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Saturday, November 4, 2017

चित्रकथा - 43: पुत्र ॠतुराज सिसोदिया की यादों में पिता बसन्त प्रकाश और ताऊ खेमचन्द प्रकाश

अंक - 43

पुत्र ॠतुराज सिसोदिया की यादों में पिता बसन्त प्रकाश और ताऊ खेमचन्द प्रकाश


"रफ़्ता-रफ़्ता आप मेरे दिल के मेहमाँ हो गए..." 



फ़िल्म संगीत के सुनहरे युग में जहाँ एक तरफ़ कुछ संगीतकार लोकप्रियता की बुलंदियों तक पहुँचे, वहीं दूसरी तरफ़ बहुत से संगीतकार ऐसे भी हुए जो बावजूद प्रतिभा सम्पन्न होने के बहुत अधिक दूर तक नहीं बढ़ सके। आज जब सुनहरे दौर के संगीतकारों की बात चलती है तब अनिल बिस्वास, नौशाद, सी. रामचन्द्र, रोशन, सचिन देव बर्मन, ओ.पी. नय्यर, मदन मोहन, रवि, हेमन्त कुमार, कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, राहुल देव बर्मन जैसे नाम सब से पहले लिए जाते हैं। इन चमकीले नामों की चमक के सामने बहुत से नाम इस चकाचौंध में नज़रंदाज़ हो जाते हैं। ऐसा ही एक नाम है संगीतकार बसंत प्रकाश का। जी हाँ, वही बसंत प्रकाश जो 40 के दशक के सुप्रसिद्ध संगीतकार खेमचंद प्रकाश के छोटे भाई थे। खेमचंद जी की तरह बसंत प्रकाश इतने मशहूर तो नहीं हुए, पर फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने को समृद्ध करने में अपना अमूल्य योगदान दिया। आज बसंत प्रकाश जी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन यह हमारा सौभाग्य है कि उनके बेटे श्री ॠतुराज सिसोदिआ आज हमारे साथ ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ पर मौजूद हैं। 


ऋतुराज जी, बहुत बहुत स्वागत है आपका हमारे मंच पर।

बहुत बहुत धन्यवाद आपका! जिस तरह से आपने भूमिका दी है, बहुत अच्छा लगा, और मैं भी बहुत उत्सुक हूँ आपके सवालों के जवाब देने के लिए, अपने पिता और खेमचन्द जी के बारे में बताने के लिए, जिन पर मुझे बहुत बहुत गर्व है।


बड़ा ही रोमांचित अनुभव कर रहा हूँ मैं इस वक़्त। ऋतुराज जी, सबसे पहले तो हम जानना चाहेंगे खेमचंद प्रकाश और बसंत प्रकाश के संबंध के बारे में। मेरा मतलब है कि कुछ लोग कहते हैं कि बसंत जी खेमचंद जी के मानस पुत्र हैं, कोई कहता है कि वो उनके मुंहबोले भाई हैं, तो हम आपसे जानना चाहेंगे इस रिश्ते के बारे में।

बहुत अच्छा और अहम सवाल है यह। मैं आपको बताऊँ कि मेरे पिता बसंत प्रकाश जी और खेमचंद जी सगे भाई भी थे और पिता-पुत्र भी।



सगे भाई और पिता-पुत्र भी? मतलब?

यानी कि रिश्ते में तो दोनों सगे भाई ही थे, लेकिन बाद में खेमचंद जी ने व्यक्तिगत कारणों से मेरे पिता बसंत प्रकाश जी को अपने इकलौते पुत्र के तौर पर गोद लिया।



यानी कि खेमचंद जी आपके ताया जी भी हुए और साथ ही दादाजी भी!

बिल्कुल ठीक!



वैसे तो हम आज बसंत प्रकाश जी के बारे में ही चर्चा कर रहे हैं, लेकिन खेमचंद जी का नाम उनके साथ ऐसे जुड़ा हुआ है कि उनका भी ज़िक्र करना अनिवार्य हो जाता है। इसलिए बसंत प्रकाश जी पर चर्चा आगे बढ़ाने से पहले, हम आपसे खेमचंद जी के बारे में जानना चाहेंगे। क्या जानते हैं आप उनके बारे में?

जी हाँ, हर पोता अपने दादाजी के बारे में जानना चाहेगा, और मेरे पिता जी ने भी उनके बारे में मुझे बताया था। खेमचंद जी ने 'सुप्रीम पिक्चर्स' की फ़िल्म 'मेरी आँखें' के ज़रिये 1939 में फ़िल्म जगत में पदार्पण किया था। और जल्द ही नामचीन 'रणजीत' फ़िल्म स्टुडिओ ने उन्हें अनुबंधित कर लिया। लता मंगेशकर के लिए खेमचंद प्रकाश फलदायक साबित हुए और उस दौर में 'आशा', 'ज़िद्दी' और 'महल' जैसी फ़िल्मों में गीत गा कर लता जी को नई-नई प्रसिद्धी हासिल हुई थी। लेकिन खेमचंद जी की असामयिक मृत्यु ने फ़िल्म जगत में एक कभी न पूरा होने वाले शून्य को जन्म दिया।




खेमचन्द्र प्रकाश
निस्संदेह खेमचंद जी के जाने से जो क्षति हुई, वह फ़िल्म जगत की अब तक की सब से बड़ी क्षतियों में से एक है।

'तानसेन' को बेहतरीन म्युज़िकल फ़िल्मों में गिना जाता है। खेमचंद जी ने लता जी को तो ब्रेक दिया ही, साथ ही किशोर कुमार को भी पहला ब्रेक दिया "मरने की दुयाएं क्यों माँगू" गीत में। यह बात मशहूर है कि लता मंगेशकर की आवाज़ को शुरु शुरु में निर्माता चंदुलाल शाह नें रिजेक्ट कर दिया था। लेकिन खेमचंद जी ने उनके निर्णय को चैलेंज किया और उन्हें बताया कि एक दिन यही आवाज़ इस इंडस्ट्री पर राज करेगी। 'ज़िद्दी' में लता जी का गाया एक बेहद सुंदर गीत था "चंदा रे जा रे जा रे"।



बहुत ही सुन्दर रचना है यह! अच्छा ॠतुराज जी, यह बताइए कि खेमचंद जी का स्वरबद्ध कौन सा गीत आपको सब से प्रिय है?

ऐसे बहुत से गीत हैं जो मुझे व्यक्तिगत तौर पे बहुत पसंद है, लेकिन एक जो गीत जो मेरा फ़ेवरीट है, वह है फ़िल्म 'महल' का "मुश्किल है बहुत मुश्किल चाहत का भुला देना"।



वाह! यह गीत मुझे भी बहुत पसन्द है, "आएगा आनेवाला" गीत से भी ज़्यादा। ऋतुराज जी, अपने परिवार के बारे में बताइए। कौन-कौन हैं आपके परिवार में?

मेरे पिताजी बसन्त प्रकाश जी के दो विवाह रहे। उनकी पहली पत्नी का नाम स्वर्गीय छोगीदेवी, मैं और मेरी सभी बहने उन्हें बड़ी माँ कह कर बुलाते थे। उनकी दो बेटियाँ हैं प्रभा दीदी और स्वर्गीय मधु दीदी। मधु दीदी निस्सन्तान रहीं और प्रभा दीदी की दो बेटियाँ हैं। वो सभी हमारे पैत्रिक निवास स्थान सुजानगढ़ में रहते हैं। मेरे पिता का दोसरा विवाह स्वर्गीय अनीता से हुआ। इस विवाह से उनकी पाँच बेटियाँ हुईं - वैजयन्ती, लक्ष्मी, दुर्गा, शानू, सोनम, और एक बेटा, यानी कि मैं। हमारा पूरा परिवार मुंबई के मलाड में रहते हैं। मेरी माँ अनीता 1995 में गुज़र गईं, मेरे पिता 1996 में, और मेरी बड़ी माँ 1998 में इस दुनिया से चली गईं। बस इतनी सी है मेरे परिवार की दास्तान।



ॠतुराज जी, हम अब बसंत प्रकाश जी पर आते हैं; बताइए कि एक पिता के रूप में वो कैसे थे? उनकी कुछ विशेषताओं के बारे में बताएँ जिनके बारे में जान कर संगीत-रसिक अभिभूत हो जाएँ?

मेरा और मेरे पिताजी का संबंध दोस्ती का था और सिर्फ़ मेरे साथ ही नहीं, पूरे परिवार के साथ ही वो घुलमिल कर रहते थे, और एक अच्छे पिता के सभी गुण उनमें थे। परिवार का वो ख़याल रखा करते थे। बहुत ही शांत और सादे स्वभाव के थे। उनकी रचनाएँ मौलिक हुआ करती थी। उन्होंने कभी डिस्को या पाश्चात्य संगीत का सहारा नहीं लिया क्योंकि वो भारतीय शास्त्रीय संगीत में विश्वास रखते थे। राग-रागिनियों, ताल और लोक-संगीत में उनकी गहरी रुचि थी। खेमचंद जी से ही उन्होंने संगीत सीखा और संगीत और नृत्य कला की बारीकियाँ उनसे सीखी। वो थोड़े मूडी थे और उनका संगीत उनके मूड पे डिपेण्ड करता था।



कहा जाता है कि 'अनारकली' फ़िल्म के लिए पहले पहले बसंत प्रकाश जी को ही साइन करवाया गया था, लेकिन बाद में इन्होंने फ़िल्म छोड़ दी। क्या इस बारे में आप कुछ कहना चाहेंगे?

