऐसी महान प्रतिभा का जन्म संगीतज्ञ या संगीत-प्रेमी परिवार में नहीं हुआ था। हरिप्रसाद जी का जन्म 1 जुलाई, 1938 को इलाहाबाद के एक ऐसे परिवार में हुआ था, जहाँ सभी सदस्य कुश्ती के शौकीन थे। उनके पिता स्वयं कुशल पहलवान थे और चाहते थे कि उनका पुत्र भी कुश्ती के दाँव-पेंच सीखे। बालक हरिप्रसाद पिता के साथ अखाड़ा जाते तो थे किन्तु उनका मन इस कार्य में कभी नहीं लगा। उनका बाल-मन तो सुरीली ध्वनियों की ओर आकर्षित होता था। ईश्वर ने उन्हें सांगीतिक प्रतिभा प्रतिभा से युक्त कर इस धरा पर भेजा था। कुश्ती के अखाड़े के बजाय उनका मन पड़ोस के संगीत शिक्षक पण्डित राजाराम के पास अधिक लगता था। बालक हरिप्रसाद को पण्डित राजाराम ने संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा दी। इसके बाद वाराणसी के सुविख्यात गुरु पण्डित भोलानाथ जी से बाँसुरी वादन की विधिवत शिक्षा प्राप्त की और 19 वर्ष की आयु के होने तक बाँसुरी-वादन में इतने कुशल हो गए कि उनकी नियुक्ति रेडियो में हो गई। 1957 में उनकी पहली तैनाती ओडिसा स्थित कटक केन्द्र पर बाँसुरी-वादक के रूप में हुई। यहाँ वे लगभग तीन वर्ष तक रहे। इस दौरान उन्होने अनेक संगीतज्ञों को सुना और क्षेत्रीय संगीत का अध्ययन भी किया। आइए, यहाँ थोड़ा विराम लेकर पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया का बजाया राग हंसध्वनि में दो रचनाएँ सुनवाते हैं। राग हंसध्वनि अत्यन्त मधुर राग है, जो उत्तर और दक्षिण, दोनों संगीत पद्यतियों में समान रूप से लोकप्रिय है। इस राग में पण्डित जी द्वारा प्रस्तुत पहली मध्य लय की रचना सितारखानी ताल में और दूसरी द्रुत तीनताल में निबद्ध है।


राग हंसध्वनि : मध्यलय सितारखानी और द्रुतलय तीनताल की रचनाएँ : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया




वर्ष 1960 में हरिप्रसाद जी का स्थानान्तरण रेडियो कटक केन्द्र से मुम्बई केन्द्र पर हो गया। मुम्बई आ जाने के बाद उन्हें अपने संगीत को अभिव्यक्ति देने के लिए और अधिक विस्तृत फ़लक मिल गया और यहाँ आ जाने के बाद संगीत के क्षेत्र में उनकी प्रतिभा को एक नई पहचान मिली। अब उन्हें प्रतिष्ठित संगीत सभाओं में मंच-प्रदर्शन के लिए आमंत्रित किया जाने लगा था। यहीं रहते हुए उनका सम्पर्क मैहर घराने के संस्थापक और सन्त-संगीतज्ञ उस्ताद अलाउद्दीन खाँ की सुपुत्री विदुषी अन्नपूर्णा देवी से हुआ। इनका मार्गदर्शन पाकर हरिप्रसाद जी के वादन में भरपूर निखार आया। उन्होने रागों के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों के लोक-संगीत का भी गहन अध्ययन किया था। आज भी विभिन्न संगीत-समारोहों में अपने बाँसुरी-वादन को विराम देने से पहले वे कोई लोकधुन अवश्य प्रस्तुत करते हैं। आइए, अब हम आपको बाँसुरी पर पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया द्वारा प्रस्तुत बंगाल की अत्यन्त लोकप्रिय भटियाली धुन सुनवाते हैं। पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया द्वारा प्रस्तुत इस भटियाली धुन के साथ तबला संगति पण्डित योगेश समसी ने की है।


भटियाली धुन : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया : तबला संगति – योगेश समसी




