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Thursday, June 16, 2016

खुशी ने मुझको ठुकराया है... आइये, सुनते हैं आज बेगम अख्तर की जीवन यात्रा!


दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज सुनिए शकील बदायूनीं की ग़ज़ल बेगम अख्तर की पुरकशिश आवाज़ में.

मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे 
स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी

Sunday, October 7, 2012

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – २

   
स्वरगोष्ठी – ९१ में आज 
बेगम अख्तर की ९९वें जन्मदिवस पर स्वरांजलि

‘भर भर आईं मोरी अँखियाँ पिया बिन...’

रस, रंग और भाव की सतरंगी छटा बिखेरती ठुमरी पर केन्द्रित लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के एक नए अंक में कृष्णमोहन मिश्र का अभिवादन स्वीकार कीजिए। ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी इस श्रृंखला के आज के अंक में हम ठुमरी और गजल की साम्राज्ञी बेगम अख्तर को उनके ९९वें जन्मदिन पर स्मरण कर रहे हैं। आज इस अवसर पर बेगम साहिबा की गायी ठुमरी और ग़ज़ल से हम उन्हें स्वरांजलि अर्पित करते हैं।



श्रृंगार और भक्ति रस से सराबोर ठुमरी और गजल शैली की अप्रतिम गायिका बेगम अख्तर का जन्म ७ अक्तूबर, १९१४ उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद नामक एक छोटे से नगर (तत्कालीन अवध) में एक कट्टर मुस्लिम परिवार में हुआ था। परिवार में किसी भी सदस्य को न तो संगीत से अभिरुचि थी और न किसी को संगीत सीखना-सिखाना पसन्द था। परन्तु अख्तरी (बचपन में उन्हें इसी नाम से पुकारा जाता था) को तो मधुर कण्ठ और संगीत के प्रति अनुराग जन्मजात उपहार के रूप में प्राप्त था। एक बार सुविख्यात सरोदवादक उस्ताद सखावत हुसेन खाँ के कानों में अख्तरी के गुनगुनाने की आवाज़ पड़ी। उन्होने परिवार में ऐलान कर दिया कि आगे चल कर यह नन्ही बच्ची असाधारण गायिका बनेगी, और देश-विदेश में अपना व परिवार का नाम रोशन करेगी। उस्ताद ने अख्तरी के माता-पिता से संगीत की तालीम दिलाने का आग्रह किया। पहले तो परिवार का कोई भी सदस्य इसके लिए राजी नहीं हुआ किन्तु अख्तरी की माँ, जो स्वयं भी कुशल गायिका थीं, ने सबको समझा-बुझा कर अन्ततः मना लिया।

उस्ताद सखावत हुसेन ने अपने मित्र, पटियाला के प्रसिद्ध गायक उस्ताद अता मुहम्मद खाँ से अख्तरी को तालीम देने का आग्रह किया। वे मान गए और अख्तरी उस्ताद के पास भेज दी गईं। मात्र सात वर्ष की आयु में उन्हें उस्ताद के कठोर अनुशासन में रियाज़ करना पड़ा। तालीम के दिनों में ही उनका पहला रिकार्ड- ‘वह असीरे दम बला हूँ...’ बना और वे अख्तरी बाई फैजाबादी बन गईं। उस्ताद अता मुहम्मद खाँ के बाद उन्हें पटना के उस्ताद अहमद खाँ से रागों की विधिवत शिक्षा मिली। इसके अलावा बेगम अख्तर को उस्ताद अब्दुल वहीद खाँ और हारमोनियम वादन में सिद्ध उस्ताद गुलाम मुहम्मद खाँ का मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। १९३४ में कलकत्ता (अब कोलकाता) के अल्फ्रेड थियेटर हॉल में बिहार के भूकम्प-पीड़ितों के सहायतार्थ एक संगीत समारोह का आयोजन किया गया था। इस समारोह में कई बड़े कलाकारों के बीच नवोदित अख्तरी बाई को पहली बार गाने का अवसर मिला। मंचीय कार्यक्रमों की भाषा में कहा जाए तो “अख्तरी बाई ने मंच लूट लिया”।

फिल्म 'जलसाघर' का एक दृश्य 
बेगम अख्तर यद्यपि खयाल गायकी में अत्यन्त कुशल थीं किन्तु उन्हें ठुमरी और गज़ल गायन में सर्वाधिक ख्याति मिली। स्पष्ट उच्चारण और भावपूर्ण गायकी के कारण उन्हे चौथे और पाँचवें दशक की फिल्मों में भी अवसर मिला। उन्होने ईस्टर्न इण्डिया कम्पनी की फिल्मों- एक दिन का बादशाह, नल-दमयंती, नसीब का चक्कर आदि फिल्मों में काम किया। १९४० में बनी महबूब प्रोडक्शन की फिल्म ‘रोटी’ में उनके गाये गीतों ने तो पूरे देश में धूम मचाई थी। विश्वविख्यात फ़िल्मकार सत्यजीत रे ने १९५९ में भारतीय संगीत की उन्नीसवीं शताब्दी में दशा-दिशा पर फिल्म ‘जलसाघर’ का निर्माण किया था। इस फिल्म में गायन, वादन और नर्तन के तत्कालीन उत्कृष्ट कलाकारों को प्रत्यक्ष रूप में प्रस्तुत किया गया था। फिल्म में बिस्मिल्लाह खाँ (शहनाई), उस्ताद वहीद खाँ (सुरबहार), रोशन कुमारी (कथक), उस्ताद सलामत अली खाँ (खयाल गायन) के साथ बेगम अख्तर ने गायिका दुर्गा बाई की भूमिका मे राग पीलू में निबद्ध विरह-वेदना को उकेरती ठुमरी- ‘भर भर आईं मोरी अँखियाँ पिया बिन...’ का गायन प्रस्तुत किया था। आगे बढ़ाने से पहले लीजिए, आप भी यह ठुमरी सुनिए-

पीलू ठुमरी : ‘भर भर आईं मोरी अँखियाँ पिया बिन...’ : बेगम अख्तर



विदुषी बेगम अख्तर का उदय जिस काल में हुआ था, भारतीय संगीत का पुनर्जागरण काल था। ब्रिटिश शासनकाल में भारतीय संगीत जिस प्रकार उपेक्षित हुआ था, उससे जनजीवन से संगीत की दूरी बढ़ गई थी। ऐसी स्थिति में १८७८ में जन्में पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर और १८९६ में जन्में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने अपने अनथक प्रयत्नों से पूरी शुचिता के साथ संगीत को न केवल पुनर्प्रतिष्ठित किया बल्कि जन-जन के लिए संगीत-शिक्षा सुलभ कराया। इस दोनों संगीत-ऋषियों के प्रयत्नों के परिणाम बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों में परिलक्षित होने लगे थे। बेगम अख्तर इसी पुनर्जागरण काल की देन थीं। उनकी गायकी में शुचिता थी और श्रोताओं के हृदय को छूने की क्षमता भी थी। अब हम आपके लिए बेगम अख्तर के स्वर में एक होरी ठुमरी प्रस्तुत करते हैं। सुविख्यात गायक पण्डित जसराज ने बेगम साहिबा और उनकी गायकी पर एक सार्थक टिप्पणी की थी, जिसे ठुमरी से पूर्व आप भी सुनेंगे।

होरी ठुमरी : ‘कैसी ये धूम मचाई...’ : बेगम अख्तर



बेगम अख्तर ने अपने जीवन में ठुमरी, दादरा और गज़ल गायकी को ही अपना लक्ष्य बनाया। खयाल गायकी में भी वे दक्ष थीं, किन्तु उनका रुझान उप-शास्त्रीय गायकी की ओर ही केन्द्रित रहा। उनकी गायकी में अनावश्यक अलंकरण नहीं होता था। उनके सुर सच्चे होते थे। बड़ी सहजता और सरलता से रचना के भावों को श्रोताओं तक सम्प्रेषित कर देती थीं। अब हम आपके लिए बेगम साहिबा की गज़ल गायकी का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। एक कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध शायर कैफी आज़मी और बेगम अख्तर की अनूठी जुगलबन्दी हुई। पहले कैफी आज़मी ने अपनी एक गज़ल पढ़ी। बाद में बेगम साहिबा ने उसी गज़ल का सस्वर गायन प्रस्तुत किया था। शायर और गायिका अर्थात शब्द और स्वर की एक ही मंच पर हुई इस अनूठी जुगलबन्दी का आप आनंद लीजिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से विदुषी बेगम अख्तर की स्मृतियों को सादर नमन अर्पित है।

गजल : ‘सुना करो मेरे जाँ इनसे उनसे अफसाने...’ : बेगम अख्तर



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी संगीत-पहेली का आज से आरम्भ हो रहा है पाँचवाँ और अन्तिम सेगमेंट। आप जानते ही हैं कि ५१वें अंक से हमने संगीत पहेली को दस-दस अंकों की श्रृंखलाओं (सेगमेंट) में बाँटा था। पाँचवें सेगमेंट अर्थात १००वें अंक तक सर्वाधिक सेगमेंट के पहले तीन विजेताओ का हम चयन करेंगे और उन्हें पुरस्कृत करेंगे। अगले अंक में चौथे सेगमेंट के विजेताओं के नाम की घोषणा भी की जाएगी।

‘स्वरगोष्ठी’ की आज की संगीत-पहेली में हम आपको कण्ठ-संगीत प्रस्तुति का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछेंगे। १००वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी श्रृंखला के विजेता होंगे।


१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

२ - यह किस भारतीय गायक की आवाज़ है?

