Showing posts with label bharat vyas. Show all posts
Showing posts with label bharat vyas. Show all posts

Sunday, February 25, 2018

राग चन्द्रकौंस : SWARGOSHTHI – 358 : RAG CHANDRAKAUNS




स्वरगोष्ठी – 358 में आज


पाँच स्वर के राग – 6 : “सन सनन सनन जा री ओ पवन…”


प्रभा अत्रे से राग चन्द्रकौंस की बन्दिश और लता मंगेशकर से फिल्म का गीत सुनिए




डॉ. प्रभा अत्रे
लता मंगेशकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पाँच स्वर के राग” की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनमें केवल पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में रागों के गायन अथवा वादन की प्राचीन परम्परा है। संगीत के सिद्धान्तों के अनुसार राग की रचना स्वरों पर आधारित होती है। विद्वानों ने बाईस श्रुतियों में से सात शुद्ध अथवा प्राकृत स्वर, चार कोमल स्वर और एक तीव्र स्वर; अर्थात कुल बारह स्वरो में से कुछ स्वरों को संयोजित कर रागों की रचना की है। सात शुद्ध स्वर हैं; षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। इन स्वरों में से षडज और पंचम अचल स्वर माने जाते हैं। शेष में से ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वरों के शुद्ध स्वर की श्रुति से नीचे की श्रुति पर कोमल स्वर का स्थान होता है। इसी प्रकार शुद्ध मध्यम से ऊपर की श्रुति पर तीव्र मध्यम स्वर का स्थान होता है। संगीत के इन्हीं सात स्वरों के संयोजन से रागों का आकार ग्रहण होता है। किसी राग की रचना के लिए कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वर की आवश्यकता होती है। जिन रागों में केवल पाँच स्वर का प्रयोग होता है, उन्हें औड़व जाति, जिन रागों में छः स्वर होते हैं उन्हें षाडव जाति और जिनमें सातो स्वर प्रयोग हों उन्हें सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। रागों की जातियों का वर्गीकरण राग के आरोह और अवरोह में लगने वाले स्वरों की संख्या के अनुसार कुल नौ जातियों में किया जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। ऐसे रागों को औड़व-औड़व जाति का राग कहा जाता है। श्रृंखला की छठी कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग चन्द्रकौंस का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात गायिका विदुषी प्रभा अत्रे के स्वरों में राग चन्द्रकौंस की एक बन्दिश के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। राग चन्द्रकौंस के स्वरों का फिल्मी गीतों में बहुत कम उपयोग किया गया है। राग चन्द्रकौंस के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1961 में प्रदर्शित फिल्म “सम्पूर्ण रामायण” से वसन्त देसाई का स्वरबद्ध किया एक गीत –“सन सनन सनन जा री ओ पवन…”, लता मंगेशकर के स्वर में सुनवा रहे हैं।



आज का राग “चन्द्रकौंस” है। इस राग में हम आपको दो रचनाएँ सुनवाएँगे। सबसे पहले आप 1961 में प्रदर्शित “सम्पूर्ण रामायण” फिल्म से राग चन्द्रकौंस पर आधारित एक मोहक गीत सुनेंगे। गीतकार भरत व्यास का लिखा और संगीतकार वसन्त देसाई का स्वरबद्ध किया यह गीत है। फिल्मी गीतों में रागों का प्रयोग और इस मामले में कभी भी समझौता न करने में संगीतकर वसन्त देसाई अग्रणी थे। फिल्म संगीत की बदलती प्रवृत्तियों के बावजूद उन्होने अपने शुरुआती दौर से लेकर वर्ष 1975 तक अपनी अन्तिम फिल्म “शक” तक अपने संगीत में रागों का साथ नहीं छोड़ा। इस प्रतिबद्धता के कारण लोकप्रियता को एक कसौटी के र्रोप में बहुत महत्वपूर्ण नहीं समझा गया और यही कारण है कि उनके लोकप्रिय गीतों की संख्या बहुत अधिक नहीं है। आज का गीत लता मंगेशकर का गाया हुआ है। परन्तु वसन्त देसाई कभी भी लता मंगेशकर पर आश्रित नहीं थे। लता मंगेशकर के बिना भी उनके राग आधारित संगीत के बल पर आठवें दशक की फिल्म “गुड्डी” का गीत –“बोले रे पपीहरा...” वाणी जयराम के स्वर में अत्यन्त लोकप्रिय हुआ था। ऐसे ही सिद्धान्तवादी, स्वाभिमानी और आत्मविश्वास से परिपूर्ण संगीतकार वसन्त देसाई द्वारा स्वरबद्ध राग चन्द्रकौंस पर आधारित गीत –“सन सनन सनन जा री ओ पवन...” लता मंगेशकर के स्वर में सुनिए।

राग चन्द्रकौंस : “सन सनन सनन जा री ओ पवन...” : लता मंगेशकर : फिल्म – सम्पूर्ण रामायण



रे प वर्जित, कोमल ग नि, औड़व कर विस्तार,
म स वादी-संवादी सों, चन्द्रकौंस तैयार।
राग चन्द्रकौंस को भैरवी थाट का जन्य राग माना जाता है। इस राग में गान्धार और धैवत स्वर कोमल लगाए जाते हैं। ऋषभ और पंचम स्वर पूर्णतः वर्जित होता है। केवल पाँच स्वर का राग होने से इस राग की जाति औड़व-औड़व होती है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग चन्द्रकौंस का गायन-वादन मध्यरात्रि के समय सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। राग मधुवन्ती की तरह यह भी आधुनिक राग है जिसकी रचना राग मालकौंस के कोमल निषाद को शुद्ध निषाद में परिवर्तित करने से हुई है। यह राग भैरवी थाट के अन्तर्गत माना जाता है, किन्तु सत्य तो यह है की राग चन्द्रकौंस पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा प्रवर्तित दस थाट में से किसी भी थाट के अन्तर्गत नहीं आता। उच्चस्तर के कई राग हैं, जैसे अहीर भैरव, आनन्द भैरव, मधुवन्ती, चन्द्रकौंस आदि, जो दस थाट में से किसी भी थाट के अन्तर्गत नहीं आते। राग चन्द्रकौंस तीनों सप्तकों में समान रूप से प्रयोग किया जाता है और तीनों सप्तकों में खिलता है। इस राग में विलम्बित व द्रुत खयाल, तराना आदि गाया जाता है, किन्तु ठुमरी नहीं गायी जाती। इस राग को गाते-बजाते समय बीच-बीच में शुद्ध निषाद प्रयोग करने की आवश्यकता होती है, इससे एक ओर राग चन्द्रकौंस के स्वरूप की स्थापना होती है तो दूसरी ओर राग मालकौंस से बचाव भी होता रहता है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, विदुषी प्रभा अत्रे के स्वर में भक्तिरस से परिपूर्ण एक खयाल रचना। यह रचना एकताल में निबद्ध है। आप इस खयाल रचना का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग चन्द्रकौंस : “सगुण स्वरूप नन्दलाल...” : डॉ. प्रभा अत्रे


संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 358वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 360वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 3 मार्च, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 360वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 356वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1966 में प्रदर्शित फिल्म “दिल दिया दर्द लिया” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – वृन्दावनी सारंग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल व कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – आशा भोसले और मुहम्मद रफी

“स्वरगोष्ठी” की पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” की छठी कड़ी में आपने राग चन्द्रकौंस का परिचय प्राप्त किया। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने लिए विदुषी डॉ. प्रभा अत्रे के स्वर में राग चन्द्रकौंस के एक द्रुत खयाल का रसास्वादन किया था। साथ ही आपने फिल्म “सम्पूर्ण रामायण” से राग चन्द्रकौंस के स्वरों में पिरोया एक मधुर गीत लता मंगेशकर के स्वर में सुना। पिछले अंक में संगीतकार चाँद परदेशी का चित्र हम सबके लिए उपलब्ध कराने वाले पाठक बीकानेर, राजस्थान के लक्ष्मीनारायण सोनी अब हमारे नियमित पाठक बन गए हैं। हमें विश्वास है कि श्री सोनी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक में पाँच स्वर के एक अन्य राग पर आपसे चर्चा करेंगे। इस नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, September 11, 2016

सूर मल्हार : SWARGOSHTHI – 283 : SUR MALHAR




स्वरगोष्ठी – 283 में आज


पावस ऋतु के राग – 4 : पण्डित भीमसेन जोशी से सुनिए सूर मल्हार


“बादरवा गरजत आए...” और “बादरवा बरसन लागी...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पावस ऋतु के राग” की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की चौथी कड़ी में आज हम राग गौड़ मल्हार पर चर्चा करेंगे। आज की कड़ी में हम आपको पहले फिल्म संगीतकार वसन्त देसाई का स्वरबद्ध किया, राग सूर मल्हार पर आधारित फिल्म ‘रामराज्य’ का एक गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे। इसके बाद राग का वास्तविक स्वरूप उपस्थित करने के लिए सुविख्यात गायक पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में हम इस राग के दो खयाल रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे, जिसके बोल हैं- ‘बादरवा गरजत आए...’ और ‘बादरवा बरसन लागी...’।


