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Sunday, May 5, 2013

रागमाला गीत- ‘काली घोड़ी द्वारे खड़ी...’




स्वरगोष्ठी – 119 में आज



रागों के रंग रागमाला गीत के संग – 5


विकसित होते प्रेम की अनुभूति कराता गीत ‘काली घोड़ी द्वारे खड़ी...’


संगीत-प्रेमियों की साप्ताहिक महफिल ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नये अंक का साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र पुनः उपस्थित हूँ। छठें और सातवें दशक की हिन्दी फिल्मों में कई उल्लेखनीय रागमाला गीतों की रचना हुई थी। नौवें दशक की फिल्मों में रागमाला गीतों की संख्या अपेक्षाकृत कम थी। ‘स्वरगोष्ठी’ के 114वें अंक में हमने आपको 1981 में प्रदर्शित फिल्म ‘उमराव जान’ से लिये गए रागमाला गीत का रसास्वादन कराया था। आज का रागमाला गीत इसी दशक अर्थात 1981 में ही बनी फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ से लिया गया है। इस गीत में मुख्य रूप से राग काफी का अत्यन्त आकर्षक आधार है। जबकि गीत के दूसरे अन्तरे में मालकौंस और तीसरे में भैरवी के स्वरों का भी प्रयोग किया गया है।

येसुदास
रागमाला गीतों में रागों का चयन और उनका क्रम एक निश्चित उद्देश्य से किया जाता है। लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीतों के संग’ के अन्तर्गत अब तक हम आपको ऐसे गीत सुनवा चुके हैं, जिनमें प्रहर के क्रम में अथवा ऋतु परिवर्तन के क्रम में रागों का चयन किया गया था। परन्तु आज हम आपको जो गीत सुनवा रहे हैं, उसमें रागो का चयन फिल्म के प्रसंग के अनुसार किया गया है। आज हम आपको 1981 में प्रदर्शित, मनोरंजक फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ से लिया गया एक रागमाला गीत सुनवाएँगे। सई परांजपे द्वारा निर्देशित यह लोकप्रिय कामेडी अपने परिवार से दूर, छात्रावास में रह कर पढ़ाई कर रहे तीन नौजवानों की कहानी है। इस फिल्म के गीत इन्दु जैन ने लिखे और इन्हें राजकमल ने संगीतबद्ध किये थे। ‘राजश्री’ की फिल्मों में अपने स्तरीय संगीत से पहचाने जाने वाले संगीतकार राजकमल ने फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ के गीतों में रागों का स्पर्श देकर उन्हें स्मरणीय बना दिया। अपने विद्यार्थी-जीवन में राजकमल एक कुशल तबला वादक थे। इसके अलावा लोक संगीत का भी उन्होने गहन अध्ययन किया था। लोक संगीत के अध्ययन के लिए उन्हें सरकारी छात्रवृत्ति भी मिली थी। ‘दोस्त और दुश्मन’ (1971) से अपने फिल्म संगीत के सफर की शुरुआत करने वाले राजकमल को पहली भव्य सफलता ‘राजश्री’ की फिल्म ‘सावन को आने दो’ (1979) में मिली। इस फिल्म के संगीत में पर्याप्त विविधता थी और गीतों में पारिवारिक अभिरुचि का समावेश भी था। रागों का सरल रूपान्तरण भी इनके संगीत के एक विशेषता रही है। फिल्म संगीत में रागों का ग्राह्य प्रयोग उन्होने 1981 की फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ में किया। इस फिल्म के अन्य मधुर गीतों के साथ एक रागमाला गीत- ‘काली घोड़ी द्वारे खड़ी...’ भी था, जिसे येसुदास और हेमन्ती शुक्ला ने स्वर दिया। कवयित्री इन्दु जैन ने इस गीत में चुहलबाजी से युक्त हास्य बुना है।

हेमन्ती शुक्ला
संगीतकार राजकमल ने इस गीत में मुख्य रूप से राग काफी का आधार दिया है। गीत के आधे से अधिक भाग अर्थात गीत का स्थायी और प्रथम दो अन्तरे राग काफी पर आधारित है। गीत के इस भाग का फिल्मांकन ‘सरगम संगीत विद्यालय’ की कक्षा में किया गया है, जहाँ नायिका (दीप्ति नवल) अपने संगीत-गुरु (विनोद नागपाल) से संगीत-शिक्षा प्राप्त कर रही है। स्थायी की पंक्ति में ‘काली घोड़ी’ शब्द का संकेत नायक (फारुख शेख) की दुपहिया (काले रंग की बाइक) की ओर है। इस पंक्ति के अर्थ है कि नायक अब नायिका के निकट आ चुका है। गीत के तीसरे अन्तरे की शुरुआत पहले सरगम और फिर ‘काली घोड़ी पे गोरा सैयाँ चमके...’ पंक्तियों से होती है। इस अन्तरे में राग मालकौंस के स्वरों का प्रयोग है। दृश्य के अनुसार नायिका सड़क पर बस के इन्तजार में खड़ी है, तभी नायक अपनी काली घोड़ी (बाइक) से आता है और उसे बैठा कर चल देता है। इस अन्तरे में ‘काली घोड़ी द्वारे खड़ी’ के स्थान पर ‘काली घोड़ी दौड़ पड़ी...’ शब्दावली का प्रयोग हुआ है। गीत का चौथा अन्तरा- 'लागी चुनरिया उड़ उड़ जाए...' राग भैरवी पर आधारित है। इस अन्तरे में नायक-नायिका के प्रेम को और प्रगाढ़ होते दिखाया गया है। इस प्रकार संगीतकार राजकमल ने प्रसंग के अनुकूल क्रमशः विकसित होते प्रेम सम्बन्धों की अनुभूति कराने के लिए राग काफी, मालकौंस और भैरवी रागों का प्रयोग किया है। फिल्मों के रागमाला गीतों में फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ का यह गीत बेहद मधुर और रोचक भी है। अब आप यह गीत सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

रागमाला गीत : फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ : ‘काली घोड़ी द्वारे खड़ी...’ : येसुदास और हेमन्ती शुक्ला



आज की पहेली 

‘स्वरगोष्ठी’ की 119वीं संगीत पहेली में हम आपको सातवें दशक की एक फिल्म के रागमाला गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको केवल इसी अंश से सम्बन्धित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 121वें अंक में हम सही उत्तर और विजेताओं के नामों की घोषणा करेंगे। 120वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता 122वें अंक में घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीतांश किस राग पर आधारित है?