३ – यही पारम्परिक दादरा सातवें दशक के आरम्भ में बनी एक फिल्म में भी शामिल किया गया था। क्या आप उस फिल्मी गीत के पार्श्वगायक का नाम बता सकते है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ९३वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ८९वें अंक में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की आवाज़ में एक प्राचीन ठुमरी का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग झिंझोटी दूसरे का सही उत्तर है- ठुमरी शैली। इस बार की पहेली में नियमित उत्तरदाताओं ने भाग नहीं लिया और जिन्होने भाग लिया, उनमें से किसी का उत्तर सही नहीं था।

झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के आगामी अंक में हम आपसे हम एक बेहद लोकप्रिय दादरा पर चर्चा करेंगे। आपके सम्मुख हम इस दादरा का उपशास्त्रीय और फिल्मी, दोनों रूप प्रस्तुत करेंगे। आपकी स्मृतियों में यदि किसी मूर्धन्य कलासाधक की ऐसी कोई पारम्परिक रचना हो जिसे किसी भारतीय फिल्म में भी शामिल किया गया हो तो हमें अवश्य लिखें। आपके सुझाव और सहयोग से इस स्तम्भ को अधिक सुरुचिपूर्ण रूप दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित अपनी इस गोष्ठी में आप अवश्य पधारिए। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


कृष्णमोहन मिश्र

 
'मैंने देखी पहली फिल्म' : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता
दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव radioplaybackindia@live.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’। सर्वश्रेष्ठ तीन आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कारस्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव। प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 31अक्टूबर, 2012 है।



Sunday, February 13, 2011

सुर संगम में आज - बेगम अख्तर की आवाज़ में ठुमरी और दादरा का सुरूर

सुर संगम - 07

कुछ लोगों का यह सोचना है कि मॊडर्ण ज़माने में क्लासिकल म्युज़िक ख़त्म हो जाएगी; उसे कोई तवज्जु नहीं देगा, पर मैं कहती हूँ कि यह ग़लत बात है। ग़ज़ल भी क्लासिकल बेस्ड है। अगर सही ढंग से पेश किया जाये तो इसका जादू भी सर चढ़ के बोलता है।


"आप सभी को मेरा सलाम, मुझे आप से बातें करते हुए बेहद ख़ुशनसीबी महसूस हो रही है। मुझे ख़ुशी है कि मैंने ऐसे वतन में जनम लिया जहाँ पे फ़न और फ़नकार से प्यार किया जाता है, और मैंने आप सब का शुक्रिया अपनी गायकी से अदा किया है"। मलिका-ए-ग़ज़ल बेगम अख़्तर जी के इन शब्दों से, जो उन्होंने कभी विविध भारती के किसी कार्यक्रम में श्रोताओं के लिए कहे थे, आज के 'सुर-संगम' का हम आगाज़ करते हैं। बेगम अख़्तर एक ऐसा नाम है जो किसी तारुफ़ की मोहताज नहीं। उन्हें मलिका-ए-ग़ज़ल कहा जाता है, लेकिन ग़ज़ल गायकी के साथ साथ ठुमरी और दादरा में भी उन्हें उतनी ही महारथ हासिल है। ३० अक्तुबर १९७४ को वो इस दुनिया-ए-फ़ानी से किनारा तो कर लिया, लेकिन उनकी आवाज़ का जादू आज भी सर चढ़ कर बोलता है। आज के संगीत में जब चारों तरफ़ शोर-शराबे का माहौल है, ऐसे में बेगम अख्तर जैसे फ़नकारों की गाई रचनाओं को सुन कर मन को कितनी शांति, कितना सुकून मिलता है, वह केवल अच्छे संगीत-रसिक ही महसूस कर सकता है। और बेगम अख़्तर जी ने भी तो उसी कार्यक्रम में कहा था, "कुछ लोगों का यह सोचना है कि मॊडर्ण ज़माने में क्लासिकल म्युज़िक ख़त्म हो जाएगी; उसे कोई तवज्जु नहीं देगा, पर मैं कहती हूँ कि यह ग़लत बात है। ग़ज़ल भी क्लासिकल बेस्ड है। अगर सही ढंग से पेश किया जाये तो इसका जादू भी सर चढ़ के बोलता है।" दोस्तों, बेगम अख़्तर की गाई हुई एक बेहद मशहूर ग़ज़ल हम आपको थोड़ी देर में सुनवाएँगे, पहले आइए सुनते हैं एक दादरा "हमरी अटरिया प आओ सांवरिया"।

दादरा - हमरी अटरिया प आओ सांवरिया (बेगम अख़्तर)


बेगम अख़्तर का असली नाम अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी है। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद में ७ अक्तुबर १९१४ को हुआ था। उनके पिता अस्ग़र हुसैन, जो पेशे से एक वकील थे, ने मुश्तरी नामक महिला से अपनी दूसरी शादी की, लेकिन बाद में उन्हे तलाक़ दे दिया और इस तरह से मुश्तरी की दो बेटियाँ ज़ोहरा और बिब्बी (अख़्तरीबाई) भी पितृप्रेम से वंचित रह गए। पिता के अभाव को अख़्तरीबाई ने रास्ते का काँटा नहीं बनने दिया और स्वल्पायु से ही संगीत में गहरी रुचि लेने लगीं। जब वो मात्र सात वर्ष की थीं, तभी वो चंद्राबाई नामक थिएटर आर्टिस्ट के संगीत से प्रभावित हुईं। पटना के प्रसिद्ध सारंगी वादक उस्ताद इम्दाद ख़ान से उन्हें बाक़ायदा संगीत सीखने का मौका मिला; उसके बाद पटियाला के अता मोहम्मद ख़ान ने भी उन्हें संगीत की बारीकियाँ सिखाई। तत्पश्चात् अख़्तरीबाई अपनी वालिदा के साथ कलकत्ते का रुख़ किया और वहाँ जाकर संगीत के कई दिग्गजों जैसे कि मोहम्मद ख़ान, अब्दुल वाहीद ख़ान और सुताद झंडे ख़ान से संगीत की तालीम ली। १५ वर्ष की आयु में उन्होंने अपना पहला पब्लिक पर्फ़ॊमैन्स दिया। १९३४ में बिहार के भूकम्प प्रभावित लोगों की मदद के लिए आयोजित एक जल्से में उन्होंने अपना गायन प्रस्तुत किया जिसकी तारीफ़ ख़ुद सरोजिनी नायडू ने की थी। इस तारीफ़ का यह असर हुआ कि अख़्तरीबाई ने ग़ज़ल गायकी को बहुत गंभीरता से लिया और एक के बाद एक उनके गाये ग़ज़लों, दादरा और ठुमरी के रेकोर्ड्स जारी होते गए। तो क्यों न हम भी इन्हीं रेकॊर्ड्स में से एक यहाँ बजाएँ! ग़ज़ल तो हम सुन चुके हैं, आइए एक ठुमरी का आनंद लिया जाए।

ठुमरी - ना जा बलम परदेस (बेगम अख़्तर)


अख़्तरीबाई का ताल्लुख़ फ़िल्मी गीतों से भी रहा है। इस क्षेत्र में उनकी योगदान को हम फिर किसी दिन आप तक पहूँचाएँगे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के ज़रिए, यह हमारा आप से वादा है। १९४५ में अख़्तरीबाई ने बैरिस्टर इश्तिआक़ अहमद अब्बासी से विवाह किया और वो बन गईं बेगम अख़्तर। लेकिन विवाह के बाद पति की सख़्ती की वजह से बेगम अख़्तर लगभग पाँच वर्षों के लिए गा नहीं सकीं और आख़िरकार बीमार पड़ गईं। उनकी बिगड़ती हालत को देखकर चिकित्सक ने उन्हें दोबारा गाने का सलाह दी. और इस तरह से १९४९ को बेगम अख़्तर वापस रेकॊर्डिंग् स्टुडिओ पहुँचीं और लखनऊ रेडिओ स्टेशन के लिए तीन ग़ज़लें गाईं और जल्द ही स्वस्थ हो उठीं। फिर उन्होंने स्टेज पर गाने का सिलसिला जारी रखा और आजीवन यह सिलसिला जारी रहा। उम्र के साथ साथ उनकी आवाज़ भी और ज़्यादा मचियोर और पुर-असर होती चली गई, जिसमें गहराई और ज़्यदा होती गई। अपनी ख़ास अंदाज़ में वो ग़ज़लें और उप-शास्त्रीय संगीत की रचनाएँ गाया करतीं। जो भी ग़ज़लें वो गातीं, उनकी धुनें भी वो ख़ुद ही बनातीं, जो राग प्रधान हुआ करती थी. वैसे दूसरे संगीतकारों के लिए भी गाया, और ऐसे ही एक संगीतकार थे हमारे ख़य्याम साहब जिन्हें यह सुनहरा मौका मिला बेगम साहिबा से गवाने का। सुनिए ख़य्याम साहब के शब्दों में (सौजन्य: संगीत सरिता, विविध भारती):

