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Wednesday, December 30, 2009

संगीत अवलोकन २००९, वार्षिक संगीत समीक्षा में फिल्म समीक्षक प्रशेन क्वायल लाये हैं अपना मत

२००९ हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में प्रायोगिकता के लिए मशहूर होगा. साल के शुरुआत में ही देव डी जैसे धमाकेदार प्रायोगिक फिल्म के म्यूजिक ने तहलका मचा दिया. बधाई हो फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप को जिन्होंने एक नए म्यूजिक डिरेक्टर को मौका देकर उन्हें पुरी स्वतंत्रता दी कि वो कुछ नया कर पाए. अंकित त्रिवेदी, जिन्होंने ये संगीत दिया है उन्होंने भी इस मौके का फायदा उठाते हुए ऐसे चौके छक्के मारे है के शायद ही कोई और प्रस्थापित संगीतकार ये कर पाता.

फिर आई दिल्ली ६ जिसमे संगीत के महारथी ए. आर. रहमान ने अपना लोहा फिर से मनवाया. प्रसून और रहमान का ये संगीत प्रयोग बेतहाशा सफल रहा और सारा भारत झूम के गाने लगा "मसकली मसकली". पर सबसे बड़ा प्रयोग था स्त्रियों के लोकसंगीत को जो आज तक उनके बीच सीमित था उसे हीप हॉप के साथ मिक्स कर के पेश करना. रहमान ने "गेंदा फूल" में वही किया और सभी गेंदा फूल बनकर पूछने लगे "अरे ये पहले क्यों नहीं हुआ. और ये नयी गायिका कौन है भाई ?"

वह गायिका है "रेखा भारद्वाज"! विशाल भारद्वाज की धर्मपत्नी. ऐसे नहीं के रेखाजी के कोई गाने पहले नहीं आये थे. इसके पहले भी ओंकारा में "नमक इश्क का" देकर उन्होंने सफलता प्राप्त की थी. पर गेंदा फूल एक मेनस्ट्रीम हिट था और इसीलिए ये सवाल आ रहा था. वर्ष की शुरूआत में गेंदा फुल देनेवाली रेखाजी ने वर्ष के अंत में रेडियो फिल्म में "पिया जैसे लड्डू" दे कर पुरे वर्ष पर अपनी मुहर लगा दी.

इनके आलावा शारिब और तोशी के संगीत ने भी व्यवसायिक सफलता प्राप्त कर के उन्हें कम उम्र में एक सफल संगीतकार बना दिया है. जनवरी में राज २ के "माही माही" गीत के साथ वे हिट रहे.

वही लन्दन ड्रीम्स के गानों ने नाराज कर दीया. संगीत के इर्द गिर्द घुमती ये फिल्म संगीत के मामले में ही कमजोर निकली. पर यहाँ भी एक प्रयोग था जो सबको पसंद आया और वह था rock हनुमान चालीसा जो सबको पसंद आई पर वोह जिस गाने का पार्ट था वही बोरियत भरा था.

लव आजकल, अजब प्रेम की गजब कहानी, तुम मिले, All the Best: Fun Begins, दिल बोले हडिप्पा, आ देखें ज़रा, बिल्लू जैसे फिल्मों के सफल संगीत से प्रीतम चक्रबोर्ती इस साल के सब से सफल संगीतकार रहे. फिल्मों की तादाद के साथ साथ उन्होंने गुणवत्ता का भी अच्छे से ख्याल रखा. ए. आर. रहमान ने भी इस साल कुछ अच्छे गाने दिए. वही सलीम-सुलेमान को बहुत सारी फिल्मे बतौर संगीतकार मिली पर वोह कुछ खांस असर नहीं दिखा पाए.

क़र्ज़ में ठीक ठाक संगीत देने वाले हिमेश रेशमिया इस बार रेडियो के साथ सबको अपनी कला से अचंभित कर गए. बार बार सुन सके ऐसे गाने दे कर उन्होंने एक पूरा हिट एल्बम प्रस्तुत किया. फिल्म हालाँकि नहीं चली पर गाने लगातार बजते रहते है.

कमीने और स्लम डोग के साथ गुलज़ार इस साल के सबसे सफल गीतकार रहे. पर प्रसून जोशी और स्वानंद किरकिरे भी अपने हुनर का जौहर दिखाने में कम नहीं रहे.

गायक और गायिकाओं में मोहित चौहान, आतिफ अस्लम हिट गाने देते रहे पर सुनिधि और शान इस साल थोड़े कम नजर आये.

मिलजुल कर संगीत के लिए ये २००९ बहुत अच्छी तरह से गुजरा और प्रायोगिक संगीत के साथ साथ बॉलीवुड का मेलोडी और मस्ती वाला समीकरण भी जमकर चला. ऐसे ही आगे होते रहे तो हम जैसे प्रशंसकों का प्यार और दुवायें हरदम बॉलीवुड के साथ बनी रहेंगीं.

अपनी पसदं के 5 गीतों को क्रमानुसार सूची.

1. पायलिया (देव डी)
2. गेंदा फूल (दिल्ली ६)
3. कमीने (शीर्षक)
4. रफा दफा (रेडियो)
5. तेरा होने लगा हूँ (APKGK)


निम्न श्रेणियों में अपनी एक प्रविष्ठी (नामांकन)

BEST SONG- Tera hone laga hun
BEST ALBUM- Radio
BEST LYRICIST- Gulzar
BEST COMPOSER- Pritam Chaktraborty
BEST SINGER (MALE) - Mohit Chauhan
BEST SINGER (FEMALE) - Rekha Bhardwaj
BEST NON FILMI SONG - Chandan mein
BEST UPCOMING ARTIST- Amit Trivedi, Music Director, Dev D
BEST FILMED (CHOREOGRAPHED) SONG OF THE YEAR: Blue Theme
ARTIST OF THE YEAR (OVERALL PERFORMANCE WISE) : Mohit Chauhan


-प्रशेन क्वायल

Tuesday, December 29, 2009

समीक्षा - २००९.... एक सफर सुकून का, वार्षिक संगीत समीक्षा में आज विश्व दीपक “तन्हा” की राय

कुछ चीजें ऐसी होती हैं जो कभी बदलती नहीं। जिस तरह हमारी जीने की चाह कभी खत्म नहीं होती उसी तरह अच्छे गानों को परखने और सुनने की हमारी आरजू भी हमेशा बरकरार रहती है। कहते हैं कि संगीत हर बीमारी का इलाज है। आप अगर निराश बैठे हों तो बस अपने पसंद के किसी गाने को सुनना शुरू कर दें, क्षण भर में हीं आप अपने आप को किसी दूसरी दुनिया में पाएँगे जहाँ ग़म का कोई नाम-ओ-निशान नहीं होगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि किसी भी गाने की धुन में जो "बिट्स" होते हैं वो हमारे "हर्ट बीट" पर असर करते हैं और यही कारण है कि गानों को सुनकर हम सुकून का अनुभव करते हैं। अब जब हमें इतना मालूम है तो क्यों न अपने पसंद के गानों की एक फेहरिश्त बना ली जाए ताकि हर बार सारे गानों को खंगालना न पड़े। यूँ तो हर इंसान की पसंद अलग-अलग होती है,लेकिन कुछ गाने ऐसे होते हैं जो अमूमन सभी को पसंद आते हैं। "आवाज़" की तरफ़ से हमारी कोशिश यही है कि उन्हीं खासमखास गानों को चुनकर आपके सामने पेश किया जाए। २००९ में रीलिज हुए गानों की समीक्षा एक बहाना मात्र है, असल लक्ष्य तो सही गानों को गुनकर, चुनकर और सुनकर सुकून की प्राप्ति करना है। तो आप हैं ना हमारे साथ इस सुकून के सफ़र में?

२००९ के संगीत (हिन्दी फिल्म-संगीत) की बात करें तो यह साल गैर-पारंपरिक शब्दों, धुनों और आवाज़ों के नाम रहा। जहाँ लेखन में पियुष मिश्रा, अमिताभ भट्टाचार्य, स्वानंद किरकिरे और सुब्रत सिन्हा ने लीक से हटकर अल्फ़ाज़ दिए, वहीं अमित त्रिवेदी, पियुष मिश्रा(जी हाँ यहाँ भी) और सोहेल सेन ने संगीत की दुनिया में अच्छे खासे प्रयोग किए। अगर गायकी की बात करें तो इस साल मोहित चौहान, नीरज श्रीधर, रेखा भारद्वाज, आतिफ़ असलम, विशाल दादलानी, सलीम मर्चेंट और हिमेश रेशमिया की आवाज़ों ने धूम मचाई। ऐसा नहीं है कि इस दौरान बाकी फ़नकार हाथ पर हाथ रखे बैठे रहे। सभी ने अपने हिस्से का काम बखूबी निभाया और इसलिए सब हीं प्रशंसा के पात्र हैं। हम एक-एक करके इन फ़नकारों की फ़नकारी पर नज़र डालेंगे।

