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Sunday, June 5, 2011

एक राजे का बेटा लेकर उड़ने वाला घोड़ा....सुनिए एक कहानी सहगल साहब की जुबानी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 671/2011/111

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक नई सप्ताह के साथ मैं, सुजॉय चटर्जी, साथी सजीव सारथी के साथ आप सब की ख़िदमत में हाज़िर हूँ। दोस्तों, बचपन में हम सभी नें अपने दादा-दादी, नाना-नानी और माँ-बाप से बहुत सारी किस्से कहानियाँ सुनी हैं, है न? उस उम्र में ये कहानियाँ हमें कभी परियों के साम्राज्य में ले जाते थे तो कभी राजा-रानी की रूप-कथाओं में। कभी भूत-प्रेत की कहानियाँ सुन कर रात को बाथरूम जाने में डर भी लगा होगा आपको। और हम जैसे जैसे बड़े होते जाते हैं, हमारी कहानियाँ भी उम्र और रुचि के साथ साथ बदलती चली जाती है। कहानी-वाचन भी एक तरह की कला है। एक अच्छा कहानी-वाचक सुनने वालों को बाकी सब कुछ भूला कर कहानी में मग्न कर देता है, और कहानी के साथ जैसे वो बहता चला जाता है। हमारी फ़िल्में भी कहानी कहने का एक ज़रिया है। और फ़िल्मों के गीत भी ज़्यादातर समय फ़िल्म की कहानी को ही आगे बढ़ाते हैं। लेकिन कई बार ऐसा भी हुआ है कि कोई फ़िल्मी गीत भी अपने आप में कोई कहानी कहता है। कुछ ऐसे ही गीतों को लेकर, जिनमें छुपी है कोई कहानी, हम आज से एक नई शृंखला की शुरुआत कर रहे हैं। कहानी भरे गीतों का जैसे ही ख़याल आया तो सब से पहले मुझे जो गीत याद आया, वह है फ़िल्म 'जब जब फूल खिले' का "एक था गुल और एक थी बुलबुल"। लेकिन क्योंकि यह गीत 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर आनन्द बक्शी साहब पर केन्द्रित शृंखला में बज चुका है, इसलिए इस शृंखला के लिये इतना सटीक होते हुए भी हम इसे शामिल नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन बक्शी साहब की लिखी इस कहानी को सलाम करते हुए हम इस शृंखला का शीर्षक रखते हैं - 'एक था गुल और एक थी बुलबुल'।

इस शृंखला के लिये गीतों की खोज करते हुये मेरे हाथ जो सबसे पुराना गीत लगा, वह है साल १९३७ का। वैसे एक नहीं, वर्ष १९३७ के मुझे दो ऐसे गीत मिले हैं जिनमें कहानी है। और इस शृंखला की पहली दो कड़ियों में ये ही दो गीत आप सुनने जा रहे हैं। शुरु करते हैं पहले सिंगिंग् सुपरस्टार कुंदनलाल सहगल से। १९३७ की फ़िल्म 'प्रेसिडेण्ट' का गीत "इक बंगला बने न्यारा" आप हाल ही में इस स्तंभ में सुन चुके हैं। इस गीत में सहगल साहब सपना देखते हैं उस मिल का मालिक बनने का जिसमें वो एक मज़दूर की हैसियत से काम करते हैं। लेकिन लगता है उनका यह सपना टूट जाता है, उनकी नौकरी चली जाती है, और वो इस बात को अपने परिवार से छुपाने की कोशिश करते हैं। इसी सिचुएशन पर फ़िल्म का अगला गीत है "एक राजे का बेटा लेकर उड़ने वाला घोड़ा"। यह गीत उनकी कोशिश है अपनी नौकरी चले जाने को छुपाने की। किदार शर्मा के लिखे इस गीत को स्वरबद्ध किया है रायचन्द बोराल नें। गीत बच्चों वाला है, जिसमें रूपकथा है, लेकिन फ़िल्म के सिचुएशन के हिसाब से यह ग़मज़दा गीत है क्योंकि नायक की नौकरी चली गई है। इस गीत में जो कहानी है, उसे पूरा तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन जो भी है, गीत उस ज़माने का सुपरहिट गीत रहा है। गीत सुनने से पहले ये रही इस गीत में कही गई कहानी:

