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Sunday, August 25, 2019

राग जयन्त मल्हार : SWARGOSHTHI – 432 : RAG JAYANT MALHAR






स्वरगोष्ठी – 432 में आज

वर्षा ऋतु के राग – 6 : राग जयन्त अथवा जयन्ती मल्हार

पण्डित विनायक राव पटवर्धन से इस राग की बन्दिश और आशा भोसले से फिल्मी गीत सुनिए




पण्डित  विनायक राव पटवर्धन
आशा  भोसले
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ “स्वरगोष्ठी” के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “वर्षा ऋतु के राग” की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि केवल मल्हार नाम से कोई राग नहीं है। दरअसल मल्हार एक अंग का नाम है। जब कोई राग इस अंग से संचालित होता है तब इसे मल्हार अंग का राग कहलाता है। राग मेघ मल्हार, मियाँ मल्हार, गौड़ मल्हार सूर मल्हार, रामदासी मल्हार आदि मल्हार अंग के प्रचलित राग हैं। इस श्रृंखला की छठी कड़ी में आज हम राग जयन्त अथवा जयन्ती मल्हार पर चर्चा करेंगे। इस राग में पहले हम आशा भोसले की आवाज़ में एक फिल्मी गीत प्रस्तुत करेंगे। यह गीत 1976 में प्रदर्शित फिल्म ‘शक’ से लिया गया है, जिसके संगीतकार हैं बसन्त देसाई। दूसरे चरण में राग जयन्त मल्हार की एक प्राचीन किन्तु मोहक बन्दिश का हमने चयन किया है। अपने समय के बहुआयामी संगीतज्ञ पण्डित विनायक राव पटवर्धन ने इस रचना को स्वर दिया है।



वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों में राग जयन्त मल्हार या जयन्ती मल्हार एक कम प्रचलित राग है। राग के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि यह राग जयजयवन्ती और मल्हार अंग के मेल से बनता है। वैसे राग जयजयवन्ती स्वतंत्र रूप से भी वर्षा ऋतु के परिवेश को रचने में समर्थ है। परन्तु जब राग जयजयवन्ती के साथ मल्हार अंग का मेल हो जाता है तब इस राग से अनुभूति और अधिक मुखर हो जाती है। आज हम राग जयन्त मल्हार पर आधारित एक मोहक फिल्मी गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। यह गीत 1976 में प्रदर्शित फिल्म ‘शक’ से लिया गया है। विकास देसाई और अरुणा राजे द्वारा निर्देशित इस फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई थे। बसन्त देसाई ने मल्हार अंग के रागों पर आधारित सर्वाधिक गीतों की रचना की थी। इस श्रृंखला में बसन्त देसाई द्वारा संगीतबद्ध किया यह दूसरा गीत है। ‘शक’ जिस दौर की फिल्म है, उस अवधि में बसन्त देसाई का रुझान फिल्म संगीत से हट कर शिक्षण संस्थाओं में संगीत के प्रचार-प्रसार की ओर अधिक हो गया था। फिल्म संगीत का मिजाज़ भी बदल गया था। परन्तु बसन्त देसाई ने बदले हुए दौर में भी अपने संगीत में रागों का आधार नहीं छोड़ा। फिल्म ‘शक’ उनकी अन्तिम फिल्म साबित हुई। फिल्म के प्रदर्शित होने से पहले ही एक लिफ्ट दुर्घटना में उनका असामयिक निधन हो गया। राग जयन्ती अथवा जयन्त मल्हार के स्वरों पर आधारित फिल्म ‘शक’ का जो गीत हम सुनवाने जा रहे हैं, उसके गीतकार हैं गुलज़ार और इस गीत को स्वर दिया है आशा भोसले ने। आइए सुनते हैं यह रसपूर्ण गीत।

राग जयन्त मल्हार : ‘मेहा बरसने लगा है आज...’ : आशा भोसले : फिल्म – शक


पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे के ग्रन्थ में राग जयन्त अथवा जयन्ती मल्हार का विवरण नहीं मिलता। आपके लिए हमने इस राग का विवरण हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव की पुस्तक ‘राग परिचय’ के चौथे भाग से लिया है। यह काफी थाट का राग माना जाता है। इसमें दोनों गान्धार और दोनों निषाद का प्रयोग होता है। इसका वादी ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। राग के आरोह के स्वर हैं- सा, रे प, म प नि(कोमल) ध नि सां, तथा अवरोह के स्वर हैं- सां ध नि(कोमल) म प, प म ग रे ग(कोमल) रे सा। इसराज और मयूरवीणा के सुप्रसिद्ध वादक पं. श्रीकुमार मिश्र के अनुसार राग जयन्त मल्हार के दोनों रागों का कलात्मक और भावात्मक मिश्रण क्लिष्ट व विशेष प्रक्रिया है। पूर्वांग में जयजयवन्ती का करुण व विनयपूर्ण भक्तिभाव परिलक्षित होता है, जबकि उत्तरांग में मियाँ की मल्हार, वर्षा के तरल भावों के साथ समर्पित, पुकारयुक्त व आनन्द से परिपूर्ण भावों का सृजन करने में सक्षम होता है। इस राग में मध्यलय की रचनाएँ अच्छी लगती हैं। आपको सुनवाने के लिए हमने राग जयन्त मल्हार की एक प्राचीन किन्तु मोहक बन्दिश का चयन किया है। अपने समय के बहुआयामी संगीतज्ञ पण्डित विनायक राव पटवर्धन ने इस रचना को स्वर दिया है। पण्डित पटवर्धन ने न केवल रागदारी संगीत के क्षेत्र में, बल्कि सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर में अपना अनमोल योगदान किया था। लीजिए, राग जयन्त मल्हार की तीनताल में निबद्ध यह बन्दिश आप भी सुनिए और हमें आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग जयन्त मल्हार : ‘ऋतु आई सावन की...’ : पण्डित विनायक राव पटवर्धन



संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 432वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको उपशास्त्रीय संगीत शैली के एक गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 440वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि यह भारतीय संगीत की कौन सी विधा है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस सुविख्यात उपशास्त्रीय गायिका की आवाज़ हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 31 अगस्त, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 434 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 430वें अंक की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1979 में प्रदर्शित फिल्म “मीरा” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – मीरा मल्हार अथवा मीराबाई की मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – वाणी जयराम

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “वर्षा ऋतु के राग” की पाँचवीं कड़ी में आज आपने मल्हार अंग के राग “जयन्त मल्हार अथवा जयन्ती मल्हार” का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित विनायक राव पटवर्धन के स्वरों में प्रस्तुत एक बन्दिश का रसास्वादन किया। इससे पहले इसी राग पर आधारित फिल्म “शक” से एक गीत पार्श्वगायिका आशा भोसले के स्वरों में सुनवाया गया। वर्ष 1976 में प्रदर्शित इस फिल्म के संगीतकार वसन्त देसाई ने इस गीत को राग जयन्त मल्हार अथवा जयन्ती मल्हार के स्वरों में संगीतबद्ध किया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग जयन्त मल्हार : SWARGOSHTHI – 432 : RAG JAYANT MALHAR : 25 अगस्त, 2019


Sunday, January 6, 2019

वर्ष के महाविजेता - 1 : SWARGOSHTHI – 401 : MAHAVIJETA OF THE YEAR






स्वरगोष्ठी – 401 में आज

सभी पाठकों और श्रोताओं का नववर्ष 2019 के पहले अंक में अभिनन्दन

महाविजेताओं की प्रस्तुतियाँ – 1

महाविजेता शुभा खाण्डेकर, विजया राजकोटिया और डॉ. किरीट छाया के सम्मान में उनकी प्रस्तुतियाँ




