Showing posts with label chitra singh. Show all posts
Showing posts with label chitra singh. Show all posts

Thursday, July 21, 2016

तुम बोलो कुछ तो बात बने....जगजीत-चित्रा की दिली ख़्वाहिश आज ’कहकशाँ’ में

जगजीत सिंह चित्रा सिंह 
महफ़िल ए कहकशाँ 9



दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज पेश है जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की युगल आवाज़ों में शमिम करबानी का कलाम।



मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे 
स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी


Thursday, June 23, 2016

तुम बोलो कुछ तो बात बने....जगजीत-चित्रा की दिली ख़्वाहिश आज ’कहकशाँ’ में



कहकशाँ - 12
जगजीत-चित्रा की दिली ख़्वाहिश 
"आइये चराग़-ए-दिल आज ही जलाएँ हम..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है छाया गांगुली की आवाज़, इब्राहिम अश्क़ के बोल और भूपेन्द्र सिंह का संगीत।




"मिट्टी दा बावा नइयो बोलदा वे नइयो चालदा...", इस नज़्म ने न जाने कितनों को रूलाया है, कितनों को ही किसी खोए हुए अपने की याद में डूबो दिया है। अपने जिगर के टुकड़े को खोने का क्या दर्द होता है, वह इस नज़्म में बख़ूबी झलकता है। तभी तो गायिका मिट्टी का एक खिलौना बनाती है ताकि उसमें अपने खोए बेटे को देख सके, लेकिन मिट्टी तो मिट्टी ठहरी, उसमें कोई जान फूँके तभी तो इंसान बने। यह गाना बस ख़्यालों में ही नहीं है, बल्कि यथार्थ में उस गायिका की निजी ज़िंदगी से जु्ड़ा है। ८ जुलाई १९९० को अपने बेटे "विवेक" को एक दु्र्घटना में खोने के बाद वह गायिका कभी भी वापस गा नहीं सकी। संगीत से उसने हमेशा के लिए तौबा कर लिया और खुद में ही सिमट कर रह गईं। उस गायिका या कहिए उस फ़नकारा ने अब अध्यात्म की ओर रूख़ कर लिया है ताकि ईश्वर से अपने बेटे की ग़लतियों का ब्योरा ले सके। भले ही आज वह नहीं गातीं, लेकिन फ़िज़ाओं में अभी भी उनकी आवाज़ की खनक मौजूद है और हम सबको यह अफ़सोस है कि उनके बाद "जगजीत सिंह" जी की गायकी का कोई मुकम्मल जोड़ीदार नहीं रहा। जी आप सब सही समझ रहे हैं, हम "जगजीत सिंह" की धर्मपत्नी और मशहूर गज़ल गायिका "चित्रा सिंह" की बात कर रहे हैं।

चित्रा सिंह, जिनका वास्तविक नाम "चित्रा दत्ता" है, मूलत: एक बंगाली परिवार से आती हैं। घर में संगीत का माहौल था इसलिए ये भी संगीत की तरफ़ चल निकलीं। १९६० में "द अनफौरगेटेबल्स" एलबम की रिकार्डिंग के दौरान जगजीत सिंह के संपर्क में आईं और वह संपर्क शादी में परिणत हो गया। जगजीत सिंह और चित्रा सिंह ने एक साथ न जाने कितनी ही गज़लें गाई हैं; जगजीत सिंह का संगीत और दो सदाबहार आवाज़, इससे ज़्यादा कोई क्या चाह सकता है! इनकी गज़लें बस हिंदी तक ही सीमित नहीं रही, इन्होंने पंजाबी और बंगाली में भी बेहतरीन नज़्में और गज़लें दी हैं। यह तो हुई दोनों के साथ की बात, अब चलते हैं चित्रा सिंह के सोलो गानों की ओर। "ये तेरा घर, ये मेरा घर", "क्यों ज़िन्दगी की राह में मजबूर हो गए", "तुम आओ तो सही", "वो नहीं मिलता मुझे", "सारे बदन का खून", "दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है", "दिल ही तो है", "हर एक बात पर कहते हो", ये सारी कुछ ऐसी नज़्में और गज़लें हैं जो बरबस ही चित्रा जी की मखमली आवाज़ का दीवाना बना देती हैं। इनकी आवाज़ में है ही ऐसा जादू कि कोई एक बार सुन ले तो फिर इनका फ़ैन हो जाए। इससे पहले कि इस जादू का असर कम हो, हम आपको आज की गज़ल से मुख़ातिब कराते हैं।

आज की गज़ल चित्रा जी के संगीत सफ़र के अंतिम दिनों की गज़ल है। १९९० में जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की साथ में एक एलबम आई थी.. "समवन समवेयर(someone somewhere)"| इस एलबम में शामिल सारी ग़ज़लें एक से बढ़कर एक थीं। यूँ तो हर ग़ज़ल का मजमून मु्ख्तलिफ़ होता है, लेकिन यह नामुमकिन नहीं कि हरेक गज़ल में कोई न कोई चीज एक जैसी हो। आप खुद मानेंगे कि दुनिया में प्यार एक ऐसी ही चीज है, जो ना चाहते हुए भी सब कुछ में शामिल है। "फ़ासला तो है मगर कोई फ़ासला नहीं" - यह ग़ज़ल भी इसी प्यार के कोमल भावों से ओत-प्रोत है। "शमिम करबानी" साहब ने हर प्रेमी की दिली ख़्वाहिश कागज़ पर उतार दी है। कहते हैं कि अगर आपके पास प्यार है तो आपको और कुछ नहीं चाहिए। शायद यही विश्वास है जो किसी प्रेमी को दुनिया से बग़ावत करा देता है। मंझधार में फ़ँसा आशिक़ बस अपने इश्क़ और अपने ख़ुदा को पुकारता है, नाख़ुदा की तरफ़ देखता भी नहीं। और वैसे भी जिसकी पु्कार इश्क़ ने सुन ली उसे औरों की क्या जरूरत...फिर चाहे वह "और" कोई ख़ुदा ही क्यों न हो!!!