एक राजे का बेटा लेकर उड़ने वाला घोड़ा,
देश देश के सैर की ख़ातिर अपने घर से निकला।

उड़ते-उड़ते चलते-चलते थके जो उसके पाँव,
तो इक जगह पर बैठ गया वो देख के ठण्डी छाँव।

इतने में होनी ने अपनी बंसी वहाँ बजायी,
जिसको सुन कर परियों की शहज़ादी दौड़ी आयी।


उसके बाद क्या हुआ, उसकी आप ख़ुद ही कल्पना कर लीजिये, और हो सके तो इस गीत को पूरा लिख कर हमें oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजिये।



क्या आप जानते हैं...
कि संगीतकार रायचन्द बोराल के पिता लालचन्द बोराल अपने ज़माने के मशहूर गायक और पखावजवादक थे।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 2/शृंखला 18
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - शांता आप्टे की आवाज़ है इसमें.
सवाल १ - गीतकार बताएं - ३ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म के निर्देशक बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर अमित और अनजाना जी ने शानदार शुरुआत की है, अविनाश जी लगता है इस बार उन्हें अच्छी टक्कर दे पायेंगें. पिछली शृंखला का आत्मविश्वास उनके जरूर काम आएगा, प्रतीक जी को भी बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, February 10, 2010

मैं क्या जानूँ क्या जादू है- सहगल साहब की आवाज़ का जादू

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 341/2010/41

दोस्तों, 'ओल्ड इज़ गोल्ड' ने देखते ही देखते लगभग एक साल का सफ़र पूरा कर लिया है। पिछले साल २० फ़रवरी की शाम से शुरु हुई थी यह शृंखला। गुज़रे ज़माने के सदाबहार नग़मों को सुनते हुए हम साथ साथ जो सुरीला सफ़र तय किया है, उसको हमने समय समय पर १० गीतों की विशेष लघु शृंखलाओं में बाँटा है, ताकि फ़िल्म संगीत के अलग अलग पहलुओं और कलाकारों को और भी ज़्यादा नज़दीक से और विस्तार से जानने और सुनने का मौका मिल सके। आज १० फ़रवरी है और आज से जो लघु शृंखला शुरु होगी वह जाकर समाप्त होगी १९ फ़रवरी को, यानी कि उस दिन जिस दिन 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पूरा करेगा अपना पहला साल। इसलिए यह लघु शृंखला बेहद ख़ास बन पड़ी है, और इसे और