बाँस से बनी बाँसुरी सम्भवतः सबसे प्राचीन स्वर-वाद्य है। महाभारत काल से पहले भी बाँसुरी का उल्लेख मिलता है। विष्णु के कृष्णावतार को तो ‘मुरलीधर’, ‘बंशीधर’, ‘वेणु के बजइया’ आदि नामों से सम्बोधित भी किया गया है। श्रीकृष्ण से जुड़ी तमाम पौराणिक कथाएँ बाँसुरी के गुणगान से भरी पड़ी हैं। यह एक ऐसा सुषिर वाद्य है जो लोक, सुगम से लेकर शास्त्रीय मंचों पर भी सुशोभित है। भारतीय संगीत के क्षेत्र में अनेक बाँसुरी के साधक हुए हैं, जिन्होने इस साधारण से दिखने वाले सुषिर वाद्य को असाधारन गरिमा प्रदान की है। वर्तमान में पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया बाँसुरी के ऐसे साधक हैं जिन्होने देश-विदेश में इस वाद्य को प्रतिष्ठित किया है। देश-विदेश के अनेकानेक सम्मान और पुरस्कारों से अलंकृत पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया ने सुप्रसिद्ध संतूर-वादक पण्डित शिवकुमार शर्मा के साथ जोड़ी बना कर वर्ष 1989 से फिल्मों में भी संगीत देना आरम्भ किया। शिव-हरि के नाम से इन दिग्गज संगीतज्ञों ने चाँदनी, विजय, सिलसिला, लम्हे, डर, फासले आदि फिल्मों में अनेक लोकप्रिय गीत दिये हैं। आज के इस अंक में हम आपको पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया और पण्डित शिवकुमार शर्मा के साथ मिल कर बनी संगीतकार जोड़ी द्वारा चर्चित हिन्दी फिल्म ‘सिलसिला’ का बेहद लोकप्रिय गीत- ‘देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए...’ सुनवाते हैं। गीतकार जावेद अख्तर के लिखे इस गीत को लता मंगेशकर और किशोर कुमार ने स्वर दिया है। इस गीत से रेखांकित करने योग्य एक तथ्य यह भी जुड़ा है कि गीत में मध्यम और निषाद स्वर रहित राग भूपाली के स्वर तो मौजूद हैं, किन्तु राग के स्वरों का चलन राग भूपाली अथवा देशकार के अनुसार नहीं है। लीजिए, अब आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


फिल्म – सिलसिला : ‘देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए...’ : लता मंगेशकर और किशोर कुमार : गीतकार – जावेद अख्तर





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 174वें अंक की पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत में एक रागबद्ध खयाल रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 180वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – खयाल का यह अंश सुन कर राग पहचाइए और हमे राग का नाम बताइए।

2 – गीत का यह अंश सुन कर गायक कलाकार को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 176वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 172वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1959 में प्रदर्शित फिल्म ‘चाचा ज़िन्दाबाद’ के एक गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग ललित और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक मन्ना डे और लता मंगेशकर। इस अंक के दोनों प्रश्नों के सही उत्तर पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपसे सुप्रसिद्ध बाँसुरी वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा की। इसके साथ ही हमने शास्त्रीय, लोक और फिल्म संगीत के क्षेत्र में किए गए कार्यों को रेखांकित किया। अगले अंक से हम कुछ ऋतु प्रधान रागों का की चर्चा करेंगे। यह अंक आपको कैसा लगा, हमें अवश्य बताइए। आप भी अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों की प्रतीक्षा करेंगे।
 




एक आवश्यक सूचना

अपने संगीत-प्रेमी पाठकों और श्रोताओ को कुछ नयेपन का अनुभव कराने के लिए ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के कुछ कार्यक्रमों को हम yourlisten के सहयोग से आडियो रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारा यह प्रयोग आपको कैसा लगा? अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव हमें swargoshthi@gmail.com , radioplaybackindia@live.com अथवा cine.paheli@yahoo.com पर अवश्य लिखें। आपके सुझाव के आधार पर हम अपने कार्यक्रमों को और अधिक बेहतर रूप दे सकेंगे।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Thursday, August 4, 2011

कोई होता मेरा अपना.....शोर के "जंगल" में कोई जानी पहचानी सदा ढूंढती जिंदगी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 715/2011/155

