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Saturday, July 2, 2016

"तू मेरा कौन लागे?" क्या सम्बन्ध है इस गीत का किशोर कुमार से?


एक गीत सौ कहानियाँ - 85
 

'तू मेरा कौन लागे...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 85-वीं कड़ी में आज जानिए 1989 की फ़िल्म ’बटवारा’ के लोकप्रिय गीत "तू मेरा कौन लागे..." के बारे में जिसे अनुराधा पौडवाल, अलका याज्ञनिक और कविता कृष्णमूर्ति ने गाया था। गीत लिखा है हसन कमाल ने और संगीत दिया है लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने।  


 मारी फ़िल्मों में एकल और युगल गीतों की कोई कमी नहीं है। तीन, चार या उससे अधिक गायकों के गाये
गीतों की भी फ़ेहरिस्त काफ़ी लम्बी है। लेकिन अगर ऐसे गानें छाँटने के लिए कहा जाए जिनमें कुल तीन गायिकाओं की आवाज़ें हैं तो शायद गिनती उंगलियों पर ही की जा सकती है। दूसरे शब्दों में ऐसे गीत बहुत कम संख्या में बने हैं। आज हम एक ऐसे ही गीत की चर्चा कर रहे हैं जो बनी थी 1989 की फ़िल्म ’बटवारा’ के लिए। अलका याज्ञनिक, अनुराधा पौडवाल और कविता कृष्णमूर्ति का गाया "तू मेरा कौन लागे" गीत अपने ज़माने में काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। इस गीत की चर्चा शुरू करने से पहले जल्दी जल्दी एक नज़र डाल लेते हैं तीन गायिकाओं के गाए फ़िल्मी गीतों के इतिहास पर। पहला गीत तो वही है जो फ़िल्म संगीत इतिहास का पहला पार्श्वगायन युक्त गीत है। 1935 की फ़िल्म ’धूप छाँव’ के गीत "मैं ख़ुश होना चाहूँ..." में संगीतकार रायचन्द बोराल ने तीन गायिकाओं - पारुल घोष, सुप्रभा सरकार और हरिमति दुआ को एक साथ गवाया था। 40 के दशक में 1945 की फ़िल्म ’ज़ीनत’ में एक ऐसी क़व्वाली बनी जिसमें केवल महिलाओं की आवाज़ें थीं, फ़िल्म संगीत के इतिहास में यह पहली बार था। मीर साहब और हाफ़िज़ ख़ाँ के संगीत में "आहें ना भरी शिकवे ना किए...", इस क़वाली में आवाज़ें थीं नूरजहाँ, ज़ोहराबाई अम्बालेवाली और कल्याणीबाई की। 50 के दशक में नौशाद साहब ने तीन गायिकाओं को गवाया महबूब ख़ान की बड़ी फ़िल्म ’मदर इण्डिया’ में। तीन मंगेशकर बहनों - लता, उषा और मीना ने इस गीत को गाया, बोल थे "दुनिया में हम आये हैं तो जीना ही पड़ेगा..."। 60 के दशक में पहली बार संगीतकार रवि ने लता, आशा और उषा को एक साथ गवाकर इतिहास रचा, फ़िल्म थी ’गृहस्थी’ और गाना था "खिले हैं सखी आज..."। इसके पाँच साल बाद 1968 में कल्याणजी-आनन्दजी ने फिर एक बार इन तीन बहनों को गवाया ’तीन बहूरानियाँ’ फ़िल्म के गीत "हमरे आंगन बगिया..." में। इसी साल कल्याणजी-आनन्दजी भाइयों ने मुबारक़ बेगम, सुमन कल्याणपुर और कृष्णा बोस की आवाज़ों में ’जुआरी’ फ़िल्म में एक गीत गवाया "नींद उड़ जाए तेरी चैन से सोने वाले" जो काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। 70 के दशक में शंकर-जयकिशन ने एक कमचर्चित फ़िल्म ’दिल दौलत दुनिया’ के लिए एक दीपावली गीत रेकॉर्ड किया आशा भोसले, उषा मंगेशकर और रेखा जयकर की आवाज़ों में, "दीप जले देखो..."। और 80 के दशक में लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने 1982 की फ़िल्म ’जीवन धारा’ में पहली बार अनुराधा-अलका-कविता की तिकड़ी को पहली बार साथ में माइक के सामने ला खड़ा किया, गीत था "जल्दी से आ मेरे परदेसी बाबुल..."। और जब 1989 में ’बटवारा’ में एक ऐसे तीन गायिकाओं वाले गीत की ज़रूरत आन पड़ी तब लक्ष्मी-प्यारे ने फिर एक बार इसी तिकड़ी को गवाने का निर्णय लिया। 90 के दशक में इस तिकड़ी को राम लक्ष्मण ने ’हम साथ साथ हैं’ फ़िल्म के कई गीतों में गवाया जैसे कि "मय्या यशोदा...", "मारे हिवड़ा में नाचे मोर...", "हम साथ साथ हैं..."। इसी दशक में यश चोपड़ा की फ़िल्म ’डर’ में शिव-हरि ने लता मंगेशकर के साथ कविता कृष्णमूर्ति और पामेला चोपड़ा को गवाकर एक अद्‍भुत गीत की रचना की, बोल थे "मेरी माँ ने लगा दिये सोलह बटन मेरी चोली में..."। 2000 के दशक में भी तीन गायिकाओं के गाए गीतों की परम्परा जारी रही, अनु मलिक ने ’यादें’ फ़िल्म में अलका याज्ञनिक, कविता कृष्णमूर्ति और हेमा सरदेसाई से गवाया "एली रे एली कैसी है पहेली..."।