भी ज़्यादा ख़ास बनाने के लिए हम इसमें लेकर आए हैं ४० के दशक के १० सदाबहार सुपर डुपर हिट गीत, जो ४० के दशक के १० अलग अलग सालों में बने हैं। यानी कि १९४० से लेकर १९४९ तक, दस गीत दस अलग अलग सालों के। हम यह दावा तो नहीं करते कि ये गीत उन सालों के सर्वोत्तम गीत रहे, लेकिन इतना आपको विश्वास ज़रूर दिला सकते हैं कि इन गीतों को आप ज़रूर पसंद करेंगे और उस पूरे दशक को, उस ज़माने के फ़नकारों को एक बार फिर सलाम करेंगे। तो पेश-ए-ख़िदमत है आज से लेकर अगले दस दिनों तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के पहले वर्ष की आख़िरी लघु शृंखला 'प्योर गोल्ड'। फ़िल्म संगीत के दशकों का अगर हम मानवीकरण करें तो मेरे ख़याल से ३० का दशक इसका शैशव है, ४० का दशक इसका बचपन, ५० और ६० के दशक इसका यौवन। क्यों सही कहा ना? यानी कि इस शृंखला में फ़िल्म संगीत के बचपन की बातें। १९३१ में 'आलम आरा' से जो यात्रा फ़िल्मों ने और फ़िल्म संगीत ने शुरु की थी, जिन कलाकारों की उंगलियाँ थामे संगीत की इस विधा ने चलना सीखा था, उनमें से कई कलाकार ४० के दशक में भी सक्रीय रहे। उस ज़माने में कलकत्ता हिंदी फ़िल्म निर्माण का एक मुख्य केन्द्र हुआ करता था। युं तो कई छोटी बड़ी कपनियाँ थीं वहाँ पर, पर उन सब में अग्रणी हुआ करता था 'न्यु थिएटर्स'। और अग्रणी क्यों ना हो, राय चंद बोराल, पंकज मल्लिक, कुंदन लाल सहगल, तिमिर बरन, कानन देवी, के. सी. डे जैसे कलाकार जिस कंपनी के पास हो, वो तो सब से आगे ही रहेगी ना! इस पूरी टीम ने ३० के दशक के मध्य भाग में फ़िल्म संगीत के घोड़े को विशुद्ध शास्त्रीय संगीत और नाट्य संगीत की भीड़ से बाहर खींच निकाला, और सुगम संगीत, लोक संगीत और पाश्चात्य ऒर्केस्ट्रेशन के संगम से फ़िल्म संगीत को एक निर्दिष्ट स्वरूप दिया, एक अलग पहचान दी। और फिर उसके बाद साल दर साल नये नये कलाकार जुड़ते गये, नये नये प्रयोग होते गये, और फ़िल्म संगीत एक विशाल वटवृक्ष की तरह फैल गया। आज यह वृक्ष इतना व्यापक हो गया है कि यह ना केवल मनोरंजन का सब से लोकप्रिय साधन है, बल्कि फ़िल्मों से भी ज़्यादा उनके गीत संगीत की तरफ़ लोग आकर्षित होते हैं।