2 – गीत के इस अंश में प्रयुक्त ताल का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 121वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 

‘स्वरगोष्ठी’ के 117वें अंक में हमने आपको 1963 में प्रदर्शित भोजपुरी फिल्म 'गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ाइबो' के शीर्षक गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दादरा और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- संगीतकार चित्रगुप्त। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।


झरोखा अगले अंक का 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीत के संग’ का आगामी अंक श्रृंखला का समापन अंक होगा। इस रागमाला गीत में चार रागों की उपस्थिति है और यह एक युगलगीत है। आप भी हमारे आगामी अंकों के लिए भारतीय शास्त्रीय, लोक अथवा फिल्म संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, December 9, 2012

'स्वरगोष्ठी' में ठुमरी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’



स्वरगोष्ठी-९९ में आज
फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – १०

विरहिणी नायिका की व्यथा : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’



‘स्वरगोष्ठी’ के ९९वें अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, शास्त्रीय, उप-शास्त्रीय और लोक संगीत पर केन्द्रित आपका यह प्रिय स्तम्भ दो सप्ताह बाद दो वर्ष पूरे करने जा रहा है। आगामी २३ और ३० दिसम्बर को हम आपके लिए दो विशेष अंक प्रस्तुत करेंगे। वर्ष के अन्तिम रविवार के अंक में हम इस वर्ष की पहेली के विजेताओं के नामों की घोषणा भी करेंगे। आपके लिए कुछ और सूचनाएँ है, जिन्हें हम समय-समय पर आपको देते रहेंगे। आइए, अब आरम्भ करते हैं, आज का अंक। आपको स्मरण ही होगा कि इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ जारी है। इस श्रृंखला की दसवीं कड़ी में आज हम आपके लिए लेकर आए हैं राग भैरवी अथवा सिन्धु भैरवी की विख्यात ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ के विविध प्रयोगों पर एक चर्चा। 


‘स्वरगोष्ठी’ के ९९वें अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, शास्त्रीय, उप-शास्त्रीय और लोक संगीत पर केन्द्रित आपका यह प्रिय स्तम्भ दो सप्ताह बाद दो वर्ष पूरे करने जा रहा है। आगामी २३ और ३० दिसम्बर को हम आपके लिए दो विशेष अंक प्रस्तुत करेंगे। वर्ष के अन्तिम रविवार के अंक में हम इस वर्ष की पहेली के विजेताओं के नामों की घोषणा भी करेंगे। आपके लिए कुछ और सूचनाएँ है, जिन्हें हम समय-समय पर आपको देते रहेंगे। आइए, अब आरम्भ करते हैं, आज का अंक। आपको स्मरण ही होगा कि इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ जारी है। इस श्रृंखला की दसवीं कड़ी में आज हम आपके लिए लेकर आए हैं राग भैरवी अथवा सिन्धु भैरवी की विख्यात ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ के विविध प्रयोगों पर एक चर्चा।

हमारी आज की ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ को सर्वाधिक प्रसिद्धि मिली, इसे उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वरों के योगदान से। उन्होने इस ठुमरी को अपना स्वर देकर कालजयी बना दिया। उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ का जन्म १९०२ में पराधीन भारत के पंजाब के कसूर में हुआ था जो अब पाक़िस्तान में है। उनके पिता अली बक्श ख़ान तत्कालीन पश्चिम पंजाब प्रान्त के एक संगीत परिवार से सम्बन्धित थे और ख़ुद भी एक जाने-माने गायक थे। बड़े ग़ुलाम अली जब ७ वर्ष के थे, तभी उन्होंने अपने चाचा काले खाँ से सारंगी वादन और गायन सीखना शुरु किया। काले ख़ाँ साहब के निधन के बाद बड़े ग़ुलाम अली अपने पिता से संगीत सीखते रहे। बड़े ग़ुलाम अली ने अपनी स्वर-यात्रा का आरम्भ सारंगी वादक के रूप में किया और कलकत्ता में आयोजित उनकी पहली संगीत-सभा में उन्हें लोकप्रियता मिली। ली। बाद में उन्होने अपनी गायन प्रतिभा से भी संगीत-प्रेमियों को प्रभावित किया। उनके गले की मिठास, गायकी का अंदाज़, हरकतें, सबकुछ मिलाकर उन्हें शीर्ष स्थान पर बिठा दिया। आइए, आज सबसे पहले उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वरों में सुनते हैं आज की ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’। 


ठुमरी भैरवी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ

 

श्रृंगार रस के विरह भाव को उकेरने में पूर्ण समर्थ इस ठुमरी को सुविख्यात गायिका पद्मा तलवलकर ने भी गाया है। २८ फरवरी, १९४८ को मुम्बई में जन्मीं पद्मा जी की संगीत-शिक्षा जयपुर, अतरौली घराने की प्राप्त हुई है, किन्तु उनके गायन में ग्वालियर और किराना गायकी की विशेषताएँ भी परिलक्षित होती हैं। उनका विवाह जाने-माने तबला-वादक पण्डित सुरेश तलवलकर से हुआ। इस संगीतज्ञ दम्पति की सन्तानें- पुत्र सत्यजीत और पुत्री सावनी, दोनों ही तबला-वादन में कुशल हैं। संगीत-शिक्षा के दौरान पद्मा जी को ‘भूलाभाई मेमोरियल ट्रस्ट’ की ओर से पाँच वर्ष तक छात्रवृत्ति प्राप्त हुई थी। बाद में उन्हें ‘नेशनल सेण्टर फॉर पर्फ़ोर्मिंग आर्ट्स’ द्वारा दो वर्ष के लिए फ़ेलोशिप भी मिली थी। उन्हें वर्ष २००४ में पण्डित जसराज गौरव पुरस्कार, २००९ में श्रीमती वत्सलाबाई भीमसेन जोशी पुरस्कार तथा २०१० में राजहंस प्रतिष्ठान पुरस्कार से अलंकृत किया गया। इन्हीं प्रतिभावान गायिका के स्वरों में अब आप भैरवी की इस ठुमरी का आनन्द लीजिए-