इस साल की शुरूआत हीं एक ऐसी खबर से हुई थी कि जिसने न सिर्फ़ बालीवुड बल्कि हालीवुड को हिलाकर रख दिया। "बाफ़्टा" अवार्ड जीतने के बाद ए०आर०रहमान ने अपने एलबम "स्लमडाग मिलिनेअर(करोड़पति)" के जरिये दो आस्कर अवार्ड हिन्दी फिल्म-संगीत की झोली में डाल दिए। लोग कितना भी कहे कि फिल्म हिन्दुस्तानी नहीं थी लेकिन संगीत तो हमारा हीं था, इसलिए इसे अपना कहने में कोई हर्ज नहीं है। यूँ तो हम इस फिल्म के गानों की समीक्षा कर सकते हैं लेकिन चूँकि यह फिल्म २००८ में रीलिज हुई थी, इसलिए इसे छोड़ देना हीं वाजिब होगा। अब जब रहमान की बात हो हीं रही है तो क्यों न लगे हाथ "दिल्ली-६" की भी बात कर ली जाए। इस फिल्म के गानों की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है। "मसकली", "दिल गिरा दफ़-अतन", "अर्जियाँ" , "रहना तू", "गेंदाफूल" जैसे गाने रोज-रोज नहीं बनते। जहाँ "नूर" में अमिताभ बच्चन को सुनकर दिल खिल उठता है, वहीं "रहना तू" में रहमान और "गेंदाफूल" में रेखा भारद्वाज की गलाकारी गायिकी के सारे बने-बनाए नियम तोड़ती हैं। प्रयोग के मामले में रहमान का कोई सानी नहीं है। "रहना तू" गाने के अंतिम दो मिनट एक ऐसे वाद्य-यंत्र को समर्पित हैं, जिसका ईजाद इसी साल हुआ है और जो हिन्दुस्तान में बस रहमान के पास हीं है। प्रसून जोशी का लेखन भी कमाल का है। "थोड़ा-सा रेशम तू हमदम, थोड़ा-सा खुरदुरा..बिना सजावट, मिलावट न ज्यादा, ना हीं कम" जैसे शब्द गीतकार की उड़ान को दर्शाते हैं। इस तरह से कहा जा सकता है कि दिल्ली-६ का संगीत पैसा वसूल था। इस फिल्म के लाजवाब संगीत के लिए मैं ए०आर०रहमान को बेस्ट कम्पोजर के लिए नामांकित करता हूँ। इसी साल "रहमान" की "ब्लू" भी रीलिज हुई थी। इस फिल्म में रहमान ने कुछ ज्यादा हीं प्रयोग कर दिए और शायद यही कारण है कि बाकी फिल्मों की तरह इस फिल्म के गाने ज्यादा नहीं सुने गए। तकनीक का ज्यादा इस्तेमाल कभी-कभी गाने की आत्मा को ले डूबता है इस बात का प्रमाण "फिक्राना" को सुनकर मिलता है। इलेक्ट्रोनिक वाद्य-यंत्रों के बीच में गाने के शब्द नदारद मालूम होते हैं और यही कारण है कि श्रोता गाने से खुद को नहीं जोड़ पाता। मुझे इस एलबम के "यार मिला था" और "रहनुमा" ज्यादा पसंद आए। और हाँ फिल्म में इन गानों को नहीं देखकर बुरा भी लगा। "काईली मेनोग" के कारण "चिगी विगी" देखा और सराहा गया। कुल मिलाकर इस एलबम को औसत हीं कहेंगे।

बालीवुड में अमित त्रिवेदी बहुत हीं नया नाम है। "देव डी" से पहले अमित के पास कहने को बस "आमिर" ही था, लेकिन उसी एक फिल्म ने अमित के लिए रास्ते का काम किया और फिर "देव डी" आई। फिल्म में पूरे अठारह गाने थे, जो किसी रिस्क से कम नहीं। आज के दौर में जब संगीतकार कम से कम गानों(उदाहरण: राकेट सिंह, ३ गाने) के साथ सफ़लता का स्वाद चखना चहता है और फिल्मकार भी ज्यादा गाने रखने से डरते हैं, अनुराग कश्यप जैसे लोग पुराने ढर्रों को तोड़ने में यकीन रखते हैं। यकीन मानिए इस फिल्म का कोई भी गाना दूसरे गाने से कमजोर नहीं था। जहाँ "इमोशनल अत्याचार" "यूथ एंथम" बन गया, वहीं "नयन तरसे" ने क्लासिकल मूड के शब्दों के साथ पाश्चात्य संगीत की बढिया जुगलबंदी पेश की। फिल्म में एक तरह "परदेशी" जैसे फास्ट नंबर्स थे तो वहीं "पायलिया" जैसे साफ़्ट रोमांटिक नंबर्स भी थे। अठारह गानों में अमित ने अमूमन १८ मूड्स को समेटा और इस लिहाज से इसे कम्प्लिट एलबम कहा जा सकता है। इस साल के बेस्ट एलबम का मेरा वोट इसी को जाता है। इस एलबम की खासियत यह है कि न सिर्फ़ संगीत की दृष्टि से यह खास थी, बल्कि "अमिताभ भट्टाचार्य" के शब्द भी काबिल-ए-तारीफ़ थे। इस एलबम के अलावा अमित की एक और पेशकश थी और वह थी "वेक अप सिड" का "एकतारा"। जहाँ अमित का संगीत और जावेद साहब के शब्द इसे लाजवाब बनाते हैं, वहीं कविता सेठ की आवाज़ इसे दूसरे ही लेवल पर ले जाती है। "अमिताभ भट्टाचार्य" की आवाज़ में "गूँजा-सा है कोई एकतारा" दिल को छू जाता है। जहाँ तक कविता सेठ का सवाल है तो इसी साल उनकी संगीतबद्ध की हुई "ये मेरा इंडिया" रीलिज हुई थी, जिसमें क्लासिकल बेस्ड कई सारे गाने थे। भले हीं उनकी "एकतारा" हीं नाम कमा सकी, पर मेरे लिए इतना हीं काफ़ी है और "बेस्ट फ़ीमेल सिंगर" का मेरा वोट इन्हीं को जाता है।

इस साल प्रयोगधर्मी फिल्मों की कमी नहीं रही और मेरे अनुसार "गुलाल" भी ऐसी हीं एक फिल्म थी। अनुराग कश्यप जहाँ एक तरफ़ अपने फिल्मों के विषय को लेकर चर्चा में रहें, वहीं संगीतकार और गीतकार का उनका चुनाव भी समझ से परे था। आप खुद हीं सोचिए कि एक ऐसा इंसान जिसने पहले कभी संगीत न दिया हो, उसके हाथों में संगीत के साथ-साथ, गीत और गायिकी का बांगडोर सौंपना कितनी हिम्मत का काम होगा। और अंतत: इस प्रयोग में अनुराग सफल हुए। "पियुष मिश्रा"(थियेटर वालों के लिए पियुष भाई) के शब्दों ने वह कमाल किया कि लोग मुँह खोलकर देखते हीं रह गए। कोई "जैसे दूर देश के टावर में घुस जाए रे एरोप्लेन" कैसे लिखता है..लोग यही समझ नहीं पा रहे थे और यहाँ अपने पियुष भाई "ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है" को एक अलग और अनोखा रूप देकर निकल पड़े। "सरफरोशी की तमन्ना" का रूपांतरण भले हीं कोई गाना न हो, लेकिन उसका असर किसी संगीत से कम नहीं था। जहाँ एक ओर "आरंभ है प्रचंड" का उद्घोष लगाया गया, वहीं "शहर" के सहारे सोए लोगों की आत्मा झकझोड़ी गई। शब्दों के इस अद्वितीय चुनाव के लिए बेस्ट लीरिस्ट का मेरा वोट संयुक्त रूप से पियुष भाई और प्रसून जोशी(इनका जिक्र आगे किया जाएगा) को जाता है। पियुष मिश्रा की इसी साल एक और फिल्म आई थी और वह थी "इल्लैया राजा" के संगीत निर्देशन में "चल चलें"। "शहर अमरूद का है ये..शहर है इलाहाबाद" में भी शब्दों का वही बेमिसाल चुनाव दिखता है। हम आगे भी पियुष मिश्रा से ऐसे हीं गानों की उम्मीद रखते हैं।

शंकर-एहसान-लौय(SEL) एक ऐसी तिकड़ी है, जिसके गाने हमेशा हीं सराहे जाते रहे हैं और इस साल भी इन्होंने निराश नहीं किया। यूँ तो इस साल इन्होंने ७ फिल्मों में संगीत दिया लेकिन "लक़ बाई चांस", "वेक अप सिड" और "लंदन ड्रीम्स" हीं इनकी सफल फिल्मों में गिनी जाती हैं। इन फिल्मों के अलावा "सिकंदर" के "धूप के सिक्के" और "गुलों में रंग", "13B" का "क्रेज़ी मामा" ,"चाँदनी चौक को चाईना" का "तेरे नैना" और "शार्टकर्ट" का "कल नौ बजे" भी अच्छे गाने में शुमार किए जाते हैं, लेकिन पूरी एलबम की बात की जाए तो बस तीन हीं ध्यान में आते हैं। इन तीनों में मैं "लक़ बाई चांस" को सबसे ऊपर और "वेक अप सिड" को सबसे नीचे रखता हूँ। "लक़ बाई चांस" का "बावरे" हर लिहाज़ से एक बढिया गीत है। पिक्चराईजेश भी कमाल का है और मेरे हिसाब से बेस्ट पिक्चराज्ड सांग यही है। "राग भैरवी" पर आधारित "सपनों से भरे नैना" की जितनी भी तारीफ़ की जाए उतनी कम है। न सिर्फ़ संगीत काबिल-ए-तारीफ़ है, बल्कि जावेद अख्शतर के ब्द भी सच्चाई के बेहद करीब नज़र आते हैं और गायिकी के लिए क्या कहना...जब खुद शंकर हीं माईक के पीछे हों। इस कारण "बेस्ट सांग आफ़ द ईयर" का मेरा वोट "सपनों से भरे नैना" और "कमीने"(इसके बारे में बातें अगले पैराग्राफ़ में) को संयुक्त रूप से जाता है। इस फिल्म के बाकी गाने भी खूबसूरत बन पड़े हैं। अब अगर "लंदन ड्रीम्स" की बात की जाए तो "बरसो यारों", "टपके मस्ती" और "शोला-शोला" एक अलग तरह का हीं माहौल तैयार करते हैं जहाँ जोश हीं जोश रवाँ हो। "खानाबदोश" हर तरह से नया है। पहले तो यह शब्द हीं कईयों के लिए अजनबी है, फिर "आ जमाने आ, आजमाने आ" जैसे प्रयोग हिन्दी गानों में सुनने को नहीं मिलते..शायद यही कारण है कि मुझे यह गाना बेहद पसंद है। बस इसी प्रयोग के लिए मैं प्रसून जोशी को बेस्ट लीरिस्ट के रूप में नामांकित करता हूँ। आप अभी तक समझ हीं गए होंगे कि मैं प्रसून जोशी के प्रयोगों का कितना बड़ प्रशंसक हूँ। अंत में "वेक अप सिड"... इस फिल्म का बस टाईटल ट्रैक हीं SEL के लिए(और हमारे लिए भी) सुकूनदायक साबित हुआ।