"जब मैं छोटा था, उस वक़्त बेगम अख़्तर जी की गायी हुई ग़ज़लें सुना करता था। तो आप समझ सकते हैं कि जब मुझे उनके लिए ग़ज़लें कम्पोज़ करने का मौका मिला तो कैस लगा होगा! एक बार वो मुझे मिलीं तो कहने लगीं कि 'ख़य्याम साहब, मैं चाहती हूँ कि आप मेरे लिए ग़ज़लें कम्पोज़ करें, मैं आपके लिए गाना चाहती हूँ। तो पहले तो मैंने उनसे कहा कि मैं क्या आपके लिए ग़ज़लें बनाऊँगा, आप ने इतने अच्छे अच्छे ग़ज़लें गायी हैं। लेकिन उन्होंने कहा कि 'नहीं, आप कम्पोज़ कीजिए, मैं ६ ग़ज़लों का एक पूरा ऐल्बम करना चाहती हूँ, आप बताइए कि जल्द से जल्द कब हम रिकोर्ड कर सकते हैं?'। मैंने कहा कि देखिए मुझे एक ग़ज़ल के लिए एक महीना चाहिए, ऐसे ६ ग़ज़लों के लिए ६ महीने लग जाएँगे। उन्होंने कहा 'ठीक है'। फिर मैंने ग़ज़लें कम्पोज़ करनी शुरु की। अब रिहर्सल का वक़्त आया, उस वक़्त उनकी उम्र भी हो गई थी, तो उनके गले से वो आवाज़, वो काम नहीं निकल के आ रहा था जैसा कि मैं चाह रहा था। लेकिन क्योंकि वो इतती बड़ी फ़नकारा हैं, मैं उनसे नहीं कह सकता था कि आप यहाँ ग़लत गा रही हैं, या आप से नहीं हो पा रहा है। लेकिन वो इतनी बड़ी कलाकार हैं कि वो इस बात को समझ गयीं कि उनसे ठीक से नहीं गाया जा रहा है। उन्होंने मुझसे कहा कि 'ख़य्याम साहब, मैं ठीक से गा नहीं पा रही हूँ'। हमने फिर मिल कर वो ग़ज़लें तैयार की, और ग़ज़लें रेकॊर्ड हो जाने के बाद बेग़म अख़्तर जी मुझसे कहने लगीं कि 'ख़य्याम साहब, आप ने मुझसे यह काम कैसे करवा लिया? मुझे तो लग ही नहीं रहा कि इतना अच्छा मैंने गाया है!' यह उनका बड़प्पन था।"

तो लीजिए दोस्तों, वादे के मुताबिक़ बेगम अख़्तर जी की आवाज़ में अब एक ऐसी ग़ज़ल की बारी जिसकी तर्ज़ ख़य्याम साहब ने ही बनाई है, "मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा...", पेश-ए-ख़िदमत है।

ग़ज़ल: मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा (बेगम अख़्तर)


अहमदाबाद में बेगम अख़्तर ने अपना अंतिम कॊन्सर्ट प्रस्तुत करते वक़्त उनकी तबियत ख़राब होने लगी और उन्हें उसी वक़्त अस्पताल पहुँचाया गया। ३० अक्तुबर १९७४ को ६० वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी सहेली नीलम गमादिया की बाहों में दम तोड़ा, जिनकी निमंत्रण से ही बेगम अख़्तर अहमदाबाद आई थीं अपने जीवन का अंतिम पर्फ़ॊर्मैन्स देने के लिए। बेगम अख़्तर को लोगों का इतना प्यार मिला है कि वह प्यार आज भी क़ायम है, उनके जाने के चार दशक बाद भी उनकी गायकी के कायम आज भी करोड़ों में मौजूद हैं। पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी और मरणोपरांत पद्मभूषण से सम्मानित बेगम अख़्तर संगीताकाश की एक चमकता सितारा हैं जिनकी चमक युगों युगों तक बरकरार रहेगी।

तो दोस्तों, यह था आज का 'सुर-संगम', हमें आशा है आपको पसंद आया होगा। इस स्तंभ के लिए आप अपने विचार, सुझाव और आलेख हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेज सकते हैं। शाम ६:३० बजे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के साथ हम फिर हाज़िर होंगे, तब तक के लिए इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

प्रस्तुति-सुजॉय चटर्जी



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Wednesday, August 18, 2010

लायी हयात, आये, क़ज़ा ले चली, चले.. ज़िंदगी और मौत के बीच उलझे ज़ौक़ को साथ मिला बेग़म और सहगल का

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #९७

नाज़ है गुल को नज़ाक़त पै चमन में ऐ ‘ज़ौक़’,
इसने देखे ही नहीं नाज़-ओ-नज़ाक़त वाले

इस तपिश का है मज़ा दिल ही को हासिल होता
काश, मैं इश्क़ में सर-ता-ब-क़दम दिल होता

यूँ तो इश्क़ और शायर/शायरी में चोली-दामन का साथ होता है, लेकिन कुछ ऐसे भी शायर होते हैं जो इश्क़ को बखूबी समझते हैं और हर शेर लिखने से पहले स्याही को इश्क़ में डुबोते चलते हैं। ऐसे शायरों का लिखा पढने में दिल को जो सुकूं मिलता है, वह लफ़्ज़ों में बयां नहीं किया जा सकता। ज़ौक़ वैसे हीं एक शायर थे। जितनी आसानी ने उन्होंने "सर-ता-ब-कदम" दिल होने की बात कही है या फिर यह कहा है कि गुलशन के फूलों को जो अपनी नज़ाकत पे नाज़ है, उन्हें यह मालूम नहीं कि यह नाज़-ओ-नज़ाकत उनसे बढकर भी कहीं और मौजूद है .. ये सारे बिंब पढने में बड़े हीं आम मालूम होते हैं ,लेकिन लिखने वाले को हीं पता होता है कि कुछ आम लिखना कितना खास होता है। मैंने ज़ौक़ की बहुत सारी ग़ज़लें पढी हैं.. उनकी हर ग़ज़ल और ग़ज़ल का हर शेर इस बात की गवाही देता है कि यह शायर यकीनन कुछ खास रहा है। फिर भी न जाने क्यों, हमने इन्हें भुला दिया है या फिर हम इन्हें भुलाए जा रहे हैं। इस गु़स्ताखी या कहिए इस गलती की एक हीं वज़ह है और वह है ग़ालिब की हद से बढकर भक्ति। अब होता है ये है कि जो भी सुखनसाज़ या सुखन की कद्र करने वाला ग़ालिब को अपना गुरू मानने लगता है, उसके लिए यक-ब-यक ज़ौक़ दुश्मन हो जाते हैं। उन लोगों को यह लगने लगता है कि ज़ौक़ की हीं वज़ह से ग़ालिब को इतने दु:ख सहने पड़े थे, इसलिए ज़ौक़ निहायत हीं घटिया इंसान थे। इस सोच का जहन में आना होता है कि वे सब ज़ौक़ की शायरी से तौबा करने लगते हैं। मुझे ऐसी सोच वाले इंसानों पे तरस आता है। शायर को उसकी शायरी से मापिए, ना कि उसके पद या ओहदे से। ज़ौक़ ज़फ़र के उस्ताद थे और उनके दरबार में रहा करते थे.. अगर दरबार में रहना गलत है तो फिर ग़ालिब ने भी तो दरबार में रहने के लिए हाथ-पाँव मारे थे। तब तो उन्हें भी बुरा कहा जाना चाहिए, पथभ्रष्ट कहा जाना चाहिए। सिर्फ़ ग़ालिब और ज़ौक़ के समकालीन होने के कारण ज़ौक़ से नाक-भौं सिकोड़ना तो सही नहीं। मुझे मालूम है कि हममें से भी कई या तो ज़ौक़ को जानते हीं नहीं होंगे या फिर जानकर भी अनजान रहना हीं पसंद करते होंगे। अपने वैसे मित्रों के लिए मैं "प्रकाश पंडित" जी के खजाने से "ज़ौक़" से ताल्लुक रखने वाले कुछ मोती चुनकर लाया हूँ। इसे पढने के बाद यकीनन हीं ज़ौक़ के प्रति बरसों में बने आपके विचार बदलेंगें।

प्रकाश जी लिखते हैं:
उर्दू शायरी में ‘ज़ौक़’ का अपना खास स्थान है। वे शायरी के उस्ताद माने जाते थे। आखिरी बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र के दरबार में शाही शायर भी थे।

बादशाह की उस्तादी ‘ज़ौक़’ को किस क़दर महंगी पड़ी थी, यह उनके शागिर्द मौलाना मुहम्मद हुसैन आज़ाद की ज़बानी सुनिए:
"वह अपनी ग़ज़ल खुद बादशाह को न सुनाते थे। अगर किसी तरह उस तक पहुंच जाती तो वह इसी ग़ज़ल पर खुद ग़ज़ल कहता था। अब अगर नयी ग़ज़ल कह कर दें और वह अपनी ग़ज़ल से पस्त हो तो बादशाह भी बच्चा न था, 70 बरस का सुख़न-फ़हन था। अगर उससे चुस्त कहें तो अपने कहे को आप मिटाना भी कुछ आसान काम नहीं। नाचार अपनी ग़ज़ल में उनका तख़ल्लुस डालकर दे देते थे। बादशाह को बड़ा ख़याल रहता था कि वह अपनी किसी चीज़ पर ज़ोर-तबअ़ न ख़र्च करें। जब उनके शौक़े-तबअ़ को किसी तरफ़ मुतवज्जह देखता जो बराबर ग़ज़लों का तार बांध देता कि तो कुछ जोशे-तबअ़ हो इधर ही आ जाय।"

शाही फ़रमायशों की कोई हद न थी। किसी चूरन वाले की कोई कड़ी पसंद आयी और उस्ताद को पूरा लटका लिखने का हुक्म हुआ। किसी फ़क़ीर की आवाज़ हुजूर को भा गयी है और उस्ताद पूरा दादरा बना रहे हैं। टप्पे, ठुमरियां, होलियां, गीत भी हज़ारों कहे और बादशाह को भेंट किये। खुद भी झुंझला कर एक बार कह दिया :

ज़ौक मुरत्तिब क्योंकि हो दीवां शिकवाए-फुरसत किससे करें
बांधे हमने अपने गले में आप ‘ज़फ़र’ के झगड़े हैं