ल्हार अंग के रागों की श्रृंखला में कुछ राग अपने युग के महान संगीतज्ञों, कवियों के नाम पर प्रचलित है। ऐसा ही एक उल्लेखनीय राग है- सूर मल्हार। ऐसी मान्यता है कि इस राग की रचना हिन्दी के भक्त कवि सूरदास ने की थी। इस ऋतु प्रधान राग में निबद्ध रचनाओं में पावस के सजीव चित्रण का गुण तो होता ही है, नायिका के विरह के भाव को सम्प्रेषित करने की क्षमता भी होती है। राग सूर मल्हार काफी थाट का राग माना जाता है। इसकी जाति औडव-षाडव होती है, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में छः स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इसका वादी मध्यम और संवादी षडज होता है। यह उत्तरांग प्रधान राग है। राग सूर मल्हार में दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। आरोह में गान्धार और धैवत स्वरों का तथा अवरोह में गान्धार स्वर का प्रयोग वर्जित होता है।

फिल्मी संगीतकारों ने वर्षा ऋतु के इस राग सूर मल्हार पर आधारित एकाध गीत ही रचे हैं, जिसमें वर्षा ऋतु के अनुकूल भावों की अभिव्यक्ति हो। संगीतकार वसन्त देसाई का संगीतबद्ध किया एक कर्णप्रिय गीत हमे अवश्य उपलब्ध हुआ। फिल्म संगीतकारों में वसन्त देसाई एक ऐसे संगीतकार रहे हैं जिनकी रचनाओं में रागदारी संगीत के प्रति लगाव और उनकी प्रतिबद्धता के स्पष्ट दर्शन होते हैं। मल्हार अंग के रागों के प्रति उनका लगाव उनकी अन्तिम फिल्म ‘शक’ तक निरन्तर बना रहा। मल्हार अंग के रागों पर संगीतकार वसन्त देसाई ने अनेक फिल्मी गीतों की रचना की है। उनके द्वारा संगीतबद्ध राग मियाँ मल्हार में स्वरबद्ध ‘गुड्डी’ का गीत -'बोले रे पपीहरा...' तो बेहद लोकप्रिय है। आज के अंक में हम राग सूर मल्हार के स्वरों में पिरोया उनका एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। 1967 में प्रदर्शित फिल्म ‘रामराज्य’ का यह गीत है, जिसे भरत व्यास ने लिखा, वसन्त देसाई ने संगीतबद्ध किया और लता मंगेशकर ने स्वर दिया है।


राग सूर मल्हार : ‘डर लागे गरजे बदरवा..’ : लता मंगेशकर : फिल्म रामराज्य



इस राग की कुछ अन्य विशेषताओं को रेखांकित करते हुए जाने-माने इसराज और मयूर वीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने बताया कि सूर मल्हार का मुख्य अंग है- सा [म]रे प म, नी(कोमल) म प, नी(कोमल)ध प, म रे सा होता है। राग के गायन-वादन में यदि सारंग झलकने लगे तो नी(कोमल) ध s म प नी(कोमल) ध s प स्वरों का प्रयोग करने से सारंग तिरोहित हो जाता है। श्री मिश्र के अनुसार सारंग के भाव में मेघ मल्हारांश उद्वेग के चपल और गम्भीर ओज से युक्त भाव में राग देस के अंश के विरह भाव के मिश्रण से कसक-युक्त उल्लास में वेदना के मिश्रण से नये रस-भाव का सृजन होता है। अब आप पण्डित भीमसेन जोशी से सुनिए, राग सूर मल्हार में निबद्ध दो मोहक खयाल रचनाएँ। मध्यलय की रचना एकताल में है, जिसके बोल हैं- ‘बादरवा गरजत आए...’ और इसके बाद द्रुत तीनताल की बन्दिश के बोल हैं- ‘बादरवा बरसन लागी...’। आप इन खयाल रचनाओं को सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग सूर मल्हार : ‘बादरवा गरजत आए...’ और ‘बादरवा बरसन लागी...’ : पण्डित भीमसेन जोशी





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 283वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको लगभग चार दशक की फिल्म से लिये गए एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 290वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें गायिका का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 17 सितम्बर, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम ‘स्वरगोष्ठी’ के 285वें अंक में प्रकाशित किया जाएगा। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 281 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1951 में प्रदर्शित फिल्म ‘मल्हार’ से राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – गौड़ मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायिका – लता मंगेशकर

इस बार की संगीत पहेली में पाँच प्रतिभागियों ने प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। इस बार की पहेली में हमारे नियमित विजेता प्रतिभागी हैं - हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी। आप सभी पाँच विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


तीसरे सत्र के विजेता


इस वर्ष की तीसरे सत्र की पहेली (271 से 280वें अंक) में प्राप्तांकों की गणना के बाद सर्वाधिक 20 अंक अर्जित कर तीन प्रतिभागियों - पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी ने प्रथम स्थान प्राप्त किया है। 18 अंक प्राप्त कर चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल ने दूसरा, और 16 अंक अर्जित कर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने इस सत्र में तीसरा स्थान प्राप्त किया है। सत्र के सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में जारी हमारी श्रृंखला ‘पावस ऋतु के राग’ की आज यह दूसरी कड़ी है। आज की कड़ी में आपने राग सूर मल्हार का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में हम वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले मल्हार अंग के कुछ रागों को चुन कर आपके लिए हम प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी, हमें लिखिए। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी कड़ी में वर्षा ऋतु का ही एक राग प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव या फरमाइश ऊपर दिये गए ई-मेल पते पर शीघ्र भेजिए। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


 


Sunday, April 19, 2015

बिलावल थाट के राग : SWARGOSHTHI – 215 : BILAWAL THAAT




स्वरगोष्ठी – 215 में आज


दस थाट, दस राग और दस गीत – 2 : बिलावल थाट


'तेरे सुर और मेरे गीत दोनों मिल कर बनेगी प्रीत...' 





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ के दूसरे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। श्रृंखला के आज के अंक में हम आपसे बिलावल थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग बिलावल में निबद्ध एक खयाल प्रस्तुत करेंगे। साथ ही इस थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत राग बिहाग के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे।



भारतीय संगीत के रागों को उनमें लगने वाले स्वरों के अनुसार वर्गीकृत करने की प्रणाली को थाट कहा जाता है। पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने कुल दस थाट के अन्तर्गत सभी रागों का वर्गीकरण किया था। उन्होने थाट के कुछ लक्षण बताए हैं। किसी भी थाट में कम से कम सात स्वरों का प्रयोग ज़रूरी है। थाट में ये सात स्वर स्वाभाविक क्रम में रहने चाहिये। अर्थात सा के बाद रे, रे के बाद ग आदि। थाट को गाया-बजाया नहीं जा सकता। इसके स्वरों के अनुकूल किसी राग की रचना की जा सकती है, जिसे गाया बजाया जा सकता है। एक थाट से कई रागों की रचना हो सकती है। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में हमने आपको ‘कल्याण’ थाट का परिचय दिया था। आज का दूसरा थाट है- ‘बिलावल’। इस थाट में प्रयोग होने वाले स्वर हैं- सा, रे, ग, म, प, ध, नि अर्थात सभी शुद्ध स्वर का प्रयोग होता है। पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे कृत ‘क्रमिक पुस्तक मालिका’ (भाग-1) के अनुसार ‘बिलावल’ थाट का आश्रय राग ‘बिलावल’ ही है। इस थाट के अन्तर्गत आने वाले अन्य प्रमुख राग हैं- अल्हैया बिलावल, बिहाग, देशकार, हेमकल्याण, दुर्गा, शंकरा, पहाड़ी, भिन्न षडज, हंसध्वनि, माँड़ आदि। राग ‘बिलावल’ में सभी सात शुद्ध स्वरों का प्रयोग होता है। वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गांधार होता है। इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल का प्रथम प्रहर होता है।

उस्ताद अब्दुल करीम खाँ 
अब हम आपको राग ‘बिलावल’ पर आधारित एक खयाल रचना सुनवाते हैं। यह रचना एक ऐसे महान संगीतज्ञ की आवाज़ में है, जो उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत के बीच एक सेतु थे। किराना घराने के इस महान कलासाधक को हम उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के नाम से जानते हैं। इस महान संगीतज्ञ का जन्म उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुजफ्फरनगर जिले में स्थित कैराना नामक कस्बे में वर्ष 1884 में हुआ था। आज जिसे हम संगीत के किराना घराने के नाम से जानते हैं वह इसी कस्बे के नाम पर पड़ा था। एक संगीतकार परिवार में जन्में अब्दुल करीम खाँ के पिता का नाम काले खाँ था। खाँ साहब के तीन भाई क्रमशः अब्दुल लतीफ़ खाँ, अब्दुल मजीद खाँ और अब्दुल हक़ खाँ थे। सुप्रसिद्ध गायिका रोशन आरा बेग़म सबसे छोटे भाई अब्दुल हक़ की सुपुत्री थीं। जन्म से ही सुरीले कण्ठ के धनी अब्दुल करीम खाँ की सीखने की रफ्तार इतनी तेज थी कि मात्र छः वर्ष की आयु में ही संगीत की सभाओं गाने लगे थे। उनकी प्रतिभा प्रतिभा इतनी विलक्षण थी कि पन्द्रह वर्ष की आयु में बड़ौदा दरबार में गायक के रूप में नियुक्त हो गए थे। वहाँ वे 1899 से 1902 तक रहे और उसके बाद मिरज चले गए। आइए, खाँ साहब की आवाज़ में सुनिए राग बिलावल की एक दुर्लभ रिकार्डिंग।