विशाल भारद्वाज की संगीतकार के तौर पर इस साल एक हीं फिल्म आई "कमीने"। "कमीने" के "धन-तनन" ने युवाओं को झूमने पर मजबूर कर दिया। पुरानी फिल्मों में हजार बार इस्तेमाल हो चुके ट्युन का आधुनकीकरण किस तरह करते हैं वह सही मायने में विशाल ने हीं सिखाया। इस फिल्म के टाईटल ट्रैक में विशाल ने अपनी आवाज़ दी। अगर यह कहूँ कि इस गाने ने इंसानी इरादों के चिथड़े करके रख दिये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसी खूबी के कारण इस गाने को मैं बेस्ट सांग के लिए नामांकित करता हूँ। गुलज़ार साहब इस तरह के गानों में माहिर माने जाते हैं। और उन्होंने इस गाने और "पहली बार मोहब्बत की है" के माध्यम से यह बात फिर से साबित की। "एड्स-जारूगकता" के लिए बनाया गया "फटाक" भी अपने उद्देश्य में सफल रहा। तो कुल मिलाकर यह एलबम हीं सफल कही जाएगी। "पहली बार मोहब्बत की है" में मोहित चौहान की रेशमी आवाज़ खुलकर सामने आती है। यूँ तो मोहित सुर्खियों में तब आए जब "मसकली" इनकी आवाज़ में खिल उठी लेकिन इस साल इन्होंने इन दो गानों के अलावा और भी कई खूबसूरत गाने गाए। कहते हैं कि मोहित की आवाज़ किसी भी गाने के लिए सफलता की गारंटी है। अगर यही है तो क्यों न बेस्ट मेल सिंगर के लिए मोहित को चुन लिया जाए।

विशाल-शेखर इस बार बस एक हीं एलबम के साथ मैदान में नज़र आए। और यह एलबम भी कुछ खासा कमाल नहीं दिखा पाई। बस एक गाना "यु आर द वन" हीं लोगों की जुबान पर चढ सका। वैसे मैं यह मानता हूँ कि यह गाना बेहद खूबसूरत बन पड़ा है और यह इसलिए भी प्रशंसा के काबिल है क्योंकि इसे लिखा खुद विशाल ने है और आवाज़ें भी इन्हीं दोनों की हैं। इस साल विशाल का नाम संगीत के लिए भले न हुआ हो लेकिन गायिकी में विशाल ने अपने झंडे जरूर गाड़े। "धन-तनन", "कुर्बां हुआ" और "नज़ारा है" कुछ उदाहरण-मात्र हैं। अब बात करते हैं अगली संगीतकार जोड़ी की और वह है "सलीम-सुलेमान".. इस साल इनकी चार फिल्में आईं- "8X10 तस्वीर", "लक़" ,"कुर्बान" और "राकेट सिंह".. इन फिल्मों में बस कुर्बान हीं है जिसके सारे गाने पसंद किए गए। यहाँ "सोनू निगम" और "श्रेया घोषाल" की आवाज़ों से सजा "शुक्रान अल्लाह" का ज़िक्र जरूरी हो जाता है, क्योंकि इस गाने से सोनू निगम पुराने फार्म में लौटते हुए नज़र आते हैं। श्रेया घोषाल इस गाने में अपने दूसरे गानों की तरह हीं सधी हुई दिखती हैं। इन सारी फिल्मों के अच्छे गानों में एक बात समान है और वह है सलीम मर्चेंट की आवाज़। "लक़" का "खुदाया वे", "कुर्बान" का "अली मौला" और "राकेट सिंह" का "पंखों को हवा" सलीम की प्रतिभा से हमें रूबरू कराते हैं। एक और संगीतकार जोड़ी है जो सलमान खान की फेवरेट मानी जाती है और वह है.. "साजिद-वाजिद"... इस साल इनकी झोली में बस एक हीं सफल फिल्म है "वांटेड"। इस फिल्म के "लव मी..लव मी" , "तोसे प्यार करते हैं" और "दिल ले के" गाने सराहे गए। और यहाँ भी वही फैक्टर हावी था..संगीतकार का खुद माईक के पीछे जाना। वाज़िद ने इस फिल्म के जिन दो गानों में अपनी आवाज़ दी वही गाने सुपरहिट हुए। तो कहा जा सकता है कि बालीवुड में यह ट्रेंड बन चुका है कि खुद के गाने को खुद हीं गाओ...और यह सफल भी हो रहा है तो कुछ और क्यों सोचा जाए।

इस साल हमें कई सारे नए संगीतकार मिले..जैसे कि "शरीब- तोषी"(राज़ 2- द मिस्ट्री कन्टीन्युज, जश्न , जेल), "सचिन-जिगर"(तेरे संग) और "सोहेल सेन"(वाट्स योर राशि)। यूँ तो इन सारे संगीतकारों में "शरीब-तोषी" सबसे ज्यादा सफल साबित हुए लेकिन मेरे हिसाब से "बेस्ट अपकमिंग आर्टिस्ट" का माद्दा सोहेल सेन में नज़र आता है। सोहेल ने "वाट्स योर राशि" में तेरह गाने दिए और तेरहों गाने लोगों को पसंद आए। ऐसा कम लोगों के हीं साथ होता है। इस फिल्म से "सू छे" ,"जाओ ना", "सौ जनम" और "आ ले चल" आज भी मेरे प्लेलिस्ट में शामिल हैं।

हिमेश रेशमिया "रेडियो" के साथ सेल्युलायड पर वापस नज़र आए। वादे के अनुसार इन्होंने तीन आवाज़ें तैयार कर ली हैं। "मन का रेडियो", "ज़िंदगी जैसे एक रेडियो", "जानेमन", "पिया जैसे लड्डु" जैसे गानों में उनकी इस बात का प्रमाण मिलता है। इस एलबम को लोगों ने बेहद पसंद किया...और फिल्म की असफलता का भी इस एलबम पर कोई असर न हुआ। भविष्य में हम हिमेश से ऐसे हीं एलबमों और गानों की आशा करते हैं| इस फिल्म के बहाने हमें "सुब्रत सिन्हा" जैसा मंझा हुआ गीतकार भी नसीब हुआ।

लीविंग लीजेंड "इल्लैया राजा" की इस साल दो फिल्में रीलिज हुईं.."चल चलें" और "पा"। "चल चलें" कोई खासा नाम न कर सकी, लेकिन "पा" में हमने उसी पुराने "इल्लैया राजा" के दर्शन किए जिनकी गीतों के हम फैन हैं। "हिचकी", "मुड़ी-मुड़ी" और "गुमसुम गुम" अपने हीं तरह के गीत हैं तो "मेरे पा" में "अमिताभ" का बच्चे की आवाज़ में गायन दिल को छू जाता है। इन गानों की सफलता में जिस इंसान का बराबर का सहयोग है, वे हैं इस फिल्म के गीतकार "स्वानंद किरकिरे"। गानों में "हिचकी", "सिसकी", "मुड़ी-मुड़ी" जैसे शब्दों का प्रयोग विरले हीं देखने को मिलता है। और अगर ऐसे अलग-से शब्द सुनने को मिल जाएँ तो श्रोता एकबारगी हीं उस गाने से जुड़ जाता है। यही कारण है कि स्वानंद किरकिरे के लिखे गाने काफी पसंद किए जाते हैं। "पा" के बाद स्वानंद किरकिरे अपने पसंदीदा संगीतकार "शांतनु मोइत्रा" के साथ "३ इडियट्स" में भी नज़र आए। "मुर्गी क्या जाने अंडे का क्या होगा", "जाने नहीं देंगे तुझे", "जैसा फिल्मों में होता है" जैसे अल्फ़ाज़ इस फिल्म के गानों को एक अलग हीं स्तर पर ले जाते हैं। "शांतनु" का संगीत सुलझा हुआ है। इस फिल्म के गाने भी धीरे-धीरे लोगों की जुबान पर चढ रहे हैं। बहुत दिनों के बाद सोनू निगम ने किसी एलबम के ४ गाने गाए हैं और चारों हीं अलग-अलग अंदाज में। "जाने नहीं देंगे तुझे" में सोनू ने अवार्ड-विनिंग सिंगिंग की है और हम भी यह उम्मीद रखते हैं कि सोनू को इस गाने के लिए पुरस्कार से नवाज़ा जाएगा।