"ज़ौक़" के काव्य के स्थायी तत्वों की व्याख्या के पहले उनके बारे में फैली हुई कुछ भ्रांतियों का निवारण आवश्यक मालूम होता है। पहली बात तो यह है कि समकालीन होने के लिहाज़ से उन्हें ‘ग़ालिब’ का प्रतिद्वंद्वी समझ लिया जाता है और चूंकि यह शताब्दी ‘ग़ालिब’ के उपासकों की है इसलिए ‘ज़ौक़’ से लोग खामखाह ख़ार खाये बैठे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि समकालीन महाकवियों में कुछ न कुछ प्रतिद्वंद्विता होती ही है और ‘ज़ौक़’ ने भी कभी-कभी मिर्ज़ा ‘ग़ालिब’ की छेड़-छाड़ की बादशाह से शिकायत कर दी थी, लेकिन इन दोनों की प्रतिद्वंद्विता में न तो वह भद्दापन था जो ‘इंशा’ और ‘मसहफ़ी’ की प्रतिद्वंद्विता में था, न इतनी कटुता जो ‘मीर’ और ‘सौदा’ में कभी-कभी दिखाई देती है। असल में उनके बीच प्रतिद्वंद्विता का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था। ‘ग़ालिब’ नयी भाव-भूमियों को अपनाने में दक्ष थे और वर्णन-सौंदर्य की ओर से उदासीन; ‘ज़ौक़’ का कमाल वर्णन-सौंदर्य में था और भावना के क्षेत्र में बुजुर्गों की देन ही को काफ़ी समझते थे। जैसा कि हर ज़माने के समकालीन महाकवि एक दूसरे के कमाल के क़ायल होते हैं, यह दोनों बुजुर्ग भी एक-दूसरे के प्रशंसक थे। ग़ालिब ‘ज़ौक़’ के प्रशंसक थे और अपने एक पत्र में उन्होंने ‘ज़ौक़’ के इस शे’र की प्रशंसा की है :

अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जायेंगे
मर गये पर न लगा जी तो किधर जायेंगे।


और उधर ‘ज़ौक़’ भी मुंह-देखी में नहीं बल्कि अपने दोस्तों और शागिर्दों मैं बैठकर कहा करते थे कि मिर्ज़ा (ग़ालिब) को खुद अपने अच्छे शे’रों का पता नहीं है और उनका यह शे’र सुनाया करते थे:

दरियाए-मआ़सी तुनुक-आबी से हुआ खुश्क
मेरा सरे-दामन भी अभी तक न हुआ था।

ज़ौक़ की असली सहायक उनकी जन्मजात प्रतिभा और अध्ययनशीलता थी। कविता-अध्ययन का यह हाल कि पुराने उस्तादों के साढ़े तीन सौ दीवानों को पढ़कर उनका संक्षिप्त संस्करण किया। कविता की बात आने पर वह अपने हर तर्क की पुष्टि में तुरंत फ़ारसी के उस्तादों का कोई शे’र पढ़ देते थे। इतिहास में उनकी गहरी पैठ थी। तफ़सीर (कुरान की व्याख्या) में वे पारंगत थे, विशेषतः सूफी-दर्शन में उनका अध्ययन बहुत गहरा था। रमल और ज्योतिष में भी उन्हें अच्छा-खासा दख़ल था और उनकी भविष्यवाणियां अक्सर सही निकलती थीं। स्वप्न-फल बिल्कुल सही बताते थे। कुछ दिनों संगीत का भी अभ्यास किया था और कुछ तिब्ब (यूनानी चिकित्सा-शास्त्र) भी सीखी थी। धार्मिक तर्कशास्त्र (मंतक़) और गणित में भी वे पटु थे। उनके इस बहुमुखी अध्ययन का पता अक्सर उनके क़सीदों से चलता है जिनमें वे विभिन्न विद्याओं के पारिभाषिक शब्दों के इतने हवाले देते हैं कि कोई विद्वान ही उनका आनंद लेने में समर्थ हो सकता है। उर्दू कवियों में इस कोटि के विद्वान कम ही हुए हैं।

‘ज़ौक़’ १२०४ हि. तदनुसार १७८९ ई. में दिल्ली के एक ग़रीब सिपाही शेख़ मुहम्मद रमज़ान के घर पैदा हुए थे। शेख़ रमज़ान नवाब लुत्फअली खां के नौकर थे। शेख़ इब्राहीम (ज़ौक़ का असल नाम) इनके इकलौते बेटे थे। इस कमाल के उस्ताद ने १२७१ हिजरी (१८५४ ई.) में सत्रह दिन बीमार रहकर परलोक गमन किया। मरने के तीन घंटे पहले यह शे’र कहा था:

कहते हैं ‘ज़ौक़’ आज जहां से गुज़र गया
क्या खूब आदमी था, खुदा मग़फ़रत करे

ग़ालिब और ज़ौक़ के बीच शायराना नोंक-झोंक और हँसी-मज़ाक के कई सारे किस्से मक़बूल हैं। मुझे याद नहीं कि मैंने यह वाक्या ग़ालिब के लिए सजी महफ़िल में सुनाया था या नहीं, अगर सुनाया हो, तब भी दुहराए देता हूँ। बात एक गोष्ठी की है । मिर्ज़ा ग़ालिब मशहूर शायर मीर तक़ी मीर की तारीफ़ में कसीदे गढ़ रहे थे । शेख इब्राहीम ‘जौक’ भी वहीं मौज़ूद थे । ग़ालिब द्वारा मीर की तारीफ़ सुनकर वे बैचेन हो उठे । वे सौदा नामक शायर को श्रेष्ठ बताने लगे । मिर्ज़ा ने झट से चोट की- “मैं तो आपको मीरी समझता था मगर अब जाकर मालूम हुआ कि आप तो सौदाई हैं ।” यहाँ मीरी और सौदाई दोनों में श्लेष है । मीरी का मायने मीर का समर्थक होता है और नेता या आगे चलने वाला भी । इसी तरह सौदाई का पहला अर्थ है सौदा या अनुयायी, दूसरा है- पागल।

ज़ौक़ कितने सौदाई थे या फिर कितने मीरी... इसका निर्धारण हम तो नहीं कर सकते, लेकिन हाँ उनके लिखे कुछ शेरों को पढकर और उन्हें गुनकर अपने इल्म में थोड़ी बढोतरी तो कर हीं सकते हैं:

आँखें मेरी तलवों से मल जाए तो अच्छा
है हसरत-ए-पा-बोस निकल जाए तो अच्छा

ग़ुंचा हंसता तेरे आगे है जो गुस्ताख़ी से
चटखना मुंह पे वहीं बाद-सहर देती है

आदमीयत और शै है, इल्म है कुछ और शै
कितना तोते को पढ़ाया पर वो हैवाँ ही रहा

वाँ से याँ आये थे ऐ 'ज़ौक़' तो क्या लाये थे
याँ से तो जायेंगे हम लाख तमन्ना लेकर


चलिए अब इन शेरों के बाद उस मुद्दे पर आते हैं, जिसके लिए हमने महफ़िल सजाई है। जानकारियाँ देना हमारा फ़र्ज़ है, लेकिन ग़ज़ल सुनना/सुनवाना तो हमारी ज़िंदगी है.. फ़र्ज़ के मामले में थोड़ा-बहुत इधर-उधर हो सकता है, लेकिन ज़िंदगी की गाड़ी पटरी से हिली तो खेल खत्म.. है ना? तो आईये.. लगे हाथों हम आज की ग़ज़ल से रूबरू हो लें। आज हम जो ग़ज़ल लेकर महफ़िल में हाज़िर हुए हैं उसे ग़ज़ल-गायिकी की बेताज बेगम "बेगम अख्तर" की आवाज़ नसीब हुई है। इतना कह देने के बाद क्या कुछ और भी कहना बचा रह जाता है। नहीं ना? इसलिए बिना कुछ देर किए, इस ग़ज़ल का लुत्फ़ उठाया जाए:

लायी हयात, आये, क़ज़ा ले चली, चले
अपनी ख़ुशी न आये न अपनी ख़ुशी चले

बेहतर तो है यही कि न दुनिया से दिल लगे
पर क्या करें जो काम न बे-दिल्लगी चले

कम होंगे इस बिसात पे हम जैसे बद-क़िमार
जो चाल हम चले सो निहायत बुरी चले

हो उम्रे-ख़िज़्र भी तो भी कहेंगे ब-वक़्ते-मर्ग
हम क्या रहे यहाँ अभी आये अभी चले

दुनिया ने किसका राहे-फ़ना में दिया है साथ
तुम भी चले चलो युँ ही जब तक चली चले

नाज़ाँ न हो ख़िरद पे जो होना है वो ही हो
दानिशतेरी न कुछ मेरी दानिशवरी चले

जा कि हवा-ए-शौक़ में हैं इस चमन से 'ज़ौक़'
अपनी ___ से बादे-सबा अब कहीं चले




वैसे तो हम एक महफ़िल में एक हीं गुलुकार की आवाज़ में ग़ज़ल सुनवाते हैं। लेकिन इस ग़ज़ल की मुझे दो रिकार्डिंग्स हासिल हुई थी.. एक बेग़म अख्तर की और एक कुंदन लाल सहगल की। इन दोनों में से मैं किसे रखूँ और किसे छाटूँ, मैं यह निर्धारित नहीं कर पाया। इसलिए बेगम की आवाज़ में ग़ज़ल सुनवा देने के बाद हम आपके सामने पेश कर रहे हैं "सहगल" साहब की बेमिसाल आवाज़ में यही ग़ज़ल एक बार फिर:



चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "उम्र" और शेर कुछ यूँ था-

आशिक़ तो मुर्दा है हमेशा जी उठता है देखे उसे
यार के आ जाने को यकायक उम्र दो बारा जाने है

इस शब्द पर ये सारे शेर महफ़िल में कहे गए:

आह को चाहिये इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक (ग़ालिब)

सर्द रातों की स्याही को चुराकर हमने
उम्र यूँ काटी तेरे शहर में आकर हमने (आशीष जी)

उम्रभर तलाशा था हमने जिस हंसी को
आज वो खुद की ही दीवानगी पे आई है (अवनींद्र जी)

उनके बच्चे भी सोये हैं भूखे
जिनकी उम्र गुजरी है रोटियाँ बनाने में (नीलम जी की प्रस्तुति.. शायर का पता नहीं)