विजया राजकोटिया
शुभा खाण्डेकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का नववर्ष के पहले अंक में हार्दिक अभिनन्दन है। इसी अंक से आपका प्रिय स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ नौवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। विगत आठ वर्षों से असंख्य पाठकों, श्रोताओं, संगीत शिक्षकों और वरिष्ठ संगीतज्ञों का प्यार, दुलार और मार्गदर्शन इस स्तम्भ को मिलता रहा है। इन्टरनेट पर शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक, सुगम और फिल्म संगीत विषयक चर्चा का सम्भवतः यह एकमात्र नियमित साप्ताहिक स्तम्भ है, जो विगत आठ वर्षों से निरन्तरता बनाए हुए है। इस पुनीत अवसर पर मैं कृष्णमोहन मिश्र, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सम्पादक और संचालक मण्डल के सभी सदस्यों; सजीव सारथी, सुजॉय चटर्जी, अमित तिवारी, अनुराग शर्मा, विश्वदीपक, संज्ञा टण्डन, पूजा अनिल और रीतेश खरे के साथ अपने सभी पाठकों और श्रोताओं के प्रति आभार प्रकट करता हूँ। आज नौवें वर्ष के इस प्रवेशांक में हम ‘स्वरगोष्ठी’ की संगीत पहेली के दूसरे महाविजेता डॉ. किरीट छाया द्वारा प्रेषित पण्डित निखिल बनर्जी का सितार पर बजाया राग सोहनी का वीडियो, तीसरी महाविजेता विजया राजकोटिया की स्वयं की आवाज़ में राग भीमपलासी पर केन्द्रित गोस्वामी तुलसीदास के भजन का वीडियो और चौथी महाविजेता शुभा खाण्डेकर द्वारा प्रेषित पार्श्वगायिका आशा भोसले के स्वर में एक मराठी अभंग की प्रस्तुतियों का रसास्वादन कराएँगे। इसके अलावा नववर्ष के इस प्रवेशांक में मांगलिक अवसरों पर परम्परागत रूप से बजने वाले मंगलवाद्य शहनाई का वादन भी प्रस्तुत करेंगे। वादक हैं, भारतरत्न के सर्वोच्च अलंकरण से विभूषित उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और राग है सर्वप्रिय भैरवी।



उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ
‘स्वरगोष्ठी’ का शुभारम्भ ठीक आठ वर्ष पूर्व ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ संचालक और सम्पादक मण्डल के प्रमुख सदस्य सुजॉय चटर्जी ने रविवार, 2 जनवरी 2011 को किया था। आरम्भ में यह ‘हिन्दयुग्म’ के ‘आवाज़’ मंच पर हमारे अन्य नियमित स्तम्भों के साथ प्रकाशित हुआ करता था। उन दिनों इस स्तम्भ का शीर्षक ‘सुर संगम’ था। दिसम्बर 2011 से हमने ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ नाम से एक अपना नया सामूहिक मंच बनाया और पाठकों के अनुरोध पर जनवरी 2012 से इस स्तम्भ का शीर्षक ‘स्वरगोष्ठी’ कर दिया गया। तब से हम आपसे निरन्तर यहीं मिलते हैं। समय-समय पर आपसे मिले सुझावों के आधार पर हम अपने सभी स्तम्भों के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ में भी संशोधन करते रहते हैं। इस स्तम्भ के प्रवेशांक में सुजॉय जी ने इसके उद्देश्यों पर प्रकाश डाला था। उन्होने लिखा था;

“नये साल के इस पहले रविवार की सुहानी सुबह में मैं, सुजॉय चटर्जी, आप सभी का 'आवाज़' पर स्वागत करता हूँ। यूँ तो हमारी मुलाक़ात नियमित रूप से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर होती रहती है, लेकिन अब से मैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के अलावा हर रविवार की सुबह भी आपसे मुख़ातिब रहूँगा इस नये स्तम्भ में जिसकी हम आज से शुरुआत कर रहे हैं। दोस्तों, प्राचीनतम संगीत की अगर हम बात करें तो वो है हमारा शास्त्रीय संगीत, जिसका उल्लेख हमें वेदों में मिलता है। चार वेदों में सामवेद में संगीत का व्यापक वर्णन मिलता है। इन वैदिक ऋचाओं को सामगान के रूप में गाया जाता था। फिर उससे 'जाति' बनी और फिर आगे चलकर 'राग' बनें। ऐसी मान्यता है कि ये अलग-अलग राग हमारे अलग-अलग 'चक्र' (ऊर्जाविन्दु) को प्रभावित करते हैं। ये अलग-अलग राग आधार बनें शास्त्रीय संगीत का और युगों-युगों से इस देश के सुरसाधक इस परम्परा को निरन्तर आगे बढ़ाते चले जा रहे हैं, हमारी संस्कृति को सहेजते हुए बढ़े जा रहे हैं। संगीत की तमाम धाराओं में सबसे महत्वपूर्ण धारा है शास्त्रीय अर्थात रागदारी संगीत। बाकी जितनी तरह का संगीत है, उन सबमें उच्च स्थान पर है अपना रागदारी संगीत। तभी तो संगीत की शिक्षा का अर्थ ही है शास्त्रीय संगीत की शिक्षा। अक्सर साक्षात्कारों में कलाकार इस बात का ज़िक्र करते हैं कि एक अच्छा गायक या संगीतकार बनने के लिए शास्त्रीय संगीत का सीखना बेहद ज़रूरी है। तो दोस्तों, आज से 'आवाज़' पर पहली बार एक ऐसा साप्ताहिक स्तम्भ शुरु हो रहा है जो समर्पित है, भारतीय परम्परागत शास्त्रीय संगीत को। गायन और वादन, यानी साज़ और आवाज़, दोनों को ही बारी-बारी से इसमें शामिल किया जाएगा। भारतीय संगीत से इस स्तम्भ की हम शुरुआत कर रहे हैं, लेकिन आगे चलकर अन्य संगीत शैलियों को भी शामिल करने की उम्मीद रखते हैं।”

तो यह सन्देश हमारे इस स्तम्भ के प्रवेशांक का था। ‘स्वरगोष्ठी’ की कुछ और पुरानी यादों को ताज़ा करने से पहले आज का का चुना हुआ संगीत सुनते हैं। आज ‘स्वरगोष्ठी’ नौवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। हम इस पावन अवसर पर मंगलवाद्य शहनाई का वादन प्रस्तुत कर रहे हैं। इस अंक में हम देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारतरत्न’ से अलंकृत उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर बजाया राग भैरवी प्रस्तुत कर रहे हैं।

मंगलध्वनि : राग भैरवी : शहनाई वादन : उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और साथी



हमारे दल के सर्वाधिक कर्मठ साथी सुजोय चटर्जी ने ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ की नीव रखी थी। उद्देश्य था, शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत-प्रेमियों को एक ऐसा मंच देना जहाँ किसी कलासाधक, प्रस्तुति अथवा किसी संगीत-विधा पर हम आपसे संवाद कायम कर सकें और आपसे विचारों का आदान-प्रदान कर सकें। आज के 401वें अंक के माध्यम से हम कुछ पुरानी स्मृतियों को ताज़ा कर रहे हैं। जैसा कि पहले ही उल्लेख किया गया है कि इस स्तम्भ की बुनियाद सुजॉय चटर्जी ने रखी थी और आठवें अंक तक अपने आलेखों के माध्यम से अनेक संगीतज्ञों व्यक्तित्व और कृतित्व से हमें रससिक्त किया था। नौवें अंक से हमारे एक नये साथी सुमित चक्रवर्ती हमसे जुड़े और आपके अनुरोध पर उन्होने शास्त्रीय, उपशास्त्रीय संगीत के साथ लोक संगीत को भी ‘सुर संगम’ से जोड़ा। सुमित जी ने इस स्तम्भ के 30वें अंक तक आपके लिए बहुविध सामग्री प्रस्तुत की, जिसे आप सब पाठकों-श्रोताओं ने सराहा। इसी बीच मुझ अकिंचन को भी कई विशेष अवसरों पर कुछ अंक प्रस्तुत करने का अवसर मिला। सुमित जी की पारिवारिक और व्यावसायिक व्यस्तता के कारण 31वें अंक से ‘सुर संगम’ का पूर्ण दायित्व मेरे साथियों ने मुझे सौंपा। मुझ पर विश्वास करने के लिए अपने साथियों का मैं आभारी हूँ। साथ ही अपने पाठकों-श्रोताओं का अनमोल प्रोत्साहन भी मुझे मिला, जो आज भी जारी है।