ख़ैर, ४० के दशक का पहला साल १९४०, और इस साल के एक बेहतरीन गीत से इस शृंखला की शुरुआत हम कर रहे हैं। न्यु थिएटर्स के बैनर तले बनी फ़िल्म 'ज़िंदगी' का गीत कुंदन लाल सहगल की आवाज़ में, संगीतकार हैं पंकज मल्लिक और गीतकार हैं किदार शर्मा। फ़िल्म 'देवदास' के बाद सहगल साहब और जमुना इसी फ़िल्म में फिर एक बार एक ही पर्दे पर नज़र आये थे। और यह फ़िल्म भी प्रमथेश बरुआ के निर्देशन में ही बनी थी। इस गीत को अगर एक ट्रेंडसेटर गीत भी कहा जाए तो ग़लत ना होगा, क्योंकि इसमें मल्लिक जी ने जो पाश्चात्य ऒर्केस्ट्रेशन के नमूने पेश किए हैं, वह उस ज़माने के हिसाब से नये थे। दोस्तों, हम इस शृंखला में पंकज मल्लिक का गाया फ़िल्म 'कपालकुण्डला' का गीत "पिया मिलन को जाना" भी सुनवाना चाहते थे, लेकिन जैसे कि इस शृंखला की रवायत है कि एक साल का एक ही गीत सुनवा रहे हैं, इसलिए इस गीत को हम फिर कभी आपको ज़रूर सुनवाएँगे। लेकिन मल्लिक साहब के बारे में कुछ बातें यहाँ पर हम ज़रूर आपको बताना चाहेंगे। १० मई १९०५ को कलकत्ता में जन्मे पंकज मल्लिक ने कई फ़िल्मों में अभिनय किया था। संगीत के प्रति उनमें गहरा रुझान था। संगीत की बारीकियाँ सीखी दुर्गादास बैनर्जी और दीनेन्द्रनाथ टैगोर से। पंकज मल्लिक भारतीय सिनेमा संगीत आकाश के ध्रुव नक्षत्र हैं। महात्मा का मन और राजर्षी का हृदय, दोनों विधाता ने उन्हे दिए थे। सन् १९२६ में पंकज दा का पहला ग्रामोफ़ोन रिकार्ड रिलीज़ हुआ विडियोफ़ोन कंपनी से। १९२७ में इंडियन ब्रॊडकास्टिंग् कंपनी से जुड़े जहाँ उन्होने लम्बे अरसे तक प्रस्तुतकर्ता, संगीतकार और संगीत शिक्षक के रूप में काम किया। १९२९ से रेडियो पर संगीत शिक्षा पर केन्द्रित उनका कार्यक्रम प्रसारित होना शुरु हुआ। १९२९ में ही उनका एक और कार्यक्रम हर वर्ष दुर्गा पूजा के उपलक्ष्य पर रेडियो पर प्रसारित होता रहा, जिसका शीर्षक था 'महीषासुरमर्दिनी'। दोस्तों, यह रेडियो कार्यक्रम तब से लेकर आज तक प्रति वर्ष आकाशवाणी कोलकाता, अगरतला और पोर्ट ब्लेयर जैसे केन्द्रों से महालया (जिस दिन दुर्गा पूजा का देवी पक्ष शुरु होता है) की सुबह ४:३० बजे से ६ बजे तक प्रसारित होता है। एक साल ऐसा हुआ कि आकाशवाणी कोलकाता ने सोचा कि इस कार्यक्रम का एक नया संस्करण निकाला जाए और उस साल महालया की सुबह 'महीषासुरमर्दिनी' का नया संस्करण प्रसारित कर दिया गया। इसके चलते अगले दिन आकाशवाणी के कोलकाता केन्द्र में जनता ने इस क़दर विरोध प्रदर्शन किया और इस तरह इसकी समालोचना हुई कि अगले वर्ष से फिर से वही पंकज मल्लिक वाला संस्करण ही बजने लगा और आज तक बज रहा है। और आइए अब वापस आते हैं आज के गीत की फ़िल्म 'ज़िंदगी' पर। 'ज़िंदगी प्रमथेश बरुआ की न्यु थिएटर्स के लिए अंतिम फ़िल्म थी। इसी साल, यानी कि १९४० में एक भयंकर अग्निकांड ने न्यु थिएटर्स को भारी नुकसान पहुँचाया। बेहद अफ़सोस इस बात का रहा कि इस कंपनी की सारी फ़िल्मों के नेगेटिव्स उस आग की चपेट में आ गए। चलिए दोस्तों, अब आज का गीत सुना जाए, ४० के दशक की और भी कई रोचक जानकारी हम इस शृंखला में आपको देते रहेंगे, फ़िल्हाल १९४० को सलाम करता हुआ सहगल साहब की आवाज़, "मैं क्या जानू क्या जादू है"। भई हम तो यही कहेंगे कि यह जादू है सहगल साहब की आवाज़ का, मल्लिक साहब की धुनों का, और शर्मा जी के बोलों का।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. साथ ही जवाब देना है उन सवालों का जो नीचे दिए गए हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