"तू मेरा कौन लागे" गीत में डिम्पल कपाडिया के लिए अलका याज्ञनिक, अम्रीता सिंह के लिए कविता
किशोर के साथ अनुराधा की दुर्लभ तसवीर, साथ में अमित कुमार और आशा
कृष्णमूर्ति और पूनम ढिल्लों के लिए अनुराधा पौडवाल की आवाज़ निर्धारित हुई। गाना रेकॉर्ड होकर सेट पर पहुँच गया शूटिंग् के लिए। पर फ़िल्मांकन में हो गई गड़बड़। अभिनेत्री-गायिका की जोड़ियों में गड़बड़ हो गई। शुरुआती मुखड़े में अम्रीता सिंह ने अनुराधा पौडवाल के गाए हिस्से में होंठ मिला दी जबकि अनुराधा को पूनम के लिए गाना था। गीत का अन्त तो और गड़बड़ी वाला है। डिम्पल गीत को ख़त्म करती हैं "तू मारो कोण लागे" पंक्ति को चार बार गाते हुए। पर पहली दो लाइनें अलका की आवाज़ में है और अगली दो लाइनें अनुराधा की आवाज़ में। और तो और अनुराधा जो पूनम के लिए "तू मेरा कौन लागे" गा रही थीं, अब डिम्पल के लिए "तू मारो कोण लागे" गाती हैं। ऐसा क्यों है, पता नहीं! ख़ैर, अब ज़िक्र करते हैं कि इस गीत का किशोर कुमार के साथ क्या सम्बन्ध है। गीत के रेकॉर्डिंग् के दिन की बात है। तीनों गायिकाएँ तैयार थीं, दवाब भी था उन पर क्योंकि तीनों में उन दिनों प्रतियोगिता थी। इसलिए इस दवाब में थीं कि कहीं मुझसे इस गीत में कोई ग़लती ना हो जाए! गीत रेकॉर्ड हो गया, तीनों गायिकाएँ काँच के कमरे से बाहर आ गईं। लक्ष्मी-प्यारे भी उनकी तरफ़ चले आ रहे थे कन्डक्टिंग् रूम की तरफ़ से, पर किसी के चेहरे पर कोई मुस्कुराहट नहीं थी जो आम तौर पर होता है अगर गीत अच्छा रेकॉर्ड हो जाए तो। लक्ष्मी-प्यारे के उतरे हुए चेहरे देख कर तीनों गायिकाएँ घबरा गईं यह सोच कर कि कहीं उनसे कोई ग़लती तो नहीं हो गई इस गीत में? पास आने पर अलका याज्ञनिक ने प्यारेलाल जी से पूछा कि क्या बात है? प्यारेलाल जी ने बताया, "किशोर दा नहीं रहे!" दिन था 13 अक्टुबर 1987। इसी दिन किशोर दा चले गए और इसी दिन रेकॉर्ड हुआ था ’बटवारा’ का यह गीत, हालाँकि फ़िल्म 1989 में रिलीज़ हुई थी। 



फिल्म - बँटवारा : "तू मेरा कौन लागे..." : अनुराधा पौडवाल, अलका याज्ञिक, कविता कृष्णमूर्ति



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Tuesday, May 17, 2011

मेरे जीवन साथी, प्यार किये जा.....एक अनूठा गीत जिसे लिखना वाकई बेहद मुश्किल रहा होगा आनंद बख्शी साहब के लिए भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 658/2011/98

लिफ़्ट के अंदर का सीन है। नायक और नायिका अंदर हैं। बीच राह पर ही नायक लिफ़्ट की बटन दबा कर लिफ़्ट रोक देता है। नायिका कहती है कि उसे हिंदी की कक्षा में जाना है, हिंदी की क्लास है। लेकिन नायक कहता है कि हिंदी की क्लास वो ख़ुद लेगा और वो ही उसे हिंदी सिखायेगा। लेकिन मज़े की बात तो यह है कि नायक दक्षिण भारतीय है जिसे हिंदी बिल्कुल भी नहीं आती। तो साहब यह था सीन और इसमे एक गीत लिखना था गीतकार आनंद बख्शी साहब को। अब आप ही बताइए कि इस सिचुएशन पर किस तरह का गीत लिखे कोई? नायक को हिंदी नही आती और उसे हिंदी में ही गीत गाना है। इस मज़ेदार सिचुएशन पर बख्शी साहब नें एक कमाल का गाना लिखा है जिसे सुनते हुए आप भी मुस्कुरा उठेंगे, और गीत में नायिका तो हँस हँस कर लोट पोट हो रही हैं। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, आज 'गान और मुस्कान' की आठवीं कड़ी में प्रस्तुत है कमाल हासन और रति अग्निहोत्री पर फ़िल्माये १९८१ की फ़िल्म 'एक दूजे के लिए' से एस. पी. बालसुब्रह्मण्यम और अनुराधा पौडवाल का गाया "मेरे जीवन साथी प्यार किये जा"। जी हाँ, बक्शी साहब नें केवल फ़िल्मों के शीर्षकों को बेहद बुद्धिमत्ता और ख़ूबसूरती के साथ एक दूसरे से जोड़ते हुए पूरा गीत लिख डाला है और क्या कमाल का लिखा है! एक शीर्षक से दूसरे शीर्षक, दूसरे से तीसरे पर, कितनी सुंदरता से अवतरण हुआ है। और इस शृंखला के मुताबिक इस गीत में हँसी आप सुनेंगे अनुराधा पौडवाल की। वैसे तो पूरा गीत एस.पी साहब नें ही गाया है, लेकिन बीच बीच में कुछ शीर्षक अनुराधा नें भी कही हैं और मुख्यत: उनकी हँसी ही गीत में उनका योगदान है। इस फ़िल्म के बाकी गीतों में गायिका के तौर पर लता जी की आवाज़ ली गई है, बस एक इस गीत मे अनुराधा की आवाज़ ली गई है। इसके पीछे कारण तो यही लगता है कि इसमें एक कम उम्र की चुलबुली लड़की की आवाज़ चाहिए होगी, और गीत का अंदाज़ ज़रा मॉडर्ण भी है, इसलिए शायद लता जी नें परहेज़ किया होगा। ख़ैर, ये सब अनुमान मात्र ही है। हक़ीक़त यह है कि फ़िल्म के अन्य गीतों की तरह इस गीत की भी अपनी अलग पहचान है, अपना अलग वजूद है।

दोस्तों, आइए इस गीत के पूरे बोल यहाँ पर लिखें, और ज़रा हिसाब लगा कर देखें कि कुल कितने फ़िल्मों के नाम इस गीत में आये हैं। चलिए शुरु करते हैं - मेरे जीवन साथी, प्यार किये जा, जवानी-दीवानी, ख़ूबसूरत, ज़िद्दी, पड़ोसन, सत्यम शिवम सुंदरम। झूठा कहीं का, हरे रामा हरे कृष्णा, ४२० (श्री ४२०), आवारा, दिल ही तो है, आशिक़ हूँ बहारों का, तेरे मेरे सपने, तेरे घर के सामने, आमने-सामने, शादी के बाद, ओ बाप रे (बाप रे बाप), हमारे-तुम्हारे, मुन्ना (मेरा मुन्ना), गुड्डी, टीकू, मिली, शिन शिना की बबला बू, खेल खेल में, शोर, जॉनी मेरा नाम, चोरी मेरा काम, राम और श्याम, बंडलबाज़, लड़की, मिलन, गीत गाता चल, प्यार का मौसम, बेशरम। नॉटी बॉय, इश्क़ इश्क़ इश्क़, ब्लफ़ मास्टर, ये रास्ते हैं प्यार के, चलते चलते, मेरे हमसफ़र, दिल तेरा दीवाना, दीवाना-मस्ताना, छलिया, अंजाना, आशिक़, बेगाना, लोफ़र, अनाड़ी, बढ़ती का नाम दाढ़ी, चलती का नाम गाड़ी, जब प्यार किसी से होता है, सनम, जब याद किसी की आती है, जानेमन, बंधन, कंगन, चंदन, झूला, दिल दिया दर्द लिया, झनक झनक पायल बाजे, छम छमा छम, गीत गाया पत्थरों नें, सरगम। हाँ तो दोस्तों, कितने नाम हुए। कहीं मुझसे कोई नाम छूट तो नहीं गया? या कोई ग़लत नाम तो नहीं लिख गया? चलिए इसकी गिनती तो मैं आप पर ही छोड़ता हूँ, मैं तो लगा इस गीत को सुनने। फ़िल्म में संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का है।