बीते वर्ष के अंकों में ‘स्वरगोष्ठी’ से असंख्य पाठक, श्रोता, समालोचक और संगीतकार जुड़े। हमें उनका प्यार, दुलार और मार्गदर्शन मिला। उन सभी का नामोल्लेख कर पाना सम्भव नहीं है। ‘स्वरगोष्ठी’ का सबसे रोचक भाग प्रत्येक अंक में प्रकाशित होने वाली ‘संगीत पहेली’ है। इस पहेली में बीते वर्ष के दौरान अनेक संगीत-प्रेमियों ने सहभागिता की। इन सभी उत्तरदाताओं को उनके सही उत्तर पर प्रति सप्ताह अंक दिये गए। वर्ष के अन्त में सभी प्राप्तांकों की गणना की की गई। 399वें अंक तक की गणना की जा चुकी है। इनमें से सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाले छः महाविजेताओं का चयन कर लिया गया है। आज के इस अंक में हम आपका परिचय पहेली के दूसरे, तीसरे और चौथे महाविजेताओं से करा रहे हैं। पहले और दूसरे महाविजेताओ की घोषणा और उनकी प्रस्तुतियों का रसास्वादन हम अगले अंक में कराएँगे।

पहेली प्रतियोगिता में चतुर्थ स्थान को सुशोभित करने वाली कल्याण, महाराष्ट्र निवासी शुभा खाण्डेकर को संगीत की प्राथमिक शिक्षा दिल्ली में श्री चतुर सेन जी से मिली। ये संस्कार आज 50 साल बाद भी शुभा जी में जीवित हैं। इनके माता-पिता दोनों संगीतप्रेमी हैं। इनके घर में चौबीस घण्टे रेडियो पर अच्छा संगीत सुनने को मिलता था। शास्त्रीय, उपशास्त्रीय के साथ-साथ हिन्दी और मराठी फिल्म संगीत, मराठी नाट्य संगीत और भावगीत तथा भारत के हर प्रदेश के लोकसंगीत भी सुनती रही हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब और महाराष्ट्र के लोकगीतों से खास लगाव रहा। कर्णाटक संगीत में ताल-वाद्य-कचेरी इन्हें बहुत अच्छी लगी। शुभा जी का गान्धर्व महाविद्यालय की तीन परीक्षा पास करने के बाद शिक्षा और रियाज़ तो छूट गया पर श्रवण-भक्ति जारी रही। राष्ट्रीय स्तर का ऐसा कोई गायक या वादक नहीं, जिन्हें उन्होने महफ़िल में सामने बैठकर नहीं सुना। 35 साल बाद मुम्बई में उन्हें फिर से गायन सीखने का मौका मिला, श्रीमती मालती कामत जी से, जो कि श्रीमती किशोरी आमोणकरजी की शिष्या हैं। परन्तु यह सिलसिला भी एक साल तक ही चल पाया। शुभा जी गाना तो अब भी चाहती हैं पर उनके अनुसार अब सम्भव नहीं। इतिहास में दिल्ली विश्वविद्यालय से एम्.ए. करने के बाद शुभा खाण्डेकर की रूचि पुरातत्त्व शास्त्र में हुई। पुणे के डेक्कन कॉलेज से इस विषय में डाक्ट्रेट करने का प्रयास विफल होने के बाद उन्होने कई साल मुम्बई में The Economic Times और अन्य अँग्रेजी दैनिकों के news desk पर काम किया। उन्होने “अमर चित्र कथा” में ऐतिहासिक विषयों पर scripts लिखे. इतिहास और पुरातत्त्वशास्त्र पर आधारित उनके लेख प्रकाशित होते रहे हैं। 2017 में उनकी पुरातत्त्व सम्बन्धित पुस्तक ArchaeoGiri : A Bridge Between the Archaeologist and the Common Man दिल्ली के कावेरी बुक्स द्वारा प्रकाशित हो चुकी है। वर्तमान में शुभा खाण्डेकर कल्याण, महाराष्ट्र में रहती हैं और भ्रमण के लिए पुरातत्त्वीय स्थल या हिमालय की ओर निकल जाती हैं। बाकी समय पढ़ती हैं, लिखती हैं, कार्टून्स बनाती हैं और हाथ की कढाई करती हैं, लेकिन यह सब करते समय संगीत निरन्तर सुनती रहती हैं। “स्वरगोष्ठी” की पहेली प्रतियोगिता में शुभा जी ने 368वें अंक की पहेली से भाग लेना आरम्भ किया था। अपनी प्रतिभा और संगीत-ज्ञान के बल पर उन्होने वर्ष के अन्त तक 58 अंक अर्जित कर चौथी महाविजेता बनने का गौरव प्राप्त किया। आज के इस अंक के माध्यम से उन्हें महाविजेता के रूप में सम्मानित करते हुए हमें अपार हर्ष हो रहा है। आज के इस अंक में अपनी अभिरुचि का संगीत सुनाने के लिए शुभा खाण्डेकर जी ने आशा भोसले का गाया हुआ एक मराठी अभंग (भजन) भेजा है, जिसकी असीम मिठास और भक्तिभाव उन्हें हमेशा संवेदनशील बना देती है। यह अभंग सन्त जनाबाई (13वीं शताब्दी) की रचना है।

मराठी अभंग : “येग येग विठाबाई...” : स्वर - आशा भोसले : प्रेषक - शुभा खाण्डेकर



“स्वरगोष्ठी” के अन्तर्गत आयोजित वर्ष 2018 की पहेली प्रतियोगिता में 66 अंक प्राप्त कर तृतीय महाविजेता का सम्मान प्राप्त करने वाली प्रतिभागी हैं, मेरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया। पहले विजया जी पेंसिलवेनिया, अमेरिका में निवास करती थीं। संगीत की साधना में पूर्ण समर्पित विजया जी ने लखनऊ स्थित भातखण्डे संगीत महाविद्यालय (वर्तमान में विश्वविद्यालय) से संगीत विशारद की उपाधि प्राप्त की है। बचपन में ही उनकी प्रतिभा को पहचान कर उनके पिता, विख्यात रुद्रवीणा वादक और वीणा मन्दिर के प्राचार्य श्री पी.डी. शाह ने कई तंत्र और सुषिर वाद्यों के साथ-साथ कण्ठ संगीत की शिक्षा भी प्रदान की। श्री शाह की संगीत परम्परा को उनकी सबसे बड़ी सुपुत्री विजया जी ने आगे बढ़ाया। आगे चलकर विजया जी को अनेक संगीत गुरुओं से मार्गदर्शन मिला, जिनमें आगरा घराने के उस्ताद खादिम हुसेन खाँ की शिष्या सुश्री मिनी कापड़िया, पण्डित लक्ष्मण प्रसाद जयपुरवाले, सुश्री मीनाक्षी मुद्बिद्री और सुविख्यात गायिका श्रीमती शोभा गुर्टू प्रमुख नाम हैं। विजया जी संगीत साधना के साथ-साथ ‘क्रियायोग’ जैसी आध्यात्मिक साधना में भी संलग्न रहती हैं। उन्होने अपने गायन का प्रदर्शन मुम्बई, लन्दन, सैन फ्रांसिस्को, साउथ केरोलिना, न्यूजर्सी, और पेंसिलवानिया में किया है। विजया जी पेंसिलवानिया के अपने स्वयं के संगीत विद्यालय में हर आयु के विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा प्रदान कर रही थीं। वर्तमान में मेरीलैंड में रह कर संगीत-सेवा कर रही हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ पहेली की महाविजेता के रूप में अब हम आपको विजया जी के स्वर में राग भीमपलासी के स्वर में पिरोया गोस्वामी तुलसीदास का एक भक्तिपद सुनवा रहे हैं। यह पद ग्वालियर घराने के संगीतज्ञ प्रायः प्रस्तुत करते हैं। लीजिए, राग भीमपलासी के स्वरों में भजन सुनिए और विजया जी को महाविजेता बनने पर बधाई दीजिए।