भंवरे मंडलाये क्यों,
तू फूल फूल हरजाई,
नैन तेरे बतियाते हैं,
किस भाषा में सौदाई...

1. बताईये इस गीत की पहली पंक्ति कौन सी है - सही जवाब को मिलेंगें ३ अंक.
2. ये गायिका का पहला हिंदी फ़िल्मी गीत है, कौन है ये गायिका - सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.
3. इस संगीतकार के नाम से पहले "मास्टर" लगता है, इनका पूरा नाम बताईये -सही जवाब के मिलेंगें १ अंक.
4. १९४१ में आई इस फिल्म का नाम क्या है जिसका ये गीत है - सही जवाब के मिलेंगें १ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी आपके सुझाव पर आज से हम पहेली का रूप रंग बदल रहे हैं. आज से एक बार फिर नए सिरे से मार्किंग करेंगे. शरद जी आप अब तक आगे चल रहे थे, पर मुझे लगता है इस नए प्रारूप में आपको भी मज़ा आएगा.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, February 9, 2010

कभी तन्हाईयों में यूं हमारी याद आएगी....मुबारक बेगम की दर्द भरी सदा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 340/2010/40

फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की कमचर्चित पार्श्वगायिकाओं को सलाम करते हुए आज हम आ पहुँचे हैं इस ख़ास शृंखला की अंतिम कड़ी पर। अब तक हमने इस शृंखला में क्रम से सुलोचना कदम, उमा देवी, मीना कपूर, सुधा मल्होत्रा, जगजीत कौर, कमल बारोट, मधुबाला ज़वेरी, मुनू पुरुषोत्तम और शारदा का ज़िक्र कर चुके हैं। आज बारी है उस गयिका की जिनके गाए सब से मशहूर गीत के मुखड़े को ही हमने इस शृंखला का नाम दिया है। जी हाँ, "कभी तन्हाइयों में युं हमारी याद आएगी" गीत की गयिका मुबारक़ बेग़म आज 'ओल्ड इस गोल्ड' की केन्द्रबिंदु हैं। मुबारक़ बेग़म के गाए फ़िल्म 'हमारी याद आएगी' के इस शीर्षक गीत को सुनते हुए जैसे महसूस होने लगता है इस गीत में छुपा हुआ दर्द। जिस अंदाज़ में मुबारक़ जी ने "याद आएगी" वाले हिस्से को गाया है, इसे सुनते हुए सचमुच ही किसी ख़ास बिछड़े हुए की याद आ ही जाती है और कलेजा जैसे कांप उठता है। इस गीत में, इसकी धुन में, इसकी गायकी में कुछ ऐसी शक्ति है कि सीधे आत्मा को कुछ देर के लिए जैसे अपनी ओर सम्मोहित कर लेती है और गीत ख़त्म होने के बाद ही हमारा होश वापस आता है। किदार शर्मा का लिखा हुआ यह गीत है जिसकी तर्ज़ बनाई है स्नेहल भाटकर ने। किदार शर्मा ने कई नए कलाकारों को समय समय पर मौका दिया है जिनमें शामिल हैं कई अभिनेता अभिनेत्री, संगीतकार, गायक और गायिकाएँ। 'हमारी याद आएगी' फ़िल्म जितना मुबारक़ बेग़म के लिए यादगार फ़िल्म है, उतनी ही यादगार साबित हुई संगीतकार स्नेहल भाटकर के लिए भी। स्नेहल भी एक कमचर्चित फ़नकार हैं। भविष्य में जब हम कमचर्चित संगीतकारों पर किसी शृंखला का आयोजन करेंगे तो स्नेहल भाटकर से सबंधित जानकारी आपको ज़रूर देंगे। आज करते हैं मुबारक़ बेग़म की बातें। लेकिन उससे पहले आपको बता दें कि आज हम इसी कालजयी गीत को सुनेंगे।

कई साल पहले मुबारक़ बेग़म विविध भारती पर तशरीफ़ लाई थीं और वरिष्ठ उद्‍घोषक कमल शर्मा ने उनसे मुलाक़ात की थी। उसी मुलाक़ात में मुबारक़ जी ने इस गीत के पीछे की कहानी का ज़िक्र किया था। पेश है उसी बातचीत का वह अंश। दोस्तों, आप सोचते होंगे कि मैं लगभग सभी आलेख में विविध भारती के कार्यक्रमों का ही ज़िक्र करता रहता हूँ। दरअसल बात ही ऐसी है कि उस गुज़रे ज़माने के कलाकारों से संबंधित सब सर्वाधिक सटीक जानकारी केवल विविध भारती के पास ही उपलब्ध है। फ़िल्म संगीत के इतिहास को आने वाली पीढ़ियों के लिए सहज कर रखने में विविध भारती के योगदान को अगर हम सिर्फ़ उल्लेखनीय कहें तो कम होगा। ख़ैर, आइए मुबारक़ बेग़म के उस इंटरव्यू को पढ़ा जाए।