अब हम बात करते हैं इस साल के सबसे सफल संगीतकार "प्रीतम चक्रवर्ती" की। इस साल प्रीतम ने १२ फिल्मों में संगीत दिए जो अपने-आप में एक रिकार्ड है। इन फिल्मों में से "लव आज कल", "न्यूयार्क", "अजब प्रेम की गज़ब कहानी", "दिल बोले हडिप्पा", "दे दनादन", "बिल्लू" और "तुम मिले" के गानों ने सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए। "लव आज कल" के "आहुं आहुं" और "ये दूरियाँ" , "अजब प्रेम.." के "तेरा होने लगा हूँ", "तू जाने ना" और "प्रेम की नैय्या" और "तुम मिले" के "दिल इबादत" और "तुम मिले" चार्ट में हमेशा हीं ऊपर रहे। प्रीतम के साथ कुछ गीतकार परमानेन्टली फिक्स्ड जैसे हैं..उन गीतकारों में दो का नाम लेना लाजिमी हो जाता है..इरशाद क़ामिल और सैयद क़ादरी। इन दोनों में से इरशाद क़ामिल मुझे ज्यादा प्रिय हैं क्योंकि प्रयोग करने से वे भी नहीं घबराते। जहाँ तक गायकों की बात है तो नीरज श्रीधर प्रीतम के हर दूसरे गाने में नज़र आते हैं, लेकिन यह प्रीतम और नीरज की काबिलियत हीं है कि दुहराव का पता नहीं चलता। नीरज के बाद "राहत फतेह अली खान" भी प्रीतम के पसंदीदा हो चले हैं। "आज दिन चढ्या", "जाऊँ कहाँ" और "यु एंड आई" जैसे गाने वैसे तो राहत के स्तर से काफी नीचे के हैं, लेकिन इन गानों में उनको सुनना अच्छा हीं लगता है। "के के" भी प्रीतम को काफी प्रिय हैं। आने वाले समय में देखने वाली यह बात होगी कि प्रीतम इनके अलावा और किसी को दुहराते हैं या नहीं। प्रीतम की सफलता का प्रतिशत देखकर इस साल का आर्टिस्ट आफ़ द ईयर इनके अलावा कोई और नहीं सुझता।

इस साल दो ऐसे गाने हुए(मेरी याद में) जो यूँ तो हैं बड़े हीं प्यारे लेकिन लोगों द्वारा नज़र-अंदाज कर दिये गए। उनमें से एक गाना है फिल्म "देख भाई देख" का जिसे संगीत से सजाया है "नायब-शादाब" ने और लिखा है "राशिद फिरोज़ाबादी" ने। "राहत फतेह अली खान" के लिखे इस गाने के बोल हैं "आँखों में क्यों नमी है"। मेरे हिसाब से इस पूरे साल राहत साहब के स्तर का बस यही एक गाना था, जिसे बदकिस्मती से लोगों ने सुना हीं नहीं। दूसरा गाना है फिल्म "तेरे संग" का "मोरे सैंया"। इस गीत में संगीत और आवाज़ें हैं "सचिन-जिगर" की और गाने के बोल लिखे हैं पिछले जमाने के सदाबहार गीतकार "समीर" ने। वैसे और भी कई गाने होंगे जिन्हें उनका हक़ नसीब नहीं हुआ। लेकिन मुझे अभी बस यही दो गाने ध्यान में आ रहे हैं।

फिल्मी-गानों की समीक्षा करने के बाद अब मैं अपनी पसंद के शीर्ष पाँच गानों की फेहरिश्त पेश करने जा रहा हूँ:

१) सपनों से भरे नैना
२) कमीने
३) रहना तू
४) तू जाने ना
५) नयन तरसे


अब हम समीक्षा के अंतिम पड़ाव पर आ चुके हैं। तो बात करते हैं गैर-फिल्मी गानों की। इस साल प्रधान तौर पर दो हीं गैर-फिल्मी एलबम रीलिज हुए। एक- कैलाश, परेश, नरेश का "चांदन में" तो दूसरा मोहित चौहान का "फितूर"। "चांदन मे" में कैलाश के पहले के एलबमों जैसा दम नहीं था। फिर भी कुछ गाने लोगों को काफी रास आए। जैसे कि "चांदन में", "चेरापूँजी" और "ना बताती तू"। कैलाश, परेश, नरेश को सुनना हमेशा से हीं फायदे का सौदा रहा है, इसलिए बेस्ट नान-फिल्मी सांग का मेरा वोट "चांदन में" को हीं जाता है। साल का अंत आते-आते मोहित की आवाज़ का जादू सर चढकर बोलने लगा था और उसी समय मोहित ने "फितूर" लाकर उस जादू को कई गुना कर दिया। मोहित की आवाज़ में पहाड़ीपन है और वह उनके गानों में भी झलकता है। "फितूर" एलबम से "माई नी मेरिए" मेरा इस एलबम का सबसे प्रिय गाना है। दुआ करते हैं कि "मोहित" हर साल ऐसा हीं कमाल करते रहें और हमारे दिलों पर उनके गानों का असर कभी कम न हो।

उम्मीद करता हूँ कि आपको हमारी यह समीक्षा पसंद आई होगी।

आप सबको नव-वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-
विश्व दीपक

Monday, December 28, 2009

संगीत २००९- एक मिला जुला अनुभव- वार्षिक संगीत चर्चा सजीव सारथी द्वारा

वर्ष २००९ संगीत के लिहाज से बहुत अधिक समृद्ध तो नहीं रहा फिर भी काफी सारे नए प्रयोग हुए, और श्रोताओं को रिझाने के लिए इंडस्ट्री के संगीतकारों, गीतकारों और गायक -गायिकाओं ने अपने तरफ से पूरी कोशिश की, कि संगीत में विविधता बनी रहे. बहरहाल मैं जिक्र करना चाहूँगा सबसे पहले उन अल्बम्स की जिन्होंने मुझे प्रभावित किया. वर्ष के शुरुआत में आई एक बहुत सुरीली अल्बम "दिल्ली ६".इस अल्बम के अधिकतर गीत ऐसे थे जो आपकी सुर-प्यास को संतुष्ट करते हैं. मसकली में मोहित चौहान एक अलग अंदाज़ में दिखे, इस गीत का फिल्मांकन भी बहुत बढ़िया रहा, ये एक ऐसा गीत है जिसे यदि साल दो साल बाद भी सुनेंगें तो ताज़ा लगेगा, गीत में एक कबूतर को संबोधित कर नायक नायिका को अपने सपनों की खातिर पंख खोलने के लिए प्रेरित कर रहा है और प्रसून ने कमाल के शब्दों से इस भाव को गढ़ा है, "तड़ी से मुड, अदा से मुड..." जैसी पंक्तियाँ गुदगुदा जाती हैं, संगीतकार रहमान ने इस फिल्म में और भी बहुत से खूबसूरत गीत जड़े हैं, "जय हो" की जबरदस्त कमियाबी की बाद ये रहमान की पहली प्रदर्शित फिल्म थी और उन्होंने निराश नहीं किया, अर्जियां सारी, रहना तू, और तुमरे भवन में जैसे गीत मधुर रहे पर जिस गीत ने दिल के तार झनझना दिए वो था "गेंदा फूल". यूं तो ये गीत उत्तर भारत के लोक संगीत पर आधारित था पर इसे दुनिया भर में श्रोताओं तक पहुँचाने के लिए निश्चित ही रहमान बधाई के पात्र हैं.

संगीतकार प्रीतम अपने लोकप्रिय गीतों से अधिक धुनें चुराने को लेकर अधिक चर्चित रहे हैं अब तक, पर इस साल उन्होंने अपने को शायद साबित करने की ठानी, और "अजब प्रेम की गजब कहानी" और "लव आजकल" के माध्यम से अपने स्वाभाविक हुनर को प्रदर्शित किया. जहाँ "अजब प्रेम में..." तेरा होने लगा हूँ, प्रेम की नैय्या, आ जाओ मेरी तमन्ना और तू जाने न जैसे लाजवाब गीत थे वहीँ "लव आजकल" में ट्विस्ट, चोर बाजारी, ये दूरियां, और आहूँ आहूँ का पंजाबी तड़का भी लोगों को खूब भाया, दोनों ही फिल्मों में उनके गीत लिखे इरशद कामिल ने, जिनके लिए ये उनका अब तक का सर्वश्रेष्ठ साल रहा कमियाबी के लिहाज से, वैसे प्रीतम ने इस साल एक के बाद एक करीब १० फिल्मों में संगीत दिया, जिनमें से अधिकतर व्यवसायिक लिहाज से सफल भी रहीं. एक और एल्बम जिसने कम से कम मुझे बहुत प्रभावित किया वो रही पियूष मिश्रा की "गुलाल", पियूष के बारे में और इस एल्बम के बारे में मैं पहले ही बहुत कुछ लिख चुका हूँ, तो बस इतना ही कहूँगा कि इस ऑल राउंड प्रदर्शन के लिए मैं पियूष भाई को सलाम देना चाहता हूँ, आरम्भ है प्रचंड, बीड़ा, शहर, दुनिया, राणा जी, किस किस की तारीफ करूँ, एक के गीत दिल चीर कर निकला हो जैसे...