जी हाँ, यह सच बात है। 'अनारकली' के संगीत को लेकर कुछ विवाद खड़े हुए थे। एक दिन काम के अंतराल के वक़्त मेरे पिता जी फ़िल्मिस्तान स्टुडिओ में आराम कर रहे थे। उस समय निर्देशक के सहायक उस कमरे में आये और उन पर चीखने लगे। मेरे पिता जी को उस ऐसिस्टैण्ट के चिल्लाने का तरीका अच्छा नहीं लगा। उन दोनों में बहसा-बहसी हुई, और उसी वक़्त पिताजी फ़िल्म छोड़ कर आ गये। लेकिन तब तक पिताजी फ़िल्म का एक गीत रेकॉर्ड कर चुके थे। सी. रामचंद्र आकर फ़िल्म के संगीत का भार स्वीकारा और अपनी शर्त रख दी कि न केवल फ़िल्म के गानें लता मंगेशकर से गवाये जाएँगे, बल्कि मेरे पिताजी द्वारा स्वरब्द्ध गीता दत्त के गाये गीत को भी फ़िल्म से हटवा दिया जाये। शुरु शुरु में उनके इन शर्तों को फ़िल्मिस्तान मान तो गये, लेकिन आख़िर में गीता दत्त के गाये गीत को फ़िल्म में रख लिया गया। और वह गीत था "आ जाने वफ़ा"।


ॠतुराज जी, मैंने पढ़ा है कि खेमचंद जी की असामयिक मृत्यु के बाद बसंत प्रकाश जी ने उनकी कुछ असमाप्त फ़िल्मों के संगीत को पूरा किया था और इसी तरह से उनका फ़िल्म जगत में आगमन हुआ था। तो हम आपसे जानना चाहते हैं कि वह कौन सी असमाप्त फ़िल्में थीं खेमचन्द जी की जिसमें बसंत प्रकाश जी ने संगीत दिया था?

10 अगस्त 1950 को दादाजी की मृत्यु हो गई थी, और उनकी कई फ़िल्में असमाप्त थी जैसे कि 'जय शंकर', 'श्री गणेश जन्म', 'तमाशा'। 'श्री गणेश जन्म' में मन्ना डे सह-संगीतकार थे और 'तमाशा' के गीतों को मन्ना डे और एस. के. पाल ने पूरा किया था। बसंत प्रकाश जी ने 'जय शंकर' का संगीत पूरा किया और यही उनकी पहली फ़िल्म भी थी।



स्वतन्त्र संगीतकार के रूप में उनकी पहली फ़िल्म कौन सी थी?

1952 की ही फ़िल्म ’बदनाम’। यह फ़िल्मिस्तान की फ़िल्म थी जिसे डी.डी. कश्यप ने डिरेक्ट किया था; बलराज साहनी और श्यामा थे इस फ़िल्म में। इस फ़िल्म के सभी गाने हिट हुए। सबसे ज़्यादा हिट गीत था "साजन तुमसे प्यार करूँ मैं कैसे तुम्हें बतलाऊँ", लता जी की आवाज़ में। इसे HMV ने लता जी के rare gems album में शामिल किया है।



जी हाँ, यह बड़ा ही मशहूर गीत था उस ज़माने का। और फिर इस फ़िल्म में और भी कई गीत थे जैसे कि "जिया नाहीं लागे हो", "काहे परदेसिया को अपना बनाया", "घिर आई है घोर घटा"।

शंकर दासगुप्ता का गाया "यह इश्क़ नहीं आसां"।



जी जी। ऋतुराज जी, हमने सुना है बसन्त प्रकाश जी संगीत के साथ-साथ नृत्य में भी पारंगत थे?

यह सच बात है। वो संगीत, गायन और कत्थक नृत्य में माहिर थे। खेमचन्द जी के अलावा पंडित मोहनलाल जी से उन्होंने कत्थक सीखा।



बसंत प्रकाश जी द्वारा स्वरबद्ध फ़िल्मों में और कौन कौन सी फ़िल्में उल्लेखनीय रहीं?

सलोनी (1952), श्रीमतिजी (1952), निशान डंका (1952), बदनाम (1952), महारानी (1957), नीलोफ़र (1957), भक्तध्रुव (1957), हम कहाँ जा रहे हैं (1966), ज्योत जले (1967), ईश्वर अल्लाह तेरे नाम (1982), अबला (1989)।



देखा जाए तो 1952 का वर्ष उनके करीअर का व्यस्ततम वर्ष रहा। फिर उसके बाद 1957 का वर्ष सुखद था। ’नीलोफ़र’ फ़िल्म का गीत "रफ़्ता रफ़्ता वो हमारे दिल के अरमाँ हो गए" बहुत बहुत कामयाब रहा। 

जी, यह गीत मेरे पिताजी का सब से पसंदीदा गीत था। यह गीत इस फ़िल्म का भी सब से लोकप्रिय गीत था। और अब तक लोग इस गीत को याद करते हैं, सुनते हैं।



बिल्कुल सुनते हैं। यह तो था बसन्त प्रकाश जी का पसन्दीदा गीत; आपका पसन्दीदा गीत कौन सा है?

यूं तो अभी जिन फ़िल्मों के नाम मैंने लिए, उन सब के गानें मुझे बहुत पसंद है, लेकिन एक जो मेरा फ़ेवरीट गीत है, वह है उनकी अंतिम फ़िल्म 'अबला' का, "अबला पे सितम निर्बल पर जुलुम, तू चुप बैठा भगवान रे..."।



1968 के बाद पूरे बीस साल तक वो ग़ायब रहे और 1986 में दोबारा उनका संगीत सुनाई दिया। इसके पीछे क्या कारण है? वो ग़ायब क्यों हुए और दोबारा वापस कैसे आये?

उनके पैत्रिक स्थान पर कुछ प्रॉपर्टी के इशूज़ हो गये थे जिस वजह से उन्हें लकवा मार गया और 15 साल तक वो लकवे से पीड़ित थे। जब वो ठीक हुए, तब उनके मित्र वसंत गोनी साहब, जो एक निर्देशक थे, उन्होंने पिताजी को फिर से संगीत देने के लिए राज़ी करवाया और इन दोनों फ़िल्मों, 'ईश्वर अल्लाह तेरे नाम' और 'अबला', में उन्हें संगीत देने का न्योता दिया। वसंत जी को पिताजी पर पूरा भरोसा था। पिताजी राज़ी हो गये और इस तरह से एक लम्बे अरसे के बाद उनका संगीत फिर से सुनाई दिया।



वह क्या मसला था सम्पत्ति का ज़रा खुल कर बताएँगे अगर आपको कोई आपत्ति ना हो तो?

मेरे पिताजी खेमचन्द जी के सबसे छोटे भाई थे। क्योंकि खेमचन्द जी का कोई बेटा नहीं था, इसलिए उन्होंने पिताजी को गोद लिया ताकि उन्हें सम्पत्ति का वारिस बना सके। खेमचन्द जी की दो हवेलियाँ थीं। पहली हवेली को बंधक बनाया हुआ था, और दूसरी हवेली, जिसका नाम था ’पवनहंस’, उसे कुछ लोगों ने धोखे से हमसे छीन लिया था जाली पेपर्स के बलबूते। क्योंकि पिताजी ज़्यादातर समय मुंबई में गुज़ारते थे, इसका फ़ायदा उठा कर हवेली के नकली पेपर तैयार कर उन लोगों ने उस पर कब्ज़ा कर लिया। उस पर पिताजी ने कानूनी कार्यवाही भी की क्योंकि वह हवेली ही खेमचन्द की अन्तिम निशानी थी हमारे पास और पिताजी उसे खोना नहीं चाहते थे। बीस साल तक यह केस चलने के बाद पिताजी यह केस हार गए। इस सदमे को वो सह नहीं सके और 1975 में उन्हें पैरालिसिस का अटैक आ गया। इस वजह से संगीतकार का दायित्व निभा पाना भी उनके लिए असंभव सा हो गया, और उन्हें काम मिलने बन्द हो गए। वो बस कुछ लोगों को संगीत की शिक्षा दिया करते थे उसके बाद।



बहुत दुख हुआ यह जानकर कि सम्पत्ति ही काल बन गया बसन्त प्रकाश जी के जीवन में। अच्छा ऋतुराज जी, सुनने में आता है कि खेमचंद जी की एक बेटी भी थी जिनका नाम था सावित्री, और जिनके लिए खेमचंद जी ने पैत्रिक स्थान सुजानगढ़ में एक आलीशान हवेली बनवाई थी, पर बाद में आर्थिक कारणों से वह गिरवी रख दी गई, और आज वह किसी और की अमानत है। क्या आप खेमेचंद जी की बेटी सावित्री जी के बारे में कुछ बता सकते हैं?