राग बिलावल : ‘प्यारा नज़र नहीं आवे...’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ




संगीतकार बसन्त देसाई 
राग बिलावल का उल्लेख ‘गुरुग्रन्थ साहब’ में भी मिलता है। सम्पूर्ण गुरुवाणी को 31 रागों में बाँधा गया है। इसके 16वें क्रम पर राग बिलावल में निबद्ध पद हैं। ग्रन्थ के पृष्ठ संख्या 795 से लेकर 859 तक की रचनाएँ इसी राग में निबद्ध हैं। बिलावल थाट के अन्तर्गत आने वाले रागों में एक प्रमुख राग बिहाग भी है, जिसमे सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग होता है। बिहाग, औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात इसके आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वरों का प्रयोग होता है। इस राग के आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। राग बिहाग के आरोह के स्वर हैं- साग मप निसां और अवरोह के स्वर हैं- सां निधप मग रेसा। यह राग रात्रि के दूसरे प्रहर में गाया-बजाया जाता है। अब हम आपको राग बिहाग में पिरोया एक आकर्षक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1959 में प्रदर्शित संगीत-प्रधान फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ से लिया है। भरत व्यास के लिखे गीत को संगीतकार बसन्त देसाई ने राग बिहाग के स्वरों में संगीतबद्ध किया है। गीत के बोल हैं- ‘तेरे सुर और मेरे गीत, दोनों मिल कर बनेगी प्रीत...’ जिसे लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। लीजिए, अब आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग बिहाग : ‘तेरे सुर और मेरे गीत...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – गूँज उठी शहनाई : संगीत – बसन्त देसाई


संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 215वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको फिल्म में शामिल एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 220 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश में किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 - क्या आप गायिका की आवाज़ को पहचान रहे है? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 25 अप्रेल, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 217वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 213वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको विख्यात गायक उस्ताद राशिद खाँ द्वारा प्रस्तुत खयाल का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछे गए थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग यमन, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- मध्यलय तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- उस्ताद राशिद खाँ। इस बार की पहेली में पहले और दूसरे प्रश्न के सही उत्तर देकर तीनों प्रतिभागियों ने पूरे दो-दो अंक अर्जित किये हैं। तीसरे प्रश्न के उत्तर में तीनों प्रतिभागी भ्रमित हुए। जबलपुर से क्षिति तिवारी ने इस प्रश्न कोई उत्तर नहीं दिया है। हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने गायक कलाकार को उस्ताद अमीर खाँ के रूप में पहचाना है। पेंसिलवेनिया, अमेरिका की विजया राजकोटिया ने एकदम सही उत्तर तो नहीं दिया है, किन्तु उस्ताद राशिद खाँ के साथ पण्डित राजन मिश्र के नाम का विकल्प भी दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ जारी है। श्रृंखला के आज के अंक में हमने आपसे बिलावल थाट और राग पर सोदाहरण चर्चा की। अगले अंक से हम एक और थाट के साथ उपस्थित होंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों के अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फर्माइशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Sunday, August 14, 2011

जननी जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान है....भारत व्यास के शब्दों में मातृभूमि का जयगान

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 721/2011/161



नमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी दोस्तों का हार्दिक स्वागत है इस नए सप्ताह में। दोस्तों, कल है 15 अगस्त, इस देश का एक बेहद अहम दिन। 200 वर्ष की ग़ुलामी के बाद इसी दिन 1947 में हमें आज़ादी मिली थी। पर इस आज़ादी को प्राप्त करने के लिए न जाने कितने प्राण न्योछावर हुए, न जाने कितनी औरतें विधवा हुईं, न जाने कितने गोद उजड़ गए, और न जाने कितने बच्चे अनाथ हो गए। अपने देश की ख़ातिर प्राणों की आहुति देने वाले अमर शहीदों को समर्पित करते हुए प्रस्तुत है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'वतन के तराने'।



देशभक्ति गीतों की इस शृंखला को हम सजा रहे हैं दस अलग-अलग ऐसे गीतकारों की लिखी हुई देशभक्ति की रचनाओं से जिनमें स्तुति है जननी जन्मभूमि की, वंदनवार है इस शस्य श्यामला धरा की, राष्ट्रीय स्वाभिमान की, देश के गौरव की। ये वो अमर गानें हैं दोस्तों, जो गाथा सुनाते हैं उन अमर महर्षियों की जिन्होंने न्योछावर कर दिये अपने प्राण इस देश पर, अपनी मातृभूमि पर। "मातृभूमि के लिए जो करता अपने रक्त का दान, उसका जीवन देवतूल्य है उसका जन्म महान"। स्वर्ग से महान अपनी इस मातृभूमि को सलाम करते हुए इस शृंखला का पहला गाना हमने चुना है गीतकार भरत व्यास का लिखा हुआ। वीरों की धरती राजस्थान में जन्म हुआ था भरत व्यास का। लेकिन कर्मभूमि उन्होंने बनाया मुंबई को। भरत व्यास के फ़िल्मी गीत भी साहित्यिक रचनाओं की श्रेणी में स्थान पाने योग्य हैं। काव्य के शील और सौंदर्य से सम्पन्न जितने उत्कृष्ट उनके रूमानी गीत हैं,उतने ही उत्कृष्ट हैं उनके देशभक्ति की रचनाएँ। और इनमें से जिस रचना को आज हमनेचुना है वह है फ़िल्म 'सम्राट पृथ्वीराज चौहान' का, "जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है..."।मन्ना डे और साथियों के गाये इस गीत को स्वरबद्ध किया था, वसंत देसाई नें। भरत व्यास - वसंत देसाई की जोड़ी का एक और उत्कृष्ट देशभक्ति गीत है फ़िल्म 'लड़की सह्याद्रि की' में पंडित जसराज की आवाज़ में "वंदना करो, अर्चना करो"।



पृथ्वीराज (1149-1192), जो सम्राट पृथ्वीराज चौहान के नाम से जाने जाते हैं, हिन्दू चौहान साम्राज्य के राजा थे जिन्होंने 12वीं सदी के उत्तरार्द्ध में अजमेर और दिल्ली पर राज किया। पृथ्वीराज चौहान अंतिम हिन्दू राजा थे जो दिल्ली के सिंहासन में बैठे। अपने नाना बल्लाल सेन (बंगाल के सेन साम्राज्य) से 20 वर्ष की आयु में सन्‍ 1169 में पृथ्वीराज को अजमेर और दिल्ली का शासन मिला था। उन्होंने वर्तमान राजस्थान और हरियाणा मेंराजपूतों को एकत्रित कर विदेशी आक्रमणों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। पृथ्वीराज नें 1175 में कन्नौज के राजा जयचन्द्र राठौड़ की बेटी संयोगिता को भगाकर ले गए। पृथ्वीराज-संयोगिता की प्रेम कहानी भारत में मशहूर है, जिसे चौहान साम्राज्य के कवि और मित्र चन्द बरदाई नें अपनी कविता में क़ैद किया। तरैन की पहली लड़ाई में 1191 में पृथ्वीराजचौहान नें शहाबुद्दीन मोहम्मद गोरी को परास्त किया। गोरी नें अगले ही वर्ष दोबारा आक्रमण किया जिसमें पृथ्वीराज को हार स्वीकारनी पड़ी। उन्हें क़ैद कर लिया गया और गोरी उन्हें ग़ज़नी ले गए जहाँ उन्हें मृत्यु प्रदान की गई। और इस तरह से दिल्ली हिन्दू राजाओं के हाथ से निकल कर विदेशी मुस्लिम आक्रमणकर्ताओं के कब्ज़े में चला गया। पृथ्वीराज चौहान की देशभक्ति की गाथा अमर वीरगाथाओं में शोभा पाता है। आइए 'वतन के तराने' शृंखला की पहली कड़ी में इस वीर योद्धा को नमन करते हुए उन्हीं पर बनीफ़िल्म का गीत सुनें "जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है"। साथ ही स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या पर हम अपने सभी श्रोता-पाठकों का हार्दिक अभिनन्दन करते हैं।



फिल्म – सम्राट पृथ्वीराज चौहान : ‘जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है’ : गीतकार –भरत व्यास





(समय के अभाव के चलते कुछ दिनों तक हम ऑडियो प्लेयर के स्थान पर यूट्यूब लिंक लगा रहे हैं, आपका सहयोग अपेक्षित है)



और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-



सूत्र १ - गीतकार हैं राजेंद्र कृष्ण.

सूत्र २ - ये फिल्म दुनिया के एक महान योद्धा की अमर दास्तान है.

सूत्र ३ - गीत में देश के उस नाम का जिक्र है जिस नाम से ये देश जाना जाता था.