हिमेश यूं तो बतौर संगीतकार मुझे हमेशा ही पसंद रहे हैं, और इस बात की तारीफ़ भी करनी पड़ेगी कि उन्होंने समय रहते अपने आप को सीमित काम करने के लिए वचन बद्ध भी कर लिया, शायद प्रीतम भी इससे कुछ सबक सीखे, बहरहाल हिमेश की एक ही फिल्म आई तो जाहिर है सबको उम्मीदें भी बहुत थी, हिमेश ने भी निराश नहीं किया, "रेडियो" में उनका संगीत ताजगी से भरा हुआ था, अपनी नयी आवाज़ में उन्होंने गाया मन का रेडियो, जो बेहद दिल को छूता है, जाने मन, पिया जैसे लाडू, रफा दफा और जिंदगी जैसे एक रेडियो जैसे गीत भीड़ से अलग हैं और मिठास से भरे हुए भी. बहुत बढ़िया हिमेश साहब....एक संगीतकार तिकड़ी जिन्होंने इस साल बहुत सफलता तो नहीं पायी मगर नए गायकों को मौका देकर एक अच्छा उदाहरण जरूर पेश किया, वो रहे शंकर एहसान लॉय. हालाँकि "लन्दन ड्रीम्स" एक संगीतमयी फिल्म थी, पर कहीं न कहीं वो इस संगीत में श्रोताओं से जुड़ने में असफल रहे. "वेक अप सिद" में कुछ भी नया नहीं था, हाँ पर "लक बाई चांस" में उनका संगीत उनकी पुरानी फिल्म "अरमान" के सदाबहार गीतों की याद ताज़ा कर गया. विशाल भारद्वाज अपने फिल्म "कमीने" से अपनी जमीन बरकरार रखने में सफल रहे. शीर्षक गीत के अलावा रात के ढाई बजे, फटाक, पहली बार मोहब्बत जैसे गीत सफल रहे. गुलज़ार साहब ने अपने शब्दों के जाल से इन्हें ख़ास बना डाला. आज के दौर के गीतकारों में मेरे सबसे पसंदीदा गीतकार स्वानंद किरकिरे ने "३ इडियट्स" और "पा" दोनों ही फिल्मों में बहुत बढ़िया काम किया. "पा" में हिचकी(इस गीत को बेहतर समझने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी)और मेरे पा जैसे गीत लिखने आसान नहीं रहे होंगें, "३ इडियट्स" में उनकी जोड़ी बनी उनके सबसे सफल जोड़ीदार शांतनु मोइत्रा के साथ, और दोनों ने मिलकर खूब रंग जमाया. ऑल इज्ज़ वेल, जुबी डूबी इसके शानदार नमूने हैं. पूरे वर्ष गायिकी में कम सुनाई दिए सोनू निगम ने ऑल इज वेल और जाने नहीं देंगें गाकर फिर से साबित किया कि इस समय तो कम से कम इंडस्ट्री में उनके टक्कर का कोई नहीं. एक और संगीतकार जिन्होंने इस वर्ष सबसे अधिक प्रभावित किया वो रहे अमित त्रिवेदी. "देव डी" का संगीत अनूठा था, अगर कहूँ तो आउट ऑफ दिस वर्ल्ड, एक दम तारो ताज़ा एक दम नया....वहीँ उनका एकतारा "वेक अप सिद" के अन्य तमाम गीतों पर भारी पड़ा.

अब कुछ ऐसे गीतों की बात करें जिनकी अल्बम तो कुछ ख़ास चर्चा में नहीं रही पर ये अपने आप में बेहद सराहे गए. जय हो का जयकारा देश विदेश में गूंजा, पर हिंदी गीतों के शौकीनों के लिए इस अल्बम में इस गीत के अलावा कुछ अधिक नहीं था, जावेद अख्तर का रचा 'सपनों से भरे नैना' दिल को बेहद करीब से छूता है. धूप के सिक्के में प्रसून ने भी बहुत बढ़िया शब्द बिछाये हैं और इन दोनों गीतों को शंकर ने अपनी आवाज़ से बुलंदियां तक पहुँचाया है. "ब्लू" में हालाँकि रहमान कुछ अलग नहीं दे पाए पर आज दिल गुस्ताख में श्रेया घोषाल ने एक अलग अंदाज़ की गायिकी दिखा कर श्रोताओं को चौंका दिया. मधुर भंडारकर की "जेल" में लता जी की दिव्य आवाज़ गूंजी. क्या इतना काफी नहीं कि गीत दाता सुन ले को हम ख़ास दर्जा दें. विशाल ददलानी ने इस साल संगीतकारी कम की गायिकी ज्यादा. सलीम सुलेमान ने "कुर्बान" में शुक्रान अल्लाह और रोकेट सिंह में पंखों को उड़ने दो जैसे गीत दिए. इस जोड़ी से भी संगीत की दुनिया उम्मीदें रख सकती है. इनके अलावा बिखरी बिखरी, सू छे (व्हाट्स यूर राशि), नदी में ये चंदा (मोहनदास), आ आजा साए मेरे (न्यू योर्क), और उम्मीद कोई (फ़िराक) के माध्यम से गीत/संगीत की दुनिया में कुछ नए नाम जुड़े, जिनकी चर्चा हम ताज सुर ताल में पहले ही कर चुके हैं. चलिए अब बढ़ते हैं उन नामों की तरफ जो मेरे हिसाब से इस वर्ष सर्वश्रेष्ठ रहे अपने अपने विभागों में.

गीतकारों की बाते करें तो प्रसून जोशी ने दिल्ली ६, लन्दन ड्रीम्स और सिकंदर में बेहतरीन गीत लिखे, उनका लिखा मसकली, खानाबदोश. धूप के सिक्के, विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं. जावेद अख्तर साहब का लिखा सपनों से भरे नैना अपनी पहचान खुद है, गुलज़ार साहब ने एड्स जैसी खतरनाक बिमारी पर सचेत किया "भंवरा" गीत से, तो जय हो पर ओस्कर की मोहर लगाने वाले वो पहले हिंदी गीतकार रहे. स्वानंद किरकिरे ने ३ इडियट्स और पा के लिए फिल्म की स्क्रिप्ट के मुताबिक लाजवाब गीत लिखे तो इर्षद कामिल (लव आजकल और अजब प्रेम कि गजब कहानी), सैयद कादरी (तुम मिले, राज़), जयदीप सहनी (रोकेट सिंह) और सुब्रत सिन्हा ने रेडियो के गीत लिखकर अपनी जबरदस्त उपस्तिथि दर्ज की. पर मेरी तरफ से इस वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गीतकार रहे पियूष मिश्रा. "चल चलें" में इलायाराजा के साथ काम करने वाले पियूष ने गुलाल में ऑल राउंड पेशकश दी, गीत लिखे भी और संगीत भी दिया. मेरा नामांकन है ९ मिनट लम्बे गीत "शहर" और "दुनिया" के रचेता पियूष मिश्रा के नाम वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गीतकार का. संगीतकारों के योगदान का जिक्र उपर हम कर ही चुके हैं. प्रीतम ने जहाँ हिट संगीत की लड़ी लगायी, वहीँ हिमेश, अमित त्रिवेदी, इल्ल्याराजा, शंकर एहसान लोय, विशाल भारद्वाज और शांतनु मोइत्रा ने अपने अपने काम से खूब मनोरंजन दिया, पर नामांकन मेरा इस वर्ष भी नाम हुआ ए आर रहमान के नाम अल्बम "दिल्ली ६" के लिए. इस अल्बम में जबरदस्त विविधता है, और हर रंग के गीत के साथ रहमान ने भरपूर न्याय किया है. सुपर हिट गीत "मसकली" और "रहना तू" के लिए रहमान को जाता है मेरा नामांकन सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के लिए.

गायक/ गायिकाओं की बात करते हैं. ग़ज़ल और सूफी गायिकी में महारथ गायिका कविता सेठ ने कुछ अलग तेवर दिखाए "एकतारा" में तो लता जी ने "दाता सुन ले" गाकर इस सामान्य से गीत को ख़ास कर दिया. सुनिधि चौहान ने लो टोन में "हिचकी" (पा), और श्रेया घोषाल ने आज दिल गुस्ताख है (ब्लू) गाकर अपने अब तक से अलग एक रूप को सफलता पूर्वक सामने रखा. बेला शिंदे ने "सू छे" से प्रभावित किया पर मेरा नामाकन पाने में सफल रही रेखा भारद्वाज अपने गीत "गैंदा फूल" के लिए, वैसे रेखा ने इस वर्ष "उम्मीद कोई" (फ़िराक) और "रात के ढाई बजे" (कमीने) में भी अपनी आवाज़ दी, पर गैंदा फूल में वो बस कमाल साबित हुई है. अपने अब तक के करियर में शायद सबसे अच्छे साल से गुजरी रेखा भारद्वाज जी को जाता है मेरा नामांकन सर्वश्रेष्ठ गायिका के लिए. गायकों में भी जबरदस्त होड़ रही. गायक जोजो (आ जाओ मेरी तमन्ना), आतिफ असलम (तू जाने न), और जावेद अली (तू ही हकीक़त ख्वाब तू) के बीच मेरे लिए चुनाव बहुत मुश्किल रहा, सोनू निगम (जाने नहीं देंगें तुझे), सुखविंदर (जय हो), मोहित चौहान (मसकली), और शंकर महादेवन (सपनों से भरे नैना और मन को अति भाए)ने दुविधा को और बढा दिया, ये सच है कि नीरज श्रीधर कभी भी मेरे बहुत पसंदीदा गायक नहीं रहे हैं, पर मुझे लगता है जिस मस्ती के साथ उन्होंने "प्रेम की नैय्या (अजब प्रेम की गजब कहानी) को गाया है वो वाकई काबिले तारीफ़ है, तो मुझे इस वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गायक का नामांकन नीरज श्रीधर के नाम आखिर करना ही पड़ा.