जी नहीं, मुझे उनके बारे में कुछ नहीं मालूम। पिताजी ने कभी मुझे उनके बारे में नहीं बताया, इसलिए मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकता।



बहुत बहुत शुक्रिया ऋतुराज जी। हम वाक़ई अभिभूत हैं खेमचंद जी और बसंत प्रकाश जी जैसे महान कलाकारों के बारे में आप से बातचीत कर। ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के लिए अपना कीमती वक़्त निकालने के लिए और इतनी सारी बातें बताने के लिए मैं अपनी तरफ़ से, हमारे तमाम श्रोता-पाठकों की तरफ़ से, और ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की तरफ़ से, आपका शुक्रिया अदा करता हूँ। नमस्कार!

आपका भी बहुत धन्यवाद, नमस्कार!



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Wednesday, June 22, 2011

बिछुडती नायिका की अपने प्रियतम के लिए कामना -"मैं मिट जाऊँ तो मिट जाऊँ, तू शाद रहे आबाद रहे...."

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 684/2011/124

'रस के भरे तोरे नैन' - फिल्मों में ठुमरी विषयक इस श्रृंखला में मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार फिर आपका स्वागत करता हूँ| कल की कड़ी में हमने आपसे चर्चा की थी कि नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में 'ठुमरी' एक शैली के रूप में विकसित हुई थी| अपने प्रारम्भिक रूप में यह एक प्रकार से नृत्य-गीत ही रहा है| राधा-कृष्ण की केलि-क्रीड़ा से प्रारम्भ होकर सामान्य नायक-नायिका के रसपूर्ण श्रृंगार तक की अभिव्यक्ति इसमें होती रही है| शब्दों की कोमलता और स्वरों की नजाकत इस शैली की प्रमुख विशेषता तब भी थी और आज भी है| कथक नृत्य के भाव अंग में ठुमरी की उपस्थिति से नर्तक / नृत्यांगना का अभिनय मुखर हो जाता है| ठुमरी का आरम्भ चूँकि कथक नृत्य के साथ हुआ था, अतः ठुमरी के स्वर और शब्द भी भाव प्रधान होते गए|

राज-दरबार के श्रृंगारपूर्ण वातावरण में ठुमरी का पोषण हुआ था| तत्कालीन काव्य-जगत में प्रचलित रीतिकालीन श्रृंगार रस से भी यह शैली पूरी तरह प्रभावित हुई| नवाब वाजिद अली शाह स्वयं उच्चकोटि के रसिक और नर्तक थे| ऊन्होने राधा-कृष्ण के संयोग-वियोग पर कई ठुमरी गीतों की रचना करवाई| ठुमरी और कथक के अन्तर्सम्बन्ध नवाबी काल में ही स्थापित हुए थे| वाजिद अली शाह के दरबार की एक बड़ी रोचक घटना है; जिसने आगे चल कर नृत्य के साथ ठुमरी गायन की धारा को समृद्ध किया| एक बार नवाब के दरबार में अपने समय के श्रेष्ठतम पखावज वादक कुदऊ सिंह आए| दरबार में उनका भव्य सत्कार हुआ और उनसे पखावज वादन का अनुरोध किया गया| कुदऊ सिंह ने वादन शुरू किया| उन्होंने ऐसी-ऐसी क्लिष्ट और दुर्लभ तालों और पर्णों का प्रदर्शन किया कि नवाब सहित सारे दरबारी दंग रह गए| कुदऊ सिंह को पता था कि नवाब के दरबार में कथक नृत्य का बेहतर विकास हो रहा है| उन्होंने ऐसी तालों का वादन शुरू किया जो नृत्य के लिए उपयोगी थे; उनकी यह भी अपेक्षा थी कि कोई नर्तक उनके पखावज वादन में साथ दे| कुदऊ सिंह की विद्वता के सामने किसी का साहस नहीं हुआ| उस समय दरबार में कथक गुरु ठाकुर प्रसाद अपने नौ वर्षीय पुत्र के साथ उपस्थित थे| ठाकुर प्रसाद नवाब वाजिद अली शाह को नृत्य की शिक्षा दिया करते थे| कुदऊ सिंह की चुनौती उनके कानों में बार-बार खटकती रही| अन्ततः उन्होंने अपने नौ वर्षीय पुत्र बिन्दादीन को महफ़िल में खड़े होने का आदेश दिया| फिर शुरू हुई एक ऐसी प्रतियोगिता, जिसमें एक ओर एक नन्हा बालक और दूसरी ओर अपने समय का प्रौढ़ एवं विख्यात पखावज वादक था| कुदऊ सिंह एक से एक क्लिष्ट तालों का वादन करते और वह बालक पूरी सफाई से पदसंचालन कर सबको चकित कर देता था| अन्ततः पखावज के महापण्डित ने उस बालक की प्रतिभा का लोहा माना और उसे अपना आशीर्वाद दिया|

यही बालक आगे चलकर बिन्दादीन महाराज के रूप कथक के लखनऊ घराने का संस्थापक हुआ| बिन्दादीन और उनके भाई कालिका प्रसाद ने कथक नृत्य को नई ऊँचाई पर पहुँचाया| बिन्दादीन महाराज ने कथक नृत्य पर भाव प्रदर्शन के लिए 1500 से अधिक ठुमरियों की रचना की थी, जिनका प्रयोग आज भी कथक नर्तक / नृत्यांगना करते हैं| "रस के भरे तोरे नैन" श्रृंखला के आगामी किसी अंक में हम बिन्दादीन महाराज की ठुमरियों पर विस्तार से चर्चा करेंगे|

इस श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आपने अमीरबाई कर्नाटकी के स्वरों में 1944 की फिल्म "भर्तृहरि" से राग हेमन्त की ठुमरी सुनी थी| आज हम आपको जो ठुमरी सुनवाने जा रहे हैं, वह भी अमीरबाई कर्नाटकी के स्वरों में ही है| 1947 की फिल्म "सिन्दूर" से यह ठुमरी ली गई है| यह वह समय था जब अमीरबाई पार्श्वगायन के क्षेत्र में शीर्ष पर थीं| 'कन्नड़ कोकिला' के नाम से विख्यात अमीरबाई ने 1947 में फिल्मिस्तान द्वारा निर्मित फिल्म "सिन्दूर" में राग "तिलक कामोद" की एक बेहद कर्णप्रिय ठुमरी का गायन किया है| फिल्म के संगीतकार हैं खेमचन्द्र प्रकाश तथा गीतकार हैं कमर जलालाबादी| ठुमरी की नायिका जाते हुए प्रियतम के कुशलता की कामना करती है, जब कि इस बिछोह से उसका ह्रदय दुखी है और आँखें आँसुओं से भीगी हैं| आइए सुनते हैं रस-भाव से भरी यह ठुमरी -



क्या आप जानते हैं...
कि भक्तकवि नरसी भगत का चर्चित भजन -"वैष्णवजन तो तेणे कहिए जे पीर पराई जाने रे..." गाने के कारण महात्मा गाँधी अमीरबाई कर्नाटकी के बहुत बड़े प्रशंसक बन गए थे|

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 04/शृंखला 19
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.
सवाल १ - किस राग पर आधारित है ये ठुमरी - ३ अंक
सवाल २ - गीतकार कौन हैं - २ अंक
सवाल ३ - इस पारंपरिक ठुमरी के संगीतकार का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
हिन्दुस्तानी जी और दीप चंद्रा जी के साथ अमित जी को बधाई. क्षिति जी इस शृंखला में आप सशक्त दावेदार हैं, जमे रहिये

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Saturday, April 9, 2011

ओल्ड इज़ गोल्ड -शनिवार विशेष - सुनहरे दौर के विस्मृत संगीतकार बसंत प्रकाश के पुत्र ॠतुराज सिसोदिआ से एक बातचीत

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार। फ़िल्म संगीत के सुनहरे युग में जहाँ एक तरफ़ कुछ संगीतकार लोकप्रियता की बुलंदियों तक पहुँचे, वहीं दूसरी तरफ़ बहुत से संगीतकार ऐसे भी हुए जो बावजूद प्रतिभा सम्पन्न होने के बहुत अधिक दूर तक नहीं बढ़ सके। आज जब सुनहरे दौर के संगीतकारों की बात चलती है तब अनिल बिस्वास, नौशाद, सी. रामचन्द्र, रोशन, सचिन देव बर्मन, ओ.पी. नय्यर, मदन मोहन, रवि, हेमन्त कुमार, कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, राहुल देव बर्मन जैसे नाम सब से पहले लिए जाते हैं। इन चमकीले नामों की इस चकाचौंध के आगे बहुत से नाम ऐसे है जो नज़रअंदाज़ हो जाते हैं। ऐसा ही एक नाम है संगीतकार बसंत प्रकाश का। जी हाँ, वही बसंत प्रकाश जो ४० के दशक के सुप्रसिद्ध संगीतकार खेमचंद प्रकाश के छोटे भाई थे। खेमचंद जी की तरह बसंत प्रकाश इतने मशहूर तो नहीं हुए, पर फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने को समृद्ध करने में अपना अमूल्य योगदान दिया। आज बसंत प्रकाश जी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन हमनें उनके बेटे श्री ॠतुराज सिसोदिआ से सम्पर्क स्थापित किया और पूछे चंद सवाल, जिनका उन्होंने पूरी उत्सुकता के साथ जवाब दिया। तो आइए आज के इस विशेषांक में प्रस्तुत है वही साक्षात्कार।
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सुजॉय - ऋतुराज जी, बहुत बहुत स्वागत है आपका 'हिंद-युग्म' में। आप से बातें करते हुए हम बहुत रोमांचित हो रहे हैं, क्योंकि हम एक ऐसे शख़्स से बातें कर रहे हैं जिनका संबंध फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के दो संगीतकारों से है, एक हैं महान खेमचंद प्रकाश जी और दूसरे हैं उन्हीं के भाई बसंत प्रकाश जी।