अब बताएं -

संगीतकार कौन है - ३ अंक

गायक बताएं - २ अंक

फिल्म का नाम बताएं - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

अमित जी बढ़िया शुरुआत....अवध जी को भी बधाई



खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, April 26, 2011

क्यों अखियाँ भर आईं, भूल सके न हम तुम्हे....सुनिए मन्ना दा का स्वरबद्ध एक गीत भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 643/2010/343

'अपने सुरों में मेरे सुरों को बसा लो' - मन्ना डे पर केन्द्रित इस शृंखला में मैं, कृष्णमोहन मिश्र आप सभी का एक बार फिर स्वागत करता हूँ। कल की कड़ी में हमने आपसे मन्ना डे को फ़िल्मी पार्श्वगायन के क्षेत्र में मिले पहले अवसर के बारे में चर्चा की थी। दरअसल फिल्म 'रामराज्य' का निर्माण 1942 में शुरू हुआ था किन्तु इसका प्रदर्शन 1943 में हुआ। इस बीच मन्ना डे ने फिल्म 'तमन्ना' के लिए सुरैया के साथ एक युगल गीत भी गाया। इस फिल्म के संगीत निर्देशक मन्ना डे के चाचा कृष्ण चन्द्र डे थे। सुरैया के साथ गाये इस युगल गीत के बोल थे- 'जागो आई उषा, पंछी बोले....'। कुछ लोग 'तमन्ना' के इस गीत को मन्ना डे का पहला गीत मानते हैं। सम्भवतः फिल्म 'रामराज्य' से पहले प्रदर्शित होने के कारण फिल्म 'तमन्ना' का गीत मन्ना डे का पहला गीत मान लिया गया हो। इन दो गीतों के रूप में पहला अवसर मिलने के बावजूद मन्ना डे का आगे का मार्ग बहुत सरल नहीं था। एक बातचीत में मन्ना डे ने बताया कि पहला अवसर मिलने के बावजूद मुझे काफी प्रतीक्षा करनी पड़ी। "रामराज्य" का गीत गाने के बाद मन्ना डे के पास धार्मिक गानों के प्रस्ताव आने लगे। उस दौर में उन्होंने फिल्म 'कादम्बरी', 'प्रभु का घर', विक्रमादित्य', 'श्रवण कुमार', 'बाल्मीकि', 'गीतगोविन्द' आदि कई फिल्मों में गीत गाये किन्तु इनमें से कोई भी गीत मन्ना डे को श्रेष्ठ गायक के रूप में स्थापित करने में सफल नहीं हुआ। हालाँकि इन फिल्मों के संगीतकार अनिल विश्वास, शंकर राव व्यास, पलसीकर, खान दत्ता, ज़फर खुर्शीद, बुलो सी रानी, सुधीर फडके आदि थे।

इस स्थिति का कारण पूछने पर मन्ना डे बड़ी विनम्रता से कहते हैं- "उन दिनों मुझसे बेहतर कई गायक थे जिनके बीच मुझे अपनी पहचान बनानी थी"। मन्ना डे का यह कथन एक हद तक ठीक हो सकता है किन्तु पूरी तरह नहीं। अच्छा गाने के बावजूद पहचान न बन पाने के दो कारण और थे। मन्ना डे से हुई बातचीत में यह तथ्य भी उभरा कि उन दिनों ग्रामोफोन रिकार्ड पर गायक कलाकार का नाम नहीं दिया जाता था, जिससे उनके कई अच्छे प्रारम्भिक गाने अनदेखे और अनसुने रह गए। दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि उस दौर में उन्हें अधिकतर धार्मिक फिल्मों के हलके-फुल्के गाने ही मिले। इस परिस्थिति से मन्ना डे लगातार संघर्ष करते रहे।

मन्ना डे कोलकाता से मुम्बई अपने चाचा के सहायक की हैसियत से आए थे। उनकी यह भूमिका अपनी पहचान न बना पाने के दौर में अधिक महत्वपूर्ण हो गई थी। वो अपने चाचा को पितातुल्य मानते थे। एक साक्षात्कार में मन्ना डे ने कहा भी था- "मेरे लिए वो आराध्य, मित्र और मार्गदर्शक थे। वह उन दिनों बंगाल के संगीत जगत, विशेषकर कीर्तन गायन के क्षेत्र में शिखर पुरुष थे। मैंने अपने चाचा को कीर्तन गाते हुए देखा था। जब वो गाते थे, श्रोताओं की ऑंखें आँसुओं से भींगी होती थी। उनका सहायक बनना मेरे लिए सम्मान की बात थी। बर्मन दादा (सचिन देव बर्मन) और पंकज मल्लिक जैसे संगीतकार मेरे चाचा से मार्गदर्शन प्राप्त करने आया करते थे"। ऐसे योग्य कलासाधक की छत्र-छाया में रह कर मन्ना डे संगीत रचना भी किया करते थे। टेलीविजन के कार्यक्रम 'सा रे गा म प' में एक बार गायक सोनू निगम से बातचीत करते हुए मन्ना डे ने बताया था कि अपने कैरियर के शुरुआती दौर में वो अपने चाचा के अलावा सचिन देव बर्मन, खेमचन्द्र प्रकाश और अनिल विश्वास के सहायक भी रहे और स्वतंत्र रूप से संगीत निर्देशक भी। उन्होंने सोनू निगम से यह भी कहा था- "संगीत रचना मैं आज भी कर सकता हूँ, यह मेरा सबसे पसन्दीदा कार्य है।"

50 के दशक में मन्ना डे ने खेमचन्द्र प्रकाश के साथ फिल्म 'श्री गणेश जन्म' और 'विश्वामित्र' तथा स्वतंत्र रूप से फिल्म 'महापूजा', 'अमानत', 'चमकी', 'शोभा', 'तमाशा' आदि में संगीत निर्देशन किया था। फिल्म 'चमकी' में मुकेश ने गीतकार प्रदीप का लिखा गीत- "कैसे ज़ालिम से पड़ गया पाला..." तथा फिल्म 'तमाशा' में लता मंगेशकर ने मन्ना डे के संगीत निर्देशन में गीत- "क्यों अँखियाँ भर आईं भूल सके न हम...." गाया | इस गीत को भरत व्यास ने लिखा है | आइए मन्ना डे की संगीत-रचना-कौशल का उदाहरण सुनते हुए आगे बढ़ते हैं |



दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 04/शृंखला 15
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - एक सुप्रसिद्ध गीत.

सवाल १ - कौन सी दो आवाजें हैं और हैं इस गीत में, याद रहे दोनों गायकों के नाम बताने पर ही पूरे अंक मिलेंगे- ३ अंक
सवाल २ - किस शायर की है मूल रचना - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी, अनजाना जी, प्रदीप जी और क्षितिज जी को बधाई

खोज व आलेख- कृष्णमोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, December 6, 2010

चली राधे रानी, आँखों में पानी....भक्ति और प्रेम का समावेश है ये गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 542/2010/242

"With his very first film Udayer Pathe (Hamrahi in Hindi), Bimal Roy was able to sweep aside the cobwebs of the old tradition and introduce a realism and subtely that was wholly suited to the cinema. He was undoubtedly a pioneer. He reached his peak with a film that still reverberates in the minds of those who saw it when it was first made. I refer to Do Bigha Zamin, which remains one of the landmarks of Indian Cinema."~ Satyajit Ray

सत्यजीत रे के इन उद्गारों के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की आज की महफ़िल की हम शमा जला रहे हैं। बिमल रॊय के फ़िल्मी सफ़र की कहनी कल आकर रुकी थी न्यु थिएटर्स में उनके द्वारा किए गये छायांकन वाले फ़िल्मों तक। इस तरह से तक़नीकी सहायक के रूप में कार्य करने के बद बिमल दा को पहली बार फ़िल्म निर्देशन का मौका मिला सन् १९४४ में, और वह बंगला फ़िल्म थी 'उदयेर पौथे' (उदय के पथ पर)। इसी फ़िल्म का हिंदी में अगले ही साल निर्माण हुआ जिसका शीर्षक रखा गया था 'हमराही'। यह फ़िल्म श्रेणी विभाजन (class discrimination) के मुद्दे को लेकर बनाई गई थी। 'उदयेर पौथे' बंगाल में बहुत ज़्यादा चर्चित हुई थी क्योंकि उस समय इतनी ज़्यादा तकनीकी रूप से विकसीत फ़िल्म नहीं बनी थी बंगला में। बिमल दा निर्देशित ४० के दशक की दो और बंगला फ़िल्में हैं - अंजानगढ़ (१९४८) और 'मंत्रमुग्ध' (१९४९)। 'अंजानगढ़' को हिंदी में भी उसी साल बनाया गया था। १९५० में न्यु थिएटर्स ने नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और उनके 'आज़ाद हिंद फ़ोर्स' को लेकर एक फ़िल्म निर्देशित की 'पहला आदमी', जिसके संगीतकार थे आर. सी. बोराल। इसी विषय को लेकर इसी साल बम्बई में फ़िल्मिस्तान ने बनाई 'समाधि'। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बंगाल का राजनैतिक दृश्य कुछ ऐसा हो गया था कि वहाँ कि फ़िल्म कंपनियाँ बंद होने के कगार पर आ गई थी। ऐसे में बहुत से बड़े कलाकार बम्बई स्थानांतरित हो गए। बिमल रॊय भी उन्हीं में से एक थे। बम्बई आकर बिमल दा बॊम्बे टॊकीज़ से जुड़ गए और १९५२ में उन्होंने दो फ़िल्में निर्देशित कीं - 'मोरध्वज' और 'माँ'। इन दोनों फ़िल्मों में संगीत एस. के. पाल का था। वह बॊम्बे टॊकीज़ का अंतिम समय था। इसलिए बिमल दा ने यह निर्णय लिया कि ख़ुद की एक फ़िल्म कंपनी खोली जाए। और इस तरह से स्थापना हुई 'बिमल रॊय प्रोडक्शन्स' की। इस बैनर की पहली फ़िल्म हेतु बिमल दा ने एक कम बजट की फ़िल्म बनाने की सोची। इसलिए अपने कलकत्ते के तीन और दोस्त - सलिल चौधरी, नवेन्दु घोष और असित सेन, इन सबों को लेकर सलिल चौधरी की उपन्यास 'रिक्शावाला' पर आधारित 'दो बीघा ज़मीन' बनाने की योजना बनाई। उसके बाद क्या हुआ, यह इतिहास बन चुका है। १९५३ में बनी 'दो बिघा ज़मीन' के बारे में एक बार बताया था सलिलदा की बेटी अंतरा चौधरी ने जिसे हमने आप तक पहुँचाया था 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की ९१-वीं कड़ी में। इसलिए आज उसे यहाँ नही दोहरा रहे हैं। बल्कि सीधे बढ़ जाते हैं उनकी अगली फ़िल्म 'परिणीता' पर।