तो अगर आपका इश्क़ चुप है, आपका हबीब ख़ामोश है तो पहले उसे मनाइये, ख़ुदा का क्या है, इश्क़ उसे मना ही लेगा:

तुम बोलो कुछ तो बात बने,
जीने लायक हालात बने।

ये तो हुए मेरे जज़्बात, अब हम "शमिम" साहब के जज़्बातों में डूबकी लगाते हैं और जगजीत-चित्रा के मौजों का मज़ा लेते हैं:

फ़ासला तो है मगर कोई फ़ासला नहीं,
मुझसे तुम जुदा सही, दिल से तो जुदा नहीं।

आसमां की फ़िक्र क्या, आसमां ख़फ़ा सही,
आप ये बताइये, आप तो खफ़ा नहीं।

कश्तियाँ नहीं तो क्या, हौसले तो पास हैं,
कह दो नाखुदाओं से, तुम कोई ख़ुदा नहीं।

लीजिए बुला लिया आपको ख़्याल में,
अब तो देखिये हमें, कोई देखता नहीं।

आइये चराग़-ए-दिल आज ही जलाएँ हम,
कैसी कल हवा चले कोई जानता नहीं।





’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Thursday, January 5, 2012

हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चाँद... राही मासूम रज़ा, जगजीत-चित्रा एवं आबिदा परवीन के साथ

"मेरे बिना किस हाल में होगा, कैसा होगा चाँद" - बस इस पंक्ति से हीं राही साहब ने अपने चाँद के दु:ख का पारावार खड़ कर दिया है। चाँद शायरों और कवियों के लिए वैसे हीं हमेशा प्रिय रहा है और इस एक चाँद को हर कलमकार ने अलग-अलग तरीके से पेश किया है। अधिकतर जगहों पर चाँद एक महबूबा है और शायद(?) यहाँ भी वही है।

Monday, August 9, 2010

तू नहीं तो ज़िंदगी में और क्या रह जाएगा...इफ़्तिख़ार साहब का दर्द और चित्र सिंह की सशक्त अभिव्यक्ति

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 457/2010/157

'सेहरा में रात फूलों की' इस शृंखला की आज है सातवीं कड़ी। कल की कड़ी में आपने जगजीत सिंह की आवाज़ सुनी थी। दोस्तों, जिस तरह से बहुत सारे संगीतकार जोड़ी के रूप में फ़िल्म जगत के मैदान पर उतरे हैं और आज भी उतर रहे हैं, वैसे ही ग़ज़लों की दुनिया में भी कुछ गायक अपने पार्टनर के साथ सामने आए हैं। दो ऐसी जोड़ियाँ जो सब से ज़्यादा लोकप्रिय रही हैं, वो हैं भूपेन्द्र और मिताली की जोड़ी, और जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की जोड़ी। इन दोनों जोड़ियों के जोड़ीदार व्यक्तिगत ज़िंदगी में पति-पत्नी भी हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि मैं ये सब यहाँ लेकर क्यों बैठ गया। भई हम बस इतना कहना चाहते हैं कि जब कल जगजीत जी की आवाज़ शामिल हो ही चुकी है, तो क्यों ना आज उनकी पत्नी और सुप्रसिद्ध ग़ज़ल गायिका चित्रा सिंह की भी आवाज़ सुन ली जाए। चित्रा सिंह ने जहाँ एक तरफ़ जगजीत जी के साथ बहुत सी युगल ग़ज़लें गायी हैं, उनकी एकल ग़ज़लों की फ़ेहरिस्त भी छोटी नहीं है। फ़िल्मों की बात करें तो 'साथ साथ' और 'अर्थ' चित्रा जी के करीयर की दो महत्वपूर्ण फ़िल्में रही हैं। 'साथ साथ' की ग़ज़ल तो हमने कल ही सुनी थी, तो आज क्यों ना फ़िल्म 'अर्थ' की एक बेहद ख़ूबसूरत ग़ज़ल हो जाए चित्रा जी की एकल आवाज़ में। वैसे अगर कल आपने ग़ौर फ़रमाया होगा तो कल की ग़ज़ल के शुरुआती लाइनों के आलाप में चित्रा जी की आवाज़ को ज़रूर पहचान लिया होगा। ख़ैर, आज की ग़ज़ल है "तू नहीं तो ज़िंदगी में और क्या रह जाएगा, दूर तक तन्हाइयों का सिलसिला रह जाएगा"। कल की तरह आज भी मौसीकार हैं कुलदीप सिंह। 'अर्थ' महेश भट्ट निर्देशित फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे शबाना आज़्मी, कुलभूषण खरबंदा, स्मिता पाटिल, राज किरण, रोहिणी हत्तंगड़ी प्रमुख। अपनी आत्मकथा पर आधारित इस फ़िल्म की कहानी लिखी थी ख़ुद महेश भट्ट ने (उनके परवीन बाबी के साथ अविवाहिक संबंध को लेकर)। इस फ़िल्म को बहुत सारे पुरस्कार मिले। फ़िल्मफ़ेयर के अंतर्गत सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री (शबाना आज़्मी), सर्बश्रेष्ठ स्कीनप्ले (महेश भट्ट) और सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री (रोहिणी हत्तंगड़ी)। शबाना आज़्मी को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार (सिल्वर लोटस) भी मिला था इसी फ़िल्म के लिए।