'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक और शाम लेकर मैं, सुजॉय चटर्जी, साथी सजीव सारथी के साथ हाज़िर हूँ। जैसा कि आप जानते हैं इन दिनों इस स्तंभ में जारी है लघु शृंखला 'एक पल की उम्र लेकर', जिसके अन्तर्गत सजीव जी की लिखी कविताओं की इसी शीर्षक से किताब में से चुनकर १० कविताओं पर आधारित फ़िल्मी गीत बजाये जा रहे हैं। आज की कविता का शीर्षक है 'जंगल'।

यह जंगल मेरा है
मगर मैं ख़ुद इसके
हर चप्पे से नहीं हूँ वाकिफ़
कई अंधेरे घने कोने हैं
जो कभी नहीं देखे

मैं डरा डरा रहता हूँ
अचानक पैरों से लिपटने वाली बेलों से
गहरे दलदलों से
मुझे डर लगता है
बर्बर और ज़हरीले जानवरों से
जो मेरे भोले और कमज़ोर जानवरों को
निगल जाते हैं

मैं तलाश में भटकता हूँ,
इस जंगल के बाहर फैली शुआओं की,
मुझे यकीं है कि एक दिन
ये सारे बादल छँट जायेंगे
मेरे सूरज की किरण
मेरे जंगल में उतरेगी
और मैं उसकी रोशनी में
चप्पे-चप्पे की महक ले लूंगा
फिर मुझे दलदलों से
पैरों से लिपटी बेलों से
डर नहीं लगेगा

उस दिन -
ये जंगल सचमुच में मेरा होगा
मेरा अपना।


जंगल की आढ़ लेकर कवि नें कितनी सुंदरता से वास्तविक जीवन और दुनिया का चित्रण किया है इस कविता में। हम अपने जीवन में कितने ही लोगों के संस्पर्श में आते हैं, जिन्हें हम अपना कहते हैं, पर समय समय पर पता चलता है कि जिन्हें हम अपना समझ रहे थे, वो न जाने क्यों अब ग़ैर लगने लगे हैं। हमारे अच्छे समय में रिश्तेदार, सगे संबंधी और मित्र मंडली हमारे आसपास होते हैं, पर बुरे वक़्त में बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो हमारे साथ खड़े पाये जाते हैं। किसी नें ठीक ही कहा है कि बुरे वक़्त में ही सच्चे मित्र की पहचान होती है। जीवन की अँधेरी गलियों से गुज़रते हुए अहसास नहीं होता कि कितनी गंदगी आसपास फैली है, पर जब उन पर रोशनी पड़ती है तो सही-ग़लत का अंदाज़ा होता है। कई बार दिल भी टूट जाता है, पर सच तो सच है, कड़वा ही सही। और इस सच्चाई को जितनी जल्दी हम स्वीकार कर लें, हमारे लिए बेहतर है। पर टूटा दिल तो यही कहता है न कि कोई तो होता जिसे हम अपना कह लेते, चाहे वो दूर ही होता, पर होता तो कोई अपना! गुलज़ार साहब नें इस भाव पर फ़िल्म 'मेरे अपने' में एक यादगार गीत लिखा था। आज गायक किशोर कुमार का जन्मदिवस है। उन्हें याद करते हुए उन्ही का गाया यह गीत सुनते हैं जिसकी धुन बनाई है सलिल चौधरी नें।



और अब एक विशेष सूचना:
२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।

और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-

सूत्र १ - एक आवाज़ रफ़ी साहब की है इस युगल गीत में.
सूत्र २ - माला सिन्हा अभिनीत फिल्म है ये.
सूत्र ३ - मुखड़े में शब्द है -"वक्त".

अब बताएं -
गीतकार कौन हैं - ३ अंक
फिल्म के नायक कौन हैं - २ अंक
संगीतकार बताएं - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
सत्यजीत जी कोशिश तो कर रहे हैं पर अमित जी जरा ज्यादा फुर्तीले दिख रहे हैं :)

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, June 14, 2011

एक हसीना थी, एक दीवाना था....एक कहानी नुमा गीत जिसमें फिल्म की पूरी तस्वीर छुपी है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 678/2011/118