ऋतुराज जी - धन्यवाद! मुझे भी अपने उन दोनों पर बहुत गर्व है।

सुजॉय - ऋतुराज जी, सबसे पहले तो हम जानना चाहेंगे खेमचंद प्रकाश और बसंत प्रकाश के संबंध के बारे में। मेरा मतलब है कि कुछ लोग कहते हैं कि बसंत जी खेमचंद जी के मानस पुत्र हैं, कोई कहता है कि वो उनके मुंहबोले भाई हैं, तो हम आपसे जानना चाहेंगे इस रिश्ते के बारे में।

ऋतुराज जी - बहुत अच्छा सवाल है यह। मैं आपको बताऊँ कि मेरे पिता बसंत प्रकाश जी और खेमचंद जी सगे भाई भी थे और पिता-पुत्र भी।

सुजॉय - सगे भाई और पिता-पुत्र भी? मतलब?

ॠतुराज जी - यानी कि रिश्ते में तो दोनों सगे भाई ही थे, लेकिन बाद में खेमचंद जी नें व्यक्तिगत कारणों से मेरे पिता बसंत प्रकाश जी को अपने इकलौते पुत्र के तौर पर गोद लिया।

सुजॉय - यानी कि खेमचंद जी आपके ताया जी भी हुए और साथ ही दादाजी भी!

ॠतुराज जी - बिल्कुल ठीक!

सुजॉय - वैसे तो हम आज बसंत प्रकाश जी के बारे में ही चर्चा कर रहे हैं, लेकिन खेमचंद जी का नाम उनके साथ ऐसे जुड़ा हुआ है कि उनका भी ज़िक्र करना अनिवार्य हो जाता है। इसलिए बसंत प्रकाश जी पर चर्चा आगे बढ़ाने से पहले, हम आपसे खेमचंद जी के बारे में जानना चाहेंगे। क्या जानते हैं आप उनके बारे में?

ऋतुराज जी - जी हाँ, हर पोता अपने दादाजी के बारे में जानना चाहेगा, और मेरे पिता जी नें भी उनके बारे में मुझे बताया था। खेमचंद जी नें 'सुप्रीम पिक्चर्स' के 'मेरी आँखें' के ज़रिये १९३९ में फ़िल्म जगत में पदार्पण किया था। और जल्द ही नामचीन रणजीत फ़िल्म स्टुडिओ ने उन्हें अनुबंधित कर लिया। लता मंगेशकर के लिए खेमचंद प्रकाश फलदायक साबित हुए और उस दौर में 'आशा', 'ज़िद्दी' और 'महल' जैसी फ़िल्मों में गीत गा कर लता जी को नई नई प्रसिद्धी हासिल हुई थी। लेकिन खेमचंद जी की असामयिक मृत्यु नें फ़िल्म जगत में एक कभी न पूरा होने वाले शून्य को जन्म दिया।

सुजॉय - निस्संदेह खेमचंद जी के जाने से जो क्षति हुई, वह फ़िल्म जगत की अब तक की सब से बड़ी क्षतियों में से एक है।

ऋतुराज जी - 'तानसेन' को बेहतरीन म्युज़िकल फ़िल्मों में गिना जाता है। खेमचंद जी नें लता जी को तो ब्रेक दिया ही, साथ ही किशोर कुमार को भी पहला ब्रेक दिया "मरने की दुवायें क्यों माँगू" गीत में। यह बात मशहूर है कि लता मंगेशकर की आवाज़ को शुरु शुरु में निर्माता चंदुलाल शाह नें रिजेक्ट कर दिया था। लेकिन खेमचंद जी नें उनके निर्णय को चैलेंज किया और उन्हें बताया कि एक दिन यही आवाज़ इस इंडस्ट्री पर राज करेगी। 'ज़िद्दी' में लता जी का गाया एक बेहद सुंदर गीत था "चंदा रे जा रे जा रे"।

सुजॉय - अभी हाल ही में हमनें इस गीत को 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में सुनवाया है इस्मत चुगताई को समर्पित अंक में। अच्छा ॠतुराज जी, यह बताइए कि खेमचंद जी का स्वरबद्ध कौन सा गीत आपको सब से प्रिय है?

ऋतुराज जी - ऐसे बहुत से गीत हैं जो मुझे व्यक्तिगत तौर पे बहुत पसंद है, लेकिन एक जो गीत जो मेरा फ़ेवरीट है, वह है फ़िल्म 'महल' का "मुश्किल है बहुत मुश्किल चाहत का भुला देना"।

सुजॉय - वाह! आपको यह जानकर ख़ुशी होगी कि इस गीत को भी हम बजा चुके हैं सस्पेन्स फ़िल्मों के गीतों की शृंखला 'मानो या ना मानो' में। ॠतुराज जी, हम अब बसंत प्रकाश जी पर आते हैं; बताइए कि एक पिता के रूप में वो कैसे थे? उनकी कुछ विशेषताओं के बारे में बताएँ जो संगीत-रसिक जान कर अभिभूत हो जाएँगे।

ऋतुराज जी - मेरा और मेरे पिताजी का संबंध दोस्ताना वाला था और सिर्फ़ मेरे साथ ही नहीं, पूरे परिवार के साथ ही वो घुलमिल कर रहते थे, और एक अच्छे पिता के सभी गुण उनमें थे। परिवार का वो ख़याल रखा करते थे। बहुत ही शांत और सादे स्वभाव के थे। उनकी रचनाएँ मौलिक हुआ करती थी। उन्होंने कभी डिस्को या पाश्चात्य संगीत का सहारा नहीं लिया क्योंकि वो भारतीय शास्त्रीय संगीत में विश्वास रखते थे। राग-रागिनियों, ताल और लोक-संगीत में उनकी गहरी रुचि थी। खेमचंद जी से ही उन्होंने संगीत सीखा और संगीत और नृत्य कला की बारीकियाँ उनसे सीखी। वो थोड़े मूडी थे और उनका संगीत उनके मूड पे डिपेण्ड करता था।

सुजॉय - कहा जाता है कि 'अनारकली' फ़िल्म के लिए पहले पहले बसंत प्रकाश जी को ही साइन करवाया गया था, लेकिन बाद में इन्होंने फ़िल्म छोड़ दी। क्या इस बारे में आप कुछ कहना चाहेंगे?

ऋतुराज जी - जी हाँ, यह सच बात है। 'अनारकली' के संगीत को लेकर कुछ विवाद खड़े हुए थे। एक दिन काम के अंतराल के वक़्त मेरे पिता जी फ़िल्मिस्तान स्टुडिओ में आराम कर रहे थे। उस समय निर्देशक के सहायक उस कमरे में आये और उन पर चीखने लगे। मेरे पिता जी को उस ऐसिस्टैण्ट के चिल्लाने का तरीका अच्छा नहीं लगा। उन दोनों में बहसा-बहसी हुई, और उसी वक़्त पिताजी फ़िल्म छोड़ कर आ गये। लेकिन तब तक पिताजी फ़िल्म का एक गीत रेकॉर्ड कर चुके थे। सी. रामचंद्र आकर फ़िल्म के संगीत का भार स्वीकारा और अपनी शर्त रख दी कि न केवल फ़िल्म के गानें लता मंगेशकर से गवाये जाएँगे, बल्कि मेरे पिताजी द्वारा स्वरब्द्ध गीता दत्त के गाये गीत को फ़िल्म से हटवा दिया जाये। शुरु शुरु में उनके इन शर्तों को फ़िल्मिस्तान मान तो गये, लेकिन आख़िर में गीता दत्त के गाये गीत को फ़िल्म में रख लिया गया। और वह गीत था "आ जाने वफ़ा"।

सुजॉय - वाह! आइए आगे बढ़ने से पहले इस लाजवाब गीत को सुन लिया जाये!

गीत - आ जाने वफ़ा (अनारकली)


सुजॉय - अच्छा ॠतुराज जी, मैंने पढ़ा है कि खेमचंद जी की असामयिक मृत्यु के बाद बसंत प्रकाश जी नें उनकी कुछ असमाप्त फ़िल्मों के संगीत को पूरा किया था और इसी तरह से उनका फ़िल्म जगत में आगमन हुआ था। तो हम आपसे जानना चाहते हैं कि वह कौन सी फ़िल्म थी जिसमें बसंत प्रकाश जी नें संगीत दिया था?