क्या आप जानते हैं...
कि गायक एस. पी. बाल्सुब्रह्मण्यम को 'एक दूजे के लिये' फ़िल्म में गायन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 09/शृंखला 16
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.
सवाल १ - किस गायिका की हँसी है इस गीत में - २ अंक
सवाल २ - फिल्म की नायिका कौन है - ३ अंक
सवाल ३ - गीतकार बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अविनाश जी आपने शुक्रवार को जो जवाब दिया उसके जवाब सब पहले से आ चुके थे आपको नहीं दिखे क्योंकि ब्लोग्गर में कुछ गडबड के चलते वो सब डिलीट हो गए थे, खैर स्वागत है आपका, बात तो तब बने जब आप अमित जी और अनजाना जी को कुछ टक्कर दे सकें, हम कब से चाह रहे हैं कि इनके मुकाबले में कोई तो आये :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, January 27, 2011

भूली बिसरी एक कहानी....इच्छाधारी नागिन का बदला भी बना संगीत से सना

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 580/2010/280

मस्कार! दोस्तों, आज हम आ पहुँचे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इन दिनों चल रही लघु शृंखला 'मानो या ना मानो' की अंतिम कड़ी पर। अब तक इस शृंखला में हमने भूत-प्रेत, आत्मा और पुनर्जनम की बातें की, जो थोड़े सीरियस भी थे, थोड़े मज़ाकिया भी, थोड़े वैज्ञानिक भी थे, और थोड़े बकवास भी। आज का अंक हम समर्पित करते हैं एक और रहस्यमय विषय पर, जिसे विज्ञान में 'Cryptozoology' कहा जाता है, यानी कि ऐसा जीव विज्ञान जो ऐसे जीवों पर शोध करता है जिनके वजूद को लेकर भी संशय है। 'क्रिप्टिड' उस जीव को कहते हैं जिसका अस्तित्व अभी प्रमाणित नहीं हुआ है। सदियों से बहुत सारे क्रिप्टिड्स के देखे जाने की कहानियाँ मशहूर है, जिनकी अभी तक वैज्ञानिक प्रामाणिकता नहीं मिल पायी है। तीन जो सब से प्रचलित क्रिप्टिड्स हैं, उनके नाम हैं बिगफ़ूट (Bigfoot), लोचनेस मॊन्स्टर (Lochness Monster), और वीयरवूल्व्स (Werewolves)। बिगफ़ूट को पहली बार १९-वीं शताब्दी में देखे जाने की बात सुनी जाती है। इस जीव की उच्चता और चौड़ाई ८ फ़ीट की होती है और पूरे शरीर पर मिट्टी के रंग वाले बाल होते हैं। इसे पैसिफ़िक उत्तर-पश्चिमी अमेरिका में देखे जाने की बात कही जाती है। बिगफ़ूट को लेकर कई धारणाएँ प्रचलित है, जिनमें से एक धारणा यह मानती है कि बिगफ़ूट एक जानवर और नीयण्डर्थल युग के मानव के बीच यौन संबंध से पैदा हुआ है आज से करीब २८००० साल पहले। बहुत से शोधार्थी अपनी पूरी पूरी ज़िंदगी लगा देते हैं बिगफ़ूट की खोज में। संसार के रहस्यों में बिगफ़ूट एक महत्वपूर्ण रहस्य है आज भी। लोचनेस मॊन्स्टर भी एक मशहूर क्रिप्टिड है जिसे पहली बार १९३० के दशक में स्कॊटलैण्ड में देखे जाने की बात कही जाती है। इसे नेसी भी कहते हैं जिसका शरीर पतला, रबर की तरह है, चमड़े का रंग काले और ग्रे के बीच का है, लम्बाई करीब २० फ़ीट की है। नेसी का शरीर सर्पीला है, एक सामुद्रिक दैत्य की तरह, और जिसका सर घोड़े के सर की तरह है। नेसी का स्कॊटलैण्ड के ताज़े-पानी के झीलों में पाये जाने की बात कही जाती है। नेसी के अस्तित्व को लेकर अभी विवाद है, लेकिन क्रिप्टोज़ूलोगिस्ट्स इसकी खोज में अब भी उतने ही उत्सुक रहते हैं जितने आज से ९० साल पहले रहते थे। वीयरवूल्व्स एक तरह का भेड़िया है जो आदमी से परिवर्तित होकर बना है। दूसरे शब्दों में, वीयरवूल्व्स वो इंसान हैं जिनमें शक्ति होती है अपने आप को भेड़िये में बदल डालने की। हालाँकि इस तरह की बातें पौराणिक कहानियों को ही शोभा देती है, लेकिन यह भी सच है कि वीयरवूल्व्स क्रिप्टोज़ूलोजी का एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा है लम्बे अरसे से।

जहाँ तक भारत और क्रिप्टोपिड्स का सम्बम्ध है, हिमालय की बर्फ़ीली पहाड़ियों में येती नामक जानवर के देखे जाने की बात सुनी जाती है। यह एक विशालकाय जीव है सफ़ेद रंग और बालों वाला, जिसकी उच्चता ६ फ़ीट के आसपास बतायी जाती है। कई पर्बत आरोही येती को देखने का दावा भी करते हैं, लेकिन वैज्ञानिकों का यह मानना है कि बर्फ़ीली पहाड़ियों में सूरज की रोशनी से इतनी चमक पैदा होती है कि कभी कभी आँखें भी धोखा खा जाती है। बर्फ़ से पहाड़ों पर ऐसी आकृतियाँ बन जाती हैं जो किसी विशालकाय दैत्य का आभास कराती हैं। अर्थात! येती बस इंसानी दिमाग का भ्रम है और कुछ नहीं। एक और देसी क्रिप्टिड है इच्छाधारी नागिन, जिसको लेकर हमारे देश में कहानियों की कोई कमी नहीं है। सदियों से इच्छाधारी नाग नागिनों की कथाएँ प्रचलित हैं जो हमारी फ़िल्मों में भी प्रवेश कर चुका है बहुत पहले से ही। सांपों पर बहुत सारे फ़िल्म बने हैं, जिनमें से कुछ इच्छाधारी नागिन के भी हैं। रीना रॊय - जीतेन्द्र अभिनीत मल्टिस्टरर फ़िल्म 'नागिन' तो आपको याद ही होगी जिसमें मशहूर गाना था "तेरे संग प्यार मैं नहीं तोड़ना"। ८० के दशक में श्रीदेवी - ऋषी कपूर अभिनीत फ़िल्म 'नगीना' तो जैसे एक ट्रेण्डसेटर फ़िल्म साबित हुई थी। इस फ़िल्म ने पहले के सभी सांपों पर बनने वाली फ़िल्मों का रेकॊर्ड तोड़ दिया था। इसलिए आज के इस अंक को हम समर्पित करते हैं इच्छाधारी नागिन के नाम, और सुनवाते हैं अनुराधा पौडवाल की आवाज़ में आनंद बक्शी का लिखा और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का स्वरबद्ध किया गीत "भूली बिसरी एक कहानी, फिर आयी एक याद पुरानी"। और इसी के साथ हमें इजाज़त दीजिए 'मानो या ना मानो' लघु शृंखला को समाप्त करने की। चलते चलते बस इतना ही कहेंगे कि आप किसी भी बात पर यकीन तो कीजिए, लेकिन अपनी बुद्धि और विज्ञान से पूरी तरह विवेचना करने के बाद ही। इस शृंखला के बारे में अपने विचार oig@hindyugm.com के पते पर हमें अवश्य लिख भेजिएगा, हम आपके ईमेल को 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' में शामिल करने की कोशिश करेंगे। तो बस अब इजाज़त दीजिए, मिलते हैं शनिवार की शाम 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' में, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि फ़िल्म 'नगीना' का शीर्षक गीत "मैं तेरी दुश्मन" पहले अनुराधा पौडवाल से ही रेकॊर्ड करवाया गया था, लेकिन बाद में लता मंगेशकर से डब करवा लिया गया। इस बात को लेकर अनुराधा पौडवाल ने एक इंटरव्यु में अफ़सोस भी जताया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 01/शृंखला 09
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - गायिका हैं सुर्रैया.