भजन राग भीमपलासी : “कहाँ के पथिक कहाँ किन्हों है गमनवा...” : विजया राजकोटिया



डॉ.किरीट छाया
वोरहीज, न्यूजर्सी के डॉ. किरीट छाया ने वर्ष 2018 की संगीत पहेली में 92 अंक अर्जित कर द्वितीय स्थान प्राप्त किया है। किरीट जी पेशे से चिकित्सक हैं और 1971 से अमेरिका में निवास कर रहे हैं। मुम्बई से चिकित्सा विज्ञान से एम.डी. करने के बाद आप सपत्नीक अमेरिका चले गए। बचपन से ही किरीट जी के कानों में संगीत के स्वर स्पर्श करने लगे थे। उनकी बाल्यावस्था और शिक्षा-दीक्षा, संगीत-प्रेमी और पारखी मामा-मामी के संरक्षण में बीता। बचपन से ही सुने गए भारतीय शास्त्रीय संगीत के स्वरो के प्रभाव के कारण किरीट जी का संगीत के प्रति अनुराग निरन्तर बना रहा। किरीट जी न तो स्वयं गाते हैं और न बजाते हैं, परन्तु संगीत सुनने के दीवाने हैं। वह इसे अपना सौभाग्य मानते हैं कि उनकी पत्नी को भी संगीत के प्रति लगाव है। नब्बे के दशक के मध्य में किरीट जी ने अमेरिका में रह रहे कुछ संगीत-प्रेमी परिवारों के सहयोग से “रागिनी म्यूजिक सर्कल” नामक संगीत संस्था का गठन किया है। इस संस्था की ओर से समय-समय पर संगीत अनुष्ठानों और संगोष्ठियों का आयोजन किया जाता है। अब तक उस्ताद विलायत खाँ, उस्ताद अमजद अली खाँ, पण्डित अजय चक्रवर्ती, पण्डित मणिलाल नाग, पण्डित बुद्धादित्य मुखर्जी आदि की संगीत सभाओं का आयोजन यह संस्था कर चुकी है। दो वर्ष पूर्व विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती की संगीत सभा का फिलेडेल्फिया नामक स्थान पर सफलतापूर्वक आयोजन किया गया था। किरीट जी गैस्ट्रोएंट्रोंलोजी चिकित्सक के रूप में विगत 40 वर्षों तक लोगों की सेवा करने के बाद जुलाई, 2014 में सेवानिवृत्त हुए हैं। सेवानिवृत्ति के बाद किरीट जी अब अपना अधिकांश समय शास्त्रीय संगीत और अपनी अन्य अभिरुचि, फोटोग्राफी और 1950 से 1970 के बीच के शास्त्रीय संगीत और हिन्दी फिल्म संगीत को दे रहे हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ मंच से डॉ. किरीट छाया का सम्पर्क हमारी एक अन्य नियमित प्रतिभागी विजया राजकोटिया के माध्यम से हुआ है। किरीट जी हमारे नियमित सहभागी हैं और अपने संगीत-प्रेम और स्वरों की समझ के बल पर वर्ष 2018 की संगीत पहेली में दूसरे महाविजेता बने हैं। रेडियो प्लेबैक इण्डिया परिवार उन्हें यह महाविजेता का सम्मान सादर समर्पित करता है। हमारी परम्परा है कि हम जिन्हें सम्मानित करते हैं स्वयं उनका अथवा उनकी पसन्द का संगीत सुनवाते हैं। लीजिए, प्रस्तुत है, डॉ. किरीट छाया की पसन्द का एक वीडियो। यू-ट्यूब के सौजन्य से प्रस्तुत इस वीडियो के माध्यम से हम आपको पण्डित निखिल बनर्जी का सितार पर बजाया राग सोहनी सुनवा रहे हैं।

राग सोहनी : सितार वादन : पण्डित निखिल बनर्जी : प्रेषक – डॉ. किरीट छाया




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 401 और 402वें अंक में हम वर्ष 2018 की संगीत पहेली के महाविजेताओं को उन्हीं की प्रस्तुतियों के माध्यम से सम्मानित कर रहे हैं, अतः इस अंक में हम आपको कोई संगीत पहेली नहीं दे रहे हैं। अगले अंक में हम पुनः एक नई पहेली के साथ उपस्थित होंगे।

इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 399वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1961 में प्रदर्शित फिल्म “स्त्री” से एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – बसन्त, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – दादरा तथा तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- स्वर – आशा भोसले, महेन्द्र कपूर और साथी

वर्ष 2018 की इस अन्तिम पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; फीनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडिया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, मेरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज का यह अंक नववर्ष 2019 का पहला अंक था। इस अंक में हमने आपको संगीत पहेली के दूसरे महाविजेता डॉ. किरीट छाया, तीसरी महाविजेता विजया राजकोटिया और चौथी महाविजेता शुभा खाण्डेकर से परिचित कराया और उनकी रचनाएँ भी प्रस्तुत की। अगले अंक में हम आपका परिचय पहेली के प्रथम और द्वितीय स्थान के महाविजेताओं से कराएँगे। वर्ष 2018 की प्रस्तुतियों को हमारे अनेकानेक पाठकों ने पसन्द किया है। हम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 7 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