ऋतुराज जी - १० अगस्त १९५० को दादाजी की मृत्यु हो गई थी, और उनकी कई फ़िल्में असमाप्त थी जैसे कि 'जय शंकर', 'श्री गणेश जन्म', 'तमाशा'। 'श्री गणेश जन्म' में मन्ना डे सह-संगीतकार थे और 'तमाशा' के गीतों को मन्ना डे और एस. के. पाल नें पूरा किया था। बसंत प्रकाश जी नें 'जय शंकर' का संगीत पूरा किया था और यही उनकी पहली फ़िल्म भी थी।

सुजॉय - बसंत प्रकाश जी द्वारा स्वरबद्ध फ़िल्मों में कौन कौन सी फ़िल्में उल्लेखनीय हैं आपके हिसाब से?

ॠतुराज जी - उनकी उल्लेखनीय फ़िल्में हैं - सलोनी (१९५२), श्रीमतिजी (१९५२), निशान डंका (१९५२), बदनाम (१९५२), महारानी (१९५७), नीलोफ़र (१९५७), भक्तध्रुव (१९५७), हम कहाँ जा रहे हैं (१९६६), ज्योत जले (१९६८), ईश्वर अल्लाह तेरे नाम (१९८४), अबला (१९८६)।

सुजॉय - १९६८ के बाद पूरे २० साल तक वो ग़ायब रहे और १९८६ में दोबारा उनका संगीत सुनाई दिया। इसके पीछे क्या कारण है? वो ग़ायब क्यों हुए थे और दोबारा वापस कैसे आये?

ॠतुराज जी - उनके पैत्रिक स्थान पर कुछ प्रॉपर्टी के इशूज़ हो गये थे जिस वजह से उन्हें लकवा मार गया और १५ साल तक वो लकवे से पीड़ित थे। जब वो ठीक हुए, तब उनके मित्र वसंत गोनी साहब, जो एक निर्देशक थे, उन्होंने पिताजी को फिर से संगीत देने के लिए राज़ी करवाया और इन दोनों फ़िल्मों, 'ईश्वर अल्लाह तेरे नाम' और 'अबला', में उन्हें संगीत देने का न्योता दिया। वसंत जी को पिताजी पर पूरा भरोसा था। पिताजी राज़ी हो गये और इस तरह से एक लम्बे अरसे के बाद उनका संगीत फिर से सुनाई दिया।

सुजॉय - बसंत प्रकाश जी के युं तो कई गीत लोकप्रिय हुए थे, आपको व्यक्तिगत तौर पे उनका बनाया कौन सा गीत सब से पसंद है?

ॠतुराज जी - युं तो अभी जिन फ़िल्मों के नाम मैंने लिए, उन सब के गानें पसंद है, लेकिन एक जो मेरा फ़ेवरीट गीत है, वह है उनकी अंतिम फ़िल्म 'अबला' का, "अबला पे सितम निर्बल पर जुलुम, तू चुप बैठा भगवान रे..."।

सुजॉय - यह तो था आपका पसंदीदा गीत। बसंत प्रकाश जी को अपने गीतों में कौन सा गीत सब से ज़्यादा पसंद था?

ऋतुराज जी - मेरे पिताजी का सब से पसंदीदा गीत फ़िल्म 'नीलोफ़र' का "रफ़्ता रफ़्ता वो हमारे दिल के अरमान हो गये" था। यह गीत इस फ़िल्म का भी सब से लोकप्रिय गीत था। और अब तक लोग इस गीत को याद करते हैं, सुनते हैं।

सुजॉय - इसमें कोई शक़ नहीं है। आइए आज हम भी इस गीत का आनंद लें, फ़िल्म 'नीलोफ़र', आवाज़ें आशा भोसले और महेन्द्र कपूर की।

गीत - रफ़्ता रफ़्ता वो हमारे दिल के अरमान हो गये (नीलोफ़र)


सुजॉय - और अब आख़िरी सवाल। सुनने में आता है कि खेमचंद जी की एक बेटी भी थी जिनका नाम था सावित्री, और जिनके लिए खेमचंद जी नें पैत्रिक स्थान सुजानगढ़ में एक आलीशान हवेली बनवाई थी, पर बाद में आर्थिक कारणों से वह गिरवी रख दी गई, और आज वह किसी और की अमानत है। क्या आप खेमेचंद जी की बेटी सावित्री जी के बारे में कुछ बता सकते हैं?

ऋतुराज जी - जी नहीं, मुझे उनके बारे में कुछ नहीं मालूम। पिताजी नें कभी मुझे उनके बारे में नहीं बताया, इसलिए मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकता।

सुजॉय - बहुत बहुत शुक्रिया ऋतुराज जी। हम वाक़ई अभिभूत हैं खेमचंद जी और बसंत प्रकाश जी जैसे महान कलाकारों के बारे में आप से बातचीत कर। 'हिंद-युग्म' के लिए अपना कीमती वक़्त निकालने के लिए और इतनी सारी बातें बताने के लिए मैं अपनी तरफ़ से, हमारे तमाम श्रोता-पाठकों की तरफ़ से, और 'हिंद-युग्म' की तरफ़ से, आपका शुक्रिया अदा करता हूँ। नमस्कार!

ऋतुराज जी - आपका भी बहुत धन्यवाद, नमस्कार!

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तो दोस्तों, ये था आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष', आशा है आपको पसंद आई होगी। अगले हफ़्ते फिर किसी ख़ास प्रस्तुति के साथ वापस आयेंगे। मेरी और आपकी दोबारा मुलाक़ात होगी कल शाम ६:३० बजे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नियमित कड़ी में, लेकिन सुमित के साथ कल सुबह 'सुर-संगम' सुनना/पढ़ना न भूलिएगा, अब अनुमती दीजिए, नमस्कार!

Monday, March 21, 2011

चंदा रे जा रे जा रे....मुस्लिम समाज में महिलाओं की निर्भीक आवाज़ बनकर उभरी इस्मत चुगताई को आज आवाज़ सलाम

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 617/2010/317

हिंदी सिनेमा के कुछ सशक्त महिला कलाकारों को सलाम करती 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'कोमल है कमज़ोर नहीं' की सातवीं कड़ी में आप सभी का फिर एक बार स्वागत है। आज हम जिस प्रतिभा से आपका परिचय करवा रहे हैं, वो एक उर्दू की जानीमानी लेखिका तो हैं ही, साथ ही फ़िल्म जगत को एक कहानीकार, पटकथा व संवाद लेखिका, निर्मात्री व निर्देशिका के रूप में अपना परिचय देनेवाली इस फनकारा का नाम है इस्मत चुगताई। १५ अगस्त १९१५ को उत्तर प्रदेश के बदायूं में जन्मीं और जोधपुर राजस्थान में पलीं इस्मत जी के पिता एक सिविल सर्वैण्ट थे। ६ भाई और ४ बहनों के विशाल परिवार में इस्मत नौवीं संतान थीं। इस्मत की बड़ी बहनों का उनकी बचपन में ही शादी हो जाने की वजह से इस्मत का बचपन अपने भाइयों के साथ गुज़रा। और शायद यही वजह थी इस्मत के अंदर पनपने वाले खुलेपन की और इसी ने उनके लेखन में बहुत ज़्यादा प्रभाव डाला। इस्मत के युवावस्था में ही उनका भाई मिर्ज़ा अज़ीम बेग चुगताई एक स्थापित लेखक बन चुके थे, और वो ही उनके पहले गुरु बनें। १९३६ में स्नातक की पढ़ाई करते हुए इस्मत चुगताई लखनऊ में आयोजित 'प्रोग्रेसिव राइटर्स ऐसोसिएशन' की पहली सभा मे शरीक हुईं। बी.ए. करने के बाद इस्मत ने बी.टी की पढ़ाई की, और बी.ए और बी.टी, दोनों डिग्रियाँ अर्जित करने वाली भारत की पहली मुस्लिम महिला बन गईं। और इसी दौरान वो छुपा छुपा कर लिखने लगीं, क्योंकि उनके इस लेखन का उनकी रूढ़ीवादी मुस्लिम परिवार ने घोर विरोध किया। तमाम मुसीबतों और कठिनाइयों का सामना करते हुए इस्मत चुगताई नें अपना लेखन कार्य जारी रखा और इस देश की आनेवाली लेखिकाओं के लिए राह आसान बनाई। और इसीलिए 'कोमल है कमज़ोर नहीं' शृंखला सलाम करती है इस्मत चुगताई जैसी सशक्त लेखिका को।