उम्र-ए-दराज़ माँग के लाए थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए, दो इन्तज़ार में । (बहादुर शाह ज़फ़र)

ता-उम्र ढूंढता रहा मंजिल मैं इश्क़ की,
अंजाम ये कि गर्द-ए-सफर लेके आ गया। (सुदर्शन फ़ाकिर)

उम्र हो गई तुम्हें पहचानने में ,
अभी तक न जान पाई हमदम मेरे ! (मंजु जी)

दिल उदास है यूँ ही कोई पैगाम ही लिख दो
अपना नाम ना लिखो तो बेनाम ही लिख दो
मेरी किस्मत में गम-ए-तन्हाई है लेकिन
पूरी उम्र ना सही एक शाम ही लिख दो. (शन्नो जी की पेशकश.. शायर का पता नहीं)

उम्र जलवों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं
हर शब्-ए-ग़म की सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं (ख़ामोश देहलवी) .. नीलम जी, आपके शायर का नाम गलत है।

पिछली महफ़िल की शान बने आशीष जी। इस उपलब्धि के लिए आपको ढेरों बधाईयाँ। मुझे पिछली महफ़िल इसलिए बेहद पसंद आई क्योंकि उस महफ़िल में अपने सारे मित्र मौजूद थे, बस सीमा जी को छोड़कर। न जाने वो किधर गायब हो गई हैं। सीमा जी, आप अगर मेरी यह टिप्पणी पढ रही हैं, तो आज की महफ़िल में टिप्पणी देना न भूलिएगा :) मनु जी, आपको ग़ज़ल पढने में अच्छी लगी, लेकिन सुनने में नहीं। चलिए हमारी आधी मेहनत तो सफल हुई। जहाँ तक सुनने-सुनाने का प्रश्न है और गुलुकार के चयन का सवाल है तो अगर मैं चाहता तो मेहदी हसन साहब या फिर गुलाम अली साहब की आवाज़ में यह ग़ज़ल महफ़िल में पेश करता, लेकिन इनकी आवाज़ों में आपने "पत्ता-पत्ता" तो कई बार सुनी होगी, फिर नया क्या होता। मुझे हरिहरण प्रिय हैं, मुझे उनकी आवाज़ अच्छी लगती है और इसी कारण मैं चाहता था कि बाकी मित्र भी उनकी आवाज़ से रूबरू हो लें। दक्षिण भारत से संबंध रखने के बावजूद उर्दू के शब्दों को वो जिस आसानी से गाते हैं और जितनी तन्मयता से वो हर लफ़्ज़ के तलफ़्फ़ुज़ पर ध्यान देते हैं, उतनी मेहनत तो हिंदी/उर्दू जानने वाला एक शख्स नहीं करता। मेरे हिसाब से हरिहरण की ग़ज़ल सुनी जानी चाहिए.. हाँ, आप इनकी ग़ज़लों की तुलना मेहदी हसन या गुलाम अली से तो नहीं हीं कर सकतें, वे सब तो इस कला के उस्ताद हैं, लेकिन यह कहाँ लिखा है कि उस्ताद के सामने शागिर्द को मौका हीं न मिले। मेरी ख्वाहिश बस यही मौका देने की थी... कितना सफल हुआ और कितना असफल, ये तो बाकी मित्र हीं बताएँगे। अवनींद्र जी और शन्नो जी, आप दोनों ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हमें शुभकामनाएँ दीं, हमारी तरफ़ से भी आप सभी स्वजनों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ.. मराठी में कहें तो "शुभेच्छा".. महाराष्ट्र में रहते-रहते यह एक शब्द तो सीख हीं गया हूँ :)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, February 3, 2010

मुझे अपने ज़ब्त पे नाज़ था.. इक़बाल अज़ीम के बोल और नय्यारा नूर की आवाज़.. फिर क्यूँकर रंज कि बुरा हुआ

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #६९

इंसानी मन प्रशंसा का भूखा होता है। भले हीं उसे लाख ओहदे हासिल हो जाएँ, करोड़ों का खजाना हाथ लग जाए, फिर भी सुकून तब तक हासिल नहीं होता, जब तक कोई अपना उसके काम, उसकी नियत को सराह न दे। ऐसा हीं कुछ आज हमारे साथ हो रहा है। जहाँ तक आप सबको मालूम है कि आज महफ़िल-ए-गज़ल की ६९वीं कड़ी है और यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते हमने दस महिने का सफ़र तय कर लिया है.. इस दौरान बहुत सारे मित्रों ने टिप्पणियों के माध्यम से हमारी हौसला-आफ़ज़ाई की और यही एकमात्र कारण था जिसकी बदौलत हमलोग निरंतर बिना रूके आगे बढते रहे.. फिर भी दिल में यह तमन्ना तो जरूर थी कि कोई सामने से आकर यह कहे कि वाह! क्या कमाल की महफ़िल सजाते हैं आप.. गज़लों को सुनकर और बातों को गुनकर दिल बाग-बाग हो जाता है। यही एक कमी खलती आ रही थी जो दो दिन पहले पूरी हो गई। दिल्ली के प्रगति मैदान नें चल रहे वार्षिक विश्व पुस्तक मेला में लगे "हिन्द-युग्म" के स्टाल पर जब आवाज़ का कार्यक्रम रखा गया तो देश भर से आवाज़ के सहयोगी और प्रशंसक जमा हुए और उस दौरान कई सारे लोगों ने हमसे महफ़िल-ए-गज़ल की बातें कीं और आवाज़ के इस प्रयास को तह-ए-दिल से सराहा। कईयों को इस बात का आश्चर्य था कि हम ऐसी सदाबहार लेकिन बहुतों के द्वारा भूला दी गई गज़लें कहाँ से चुनकर लाते हैं। और न सिर्फ़ गज़लें हीं बल्कि उन गज़लों और गज़लों से जुड़े फ़नकारों के बारे में ऐसी अमूल्य जानकारियाँ हम ढूँढते हैं तो कहाँ से! कहते हैं ना कि आपकी मेहनत तब सफ़ल हो जाती हैं जब आपकी मेहनत का एक छोटा-सा हिस्सा भी किसी को खुशियाँ दे जाता है... आज हम उसी सफ़लता की अनुभूति कर रहे हैं। हम बता नहीं सकते कि इस आलेख को लिखते समय हमारे दिल और दिमाग की स्थिति क्या है... दिल को छोड़िये हमारा तो अपनी अंगुलियों की जुंबिश पर कोई नियंत्रण नहीं रहा... इसलिए इस कड़ी में अगर काम से ज्यादा बेकाम की बातें हो जाएँ (या हो रही हैं) तो इसमें हमारे चेतन मन का कोई दोष नहीं.. कुछ तो अचेतन है जो हमें लीक से हटने पर मजबूर कर रहा है। वैसे हमें यह पता है कि हमें इतने से हीं खुश नहीं होना है.. अभी और आगे जाना है, अभी और हदें ढकेलनी हैं, गज़लों की वो सारी किताबें खोज निकालनी हैं, जिनके जिल्द तक फट चुके हैं, दीमक जिन्हें कुतर चुका है, लेकिन सपहों पे पड़े हर्फ़ दूर से हीं चमक रहे हैं और हमें अपनी ओर खींच रहे हैं। आपका साथ अगर इसी तरह मिलता रहा तो हमें पूरा यकीन है कि हम उन सारी किताबों को एक नया रूप देने में जरूर सफ़ल होंगे। आमीन!

चलिए.. बातें बहुत हो गईं, अब आज की महफ़िल की विधिवत शुरूआत करते हैं। आज की गज़ल को जिन फ़नकारा ने अपनी आवाज़ से मुकम्मल किया है, उनके सीधेपन और चेहरे से टपकती मासूमियत की मिसालें दी जाती हैं। कहते हैं कि संगीत की दुनिया में उनका आना एक करामात के जैसा था... जो भी हुआ बड़े हीं आनन-फ़ानन में हो गया। बात १९६८ की है। ये फ़नकारा लाहौर के नेशनल कालेज आफ़ आर्ट में टेक्स्टाईल डिजाईन में डिप्लोमा कर रही थीं। उस दौरान कालेज में कई सारे कार्यक्रम होते रहते थे। वैसे हीं किसी एक कार्यक्रम में इस्लामिया कालेज के प्रोफ़ेसर इसरार ने इन्हें गाते हुए सुन/देख लिया। प्रोफ़ेसर साहब ने इनसे युनिवर्सिटी के रेडियो पाकिस्तान के कार्यक्रमों के लिए गाने का अनुरोध किया... और फिर देखिए एक वह दिन था और एक आज का दिन है। आपने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। यह फ़नकारा, जिनकी हम बातें कर रहे हैं , उनका नाम है नय्यारा नूर। "नय्यारा" का जन्म १९५० में असम में हुआ था। ये लोग रहने वाले तो थे अमृतसर के लेकिन चूँकि व्यवसायी इनका मुख्य पेशा था, इसलिए ये लोग असम में जा बसे थे। "नय्यारा" के अब्बाजान की गिनती मुस्लिम लीग के अगली पंक्ति के सदस्यों में की जाती थी। ठीक-ठाक वज़ह तो नहीं मालूम लेकिन शायद इसी कारण से इनका परिवार १९५८ में पाकिस्तान चला गया। १९७१ आते-आते , नय्यारा ने टीवी और फिल्मों के लिए गाना शुरू कर दिया था। "घराना" और "तानसेन" जैसी फिल्मों ने इन्हें आगे बढने का मौका दिया। पीटीवी के एक कार्यक्रम "सुखनवर" में इनके द्वारा रिकार्ड की गई गज़ल "ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज मुक़ाबिल आ जाए, मंज़िल के लिए दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए" ने इनकी प्रसिद्धि में चार चाँद लगा दिए। वैसे देखा जाए तो यह गज़ल इन्हीं के लिए लिखी मालूम होती है। जानकारी के लिए बता दें कि इस गज़ल को लिखा था बहज़ाद लखनवी ने और संगीत से सजाया था मास्टर मंज़ूर हुसैन ने। नय्यारा नूर बेग़म अखर से काफ़ी प्रभावित थीं। कालेज के दिनों में भी वो बेग़म अख्तर की गज़लें और नज़्में गाया करती थीं। उन गज़लों ने हीं नय्यारा को लोगों की नज़रों में चढाया था। बेगम अख्तर की गायिकी का नय्यारा पर इस कदर असर था कि वो बेग़म की गज़लें पुराने तरीके से आर एम पी ग्रामोफ़ोन रिकार्ड प्ल्यर्स पर हीं सुना करती थीं, जबकि आडियो कैसेट्स बाज़ार में आने लगे थे। नय्यारा गायिकी की दूसरी विधाओं की तुलना में गज़लों को बेहतर मानती थीं(हैं)। इनका मानना है कि "गज़लें श्रोताओं पर गहरा असर करती हैं और यह असर दीर्घजीवी होता है।" नय्यारा ने अनगिनत गज़लें गाई है। उनमें से कुछ हैं- "आज बाज़ार में पा-बजौला चलो", "अंदाज़ हु-ब-हु तेरी आवाज़-ए-पा का था", "रात यूँ दिल में तेरी खोई हुई याद आई", "ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर", "कहाँ हो तुम", "वो जो हममें तुममें करार था", "रूठे हो तुम, तुमको कैसे मनाऊँ पिया".... नय्यारा पाकिस्तान के जाने-माने गायक और संगीत-निर्देशक "मियाँ शहरयार ज़ैदी" की बीवी हैं। नय्यारा के बारे में कहने को और भी बहुत कुछ है..लेकिन वो सब कभी दूसरी कड़ी में..