Sunday, November 25, 2018

राग दरबारी कान्हड़ा : SWARGOSHTHI – 395 : RAG DARBARI KANHADA






स्वरगोष्ठी – 395 में आज

पूर्वांग और उत्तरांग राग – 10 : राग दरबारी कान्हड़ा

आशा भोसले से फिल्म का एक गीत और पण्डित जसराज से राग दरबारी कान्हड़ा सुनिए





पण्डित जसराज
आशा भोसले
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की दसवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। रागों को पूर्वांग और उत्तरांग में विभाजित करने के लिए सप्तक के सात स्वरों के साथ तार सप्तक के षडज स्वर को मिला कर आठ स्वरों के संयोजन को दो भागों में बाँट दिया जाता है। प्रथम भाग षडज से मध्यम तक पूर्वांग और दूसरे भाग पंचम से तार षडज तक उत्तरांग कहा जाता है। इसी प्रकार जो राग दिन के पहले भाग (पूर्वार्द्ध) अर्थात दिन के 12 बजे से रात्रि के 12 बजे के बीच में गाया-बजाया जाता हो उन्हें पूर्व राग और जो राग दिन के दूसरे भाग (उत्तरार्द्ध) अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता हो उन्हें उत्तर राग कहा जाता है। भारतीय संगीत का यह नियम है कि जिन रागों में वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में हो तो उन्हें दिन के पूर्वार्द्ध में और जिन रागों को वादी स्वर सप्तक उत्तरांग में हो उन्हे दिन के उत्तरार्द्ध में गाया-बजाया जाना चाहिए। राग का वादी स्वर यदि सप्तक के प्रथम भाग में है संवादी स्वर निश्चित रूप से सप्तक के दूसरे भाग में होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर सप्तक के दूसरे भाग में हो तो संवादी स्वर सप्तक के पूर्व में होगा। वादी और संवादी स्वरों में सदैव तीन अथवा चार स्वरों का अन्तर होता है। इसलिए यदि वादी स्वर ऋषभ है तो संवादी स्वर पंचम या धैवत होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर धैवत हो तो संवादी स्वर गान्धार अथवा ऋषभ होगा। भीमपलासी, बसन्त और भैरवी जैसे कुछ राग इस नियम के अपवाद होते हैं। इस कठनाई को दूर करने के लिए सप्तक के पूर्वांग और उत्तरांग का क्षेत्र बढ़ा दिया जाता है। पूर्वांग का क्षेत्र षडज से पंचम तक और उत्तरांग का क्षेत्र मध्यम से तार सप्तक के षडज तक माना जाता है। इस प्रकार वादी-संवादी में से यदि एक स्वर पूर्वांग में हो तो दूसरा स्वर उत्तरांग में हो जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ पूर्वांग और उत्तरांग प्रधान रागों पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए चुने गए अधिकतर रागों में वादी स्वर षडज अथवा ऋषभ होता है और संवादी स्वर पंचम अथवा मध्यम होता है। श्रृंखला की दसवीं कड़ी में आज हमने राग दरबारी कान्हड़ा चुना है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम पार्श्वगायिका आशा भोसले के स्वर में 1965 में प्रदर्शित फिल्म “काजल” से राग दरबारी कान्हड़ा पर आधारित एक भक्तिगीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जसराज के स्वर में राग दरबारी कान्हड़ा में निबद्ध शक्ति और बुद्धि की प्रतीक देवी दुर्गा की स्तुति भी हम प्रस्तुत कर रहे हैं।



राग दरबारी कान्हड़ा का यह नामकरण अकबर के काल से प्रचलित हुआ। मध्यकालीन ग्रन्थों में राग का नाम दरबारी कान्हड़ा नहीं मिलता। इसके स्थान पर कर्नाट या शुद्ध कर्नाट नाम से यह राग प्रचलित था। तानसेन दरबार में अकबर के सम्मुख राग कर्नाट गाते थे, जो बादशाह और अन्य गुणी संगीत-प्रेमियों को खूब पसन्द आता था। राज दरबार का पसंदीदा राग होने से धीरे-धीरे राग का नाम दरबारी कान्हड़ा हो गया। प्राचीन नाम ‘कर्नाट’ परिवर्तित होकर ‘कान्हड़ा’ प्रचलित हो गया। वर्तमान में राग दरबारी कान्हड़ा आसावरी थाट का राग माना जाता है। इस राग में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर सदा कोमल प्रयोग किया जाता है। शेष स्वर शुद्ध लगते हैं। राग की जाति वक्र सम्पूर्ण होती है। अर्थात इस राग में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। मध्यरात्रि के समय यह राग अधिक प्रभावी लगता है। गान्धार स्वर आरोह और अवरोह दोनों में तथा धैवत स्वर केवल अवरोह में वक्र प्रयोग किया जाता है। कुछ विद्वान अवरोह में धैवत को वर्जित करते हैं। तब राग की जाति सम्पूर्ण-षाडव हो जाती है। राग दरबारी का कोमल गान्धार अन्य सभी रागों के कोमल गान्धार से भिन्न होता है। राग का कोमल गान्धार स्वर अति कोमल होता है और आन्दोलित भी होता है। इस राग का चलन अधिकतर मन्द्र और मध्य सप्तक में किया जाता है। यह आलाप प्रधान राग है। इसमें विलम्बित आलाप और विलम्बित खयाल अत्यन्त प्रभावी लगते हैं। राग दरबारी कान्हड़ा को आधार बना कर फिल्मों के अनेक गीतों की रचना हुई है। इन्हीं में से एक गीत का चयन हमने आपके लिए किया है। आइए, आशा जी का गाया, फिल्म “काजल” का भक्तिगीत - “तोरा मन दर्पण कहलाए...” सुनते हैं। 1965 में प्रदर्शित इस फिल्म के संगीतकार रवि ने राग दरबारी कान्हड़ा पर आधारित स्वरों में गीत को पिरोया है। कहरवा ताल में निबद्ध इस गीत के भक्तिरस का आप आस्वादन कीजिए।

राग दरबारी कान्हड़ा : ‘तोरा मन दर्पण कहलाए...’ : आशा भोसले : फिल्म – काजल


मध्यरात्रि के परिवेश को संवेदनशील बनाने और विनयपूर्ण पुकार की अभिव्यक्ति के लिए दरबारी कान्हड़ा एक उपयुक्त राग है। प्राचीन काल में कर्णाट नामक एक राग प्रचलित था। 1550 की राजस्थानी पेंटिंग में इस राग का नाम आया है। बाद में यह राग कानडा या कान्हड़ा नाम से प्रचलित हुआ। यह मान्यता है कि अकबर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन ने कान्हड़ा के स्वरों में आंशिक परिवर्तन कर दरबार में गुणिजनों के बीच प्रस्तुत किया था, जो बादशाह अकबर को बहुत पसन्द आया और उन्होने ही इसका नाम दरबारी रख दिया था। आसावरी थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला यह राग मध्यरात्रि और उसके बाद की अवधि में ही गाया-बजाया जाता है। इस राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। अति कोमल गान्धार स्वर का आन्दोलन करते हुए प्रयोग इस राग की प्रमुख विशेषता होती है। यह अतिकोमल गान्धार अन्य रागों के गान्धार से भिन्न है। यह पूर्वांग प्रधान राग है। अवरोह के स्वर वक्रगति से लगाए जाते हैं। राग के यथार्थ स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपको राग दरबारी के भक्तिरस के पक्ष को रेखांकित करने के लिए अब हम आपको विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जसराज के स्वरों में शक्ति और बुद्धि की प्रतीक देवी दुर्गा की स्तुति सुनवाते हैं। आप यह रचना सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग दरबारी : ‘जय जय श्री दुर्गे...’ : पण्डित जसराज




संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 395वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1964 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष की अन्तिम पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 1 दिसम्बर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 397वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 393वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1977 में प्रदर्शित फिल्म “भूमिका” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – तिलक कामोद, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – सितारखानी अथवा पंजाबी ठेका और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – प्रीति सागर

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, मेरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, फीनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की दसवीं कड़ी में आपने राग दरबारी कान्हड़ा का परिचय प्राप्त किया। इस राग में आपने सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित जसराज के स्वर में एक भक्ति-रचना का रसास्वादन किया। साथ ही आपने इस राग पर आधारित संगीतकार रवि द्वारा संगीतबद्ध फिल्म “काजल” का एक गीत आशा भोसले की आवाज़ में सुना। आज के अंक में हम आपको एक शुभ सूचना देना चाहते हैं। हैदराबाद निवासी, संगीत शिक्षिका, “स्वरगोष्ठी” की नियमित पाठक और पहेली का नियमित उत्तर देने वाली सुश्री हरिणा माधवी ने अपने शिक्षण-कार्य के दौरान अनेक स्वरचित बन्दिशों का एक संकलन तैयार किया है, जिसके पुस्तक रूप में प्रकाशन के हमें सूचना मिली है। इस प्रकाशन का विस्तृत विवरण अपने पाठकों को हम शीघ्र ही उपलब्ध कराएंगे। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे। 



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग दरबारी कान्हड़ा : SWARGOSHTHI – 395 : RAG DARBARI KANHADA : 25 नवम्बर, 2018