और अब हम आते हैं इस ग़ज़ल के शायर पर। यह ग़ज़ल किसी फ़िल्मी गीतकार ने नहीं लिखी है, बल्कि यह कलाम है इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दिक़ी का। सिद्दिक़ी साहब को उर्दू साहित्य के एक सशक्त स्तंभ माना जाता है। उर्दू मासिक पत्रिका 'शायर' के सम्पादक के रूप में उन्होने इस भाषा की जो सेवा की है, वो उल्लेखनीय है। उनको ये शेर-ओ-शायरी विरासत में ही मिली थी। उनके दादा अल्लामा सीमब अकबराबादी और पिता इजाज़ सिद्दिक़ी जाने माने शायर रहे। सन् २००१ में इफ़्तिख़ार साहब एक ट्रेन हादसे का शिकार होने के बाद बिस्तर ले लिया है। यह हादसा एक भयानक हादसा था उनके जीवन का। हुआ युं था कि वो एक मुशायरे में भाग लेकर वापस घर लौट रहे थे मुंबई के लोकल ट्रेन में। वो अपनी माँ से मोबाइल पर बात करना चाहते थे, लेकिन क्योंकि ट्रेन के कमरे में सिगनल नहीं मिल रहा था, तो वो प्लैटफ़ॊर्म पर उतरे और बात करने लगे, इस बात से बिलकुल बेख़बर कि पीछे ट्रेन चल पड़ी है। जब उन्हे इस बात का अहसास हुआ तो दौड़ कर ट्रेन में चढ़ने की कोशिश की लेकिन फ़िसल कर ट्रेन के नीचे आ गए। ऐसे में ९९% मौकों पर इंसान का बच पाना संभव नहीं होता, लेकिन इफ़्तिख़ार साहब पर ख़ुदा की नेमत थी कि वो बच गए। लेकिन सर पर घातक चोट लगने की वजह से उनका पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो गया। अभी हाल ही में, २४ मई २०१० के दिन उनकी माँ मनज़ूर फ़ातिमा का निधन हो गया जो ९१ वर्ष की थीं। दोस्तों, अगर आप इफ़्तिख़ार साहब से सम्पर्क करना चाहते हैं तो यह रहा पता:

'शायर' पत्रिका, पोस्ट बॊक्स नं: ३७७०, गिरगाम पोस्ट ऒफ़िस, मुंबई-४००००४.

दोस्तों, 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से इफ़्तिख़ार साहब के लिए यही दुआ करते हुए कि वो जल्द से जल्द ठीक हो जाएँ, स्वस्थ हो जाएँ, आपको सुनवा रहे हैं चित्रा सिंह की गायी यह ग़ज़ल फ़िल्म 'अर्थ' से। इस ग़ज़ल के चार शेर ये रहे...

तू नहीं तो ज़िंदगी में और क्या रह जाएगा,
दूर तक तन्हाइयों का सिलसिला रह जाएगा।

दर्द की सारी तहें और सारे गुज़रे हादसे,
सब धुआँ हो जाएँगे एक वाक़िया रह जाएगा।

युं भी होगा वो मुझे दिल से भुला देगा मगर,
ये भी होगा ख़ुद से उसी में एक ख़ला रह जाएगा।

दायरे इंकार के इकरार की सरग़ोशियाँ,
ये अगर टूटे कभी तो फ़ासला रह जाएगा।



क्या आप जानते हैं...
कि चित्रा सिंह और जगजीत सिंह ने साथ मिलकर अपना पहला ऐल्बम सन् १९७६ में जारी किया था जिसका शीर्षक था 'दि अनफ़ॊरगेटेबलस'।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. एक बार फिर खय्याम साहब हैं सगीतकार, शायर बताएं - ३ अंक.
२. गायक बताएं - २ अंक.
३. वास्तविक जीवन में ये पति पत्नी है और ऑन स्क्रीन भी इस जोड़ी ने कमाल किया है, कौन दो स्टार है इस फिल्म के प्रमुख अभिनेता अभिनेत्री - १ अंक.
४. एतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म के निर्देशक कौन हैं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
पवन जी और अवध जी दोनों ही चूक गए इस बार, बस एक गोस्त बस्टर जी हैं जिनका जवाब सही रहा.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, April 30, 2009

तुम बोलो कुछ तो बात बने....जगजीत-चित्रा की दिली ख़्वाहिश और महफ़िल-ए-बंदिश

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #०९

मिट्टी दा बावा नईयो बोलदा वे नईयो चालदा....इस नज़्म ने न जाने कितनों को रूलाया है,कितनों को हीं किसी खोए अपने की याद में डूबो दिया है। अपने जिगर के टुकड़े को खोने का क्या दर्द होता है, वह इस नज़्म में बखूबी झलकता है। तभी तो "गायिका" मिट्टी का एक खिलौना बनाती है ताकि उसमें अपने खोए बेटे को देख सके, लेकिन मिट्टी तो मिट्टी ठहरी, उसमें कोई जान फूँके तभी तो इंसान बने। यह गाना बस ख़्यालों में हीं नहीं है, बल्कि यथार्थ में उस गायिका की निजी ज़िंदगी से जु्ड़ा है। ८ जुलाई १९९० को अपने बेटे "विवेक" को एक दु्र्घटना में खोने के बाद वह गायिका कभी भी वापस गा नहीं सकी। संगीत से उसने हमेशा के लिए तौबा कर लिया और खुद में हीं सिमट कर रह गई। उस गायिका या कहिए उस फ़नकारा ने अब अध्यात्म की ओर रूख कर लिया है,ताकि ईश्वर से अपने बेटे की गलतियों का ब्योरा ले सके। भले हीं आज वह नहीं गातीं, लेकिन फ़िज़ाओं में अभी भी उनकी आवाज़ की खनक मौजूद है और हम सबको यह अफ़सोस है कि उनके बाद "जगजीत सिंह" जी की गायकी का कोई मुकम्मल जोड़ीदार नहीं रहा। जी आप सब सही समझ रहे हैं, हम "जगजीत सिंह" की धर्मपत्नी और मशहूर गज़ल गायिका "चित्रा सिंह" की बात कर रहे हैं।