इसी साल १९५३ में बिमल दा ने 'परिणीता' का निर्देशन किया था, लेकिन यह 'बिमल रॊय प्रोडक्शन्स' की प्रस्तुति नहीं थी। अभिनेता अशोक कुमार, जिनका हिमांशु राय और देविका रानी के साथ बहुत अच्छा संबंध था, हमेशा चाहा कि बॊम्बे टॊकीज़ अपनी आर्थिक समस्याओं से बाहर निकले, और इस मकसद से उन्होंने कुछ फ़िल्में प्रोड्युस की। हालाँकि इन फ़िल्मों को सफलता ज़रूर मिली, लेकिन बॊम्बे टॊकीज़ में चल रहे अस्थिरता को ख़त्म नहीं कर सके और १९५२ में बॊम्बे टॊकीज़ में हमेशा के ताला लग गया। अशोक कुमार ने फिर अपनी निजी कंपनी 'अशोक कुमार प्रोडक्शन्स' की नींव रखी और इस बैनर तले पहली फ़िल्म 'परिणीता' का निर्माण किया। शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की मशहूर उपन्यास पर आधारित इस फ़िल्म में मीना कुमारी शीर्षक भूमिका में नज़र आईं थीं और साथ में थे अशोक कुमार और नासिर हुसैन। इस फ़िल्म का एक मुख्य आकर्षण बिमल रॊय का निर्देशन भी था। दादामुनि अशोक कुमार ने बाद में बिमल दा की शान में ये शब्द कहे थे - "In my long experience in this industry I really have not come across another director like Bimal Roy… such commitment to cinema, to perfection. I regret we have few like him today." गायक अरुण कुमार मुखर्जी, जो अशोक कुमार के मौसेरे भाई थे, और अशोक कुमार का प्लेबैक करने के लिए जाने जाते थे ('बंधन', 'झूला', 'क़िस्मत' जैसी फ़िल्मों में इन्होंने दादामुनि के लिए गाया था), तो दादामुनि ने अरुण कुमार को 'परिणीता' में सगीत देने का मौका दिया। भरत व्यास का लिखा और मन्ना डे का गाया इस फ़िल्म का सब से लोकप्रिय गीत था "चले राधे रानी अखियों में पानी, अपने मोहन से मुखड़ा मोड़ के"। इसके अलावा इस फ़िल्म में आशा भोसले ने "गोरे गोरे हाथों में मेहंदी", "कौन मेरी प्रीत के पहले जो तुम" तथा किशोर दा के साथ एक युगल गीत "ऐ बंदी तुम बेगम बनो" गाया था। गीता रॊय की आवाज़ में "चांद है वही सितारें वो ही, गगन फिर भी क्यों उदास है" भी एक सुंदर रचना है। लेकिन फ़िल्म का सब से लोकप्रिय गीत "चले राधे रानी" ही है, और इसीलिए आज हम आपको यही गीत सुनवा रहे है, सुनिए...



क्या आप जानते हैं...
कि अरुण कुमार का ६ दिसम्बर १९५५ को दिल का दौरा पड़ने से असामयिक निधन हो गया था जब वे अशोक कुमार के साथ फ़िल्म 'बंदिश' का ट्रायल शो देख कर कार में वापस लौट रहे थे। यह भी अजीब इत्तेफ़ाक़ की बात है कि जिस अशोक कुमार ने उन्हें फ़िल्मों में अवसर दिलाया, उन्हीं की गोद में सिर रख कर उनका निधन हुआ।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०३ /शृंखला ०५
गीत की एक झलक सुनिए-


अतिरिक्त सूत्र - बिमल रॉय की एक और नायाब फिल्म.

सवाल १ - गायिका पहचानें - २ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - संगीतकार का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्याम कान्त जी को २ अंक और इंदु-रोमेंद्र जी को १-१ अंक की बधाई, इंदु जी और रोमेंद्र जी दोनों ही नियमित नहीं रह पाते और अगर अवध जी भी सही समय पर पहुँच पायें तो मुकाबला और दिलचस्प बन जायेगा.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, November 25, 2010

आधा है चंद्रमा रात आधी.....पर हम वी शांताराम जैसे हिंदी फिल्म के लौह स्तंभ पर अपनी बात आधी नहीं छोडेंगें

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 535/2010/235

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार! 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' - इस लघु शृंखला के पहले खण्ड के अंतिम चरण मे आज हम पहुँच चुके हैं। इस खण्ड में हम बात कर रहे हैं फ़िल्मकार वी. शांताराम की। उनकी फ़िल्मी यात्रा में हम पहुँच चुके थे १९५७ की फ़िल्म 'दो आँखें बारह हाथ' तक। आज बातें उनकी एक और संगीत व नृत्य प्रधान फ़िल्म 'नवरंग' की, जो आई थी ५० के दशक के आख़िर में, साल था १९५९। इससे पहले की हम इस फ़िल्म की विस्तृत चर्चा करें, आइए आपको बता दें कि ६०, ७० और ८० के दशकों में शांताराम जी ने किन किन फ़िल्मों का निर्देशन किया था। १९६१ में फिर एक बार शास्त्रीय संगीत पर आधारित म्युज़िकल फ़िल्म आई 'स्त्री'। 'नवरंग' और 'स्त्री', इन दोनों फ़िल्मों में वसत देसाई का नहीं, बल्कि सी. रामचन्द्र का संगीत था। १९६३ में वादक व संगीत सहायक रामलाल को उन्होंने स्वतंत्र संगीतकार के रूप में संगीत देने का मौका दिया फ़िल्म 'सेहरा' में। इस फ़िल्म के गानें भी ख़ूब चले। १९६४ की में वी. शांताराम ने अपनी सुपुत्री राजश्री शांताराम को बतौर नायिका लॉन्च किया फ़िल्म 'गीत गाया पत्थरों ने' में। जीतेन्द्र की भी यह पहली फ़िल्म थी और इस फ़िल्म के संगीत ने भी ख़ूब नाम कमाया। संगीतकार एक बार फिर रामलाल। १९६६ में 'लड़की सह्याद्री की' और १९६७ में 'बूंद जो बन गए मोती' इस दशक की दो और उल्लेखनीय फ़िल्में थीं। इन दो फ़िल्मों के संगीतकार थे क्रम से वसंत देसाई और सतीश भाटिया। मुकेश की आवाज़ में "ये कौन चित्रकार है" गीत प्रकृति की सुषमा का वर्णन करने वाले गीतों में सर्वोपरी लगता है। ऐसे में १९७१ में 'जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली', १९७२ में 'पिंजरा', १९७५ में 'चंदनाची चोली अंग अंग जली', और १९७७ में 'चानी' नाम की कमचर्चित फ़िल्में आईं जो व्यावसायिक दृष्टि से असफल रही। बहुत कम लोगों ने सुना होगा, पर फ़िल्म 'चानी' में लता का गाया 'मैं तो जाऊँगी जाऊँगी जाऊँगी उस पार" गीत में कुछ और ही बात है। इस गीत को हम खोज पाए तो आपको ज़रूर सुनवाएँगे कभी। १९८६ में शांताराम ने 'फ़ायर' नामक फ़िल्म का निर्देशन किया था जो उनकी फ़िल्मी सफ़र की अंतिम फ़िल्म थी। एक अभिनेता, निर्माता और निर्देशक होने के अलावा वी. शांताराम फ़िल्म सोसायटी' के अध्यक्ष भी रहे ७० के दशक के आख़िर के सालों में। १९८६ में सिनेमा में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए शांताराम जी को दादा साहब फालके पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। ३० अक्तुबर १९९० को वी. शांताराम का बम्बई में निधन हो गया।