जैसा कि हमनें कहा कि इस्मत चुगताई को बड़ी मुसीबतों का सामना करना पड़ा है, आइए इस ओर थोड़ा नज़र डालें। उनकी बहुत सारी लेखों का दक्षिण एशिया में घोर विरोध किया क्योंकि उन सब में मुस्लिम समाज में लाये जाने वाली ज़रूरी बदलावों की बात की गई थी, यहाँ तक कि इस्लामिक उग्रवाद पर भी वार किया था उन्होंने। मुस्लिम महिलाओं की नक़ाबपोशी (परदा) के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाकर उन्होंने मुस्लिम समाज में तूफ़ान उठा दिया था। वर्तमान में मुस्लिम देशों में इस्मत चुगताई की बहुत सी किताबों पर प्रतिबंध है। इस्मत चुगताई के हिंदी सिनेमा में योगदान की अगर बात करें तो उन्होंने इस राह में पदार्पण किया था १९४८ की फ़िल्म 'ज़िद्दी' में, जिसकी उन्होंने कहानी लिखी थी। उसके बाद १९५० में 'फ़रेब' का उन्होंने निर्देशन किया। १९५८ की फ़िल्म 'सोने की चिड़िया' का न केवल उन्होंने निर्माण किया, बल्कि पटकथा भी ख़ुद लिखीं। १९६८ की फ़िल्म 'जवाब आयेगा' को निर्देशित कर १९७३ की मशहूर कलात्मक फ़िल्म 'गरम हवा' की कहानी लिखीं। १९७५ की वृत्तचित्र 'माइ ड्रीम्स' का उन्होंने निर्देशन किया और १९७८ की फ़िल्म 'जुनून' में संवाद लिखे और अभिनय भी किया। २४ अक्तुबर १९९१ को इस्मत चुगताई का बम्बई में निधन हो गया। मुस्लिम होते हुए भी उन्हें कब्र में समाधि नहीं दी गई, बल्कि उनके ख़्वाहिशानुसार उनका अंतिम संस्कार चंदनवाड़ी क्रिमेटोरियम में किया गया। इस छोटे से लेख में इस्मत चुगताई जैसी विशाल प्रतिभा को पूरी तरह से हम समेट नहीं सकते, फिर कभी मौका मिला तो उनके शख्सियत की कुछ और बातें आपको बताएँगे। फ़िल्हाल आइए सुनते हैं फ़िल्म 'ज़िद्दी' से लता मंगेशकर का गाया "चंदा रे, जा रे जा रे"। खेमचंद प्रकाश का संगीत था इस फ़िल्म में और गीतकार थे प्रेम धवन, जिनकी यह पहली पहली फ़िल्म थी। दरअसल निर्देशक शाहीद लतीफ़ और इस्मत चुगताई ही प्रेम धवन साहब को ले गये थे अशोक कुमार और देविका रानी के पास और गीतकार के लिए उनका नाम सुझाया। प्रेम धवन साहब के लिए आज का प्रस्तुत गीत बहुत मायने रखता था, तभी तो विविध भारती के 'जयमाला' कार्यक्रम में कुछ इस तरह से उन्होंने इसके बारे में कहा था - "मैं अपनी ग्रैजुएशन पूरी कर इप्टा से जुड़ गया, कम्युनिस्ट के ख़यालात थे मुझमें। पंजाब में मैं इसका फ़ाउण्डर मेम्बर था। मैंने एक ट्रूप बनाया पंडित रविशंकर और सचिन शंकर के साथ मिल कर और हम पंजाबी में कार्यक्रम पेश करने लगे पूरे देश में घूम घूम कर, और अपनी संस्था इप्टा के लिए चंदा इकट्ठा करते ज़रूरतमंद लोगों की सेवा के लिए। पर १९४७ में दंगे शुरु हो गए और हमारे टूर भी बंद हो गए। चंदा कलेक्ट करना भी बंद हो गया। हमनें फ़ैसला किया कि थिएटर को बंद कर दिया जाए। थिएटर बंद होने के बाद फ़िल्मवालों ने बुलाया। मेरी पहली फ़िल्म थी 'बॊम्बे टाकीज़' की 'ज़िद्दी'। उसमें एक गीत था "चंदा रे, जा रे जा रे", जिसे लता ने गाया था। उस समय लता भी नई नई थी। यह 'महल' के पहले की बात है। यह गीत मेरे करीयर का एक लैण्डमार्क गीत था और लता का भी। इस कॊण्ट्रैक्ट के ख़त्म होने के बाद मैंने अनिल बिस्वास के लिए कई फ़िल्मों में गानें लिखे जैसे 'लाजवाब', 'तरना' वगेरह।" तो आइए दोस्तों, इस्मत चुगताई को सलाम करते हुए सुनें उनकी लिखी कहानी पर बनी फ़िल्म 'ज़िद्दी' का यह गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि इस्मत चुगताई के जीवन पर लिखे किताबों में उल्लेखनीय दो किताबें हैं सुक्रीता पाल कुमार लिखित 'Ismat: Her Life, Her Times' तथा मंजुला नेगी लिखित 'Ismat Chughtai, A Fearless Voice'

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 08/शृंखला 12
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - एक आवाज़ है येसुदास की.

सवाल १ - हम चर्चा करेंगें इस गीत की फिल्म की निर्देशिका की, कौन हैं ये - २ अंक
सवाल २ - गीतकार भी एक जानी मानी लेखिका हैं, नाम बताएं - ३ अंक
सवाल ३ - कौन हैं सहगायिका - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर अंजाना जी बाज़ी मार गए....कमाल हैं आप दोनों...वाकई :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, January 16, 2011

मुश्किल है बहुत मुश्किल चाहत का भुला देना....और भुला पाना उन फनकारों को जिन्होंने हिंदी सिनेमा में सस्पेंस थ्रिलर की नींव रखी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 571/2010/271

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस नए सप्ताह में आप सभी का फिर एक बार हार्दिक स्वागत है। दोस्तों, बचपन में आप सभी ने कभी ना कभी अपनी दादी-नानी से भूत-प्रेत की कहानियाँ तो ज़रूर सुनी होंगी। सर्दी की रातों में खाना खाने के बाद रजाई ओढ़कर मोमबत्ती या लालटेन की रोशनी में दादी-नानी से भूतों की कहानी सुनने का मज़ा ही कुछ अलग होता था, है न? और कभी कभी तो बच्चे अगर ज़िद करे या शैतानी करे तो भी उन्हें भूत-प्रेत का डर दिखाकर सुलाया जाता है, आज भी। लेकिन जब हम धीरे धीरे बड़े होते है, तब हमें अहसास होने लगता है कि ये भूत-प्रेत बस कहानियों में ही वास करते हैं। हक़ीक़त में इनका कोई वजूद नहीं है। लेकिन क्या वाक़ई यह सच है कि आत्मा या भूत-प्रेत का कोई वजूद नहीं, बस इंसान के मन का भ्रम या भय है? दोस्तों, सदियों से सिर्फ़ हमारे देश में ही नही, बल्कि समूचे विश्व में भूत-प्रेत की कहानियाँ तो प्रचलित हैं ही, बहुत सारे क़िस्से ऐसे भी हुए हैं जिनके द्वारा लोगों ने यह साबित करने की कोशिश की है कि भूत-प्रेत और आत्माओं का अस्तित्व है। हर देश में इस तरह के किस्से, इस तरह की घटनाओं का ब्योरा मिलता है। तो हमने भी सोचा कि क्यों ना देश विदेश की ऐसी ही तमाम "सत्य" घटनाओं को संजोकर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में एक लघु शृंखला चलाई जाये, जिसमें हम देश विदेश की इन रोमहर्षक घटनाओं का ज़िक्र तो करेंगे ही, साथ ही यह भी जानने की कोशिश करेंगे कि विज्ञान क्या कहता है इनके बारे में। और लगे हाथ हम कुछ ऐसे गीत भी सुनेंगे जो सपेन्स थ्रिलर या हॊरर फ़िल्मों से चुने हुए होंगे। तो प्रस्तुत है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'मानो या ना मानो'। आज इसकी पहली कड़ी में हम ज़िक्र करना चाहेंगे आकाशवाणी कोलकाता की। अब आप हैरान हो रहे होंगे कि भूत प्रेत से आकाशवाणी कोलकाता का क्या रिश्ता है! बात ऐसी है कि आकाशवाणी कोलकाता का जो पुराना ऒफ़िस था गार्स्टिन प्लेस नामक जगह में, जो अब परित्यक्त है, ऐसा सुनने में आता है कि यह जगह हौण्टेड है। अभी हाल ही में स्टार आनंद (स्टार टीवी का बंगला चैनल) पर कई कलाकारों के विचार दिखाये गये थे जिन्होंने इस बात की पुष्टि की है, और इनमें से एक गायिका हेमंती शुक्ला भी हैं। हेमंती जी ने बताया कि उन्हें गुज़रे ज़माने के कुछ कलाकारों ने बताया कि उस जगह पर अजीब-ओ-ग़रीब आवाज़ें सुनी जा सकती है। अपने आप ही पियानो के बजने की आवाज़ भी कई लोगों ने सुनी है रात के वक़्त। १ गार्स्टिन प्लेस, जहाँ पर ऒल इण्डिया रेडिओ कोलकाता का जन्म हुआ था, उसके विपरीत अब जॊब चारनॊक की कब्र है, और शायद यह भी एक कारण है लोगों के इस जगह को हौण्टेड मानने का। भले ही आज लोग रात के वक़्त इस जगह के आसपास से गुज़रना पसंद नहीं करते हों, लेकिन वैज्ञानिक तौर पर इस रहस्य के पीछे का कारण पता नहीं चल सका है।