'एक था गुल और एक थी बुलबुल' शृंखला में कल आपने १९७९ की फ़िल्म 'मिस्टर नटवरलाल' का गीत सुना था। जैसा कि हमने कल बताया था कि आनन्द बक्शी साहब के लिखे दो गीत आपको सुनवायेंगे, तो आज की कड़ी में सुनिये उनका लिखा एक और ज़बरदस्त कहानीनुमा गीत। यह केवल कहानीनुमा गीत ही नहीं, बल्कि उसकी फ़िल्म का सार भी है। पुनर्जनम की कहानी पर बनने वाली फ़िल्मों में एक महत्वपूर्ण नाम है 'कर्ज़' (१९८०)। राज किरण और सिमी गरेवाल प्रेम-विवाह कर लेते हैं। राज को भनक तक नहीं पड़ी कि सिमी ने दरअसल उसके बेहिसाब जायदाद को पाने के लिये उससे शादी की है। और फिर एक दिन धोखे से सिमी राज को गाड़ी से कुचल कर पहाड़ से फेंक देती है। राज किरण की मौत हो जाती है और सिमी अपने स्वर्गवासी पति के एस्टेट की मालकिन बन जाती है। लेकिन कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई। प्रकृति भी क्या क्या खेल रचती है! राज दोबारा जनम लेता है ॠषी कपूर के रूप में, और जवानी की दहलीज़ तक आते आते उसे अपने पिछले जनम की याद आ जाती है और किस तरह से वो सिमी से बदला लेता है अपने इस जनम की प्रेमिका टिना मुनीम के साथ मिल कर, किस तरह से पिछले जनम का कर्ज़ चुकाता है, यही है इस ब्लॉकबस्टर फ़िल्म की कहानी। एक कमर्शियल फ़िल्म की सफलता के लिये जिन जिन बातों की ज़रूरत होती है, वो सभी बातें मौजूद थीं सुभाष घई की इस फ़िल्म में। यहाँ तक कि इसके गीत-संगीत का पक्ष भी बहुत मज़बूत था। दोस्तों, पूनर्जनम और सस्पेन्स फ़िल्मों में पार्श्वसंगीत का बड़ा हाथ होता है माहौल को सेट करने के लिये। और ख़ास कर पूनर्जनम की कहानी मे ऐसी विशेष धुन की ज़रूरत होती है जिससे आती है एक हौण्टिंग् सी फ़ीलिंग्। यह धुन बार बार बजती है, और कभी कभी तो इसकी कहानी में इतनी अहमियत हो जाती है कि यह धुन ही पिछले जनम की याद दिलवा जाये! ऐसा ही कुछ 'कर्ज़' में भी था। याद है आपको वह इन्स्ट्रुमेण्टल पीस जो राज किरण और सिमी की गाड़ी में बजी थी ठीक राज के कत्ल से पहले। अगले जनम में ऋषी इसी धुन पर आधारित गीत गा कर और उस धुन पर उसी भयानक कहानी को सुना कर सिमी को भयभीत कर देता है। और दोस्तों, यही कहानी है आज के गीत में, जिसे आवाज़ें दी हैं किशोर कुमार और आशा भोसले नें। "एक हसीना थी, एक दीवाना था..."। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत था इस फ़िल्म में।

अभी जो उपर 'कर्ज़' फ़िल्म की कहानी हमने बतायी, उसी का एक अन्य रूप था गीत की शक्ल में! और फिर एक बार आनन्द बक्शी ऐट हिज़ बेस्ट!!! क्या कमाल का लिखा है। सिचुएशन है कि ऋषी कपूर को पिछले जनम की कातिल-पत्नी सिमी गरेवाल को उस भायानक कहानी की याद दिला कर उसे डराना है, उसे एक्स्पोज़ करना है। इस जनम में ऋषी एक सिंगर-डान्सर हैं, और यह काम वो एक स्टेज-शो में टिना मुनीम के साथ मिल कर करते हैं। गीत के शुरुआती बोल ऋषी कपूर की आवाज़ में ही है। आइए इस गीत-रूपी कहानी को पहले पढ़ें और फिर सुनें।

रोमिओ-जुलिएट, लैला-मजनु, शिरी और फ़रहाद,
इनका सच्चा इश्क़ ज़माने को अब तक है याद।