ठुमरी भैरवी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : विदुषी पद्मा तलवलकर




आज हमारी चर्चा में जो ठुमरी है, उसे अनेक गायक-गायिकाओं ने अलग-अलग ढंग से गाया है। वर्तमान में भारतीय संगीत की हर शैली पर समान रूप से अधिकार रखने वाले संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती ने भी अनेक अवसरों पर इस ठुमरी को प्रस्तुत किया है। उनके स्वरों में ढल कर इस ठुमरी का एक अलग रंग निखरता है। आज के अंक में हम उनकी आवाज़ में भी यह ठुमरी सुनवा रहे हैं। अजय जी को पटियाला, कसूर घराने की संगीत-शिक्षा उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के सुपुत्र उस्ताद मुनव्वर अली खाँ से प्राप्त हुई है। इससे पूर्व अजय जी की प्रारम्भिक शिक्षा उनके पिता पं. अजीत चक्रवर्ती से, बाद में कालीदास वैरागी और पं. ज्ञानप्रकाश घोष से प्राप्त हुई। पण्डित अजय चक्रवर्ती पहले ऐसे संगीत-साधक हैं, जिन्हें पाकिस्तान आमंत्रित किया गया और उन्हें राष्ट्रपति सम्मान से नवाजा गया था। एक संगीत-सभा में इस ठुमरी की प्रस्तुति के दौरान पण्डित अजय चक्रवर्ती ने वर्तमान गजल गायकी, राग भैरवी के विभिन्न रूप तथा पटियाला घराने की गायकी के बारे में कुछ चर्चा की है। संगीत के विद्यार्थियों के लिए यह प्रस्तुति लाभकारी होगी। आइए, सुनते है, पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वरों में भैरवी की यही ठुमरी। 


ठुमरी भैरवी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : पण्डित अजय चक्रवर्ती



वर्ष १९७७ वासु चटर्जी की फिल्म ‘स्वामी’ प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म के संगीतकार राजेश रोशन थे। उन्होने फिल्म के एक प्रसंग में भैरवी की इस पारम्परिक ठुमरी का उपयोग किया था। परन्तु ठुमरी के इस फिल्मी स्वरूप में भैरवी के अलावा बीच-बीच में कुछ अन्य रागों- जोगिया, पीलू आदि की अनुभूति भी होती है। सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक येसुदास ने इस ठुमरी को बड़े नर्म और भावपूर्ण अंदाज में गाया है। राजेश रोशन के पिता, संगीतकार रोशन ने अपने समय की फिल्मों में पारम्परिक खयाल, ठुमरी आदि का भरपूर उपयोग किया था। फिल्म ‘स्वामी’ में इस ठुमरी को शामिल करने की प्रेरणा राजेश को सम्भवतः अपने पिता से मिली हो। ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ के इस फिल्मी रूप का आनन्द आप भी लीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

फिल्म – स्वामी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : येसुदास



आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ पर आज की संगीत पहेली में एक बार फिर हम आपको एक बेहद लोकप्रिय ठुमरी का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के सौवें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही वर्ष २०१२ की पाँचों श्रृंखलाओं में सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रथम तीन विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से पुरस्कृत भी किया जाएगा।



१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह ठुमरी किस राग में निबद्ध है?
२ – इस पारम्परिक ठुमरी को आठवें दशक की एक फिल्म में भी शामिल किया गया था। उस फिल्म के संगीतकार कौन थे?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के १०१वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता 


 
‘स्वरगोष्ठी’ के ९७वें अंक में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायिका इकबाल बानो के स्वर में ठुमरी ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग पीलू और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग देस। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से बधाई।

झरोखा अगले अंक का



 मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के आगामी अंक सौवाँ अंक होगा और यह हमारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ का समापन अंक भी होगा। इस अंक में हम आपके लिए श्रृंगार रस की अत्यन्त मोहक ठुमरी प्रस्तुत करेंगे। जनवरी, २०१३ से हम आपके सुझावों और फरमाइशों के आधार पर आपके प्रिय कार्यक्रमों में बदलाव कर रहे हैं। आप अपने सुझाव १५ दिसम्बर तक अवश्य भेज दें। अगले अंक में रविवार को प्रातः ९-३० बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सब संगीत-रसिकों की हम प्रतीक्षा करेंगे। 

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Tuesday, March 22, 2011

कहाँ से आये बदरा....एक से बढ़कर एक खूबसूरत फ़िल्में दी सशक्त निर्देशिका साईं परांजपे ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 618/2010/318

पार्श्वगायन को छोड़ कर हिंदी फ़िल्म निर्माण के अन्य सभी क्षेत्रों में पुरुषों का ही शुरु से दबदबा रहा है। लेकिन कुछ साहसी और सशक्त महिलाओं नें फ़िल्म निर्माण के सभी क्षेत्रों में क़दम रखा और दूसरों के लिए राह आसान बनायी. ऐसी ही कुछ महत्वपूर्ण महिला कलाकारों को समर्पित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला 'कोमल है कमज़ोर नहीं' में आप सब का हम फिर एक बार स्वागत करते हैं। कल की कड़ी में हमने बातें की मशहूर लेखिका इस्मत चुगताई की, और आज बातें फिर एक बार एक लेखि्का व निर्देशिका की। इन्होंने अपनी कलम को अपना 'साज़' बनाकर ऐसी 'कथा' लिखीं कि वह न केवल सब के मन को 'स्पर्श' कर गईं बल्कि फ़िल्म निर्माण को भी एक नई 'दिशा' दी। उनकी लाजवाब फ़िल्मों को देख कर केवल पढ़े लिखे लोग ही नहीं, बल्कि 'अंगूठा-छाप' लोगों ने भी एक स्वर कहा 'चश्म-ए-बद्दूर'!!! जी हाँ, हम आज बात कर रहे हैं साईं परांजपे की। १९ मार्च १९३८ को लखनऊ मे जन्मीं साईं के पिता थे रशियन वाटरकलर आर्टिस्ट यूरा स्लेप्ट्ज़ोफ़, और उनकी माँ थीं शकुंतला परांजपे, जो ३० और ४० के दशक की हिंदी और मराठी सिनेमा की जानीमानी अभिनेत्री थीं। वी. शांताराम की मशहूर फ़िल्म 'दुनिया न माने' में भी शकुंतला जी ने अभिनय किया था। बाद में शकुंतला जी एक लेखिका व समाज सेविका बनीं और राज्य सभा के लिए भी मनोनीत हुईं। वो १९९१ में पद्मभूषण से सम्मानित की गई। दुर्भाग्यवश सई के जन्म के कुछ दिनों में ही उनके माता-पिता अलग हो गए और सई को उनकी माँ ने बड़ा किया अपने पिता श्री आर. पी. परांजपे के घर में, जो एक प्रसिद्ध गणितज्ञ और शिक्षाविद थे। इस तरह से साईं को बहुत अच्छी शिक्षा मिली और कई शहरों में रहने का मौका भी मिला, जिनमें पुणे का नाम उल्लेखनीय है। बचपन में सई अपने चाचा अच्युत राणाडे के पास जाया करतीं, जो ४० और ५० के दशकों के जानेमाने फ़िल्मकार थे। उन्हीं से साईं को पटकथा लेखन की पहली शिक्षा मिली। साईं ने भी लिखना शुरु किया और केवल आठ वर्ष की आयु में उनकी पहली पुस्तक 'मूलांचा मेवा' (मराठी) प्रकाशित हुई। १९६३ में साईं ने 'नैशनल स्कूल ऒफ़ ड्रामा' से स्नातक की डिग्री प्राप्त की।