सवाल १ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - संगीतकार बताएं - 1 अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी दो बैक तो बैक शृंखला में विजयी हुए हैं, बधाई जनाब....नयी शृंखला के लिए शुभकामनाएँ

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, December 30, 2010

तू मेरा जानूँ है तू मेरा हीरो है.....८० के दशक का एक और सुमधुर युगल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 560/2010/260

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! देखिए, गुज़रे ज़माने के सुमधुर गीतों को सुनते और गुनगुनाते हुए हम आ पहुँचे हैं इस साल २०१० के 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की अंतिम कड़ी पर। आज ३० दिसंबर, यानी इस साल का आख़िरी 'ओल्ड इज़ गोल्ड'। जैसा कि इन दिनों आप इस स्तंभ में सुन और पढ़ रहे हैं फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की कुछ सदाबहार युगल गीतों से सजी लघु शृंखला 'एक मैं और एक तू', आज ८० के दशक के ही एक और लैण्डमार्क डुएट के साथ हम समापन कर रहे हैं इस शृंखला का। यह वह गीत है दोस्तों जिसने लता और आशा के बाद की पीढ़ी के पार्श्वगायिकाओं का द्वार खोल दिया था। इस नयी पीढ़ी से हमारा मतलब है अनुराधा पौड़वाल, अल्का याज्ञ्निक, साधना सरगम और कविता कृष्णमूर्ती। आज हम चुन लाये हैं अनुराधा और मनहर उधास की आवाज़ों में १९८३ की फ़िल्म 'हीरो' का गीत "तू मेरा जानू है... मेरी प्रेम कहानी का तू हीरो है"। युं तो इस गीत से पहले भी अनुराधा ने कुछ गीत गाये थे, लेकिन इस गीत ने उन्हें पहली बार अपार सफलता दी जिसके बाद उन्हें पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। 'एक दूजे के लिए' ही की तरह 'हीरो' भी एक कामयाब युवा फ़िल्म है, और इस फ़िल्म के ज़रिए जैकी श्रॊफ़ और मीनाक्षी शेषाद्री ने फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखा था। 'हीरो' के गीतों की अपार कामयाबी ने एक बार फिर साबित किया कि ८० के दशक में भी एल.पी का संगीत उतना ही पुरअसर है जितना पिछले दो दशकों में था "निंदिया से जागी बहार" की शास्त्रीयता से भरी सुमधुर धुन, रेशमा की आवाज़ में कलेजे को चीर कर रख देने वाली "लम्बी जुदाई", लता-मनहर का गाया "प्यार करने वाले कभी डरते नहीं", तथा अनुराधा-मनहर के गाये दो गीत - "तू मेरा जानू है" और "डिंग डॊंग" जैसे गीतों के लिए एल. पी को बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।

दोस्तों, आज पहली बार 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर अनुराधा और मनहर की आवाज़ें गूंज रही है। ऐसे में आइए आज अनुराधा पौडवाल द्वारा प्रस्तुत 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम का एक अंश पढ़ते हैं जिसमें वो बता रही हैं कि फ़िल्म जगत में उनका पदार्पण किस तरह से हुआ था। विविध भारती के सौजन्य से यह रहा वह अंश - "फ़ौजी भाइयों को मेरा संगीतमय नमस्कर! आज यह अवसर आप से बातें करने का, अपने गानें सुनाने का मिला है उसे मैं शिव जी का प्रसाद कहूँ तो सही होगा। जैसा कि बहुत से सुनने वाले शायद जानते हैं कि मेरे शोहर, श्री अरुण पौडवाल एक ज़माने में एस. डी. बर्मन के ऐसिस्टैण्ट भी रहे। बात युं हुई कि 'अभिमान' फ़िल्म का 'बैकग्राउण्ड म्युज़िक' रेकॊर्ड किया जा रहा था। सोच विचार हो रहा था कि एक 'पर्टिकुलर सिचुएशन' में कौन सा श्लोक रखा जाए। दादा ने अरुण से कहा कि तुम महाराष्ट्रियन हो और तुम्हारे घरों में बड़े बुज़ुर्ग बहुत अच्छे अच्छे श्लोक रिसाइट करते हैं। तो कल कोई श्लोक घर से लेके आना। मेरी क़िस्मत को मंज़ूर था और ईश्वर की कृपा मुझ पर होनी थी कि अरुण जी के मन में यह ख़याल आया कि क्यों ना यह श्लोक अनुराधा से, यानी मुझसे अपने टेप रेकोर्डर पे घर से ही रेकोर्ड करके ले जाऊँ! दादा ने श्लोक सुना और मेरे लिये प्लेबैक की दुनिया के दरवाजे खुल गये। उन्होंने श्लोक सुनते ही पूछा, 'कौन है ये?' दादा ने कहा कि शायद मैंने ऐसी ही आवाज़ में ऐसा ही श्लोक सोचा था जो बरबस तुम मेरे सामने ले आये। अरुण जी से कहा, अभी बुलाओ इस आवाज़ को। जब अरुण ने कहा कि यह आवाज़ अनुराधा की है, मेरी वाइफ़ की है, तो दादा और भी ख़ुश हुए। और शिव जी का प्रसाद मुझे ऐसा मिला कि दिन-ओ-दिन आप लोगों का प्यार और सुनने वालों की चाहत आज मुझे यहाँ तक ले आई है।" हाँ तो दोस्तों, ये थी अनुराधा जी के शब्द जो रेकॊर्ड हुए थे १९८७ में विविध भारती के स्टुडिओ में। और अब फ़िल्म 'हीरो' का वही हिट गीत जिसे शायद आपने कुछ दिनों से नहीं सुना होगा, लीजिए ८० के दशक की यादें फिर एक बार ताज़ा कर लीजिए इस गीत के माध्यम से। और इसी के साथ 'एक मैं और एक तू' शृंखला सम्पन्न होती है। हमें उम्मीद है कि ३० के दशक से लेकर ८० के दशक के ये १० युगल गीत आपको पसंद आये होंगे। आप अपने विचार और सुझाव हमारे ईमेल पते oig@hindyugm.com पर अवश्य लिख भेजिएगा। हमें इंतज़ार रहेगा। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की अगली कड़ी अब अगले साल ही पेश होगी। अरे अरे घबराइए नहीं, अगले साल, यानी कि इसी रविवार, २ जनवरी की शाम को। नये साल की ढेरों हार्दिक शुभकामनाओं के साथ अब हमें इजाज़त दीजिए, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि अनुराधा पौडवाल ने अपना पहला फ़िल्मी एकल गीत गाया था संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत निर्देशन में, हेमा मालिनी - शशि कपूर अभिनीत फ़िल्म 'आप बीती' में।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 01/शृंखला 07
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - खुद संगीतकार है इस युगल गीत में गायक.