फ़नकारा के बाद अब वक्त है इस गज़ल के गज़लगो से रूबरू होने का, गुफ़्तगू करने का। चूँकि हम भी लेखन से हीं ताल्लुक रखते हैं, इसलिए जायज है कि गज़लगो का नाम आते हीं हममें रोमांच की लहर दौड़ पड़े। लेकिन क्या कीजियेगा... इन शायर की किस्मत भी ज्यादातर शायरों के जैसी हीं है... या फिर ये कहिए कि हमारी किस्मत हीं खराब है कि हमें अपनी धरोहर संभालकर रखना नहीं आता.. तभी तो इनके बारे में जानकारियाँ उपलब्ध नहीं हैं। खोज-बीन करने पर बस एक फ़ेहरिश्त हासिल हुई है, जिसमें इनकी लिखी कुछ गज़लें दर्ज़ हैं। अब चूँकि हमें इन गज़लों से ज्यादा कुछ भी नहीं मालूम इसलिए हम यही फ़ेहरिश्त आपके सामने पेश किए देते हैं:

१) मगर जुबां से कभी हमने कुछ कहा तो नहीं
२) हमें जिन दोस्तों ने बेगुनाही की सज़ा दी है
३) तुमने दिल की बात कह दी आज यह अच्छा हुआ
४) हँसना नहीं आता मुझे, यह बात नहीं है
५) ये मेरी अना की शिकस्त है, न दवा करो, न दुआ करो
६) उनको मेरी वफ़ाओं का इकरार भी नहीं
७) सोज़-ए-ग़म से जिस कदर शिकवा सदा होते हैं लोग
८) न मिन्नत किसी की, न शिकवा किसी से
९) लाख मैं सबसे खफ़ा होके घर को चला
१०) पैमाने छलक हीं जाते हैं जब कैफ़ का आलम होता है

आपको इनकी ये सब गज़लें या फिर बाकी की और भी गज़लें पढनी हों तो यहाँ जाएँ। अहा! देखिए तो इस हरबराहट में हम इन शायर का नाम बताना हीं भूल गए। तो इन्हीं अज़ीम-उस-शान शायर "इक़बाल अज़ीम" का एक शेर सुनाकर हम इस गलती को सुधारना चाहेंगे:

हमें जिन दोस्तों ने बेगुनाही की सज़ा दी है,
हमारा ज़र्फ़ देखो हमने उनको भी दुआ दी है।


इस शेर के बाद अब पेश है कि आज की वह गज़ल जिसके लिए हमने यह महफ़िल सजाई है। तो डूब जाईये दर्द की इस मदहोशी में... हाँ चलते-चलते यह भी बता दें कि यहाँ पर दो-तीन शेर ज्यादा हीं हैं... वैसे भी शेर हैं जो नय्यारा नूर ने इस गज़ल में नहीं गाए। पर जैसा कि ग़ालिब ने कहा है कि "मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है", इसलिए न हमें शिकायत है और यकीन मानिए आपको भी कोई शिकायत नहीं होगी:

मुझे अपने ज़ब्त पे नाज़ था, सर-ए-बज़्म रात ये क्या हुआ
मेरी आँख कैसे छलक गयी, मुझे रंज है ये बुरा हुआ

जो नज़र बचा के गुज़र गये, मेरे सामने से अभी अभी
ये मेरे ही शहर के लोग थे, मेरे घर से घर है मिला हुआ

मेरी ज़िन्दगी के चिराग का, ये ____ कुछ नया नहीं
अभी रोशनी अभी तीरगी, ना जला हुआ ना बुझा हुआ

मुझे हमसफ़र भी मिला कोई, तो शिकस्ता हाल मेरी तरह
कई मंजिलों का थका हुआ, कई रास्तों का लुटा हुआ

मुझे जो भी दुश्मन-ए-जाँ मिला, वो ही पुख़्ताकार जफ़ा मिला
न किसी के जख़्म गलत पड़े, न किसी का तीर ख़ता हुआ

मुझे रास्ते मे पड़ा हुआ, एक अजनबी का खत मिला
कहीं खून-ए-दिल से लिखा हुआ, कहीं आँसुओं से मिटा हुआ




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "फरियाद" और पंक्तियाँ कुछ इस तरह थीं -

किसी के दिल की तू फरियाद है क़रार नहीं,
खिलाए फूल जो ज़ख्मों के वो बहार नहीं

नज़्म को सुनकर इस शब्द की सबसे पहले पहचान की सीमा जी ने। सीमा जी, आप जिस तरह से एक हीं टिप्पणी में सारे शेर एक के बाद एक पेश करती हैं, उससे हमें बड़ी हीं सहूलियत होती है। मैं बाकी मित्रों से भी यह दरख्वास्त करना चाहता हूँ कि आप अपनी पेशकश को एक टिप्पणी या फिर दो टिप्पणियों तक हीं सीमित रखें। इसके लिए आप सबों को अग्रिम धन्यवाद। हम वापस आते हैं सीमा जी की टिप्पणी पर। तो ये रहे आपके शेर:

उन्हीं के इश्क़ में हम नाला-ओ-फ़रियाद करते हैं
इलाही देखिये किस दिन हमें वो याद करते हैं। (ख़्वाजा हैदर अली 'आतिश')

ख़ुदा से हश्र में काफ़िर! तेरी फ़रियाद क्या करते?
अक़ीदत उम्र भर की दफ़अतन बरबाद क्या करते? (सीमाब अकबराबादी)

नाला, फ़रियाद, आह और ज़ारी,
आप से हो सका सो कर देखा| (ख़्वाजा मीर दर्द)

सीमा जी के बाद इस महफ़िल में शरद जी और मंजु जी खुद के लिखे शेरों के साथ हाज़िर हुए। मंजु जी, पिछली बार भले हीं हमने आपको उलाहना दी थी, लेकिन इस बार उसी गलती (आपकी नहीं... हमारी) के लिए हम आपकी प्रशंसा करने को बाध्य हैं... आप भले हीं देर आईं लेकिन दुरूस्त तो आईं। ये रहे आप दोनों के शेर क्रम से:

उन हसीं लम्हों को फिर आबाद करना
तुम लडकपन के भी वो दिन याद करना
लौट आएं फिर से वो गुज़रे ज़माने
बस खुदा से इक यही फ़रियाद करना । (शरद जी)

मेरे मालिक !तेरे दरबार में ,
करूँ बार - बार फरियाद मैं .
मानव में उदय हो मानवतावाद ,
न होगा फिर आतंक का नामोनिशान (मंजु जी)

सुमित जी और राज सिंह जी, आप दोनों बड़ी हीं मुद्दतों के बाद इस महफ़िल में नज़र आए। राज सिंह जी, यह क्या.. जब आप हमारी महफ़िल तक का सफ़र तय कर हीं लेते हैं तो बस मंज़िल (टिप्पणी) से पहले लौट क्यों जाते हैं... उम्मीद करता हूँ कि आप आगे से ऐसा नहीं करेंगे। सुमित जी, यह रही आपकी पेशकश:

कोई फ़रियाद तेरे दिल में दबी हो जैसे,
तूने आँखों से कोई बात कही हो जैसे। (फ़ैज़ अनवर)

शामिख साहब, गणतंत्र दिवस की आपको भी ढेरों बधाईयाँ। आपने ग़ालिब के कई सारे शेर हमारी महफ़िल के सामने रखे... इसी खुशी में हम आपसे यह खुशखबरी बाँटना चाहेंगे कि आने वाले कुछ हीं दिनों में हम ग़ालिब पर एक शृंखला (बस एक महफ़िल नहीं..बल्कि महफ़िलों की लड़ी) लेकर हाज़िर होने वाले हैं। तो संभालिए अपनी धड़कन को और उठने दीजिए चिलमन को :) उससे पहले पेश हैं आपके ये शेर:

फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया
दिल जिगर तश्ना-ए-फ़रियाद आया (ग़ालिब)

चार लफ़्ज़ों में कहो जो भी कहो
उसको कब फ़ुरसत सुने फ़रियाद सब (जावेद अख्तर)

दिल वो है कि फ़रियाद से लबरेज़ है हर वक़्त
हम वो हैं कि कुछ मुँह से निकलने नहीं देते (अकबर इलाहाबादी)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Thursday, April 9, 2009

जां अपनी, जांनशीं अपनी तो फिर फ़िक्र-ए-जहां क्यों हो...बेगम अख्तर और आशा ताई एक साथ.