साईं परांजपे का करीयर आकाशवाणी पुणे से आरंभ हुआ बतौर उद्घोषिका, और जल्दी ही वहाँ के बाल-कार्यक्रम के माध्यम से लोकप्रियता हासिल कर लीं। साईं ने अपने करीयर में मराठी, हिंदी और अंग्रेज़ी में बहुत से नाटक लिखे और निर्देशित कीं। सई नें न केवल फ़ीचर फ़िल्मों का निर्माण किया बल्कि बच्चों की फ़िल्में और वृत्तचित्रों का भी निर्माण व निर्देशन किया। उनकी लिखी किताबों में ६ किताबों को राष्ट्रीय या राज्य स्तर के पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। दूरदर्शन के लिए साईं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया और कई वर्षों तक बतौर प्रोड्युसर व डिरेक्टर जुड़ी रहीं। टीवी के लिए उनकी पहली फ़िल्म 'दि लिट्ल टी शॊप' को तेहरान में 'एशियन ब्रॊडकास्टिंग् युनियन अवार्ड' से सम्मानित किया गया था। बम्बई दूरदर्शन के सर्वप्रथम कार्यक्रम को प्रोड्युस करने का दायित्व उन्हें ही दिया गया था, जो उनके लिए बड़ा सम्मान था। ७० के दशक में साईं को दो बार 'चिल्ड्रेन फ़िल्म सोसायटी ऒफ़ इण्डिया' के सचिव के लिए चुना गया, और उस दौरान उन्होंने चार बाल-फ़िल्में बनाईं, जिनमें 'जादू का शंख' और 'सिकंदर' को पुरस्कृत किया गया था। उनकी पहली फ़ीचर फ़िल्म 'स्पर्श' (१९८०) को उस साल राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ साथ अन्य पाँच पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया था। 'स्पर्श' के बाद दो हस्य फ़िल्में उन्होंने बनाईं - 'चश्म-ए-बद्दूर' (१९८१) और 'कथा' (१९८२)। उन्होंने १९८४ में 'अड़ोस-पड़ोस' और १९८५ में 'छोटे-बड़े' जैसी टीवी सीरियल्स बनाये। उनकी अन्य फ़िल्मों में शामिल हैं - 'अंगूठा छाप' (राष्ट्रीय साक्षरता मिशन पर केन्द्रित), 'दिशा' (स्थानांतरित मज़दूरों पर केन्द्रित), 'पपीहा' (जंगल पर केन्द्रित), 'साज़' (दो गायिका बहनों के जीवन की कहानी पर केन्द्रित), और 'चकाचक' (वातावरण-दूषण पर केन्द्रित)। इस तरह से साईं परांजपे एक ऐसी फ़िल्मकार हैं जिन्होंने हमेशा ही अर्थपूर्ण फ़िल्में बनाईं हैं। सन् २००६ में भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया। आइए आज उनको सलाम करते हुए सुनते हैं फ़िल्म 'चश्म-ए-बद्दूर' से एक बड़ा ही मशहूर गीत "कहाँ से आये बदरा, घुलता जाये कजरा"। हमनें इस गीत को इसलिए भी चुना क्योंकि इस गीत को लिखा है एक महिला गीतकार नें। इंदु जैन ने इस गीत को लिखा है और संगीत दिया है राजकमल साहब नें। युगल आवाज़ें हैं हेमंती शुक्ला और येसुदास के। महिला गीतकारों की अगर बात करें तो एक और नाम जो याद आता है, वह है माया गोविंद जी का। तो दोस्तों, 'कोमल है कमज़ोर नहीं' की आज की कड़ी में हमनें जिन महिला कलाकारों का नाम लिया, वो हैं साईं परांजपे, शकुंतला परांजपे , इंदु जैन, माया गोविंद और हेमंती शुक्ला। सुनते हैं राग वृंदावनी सारंग पर आधारित इस सुमधुर गीत को।



क्या आप जानते हैं...
१९९३ में साईं परांजपे की फ़िल्म 'चूड़ियाँ' को 'National Film Award for Best Film on Social Issues' से सम्मानित किया गया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 09/शृंखला 12
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - नारी शक्ति की आवाज़ भी है ये गीत.