सवाल १ - किस संगीतकार की बात है यहाँ - १ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी को बधाई हमारी ७ वीं शृंखला में वो विजेता हुए हैं. अमित जी कल तो आपका अंदाजा गलत हो गया..खैर कोई बात नहीं, नयी शृंखला के लिए सभी को शुभकामनाएँ

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, December 23, 2009

ज़िंदगी मेरे घर आना...फ़ाकिर के बोलों पर सुर मिला रहे हैं भूपिन्दर और अनुराधा..संगीत है जयदेव का

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #६३

ज की महफ़िल में हम हाज़िर हैं शामिख जी की पसंद की अंतिम नज़्म लेकर। इस नज़्म को जिन दो फ़नकारों ने अपनी आवाज़ से मुकम्मल किया है उनमें से एक के बारे में महफ़िल-ए-गज़ल पर अच्छी खासी सामग्री मौजूद है, इसलिए आज हम उनकी बात नहीं करेंगे। हम ज़िक्र करेंगे उस दूसरे फ़नकार या यूँ कहिए फ़नकारा और इस नज़्म के नगमानिगार का, जिनकी बातें अभी तक कम हीं हुई हैं। यह अलग बात है कि हम आज की महफ़िल इन दोनों के सुपूर्द करने जा रहे हैं, लेकिन पहले फ़नकार का नाम बता देना हमारा फ़र्ज़ और जान लेना आपका अधिकार बनता है। तो हाँ, इस नज़्म में जिसने अपनी आवाज़ की मिश्री घोली है, उस फ़नकार का नाम है "भूपिन्दर सिंह"। "आवाज़" पर इनकी आवाज़ न जाने कितनी बार गूँजी है। अब हम बात करते हैं उस फ़नकारा की, जिसने अपनी गायिकी की शुरूआत फिल्म "अभिमान" से की थी जया बच्चन के लिए एक श्लोक गाकर। आगे चलकर १९७६ में उन्हें फिल्म कालिचरण के लिए गाने का मौका मिला। पहला एकल उन्होंने "लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल" के लिए "आपबीती" में गाया। फिर राजेश रोशन के लिए "देश-परदेश" में, जयदेव के लिए "लैला-मजनूं" और "दूरियाँ"(जिस फिल्म से आज की नज़्म है) में, कल्याण जी-आनंद जी के लिए "कलाकार" और "विधाता" में और उषा खन्ना के लिए "सौतन" और "साजन बिना सुहागन" में गाकर उन्होंने अपनी प्रसिद्धि में इजाफ़ा किया। आगे चलकर जब उन्होंने लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के लिए "हीरो" , "मेरी जंग", "बंटवारा", "नागिन", "राम-लखन" और "तेजाब" में गाने गाए तो मानो उन्हें उनकी सही पहचान मिल गई। उन्हें "लता मंगेशकर" और "आशा भोंसले" के विकल्प के रूप में देखा जाने लगा और यही उनके लिए घाटे का सौदा साबित हुआ। "मंगेशकर" बहनों के खिलाफ उनकी मुहिम उनके लिए गले का घेघ बन गई। और उसी दौरान गुलशन कुमार से उनकी नजदीकी और उनके पति अरूण पौडवाल(एस डी बर्मन के सहायक) की मौत और फिर आगे चलकर गुलशन कुमार की मौत का उनकी ज़िंदगी और उनकी गायिकी पर गहरा असर पड़ा। सारी घटनाएँ एक के बाद एक ऐसे होती गईं कि उन्हें संभलने का मौका भी न मिला। उनके इस हाल के जिम्मेवार वे खुद भी थीं। उनका यह निर्णय कि वो बस टी-सीरिज के लिए हीं गाएँगी..शुरू-शुरू में सबको रास आता रहा, लेकिन आगे चलकर इसी निर्णय ने उन्हें अच्छे संगीतकारों से दूर कर दिया। उन्होंने चाहे जैसे भी दिन देखे हों लेकिन उनकी बदौलत हिन्दी फिल्म उद्योग को कई सारे नए गायक मिले..जैसे कि सोनू निगम, कुमार शानू, उदित नारायण और अभिजीत। उन्होंने दक्षिण के भी कई सारे गायकों के साथ बेहतरीन गाने गाए हैं जिनमें से एस पी और यशुदास का नाम खासा ऊपर आता है। वह फ़नकार जो कि अनुराधा पौडवाल के नाम से जानी जाती है, भले आज कम सुनी जाती हो लेकिन उनकी आवाज़ की खनक आज भी वादियों में मौजूद है जो कभी-कभार किसी नए गाने में घुलकर हमारे पास पहुँच हीं जाती है।