प्र: यह गीत (कभी तन्हाइयों में युं) किदार शर्मा की फ़िल्म 'हमारी याद आएगी' का है, संगीतकार स्नेहल भाटकर।

उ: पहले पहले यह गीत रिकार्ड पर नहीं था। इस गीत के बस कुछ लाइनें बैकग्राउंड के लिए लिया गया था।

प्र: किदर शर्मा की और कौन कौन सी फ़िल्मों में आपने गीत गाए?

उ: 'शोख़ियाँ', 'फ़रीयाद'।

प्र: किदार शर्मा के लिए आप की पहली फ़िल्म कौन सी थी?

उ: 'शोख़ियाँ'। संगीत जमाल सेन का था। मैं जो बात बता रही थी कि "हमारी याद आएगी" गाना रिकार्ड पर नहीं था। इसे पार्ट्स मे बैकग्राउंड म्युज़िक के तौर पर फ़िल्म में इस्तेमाल किया जाना था। मुझे याद है बी. एन. शर्मा गीतकार थे, स्नेहल और किदार शर्मा बैठे हुए थे। रिकार्डिंग् के बाद किदार शर्मा ने मुझे ४ आने दिए। मैंने किदार शर्मा की तरफ़ देखा। उन्होने मुझसे उसे रखने को कहा और कहा कि यह 'गुड-लक' के लिए है। सच में वह मेरे लिए लकी साबित हुई।

प्र: आप बता रहीं थीं कि शुरु शुरु में यह गीत रिकार्ड पर नहीं था?

उ: हाँ, लेकिन बाद में उन लोगों को गीत इतना पसंद आया कि उन्होने सारे पार्ट्स जोड़कर गीत की शक्ल में रिकार्ड पर डालने का फ़ैसला किया। मैं अभी आपको बता नहीं सकती, लेकिन अगर आप गाना बजाओ तो मैं ज़रूर बता सकती हूँ कि कहाँ कहाँ गीत को जोड़ा गया है।

प्र: आपको यह पता था कि ऐसा हो रहा है?

उ: पहले मुझे मालूम नहीं था, लेकिन रिकार्ड रिलीज़ होने के बाद पता चला।

प्र: आपने अपना शेयर नहीं माँगा?

उ: दरअसल मैं तब बहुत नई थी, इसलिए मैंने अपना मुंह बंद ही रखा, वरना मुझे जो कुछ भी मिल रहा था वो भी बंद हो जाता। आगे भी कई बार ऐसे मौके हुए कि जब मुझसे कुछ कुछ लाइनें गवा ली गई और बाद में उन लोगों ने उसे एक गीत के शक्ल में रिकार्ड पर उतार दिया।


दोस्तों, इस अंश को पढ़कर आप समझ सकते हैं कि मुबारक़ बेग़म जैसी कमचर्चित गायिकाओं को किस किस तरह का संघर्ष करना पड़ता होगा! ये सब जानकर दिल उदास हो जाता है कि इतनी सुरीले कलाकारों को उन्हे अपना हिस्सा नहीं मिला जिसके वो हक़दार थे। 'आवाज़' की तरफ़ से हमारी ये छोटी सी कोशिश थी इन कमचर्चित गायिकाओं को याद करने की, आशा है आपको पसंद आई होगी। अपनी राय आप टिपण्णी के अलावा hindyugm@gmail.com के पते पर भी लिख भेज सकते हैं। आप से हमारा बस यही गुज़ारिश है कि इन कमचर्चित कलाकारों को कभी भुला ना दीजिएगा, अपनी दिल की वादियों में इन सुरीली आवाज़ों को हमेशा गूंजते रहने दीजिए, क्योंकि ये आवाज़ें आज भी बार बार हमसे यही कहती है कि कभी तन्हाइयों में युं हमारी याद आएगी।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

नैनों में छुपे,
कुछ ख्वाब मिले,
मन झूम उठा,
कुछ कहा होगा, भूले ख्वाबों ने...