दोस्तों, वी. शांताराम के फ़िल्म के जिस गीत से उन पर केन्द्रित इस शृंखला को हम समाप्त कर रहे हैं, वह है फ़िल्म नवरंग का कालजयी युगल गीत "आधा है चन्द्रमा रात आधी, रह ना जाए तेरी मेरी बात अधी, मुलाक़ात आधी"। 'झनक झनक पायल बाजे' की अपार सफलता के बाद सन् १९५९ में शांताराम जी ने कुछ इसी तरह की एक और नृत्य और संगीत-प्रधान फ़िल्म बनाने की सोची और इस तरह से 'नवरंग' की कल्पना की गई। अभिनेत्री के रूप में संध्या को ही फ़िल्म में बरकरार रखा गया, लेकिन नायक के रूप में आ गये महिपाल। संगीत पक्ष के लिए वसंत देसाई की जगह पर आ गई अन्ना साहब यानी कि सी. रामचन्द्र। भरत व्यास ने फ़िल्म के सभी गीत लिखे। आशा भोसले और महेन्द्र कपूर के गाये इस गीत के साथ महेन्द्र कपूर का एक दिलचस्प वक्या जुड़ा हुआ है, जिसे महेन्द्र कपूर ने विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में कहे थे। उनके अनुसार इस गीत के निर्माण के दौरान उनका करीयर दाव पर लग गया था। हुआ युं था कि यह गीत किसी रिकॉर्डिंग स्टुडिओ में नहीं बल्कि 'राजकमल कलामंदिर' में रेकॊर्ड किया जा रहा था, जो एक फ़िल्म स्टुडिओ था। एक तरफ़ वो इस बात से नर्वस थे कि पहली बार अशा भोसले के साथ गा रहे हैं, और दूसरी तरफ़ देखा कि रेकॊर्डिस्ट मंगेश देसाई और दूसरे नकनीकी सहायक एक एक कर के कन्ट्रोल रूम से बाहर निकल के आ रहे हैं और उनकी तरफ़ अजीब निगाहों से देख रहे हैं। सी. रामच्न्द्र मंगेश से पूछते हैं कि 'काय बख्तोस तू?' (तुम क्या देख रहे हो?)। मंगेश देसाई कहते हैं कि रेकॊर्डिंग् कैन्सल करनी पड़ेगी क्योंकि महेन्द्र कपूर की आवाज़ स्थिर नहीं है, और वो नर्वस हैं। तब अन्ना ने कहा कि ये तो फ़र्स्ट क्लास गा रहा है, तुम अपना वायरिंग् चेक करो। और तभी इस बात पर से पर्दा उठा कि महेन्द्र कपूर के माइक्रोफ़ोन का प्लग ढीला हो गया था, जिस वजह से ये कंपन आ रहा था। महेन्द्र कपूर यह मानते हैं कि अगर उस प्लग के ढीले होने की बात पता ना चलती तो शायद उसी दिन उनका करीयर ख़त्म हो जाता। तो दोस्तों, आइए अब इस गीत को सुनते हैं, और इसी के साथ समाप्त करते हैं 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' शृंखला का पहला खण्ड जो समर्पित था महान फ़िल्मकार वी. शांताराम को। अगले हफ़्ते इस शृंखला के दूसरे खण्ड में हम एक और महान फ़िल्मकार के फ़िल्मी सफ़र के साथ हाज़िर होंगे, तब तक के लिए अनुमति दीजिए, शनिवार को 'ईमेल के बहाने, यादों के ख़ज़ाने' में पधारना ना भूलिएगा, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि बतौर लेखक वी. शांताराम को उनकी तीन फ़िल्मों के साथ जोड़ा जा सकता है - 'अमृत मंथन' (संवाद), 'नवरंग' (स्क्रीनप्ले), 'सेहरा' (स्क्रीनप्ले)

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ६ /शृंखला ०४
गीत का प्रील्यूड सुनिए -


अतिरिक्त सूत्र - नौशाद साहब हैं संगीतकार

सवाल १ - किस निर्देशक की चर्चा में होगा ये गीत - २ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गायिका बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्याम कान्त जी एक बार फिर सही निकले. रोमेंद्र समय पर पहुंचे कल तो अमित भाई का भी जवाब उनके लिए एक अंक का बोनस दे गया. शरद जी आज देखते हैं...:)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, November 24, 2010

ए मलिक तेरे बंदे हम....एक कालजयी प्रार्थना जो आज तक एक अद्भुत प्रेरणा स्रोत है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 534/2010/234

फ़िल्मकार वी. शांताराम द्वारा निर्मित और/ या निर्देशित फ़िल्मों के गीतों से सजी लघु शृंखला 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' का पहला खण्ड इन दिनों जारी है। गीतों के साथ साथ हम शांताराम जी के फ़िल्मी सफ़र की भी थोड़ी बहुत संक्षिप्त में चर्चा भी हम कर रहे हैं। पिछली कड़ी में हमने ४० के दशक के उनकी फ़िल्मों के बारे में जाना। आज हम ज़िक्र करते हैं ५० के दशक की। पिछले दो दशकों की तरह यह दशक भी शांताराम जी के फ़िल्मी सफ़र का एक अविस्मरणीय दशक सिद्ध हुआ। १९५० में शांताराम ने समाज की ज्वलंत समस्या दहेज पर वार किया था फ़िल्म 'दहेज' के ज़रिए। ६० वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन आज भी उनकी यह फ़िल्म उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उस ज़माने में थी। इस फ़िल्म में करण दीवान और वी. शांताराम की पत्नी जयश्री शांताराम ने अभिनय किया था। वसंत देसाई का ही संगीत था और जयश्री शांताराम का गाया "अम्बुआ की डाली पे बोले रे कोयलिया" गीत बेहद मकबूल हुआ था। १९५२ में 'परछाइयाँ', १९५३ में 'तीन बत्ती चार रास्ता', १९५४ में 'सुबह का तारा', १९५४ में 'महात्मा कबीर' शांताराम निर्देशित कुछ प्रमुख फ़िल्में थीं ५० के दशक के पहले भाग की। फिर आई १९५५ की फ़िल्म 'झनक झनक पायल बाजे', जिसका एक गीत कल आपने सुना था। यही फ़िल्म वसंत देसाई की ज़िंदगी और शायद हिंदी सिने-संगीत के इतिहास का भी मीलस्तंभ बना। शांताराम की इस महत्वकांक्षी फ़िल्म लिए उन्होंने पूरे देश भर में घूम घूम कर एक से एक बेहतरीन संगीतज्ञों का चयन किया। संगीत नृत्य प्रधान इस फ़िल्म के लिए उन्होंने कलकत्ता से बुलाया सुविख्यात तबला नवाज़ सामता प्रसाद को, संतूर के लिए पंडित शिव कुमार शर्मा को, और सारंगी के लिए पंडित राम नारायण को। यही नहीं फ़िल्म का शीर्षक गीत गवाया गया था शुद्ध शास्त्रीय गायक अमीर ख़ाँ साहब से. अभिनेत्री संध्या और विख्यात नृत्यशिल्पि गोपी कृष्ण जे जानदार अभिनय और नृत्यों से, शांताराम के प्रतिभा से, और वसंत देसाई के धुनों से इस फ़िल्म ने एक इतिहास की रचना की। इस फ़िल्म के सभी गीत शास्त्रीय संगीत पर आधारित हैं। आगे चलकर इस फ़िल्म के गानें जैसे जैसे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर शामिल होते जाएँगे, हर गीत के विशेषताओं की हम तफ़सील से चर्चा करते जाएँगे। इस फ़िल्म के बाद १९५६ में आई थी 'तूफ़ान और दीया' जिसे निर्देशित किया था शांताराम जी के सुपुत्र प्रभात कुमार ने और जिसके बारे में हम चर्चा भी कर चुके हैं और फ़िल्म का शीर्षक गीत भी सुन चुके हैं।