अनुराधा जी के बारे में इतनी बातें करने के बाद अब वक्त है आज के नगमानिगार से रूबरू होने का। तो आज की नज़्म के रचयिता कोई और नहीं बल्कि जगजीत सिंह जी के खासमखास "सुदर्शन फ़ाकिर" जी हैं। वो क्या थे, यह उनके किसी अपने के लफ़्ज़ों में हीं जानते हैं(प्रस्तुति: वीणा विज): १८ फरवरी ‘०८ की रात के आग़ोश में उन्होंने हमेशा के लिए पनाह ले ली |वो सोच जो ज़िन्दग़ी, इश्क , दर्दो-ग़म को इक अलग नज़रिये से ग़ज़लों के माध्यम से पेश करती थी, वह सोच सदा के लिये सो गई |बेग़म अख़्तर की गाई हुई इनकी यह ग़ज़ल” इश्क में ग़ैरते जज़्बात ने रोने न दिया”–किस के दिल को नहीं छू गई? या फिर “यह दौलत भी ले लो, यह शौहरत भी ले लो|भले छीनलो मुझसे मेरी जवानी, मग़र मुझको लौटा दो वो बचपन का सावन वो क़ाग़ज़ की कश्ती वो बारिश का पानी” –जन-जन को इस क़लाम ने बचपन की यादों से सरोबार कर दिया |इनके काँलेज के साथी जगजीत सिह ने जब इनकी यह नज्म गाई, तो दोनों ही इससे मशहूर हो गए |सालों से सुनते आ रहे, गणतंत्र दिवस पर एन. सी. सी.के बैंड की धुन” हम सब भारतीय हैं” यह भी फ़ाक़िर की रचना है |इससे पूर्व जवानी में फ़ाकिर आल इंडिया रेडियो जलंधर पर ड्रामा एवम ग़ज़लों के साथ व्यस्त रहे |फिर जब एक बार मुम्बई की ओर रुख़ किया तो ये एच.एम वी के साथ ता उम्र के लिए जुड़ गए |बेग़म अख़्तर ने जब कहा कि अब मैं फ़ाक़िर को ही गाऊंगी,तो होनी को क्या कहें, वे इनकी सिर्फ़ पाँच ग़ज़लों को ही अपनी आवाज़ दे सकीं थीं कि वे इस जहान से चलता कर गईं |हृदय से बेहद जज़्बाती फ़ाकिर अपनी अनख़, अपने आत्म सम्मान को बनाए रखने के कारण कभी किसी से काम माँगने नहीं गए | वैसे उन्होंने फिल्म ‘दूरियाँ, प्रेम अगन और यलग़ार” के संवाद और गीत लिखे थे | ये काफ़ी लोकप्रिय भी हुए थे |हर हिन्दू की पसंद कैसेट’ हे राम’ भी फ़ाक़िर की रचना है |इसने तो इन्हें अमर कर दिया है |संयोग ही कहिए कि जिस शव-यान में इनकी शव-यात्रा हो रही थी , उसमें भी यही ‘हे राम’ की धुन बज रही थी |सादगी से जीवन बिताते हुए वे जाम का सहारा लेकर अपने दर्दो-ग़म को एक नया जामा पहनाते रहे | जलंधर आने पर जब भी हम इकठे बैठते तो वे अपने कलाम को छपवाने की चर्चा करते या फिर मेरी रचनाओं को पढ़कर मुझे गाईड करते थे | रिश्ते में सालेहार थी मैं उनकी ,सो कभी हँसी-मज़ाक भी हो जाता था | तेहत्तर वर्ष कि उम्र में भी वे मस्त थे |लेकिन दुनिया से अलग- थलग, इक ख़ामोशी से चेहरा ढ़ाँके हुए |फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ फ़ाकिर को बहुत बड़ा शायर मानते थे |

अब उनके बारे में कुछ उन्हीं के शब्दों में: खुद के बारे में क्या कहूं? फिरोजपुर के नजदीकी एक गांव में पैदा हुआ। पिताजी एम.बी.बी.एस. डाक्टर थे। जालंधर के दोआबा कालेज से मैंने पॉलिटिकल साइंस में १९६५ में एम.ए. किया। आल इंडिया रेडियो जालंधर में बतौर स्टाफ आर्टिस्ट नौकरी मिल गई। खूब प्रोग्राम तैयार किए। 'गीतों भरी कहानी' का कांसेप्ट मैंने शुरू किया था। लेकिन रेडियो की नौकरी में मन नहीं रमा। सब कुछ बड़ा ऊबाऊ और बोरियत भरा। १९७० में मुंबई भाग गया।' 'मुंबई में मुझे एच.एम.वी. कंपनी के एक बड़े अधिकारी ने बेगम अख्तर से मिलवाया। वे 'सी ग्रीन साउथ' होटल में ठहरी हुई थीं। मशहूर संगीतकार मदनमोहन भी उनके पास बैठे हुए थे। बेगम अख्तर ने बड़े अदब से मुझे कमरे में बिठाया। बोलीं, 'अरे तुम तो बहुत छोटे हो। मुंबई में कैसे रहोगे? यह तो बहुत बुरा शहर है। यहां के लोग राइटर को फुटपाथ पर बैठे देखकर खुश होते है।'' 'जब मैं बेगम अख्तर से मिला तो मेरी उम्र २४ साल थी, लेकिन उन्होंने मेरी हौंसला-अफजाई की। मैंने उनके लिए पहली गजल लिखी, 'कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया' बेगम साहब बेहद खुश हुई। १९७० से १९७४ तक मेरी लिखी कुल छह गजलें एच.एम.वी. कंपनी ने बेगम अख्तर की आवाज में रिकार्ड कीं। मुझे याद है कि उन्होंने मेरी शायरी में कभी कोई तरमीम नहीं की। यह मेरे लिए फक्र की बात थी। एक बात और जो मैं कभी नहीं भूलता। वह कहा करती थीं, फाकिर मेरी आवाज और तुम्हारे शेरों का रिश्ता टूटना नहीं चाहिए।' फाकिर का क्या अर्थ है, पूछने पर उन्होंने कहा 'यह फारसी का लफ्ज है, जिसके मायने हिंदी में चिंतक और अंग्रेजी में थिंकर है।' 'मेरा एक गीत 'जिंदगी, जिंदगी, मेरे घर आना, आना जिंदगी। मेरे घर का इतना सा पता है..' इसे भूपेन्द्र ने गाया था। इस गीत के लिए मुझे 'बेस्ट फिल्म फेयर अवार्ड मिला था।'' कम हीं लोगों को यह मालूम होगा कि प्रख्यात गजल गायक जगजीत सिंह, जाने-माने लेखक, नया ज्ञानोदय के संपादक रवीन्द्र कालिया और सुदर्शन फाकिर छठे दशक में जालन्धर के डीएवी कालेज के छात्र थे। तीनों में घनिष्ठ मित्रता थी और अपने-अपने इदारों में तरक्की के शिखर छूने के लिए उन्होंने अथक परिश्रम किया। आगे चलकर तीनों हीं सेलिब्रिटीज बने। फ़ाकिर के बारे में कहने को और भी बहुत कुछ है..लेकिन वो सब कभी बाद में। अभी तो उनके इस शेर का लुत्फ़ उठाना ज्यादा मुनासिब जान पड़ता है:

इश्क़ का ज़हर पी लिया "फ़ाकिर"
अब मसीहा भी क्या दवा देगा


वाह! क्या बात कही है "फ़ाकिर" ने। इश्क़ को ऐसे हीं नहीं लाईलाज कहते हैं।

इस शेर के बाद अब हम रूख करते हैं फिल्म "दूरियाँ" के इस नज़्म की ओर.....जिसे संगीत से सजाया ने जयदेव ने। यह नज़्म इश्क़ के नाजुक लम्हों को बयां करती है, उन्हें जीती है और हर सुनने वाले के दिल में उस कोमल भावना की घुसपैठ कराती है। यकीन नहीं आता तो आप खुद हीं सुनकर देख लें..फिर नहीं कहिएगा कि "कुछ कुछ" क्यों होता है:

भू: ज़िंदगी ज़िंदगी मेरे घर आना- आना ज़िंदगी
ज़िंदगी मेरे घर आना- आना ज़िंदगी
अ: ज़िंदगी ज़िंदगी मेरे घर आना- आना ज़िंदगी
ज़िंदगी मेरे घर आना- आना ज़िंदगी

भू: मेरे घर का सीधा सा इतना पता है
ये घर जो है चारों तरफ़ से खुला है
न दस्तक ज़रूरी, ना आवाज़ देना
मेरे घर का दरवाज़ा कोई नहीं है
हैं दीवारें गुम और छत भी नहीं है
बड़ी धूप है दोस्त
खड़ी धूप है दोस्त
तेरे आंचल का साया चुरा के जीना है जीना
जीना ज़िंदगी, ज़िंदगी