सर्वश्रेष्ठ गीत वो होता है जिसका नशा पूरे साल न टूटे, मेरी नज़र में इस वर्ष ऐसा एक ही गीत रहा जिसने बच्चों बूढों और जवानों, शहरों, गाँवो और विदेशों में भी एक सी धूम मचाई, वो है दिल्ली ६ का "गैंदा फूल", मैं इस गीत को सर्वश्रेष्ठ गीत में नामांकित करना चाहूँगा. वर्ष २००९ में यदि कोई अल्बम ऐसी आई है जिसने मुझे बार बार सुने जाने पर मजबूर किया है वो है "अजब प्रेम की गजब कहानी", सर्वश्रेष्ठ अल्बम की श्रेणी में मैं इस अल्बम को नामंकिंत करना चाहूँगा. इसी फिल्म का "तू जाने न" गीत है मेरी नज़र में साल का सर्वश्रेष्ठ फिल्मांकित गीत. सुंदर पृष्ठभूमि और टेक्सचर पर रणबीर और कटरीना को देखना एक अनुभव ही है. उभरते हुए कलाकार में मैं सुब्रत सिन्हा को नामांकित करूँगा. शायद "रेडियो" उनकी पहली फिल्म है पर उनका लिखा हर गीत ऐसा लगता है जैसे किसी तजुर्बेकार गीतकार ने लिखा हो, मुझे इनसे बहुत उम्मीदें हैं. वर्ष के कलाकार के रूप में एक बार फिर मैं प्रीतम को नामांकित करना चाहूँगा. प्रीतम ने (यदि चुरा कर न पेश किया हो) तो पूरे साल संगीत की दुनिया में हलचल बनाये रखी. "अजब प्रेम.." और "लव आजकल" में उनका काम बहुत बढ़िया रहा.

चलते चलते कुछ बातें गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया की भी. गैर फिल्म संगीत जिस तेज़ी से बढ़ना चाहिए उस तेज़ी से नहीं बढ़ रहा है ये दुखद है. गैर फ़िल्मी संगीत में कलाकार के पास मौका होता है सामान्यता प्रेम गीतों के आस पास रहते फिल्म संगीत से कुछ अलग कर दिखाने का, बस जरुरत है कि उन्हें भी भरपूर प्रचार मिले ताकि वो भी अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुच सके. मेरे लिए चुनाव वाकई बहुत मुश्किल रहा इसलिए मैं इस श्रेणी में दो गीतों को नामांकित कर रहा हूँ एक "भीग गया मेरा मन" (कैलाश खेर, चांदन में) और दूसरा "माये नि मेरिये"(फितूर, मोहित चौहान). दोनों ही गीतों में मिटटी की खुशबू है, एक में चेरापूंजी की महक है तो दूसरे में पहाड़ों का जादू.और ये रहे मेरी पसंद के ५ गीत क्रमानुसार-

१. गैंदाफूल(दिल्ली ६)
२. एकतारा (वेक अप सिद)
३. सपनों से भरे नैना (लक बाई चांस)
४. तू जाने न (अजब प्रेम की गजब कहानी)
५. तू ही हकीकत (तुम मिले)


चलिए ये तो हुई मेरी राय, मैं जानना चाहूँगा कि मेरे इन नामांकनों पर आपकी क्या राय है, अपने विचारों में मुझे अवश्य अवगत करें...धन्येवाद

Friday, December 25, 2009

फ़्लैशबैक २००९- नए संगीत कर्मियों का जोर- हिंदी फ़िल्मी/गैरफिल्मी गीत-संगीत पर एक वार्षिक अवलोकन सुजॉय चटटर्जी द्वारा

आप सभी को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार और Merry Christmas! अब बस इस साल में कुछ ही दिन रह गए हैं, और सिर्फ़ इस साल के ही नहीं बल्कि इस पूरे दशक के चंद रोज़ बाक़ी हैं। साल २००९ अगर हमें अलविदा कहने की ज़ोर शोर से तैयारी कर रहा है तो साल २०१० दरवाज़े पर दस्तक भी दे रहा है। हर साल की तरह २००९ भी हिंदी फ़िल्म जगत के लिए मिला जुला साल रहा, बहुत सारी फ़िल्में बनीं, जिनमें से कुछ चले और बहुत सारों के सितारे गरदिश पर ही रहे। जहाँ तक इन फ़िल्मों के संगीत का सवाल है, इस साल कई लोकप्रिय गानें आए जिनमें से कुछ फ़ूट टैपरिंग् नंबर्स थे तो कुछ सूफ़ी रंग में रंगे हुए, कुछ सॊफ़्ट रोमांटिक गानें दिल को छू गए, और बहुत सारे गानें तो कब आए और कब गए पता भी नहीं चला। आइए प्रस्तुत है साल २००९ के फ़िल्म संगीत पर एक लेखा जोखा, हमारी यह विशेष प्रस्तुति 'फ़ैल्शबैक २००९' के अन्तर्गत।

हम इस आलेख को शुरु करना चाहेंगे कुछ ऐसे कलाकारों को श्रद्धांजली अर्पित करते हुए जो इस साल हमें छोड़ अपनी अनंत यात्रा पर निकल पड़े हैं। आप हैं फ़िल्मकार शक्ति सामंत, फ़िल्मकार प्रकाश मेहरा, गीतकार गुलशन बावरा, और अभी हाल ही मे हमसे बिछड़ी अभिनेत्री बीना राय। 'हिंद युग्म' की तरफ़ से आप सभी को हमारी विनम्र श्रद्धांजली। आज हम दो और कलाकारों को श्रद्धा सुमन अर्पित करना चाहेंगे, एक हैं मोहम्मद रफ़ी साहब जिनका कल, २४ दिसंबर को जन्मदिन था और दूसरे, संगीतकार नौशाद साहब, जिनका आज जन्मदिन है। आइए अब आगे बढ़ा जाए २००९ की फ़िल्म संगीत की समीक्षा पर। शुरुआत हम करना चाहेंगे फ़िल्म जगत की सुरीली महारानी लता मंगेशकर को सेल्युट करते हुए। दोस्तों, यह हैरत में डाल देने वाली ही बात है कि ८० वर्ष की आयु में लता जी फ़िल्म जगत में सक्रीय हैं, भले ही कम मात्रा में। मधुर भंडारकर की फ़िल्म 'जेल' के लिए लता जी ने गाया "दाता सुन ले, मौला सुन ले" और एक बार फिर साबित किया कि वो लता मंगेशकर हैं। इस साल की सर्वश्रेष्ठ गायिका के रूप में उनका नाम मनोनित करने की ग़ुस्ताख़ी मैं नहीं करूँगा क्योंकि आज के दौर के गायिकाओं में उन्हे शामिल करना हमें शोभा नहीं देता। बस ईश्वर से यही दुआ करेंगे कि लता जी ऐसे ही गाती रहें और फ़िज़ाओं में अमृत घोलती रहें।

अगर हम २००९ को संगीतकार प्रीतम का साल कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। सब से ज़्यादा हिट गानें उन्होने ही तो दिए हैं इस साल। 'बिल्लु', 'न्युयार्क', 'लव आजकल', 'लाइफ़ पार्टनर', 'लव खिचड़ी', 'दिल बोले हड़िप्पा', 'ऒल दि बेस्ट', 'अजब प्रेम की ग़ज़ब कहानी' और 'तुम मिले' जैसी फ़िल्मों में उन्होने कामयाब संगीत दिया। इन सभी फ़िल्मों के गानें साल भर छाए रहे हर रेडियो व टीवी चैनल पर, और झूठ नहीं बोलूँगा मुझे भी इन फ़िल्मों में से कई गानें पसंद आए जिनका ज़िक्र आगे चलकर बारी बारी से आलेख में आता रहेगा किसी ना किसी संदर्भ में। इन सब फ़िल्मों के अलावा नवोदित संगीतकार गौरव दासगुप्ता के साथ उन्होने शेयर किया फ़िल्म 'आ देखें ज़रा' का संगीत। उधर गौरव ने बप्पी लाहिड़ी के बेटे और उभरते संगीतकार बप्पा लाहिड़ी तथा 'जेल' फ़िल्म के मुख्य संगीतकार शमीर टंडन के साथ 'ऐसिड फ़ैक्टरी' का संगीत भी शेयर किया। नवोदित संगीतकारों की बात जब छिड़ ही गई है तो गौरव दासगुप्ता के अलावा और भी कई उभरते संगीतकार इस साल नज़र आए। अमित त्रिवेदी ने 'देव-डी' में अगर किया आपका "ईमोशनल अत्याचार" तो आर.डी.बी ने बनाया हमारे लिए 'आलू चाट'। अब उस चाट का स्वाद कैसा था वह हम सभी को पता है। और अब आर.डी.बी का पूरा नाम मुझसे मत पूछिएगा! चिरंतन भट्ट का संगीत फ़िल्म 'थ्री - लव लाइज़ ऐंड बिट्रेयल' में उन्हे बिट्रे कर गई लेकिन सोहैल सेन के १३ गानें 'व्हाट्स योर राशी' में कुछ हद तक पसंद किए गए, लेकिन फ़िल्म के पिट जाने की वजह से संगीत का राशीफल भी कुछ अच्छा नहीं रहा। नए संगीतकारों में शरीब साबरी और तोशी साबरी ने शरीब-तोशी की जोड़ी बनाकर फ़िल्म 'राज़-२', 'जश्न', और 'जेल' में अच्छा काम दिखाया। तोशी की ही आवाज़ में 'राज़-२' का गीत "दिल रोए रे इलाही तू आजा मेरे माही" ख़ासा लोकप्रिय हुआ। इस फ़िल्म में राजु सिंह, प्रणय एम. रिजिया और गौरव दासगुप्ता ने भी कुछ गानें कॊम्पोज़ किए। राजु सिंह के संगीत में सोनू निगम और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में "ओ सोनियो" ने भी युवाओं को काफ़ी अट्ट्राक्ट किया।