सन् १९५७ में वी. शांताराम ने 'दो आँखें बारह हाथ' फ़िल्म का निर्माण व निर्देशन किया, और स्वयं अभिनय भी किया। यह भी एक कालजयी फ़िल्म साबित हुई। कहानी, अभिनय, छायांकन, कैमरा, निर्देशन, सब कुछ मिलाकार एक बेहतरीन फ़िल्म। १९५८ में इस फ़िल्म को सैन फ़्रांसिस्को फ़िल्म महोत्सव में दिखाया गया था। फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि एक पुलिसवाला (शांताराम) एक फ़ार्म खोलता है जिसके सदस्य हैं ६ ख़ूनी। पंकज राग अपनी किताब 'धुनों की यात्रा' में इस फ़िल्म के बारे में लिखते हैं - "१९५७ में वी. शाताराम डाकुओं की समस्या का गांधीवादी हल लेकर 'दो आँखें बारह हाथ' में आए। इस फ़िल्म को राष्ट्रपति का स्वर्णपदक तथा बर्लिन के फ़िल्म फ़ेस्टिवल में 'सिल्वर लोटस' से पुरस्कृत किया गया था। और साथ में आये वसंत देसाई "ऐ मालिक तेरे बंदे हम" लेकर। नैतिकता से परिपूर्ण प्रार्थना गीतों को भी कितनी सुंदर धुन दी जा सकती है, यह उसी वसंत देसाई ने दिखाया जो पिछले दशक में ऐसे गीतों के सामने अपने संगीत को कई बार बंधा और दबा पाते थे। नतीजा था एक ऐसा गीत जो देश के हर विद्यालय का प्रार्थना गीत बना और आज तक बना हुआ है। देसाई के भैरवी पर कम्पोज़ किए इस गीत से आनेवाली कई पीड़ियाँ प्रेरणा लेती रहेंगे - ऐसी विरासत विरलों को ही नसीब होती है।" दोस्तों, यहाँ पर आकर अगर इस कालजयी प्रार्थना को सुनें बग़ैर ही हम आगे बढ़ जाएँगे तो शायद इस शृंखला के साथ अन्याय होगा। लता मंगेशकर और साथियों की आवाज़ों में इस गीत को अमर बोल दिए थे गीतकार भरत व्यास ने। तो आइए सुनते हैं यह अमर प्रार्थना "ऐ मालिक तेरे बंदे हम, हो ऐसे हमारे करम, नेकी पर चलें, और बदी से टलें, ताकि हँसते हुए निकले दम"। चलते चलते आपको यह भी बता दें कि इसी गीत का एक अन्य वर्ज़न भी है जिसे केवल समूह स्वरों में गाया गया है।



क्या आप जानते हैं...
कि 'दो आँखें बारह हाथ' फ़िल्म को हॊलीवूड प्रेस ऐसोसिएशन ने १९५८ का सर्वश्रेष्ठ विदेशी फ़िल्म होने का गौरव दिलवाया था। यह भारत के लिए जितनी गौरव की बात थी, उतना ही परिचय था शांताराम के प्रतिभा का।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ५ /शृंखला ०४
गीत का इंटरल्यूड सुनिए -


अतिरिक्त सूत्र - कोई और सूत्र चाहिए क्या ?

सवाल १ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - गायक बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
बिट्टू जी ने कल खाता खोला. श्याम जी अमित जी सभी को बधाई.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, November 22, 2010

निर्बल से लड़ाई बलवान की, ये कहानी है दीये की और तूफ़ान की....प्रेरणा का स्रोत है ये गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 532/2010/232

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर पहली बार बीस कड़ियों की एक लघु शृंखला कल से हमने शुरु की है - 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ'। इस शृंखला के पहले खण्ड में आप सुन रहे हैं फ़िल्मकार वी. शांताराम की फ़िल्मों के गीत और पढ़ रहे हैं उनके फ़िल्मी सफ़र का लेखा जोखा। मूक फ़िल्मों से शुर कर कल के अंक के अंत में हम आ पहुँचे थे साल १९३२ में। आज १९३३ से बात को आगे बढ़ाते हैं। इस साल शांताराम ने अपनी फ़िल्म 'सैरंध्री' को जर्मनी लेकर गए आगफ़ा लैब में कलर प्रोसेसिंग् के लिए। लेकिन जैसी उन्हें उम्मीद थी, वैसा रंग नहीं जमा सके। तस्वीरें बड़ी फीकी फीकी थी, वरना यही फ़िल्म भारत की पहली रंगीन फ़िल्म होने का गौरव प्राप्त कर लेती. यह गौरव आर्दशिर ईरानी के 'किसान कन्या' को प्राप्त हुआ आगे चलकर। कुछ समय के लिए शांताराम जर्मनी में रहे क्योंकि उन्हें वहाँ काम करने के तौर तरीक़े बहुत पसंद आये थे। १९३३ में ही 'प्रभात स्टुडियोज़' को कोल्हापुर से पुणे स्थानांतरित कर लिया गया, क्योंकि पुणे फ़िल्म निर्माण का एक मुख्य केन्द्र बनने लगा था। १९३४ में इस स्टुडियो ने प्रदर्शित की फ़िल्म 'अमृत मंथन', जिसका विषय था बौद्ध और दूसरे धर्मों के बीच का तनाव। यह फ़िल्म हिट हुई थी। शांता आप्टे के गाये इस फ़िल्म के गानें भी बहुत लोकप्रिय हुए थे। उसके बाद १९३५ में मराठी संत एकनाथ पर उन्होंने फ़िल्म बनायी 'धर्मात्मा', जिसमें संत एकनाथ का चरित्र निभाया था बाल गंधर्व ने। इस फ़िल्म की एक दिलचस्प बात पढ़िएगा "क्या आप जानते हैं" में। १९३६ में इसी तरह की एक और फ़िल्म आयी 'संत तुकाराम', जिसे १९३७ में वेनिस फ़िल्म फ़ेस्टिवल में पुरस्कृत किया गया था, जो ऐसी पहली भारतीय फ़िल्म थी। विष्णुपति पगनिस ने संत तुकाराम की भूमिका अदी की। वी. शांताराम के हर फ़िल्म में समाज के लिए कोई ना कोई संदेश हुआ करता था। १९३६ में बनी 'अमर ज्योति' एक औरत की कहानी थी जो एक डाकू बनकर अपने पे हुई अन्याय का बदला लेती है। यह एक बिलकुल ही अलग तरह की फ़िल्म थी 'प्रभात' के लिए, जिसमें स्टण्ट और ऐक्शन का बोलबाला था। आगे चलकर इस विषय पर बेशुमार फ़िल्में बनीं। १९३७ में एक और फ़िल्म आई 'दुनिया ना माने', जिसमें भी नारी समस्या केन्द्रबिंदु में थी। ३० के दशक का आख़िरी साल, १९३९ में शांताराम की एक बेहद महत्वपूर्ण फ़िल्म आई 'आदमी' और इस बार विषयवस्तु थी वेश्या। केसर नाम की एक वेश्या के संघर्ष की कहानी थी यह फ़िल्म। हालाँकि पी. सी. बरुआ ने 'देवदास' में चंद्रमुखी को एक बड़े ही भावुक किरदार में प्रस्तुत किया था, शांताराम ने केसर का ऐसा चित्रण क्या जो असली ज़िंदगी के बहुत करीब था। तो ये था ३० के दशक में शांताराम के फ़िल्मी सफ़र का एक संक्षिप्त विवरण। ये सभी फ़िल्में उस ज़माने में बेहद चर्चित हुई थी और शांताराम के इन प्रयासों से 'प्रभात स्टुडियोज़' कामयाबी के शिखर पर पहुँच चुका था।

दोस्तों, कल की कड़ी में हम आपको शांताराम के ४० के दशक की फ़िल्मों के बारे में बताएँगे, लेकिन फ़िल्हाल आइए एक बड़ा ही आशावादी गीत सुनते हैं। कौन सा गीत है, इस गीत से शांताराम जी की कैसी यादें जुड़ी हुई हैं, लीजिए पढ़िए शांताराम जी की ही ज़ुबानी, जो उन्होंने कहे थे विविध भारती के 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम में। "मैं अपनी ज़िंदगी में उपदेशपूर्ण फ़िल्में बनाता आया हूँ। और उनमें सामाजिक, राजनैतिक और मानविक समस्याएँ प्रस्तुत करता रहा हूँ। साथ ही साथ इन समस्याओं को अपने ढंग से सुलझाने की कोशिश भी करता रहा हूँ। मेरी बनाई हुई फ़िल्में देखने के बाद देश के कोने कोने से लोग मुझे अपनी प्रशंसा और आलोचना लिख कर भेजते हैं। अधिकतर लोग मुझे ऐसी फ़िल्में बनाने की उपदेश भी देते हैं। ऐसे पत्रों को पढ़कर ऐसी समस्यापूर्ण और उपदेशपूर्ण फ़िल्में बनाने का मेरा उत्साह और भी बढ़ जाता है। इस संबंध में कई प्रत्यक्ष घटनाएँ भी हुईं हैं। उनमें से एक मैं आपको बताए बिना नहीं रह सकता। मेरी पहचान का एक आदमी किसी गाँव गया था। स्टेशन पर उसका सामान एक छोटे से लड़के ने उठाकर कहा 'बाहर पहूँचा दूँ साहब?' उस आदमी ने कहा 'अभी तू बहुत छोटा है, इतनी कष्ट का काम क्यों करता है?' लड़के ने जवाब दिया, 'मेहनत करके कुछ पैसे कमाऊँगा और अपनी माँ की मदद करूँगा।' उस आदमी ने फिर पूछा 'क्या तुम्हारी माँ ने तुम्हे काम करने को कहा है?' तब उस बालक ने कहा, 'माँ को तो इसका पता भी नहीं है, मैंने 'तूफ़ान और दीया' नाम की एक फ़िल्म देखी थी, उसमें मुझसे भी छोटा एक लड़का अपनी अंधी बहन के लिए इससे भी ज़्यादा कष्ट उठाता है, तो क्या मैं अपनी माँ के लिए इतना काम भी नहीं क सकता!' उस आदमी से यह घटना सुन कर मेरी आँखें भर आईं। आज तक मुझे मिलने वाले पुरस्कारों में यही एक पुरस्कार मेरे लिए बड़ा था। जी हाँ, 'तूफ़ान और दीया' फ़िल्म का निर्माण मैंने ही किया था, और दिग्दर्शन मेरा पुत्र प्रभात कुमार ने किया था। इस फ़िल्म का शीर्षक गीत आज भी निर्बल को बलवान बनाने का संदेश देता है।" तो लीजिए दोस्तों, मन्ना डे और साथियों की आवाज़ों में १९५६ की फ़िल्म 'तूफ़ान और दीया' का यह शीर्षक गीत सुनिए, गीत लिखा है भरत व्यास ने और संगीत दिया है वसंत देसाई ने।



क्या आप जानते हैं...
कि १९३५ की फ़िल्म 'धर्मात्मा', जो मराठी संत एकनाथ की जीवनी पर बनी फ़िल्म थी, इस फ़िल्म का शीर्षक पहले 'महात्मा' रखा गया था, लेकिन गांधीजी के नाम और काम के साथ समानता को देखते हुए सेन्सर बोर्ड ने फ़िल्म के कुछ सीन्स काटने का निर्देश दिया। शांताराम ने यह गवारा नहीं किया और फ़िल्म की शीर्षक ही बदल दिया।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ३ /शृंखला ०४
गीत का इंटरल्यूड सुनिए -


अतिरिक्त सूत्र - यह एक बेहद कामयाब संगीतमयी फिल्म थी.