चित्रा सिंह, जिनका वास्तविक नाम "चित्रा दत्ता" है, मूलत: एक बंगाली परिवार से आती हैं। घर में संगीत का माहौल था इसलिए ये भी संगीत की तरफ़ चल निकलीं। १९६० में "द अनफौरगेटेबल्स" एलबम की रिकार्डिंग के दौरान जगजीत सिंह के संपर्क में आईं और वह संपर्क शादी में परिणत हो गया। जगजीत सिंह और चित्रा सिंह ने एक साथ न जाने कितनी हीं गज़लें गाई हैं; जगजीत सिंह का संगीत और दो सदाबहार आवाज़...इससे ज्यादा कोई क्या चाह सकता है। इनकी गज़लें बस हिंदी तक हीं सीमित नहीं रही..इन्होंने पंजाबी और बंगाली में भी बेहतरीन नज़्में और गज़लें दी हैं। यह तो हुई दोनों के साथ की बात...अब चलते हैं चित्रा सिंह के सोलो गानों की ओर। "ये तेरा घर, ये मेरा घर","तुम आओ तो सही","वो नहीं मिलता मुझे","सारे बदन का खून","दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है","दिल हीं तो है","हर एक बात पर कहते हो",ये सारी कुछ ऎसी नज़्में और गज़लें हैं, जो बरबस हीं चित्रा जी की मखमली आवाज़ का दीवाना बना देती हैं। इनकी आवाज़ में है हीं ऎसा जादू कि कोई एक बार सुन ले तो फिर इनका फ़ैन हो जाए। इससे पहले कि इस जादू का असर कम हो, हम आपको आज की गज़ल से मुखातिब कराते हैं।

आज की गज़ल चित्रा जी के संगीत सफ़र के अंतिम दिनों की गज़ल है। १९९० में जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की साथ में एक एलबम आई थी.. "समवन समवेयर(someone somewhere)"| इस एलबम में शामिल सारी गज़लें एक से बढकर एक थीं। यूँ तो हर गज़ल का मजमून मु्ख्तलिफ़ होता है, लेकिन यह नामुमकिन नहीं कि हरेक गज़ल में कोई न कोई चीज एक जैसी हो। आप खुद मानेंगे कि दुनिया में प्यार एक ऎसी हीं चीज है, जो ना चाहते हुए भी सब कुछ में शामिल है। "फ़ासला तो है मगर कोई फ़ासला नहीं" -यह गज़ल भी इसी प्यार के कोमल भावों से ओत-प्रोत है। "शमिम करबानी" साहब ने हर प्रेमी की दिली ख़्वाहिश कागज़ पर उतार दी है। कहते हैं कि अगर आपके पास प्यार है तो आपको और कुछ नहीं चाहिए। शायद यही विश्वास है जो किसी प्रेमी को दुनिया से बगावत करा देता है। मंझधार में फ़ँसा आशिक बस अपने इश्क और अपने खुदा को पुकारता है, नाखुदा की तरफ़ देखता भी नहीं। और वैसे भी जिसकी पु्कार इश्क ने सुन ली उसे औरों की क्या जरूरत...फिर चाहे वह "और" कोई खुदा हीं क्यों न हो!!!

तो अगर आपका इश्क चुप है, आपका हबीब खामोश है तो पहले उसे मनाईये, खुदा का क्या है,इश्क उसे मना हीं लेगा:
तुम बोलो कुछ तो बात बने,
जीने लायक हालात बने।


ये तो हुए मेरे जज़्बात, अब हम "शमिम" साहब के जज़्बातों में डूबकी लगाते हैं और जगजीत-चित्रा के मौज़ों का मज़ा लेते हैं:

फ़ासला तो है मगर कोई फ़ासला नहीं,
मुझसे तुम जुदा सही, दिल से तो जुदा नहीं।

आसमां की फ़िक्र क्या, आसमां खफ़ा सही,
आप ये बताईये, आप तो खफ़ा नहीं।

कश्तियाँ नहीं तो क्या, हौसले तो पास हैं,
कह दो नाखुदाओं से, तुम कोई खुदा नहीं।

लीजिए बुला लिया आपको ख़्याल में,
अब तो देखिये हमें, कोई देखता नहीं।

आईये चराग-ए-दिल आज हीं जलाएँ हम,
कैसी कल हवा चले कोई जानता नहीं।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

दुनिया न जीत पाओ तो हारो न ____ को तुम,
थोडी बहुत तो जेहन में नाराजगी रहे...


आपके विकल्प हैं -
a) दिल , b) मन , c) खुद, d) सब

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-

पिछली महफिल में जम कर शायरी हुई, "रात" शब्द ने लगता है सभी को रूमानी बना दिया, कुछ झलकियाँ पेश है -
मनु जी ने फरमाया -

सहर पूछे है शबे ग़म की कहानी मुझसे,
क्या कहूँ क्या क्या ज़हर रात पिया है मैंने,

तो पहली बार पूजा जी भी हरकत में आई इस शेर के साथ -

कहीं सूरज आकर चुरा ना ले मेरा चाँद,
हम रात भर "रात" को थामे रहे.