सवाल १ - हालाँकि एक मशहूर गायिका पे केंद्रित है ये कड़ी, पर इस फिल्म की नायिका का भी इसमें सम्मान है, कौन है ये जबरदस्त लाजवाब अभिनेत्री - ३ अंक
सवाल २ - गीतकार कौन हैं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म के निर्देशक कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अवध जी २ अंको की बधाई के साथ जानकारी देने का आभार, अमित जी और अंजाना जी तो हैं ही सदाबहार

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, November 17, 2010

कोई गाता मैं सो जाता....जब हरिवंश राय बच्चन के नाज़ुक बोलों को मिला येसुदास का स्वर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 529/2010/229

लाहाबाद के पास स्थित प्रतापगढ़ ज़िले के रानीगंज के बाबूपट्टी में एक कायस्थ परिवार में जन्म हुआ था प्रताप नारायण श्रिवास्तव और सरस्वती देवी के पुत्र का। घर पर प्यार से उन्हें 'बच्चन' कह कर पुकारते थे, जिसका अर्थ है "बच्चे जैसा"। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और स्वागत है 'दिल की कलम से' शृंखला की इस कड़ी में। पहली लाइन को पढ़कर आप समझ चुके होंगे कि आज जिस साहित्यकार की चर्चा हम कर रहे हैं, वो और कोई नहीं डॊ. हरिवंशराय बच्चन हैं। हरिवंशराय की शिक्षा एक स्थानीय म्युनिसिपल स्कूल में हुई और अपने पारिवारिक परम्परा को बनाये रखते हुए कायस्थ पाठशाला में उर्दू सीखने लगे। बाद में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू युनिवर्सिटी से भी शिक्षा अर्जित की। इसी दौरान वो स्वाधीनता संग्राम से जुड़ गये, महात्मा गांधी के नेतृत्व में। उन्हें यह अहसास हुआ कि यह राह वो राह नहीं जिस पर उन्हें आगे चलना है। इसलिए वो विश्वविद्यालय वापस चले गए। १९४१ से १९५२ तक वो इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी पढ़ाते रहे, और उसके बाद दो साल कैम्ब्रिज युनिवर्सिटी में पी.एच.डी की। और तभी से उन्होंने अपने नाम से 'श्रीवस्तव' को हटाकर 'बच्चन' लिखना शुर कर दिया। कैम्ब्रिज से डॊक्टोरेट की डिग्री पाने वाले वो द्वितीय भारतीय बने। भारत लौटने के बाद वो फिर से अध्यापना से जुड़ गये और आकाशवाणी के इलहाबाद केन्द्र की भी सेवा की। १९२६ में, केवल १९ वर्ष की आयु में हरिवंशराय बच्चन ने विवाह किया श्यामा से, जो १४ वर्ष की थीं। लेकिन १९३६ में श्यामा की अकालमृत्यु के बाद १९४१ में हरिवंशराय जी ने तेजी सूरी से विवाह किया, जो एक सिख परिवार से ताल्लुख़ रखती थीं। इस विवाह से उन्हें दो पुत्र हुए - अमिताभ और अजिताभ। ९५ वर्ष की आयु में हरिवंशराय बच्चन १८ जनवरी २००३ को इस दुनिया से चले गये। सम्मान और पुरस्कारों की बात करें तो १९६६ में उन्हें राज्य सभा के लिए मनोनीत किया गया था और १९६९ में उन्हें सर्वोच्च साहित्य सम्मान 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। १९७६ में पद्म भूषण और 'सरस्वती सम्मान' से सम्मानित हुए १९९४ में 'यश भारती सम्मान' से उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार ने नवाज़ा। उन्हें 'सोवियत लैण्ड नेहरु अवार्ड' और 'लोटस अवार्ड ऒफ़ दि अफ़्रो-एशियन राइटर्स कॊनफ़रेन्स' भी प्राप्त है। उनकी याद और सम्मान में सन २००३ में एक डाक टिकट भी जारी किया गया है।

हरिवंशराय बच्चन की साहित्यिक कृतियों की चर्चा करने लगे तो कई कई पन्ने लग जाएँगे। इसलिए यहाँ पर उनकी कुछ प्रमुख रचनाओं की ही बात करते हैं। उनकी कृति 'मधुशाला' हिंदी साहित्य में एक इतिहास बना चुकी है। जब भी वो स्टेज पर अपनी 'मधुशाला' पाठ करते, श्रोतागण उसमें पूरी तरह से खो जाते और उसकी बहाव में बह जाते। उमर ख़य्याम की रुबाइयात से प्रेरीत होकर डॊ. बच्चन ने 'मधुशाला' के बाद 'मधुबाला' और 'मधुकलश' नामक कविताओं की रचना की। उनकी जानी मानी कृतियों में शामिल है इनका भागवद गीता का अवधी और हिंदी में अनुवाद। अब हिंदी फ़िल्म संगीत की बात करें तो कुछ गिने चुने फ़िल्मों में उनके गीत आये हैं। शायद ही कोई होली ऐसी गई हो कि जिस दिन हरिवंशराय का लिखा और उन्हीं के सुपुत्र अमिताभ बच्चन का गाया फ़िल्म 'सिलसिला' का गीत "रंग बरसे भीगे चुनरवाली रंग बरसे" हमें सुनाई ना दिया हो। फ़िल्म 'बदनाम बस्ती' में "मेले में खोई गुजारिया" गीत को स्वयं हरिवंशराय ने गाया था। और फ़िल्म 'आलाप' में भी उन्होंने एक बड़ा ही कोमल गीत लिखा था, "कोई गाता मैं सो जाता", जिसे येसुदास ने भी उसी मख़मली अंदाज़-ओ-आवाज़ में गाया। आइए आज हरिवंशराय बच्चन की याद में इसी गीत को सुना जाए। जयदेव का संगीत है इसमें और इस फ़िल्म के बाकी डिटेल्स आप प्राप्त कर सकते हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की ३११ वीं कड़ी में जिस दिन हमने येसुदास को जनमदिवस की बधाई स्वरूप इसी फ़िल्म का "चांद अकेला जाये सखी री" सुनवाया था। तो आइए सुनते हैं आज का गीत...



क्या आप जानते हैं...
कि हरिवंशराय बच्चन की लिखी कविता 'अग्निपथ' पर ही ९० के दशक का वह ब्लॊकबस्टर फ़िल्म बनी थी, जिसमें अभिनय कर अमिताभ बच्चन को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। पूरे फ़िल्म में अमिताभ बच्चन को इस कविता का पाठ करते देखा व सुना गया।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली १० /शृंखला ०३
ये प्रिल्यूड है गीत का -


अतिरिक्त सूत्र - इस गीत में अभिनेत्री के बचते हुए दिखते है शत्रुघ्न सिन्हा.