Sunday, November 11, 2018

राग आभोगी : SWARGOSHTHI – 393 : RAG AABHOGI






स्वरगोष्ठी – 393 में आज

पूर्वांग और उत्तरांग राग – 8 : राग आभोगी

आशा भोसले से फिल्म का एक गीत और विदुषी अश्विनी भिड़े से राग आभोगी सुनिए




अश्विनी भिड़े  देशपाण्डे
आशा भोसले
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। रागों को पूर्वांग और उत्तरांग में विभाजित करने के लिए सप्तक के सात स्वरों के साथ तार सप्तक के षडज स्वर को मिला कर आठ स्वरों के संयोजन को दो भागों में बाँट दिया जाता है। प्रथम भाग षडज से मध्यम तक पूर्वांग और दूसरे भाग पंचम से तार षडज तक उत्तरांग कहा जाता है। इसी प्रकार जो राग दिन के पहले भाग (पूर्वार्द्ध) अर्थात दिन के 12 बजे से रात्रि के 12 बजे के बीच में गाया-बजाया जाता हो उन्हें पूर्व राग और जो राग दिन के दूसरे भाग (उत्तरार्द्ध) अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता हो उन्हें उत्तर राग कहा जाता है। भारतीय संगीत का यह नियम है कि जिन रागों में वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में हो तो उन्हें दिन के पूर्वार्द्ध में और जिन रागों को वादी स्वर सप्तक उत्तरांग में हो उन्हे दिन के उत्तरार्द्ध में गाया-बजाया जाना चाहिए। राग का वादी स्वर यदि सप्तक के प्रथम भाग में है संवादी स्वर निश्चित रूप से सप्तक के दूसरे भाग में होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर सप्तक के दूसरे भाग में हो तो संवादी स्वर सप्तक के पूर्व में होगा। वादी और संवादी स्वरों में सदैव तीन अथवा चार स्वरों का अन्तर होता है। इसलिए यदि वादी स्वर ऋषभ है तो संवादी स्वर पंचम या धैवत होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर धैवत हो तो संवादी स्वर गान्धार अथवा ऋषभ होगा। भीमपलासी, बसन्त और भैरवी जैसे कुछ राग इस नियम के अपवाद होते हैं। इस कठनाई को दूर करने के लिए सप्तक के पूर्वांग और उत्तरांग का क्षेत्र बढ़ा दिया जाता है। पूर्वांग का क्षेत्र षडज से पंचम तक और उत्तरांग का क्षेत्र मध्यम से तार सप्तक के षडज तक माना जाता है। इस प्रकार वादी-संवादी में से यदि एक स्वर पूर्वांग में हो तो दूसरा स्वर उत्तरांग में हो जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ पूर्वांग और उत्तरांग प्रधान रागों पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए चुने गए अधिकतर रागों में वादी स्वर षडज अथवा ऋषभ होता है और संवादी स्वर पंचम अथवा मध्यम होता है। श्रृंखला की आठवीं कड़ी में आज हमने राग आभोगी अथवा आभोगी कान्हड़ा चुना है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम सुविख्यात पार्श्वगायिका आशा भोसले के स्वर में 1975 में प्रदर्शित फिल्म “कागज़ की नाव” से राग आभोगी कान्हड़ा पर आधारित एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुप्रसिद्ध संगीत-विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वर में राग आभोगी कान्हड़ा की एक बन्दिश भी हम प्रस्तुत कर रहे हैं।



राग आभोगी अथवा आभोगी कान्हड़ा को काफी थाट जन्य माना जाता है। इसमें गान्धार स्वर कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इस राग में पंचम और निषाद स्वर वर्जित होने से राग की जाति औडव-औडव होती है। वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर अधिक खिलता है। यह कर्नाटक संगीत पद्धति का एक मधुर राग है, जिसका प्रचार उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में अधिक हुआ है। कान्हड़ा का प्रकार होने के कारण अवरोह में गान्धार स्वर का वक्र प्रयोग किया जाता है, जैसे; (कोमल), म, रे, सा। यह स्वर-समूह बार-बार प्रयोग किया जाता है और कोमल गान्धार स्वर आन्दोलित होता है। हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव की पुस्तक “राग परिचय” के अनुसार राग आभोगी और आभोगी कान्हड़ा में बहुत थोड़ा अन्तर होता है। राग आभोगी को आभोगी कान्हड़ा बनाने के लिए (कोमल), म, रे, सा, स्वर-समूह का प्रयोग किया जाता है, अन्यथा सम्पूर्ण राग के चलन में कोई परिवर्तन नहीं आता। कुछ विद्वान इस भेद को नहीं मानते, उनका कहना है कि यह भेद करना ‘बाल की खाल निकालना’ है। आभोगी और आभोगी कान्हड़ा दोनों में रे, (कोमल), म, (कोमल), रे, सा स्वर-समूह प्रयोग होता है। केवल आभोगी कान्हड़ा में कान्हड़ा अंग लाने के लिए (कोमल), म, रे, सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है, किन्तु आभोगी में नहीं किया जाता। कुछ विद्वानों का मत है कि आभोगी राग में आन्दोलित कोमल गान्धार स्वर से ही कान्हड़ा अंग स्पष्ट हो जाता है, चाहे वक्र कोमल गान्धार स्वर अवरोह में लें अथवा न लें। इस राग का चलन तीनों सप्तकों में होता है। यह खयाल शैली का राग है, इसमें ठुमरी नहीं गायी जाती। इस राग का आलाप अत्यन्त कर्णप्रिय लगता है। राग आभोगी कान्हड़ा के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, इस राग में एक मोहक द्रुत खयाल, जिसे स्वर दे रही हैं, सुविख्यात गायिका अश्विनी भिड़े देशपाण्डे।

राग आभोगी कान्हड़ा : “रस बरसत तोरे घर...” : अश्विनी भिड़े देशपाण्डे


राग आभोगी का न्यास स्वर मध्यम और उपन्यास स्वर धैवत होता है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय रात्रि में 11 से 12 बजे के बीच होता है। इस राग के बारे में सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ और मयूरवीणा के वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र बताते हैं कि संगीत-मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के मतानुसार अवरोह में जब सां, ध, म, (कोमल), रे ,सा स्वरों का प्रयोग किया जाएगा तो यह राग आभोगी होगा। जब इसमें म, (कोमल), रे सा के स्थान पर (कोमल), म, रे, सा स्वरो का प्रयोग करेंगे यह आभोगी कान्हड़ा बन जाता है। ये कान्हड़ा अंग के राग हैं। इस राग की प्रकृति शान्त व आत्मनिवेदन की होती है। आभोगी के श्रवण से भक्तिभाव की अभिव्यक्ति होगी तथा आभोगी कान्हड़ा के श्रवण से मन शान्त हो जाएगा। दोनों ही राग डिप्रेशन और चिन्ताविकृत को दूर का रास्ता दिखा कर गहन निद्रा का सुख प्रदान कर सकते हैं। कुछ विद्वान राग आभोगी और आभोगी कान्हड़ा में वादी-संवादी स्वरों का अन्तर भी मानते हैं। वे राग आभोगी में षडज और मध्यम स्वरों तथा राग आभोगी कान्हड़ा में मध्यम और षडज स्वरों को क्रमशः वादी-संवादी मानते हैं। इस परिवर्तन से राग आभोगी पूर्वांग प्रधान और राग आभोगी कान्हड़ा उत्तरांग प्रधान राग होना चाहिए, परन्तु यह भेद उचित नहीं मालूम होता। शास्त्र सदैव क्रियात्मक संगीत का अनुसरण करता है। जो बातें क्रियात्मक संगीत में होती है, वही शास्त्र में शामिल की जाती है। क्रियात्मक संगीत में (कोमल), म, रे, सा के अतिरिक्त कोई भेद दिखाई नहीं पड़ता। इसलिए वादी-संवादी के फलस्वरूप पूर्वांग-उत्तरांग का भेद न्याय-संगत नहीं है। अब हम आपको राग आभोगी कान्हड़ा पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवा रहे हैं। इस गीत को हमने 1975 में प्रदर्शित फिल्म “कागज़ की नाव” से चुना है। गीत में स्वर आशा भोसले का और संगीत सपन जगमोहन का है।