याद मुझे आया है एक ऐसे दिलबर का नाम,
जिसने धोखा देकर नाम-ए-इश्क़ किया बदनाम।

यही है सायबान कहानी प्यार की,
किसी ने जान ली, किसी ने जान दी।

एक हसीना थी, एक दीवाना था,
क्या उमर, क्या समा, क्या ज़माना था।

एक दिन वो मिले, रोज़ मिलने लगे,
फिर मोहब्बत हुई, बस क़यामत हुई,
खो गये तुम कहाँ, सुन के ये दास्ताँ,
लोग हैरान हैं, क्योंकि अंजान हैं,
इश्क की वो गली, बात जिसकी चली,
उस गली में मेरा आना-जाना था,
एक हसीना थी एक दीवाना था।

उस हसीं ने कहा, सुनो जाने-वफ़ा,
ये फ़लक ये ज़मीं, तेरे बिन कुछ नहीं,
तुझपे मरती हूँ मैं, प्यार करती हूँ मैं,
बात कुछ और थी, वो नज़र चोर थी,
उसके दिल में छुपी चाह दौलत की थी,
प्यार का वो फ़कत एक बहाना था,
एक हसीना थी एक दीवाना था।

बेवफ़ा यार ने अपने महबूब से,
ऐसा धोखा किया,
ज़हर उसको दिया,
धोखा धोखा धोखा धोखा।

मर गया वो जवाँ,
अब सुनो दास्ताँ,
जन्म लेके कहीं फिर वो पहुँचा वहीं,
शक्ल अंजान थी, अक्ल हैरान थी,
सामना जब हुआ, फिर वही सब हुआ,
उसपे ये कर्ज़ था, उसका ये फ़र्ज़ था,
फ़र्ज़ तो कर्ज़ अपना चुकाना था।




क्या आप जानते हैं...
कि 'कर्ज़' फ़िल्म के इस गीत के पहले इंटरल्युड म्युज़िक का इस्तमाल अनु मलिक नें फ़िल्म 'हर दिल जो प्यार करेगा' के गीत "ऐसा पहली बार हुआ सतरह अठरह सालों में" में किया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 9/शृंखला 18
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - लता की आवाज़ है गीत में.
सवाल १ - संगीतकार कौन हैं - २ अंक
सवाल २ - गीतकार का नाम बताएं - ३ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
लगता है अनजाना जी वाकई सत्यग्रह पर बैठ गए हैं, अरे भाई हम सरकार नहीं हैं वापस आईये मुकाबल एकतरफा हो रहा है, अमित जी क्षिति जी और अविनाश जी को बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, June 1, 2011

आओ मनाये जश्ने मोहब्बत, जाम उठाये गीतकार मजरूह साहब के नाम

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 669/2011/109

जरूह सुल्तानपुरी एक ऐसे गीतकार रहे हैं जिनका करीयर ४० के दशक में शुरु हो कर ९० के दशक के अंत तक निरंतर चलता रहा और हर दशक में उन्होंने अपना लोहा मनवाया। कल हमनें १९७३ की फ़िल्म 'अभिमान' का गीत सुना था। आज भी इसी दशक में विचरण करते हुए हमनें जिस संगीतकार की रचना चुनी है, वो हैं राजेश रोशन। वैसे तो राजेश रोशन के पिता रोशन के साथ भी मजरूह साहब नें अच्छा काम किया, फ़िल्म 'ममता' का संगीत उसका मिसाल है; लेकिन क्योंकि हमें १०-कड़ियों की इस छोटी सी शृंखला में अलग अलग दौर के संगीतकारों को शामिल करना था, इसलिए रोशन साहब को हम शामिल नहीं कर सके, लेकिन इस कमी को हमन उनके बेटे राजेश रोशन को शामिल कर पूरा कर रहे हैं। एक बड़ा ही लाजवाब गीत हमनें सुना है मजरूह-राजेश कम्बिनेशन का, १९७७ की फ़िल्म 'दूसरा आदमी' से। "आओ मनायें जश्न-ए-मोहब्बत जाम उठायें जाम के बाद, शाम से पहले कौन ये सोचे क्या होना है शाम के बाद"। हज़ारों गीतों के रचैता मजरूह सुल्तानपुरी के फ़न की जितनी तारीफ़ की जाये कम है। ज़िक्र चाहे दोस्त के दोस्ती की हो या फिर महबूब द्वारा अपने महबूबा से छुवन का पहला अहसास, मुश्किल से मुश्किल भाव को भी बड़े ही सहजता से व्यक्त करना उनका कमाल था और बड़ी ख़ूबसूरती के साथ इन अहसासों को वे लफ़्ज़ों में पकड़ लेते थे। लता मंगेशकर और किशोर कुमार की आवाज़ों में आज का प्रस्तुत गीत भी इन्हीं में से एक है।