अ: मेरे घर का सीधा सा इतना पता है
मेरे घर के आगे मुहब्बत लिखा है
न _____ ज़रूरी, न आवाज़ देना
मैं सांसों की रफ़्तार से जान लूंगी
हवाओं की खुशबू से पहचान लूंगी
तेरा फूल हूँ दोस्त
तेरी भूल हूँ दोस्त
तेरे हाथों में चेहरा छुपा के जीना है जीना
जीना ज़िंदगी, ज़िंदगी

मगर अब जो आना तो धीरे से आना
यहाँ एक शहज़ादी सोई हुई है
ये परियों के सपनों में खोई हुई है
बड़ी ख़ूब है ये, तेरा रूप है ये
तेरे आँगन में तेरे दामन में
तेरी आँखों पे तेरी पलकों पे
तेरे कदमों में इसको बिठाके
जीना है, जीना है
जीना ज़िंदगी, ज़िंदगी




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "लगावट" और शेर कुछ यूं था -

कुछ उसके दिल में लगावट जरूर थी वरना
वो मेरा हाथ दबाकर गुजर गया कैसे

इस शब्द की सबसे पहले पहचान की शरद जी ने। आपने यह स्वरचित शेर भी पेश किया:

ये लगावट नहीं तो फिर क्या है
क़त्ल करके मुझे वो रोने लगा।

शरद जी के बाद महफ़िल की शोभा बनीं सीमा जी। पिछली महफ़िल में कहाँ थे आप दोनों? अब आ गए हैं तो जाईयेगा मत। नज़र-ए-करम बरकरार रखिएगा। ये रही आपकी पेशकश:

करे है क़त्ल लगावट में तेरा रो देना
तेरी तरह कोई तेग़-ए-निगाह को आब तो दे (ग़ालिब)

मस्ती में लगावट से उस आंख का ये कहना
मैख्‍़वार की नीयत हूँ मुमकिन है बदल जाना (फ़िराक़ गोरखपुरी)

शामिख जी..आपकी फरमाईशों को पूरा करना तो हमारा फ़र्ज़ है। आप इतना भी शुक्रगुजार मत हो जाया करें :) आप जो भी शेर ढूँढकर लाते हैं वे कमाल के होते हैं..बस यह मालूम नहीं चलता कि शायरों को कहाँ भूल जाते हैं। हर शायर "अंजान" हीं क्यों होता है? :) ये रहे आपके शेर:

नतीजा लगावट का जाने क्या निकले
मोहब्बत में वो आजमा कर चले (अंजान)

छूटती मैके की सरहद माँ गुजर जाने के बाद
अब नहीं आता संदेसा मान मनुहारों भरा
खत्म रिश्तों की लगावट माँ गुजर जाने के बाद (अंजान)

और अंत में महफ़िल में नज़र आईं मंजु जी। आप एक काम करेंगी? जरा यह मालूम तो करें कि हमारे बाकी साथी कहाँ सोए हुए हैं। तब तक हम आपके स्वरचित शेर का लुत्फ़ उठाते हैं:

उनकी लगावट से साँसे चल रहीं ,
नहीं तो कब के मर गये होते।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, November 4, 2008

केरवा जे फरेला घवद से : सुनिए छठ के अवसर पर ये लोक गीत

आज छठ पर्व है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक श्रृद्धालु डूबते सूरज को अर्घ्य दे चुके होंगे और कल भोर में दूसरा अर्घ्य उगते सूरज को दिया जाएगा। छठ का नाम बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे पावन पर्वों में शुमार होता है। विश्व में जहाँ कहीं भी इन प्रदेशों के लोग गए हैं वो अपने साथ इसकी परंपराओं को ले कर गए हैं। छठ जिस धार्मिक उत्साह और श्रृद्धा से मनाया जाता है इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि जब तीन चौथाई पुलिसवालों के छुट्टी पर रहते हुए भी बिहार जैसे राज्य में इस दौरान आपराधिक गतिविधियाँ सबसे कम हो जाती हैं।

अब छठ की बात हो और छठ के गीतों का जिक्र ना आए ये कैसे हो सकता है। बचपन से मुझे इन गीतों की लय ने खासा प्रभावित किया था। इन गीतों से जुड़ी एक रोचक बात ये है कि ये एक ही लए में गाए जाते हैं और सालों साल जब भी ये दिन आता है मुझे इस लय में छठ के गीतों को गुनगुनाने में बेहद आनंद आता है। यूँ तो शारदा सिन्हा ने छठ के तमाम गीत गा कर काफी प्रसिद्धि प्राप्त की है पर आज जिस छठ गीत की मैं चर्चा कर रहा हूँ उसे मैंने टीवी पर भोजपुरी लोक गीतों की गायिका देवी की आवाज में सुना था और इतने भावनात्मक अंदाज में उन्होंने इस गीत को गाया था कि मेरी आँखें भर आईं थीं।

इससे पहले कि ये गीत मैं आपको सुनाऊँ, इसकी पृष्ठभूमि से अवगत कराना आपको जरूरी होगा। छठ में सूर्य की अराधना के लिए जिन फलों का प्रयोग होता है उनमें केला और नारियल का प्रमुख स्थान है। नारियल और केले की पूरी घौद गुच्छा इस पर्व में प्रयुक्त होते हैं।

इस गीत में एक ऐसे ही तोते का जिक्र है जो केले के ऐसे ही एक गुच्छे के पास मंडरा रहा है। तोते को डराया जाता है कि अगर तुम इस पर चोंच मारोगे तो तुम्हारी शिकायत भगवान सूर्य से कर दी जाएगी जो तुम्हें नहीं माफ करेंगे। पर फिर भी तोता केले को जूठा कर देता है और सूर्य के कोप का भागी बनता है। पर उसकी भार्या सुगनी अब क्या करे बेचारी? कैसे सहे इस वियोग को ? अब तो ना देव या सूर्य कोई उसकी सहायता नहीं कर सकते आखिर पूजा की पवित्रता जो नष्ट की है उसने।

ये गीत थोड़ी बहुत फेर बदल के बाद सभी प्रमुख भोजपुरी गायकों द्वारा गाया गया है। पिछले साल मैंने इसे अपने चिट्ठे पर चढ़ाया था। आज छठ के गीत में छुपी भावनाओं को इस गीत के माध्यम से आवाज़ के सुधी श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।




केरवा जे फरेला घवद से
ओह पर सुगा मेड़राय


उ जे खबरी जनइबो अदिक (सूरज) से
सुगा देले जुठियाए


उ जे मरबो रे सुगवा धनुक से
सुगा गिरे मुरझाय


उ जे सुगनी जे रोए ले वियोग से
आदित होइ ना सहाय
देव होइ ना सहाय


अब देवी का गाया हुआ ये गीत तो मुझे नहीं मिल सका पर आप सब के लिए अनुराधा पोडवाल के स्वर में ये गीत प्रस्तुत है



Monday, November 3, 2008

छठ पर्व और शारदा सिंहा, कविता पौडवाल, अनुराधा पौडवाल, सुनील छैला बिहारी आदि के गाये गीत