दोस्तों, क्योंकि यह 'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला है, इसलिए चाहे कितनी भी क़िस्से और कहानियाँ आपको सुनवाएँ, घूम फिर कर तो हमें पुराने फ़िल्मी गीतों की तरफ़ मुड़ना ही है। हिंदी फ़िल्मों में सस्पेन्स और हॊरर फ़िल्मों की बात करें तो जिस फ़िल्म की याद हमें सब से पहले आती है, वह है १९४९ की 'महल'। 'बॊम्बे टॊकीज़' बम्बई के मलाड में स्थित था। उसका कैम्पस बहुत बड़ा था, कंपनी में काम करने वालों के बच्चों के लिए स्कूल व अन्य सुविधाएँ भी मौजूद थी वहाँ। एक बार ऐसी बात चल पड़ी कि उस कैम्पस में भूत हैं और यहाँ तक कि हिमांशु राय का जो बंगला है, वह हौण्टेड है। जब दादामुनि अशोक कुमार ने इस बात का ज़िक्र कमाल अमरोही से किया, तो उनके दिमाग़ में पुनर्जनम की एक कहानी सूझी जिसका नतीजा था 'महल'। फ़िल्म की कहानी कुछ इस तरह की थी कि हरिशंकर (अशोक कुमार) अपने पूर्वजों की जायदाद, एक परित्यक्त महल को देखने के लिए जाते हैं। इस 'शबनम महल' का अतीत बहुत ज़्यादा सुखदायी नहीं था। इतने बरसों के बाद उस महल में वो गये और उस वक़्त हैरान रहे गये जब उन्होंने देखा कि उनका ही एक चित्र दीवार पर टंगा हुआ है। महल की देखरेख करने वाले बूढ़े आदमी ने उस चित्र के पीछे की कहानी बताई और बताया कि किस तरह से वहाँ एक प्रेमी का और उसकी प्रेमिका का अंत हुआ था। बाद में हरिशंकर एक लड़की को देखते है गाते हुए, कभी बग़ीचे में झूला झूलते हुए, लेकिन जब भी वो उसके पास जाते हैं, वो ग़ायब हो जाती है। उस बूढ़े चौकीदार और उनका वकील दोस्त श्रीनाथ, दोनों ही उन्हें उस महल से दूर रहने की सलाह देते हैं। हरिशंकर जितना दूर जाने की कोशिश करते हैं, कुछ बात उन्हें और ज़्यादा उस महल के करीब ले जाती है, और वो क्रमश: उस महल में फैली गहरी भूतिया अंधकार में धँसते चले जाते हैं। फ़िल्म का हौण्टिंग् नंबर "आयेगा आनेवाला" हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनवा चुके हैं। राजकुमारी का भी गाया हुआ "घबरा के जो हम सर को टकराएँ तो अच्छा" भी आपने सुना था इसी महफ़िल में। आइए आज इस फ़िल्म से सुनें लता मंगेशकर की आवाज़ में "मुश्किल है बहुत मुश्किल चाहत का भुला देना"। खेमचंद प्रकाश का संगीत और नक्शब जराचवी के बोल। राग पहाड़ी पर आधारित यह गीत है जो फ़िल्माया गया है मधुबाला पर। किसी भी सस्पेन्स थ्रिलर फ़िल्म की सफलता में पार्श्व संगीत या बकग्राउण्ड म्युज़िक का बहुत बड़ा हाथ होता है और साथ ही बड़ा हाथ होता है छायांकन का। इन दो क्षेत्रों में क्रम से खेमचंद प्रकाश और जोसेफ़ विर्स्चिंग् ने अतुलनीय काम किया, और इस फ़िल्म ने हिंदी सस्पेन्स थ्रिलर की नीव रखी और एक ट्रेण्डसेटर फ़िल्म सिद्ध हुई। तो लीजिए, लता जी के करीयर के शुरुआती दौर का यह यादगार गीत सुनिए और आवाज़ दीजिए उस गुज़रे सुरीले ज़माने को। कल कुछ और दिलचस्प तथ्यों और एक और हौण्टिंग् नंबर के साथ हाज़िर होंगे, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि किशोर कुमार को पहली बार पार्श्वगायक के रूप में दुनिया के समक्ष प्रस्तुत करने वाले संगीतकार खेमचंद प्रकाश ही थे और वह फ़िल्म थी 'ज़िद्दी' (१९४८)।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 02/शृंखला 08
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - इतना बहुत है इस यादगार गीत को पहचानने के लिए.

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - फिल्म की नायिका जून है - १ अंक
सवाल ३ - संगीतकार कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
दोस्तों पिछली शृंखला के परिणाम बताते हुए हमसे एक भूल हुई, अमित जी के कुछ अंक हमसे गलती से छूट गए...दरसअल अमित जी के १२ अंक है शरद जी के १० अंकों की तुलना में, तो इस तरह ७ वीं शृंखला अमित जी ने नाम रही....अमित जी ने हमारा ध्यान इस तरफ़ आकर्षित करवाया, और उन्हीं से हमें पता चला कि उनका पूरा नाम अमित तिवारी है और वो उस अमित जी से अलग हैं जो पहले एक शृंखला जीत चुके हैं. बहरहाल अब की सात श्रृंखलाओं में स्कोर अब इस प्रकार है - श्याम जी -४, शरद जी २, और अमित और अमित तिवारी जी एक एक. असुविधा के लिए क्षमा चाहेंगें. नयी शृंखला में एक बार फिर अमित तिवारी जी ने बढ़त बनाई है २ अंक लेकर शरद जी और प्रतिभा जी पर जिन्हें १-१ अंक मिले हैं.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, December 16, 2009

घबरा के जो हम सर को टकराएँ तो अच्छा है...दर्द भरा बेहद मशहूर गीत राजकुमारी का गाया

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 292

राग सांकला जी के पसंद का दूसरा गाना है १९४९ की फ़िल्म 'महल' का। जहाँ एक तरफ़ इस फ़िल्म में "आयेगा आनेवाला" गीत गा कर लता मंगेशकर को अपना पहला पहला बड़ा ब्रेक मिला था, वहीं गायिका राजकुमारी ने भी इस फ़िल्म में अपने करीयर का एक बड़ा ही कामयाब गीत गाया था। यह गीत है "घबरा के जो हम सर को टकराएँ तो अच्छा है", जिसे आज हम पराग जी की फ़रमाइश पर सुनने जा रहे हैं। 'महल' बॊम्बे टॊकीज़ की फ़िल्म थी, जिसमें संगीत दिया खेमचंद प्रकाश ने और गानें लिखे नकशब जराचवी ने, जिन्हे हम जे. नकशब के नाम से भी जानते हैं। 'महल' एक सस्पेन्स थ्रिलर फ़िल्म थी, जो एक ट्रेंडसेटर फ़िल्म साबित हुई। हुआ युं था कि बॊम्बे टॊकीज़ मलाड का एक विस्तृत इलाका संजोय हुए था। उस कैम्पस में बहुत से लोग रहते थे, बॊम्बे टॊकीज़ के कर्मचारियों के बच्चों के लिए स्कूल भी उसी कैम्पस के अंदर मौजूद था। एक बार एक ऐसी अफ़वाह उड़ी कि उस कैम्पस में भूत प्रेत बसते हैं, और यहाँ तक भी कहा गया कि स्वर्गीय हिमांशु राय का जो बंगला था, उसमें भी भूत हैं। यह बात जब दादामुनि अशोक कुमार ने कमाल अमरोही साहब से कहे तो कमाल साहब को पुनर्जनम पर एक कहानी सूझी और आख़िरकार फ़िल्म 'महल' के रूप में वह पर्दे पर आ ही गई। अशोक कुमार, मधुबाला और विजयलक्ष्मी ने इस फ़िल्म में मुख्य किरदार निभाए। एक सुपर डुपर हिट म्युज़िकल फ़िल्म है 'महल', जिसे हिंदी सिनेमा का एक लैंडमार्क फ़िल्म माना जाता है।

'महल' में लता जी ने मधुबाला का पार्श्वगायन किया था और राजकुमारी ने गाए विजयलक्ष्मी के लिए। अमीन सायानी को दिए गए एक पुराने इंटरव्यू में राजकुमारी जी ने ख़ास कर इस फ़िल्म के गीतों के बारे में कहा था - "महल में मेरे चार गानें थे, और चारों गानें काफ़ी अच्छे थे और लोगों ने काफ़ी पसंद भी किए। दो अब भी याद है लोगों को। और अभी भी कभी कभी वो महल पिक्चर रिलीज़ होती रहती है। "मैं वह दुल्हन हूँ रास ना आया जिसे सुबह", इसे विजयलक्ष्मी के लिए गाया था।" लेकिन जिस गीत के लिए वो जानी गईं, वह गीत है "घबरा के जो सर को टकराएँ तो अच्छा हो"। यह गीत इतना ज़्यादा हिट हुआ कि उसके बाद राजकुमारी जिस किसी भी पार्टी या जलसे में जातीं, उन्हे इस गीत के लिए फ़रमाइशें ज़रूर आतीं। हक़ीक़त भी यही है कि यह गीत उनके आख़िर के दिनों में उनका आर्थिक सहारा भी बना। राजकुमारी ने सब से ज़्यादा गानें ४० के दशक में गाए, और ५० के दशक के शुरुआती सालों में भी उनके गानें रिकार्ड हुए। जिन फ़िल्मों में उनके हिट गानें रहे, उनके नाम हैं - बाबला, भक्त सूरदास, बाज़ार, नर्स, पन्ना, अनहोनी, महल, बावरे नैन, आसमान, और नौबहार। दोस्तों, अमीन सायानी के उसी इंटरव्यू में जब अमीन भाई ने उनसे पूछा कि उन्होने फ़िल्मों के लिए गाना क्यों छोड़ दिया, तो उसके जवाब में राजकुमारी जी ने अफ़सोस व्यक्त हुए कहा कि "मैनें फ़िल्मों के लिए गाना कब छोड़ा, मैने छोड़ा नहीं, मैने कुछ छोड़ा नहीं, वैसे लोगों ने बुलाना बंद कर दिया। अब यह तो मैं नहीं बता पाउँगी कि क्यों बुलाना बंद कर दिया"। बहुत ही तक़लीफ़ होती है किसी अच्छे कलाकार के मुख से ऐसे शब्द सुनते हुए। ऐसे बहुत से कलाकार हैं जिन्हे बदलते वक़्त ने अपने चपेट में ले लिया और लोगों ने भी उन्हे धीरे धीरे भुला दिया। राजकुमारी एक ऐसी ही गायिका हैं जिन्होने बहुत से सुरीले और कर्णप्रिय गानें गाए हैं, और आज का यह अंक हम उन्ही को समर्पित कर रहे हैं। सुनते हैं फ़िल्म 'महल' का गीत और शुक्रिया पराग जी का इस गीत को चुनने के लिए। सुनिए...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस गीत को गाया है हेमंत कुमार ने.
२. ओ पी दत्ता निर्देशित इस फिल्म में नलनी जयवंत भी थी.
३. मुखड़े में शब्द है "आंसू".