प्रीतम के बाद जो संगीतकार इस साल ज़्यादा सक्रीय रहे वो हैं शंकर अहसान लॊय की तिकड़ी। 'लक बाइ चांस', 'लंदन ड्रीम्स', 'वेक अप सिद', '१३-बी', 'शॊर्ट कट' जैसी फ़िल्मों में उनका संगीत बजा। शंकर ने इनमें से कई फ़िल्मों में अपनी गायकी के जल्वे भी दिखाए। 'लक बाइ चांस' में "बावरे", "सपनों से भरे नैना", "ओ राही रे", 'शॊर्ट कट' में "मरीज़-ए-मोहब्बत" और "पतली गली से निकल भी जा", 'वेक अप सिद' का शीर्षक गीत, 'लंदन ड्रीम्स' में "मन को अति भावे स‍इयाँ" और फ़िल्म 'अलादिन' में भी कुछ गानें उन्होने गाए। शंकर अहसान लॊय ने इस साल कम से कम तीन नए गायकों को अच्छा ब्रेक दिया। इनमें से एक हैं 'इंडियन आइडल' के प्रतिभागी अमित पॉल जिनसे गवाया गया महालक्ष्मी अय्यर के साथ फ़िल्म 'लक बाइ चांस' में एक नर्मोनाज़ुक युगल गीत "प्यार की दस्ताँ"। 'लंदन ड्रीम्स' में एक और रियलिटी शो से उभरे गायक अभिजीत घोषाल को "जश्न है जीत का" गीत में और मोहन को "ख़ाना बदोश" गीत में मौका दिया। 'वेक अप सिद' में अमिताभ भट्टाचार्य से गवाया "गूँजा सा है कोई इकतारा"। 'शॊर्ट कट' फ़िल्म में बहुत दिनों के बाद सोनू निगम और अल्का याज्ञ्निक की युगल आवाज़ें सुनने को मिलीं जावेद अख़्तर साहब के लिखे एक रोमांटिक डुएट "कल नौ बजे तुम चाँद देखना" गीत में। शंकर अहसान लॊय ने 'चांदनी चौक टू चायना' फ़िल्म में कैलाश खेर, कामत ब्रदर्स और बप्पी लाहिड़ी के साथ संगीत शेयर किया। बप्पी दा ने इस फ़िल्म में अपना हिट गीत "बम्बई से आया मेरा दोस्त" को नए रूप में "इंडिया से आया मेरा दोस्त" पेश किया। बप्पी लाहिड़ी और लव जंजुआ 'जय वीरू' फ़िल्म में भी संगीत दिया लेकिन "तैनु लेके जाना" गीत के अलावा किसी भी गीत के तरफ़ लोगों ने ध्यान नहीं दिया।

अब ज़िक्र एक ऐसे संगीतकार का जिनका नाम हर पीढ़ी के श्रोता बड़े सम्मान से लेते हैं। ए. आर. रहमान, जो हर साल एक दो फ़िल्मों में संगीत देकर अपना अमिट छाप छोड़ जाते रहे हैं, इस साल भी उनका यही रवैया जारी रहा। बस दो फ़िल्में - 'दिल्ली-६' और 'ब्लू', लेकिन दोनों का संगीत ही सुपरहिट। 'ब्लू' फ़िल्म भले ही पिट गई लेकिन 'दिल्ली-६' ने लोगों को अपनी ओर खींचा। "मसक्कली", "ससुराल गेंदाफूल", "अर्ज़ियाँ" और "रहना तू" जैसे गानें ख़ूब ख़ूब पसंद किए गए और निस्संदेह इन गीतों को पुरस्कारों के कई विभागों में इस साल नॊमिनेशन मिलेगा ऐसा मेरा ख़याल है। दक्षिण के एक और संगीतकार जिनकी फ़िल्म 'सदमा' के गानें आज भी याद किए जाते हैं, इस साल उनका पुनरागमन हुआ हिंदी फ़िल्म संगीत में। इलय्याराजा ने फ़िल्म 'चल चलें' और 'पा' में संगीत दिया। 'चल चलें' तो बिना कोई शोर मचाए ही चली गई पर अभी अभी प्रदर्शित हुए 'पा' के रेवियूस बेहद अच्छे हैं। फ़िल्म 'पा' के गानें लिखे हैं स्वानंद किरकिरे ने जो ज़्यादा जाने जाते हैं संगीतकार शांतनु मोइत्र के साथ काम करने के लिए। तो भई, इस साल भी इन दोनों की जोड़ी सलामत रही और आज ही रिलीज़ हो रही है स्वानंद-शांतनु की फ़िल्म '३ इडियट्स'। इस फ़िल्म में सोनू निगम और श्रेया घोषाल के गाए "ज़ूबी डूबी" गीत को काफ़ी पसंद भी किया जा रहा है। एक और सीनियर संगीतकार अनु मलिक साहब ने इस साल 'विक्ट्री' और 'कमबख़्त इश्क़' में संगीत दिया, पर इन कमबख़्त फ़िल्मों ने उनका साथ नहीं दिया। अनु मलिक के भाई और कम बजट के फ़िल्मों के संगीतकार डबू मलिक को इस साल मौका मिला कुछ हद तक बड़ी बजट की फ़िल्म 'किसान' में संगीत देने का लेकिन वो इसका फ़ायदा नहीं उठा सके। ज़िक्र जारी है सीनियर संगीतकारों की, नदीम श्रवण इस साल लेकर आए 'डू नॊट डिस्टर्ब'। इस फ़िल्म के संगीत को सुनकर हम बस यही कह सकते हैं कि नदीम श्रवण जी, आपके पुराने तमाम गीतों के चाहनेवालों को आपने बहुत ज़्यादा निराश किया है।

हमेशा किसी ना किसी वजह से चर्चा में रहने वाले हिमेश रेशम्मिया इस साल चर्चा में रहे अपने नए लुक्स और नई आवाज़ के लिए। फ़िल्म थी 'रेडियो - लव ऒन एयर'। हाल ही में फ़िल्म रिलीज़ हुई है, गानें भी अच्छे बनाए हैं उन्होने इस फ़िल्म में। श्रेया घोषाल के साथ उनका गाया युगल गीत "जानेमन" का शुमार तो अच्छे गीतों में ही होना चाहिए। लेकिन 'तेरे नाम' वाली बात फिर भी नहीं बन पाई है। 'तेरे नाम' से याद आया कि सल्लु मियाँ पिछले कुछ सालों से संगीतकार जोड़ी साजिद-वाजिद को संगीत देने के काफ़ी मौके देते आए हैं। इस साल भी 'वान्टेड' और 'मैं और मिसेस खन्ना' जैसी फ़िल्मो में इस जोड़ी का संगीत गूँजा। 'वान्टेड' के गानें तो ज़्यादातर आइटम सॊंग्‍स् ही थे, और 'मैं और मिसेस खन्ना' में सोनू-श्रेया के गाए "डोंट से अल्विदा" में भी 'मुझसे शादी करोगी' की याद आती रही। 'ढ़ूंढते रह जाओगे' में भी साजिद-वाजिद का संगीत रहा लेकिन अगर मैं आप से इस फ़िल्म के गीतों के बारे में पूछूँ तो आप भी शायद ढ़ूंढते ही रह जाओगे!

२००८ में 'रब ने बना दी जोड़ी' से हिट हुए संगीतकार जोड़ी 'सलीम सुलेमान' ने कम से कम तीन ऐसी फ़िल्मों में संगीत दिया कि वो फ़िल्में तो नही चली लेकिन उनके संगीत को ज़रूर नोटिस किया गया। फ़िल्म 'लक' में "लक आज़मा" और 'क़ुर्बान' में "शुक्रान अल्लाह" गीतों ने अच्छा नाम कमाया। '8x10 तस्वीर' में "नज़ारा है" गीत हिट हुआ। वैसे इस फ़िल्म में नीरज श्रीधर और बोहेमिया का भी संगीत था। नीरज श्रीधर भले ही इस फ़िल्म में संगीत दिया हो, लेकिन वो इस साल छाए रहे अपनी आवाज़ की वजह से। एक के बाद एक कई हिट गीतों में उनकी आवाज़ रही। 'बिल्लू' फ़िल्म में "लव मेरा हिट हिट सोनिए", '8x10 तस्वीर' में "आजा माही", 'लव आजकल' में "ट्विस्ट'", "चोर बाज़ारी", "आहुं आहुं", 'अजब प्रेम की ग़ज़ब कहानी' में "प्रेम की नैया", 'तुम मिले' में "तुम मिले तो जीना आ गया" जैसे पॊपुलर गानें उन्होने गाए। नीरज श्रीधर के ज़िक्र से याद आया दोस्तों कि हमने अब तक एक ऐसे गायक का ज़िक्र तो किया ही नहीं जिसने शायद इस साल सब से ज़्यादा बेहतरीन गानें गाए हैं। जी हाँ, मोहित चौहान। चाहे वह 'दिल्ली-६' की "मसकली" हो या 'लव आजकल' की "ये दूरियाँ", '8x10 तस्वीर' का "हाफ़िज़ ख़ुदा", 'न्यु यार्क' का "तूने जो ना कहा", 'तुम मिले' में "इस जहाँ में" और 'कमीने' फ़िल्म का "पहली बार मोहब्बत की है"। वैसे 'कमीने' ज़्यादा चर्चित हुआ सुखविंदर सिंह और विशाल दादलानी के गाए "ढैन ट नैन" गीत की वजह से। गुल्ज़ार साहब के क़लम का जादू चला इस फ़िल्म के गीतों में और विशाल भारद्वाज का संगीत था। वैसे विशाल दादलानी अपनी संगीतकार जोड़ी विशाल-शेखर के संगीत के बाहर भी शुरु से ही गाते आए हैं, इस साल भी उनकी आवाज़ कई गीतों में गूँजी। "नज़ारा है" और "ढैन ट नैन" के अलावा विशाल-शेखर के संगीत में 'अलादिन' फ़िल्म में 'यू मे बी" और "बचके ओ बचके" गीतों में उनकी आवाज़ थी। वैसे विशाल शेखर के लिए यह साल उतना अच्छा नहीं रहा जिस तरह का उनका पहले रह चुका है। नीरज श्रीधर और मोहित चौहान, इन दोनों गायकों को फ़िल्मों में मौका देकर लोकप्रिय बनाने का श्रेय संगीतकार प्रीतम को ही जाता है। और सिर्फ़ ये दो ही नहीं बल्कि कई और गायकों को प्रीतम ने समय समय पर मौका दिया है। २००९ में सोहम ने प्रीतम दा के लिए गाया फ़िल्म 'लाइफ़ पार्टनर' में "तेरी मेरी ये ज़िंदगी" तथा आतिफ़ अस्लम ने 'अजब प्रेम की...' में "तेरा होने लगा हूँ"।