सवाल १ - कवि / गीतकार का नाम बताएं - २ अंक
सवाल २ - अभिनेत्री का नाम बताएं - २ अंक
सवाल ३ - संगीतकार बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्याम कान्त जी ने अजय बढ़त बना ली है. बहुत बधाई. शंकर लाल जी बहुत दिनों बाद नज़र आये.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, August 23, 2010

सुरमई अंखियों में नन्हा मुन्ना एक सपना दे जा रे.....एक स्वर्ग से उतरी लोरी, येसुदास की पाक आवाज़ में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 467/2010/167

च्चों के साथ गुलज़ार साहब का पुराना नाता रहा है। गुलज़ार साहब को बच्चे बेहद पसंद है, और समय समय पर उनके लिए कुछ यादगार गानें भी लिखे हैं बिल्कुल बच्चों वाले अंदाज़ में ही। मसलन "लकड़ी की काठी", "सा रे के सा रे ग म को लेकर गाते चले", "मास्टरजी की आ गई चिट्ठी", आदि। बच्चों के लिए उनके लिखे गीतों और कहानियों में तितलियाँ नृत्य करते हैं, पंछियाँ गीत गाते हैं, बच्चे शैतानी करते है। जीवन के चिर परिचीत पहलुओं और संसार की उन जानी पहचानी ध्वनियों की अनुगूंज सुनाई देती है गुलज़ार के गीतों में। बच्चों के गीतों की बात करें तो एक जौनर इसमें लोरियों का भी होता है। गुलज़ार साहब के लिखे लोरियों की बात करें तो दो लोरियाँ उन्होंने ऐसी लिखी है कि जो कालजयी बन कर रह गई हैं। एक तो है फ़िल्म 'मासूम' का "दो नैना और एक कहानी", जिसे गा कर आरती मुखर्जी ने फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीता था, और दूसरी लोरी है फ़िल्म 'सदमा' का "सुरमयी अखियों में नन्हा मुन्ना एक सपना दे जा रे"। येसुदास की नर्म मख़मली आवाज़ में यह लोरी जब भी सुनें दिल को एक सुकून दे जाती है। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इसी लोरी की बारी। हालाँकि हमने बच्चों की बात की, लेकिन आपको पता होगा कि फ़िल्म 'सदमा' में यह लोरी किसी बच्चे को सुलाने के लिए नहीं, बल्कि कमल हासन दिमागी तौर पर असंतुलित श्रीदेवी को सुलाने के लिए गा रहे होते हैं। 'सदमा' फ़िल्म आप में से अधिकतर लोगों ने देखी होगी, और देखनी भी चाहिए। यह भी हिंदी सिनेमा की एक क्लासिक फ़िल्म है जिसकी तारीफ़ जितनी भी की जाए कम है। 'सदमा' का निर्माण किया था राज एन. सिप्पी और रोमू एन. सिप्पी ने, कहानी, निर्देशन, स्क्रीनप्ले और सिनेमाटोग्राफ़ी था बालू महेन्द्र का। गुलज़ार साहब ने फ़िल्म के संवाद और गीत लिखे। फ़िल्म में संगीत था इलैयाराजा का। फ़िल्म की कहानी जितनी मर्मस्पर्शी थी, उतने ही मर्मस्पर्शी अभिनय से परदे पर इसे साकार किया कमल हासन और श्रीदेवी ने। फ़िल्म का वह रेल्वे स्टेशन का अंतिम सीन जैसे भुलाए नहीं भूलता!

आज हम गुलज़ार साहब द्वारा प्रस्तुत विशेष जयमाला कार्यक्रम का एक शुरुआती अंश पेश कर रहे हैं जिसमें गुलज़ार साहब फ़ौजी भाइयों से मुख़ातिब कुछ दिल की बातें शेयर कर रहे हैं, और जिन्हे पढ़ते हुए आपको अंदाज़ा होता रहेगा गुलज़ार साहब के वर्सेटायलिटी का। "फ़ौजी भाइयों, आदाब! बहुत दिन बाद फिर आपकी महफ़िल में शामिल हो रहा हूँ। इससे पहले जब भी आपके पास आया तो कोई ना कोई नई तरक़ीब, कोई ना कोई नई आग़ाश लेकर गानों की, जिसमें मैंने कई तरह के गानें आपको सुनाए, जैसे रेल की पटरी पर चलते हुए गानें सुनाए थे एक बार, वो तमाम गानें जिनमें रेल के पटरी की आवाज़ सुनाई देती है। और एक बार आम आदमी के मसलों पर गाने आपको सुनाए जो लक्ष्मण के कारटूनों जैसे लगते हैं। लेकिन मज़ाक के पीछे कहीं बहुत गहरे बहुत संजीदे दर्द भरे हुए हैं इन गानों में। बच्चों के साथ गाए गानें भी आपको सुनाए, खेलते कूदते हुए गानें, लोरियाँ सुनाए आपको। और बहुत से दोस्तों की चिट्ठियाँ जब आई, चाहने वालों की चिट्ठियाँ आई, जिनमें शिकायतें भी, गिले भी, शिकवे भी। उनमें एक बात बहुत से दोस्तों ने कही कि हर बार आप कुछ मज़ाक करके, हंस हंसाकर रेडियो से चले जाते हैं, जितनी बार आप आते हैं, हर बार हम आप से कुछ संजीदा बातें सुनना चाहते हैं, कि संजीदा सिचुएशन्स पर आप कैसे लिखते हैं, क्या लिखते हैं, और हाँ, ये किसी ने नहीं कहा कि क्यों लिखते हैं। फ़ौजी भाइयों, आप तो वतन की सरहदों पर बैठे हैं, और मैं आपको बहलाते हुए आपके परिवारों को भी बहलाने की कोशिश करता रहता हूँ। हाँ, उन सरहदों की बात कभी नहीं करता जो दिलों में पैदा हो जाती हैं। कभी जुड़ती हुई, कभी टूटती हुई, कभी बनती हुई, गुम होती हुई सरहदें, या सिर्फ़ हदें। इस तरह के रिश्ते सभी के ज़िंदगी से गुज़रते हैं, वो ज़िंदगी जिसे एक सुबह एक मोड़ पर देखा था तो कहा था, हाथ मिला ऐ ज़िंदगी, आँख मिलाकर बात कर।" दोस्तों, कुछ ऐसी ही बात फ़िल्म 'सदमा' के एक दूसरे गीत में गुलज़ार साहब ने लिखा था। याद आया "ऐ ज़िंदगी गले लगा ले"? इस गीत को भी हम आगे चलकर ज़रूर सुनवाएँगे कभी। आज अभी के लिए आइए सुनते हैं येसुदास की गाई लोरी, लेकिन ध्यान रहे कहीं सो मत जाइएगा...