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी अब आप मात्र ७ जवाब दूर हैं ५० के आंकडे से....पर आपके पास एपिसोड भी केवल ८ हैं इस लक्ष्य को पाने के लिए, यदि आप ऐसा कर पायीं तो ये ओल्ड इस गोल्ड के इतिहास में एक रिकॉर्ड होगा, सबसे तेज़ अर्धशतक ज़माने का.....हमारी तरफ से अग्रिम बधाई स्वीकार करें, अनुराग जी आपको इस महफ़िल में देख अच्छा लगा

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, September 23, 2009

दूर जाए रे राह मेरी आज तेरी राह से....खेमचंद प्रकाश के लिए गाया लता ने ये बेमिसाल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 211

२८ सितंबर १९२९। मध्य प्रदेश के इंदौर में जन्म हुआ था एक बच्ची का। कहा जाता है कि गंगा नदी शिव जी की जटा से इस धरती पर उतरी थी, पर सुर की गंगा तो स्वर्ग से सीधे इस बच्ची के गले में उतर गई और तब से लेकर आज तक हम सब को अपनी उस आवाज़ के बारिश से भीगो रही है जिस आवाज़ की तारीफ़ में कुछ कहना सिवाय वक़्त के बरबादी के और कुछ भी नहीं है। दोस्तों, कितने ख़ुशनसीब हैं वो लोग जिनका जन्म इस बच्ची के जन्म के बाद हुआ। अफ़सोस तो उन लोगों के लिए होता है जो इस सुर गंगा में नहाए बिना ही इस धरती से चले गए। ये बच्ची आगे चलकर बनी ना केवल इस देश की आवाज़, बल्कि युं भी कह सकते हैं कि ये आवाज़ है पिछली सदी की आवाज़, इस सदी की आवाज़, और आगे आनेवाली तमाम सदियों की आवाज़। फ़िल्म संगीत में हम और आप जैसे संगीत प्रेमियों की अपनी अपनी पसंद नापसंद होती है, मगर हर किसी के पसंद की राहें जिस एक लाजवाब मंज़िल पर जा कर मिल जाती हैं, उस मंज़िल का नाम है सुरों की मलिका, कोकिल कंठी, मेलडी क्वीन, सुर साम्राज्ञी, भारत रत्न, लता मंगेशकर। आज से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर शुरु हो रहा है लता जी पर केन्द्रित लघु शृंखला 'मेरी आवाज़ ही पहचान है'। लता जी के गाए गीतों में से दस लाजवाब गीतों को चुनना अकल्पनीय बात है। इसीलिए हम इस शृंखला के लिए वह राह इख़्तियार नहीं कर रहे हैं, बल्कि हम वह राह चुन रहे हैं जिसमें हैं लता जी के गाए कुछ भूले बिसरे और बेहद दुर्लभ नग़में, जो शायद ही आज आप को कहीं मिल सके, या कहीं और आप इन्हे सुन सके। और हमारी इसी योजना को साकार करने के लिए सामने आए नागपुर के अजय देशपाण्डे जी, जिन्होने लता जी के गाए दुर्लभतम गीतों में से १० गानें चुन कर हमें भेजे, जिनमें से ५ गीत हैं ख़ुश रंग और ५ गीत हैं कुछ ग़मज़दा क़िस्म के। हम तह-ए-दिल से उनका शुक्रिया अदा करते हैं क्योंकि उनके इस सहयोग के बिना इस शृंखला की हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे।

लता मंगेशकर के गाए भूले बिसरे और दुर्लभ गीतों की बात करें तो लता जी के संगीत सफ़र की शुरुआती सालों में, यानी कि ४० के दशक में उन्होने कुछ ऐसे फ़िल्मों में गानें गाए थे जो बहुत ज़्यादा चर्चित नहीं हुए। उस ज़माने में पंजाबी शैली में गाने वाली तमाम वज़नदार आवाज़ों वाली गायिकाओं के गाए गीतों के बीच लता की धागे से भी पतली आवाज़ कहीं दब कर रह गई। अपने पिता की अकाल मृत्यु की वजह से १२ साल की लता ने अपने परिवार का ज़िम्मा अपने कंधों पर लिया और इस फ़िल्मी दुनिया में पहली बार क़दम रखा। साल था १९४२ और फ़िल्म थी मास्टर विनायक की मराठी फ़िल्म 'पहली मंगलागौर', जिसमें उन्होने बाल कलाकार का एक चरित्र निभाया और इसी फ़िल्म में उनका पहला गीत भी रिकार्ड हुआ। इस मराठी गीत के बोल थे "सावन आला तरु तरु ला बांगू हिंदोला"। उसके बाद लता ने कुछ और फ़िल्मों में अभिनय किया और कुछ गानें भी गाए। किसी हिंदी फ़िल्म में उनका गाया पहला गीत था सन् १९४६ की फ़िल्म 'सुभद्रा' का, जिसमें उन्होने शांता आप्टे के साथ मिलकर गाया था "मैं खिली खिली फुलवारी", जिसके संगीतकार थे वसंत देसाई साहब और जिस फ़िल्म में लता ने अभिनय भी किया था। प्लेबैक की अगर बात करें तो किसी अभिनेत्री के लिए लता का गाया हुआ पहला गीत था १९४७ की फ़िल्म 'आपकी सेवा में' का "पा लागूँ कर जोरी रे, श्याम मोसे न खेलो होरी"। इसी साल, यानी कि १९४७ की आख़िर में एक गुमनाम फ़िल्म आयी थी 'आशा'। फ़िल्म कब आयी और कब गई पता ही नहीं चला। शायद देश विभाजन की अफ़रा-तफ़री में लोगों ने इस फ़िल्म की तरफ़ ध्यान नहीं दिया होगा! और इस फ़िल्म में लता का गाया गीत भी गुमनामी के अंधेरे में खो गया। आज लता जी पर केन्द्रित इस शृंखला की शुरुआत हम इसी फ़िल्म 'आशा' के एक गीत से कर रहे हैं। मेघानी निर्देशित इस फ़िल्म के नायक थे रामायण तिवारी। फ़िल्म के संगीतकार थे खेमचंद प्रकाश, जिन्होने लता को दिया था सही अर्थ में उनका पहला सुपरहिट गीत "आयेगा आनेवाला", फ़िल्म 'महल' में। तो लीजिए दोस्तों, फ़िल्म 'आशा' का गीत प्रस्तुत है, जिसके बोल हैं "दूर जाए रे राह मेरी आज तेरी राह से"। लेकिन हम यही कहेंगे कि हमारी राहों में लता जी की आवाज़ युगों युगों तक एक विशाल वट वृक्ष की तरह शीतल छाँव प्रदान करती रहेंगी, अपनी आवाज़ की अमृत गंगा से करोड़ों प्यासों की प्यास बुझाती रहेंगी... सदियों तक।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ३ अंकों की बढ़त पाने के लिए बूझिये लता का ये दुर्लभ गीत.
२. गीतकार हैं नजीम पानीपती.
३. मुखड़े की पहली पंक्ति में शब्द है -"आसरा".

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी शानदार वापसी है, बधाई....३ अंकों के सतह खाता खुला है आपका फिर एक बार. दिलीप जी आपने जिन दो गीतों का जिक्र किया है वो भी आपको जल्दी सुनवायेंगें. पूर्वी जी और पराग जी यदि शरद जी और स्वप्न जी इस स्तिथि से भी आप लोगों से आगे निकल जाते हैं तो ये वाकई शर्म की बात होगी, इसलिए कमर कस लीजिये....नाक मत काटने दीजियेगा :) अर्चना जी हर रोज नज़र आया करें....हम हाजरी रजिस्टर रखते हैं यहाँ

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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