शन्नो जी ने बातों ही बातों में कई राज़ खोल डाले तो नीलम जी भी कहाँ पीछे रहने वाली थी -

रात -ए मौजूं देखा किये, न जाने किन रवानियों में बहते रहे |
वो चले, वो रुके थे, मगर कदम न जाने क्योँ उनके बढ़ते ही गए

सलिल साहब ने तो कई रातों का जिक्र कर डाला कुछ फ़िल्मी गीतों के मुखड़े भी गुनगुना डाले, तब उन्हें याद आये ये शेर-

ये खुली-खुली सी जुल्फें, ये उडी-उडी सी रंगत.
तेरी सुबह कह रही है, तेरी रात का फ़साना..

सलिल जी पूरे मूड में दिखे, अपनी जवानी के दिनों को याद कर कहा -

पाक दामन दिख रहे हैं, दिन में हम भी दोस्तों.
रात का मत ज़िक्र करना, क्या पता कैसे-कहाँ?

सलिल जी जम कर रंग जमाया तो उनकी शिष्य शन्नो जी ने भी महफ़िल की आखिरी शमा कुछ यूँ कह कर बुझा दी -

किसी खिताब की ना ही ख्वाहिश है ना काबिल हैं उसके
बस इस रात की महफ़िल में कुछ लम्हे काटने आ जाते हैं.

तो युहीं आते रहें...हम तो बस यही चाहेंगे, एक गुजारिश है बस कि जो ग़ज़ल हम आपके लिए लेकर आते हैं उसके बारे में भी कुछ फ़रमाया कीजिये.....

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Friday, April 17, 2009

किन्नी बीती ते किन्नी बाकी ऐ..मैनू ऐ हो हिसाब ले बैठा....

पंजाबी शायर और कवि शिव कुमार बटालवी पर विशेष. दीप जगदीप बाँट रहे है अपने अनुभव बटाला शहर के

यौवन की ऋतु में जो भी मरता है,
वह या तो फूल बन जाता है या तारा।
यौवन की ऋतु में आशिक़ मरता है
या फिर करमों वाला।

- शिव बटालवी

हमारे यहां बहुत उम्‍दा कवि हुए हैं, लेकिन ऐसे कम ही हैं, जिन्‍हें लोगों का इतना प्यार मिला हो। हिंदी में बच्चन को मिला, उर्दू में ग़ालिब और फ़ैज़ को. अंग्रेज़ी में कीट्स को. स्पैनिश में नेरूदा को. पंजाबी में इतना ही प्यार शिव को मिला. शिव कुमार बटालवी. शिव हिंदी में कितना आया, यह अंदाज़ नहीं है. पंजाब आने से पहले मैंने सिर्फ़ शिव का नाम पढ़ा था. इतना जानता था कि कोई मंचलूटू गीतकार था. पर शिव सिर्फ़ मंच नहीं लूटता. उसकी साहित्यिक महत्ता भी है. उसे पढ़ने, सुनने के बाद यह महसूस होता है. वह अकेला कवि है, जिसकी कविता मैंने अतिबौद्धिक अभिजात अफ़सरों के मुंह से भी सुनी है और साइकिल रिक्शा खींचने वाले मज़दूर के मुंह से भी. ऐसी करिश्माई बातें हम नेरूदा के बारे में पढ़ते हैं. पंजाब में वैसा शिव है.

1973 में जब शिव की मौत हुई, तो उसकी उम्र महज़ 36 साल थी। उसने सक्रियता से सिर्फ़ दस साल कविताएं लिखीं. इन्हीं बरसों में उसकी कविता हर ज़बान तक पहुंच गई. 28 की उम्र में तो उसे साहित्य अकादमी मिल गया था. प्रेम और विरह उसकी कविता के मूल स्वर हैं. वह कविता में क्रांति नहीं करता. मनुष्य की आदत, स्वभाव, प्रेम, विरह और उसकी बुनियादी मनुष्यता की बात करता है. वह लोककथाओं से अपनी बात उठाता है और लोक को भी कठघरे में खड़ा करता है. जिस दौर में लगभग सारी भारतीय भाषाओं में कविता नक्‍सलबाड़ी आंदोलन से प्रभावित थी, शिव बिना किसी वाद में प्रवेश किए एक मेहनतकश आदमी की संवेदनाओं और भावनात्मक विश्वासों की बात कर रहा था. इसीलिए पंजाबी कविता के प्रगतिशील तबक़े ने शिव को सिरे से ख़ारिज कर दिया. हालांकि उसकी कविता इतनी ताक़तवर है कि अब तक लोकगीतों की तरह सुनी-गाई जाती है.