राग आभोगी कान्हड़ा : “ना जइयो रे सौतन घर...” : आशा भोसले : फिल्म – कागज़ की नाव




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 393वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1977 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष की अन्तिम पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायिका के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 17 नवम्बर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 395वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 391वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1955 में प्रदर्शित फिल्म “सीमा” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – जयजयवन्ती, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – एकताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, फीनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडिया, मेरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की आठवीं कड़ी में आपने राग आभोगी अथवा आभोगी कान्हड़ा का परिचय प्राप्त किया। इस राग में आपने विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे से द्रुत खयाल की एक रचना का रसास्वादन किया। साथ ही आपने इस राग पर आधारित संगीतकार सपन जगमोहन द्वारा संगीतबद्ध फिल्म “कागज़ की नाव” का एक गीत आशा भोसले से सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इडि
राग आभोगी : SWARGOSHTHI – 393 : RAG AABHOGI : 11 नवम्बर, 2018


Sunday, December 17, 2017

ठुमरी खमाज : SWARGOSHTHI – 348 : THUMARI KHAMAJ : पूरब अंग ठुमरी का रंग




स्वरगोष्ठी – 348 में आज

फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व – 5 : पूरब अंग ठुमरी का रंग

लोकरस से सराबोर ठुमरी - "नज़र लागी राजा तोरे बंगले पर..."




आशा भोसले
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की इस पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला में हमने आपके लिए फिल्मों में पारम्परिक ठुमरी के साथ-साथ उसके फिल्मी प्रयोग को भी रेखांकित किया था। इस श्रृंखला में भी हम केवल फिल्मी ठुमरियों की चर्चा कर रहे हैं, किन्तु ये ठुमरियाँ पारम्परिक हों, यह आवश्यक नहीं हैं। इन ठुमरी गीतों को फिल्मों के प्रसिद्ध गीतकारों ने लिखा है और संगीतकारों ने इन्हें विभिन्न रागों में बाँध कर ठुमरी गायकी के तत्वों से अभिसिंचित किया है। हमारी इस श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल किये गए ऐसे गीत हैं जिनमे राग, भाव और रस की दृष्टि से उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी के तत्वों का उपयोग हुआ है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे पाँचवें और छठे दशक की ऐसी ही कुछ गैर-पारम्परिक चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात कर रहे हैं। आज हम आपको देव आनन्द और नलिनी जयवन्त अभिनीत 1958 की लोकप्रिय फिल्म "कालापानी" की ठुमरी -"नज़र लागी राजा तोरे बंगले पर...." सुनवा रहे हैं। यह ठुमरी गीत दरअसल एक मुजरा गीत है। इस ठुमरी गीत में आपको मजरुह सुल्तानपुरी के लोक-तत्वों से गूँथे शब्द, सचिनदेव बर्मन द्वारा निबद्ध राग खमाज के स्वर और ठुमकते हुए ताल दादरा की थिरकन का अनूठा संयोजन मिलेगा।


पिछले अंकों में हमने आपके साथ ठुमरी के प्रारम्भिक दौर की जानकारी बाँटी थी। यह भी चर्चा हुई थी कि उस दौर में ठुमरी कथक नृत्य का एक हिस्सा बन गई थी। परन्तु एक समय ऐसा भी आया जब ठुमरी की विकास-यात्रा में थोड़ा व्यवधान भी आया। इस शैली के पृष्ठ-पोषक नवाब वाजिद अली शाह को 1856 में अंग्रेजों ने अपनी साम्राज्यवादी नीतियों के कारण बन्दी बना लिया गया| नवाब को बन्दी बना कर कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) के मटियाबुर्ज नामक स्थान पर भेज दिया गया, नवाब यहाँ पर मृत्यु-पर्यन्त (1887) तक स्थायी रूप से रहे। नवाब वाजिद अली शाह के लखनऊ छूटने से पहले तक ठुमरी की जड़ें जमीन को पकड़ चुकी थीं। इस दौर में केवल संगीतज्ञ ही नहीं बल्कि शासक, दरबारी, सामन्त, शायर, कवि आदि सभी ठुमरी की रचना, गायन और उसके भावाभिनय में प्रवृत्त हो गए थे। वाजिद अली शाह के रिश्तेदार और बादशाह नासिरुद्दीन हैदर के पौत्र वजीर मिर्ज़ा बालाकदर, "कदरपिया" उपनाम से ठुमरियों के प्रमुख रचनाकार थे। आज भी कदरपिया की ठुमरी रचनाएँ संगीत जगत में प्रचलित है। इसके अलावा उस दौर के ठुमरी रचनाकारों और गायकों में उस्ताद सादिक अली, मुहम्मद बख्श, चाँद मियाँ, बिन्दादीन, रमजानी, मिर्ज़ा वहीद कश्मीरी, घूमन, हुसैनी, लज्जतबख्श आदि के नाम उल्लेखनीय है। नवाब वाजिद अली शाह के बन्दी बनाए जाने के बाद कई ठुमरी गायक-गायिकाएँ और नर्तक-नर्तकियाँ नवाब के साथ कोलकाता चले गए। लखनऊ के अन्य ठुमरी कलाकारों ने भी संगीत के अन्य केन्द्रों; बनारस (वर्तमान वाराणसी), गया, पटना, आदि की ओर रुख किया। लखनऊ की ठुमरी का बनारस पहुँचना ठुमरी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ। दरअसल उस दौर में बनारस का संगीत परिवेश काफी विकसित अवस्था में था। तबला-पखावज वादन, ध्रुवपद और ख़याल गायन के साथ-साथ लोक संगीत की भी एक समृद्ध परम्परा बनारस के संगीत परिवेश में मौजूद थी। ऋतु आधारित लोक संगीत; कजरी, चैती आदि का प्रचलन था। ऐसे वातावरण में जब लखनऊ की ठुमरी बनारस पहुँची तो उसे हाथों-हाथ लिया गया।

बनारस के कई गायक-गायिकाओं ने ठुमरी को न केवल अपनाया बल्कि इस नई शैली को विकसित करने में भी अपना योगदान किया। शब्दों की कोमलता और स्वरों की नजाकत तो ठुमरी में पहले से ही मौजूद थी; बनारस के संगीतज्ञों, विशेष तौर पर तवायफों ने लोक-तत्वों का मिश्रण करते हुए ठुमरी गायन आरम्भ का दिया। यह ठुमरी के साथ एक अनूठा प्रयोग था जिसे रसिकों ने हाथों-हाथ लिया। लोक-रस में भीग कर ठुमरी का सौन्दर्य और अधिक निखरा। आगे चल कर बनारस की यह ठुमरी "पूरब अंग की ठुमरी" के नाम से प्रचलित हुई। बनारस में ठुमरी के साथ हुए प्रयोगों की चर्चा हम श्रृंखला के अगले अंक में जारी रखेंगे। इससे पहले थोड़ी चर्चा आज प्रस्तुत की जाने वाली ठुमरी के विषय में हो जाए। बनारस पहुँचने पर ठुमरी का लोक-रंग में जैसा श्रृंगार हुआ; कुछ उसी प्रकार की फ़िल्मी ठुमरी आज हम आपके लिए लेकर उपस्थित हुए हैं।

आज हम आपको 1958 में प्रदर्शित लोकप्रिय फिल्म "कालापानी" की ठुमरी - "नज़र लागी राजा तोरे बंगले पर..." सुनवा रहे हैं। इस ठुमरी गीत में आपको मजरुह सुल्तानपुरी के लोक- तत्वों से गूँथे शब्द, सचिनदेव बर्मन द्वारा निबद्ध राग "खमाज" के स्वर और ठुमकते हुए ताल दादरा की थिरकन का अनूठा संयोजन मिलेगा। राग खमाज इसी नाम से प्रचलित खमाज थाट से सम्बन्धित माना जाता है। खमाज थाट के स्वर होते हैं- सा, रे ग, म, प ध, नि॒ (कोमल)। अर्थात इस थाट में निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस थाट का आश्रय राग ‘खमाज’ कहलाता है। ‘खमाज’ राग में थाट के अनुकूल निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। यह षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात राग के आरोह में छः स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। राग खमाज के आरोह में सा, ग, म, प, ध नि सां और अवरोह में सां, नि (कोमल), ध, प, म, ग, रे, सा स्वरों का प्रयोग होता है। आरोह में ऋषभ स्वर नहीं लगता। राग में दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद लगाया जाता है। वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन-वादन का समय रात्रि का दूसरा प्रहर होता है।