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #०३

ग़मे-हस्ती, ग़मे-बस्ती, ग़मे-रोजगार हूँ,
ग़म की जमीं पर गुमशुदा एक शह्रयार हूँ।


बात इतनी-सी है कि दिन जलाने के लिए सूरज को जलना हीं पड़ता है। अब फ़र्क इतना हीं है कि वह सूरज ता-उम्र,ता-क़यामत खुद को बुलंद रख सकता है, लेकिन एक अदना-सा-इंसान ऎसा कर सके, यह मुमकिन नहीं। जलना किसी की भी फितरत में नहीं होता, लेकिन कुछ की किस्मत हीं गर्म सुर्ख लोहे से लिखी जाती है, फिर वह जले नहीं तो और क्या करे। वहीं कुछ को अपनी आबरू आबाद रखने के लिए अपनी हस्ती को आग के सुपूर्द करना होता है। यारों, इश्क एक ऎसी हीं किस्मत है, जो नसीब से नसीब होती है, लेकिन जिनको भी नसीब होती है, उनकी हस्ती को मु्ज़्तरिब कर जाती है। जिस तरह सूरज जमीं के लिए जलता है, उसी तरह इश्क में डूबा शख़्स अपने महबूब या महबूबा के लिए सारे दर्द-औ-ग़म सहता रहता है। और ये दर्द-औ-ग़म उसे कहीं और से नहीं मिलते,बल्कि ये सारे के सारे इसी जहां के जहांपनाहों के पनाह से हीं उसकी झोली में आते हैं। सच हीं है कि:

राह-ए-मोहब्बत के अगर मंजिल नहीं ग़म-औ-अज़ल,
जान लो हाजी की किस्मत में नहीं ज़मज़म का जल।


अपने जमाने के मशहूर शायर "शकील बदायूनी" इन इश्क-वालों का हाले-दिल बयां करते हुए कहते हैं:

"किनारों से मुझे ऎ नाख़ुदा दूर हीं रखना,
वहाँ लेकर चलो तूफां जहाँ से उठने वाला है।"

बेगम अख्तर ने इस गज़ल में उस दर्द की कोई भी गुंजाईश नहीं छोड़ी, मोहब्बत जिस दर्द की माँग करती है। सुनिए और खुद महसूस कीजिए कि दर्द जब हर्फ़ों से छलके तो कैसी टीस उठती है।



यह मेरी हक़-परस्ती भी ना मेरे काम है आई,
जिसे ज़ाहिद कहा मैने,वो निकला रब का सौदाई।


आख़िर ऎसा क्यों होता है कि हम औरों से ईमान की बातें करते हैं और जब खुद पर आती है तो ईमान से आँखें चुराने लगते हैं। हम वफ़ा के कसीदे पढते हैं,तहरीरें लिख डालते हैं लेकिन हक़ीक़त में अपने पास वफ़ा को फटकने भी नहीं देते। हद तो तब हो जाती है जब हम महफ़िलों और मुशाअरों में प्यार-मोहब्बत के रहनुमा नज़र आते हैं, लेकिन जब अपने घर का कोई प्यार के राह पर चल निकले तो शमशीर लेकर दरवाजे पर जम जाते हैं। और यह नहीं है कि यह बस किसी-किसी के साथ होता है, यकीं मानिए यह हर किसी के साथ होता है। हर किसी के अंदर एक बगुला भगत होता है, एक ढोंगी निवास करता है। और यही एकमात्र रोग है, जिसने हर दौर में दुनिया का नाश किया है। सच यह नहीं है कि दुनिया इश्क-वालों को नहीं समझती या समझना नहीं चाहती, सच यह है कि दुनिया ऎसी हीं है और वह अगर इश्क का मतलब जान भी ले तो भी अपनी आदत से बाज़ नहीं आएगी। और यह आदत इसलिए भी है क्योंकि दुनिया का हरेक शख़्स खुद को दूसरे से बड़ा और बेहतर साबित करने में लगा है। भाई, अगर दुनिया ऎसी हीं है तो फ़िर इश्क-वाले क्यों दूसरों की परवाह करें। जां अपनी, जांनशीं अपनी तो फिर फ़िक्र-ए-जहां क्यों हो:

जहां वालों की तल्ख़ी का नज़ारा कर लिया मैने,
मुझे खुद पर गुमां है कि गुजारा कर लिया मैने।


यह बस इसी युग या इसी दौर की बात नहीं है। बरसों पहले नक़्श लायलपुरी ने दुनिया की इस तल्ख़ी को नज़र करके लिखा था:

"दुनिया वालों कुछ तो मुझको मेरी वफ़ा की दाद मिले,
मैने दिल के फूल खिलाए शोलों में,अंगारों में।"

ख़य्याम के संगीत से सजी यह गज़ल आशा ताई की आवाज़ में चमक-सी उठती है। शब्दों के मोड़ पर गले की झनकार ने इसे एक अलग हीं पहचान दे दी है। लीजिए आप खुद हीं इसका लुत्फ़ उठाईये।



चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक ख़ास शब्द होगा जो मोटे अक्षर में छपा होगा. वही शब्द आपका सूत्र है. आपने याद करके बताना है हमें वो सभी शेर जो आपको याद आते हैं जिसके दो मिसरों में कहीं न कहीं वही शब्द आता हो. आप अपना खुद का लिखा हुआ कोई शेर भी पेश कर सकते हैं जिसमें आपने उस ख़ास शब्द का प्रयोग क्या हो. तो खंगालिए अपने जेहन को और अपने संग्रह में रखी शायरी की किताबों को. आज के लिए आपका शेर है - गौर से पढिये -

आशिकी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब,
दिल का क्या रंग करुँ, खूने-जिगर होने तक.

इरशाद ....


पिछली महफ़िल के साथी-

ग़ैर फिल्मी गीतों की यह महफिल भी सजने लगी है। शन्नो जी अब आप तन्हा कहाँ हैं! आवाज़ की तमाम पेशकश आपके एकांत को दूर करने को तैयार हैं।

नीलम जी, शौक अगर जीने का है तो समझौता नहीं, जिंदगी को गले लगाइए, आपको लगेगा कि वह समझौता नहीं है। गाना गाइए- ऐ जिंदगी! गले लगा ले।

राज़ जी, ख़ुदा करे कि यह मुश्किल बनी रहे, इसका अपना मज़ा है।

संजीव जी, दोहों के बाद शे'र, आपके क्या कहने! मनु जी, इसीलिए तो कहते हैं कि ग़ालिब का अंदाज़-ए-बयाँ कुछ और था। अपना-अपना मतलब निकालते रहें।


प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -'शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.




Monday, January 19, 2009

दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे.... बेगम अख्तर

(पहले अंक से आगे..)

अख्तर बेगम जितनी अच्छी फ़नकार थीं उतनी ही खूबसूरत भी थीं। कई राजे महाराजे उनका साथ पाने के लिए उनके आगे पीछे घूमते थे लेकिन वो टस से मस न होतीं।

अकेलेपन के साथी थे- कोकीन,सिगरेट, शराब और गायकी। इन सब के बावजूद उनकी आवाज पर कभी कोई असर नहीं दीखा। अल्लाह की नेमत कौन छीन सकता था।

1945 में जब उनकी शौहरत अपनी चरम सीमा पर थी उन्हें शायद सच्चा प्यार मिला और उन्हों ने इश्तिआक अहमद अब्बासी, जो पेशे से वकील थे, से निकाह कर लिया और अख्तरी बाई फ़ैजाबादी से बेगम अख्तर बन गयीं। गायकी छोड़ दी और पर्दानशीं हो गयीं। बहुत से लोगों ने उनके गायकी छोड़ देने पर छींटाकशी की,"सौ चूहे खा के बिल्ली हज को चली" लेकिन उन्हों ने अपना घर ऐसे बसाया मानों यही उनकी इबादत हो। पांच साल तक उन्हों ने बाहर की दुनिया में झांक कर भी न देखा। लेकिन जो तकदीर वो लिखा कर लायी थीं उससे कैसे लड़ सकती थीं। वो बिमार रहने लगीं और डाक्टरों ने बताया कि उनकी बिमारी की एक ही वजह है कि वो अपने पहले प्यार, यानी की गायकी से दूर हैं।

मानो कहती हों -
इतना तो ज़िन्दगी में किसी के खलल पड़े...


उनके शौहर की शह पर 1949 में वो एक बार फ़िर अपने पहले प्यार की तरफ़ लौट पड़ीं और ऑल इंडिया रेडियो की लखनऊ शाखा से जुड़ गयीं और मरते दम तक जुड़ी रहीं। उन्हों ने न सिर्फ़ संगीत की दुनिया में वापस कदम रखा बल्कि हिन्दी फ़िल्मों में भी गायकी के साथ साथ अभिनय के क्षेत्र में भी अपना परचम फ़हराया। उनका हिन्दी फ़िल्मों का सफ़र 1933 में शुरु हुआ फ़िल्म 'एक दिन का बादशाह' और 'नल दमयंती' से। फ़िर तो सिलसिला चलता ही रहा, 1934 में मुमताज बेगम, अमीना 1935 में जवानी का नशा, नसीब का चक्कर, 1942 में रोटी। फ़िल्मों से कभी अदाकारा के रूप में तो कभी गायक के रूप में उनका रिश्ता बना ही रहा। सुनते हैं एक ठुमरी उनकी आवाज़ में - जब से श्याम सिधारे...