शिव की दीवानगी का सिलसिला मेरी जवानी के साथ ही शुरू हुआ और कब ये इश्क पागलपन तक पहुंच गया,खुद मुझे मालूम नहीं। तीन साल पहले की बात है, पता चला कुछ साहित्यकार दोस्त बटाला जा रहे हैं। मैंने एक दम कह दिया मैं भी चलूंगा, वहां पर साहित्य समारोह था, सभी उसमें शिरकत करने जा रहे थे। मुझे कवि गुरभजन गिल ने कहा सुबह 6 बजे जाना होगा, तुम पंजाबी भवन पहुंच जाना। अगली सुबह मैं छह से पहले वहां पहुंच गया। इसे मेरी खुशनसिबी समिझए कि जिस होटल में ये कार्यक्रम था, उसके ठीक सामने शिव की याद में एक ऑडिटोरियम बन रहा था। दो बार नींव पत्थर रखे जाने के बावजूद उसकी हालत पखाने से बद्दतर थी। जंग लगे बड़े से गेट पर ताला लटक रहा था। डा.जगतार धीमान ने मुझे दीवार फांद अंदर जाने की सलाह दी, वो भी मेरे साथ हो लिए। बीस पच्चीस कदम दीवार पर चलने के बाद हम अंदर के दरवाजे के सामने पहुंच कर नीचे कूद गए। ऑडिटोरियम में अंधेरा था और बैठने वाली सीढि़यों के दायरे के रुप में सीमेंट ईंट का ढांचा खड़ा था। उसके बीच मिट्टी के ढेर पड़े थे। बीचों बीच दो ढेर बिल्कुल गोल पहाड़ी की तरह करीब 5 फुट उंचाई तक होंगे, मैं यूं ही मस्ती में उन पर कोहनी रख कर खड़ा हो गया। धीमान साहब फोटो खींचने में बिजी थे, अचानक उनकी नजर मुझ पर पड़ी तो चेताने वाले लहजे में बोले वहां से हट जा उसमें सांप हो सकता हैं। मैं हैरान था, मुझे पता चला ये सांप की बाम्बियां है। वहां से हटने से पहले ही मेरे दिमाग में बात गूंज गई कि शिव जिंदगी भर अपने गीतों में सांप और उनकी वर्मियों की बातें करता रहा और आज वह उसकी अधूरी खंडहर यादगार पर भी कुंडली मारे बैठे हैं, मैंने उन्हीं के साथ फोटो खिचवाई। अफसोस के वो फोटो आज तक नहीं मिल सके।

उसी दोपहर को बटाले वाले सुभाष कलाकार और रंधावा के साथ हम शिव का घर देखने गए। घर बंद पड़ा था,जो कोई वहां पर रहता था, मौजूद नहीं था। पड़ोसियों ने मेरी आंखों की अकांक्षा समझ ली शायद और उनके घर की सीढि़यां चढ़ कर दीवार फांद कर हम शिव के उस छोटे से चौबारे में पहुंचे, जहां पर कहते हैं शिव ने कई खूबसूरत शामें गुजारी हैं। बिल्कुल खाली पड़ा कमरा, गली को खुलती लोहे की सलाखों वाली खिड़की और ठंडा सीमेंट का फर्श। कुछ पल खिड़की के पार झांकते हुए मैंने सोचा शायद शिव भी यूं अपना शहर यहां से देखता होगा। फिर न जाने क्या सूझी के ठंडे फर्श पर मैं लेट गया। एक पल लगा मानों मैं हल्का पंख हो गया फर्श की ठंडक भरी गोद में यूं लगा शिव की गोद में सो रहा हूं। आवाज गूंजी "चलो चलें" तो मेरा ख्वाब टूटा भीगी पलकों के साथ खड़ा हुआ, तो दो बूंदें फर्श पर गिर पड़ी, मुझे याद आ गया शिव ने कहा था, "भट्ठी वालिए चम्बे दिए डालिए पीड़ां दा परागा भुन दे, तैनूं देआं हंझूआं दा भाड़ा...". अंदर से आवाज गूंजी शिव तेरे फर्श पर दो पल सकून के गुजारने का भाड़ा मेरे दो आसूं रख लेना शायद यही मेरे लिए तसल्ली की बात थी कि "पीड़ां दा परागा" भुनाने के बदले आंसूओं का भाड़ा देने वाले शिव को मैंने उसी का सरमाया लौटाया है।

आज हम आवाज़ के श्रोताओं के लिए लाये हैं शिव के गीत, जिन्हें अलग अलग फनकारों ने अपनी आवाजों से सजाया है. जिन्हें पंजाबी आती है उनके लिए तो ये संकलन एक शानदार तोहफा है ही, भाषा पर पकड़ न रखने वालों के लिए भी उन्हें सुनना एक यादगार अनुभव होगा, ऐसा हमारा दावा है. तो शुरू करते है "भट्ठी वालिए चम्बे दिए डालिए पीड़ां दा परागा भुन दे, तैनूं देआं हंझूआं दा भाड़ा..." से, फनकार है सतबीर कौर.


सुरिंदर कौर की आवाज़ में सुनिए - "गमां दी रात लम्बी ऐ..." और चित्र सिंह की आवाज़ में "गीतां वे चुंज भरी..."




जगजीत सिंह से सुनिए "एक शिकरा यार बनाया..." और "रोग बन के रह गया है इश्क तेरे शहर का..."




कुलदीप दीपक ने एक पूरी एल्बम उन्हें समर्पित किया है, जिसके कुछ हिस्से यहाँ पेश हैं -


और अब सुनिए खुद शिव की आवाज़ में ये गीत -
मैनू तेरा शबाब ले बैठा,
रंग गोरा गुलाब ले बैठा,
मैंनू जद वी तुसी हो याद आए,
दिन दिहाडे शराब ले बैठा,
किनी बीती ते किनी बाकी ऐ,
मैनू ऐ हो हिसाब ले बैठा.....




प्रस्तुति - गीत चतुर्वेदी के साथ जगदीप सिंह

Tuesday, March 17, 2009

जगजीत सिंह ‘The Pied Piper’

रेडियो पर जगजीत सिंह की गजल बज रही है और मुझे याद आ रहा है, वो नब्बे का दशक जब हमारी उम्र रही होगी तीस के ऊपर(कितनी ऊपर हम नहीं बताने वाले…:)) पतिदेव काम के सिलसिले में अक्सर शहर से बाहर रहते थे। जब जब वो बाहर जाते दिन तो रोज की दिनचर्या में गुजर जाता लेकिन रातों को हमें अकेले डर के मारे नींद न आती। अब क्या करते? ऐसे में पूरी पूरी रात जगजीत सिंह की आवाज हमारा सहारा बनती।

मेरी पंसद के एक दो गीत हो जाएं,क्या कहते हैं आप ?