अतिरिक्त सूत्र- शुद्ध सोने से सजे गीतों की शृंखला में कल फिर गूंजेगी कुंदन लाल सहगल की आवाज़

पिछली पहेली का परिणाम-
बिलकुल सही शरद जी, एक अंक और आपके खाते में, एक गुजारिश है आपसे, आप अपने ऐसे शोस् जिनमे आपको ऐसे गजब के फनकारों की संगती मिली हो, उनके अनुभव अन्य श्रोताओं के साथ भी अवश्य बाँटें

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, January 18, 2010

सो जा राजकुमारी सो जा...हिंदी फिल्म संगीत के पहले सुपर सिंगर को नमन

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 318/2010/18

'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इन दिनों हम अपको सुनवा रहे हैं लघु शृंखला 'स्वरांजली', जिसके अन्तर्गत हम याद कर रहे हैं फ़िल्म संगीत के उन लाजवाब कलाकारों को जो या तो हमसे बिछड़े थे जनवरी के महीने में, या फिर वो मना रहे हैं अपना जन्मदिन इस महीने। यशुदास और जावेद अख़तर को हम जनमदिन की शुभकामनाएँ दे चुके हैं, और श्रद्धांजली अर्पित की है सी. रामचन्द्र, जयदेव, चित्रगुप्त, कैफ़ी आज़मी, और ओ. पी. नय्यर को। आज १८ जनवरी जिस महान कलाकार का स्मृति दिवस है, उनके बारे में यही कह सकते हैं कि वो हिंदी सिनेमा के पहले सिंगिंग् सुपरस्टार हैं, जिन्होने फ़िल्म संगीत को एक दिशा दिखाई। जब फ़िल्म संगीत का जन्म हुआ था, उस समय प्रचलित नाट्य और शास्त्रीय संगीत ही सीधे सीधे फ़िल्मी गीतों के रूप में प्रस्तुत कर दिए जाते थे। लेकिन इस अज़ीम गायक अभिनेता फ़िल्मों में लेकर आए सुगम संगीत और जिनकी उंगली थाम फ़िल्म संगीत ने चलना सीखा, आगे बढ़ना सीखा, अपना एक अलग पहचान बनाया। आप हैं फ़िल्म जगत के पहले सिंगिंग् सुपरस्टार कुंदन लाल सहगल। सहगल साहब ने फ़िल्म संगीत में जो योगदान दिया है, उनका शुक्रिया अदा करने की किसी के पास ना तो शब्द हैं और ना ही कोई और तरीक़ा। फिर भी विविध भारती उन्हे श्रद्धा स्वरूप दशकों से अपने दैनिक 'भूले बिसरे गीत' कार्यक्रम में हर रोज़ याद करते हैं कार्यक्रम के अंतिम गीत के रूप में। और यह सिलसिला दशकों से बिना किसी रुकावट से चली आ रही है। सहगल साहब की आवाज़ में 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के ५०-वे एपिसोड में हमने आपको फ़िल्म 'शाहजहाँ' का गीत सुनवाया था "ग़म दिए मुस्तक़िल"। आज हम कुछ साल और पीछे की तरफ़ जा रहे हैं और आपके लिए चुन कर लाए हैं सन् १९४० की फ़िल्म 'ज़िंदगी' से सहगल साहब की गाई हुई लोरी "सो जा राजकुमारी सो जा"। इस फ़िल्म में संगीत पकज मल्लिक साहब का था, और सहगल साहब के अलावा फ़िल्म में अभिनय किया जमुना और पहाड़ी सान्याल ने। इस कालजयी लोरी को लिखा था किदार शर्मा ने। यह लोरी फ़िल्मी लोरियों में एक ख़ास मुक़ाम रखती है। सहगल साहब की कोमल आवाज़ जिस तरह से "सो जा" कहती है, बस सुन कर ही इसे अनुभव किया जा सकता है।