यह ठुमरी फिल्म में तवायफ के कोठे पर फिल्माया गया है। अभिनेत्री नलिनी जयवन्त ने इस ठुमरी पर नृत्य किया है। गीत में नायक के बंगले को लक्ष्य करके नायिका अपना समर्पण भाव व्यक्त करती है। दूसरे अन्तरे - "बरस रहती राजा..." के बाद अन्तराल संगीत में बर्मन दादा ने कथक का एक लुभावना तत्कार डाल कर ठुमरी को और भी आकर्षक रूप दे दिया है। बर्मन दादा ने इस गीत में एक और विशेषता उत्पन्न की है; उन्होंने ठुमरी का स्थायी और चारो अन्तरा राग खमाज में निबद्ध किया है, किन्तु अन्तराल संगीत राग विहाग में है। फिल्म "कालापानी" के नायक देवानन्द को फिल्मफेयर का श्रेष्ठ अभिनेता का और नलिनी जयवन्त को श्रेष्ठ सह अभिनेत्री का पुरस्कार प्राप्त हुआ था। फिल्म के इस दृश्य में राज कपूर, विमल रॉय और विजय आनन्द को अतिथि कलाकार के रूप में नलिनी जयवन्त के नृत्य का आनन्द लेते दिखाया गया है।

ठुमरी खमाज : "नज़र लागी राजा तोरे बंगले पर..." : आशा भोसले : फिल्म – कालापानी




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 348वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको 1959 में प्रदर्शित एक फिल्म से एक ठुमरी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही प्रश्न का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष के अन्तिम अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद महाविजेताओं की घोषणा भी की जाएगी।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 23 दिसम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 350वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 346वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1953 में प्रदर्शित फिल्म “लड़की” से एक ठुमरी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – गीता दत्त

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे प्रतिभागी हैं – एक अन्तराल के बाद मिनिसोटा, अमेरिका से हमारे नियमित पाठक-श्रोता दिनेश कृष्ण जोइस ने पहेली प्रतियोगिता में भाग लिया और तीनों प्रश्नो का सही उत्तर दिया है। अन्य सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की आज की कड़ी में आपने 1958 में प्रदर्शित फिल्म “कालापानी” के ठुमरी गीत का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे फिल्मी गीतों पर चर्चा करेंगे जिसमें आपको ठुमरी शैली के दर्शन होंगे। आज आपने जो गीत सुना, उसमें राग पीलू का स्पर्श है। इस श्रृंखला में भी हम आपसे फिल्मी ठुमरियों पर चर्चा कर रहे हैं और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा भी करेंगे। हमारी वर्तमान और आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, October 29, 2017

ठुमरी पीलू और देश : SWARGOSHTHI – 341 : THUMARI PILU & DESH




स्वरगोष्ठी – 341 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 8 : ठुमरी पीलू और देश

दो भिन्न रागों में श्रृंगार रस से परिपूर्ण ठुमरी  - “गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...”




आशा भोसले और मोहम्मद रफी
इकबाल बानो, उस्ताद अख्तर अली और ज़ाकिर अली खाँ
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला की भाँति इस श्रृंखला में भी हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हमारे सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन ने प्रस्तुत किया है। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। दरअसल यह श्रृंखला पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित की गई थी। हमारे पाठकों / श्रोताओं को यह श्रृंखला सम्भवतः कुछ अधिक रुचिकर प्रतीत हुई थी। अनेक संगीत-प्रेमियों ने इसके पुनर्प्रसारण का आग्रह किया है। सभी सम्मानित पाठकों / श्रोताओं के अनुरोध का सम्मान करते हुए और पूर्वप्रकाशित श्रृंखला में थोड़ा परिमार्जन करते हुए यह श्रृंखला हम पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारी नई लघु श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल की गई उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे ऐसी ही कुछ चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज के अंक हम आपको राग पीलू की एक परम्परागत ठुमरी पहले सुविख्यात गायिका इकबाल बानो की आवाज़ में, फिर यही ठुमरी उस्ताद अख्तर अली और ज़ाकिर अली खाँ के युगल स्वर में सुनेंगे। इसी ठुमरी का राग देश में प्रयोग 1964 की प्रदर्शित फिल्म – “मैं सुहागन हूँ” में संगीतकार लच्छीराम तँवर ने मोहम्मद रफी और आशा भोसले की युगल स्वर में किया था। 


ठुमरी पीलू : ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ : गायिका इकबाल बानो
ठुमरी पीलू : ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ उस्ताद अख्तर अली और ज़ाकिर अली खाँ
ठुमरी देश : ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ : आशा भोसले और मोहम्मद रफी : फिल्म – मैं सुहागन हूँ







संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 341वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक और फिल्मी ठुमरी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष के अन्तिम अंक के ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – इस ठुमरी रचना का अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – इस ठुमरी गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस ठुमरी में किस गायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 4 नवम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 343वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 339वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको वर्ष 1938 में प्रदर्शित फिल्म – “स्ट्रीट सिंगर” से ली गई ठुमरी का अंश सुनवा कर हमने आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – कुन्दनलाल सहगल

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में तीनों प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। इसके साथ ही इस बार हमारे एक नए प्रतिभागी, फर्रुखाबाद, उत्तरप्रदेश से विद्याप्रकाश दीक्षित ने भी तीनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये हैं। हम उनका हार्दिक स्वागत करते हैं। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस आठवीं कड़ी में आपने राग पीलू की एक पारम्परिक ठुमरी को गायिका इक़बाल बानो और उस्ताद अख्तर अली तथा ज़ाकिर अली खाँ के स्वर में रसास्वादन किया। इसी ठुमरी के फिल्मी रूप का राग देश में गायन मोहम्मद रफी और आशा भोसले के स्वर में आनन्द लिया। 

“स्वरगोष्ठी” 338वें अंक की पहेली के बारे टिप्पणी करते हुए हमारे एक पाठक Janardan Murhekar ने लिखा है - "लताजी द्वारा गाये "सौतेला भाई" के इस गीत ने मुझे अरसे से मोहित किया है। कब तक हंसध्वनि राग मे यह गीत बाँधा गया है, ऐसा मै समझता था। कृपया प्रकाश डालें।" 

जनार्दन जी से निवेदन है - "संगीत के विभिन्न ग्रन्थों और विद्वानों के अनसार राग हंसध्वनि और अड़ाना में पर्याप्त अन्तर होता है। मूलतः कर्नाटक पद्यति के राग हंसध्वनि में सभी शुद्ध स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इस राग में मध्यम और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। राग की जाति औड़व-औड़व है। जबकि राग अड़ाना में गान्धार और धैवत स्वर कोमल और दोनों निषाद स्वर का प्रयोग होता है। आरोह में गान्धार वर्जित और अवरोह में वक्र प्रयोग होता है। इस राग की जाति षाडव-सम्पूर्ण होती है। आशा है, जनार्दन जी सन्तुष्ट हो गए होंगे।

आपके अनुरोध पर पुनर्प्रसारित इस श्रृंखला के अगले अंक में भी हम आपसे एक और पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी रूप पर चर्चा करेंगे और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा करेंगे और सम्बन्धित रागों तथा संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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