परेशां रात सारी हैं सितारों तुम तो सो जाओ...


मेरी तन्हाइयों तुम भी लगा लो मुझको सीने से कि मैं घबरा गया हूँ इस तरह रो रो के जीने से


आप कहेगें नब्बे का दशक? लेकिन जगजीत सिंह और चित्रा सिंह( उनकी धर्मपत्नी) की जोड़ी तो 1976 में ही अपनी पहली एलबम “The Unforgettables” से ही लोकप्रिय हो गये थे। जी हां जानते हैं, जानते हैं, हम भी उसी युवा वर्ग से थे जो उनकी पहली एल्बम से ही उनकी आवाज का दिवाना हो गया था, इसी लिए तो अपने संगीत के खजाने में से सिर्फ़ उनके ही कैसेट निकाल कर सुने जाते थे। भई तब सी डी का रिवाज नहीं था न्। अब जब कोई आप को इतना प्रभावित करे तो उसके बारे में सब कुछ जान लेने का मन करता ही है। हमने भी जितनी हो सकी उतनी जानकारी उनके बारे में हासिल करने की कौशिश की। मुझे मालूम है आप में से भी कई जगजीत जी के दिवाने होगें तो आइए बात करें कुछ उनकी कुछ अपनी।

तेरी महफ़िल में किस्मत आजमा कर हम भी देखेगें

आठ फ़रवरी 1941 में सरकारी मुलाजिम सरदार अमर सिंह धीमन और सरदारनी बच्चन कौर को चार लड़कियों और दो लड़कों के बाद, जब वाहे गुरु की नेमत के रूप में एक और पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तो न जाने क्या सोच कर उन्हों ने उसका नाम रख दिया ‘जगजीत सिंह’,यानी की जग को जीतने वाला। इस नाम में ही शायद आने वाले भविष्य का आगाज छुपा था। हर माता पिता की तरह सरदार अमर सिंह जी ने भी सपने देखे थे कि उनका बेटा बड़ा हो कर आई ए एस की सीढ़ी पार करते हुए किसी ऊंचे सरकारी औहदे पर आसीन होगा। लेकिन खुदा को तो कुछ और ही मंजूर था। जगजीत सिंह जिन्हें उनके घर के लोग प्यार से ‘जीत’ बुलाते थे गंगानगर से दसवीं पास कर कॉलेज की पढ़ाई करने जलंधर आ गये। दसवीं तक तो साइंस लिया हुआ था लेकिन उनका मन सांइस में न लगता था, इस लिए बी ए इतिहास ले कर किया। साथ ही साथ् पंडित छगल लाल शर्मा और बाद में उस्ताद जमाल खां साहब से गायिकी की तालीम लेते रहे। ग्रेजुएशन होते होते जगजीत साहब ख्याल, ठुमरी और ध्रुपद जैसी विधाओं में परांगत हो गये। 1965 में उन्हों ने बम्बई आकर संगीत की दुनिया में अपनी किस्मत आजमाने का फ़ैसला कर लिया। उनके पिता जी स्वाभाविक है कि इस बात से खुश नहीं थे, उनके भविष्य की चिंता उन्हें खाये जा रही थी। पर जगजीत सिंह जी दृढ़ निश्चय कर चुके थे और वो बम्बई आ गये। अब जैसा कि हर नवोदित कलाकार के साथ होता है वो उनके साथ भी हुआ। बम्बई सपनों की नगरी मानी जाती है, जो भी यहां आखों में सपने ले कर आता है उसे अपने सपने पूरे करने का मौका जरूर देती है, लेकिन राह इतनी आसां भी नहीं होती। ये कड़ी मेहनत, कई निराशा भरे दिनों से गुजरने के बाद ही सफ़लता का सेहरा किसी के सर पर रखती है। जगजीत जी के साथ भी यही हुआ। शुरु शुरु में उन्हें शादियों में गाना पड़ा, कई इश्तहारों के जिंगल्स गाने पड़े। उसी जमाने में उनकी मुलाकात हुई चित्रा जी से। चित्रा जी खुद एक अच्छी गायिका थी और हैं। पहले पहल तो वो उनसे जरा भी प्रभावित न थीं, उन्हें लगता था कि जगजीत सिंह जी बहुत ही आलसीराम है जो न जगह देखते हैं न मौका, बस जरा मौहलत मिली नहीं कि लगे खर्राटे मारने। सोते ही रह्ते हैं, सोते ही रहते हैं। लेकिन धीरे धीरे जगजीत जी की गायकी का जादू उन पर भी चढ़ने लगा और वो उनकी ऐसी कायल हुई कि साठ का दशक ख्तम होते होते वो उनकी धर्मपत्नी बन गयीं। आज लगभग चालीस साल बाद भी वो जगजीत सिंह जी की गायकी के जादू से सम्मोहित हैं और मानती हैं कि जगजीत सिंह जी की आवाज कानों से सीधे दिल में उतर जाती है। ये बात वो तो क्या सारी दुनिया मानती है। हम भी पिछले चालिस सालों से जगजीत सिंह जी की आवाज के ऐसे दिवाने हैं कि सुनते ही खिचे चले जाते हैं जैसे पाइड पाइपर के पीछे बच्चे चल दिए थे।

1976 में भारत की संगीत की दुनिया में जगजीत सिंह और चित्रा सिंह पहले गजल गायक दंपत्ति के रूप में उतरे और ऐसे लोकप्रिय हुए कि दूसरे कई गायक दंपत्तियों के लिए मिसाल बन गये।