दोस्तों, सहगल साहब का १८ जनवरी १९४७ को निधन हो गया था। शराब की लत ऐसी लग गई थी कि कोई दवा काम न आ सकी। उनके दिमाग़ में यह बात बैठ गई थी कि जब तक वो शराब न पी लें, वो अच्छी तरह से गा नहीं सकते। एक बार नौशद साहब ने फ़िल्म 'शाहजहाँ' के गाने की रिकार्डिंग् के दौरान उनसे कहा कि आप बिना पीये मुझे एक टेक दे दीजिए, फिर उसके बाद आप जो कहेँगे हम सुनेँगे। सहगल साहब मान गए, बिना पीए टेक दे दिया और उसके बाद फिर पीना शुरु किया। घर जाने से पहले नशे की हालत में फिर एक टेक उन्होने दिया, जो उनके हिसाब से बिना पीये टेक से बेहतर था। अगले दिन नौशाद साहब ने दोनों टेक सहगल साहब को सुनवाए लेकिन यह नहीं बताया कि कौन सा टेक बिना पीये है और कौन सा नशे की हालत में। सहगल साहब ने बिना पीये टेक को बेहतर क़रार देते हुए कहा कि देखा, मैंने कहा था न कि बिना पीये मेरी आवाज़ नहीं खुलती! इस पर जब नौशाद साहब ने उनसे कहा कि दरअसल यह बिना पीये वाला रिकार्डिंग् था तो वो आश्चर्यचकित रह गए। नौशाद साहब ने उनसे कहा था कि "जिन लोगों ने आप से यह कहा है कि पीये बग़ैर आपकी आवाज़ नहीं खुलती, वो आपके दोस्त नहीं हैं।" ये सुनकर सहगल साहब का जवाब था "अगर यही बात मुझसे पहले किसी ने कहा होता तो शायद कुछ दिन और जी लेता!!!" दोस्तों, लता मंगेशकर ने ९० के दशक में 'श्रद्धांजली' शीर्षक से एक ट्रिब्युट ऐल्बम जारी किया था जिसमें उन्होने सुनहरे दौर के दिग्गज गायकों को श्रद्धांजली स्वरूप याद करते हुए उनके एक एक गाने गाए थे। पहला गाना सहगल साहब का था, और आपको पता है वह कौन सा गाना था? जी हाँ, आज का प्रस्तुत गीत। लता जी कहती हैं, "स्वर्गीय श्री के. एल. सहगल, वैसे तो उनसे सीखने का सौभाग्य मुझे प्राप्त नहीं हुआ, मगर उनके गाए गानें सुन सुन कर ही मुझमें सुगम संगीत गाने की इच्छा जागी। मेरे पिताजी, श्री दीनानाथ मंगेशकर, जो अपने ज़माने के माने हुए गायक थे, उनको सहगल साहब की गायकी बहुत पसंद थी। वो अक्सर मुझे सहगल साहब का कोई गीत सुनाने को कहते थे।" चलिए दोस्तों, सहगल साहब की स्वर्णिम आवाज़ में सुनते है फ़िल्म 'ज़िंदगी' का यह गीत। बेहद बेहद ख़ास है आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड', है न?



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

तरसे अखियाँ,
बरसे बादल,
सूखी दुनिया,
दिल का अंचल

अतिरिक्त सूत्र - इस गीतकार ने ९ जनवरी २००३ का दिन चुना था दुनिया को अलविदा कहने के लिए

पिछली पहेली का परिणाम-


खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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