क्या आप जानते हैं...
कि गुलज़ार साहब की पत्नी और अभिनेत्री राखी का जन्म तारीख है १५ अगस्त १९४७, यानी कि जिस दिन भारत को आज़ादी मिली थी।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. ये दर्द भरा गीत किस गायक की आवाज़ में हैं - २ अंक.
२. ये फिल्माया गया गया है धर्मेन्द्र पर. फिल्म की नायिका बताएं - ३ अंक.
३. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से - "चमन", फिल्म बताएं - १ अंक.
४ संगीतकार बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी विजय लक्ष्य के करीब है और अवध जी भी सही चल रहे हैं. प्रतिभा और किशोर जी की जोड़ी सही जवाबों के साथ हाज़िर हो रही हैं. कनाडा वाले हमारे सभी बंधुओं से गुजारिश है कि अपने बारे में कुछ परिचय स्वरुप सबके साथ बांटिय, अब आप इस ओल्ड इस गोल्ड परिवार का हिस्सा हैं अब

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, January 11, 2010

चाँद अकेला जाए सखी री....येसुदास की मधुर आवाज़ और जयदेव का संगीत, इससे बेहतर क्या होगा...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 311/2010/11

नवरी का महीना फ़िल्म संगीत जगत के लिए एक ऐसा महीना है जिसमें अनेक कलाकारों के जन्मदिवस तथा पुण्यतिथि पड़ती है। इस साल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की शुरुआत हमने की पंचम यानी कि राहुल देव बर्मन के पुण्यतिथि को केन्द्रित कर उन पर आयोजित लघु शृखला 'पंचम के दस रंग' के ज़रिए, जो कल ही पूर्णता को प्राप्त हुई है। पंचम के अलावा जनवरी के महीने में और भी बहुत सारे संगीतकारों, गीतकारों और गायकों के जन्मदिन व स्मृतिदिवस हैं, तो हमने सोचा कि क्यों ना दस अंकों की एक ख़ास लघु शृंखला चलाई जाए जिसमें ऐसे कलाकारों को याद कर उनके एक एक गीत सुनवा दिए जाएँ और उनसे जुड़ी कुछ बातें भी की जाए। तो लीजिए प्रस्तुत है आज, यानी ११ जनवरी से लेकर २० जनवरी तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की ख़ास शृंखला 'स्वरांजली'। दोस्तों, आज है ११ जनवरी। और कल, यानी कि १० जनवरी को था हिंदी और दक्षिण भारत के सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक यशुदास जी का जनमदिन। जी हाँ, यशुदास, जिनका नाम कई जगह बतौर जेसुदास भी दिखाई दे जाता है। तो हम यशुदास जी को कहते हैं 'बिलेटेड हैप्पी बर्थडे'!!! पद्मभूषण डॊ. कट्टास्सरी जॊसेफ़ यशुदास (Kattassery Joseph) का जन्म १० जनवरी १९४० को कोचिन में पिता Augustine Joseph और माँ Alicekutty के घर हुआ था। यशुदस के बारे में विस्तृत जानकारी आप उनकी वेबसाइट पर प्राप्त कर सकते हैं। हम यहाँ बस इतना ही कहेंगे कि उन्होने भारतीय और विदेशी भाषाओं में कुल ४०,००० से उपर गानें गाए हैं। उन्हे ७ बार सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक के राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं जो किसी पार्श्वगायक के लिए सब से अधिक बार है। मलयालम के कई फ़िल्मों में उन्होने बतौर संगीतकार भी काम किया है और उन्हे वहाँ 'गान गधर्व' के नाम से संबोधित किया जाता है।

दोस्तों, यशुदास एक ऐसे गायक हैं जिनका स्तर बहुत ऊँचा है। ७० के दशक के अंतिम भाग से लेकर ९० के दशक के शुरआती सालों तक उन्होने हिंदी फ़िल्म जगत में बेहतरीन से बेहतरीन गानें गाए हैं। दक्षिण में उनके गाए गीतों की संख्या तो भूल ही जाइए। और सब से बड़ी बात यह कि हिंदी फ़िल्मों के लिए उन्होने जितने भी गानें गाए हैं, उनका स्कोर १००% रहा है। यानी कि उनका हर गीत सुरीला है, कभी भी उन्होने कोई सस्ता गीत नहीं गाया, कभी भी व्यावसायिक्ता के होड़ में आकर अपने स्तर को गिरने नहीं दिया। आज जब हम उनके गाए गीतों को याद करते हैं, तो हर गीत लाजवाब, हर गीत बेमिसाल पाते हैं। शास्त्रीय और लोक संगीत पर आधारित गानें उनसे ज़्यादा गवाए गये हैं। और आज के लिए हमने एक बहुत ही ख़ूबसूरत सा गीत चुना है शास्त्रीय रंग में ढला हुआ। फ़िल्म का नाम है 'आलाप' और गाने के बोल हैं "चांद अकेला जाए सखी री"। फ़िल्म 'आलाप' १९७७ की फ़िल्म थी जिसका निर्माण किया था ऋषिकेश मुखर्जी और एन. सी. सिप्पी ने। ऋषि दा की ही कहानी थी और उन्ही का निर्देशन था। अमिताभ बच्चन, रेखा, छाया देवी और ओम प्रकाश जैसे स्टार कास्ट के होते हुए, और ऋषि दा जैसे निर्देशक और कहानीकार के होने के बावजूद यह फ़िल्म बुरी तरह से फ़्लॊप हुई। ऐसा सुनने में आता है कि फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद 'मोहन स्टुडियो' में १५ अप्रैल १९७७ के दिन फ़िल्म के कुछ अंश दोबारा फ़िल्माए गए, लेकिन फिर भी वो फ़िल्म के क़िस्मत को नहीं बदल सके। आज अगर यह फ़िल्म याद की जाती है तो बस इसके गीतों की वजह से। संगीतकार जयदेव का सुरीला संगीत इस फ़िल्म में सुनाई देता है जो शास्त्रीय संगीत पर आधारित है। दोस्तों, जयदेव जी की भी पुण्य तिथि इसी महीने की ६ तारीख़ को थी। आगे चलकर इस शृंखला में हम उन्हे भी अलग से अपनी स्वरांजली अर्पित करेंगे। डॊ. राही मासूम रज़ा ने फ़िल्म 'आलाप' के संवाद लिखने के साथ साथ फ़िल्म के गानें भी लिखे, सिवाय एक गीत के ("कोई गाता मैं सो जाता") जिसे डॊ. हरिवंशराय बच्चन ने लिखा था। फ़िल्म के ज़्यादातर गानें यशुदास ने ही गाए, एक गीत भुपेन्द्र की आवाज़ में था। गायिकाओं में लता मंगेशकर, दिलराज कौर, और शास्त्रीय गायिकाएँ कुमारी फ़य्याज़ और मधुरानी की आवाज़ें शामिल थीं। फ़िल्म की कहानी पिता पुत्र के आपस के मतभेद को लेकर था। जहाँ पुत्र को गीत संगीत का शौक है और उसी दिशा में आगे बढ़्ना चाहता है, वहीं उद्योगपति पिता चाहता है कि बेटा उन्ही की राह पर चले। बस इसी के इर्द गिर्द घूमती है कहानी। तो आइए, अब इस सुमधुर गीत का आनंद उठाया जाए। चलते चलते आपको यह बता दें कि फ़िल्म 'आलाप' समर्पित किया गया था गायक मुकेश की पुण्यस्मृति को जिनका इस फ़िल्म के रिलीज़ के कुछ महीनें पहले अमरीका में निधन हो गया था। तो दोस्तों, आज यशुदास जी को उनकी ७१ वीं वर्षगांठ पर बधाइयाँ देने के साथ साथ स्वर्गीय मुकेश जी को भी हम अर्पित कर रहे हैं हमारी स्वरांजली।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