दोस्तों, एक और पार्श्व गायक हैं जो कई हिट गीत गाते रहने के बावजूद भी कुछ अंडर-रेटेड ही रहे हैं। हम यहाँ के.के की बात कर रहे हैं। "है जुनून" (न्युयार्क), "मैं क्या हूँ" (लव आजकल), "मैं जितनी मर्तबा" (ऒल दि बेस्ट), "मैं तेरा धड़कन तेरी" (अजब प्रेम की...), "दिल इबादत कर रहा है धड़कनें मेरी सुन" और "ओ मेरी जान" (तुम मिले) जैसे गीत इस साल के.के. ने गाए हैं, लेकिन उनकी चर्चा ना के बराबर ही हुई। सूफ़ी मिज़ाज के गीतों की अब बात करें तो कैलाश खेर, राहत फ़तेह अली ख़ान और जावेद अली जैसे गायकों ने परंपरा को आगे बढ़ाया। इनमें उल्लेखनीय हैं राहत साहब के गाए "जाऊँ कहाँ" (बिल्लू), "आज दिन चढ़ेया" (लव आजकल), और "रब्बा" (मैं और मिसेस खन्ना)। 'दिल्ली-६' की क़व्वाली "अर्ज़ियाँ" में कैलाश खेर और जावेद अली की आवाज़ें थीं। जहाँ तक पार्श्व गायिकाओं की बात है तो इस साल की फ़िल्मों का रवैया गायिकाओं की तरफ़ उदासीन ही रहा। इस साल गायिकाओं के गाए ऐसे गानें जो आप के दिल को छू ले, उंगलियों में गिने जा सकते हैं। लता जी के गाए 'जेल' फ़िल्म के गीत के अलावा जिन प्रमुख गीतों का उल्लेख किया जा सकता है वो हैं फ़िल्म 'दिल्ली-६' का समूह गीत "ससुराल गेंदाफूल" जिसे रेखा भारद्वाज, श्रद्धा पंडित और सुजाता मजुमदार ने गाया है, इसी फ़िल्म में श्रेया घोषाल का गाया राग गुजरी तोड़ी पर आधारित "भोर भई", फ़िल्म 'न्यु यार्क' में सुनिधि चौहान का गाया "मेरे संग", अल्का याज्ञ्निक का गाया फ़िल्म 'शॊर्ट कट' में "कल नौ बजे", फ़िल्म 'व्हाट्स योर राशी' में बेला शेंदे का गाया "सु छे", 'वेक अप सिद' में कविता सेठ का गाया "इकतारा", शिल्पा राव की आवाज़ में फ़िल्म 'पा' का "उड़ी उड़ी", और अलिशा चिनॊय का गाया फ़िल्म 'अजब प्रेम की गज़ब कहानी' का लोकप्रिय गीत "तेरा होने लगा हूँ"। इस गीत में भले ही आतिफ़ अस्लम वाला हिस्सा "तेरा होने लगा हूँ" इस गीत का कैच लाइन है, लेकिन अलिशा वाला हिस्सा आजकल बहुतों के कॊलर ट्युन में सुना जा सकता है।

और अब आते हैं गीतकारों पर। गुल्ज़ार, जावेद अख़्तर और स्वानंद किरकिरे का अब तक हमने ज़िक्र किया है। इनके अलावा दो और गीतकार जो पिछले कुछ सालों से फ़िल्म जगत में सक्रीय रहे हैं और इस साल भी कई अच्छे गानें हमें दिए हैं, वो हैं प्रसून जोशी और इरशाद कामिल। अगर प्रसून ने 'दिल्ली-६' के गानें लिखे तो इरशाद साहब ने 'लव आजकल' और 'अजब प्रेम की...' के तमाम हिट गानें लिखे। वैसे 'अजब प्रेम...' में आशिष पंडित के भी गानें थे और 'बिल्लु' फ़िल्म का "मरजानी" गीत भी आशिष का ही लिखा हुआ था। इनके अलावा जिन गीतकारों ने इस साल काम किया उनमें शामिल हैं सईद क़ादरी, मयूर पुरी, सय्यद गुलरेज़, शीर्षक आनंद, प्रशांत पाण्डेय, संदीप श्रीवास्तव, जुनैद वारसी, अजय कुमार गर्ग जिन्होने फ़िल्म 'जेल' में "दाता सुन ले" गीत को लिखा था। हिमेश भाई की फ़िल्म 'रेडियो - लव ऒन एयर' में नवोदित गीतकार सुब्रत सिन्हा ने बहुत ही अच्छे काम का प्रदर्शन किया है, और सुनने में आया है कि फ़िल्म ने अपने रिलीज़ से पहले ही पूरा पैसा वसूल कर लिया है, और यकीनन यह इस फ़िल्म के गीतों का ही असर होगा! गुल्ज़ार साहब ने 'कमीने' के अलावा 'बिल्लु' में कुछ गानें लिखे तथा जावेद अख़्तर ने 'शॊर्ट कट' के अलावा अपने बेटे की फ़िल्म 'लक बाइ चांस' के गानें लिखे। कुछ भी कहिए गुलज़ार साहब का कोई सानी आज दूर दूर तक दिखाई नहीं देता। उनके ग़ैर पारम्परिक बोल इस साल भी सुनाई दिए, ख़ास कर फ़िल्म 'कमीने' के गीत "पहली बार मोहब्बत की है" में भी गिलहरी के जूठे मटर खाने का ज़िक्र है जो उनकी इसी ख़ास अदा को बरकरार रखती है। जहाँ कुछ गीतकारों ने अच्छा काम दिखाया, वहीं बहुत से गीतकारों ने महज़ 'वर्ड फ़िटर' की भूमिका निभाई, और यह मैं यह काम आप पर छोड़ता हूँ ऐसे गीतों को अलग कर रद्दी की टोकरी में फेंकने की।

और अब ये हैं इस साल के मेरी पसंद के ५ गानें....

१. दाता सुन ले, मौला सुन ले (जेल)

२. ससुराल गेंदाफूल (दिल्ली-६)

३. कल नौ बजे तुम चांद देखना (शॊर्ट कट)

४. ये दूरियाँ (लव आजकल)

५. दिल इबादत कर रहा है (तुम मिले)


और अब मेरी तरफ़ से इस साल के कुछ सर्वश्रेष्ठ गीत व कलाकार, अलग अलग श्रेणियों में......

BEST SONG - मसकली (दिल्ली-६)
BEST ALBUM- दिल्ली-६
BEST LYRICIST- गुलज़ार (पहली बार मोहब्बत की है, कमीने)
BEST COMPOSER- ए. आर. रहमान (दिल्ली-६)
BEST SINGER (MALE) - मोहित चौहान (मसकली, दिल्ली-६)
BEST SINGER (FEMALE) - रेखा भारद्वाज, श्रद्धा पंडित, सुजाता मजुमदार (ससुराल गेंदाफूल, दिल्ली-६)
BEST NON FILMI SONG - चांदन में (कैलाश खेर)
BEST UPCOMING ARTIST - तोशी (तू आजा मेरे माही, राज़-२)
BEST FILMED (CHOREOGRAPHED) SONG OF THE YEAR. - बावरे (लक बाइ चांस)
ARTIST OF THE YEAR (OVERALL PERFORMANCE WISE) - प्रीतम


और दोस्तों, अब चलने से पहले आपको बताना चाहेंगे कि साल २०१० में आप किन फ़िल्मों से उम्मीदें रख सकते हैं। साल की शुरुआत होगी सीज़न्स ग्रीटिंग्स के साथ। जी हाँ, १ जनवरी को रिलीज़ हो रही है फ़िल्म 'सीज़न्स ग्रीटिंग्स'। इसके अलावा 'पान सिंह तोमर', 'पीटर गया काम से', 'फ़िल्म सिटि', 'माइ नेम इज़ ख़ान', 'कुची कुची होता है', 'तीन पत्ती', 'रण', 'वीर', 'राइट या रॊंग्', और 'दुल्हा मिल गया' जैसी फ़िल्में एक के बाद एक आती जाएँगी। इन सब की क़िस्मत में क्या है वह तो वक्त और जनता ही तय करेगी, फ़िल्हाल आप ईयर एंडिंग् की छुट्टियों का मज़ा लीजिए, और २००९ के फ़िल्म संगीत की यह समीक्षा आपको कैसी लगी, ज़रूर टिप्पणी में लिखिएगा, आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ, अब दीजिए मुझे इजाज़त, नमस्कार!

आलेख - सुजॉय चटर्जी

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