अब तक दिल में बसा हुआ है। अदाकारा के रूप में उनकी आखरी पेशकश थी सत्यजीत रे की बंगाली फ़िल्म 'जलसा घर' जिसमें उन्हों ने शास्त्रीय गायिका का किरदार निभाया था।

फ़िल्मों के अलावा वो ऑल इंडिया रेडियो पर,और मंच से गाती ही रहती थीं ।सब मिला के उनकी गायी करीब 400 गजलें, दादरा और ठुमरी मिलती हैं। संगीत पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि ज्यादातर वो शायरी को संगीत का जामा खुद पहनाती थी। ढेरों इनामों से नवाजे जाने के बावजूद लेशमात्र भी दंभ न था और ता उम्र वो मशहूर उस्तादों से सीखती रहीं । एक जज्बा था कि न सिर्फ़ अच्छा गाना है बल्कि वो बेहतर से बेहतर होना चाहिए- परफ़ेक्ट।

यही कारण था कि 1974 में जब अहमदाबाद में वो (अपनी खराब तबियत के बावजूद) मंच पर गा रही थीं वो खुद अपनी गायकी से संतुष्ट नहीं थी और उसे बेहतर बनाने के लिए उन्हों ने अपने ऊपर इतना जोर डाला कि उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा और वो चल पड़ी उस पड़ाव की ओर जहां से कोई लौट कर नहीं आता, जहां कोई साथ नहीं जाता, फ़िर भी अकेलेपन से निजाद मिल ही जाता है। वो गाती गयीं -

मेरे हमसफ़र मेरे हमनवाज मुझे दोस्त बन के दगा न दे...


खूने दिल का जो कुछ....


दीवाना बनाना है तो .....(उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब की सबसे पसंदीदा ग़ज़ल)


खुशी ने मुझको ठुकराया....


हमार कहा मानो राजाजी (दादरा)


अब छलकते हुए...


खुश हूँ कि मेरा हुस्ने तलब काम तो आया...


और उनके चाहने वालों का दिल कह रहा है-
किस से पूछें हमने कहाँ वो चेहरा-ऐ-रोशन देखा है.....


कहने को बहुत कुछ है,आखिरकार पदमविभूषण से सम्मानित ऐसी नूरी शख्सियत को चंद शब्दों में कैसे बांधा जा सकता है, बस यही कहेगें -
डबडबा आई वो ऑंखें, जो मेरा नाम आया.
इश्क नाकाम सही, फ़िर भी बहुत काम आया.....


प्रस्तुति - अनीता कुमार




Friday, January 16, 2009

मल्लिका-ए-गजल - बेगम अख्तर


सुना है तानसेन जब दीपक राग गाते थे तो दीप जल उठते थे और जब मेघ मल्हार की तान छेड़ते थे तो मेघ अपनी गठरी खोलने को मजबूर हो जाते थे। पीछे मुड़ कर देखें तो न जाने कितने ही ऐसे फ़नकार वक्त की चादर में लिपटे मिल जाते हैं जो इतिहास का हिस्सा बन कर भी आज भी हमारे दिलो जान पर छाये हुए हैं, आज भी उनका संगीत आदमी तो आदमी, पशु पक्षियों, वृक्षों और सारी कायनात को अपने जादू से बांधे हुए है।

आइए ऐसी ही एक जादूगरनी से आप को मिलवाते हैं जो बेगम अख्तर के नाम से मशहूर हैं।


आज से लगभग एक सदी पहले जब रंगीन मिजाज, संगीत पुजारी अवधी नवाबों का जमाना था, लखनऊ से कोई 80 किलोमीटर दूर फ़ैजाबाद में एक प्रेम कहानी जन्मी। पेशे से वकील, युवा असगर हुसैन को मुश्तरी से इश्क हो गया। हुसैन साहब पहले से शादी शुदा थे पर इश्क का जादू ऐसा चढ़ा कि उन्हों ने मुश्तरी को अपनी दूसरी बेगम का दर्जा दे दिया। लेकिन हर प्रेम कहानी का अंत सुखद नहीं होता, दूसरे की आहों पर परवान चढ़े इश्क का अंत तो बुरा होना ही था। मुशतरी के दो बेटियों के मां बनते बनते हुसैन साहब के सर से इश्क का भूत उतर गया और उन्हों ने न सिर्फ़ मुश्तरी से सब रिश्ते तोड़ लिए बल्कि अपनी बेटियों (जोहरा और बिब्बी) के अस्तित्व को भी नकार दिया। दुखों की कड़ी अभी टूटी नहीं थी। चार साल की बिब्बी(अख्तर)और उसकी जुड़वां बहन जोहरा ने पता नहीं कैसे विषाक्त मिठाई खा ली और जब तक कुछ कारागर इलाज होता जोहरा इस दुनिया से कूच कर गयी। इतने बड़े जहान में एक दूसरे का सहारा बनने को रह गयीं मां बेटी अकेली।

इश्क में गैरते-जज़्बात ने रोने न दिया ...


ये वो जमाना था जब पेशेवर महिलाओं प्रोत्साहन देना तो दूर हिकारत की नजर से देखा जाता था, और अगर वो गायिका किसी गायिकी के घराने से हो तब तो उसे महज कोठे वाली ही समझ लिया जाता था। लेकिन अख्तरी बाई फ़ैजाबादी को भी आसान राहें गवारा कहाँ। सात साल की कच्ची उम्र में चंद्राबाई के स्वर कान में पड़ते ही उन्हों ने अपने जीवन का सबसे अहम फ़ैसला कर डाला कि उन्हें गायिका बनना है। बस उसी उम्र से संगीत की तालीम का एक लंबा सफ़र शुरु हो गया। पहले पटना के मशहूर सारंगी वादक उस्ताद इम्दाद खान, पटियाला के अता मौहम्मद खान, कलकत्ता के मौहम्मद खान, लाहौर के अब्दुल वाहिद खान से होता हुआ ये सफ़र आखिरकार उस्ताद झंडेखान पर जा कर खत्म हुआ।

ये सफ़र इतना आसां न था। मौसिकी का सफ़र वैसे तो सबके लिए ही तकलीफ़ों से गुले गुलजार होता है लेकिन औरतों के लिए ये सफ़र कई गुना ज्यादा तकलीफ़ें ले कर आता है। अख्तरी बाई भी उससे कैसे अछूती रह पातीं। सात साल की उम्र में ही पहले उस्ताद ने गायकी की बारीकियाँ सिखाने के बहाने उनकी पोशाक उठा अपना हाथ उनकी जांघ पर सरका दिया और तेरह साल की उम्र होते होते बिहार की किसी रियासत के राजा ने उनकी गायकी के कद्रदान बनते बनते उनकी अस्मत लूट ली। इस हादसे का जख्म सारी उम्र उनके लिए हरा रहा एक बेटी के रूप में जिसे दुनिया के डर से उन्हें अपनी छोटी बहन बताना पड़ता था। पन्द्रह साल की उम्र में पहली बार मंच पर उतरने के पहले हालातों ने वो नश्तर चुभो दिए कि उसके बाद इस सफ़र को जारी रखना एक जंग लड़ने के बराबर था, पर फ़िर भी उन्हों ने अपना संगीत का सफ़र जारी रखा।

'ऐ मौहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया, जाने क्युं आज मुझे तेरे नाम पे रोना आया'


कहते हैं न हिना रंग लाती है पिसने के बाद्। अख्तरी बाई ऐसी ही हिना थीं जितने नासूर जिन्दगी ने उन्हें अता किए उतने ही गहरे रंग उनकी गायकी में घुलते गये।आसपास इतने चाहने वाले होते हुए भी जिन्दगी में पसरे अकेलेपन का एहसास, 'अब आगे पता नहीं क्या हो? का डर, सच्चे प्यार की प्यास, दुख तो मानों उनके दिल में पक्का घर बना के बैठ गया था जो हजार कौशिश करने के बाद भी पल भर को भी हटने का नाम न लेता था। कोई आम महिला होती तो शायद टूट चुकी होती लेकिन अख्तरी बाई ने इन्हीं दुखों को अपनी ताकत बना लिया। जब वो गाती थीं तो उनकी आवाज में वो दर्द छलकता था जो सीधा सुनने वाले के दिल में उतर जाता था। आखों में आसूँ आये बिना न रहते थे।

गायकी और शायरी का तो जुड़वां बहनों जैसा रिश्ता है। अख्तरी बाई, जो शादी के बाद बेगम अख्तर कहलायी जाने लगीं, को भी अच्छी शायरी की खूब पहचान थी। फ़िर शायरी चाहे हिन्दूस्तानी में हो या पुरबिया, ब्रिज या उर्दू में उनकी शब्दों पर पकड़ भी उतनी ही लाजवाब थी जितनी गायकी पर । वो तभी कोई गजल गाती थीं जब उन्हें उसके शेर पसंद आ जाएं। चुनिन्दा शायरी जब उनकी शास्त्रीय संगीत में मंजी आवाज और रूह की गहराइयों से फ़ूटते दर्द में लिपट कर सामने आती थी तो सुनने वालों की आह निकले बिना न रहती। कितनी ही गजलें उनकी आवाज की नैमत पा कर अजर अमर हो गयीं। ये तो जैसे तयशुदा बात थी कि वो मिर्जा गालिब की गजलों की फ़ैन रहीं होगीं। मिर्जा गालिब की कई गजलों को उन्हों ने अपने खूबसूरत अंदाज में गा कर और खूबसूरत बना दिया। एक गजल जो मुझे भी बहुत पसंद है बेगम अख्तर की अदायगी में वो है -

जिक्र उस परीवश का और फ़िर बयां अपना...



(जारी..)

प्रस्तुति - अनीता कुमार


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