सवाल १ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - पुरुष गायक कौन हैं इस युगल गीत में - १ अंक
सवाल ३ - गीतकार बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी आगे निकल आये हैं, उन्हें श्याम कान्त जी और अमित जी को बधाई....अवध जी जरा चूक गए पहले....रोमेंद्र जी आप फिर गायब हो गए

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, October 12, 2010

तुम गगन के चन्द्रमा हो.....प्रेम और समर्पण की अद्भुत शब्दावली को स्वरबद्ध किया एल पी ने उसी पवित्रता के साथ

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 503/2010/203

'एक प्यार का नग़मा है' - फ़िल्म संगीत जगत की सुप्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के स्वरबद्ध गीतों से सजी इस लघु शृंखला की तीसरी कड़ी में हम आप सब का स्वागत करते हैं। आनंद बक्शी और राजेन्द्र कृष्ण के बाद आज जिस गीतकार के शब्दों को एल.पी अपने धुनों से सजाने वाले हैं, उस महान गीतकार का नाम है भरत व्यास, जो एक गीतकार ही नहीं एक बेहतरीन हिंदी के कवि भी हैं और उनका काव्य फ़िल्मी गीतों में भी साफ़ दिखाई देता है। व्यास जी ने शुद्ध हिंदी का बहुत अच्छा इस्तेमाल फ़िल्मी गीतों में भी किया और इस तरह से बहुत सारे स्तरीय गीत फ़िल्म जगत को दिए। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ जब उनकी बात चलती है तो एक दम से हमारे दिमाग़ में जिस फ़िल्म का नाम आता है, वह है 'सती सावित्री'। इस फ़िल्म के गानें तो भरत व्यास जी के गीतों की कड़ियों में बहुत बाद में दर्ज हुआ; सन् १९४९ में वे मिले संगीतकार खेमचंद प्रकाश से और इन दोनों ने लुभाना शुरु कर दिया अपने श्रोताओं को। 'ज़िद्दी', 'सावन आया रे', 'तमाशा' आदि फ़िल्मों में इन दोनों ने साथ साथ काम किया। ५० के दशक में भरत व्यास के धार्मिक और ऐतिहासिक फ़िल्मी गीत ख़ूब लोकप्रिय हुए जिनमें 'रानी रूपमती' और 'जनम जनम के फेरे' सब से उल्लेखनीय रहे। हिंदी के जटिल शब्दों को बड़े ख़ूबसूरत अंदाज़ में उन्होंने गीतों में ढाला और आम जनता में उन्हें लोकप्रिय कर दिखाया। १९६४ की फ़िल्म 'सती सावित्री' की बात करें तो इस फ़िल्म के गानें शास्त्रीय रंग लिए हुए हैं जिन्हें लक्ष्मी-प्यारे ने बड़े ही सुंदर तरीके से कॊम्पोज़ किए। इस फ़िल्म के तमाम सुमधुर गीतों में एक युगल गीत था लता मंगेशकर और मन्ना डे का गाया हुआ, जो शुद्ध कल्याण रूपक ताल पर आधारित एक बेहद सुंदर, कोमल, और निष्पाप प्रेम के भावनाओं से सराबोर गीत था। "तुम गगन के चन्द्रमा हो मैं धरा की धूल हूँ, तुम प्रणय के देवता हो मैं समर्पित फूल हूँ"। किसी फ़िल्मी गीत में प्रणय की अभिव्यक्ति का इससे सुंदर और काव्यात्मक उदाहरण और क्या हो सकता है भला!

'सती सावित्री' सन् १९६४ की फ़िल्म थी, यानी कि एल.पी के स्वतंत्र संगीतकर बनने के बाद शुरुआती सालों का एक फ़िल्म। शांतिलाल सोनी निर्देशित इस धार्मिक फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे महिपाल, अंजली देवी, जीवन, बी. एम. व्यास, रामायण तिवारी, अरुणा ईरानी, मोहन चोटी, निरंजन शर्मा आदि। युं तो ऐसा अक्सर देखा गया उस ज़माने में कि जिस कलाकार ने भी धर्मिक और ऐतिहासिक फ़िल्मों में काम किया, उस जौनर की मोहर उन पर लग गई और उसके बाद उस जौनर में से निकल पाना बेहद मुश्किल साबित हुआ। कल्याणजी-आनंदजी ने अपने करीयर के शुरु शुरु में ऐसे कई फ़िल्मों को ठुकरा दिया था इसी डर से। लेकिन लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने यह रिस्क लिया और 'सती सावित्री' में संगीत देने के लिए तैयार हो गए यह जानते हुए भी कि इस फ़िल्म का बाकी जो टीम है वह पूरा का पूरा माइथोलोजिकल जौनर का है। लेकिन शायद यह उनकी काबिलियत ही रही होगी कि वो इस जौनर में नहीं फँसे और अपने वर्सएटायलिटी को बरकरार रखा। और लीजिए अब प्यारेलाल जी के शब्दों में सुनिए आज के प्रस्तुत गीत के बनने की कहानी जो उन्होंने विविध भारती के उसी इंटरव्यू में कहे थे कमल शर्मा को। "एक बात कहूँ मैं, यह जो पिक्चर थी 'सती सावित्री', इसमें एक गाना है, एक पिक्चर बन रही थी भगवान मिस्त्री की, 'राम बाण', या कोई और, ठीक से याद नहीं मुझे, राम के उपर बड़ी पिक्चर बन रही थी, कलर पिक्चर, उसमें एक गाना था, उसमें म्युज़िक दे रहे थे वसंतराव देसाई, और भरत (व्यास) जी गाना लिख रहे थे। अब यह गाना जो है, "तुम गगन के चन्द्रमा हो", मैं इसलिए कह रहा हूँ, कि यह गाना जो है उन्होंने उस फ़िल्म के लिए लिखा था, जिसमें राम और सीता गाते हैं। तो वह गाना ना वहाँ पर हुआ, और एक जगह दे रहे थे भरत जी, वहाँ भी नहीं हुआ, उन्होंने हम लोगों से कहा कि 'बेटे, बहुत प्यार करते थे हम लोगों को, कहने लगे कि तुम लोग यह गाना कॊम्पोज़ करो। तो यह गाना हमने बाद में कॊम्पोज़ किया, लेकिन लिखा पहले है, धुन बाद में बनी।"

और दोस्तों, शायद इसी वजह से इस गीत में जान डल गई है। तो लीजिए पहले राम और सीता के किरदारों के लिए लिखा यह गीत, जो बाद में सावित्री सत्यवान के किरदारों पर फ़िल्माया गया, सुनते हैं लता जी और मन्ना दा की आवाज़ों में। इसे सुन कर एक अजीब सी शांति मिलती है मुझे, क्या आपको भी?



क्या आप जानते हैं...
कि १९६९ में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को ईरान में बनने वाली एक फ़िल्म में संगीत देने के लिए अनुबंधित किया गया था। यह ना केवल उनकी उपलब्धि थी बल्कि पूरे देश के लिए गौरव की बात थी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०३ /शृंखला ०१
ये धुन उस गीत के प्रीलियूड की है, सुनिए -


अतिरिक्त सूत्र -मुखड़े में "खत" शब्द है और नायिका परदेस में बैठे प्रेमी से वापस आने की गुहार कर रही है

सवाल १ - लोक रंग में रंगे इस गीत के गीतकार कौन हैं - २ अंक
सवाल २ - गायिका बताएं - १ अंक
सवाल ३ - किस नायिका पर फिल्माया गया था ये गीत - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी सही जवाब, २ अंक और...अवध जी आपका अंदाजा एकदम सही है, बिट्टो जी, आपको भी १ अंक की बहुत बधाई. अमित जी और श्याम कान्त जी....लगे रहिये....शंकर लाल जी मुस्कुरा रहे हैं.....उम्मीद है आज का अतिरिक्त सूत्र आपकी दिक्कतें आसान कर देगा.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