जगजीत जी की आवाज तो उन्हें ईश्वर से आशीष के रूप में मिली है पर उसे अपनी मेहनत और लगन से मांजा है जगजीत जी ने खुद्। वो न सिर्फ़ अच्छे गायक है उनकी दुरदर्शिता भी बेमिसाल है। सत्तर का दशक वो दशक था जब गजल की दुनिया में कई महारथी पहले से मौजूद थे जैसे मैंहदी हसन, पंकज मलिक,तलत महमूद, गुलाम अली, बेगम अख्तर, नूरजंहा आदि आदि। ऐसे में जगजीत जी के लिए अपनी जगह बना पाना काफ़ी टेढ़ी खीर थी। म्युजिक कंपनियां जो अपने नफ़े के प्रति बड़ी सतर्क रहती हैं आसानी से किसी नये गायक पर पैसा लगा कर खतरा नहीं उठाना चाह्तीं, अगर वो गायक न चला तो नुकसान तो होगा ही, प्रतिष्ठित गायकों की नाराजगी का भी खतरा रहता है।

दूरदर्शी जगजीत सिंह

जगजीत जी ने दूरदर्शिता दिखाते हुए अपने लिए मुकाम हासिल करने की सोची सेमी क्लासिकल में। जब उनकी पहली एलबम आयी तो समीक्षकों ने काफ़ी आलोचना की लेकिन जनता ने अपना फ़ैसला सुना दिया था। उनकी एलबम की बिक्री ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये। उनका नाम संगीत की दुनिया के प्रतिष्ठित हस्तियों में शुमार हो गया। जगजीत सिंह दंपत्ति ने एक के बाद एक मधुर आत्मा में उतर जाने वाले एलबम देने शुरु कर दिए। जगजीत जी बड़ी आसानी से जनता की नब्ज पर हाथ धर लेते हैं। अगर आप ने ध्यान दिया हो तो उनकी ज्यादातर एलबम के नाम अंग्रेजी में हैं और गजलों का चुनाव उम्दा शायरी की मिसाल्।

जगजीत जी समाज के हर तबके तक पहुंचना चाह्ते थे। अंग्रेजी में नाम रखने से आज का युवा वर्ग (जो पॉप म्युजिक और हिप हॉप का दिवाना है) खुद को उनके संगीत से जुदा नहीं पाता और दिल में उतरती उम्दा शायरी प्रौढ़ वर्ग को दिवाना बना देती है। जैसे उनकी कुछ एलबमस के नाम हैं Ecstasies, A Sound Affair, Passions, Beyond Time, Mirage, Visions, Love is Blind, पर इसी के साथ देखे तो मिर्जा गालिब उनकी बेहतरीन एलबम में से एक हैं। हम तो यहां तक कह सकते हैं कि मिर्जा गालिब ने जहां दिल को छूने वाली गजले लिखीं उनमें आत्मा डाली जगजीत सिंह की आवाज और अंदाज ने।

जगजीत सिंह् जी न सिर्फ़ गैर फ़िल्मी बल्कि फ़िल्मी संगीत की दुनिया के भी नामी गिरामी सितारे बन गये, कई फ़िल्में उनके गाये गानों की वजह से आज तक जेहन से नहीं उतरती जैसे अर्थ, साथ साथ, प्रेमगीत, तुम बिन, सरफ़रोश, दुश्मन, तरकीब और भी न जाने कितनी। किस किस के नाम गिनाऊं?



मां का दर्द

जिन्दगी बहुत ही जालिम है, इसमें खुशी और गम दोनों से कोई अछूता नहीं रह पाया। सब अच्छा चल रहा था जब नब्बे के दशक में एक हादसे ने जगजीत सिंह दंपत्ति की दुनिया ही बदल कर रख दी। उनका 21 वर्षीय इकलौता बेटा विवेक एक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गया। जिस दिन हमने अखबार में ये खबर पढ़ी थी दिल धक्क से रह गया था। जगजीत सिंह जी ने तो फ़िर भी इस झटके को अपनी छाती पर खाया और डटे रहे लेकिन चित्रा सिंह बिचारी क्या करतीं , वो मां इतना ढाढस कहां से लाती कि अपने जवान बेटे को जिसे घोड़ी चढ़ाने के सपने देख रही थी उसे अर्थी पर चढ़ा देखती। उन्हें ऐसा झटका लगा कि चौदह साल तक उनकी आवाज गमों के अंधेरों में कैद हो गयी और वो घर पर भी कभी भूले से कुछ गुनगुना भी न पायीं, बाहर गाना तो बहुत दूर की बात थी। बड़ी मुश्किल से जगजीत जी के बहुत समझाने पर उन्हों ने अपनी अंतिम एलबम पर काम किया जो उन दोनों ने अपने बेटे की याद को समर्पित की थी। उस एलबम का नाम था “Somewhere Some one” । जाहिर है कि इस एलबम में उन दोनों का पूरा दर्द उभर कर सामने आया और ऐसा आया कि हर सुनने वाले को आज भी रुलाता है।

चित्रा जी अपने गम में ऐसी डूबीं कि उन्होने खुद को अपने घर की चार दिवारी में कैद कर लिया और सिर्फ़ बेटे की यादों में लिपटी रहीं। जगजीत जी किसी तरह संभले और जिन्दगी को दोबारा पटरी पर लाने की कौशिश की। उन्होने पहली बार लता मंगेशकर जी के साथ एलबम बनायी ‘सजदा’ ये एलबम भी सुपर हिट रही, मेरी भी पंसदीदा एलबम में से ये एक हैं इसी का एक गाना जो मुझे बहुत पंसद है आप भी सुनिए………

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी


इसकी दूसरी किश्त पढ़ें
प्रस्तुति - अनीता कुमार

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