फ़िल्म संगीत का स्वर्णयुग बीत जाने के बाद भी मजरूह सुल्तानपुरी अपने स्तर को कायम रखने में सक्षम थे। जहाँ दूसरे गीतकार फ़िल्म निर्माता के डिमाण्ड के मुताबिक सस्ते और चल्ताउ किस्म के गीत लिख रहे थे और उन्हें पब्लिक डिमाण्ड कह कर चला रहे थे, वहीं दूसरी तरफ़ कुछ गिने-चुने गीतकारों नें यह साबित भी किया कि अगर सृजनात्मक्ता है तो तमाम पाबंदियों में रह कर भी अच्छा गीत लिखा जा सकता है। मजरूह साहब भी इन गिने चुने गीतकारों में से थे। शारीरिक संबंध और पैशन को अश्लील और खुले शब्दों में व्यक्त करने का काम तो बहुत से गीतकारों नें हाल में किया है, लेकिन मजरूह साहब नें कई बार ऐसे सिचुएशनों के लिये भी कुछ ऐसे सुंदर गीत लिखे हैं जो यौनोत्तेजक होते हुए भी उनमें कितनी सुंदर अभिव्यक्ति हुई है। मजरूह साहब के ही शब्दों में - "I have said it all in so many songs, without resorting to cheapness or blatant verse"। उनका कहना बिल्कुल सही है। फ़िल्म 'अनामिका' में लता जी से ही गवाया गया था "बाहों में चले आओ, हमसे सनम क्या परदा"। अगर इस गीत को दूसरे अंदाज़ में लिखा गया होता तो शायद लता जी इस गीत को कभी नहीं गातीं, लेकिन सेन्सुअस होते हुए भी शालीनता को बरकरार रखते हुए मजरूह साहब नें इस गीत को जो अंजाम दिया है कि लता जी भी गीत को गाने के लिये राज़ी हो गईं, जब कि फ़िल्म के सभी दूसरे गीत आशा जी की आवाज़ में है। और आज के अंक के 'दूसरा आदमी' के गीत को ही ले लीजिये, इसके अंतरे के बोलों पर ज़रा ध्यान दीजिये, "ये आलम है ऐसा, उड़ा जा रहा हूँ, तुम्हें लेके बाहों में, हमारे लबों से तुम्हारे लबों तक, नहीं कोई राहों में, कैसे कोई अब दिल को सम्भाले, इतने हसीं पैग़ाम के बाद, शाम से पहले कौन ये सोचे क्या होना है शाम के बाद"। गीत के पिक्चराइज़ेशन की बात करें तो यह पार्श्व में चलने वाला गीत है, यानी किसी अभिनेता ने लिप-सींक नहीं किया है। पार्टी में ॠषी कपूर और राखी डांस करते हुए दिखाये जाते हैं और राखी को मन ही मन चाहने वाले परीक्षित साहनी दूर खड़े उन्हें देखते रहते हैं। और घर में तन्हाई में बैठी नीतू सिंह अपने पति ॠषी कपूर के दफ़्तर से वापस लौटने का इंतज़ार कर रही है। वैवाहिक संबंधों के तानेबाने पर केन्द्रित यश चोपड़ा की इस फ़िल्म के सभी गानें लोकप्रिय हुए थे, लेकिन यह गीत फ़िल्म का सब से उत्कृष्ट गीत है हमारी नज़र में, आइए सुना जाये!



क्या आप जानते हैं...
कि मजरूह सुल्तानपुरी के बेटे अंदलिब सुल्तानपुरी फ़िल्म जगत में एक निर्देशक की हैसियत रखते हैं। 'जानम समझा करो' उन्हीं के निर्देशन में बनी पहली फ़िल्म थी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 9/शृंखला 17
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.
सवाल १ - फिल्म में नायक के भाई की भूमिका किस कलाकार ने निभायी है - ३ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - निर्देशक कौन है इस खूबसूरत फिल्म के - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अविनाश जी ने दूसरी कोशिश में कैच पूरा किया और लपक लिए ३ अंक. प्रतीक जी और क्षिति जी को भी बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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