बिछड गयी खुशबू पवन से,
रूखी धूल उड़े रे,
मुरझे फूल करे क्या गुजारा,
हंसना भूल गए रे....

अतिरिक्त सूत्र- इस गीत के माध्यम से हम याद करेंगें उस संगीतकार को जिनकी पुण्यतिथि इस माह की ५ तारीख को थी.

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी, फिर एक बार आपको एक ही अंक मिलेगा, आज की पहेली में मौका दीजिए किसी और को जीतने का ताकि अगले जवाब के साथ आपको फिर २ अंक मिले, वैसे आपकी याददाश्त का जवाब नहीं, इस पहेली को सुलझाना आसान नहीं था, बधाई...

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, December 4, 2008

सुनिए सलिल दा के अन्तिम संगीत रचनायों में से एक, फ़िल्म "स्वामी विवेकानंद" के गीत

पिछले दिनों सलिल दा पे लिखी हमारी पोस्ट के जवाब में हमारे एक नियमित श्रोता ने हमसे गुजारिश की सलिल दा के अन्तिम दिनों में की गई फिल्मों में से एक "स्वामी विवेकानंद" के गीतों को उपलब्ध करवाने की. सलिल दा के अन्तिम दिनों में किए गए कामों की बहुत कम चर्चा हुई है. स्वामी के जीवन पर आधारित इस फ़िल्म में सलिल दा ने ८ गीत स्वरबद्ध किए. ख़ुद स्वामी के लिखे कुछ गीत हैं इसमें तो कबीर, जयदेव और सूरदास के बोलों को भी स्वरों का जामा पहनाया है सलिल दा ने.दो गीत गुलज़ार साहब ने लिखे हैं जिसमें के जे येसुदास का गाया बेहद खूबसूरत "चलो मन" भी शामिल है. गुलज़ार के ही लिखे एक और गीत "जाना है जाना है..." को अंतरा चौधरी ने अपनी आवाज़ दी है. अंतरा की आवाज़ में बहुत कम हिन्दी गीत सुनने को मिले हैं, इस वजह से भी ये गीत हमें बेहद दुर्लभ लगा. एक और विशेष बात इस फ़िल्म के बारे में ये है कि सलिल दा अपनी हर फ़िल्म का जिसमें भी वो संगीत देते थे, पार्श्व संगीत भी वो ख़ुद ही रचते थे. पर इस फ़िल्म के मुक्कमल होने से पहले ही दा हम सब को छोड़ कर चले गए. विजय भास्कर राव ने इस फ़िल्म का पार्श्व संगीत दिया. जानकारी के लिए बता दें कि "स्वामी विवेकानंद" के आलावा मात्र एक बांग्ला फ़िल्म है (रात्रि भोर) जिसमें सलिल दा गीतों को स्वरबद्ध करने के साथ साथ फ़िल्म के पार्श्व संगीत में अपना योगदान नही दिया. पार्श्व संगीत में उनका दखल भी इसी बात की तरफ़ इशारा करता है कि वो मुक्कमल "शो मैन" संगीतकार थे, जो दृश्य और श्रवण की बेमिसाल सिम्फनी रचते थे. इससे पहले कि हम आपको १९९४ में आई फ़िल्म "स्वामी विवेकानंद" के गीत सुनवायें आपको उनके द्वारा रचित एक "बेले" का संगीत सुनवाते हैं.


बेले का थीम है "बोटमेन ऑफ़ ईस्ट बंगाल", सचिन शंकर बेले यूनिट द्वारा १९७१ में रचित इस बेले में सलिल दा ने एक दुर्लभ गीत बनाया "दयानी करिबो अल्लाह रे" जिसे पंकज मित्रा ने अपनी महकती आवाज़ से सजाया. सलिल दा ने इस मधुर धुन को अपनी ही एक हिन्दी फ़िल्म लालबत्ती (१९५७) के गीत "क्या से क्या हो गए अल्लाह रे' से लिया था जिसे सलिल दा के बहुत गहरे मित्र और मशहूर लोक गायक निर्मालेंद्रू चौधरी ने गाया था. पर इस बेले के लिए उनका रचा ये गीत तो किसी और ही दुनिया का लगता है. सुनते हैं सलिल दा की सिम्फनी "दयानी करिबो अल्लाह रे..."




और अब सुनिए फ़िल्म "स्वामी विवेकानंद" से सलिल दे कुछ लाजवाब गीत -




प्रस्तुति सहयोग सलिल दा डॉट कॉम, सलिल दा के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहाँ अवश्य जाएँ.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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