भारत पर्व प्रधान देश है। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में इन दिनों छठ पूजा की धूम है। इस अवसर हम आपके लिए गीत-संगीत से सजा आलेख लेकर आये हैं। छठ गीत की पारम्परिक धुन इतनी मधुर है कि जिसे भोजपुरी बोली समझ में न भी आती हो तो भी गीत सुंदर लगता है। यही कारण है कि इस पारम्परिक धुन का इस्तेमाल सैकड़ों गीतों में हुआ है, जिसपर लिखे बोलों को बहुत से गायक और गायिकाओं ने अपनी आवाज़ दी है। आलेख की शुरूआत पहले हम इसी पारम्परिक धुन पर पद्मश्री शारदा सिंहा द्वारा गाये एक गीत 'ओ दीनानाथ' को सुना कर करना चाहेंगे। पद्मश्री शारदा सिंहा को बिहार की कोकिला भी कहा जाता है। यह मशहूर लोकगायिका विंध्यवासिनी देवी की शिष्या थीं।




सुख-समृद्धि और और सूर्य उपासना का पर्व है 'छठ'

सूर्य नमन
इस वर्ष ४ नवम्बर को मनाई जा रही सूर्य षष्ठी गायत्री साधको के लिए अनुदानों का अक्षय कोष है। गायत्री महामंत्र के अधिष्ठाता भगवन सूर्य प्रत्यक्ष देव हैं। सूर्य देव की आराधना एवं उपासना से शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शान्ति एवं अध्यात्मिक अनुदान-वरदान की उपलब्धि होती है। सूर्योपासना के लिए निर्धारित तिथि को सूर्यषष्ठी के रूप में जाना जाता है। कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि सूर्यषष्ठी कहलाती है। सूर्यषष्ठी व्रत मुख्यतः रोग मुक्ति, पुत्र प्राप्ति तथा दीर्घायु की कामना के लिए किया जाता है।
श्रद्धा एवं भावना के साथ किया गया छठ या सूर्यषष्ठी व्रत अत्यंत लाभदायक एवं फलदायक होता है। छठ शब्द का प्रादुर्भाव षष्ठी यानी षष्ठ से हुआ है। यह सूर्य उपासना की विशिष्ठ एवं खास तिथि है। सूर्योपासना को सूर्योपस्थान भी कहते हैं, इसमें सूर्य भगवान को भाव भरा अर्घ्य भी चढ़ाया जाता है। इस अर्घ्य दान में वैज्ञानिकता के साथ-साथ आध्यात्मिकता का गहन एवं गूढ़ रहस्य भी भरा पड़ा है, जिसका वेद, उपनिषदों एवं पुराणों में विस्तार से उल्लेख किया गया है।

शारदा सिंहा के स्वर में कुछ प्रसिद्ध छठ गीत

1. ओ दीनानाथ
2. उठअऽ सुरुज होइल बिहान
3. उगीहें सुरुज गोसैया हो
4. साम चकेबा खेलब
5. केलवा के पात पर
6. हे छठी मैया
7. हे गंगा मैया

वैदिक साहित्य में सूर्य देव की महिमा का भाव भरा गायन किया गया है। इनमें सर्वसुलभ सूर्य देव के सूक्ष्म एवं दिव्य आध्यात्मिक तुल्य का प्रतिपादन करते हुए सविता को सूर्य की आत्मा कहा गया है। गायत्री महामंत्र का सूर्य से गहरा तादातम्य है, इस तथ्य के पीछे तीन कारण है-
१-गायत्री महामंत्र का देवता सविता है।
२-सूर्योपासना सार्वभौमिक है।
३-सूर्य की उपासना-आराधना से होने वाला प्रभाव सर्वथा वैज्ञानिक एवं तथ्यपूर्ण है।

आर्ष साहित्य में इस तथ्य को प्रमाणितत करते हुए उल्लेख किया गया है। इस कथानक के अनुसार "गायत्री वरदां देवीं सावत्रीं वेदमातरम्", प्रजापति बोले, हे देवताओ! यह जो अनेक प्रकार के वरदान देने वाली गायत्री है उसे तुम सावित्री अर्थात सूर्य से उद्भाषित होने वाला ज्ञान जानो। इसके अतिरिक्त गोपथ ब्राह्मण ५/३ में तेजो वै गायत्री, के रूप में इसका निरूपण किया गया है। इसके अतिरिक्त ज्योतिर्वे गायत्री छंद साम् ज्योतिर्वे गायत्री, दविद्युतती वैगायत्री गायत्र्यैव भर्ग, तेजसा वेगायत्रीपथमं त्रिरात्रं दाधार पदै द्वितीयं त्र्यक्षरै स्तृतीयम् के रूप में सूर्य और गायत्री के सम्बन्ध को दर्शाया गया है। गायत्री मन्त्र के सवितुः पद में इसी एकात्मकता का संकेत है। गायत्री मन्त्र सविता देव से आपको एकात्म करने की गुह्य तकनीक है। गायत्री का देवता सविता सूर्य संसार के जीवन के ज्ञान-विज्ञान का केन्द्र है। यह अन्य समस्त देव शक्तियों का मुख्य केन्द्र भी है।
चारों वेदों में भी जो कुछ है वो सब भी सविता सूर्य शक्ति का विवेचन-विश्लेषण मात्र है। शतपथ ब्राहमण में असौ व आदित्यो देवः सविता, कहकर सूर्य की प्रतिष्ठा की गई है। भविष्योत्तर पुराण में कृष्ण और अर्जुन संवाद में सूर्य को त्रिदेवों के गुणों से विभूषित किया गया है। इस संवाद के अनुसार सूर्य उदयकाल में ब्रह्म, मध्याह्न काल में महेश और संध्या काल में विष्णु के रूप हैं।
अन्य शास्त्रों में सूर्य देव को इस तरह अलंकृत किया गया है, सूर्यो वै सर्वेषा देवानामात्मा अर्थात् सूर्य ही समस्त देवों की आत्मा है, सर्वदेवामय रविः अर्थात् सूर्य सर्वदेवमय है। मनुस्मृति का वचन है, सूर्य से वर्षा, वर्षा से अन्न और अन्न से प्रजा (प्राणी) का जन्म होता है। पौराणिक कथानकों के अनुसार सूर्य महर्षि कश्यप के पुत्र होने के कारण काश्यप कहलाये। उमका लोकावतरण महर्षि की पत्नी अदिति के गर्भ से हुआ था अतः उनका एक नाम आदित्य भी लोकविख्यात और प्रसिद्ध हुआ।
एक व्रती
उपनिषदों में आदित्य को ब्रह्मा के प्रतीक के रूप में दर्शाया गया है। छान्दोपनिषद् आदित्यो ब्रह्म कहता है तो तैत्तिरीयारण्यक असावादिव्यो ब्रह्म की उपमा देता है। अथर्ववेद की भी यही मान्यता है। इसके मतानुसार आदित्य ही ब्रह्म का साकार स्वरूप है। ऋग्वेद में सर्व्यापक ब्रह्म और सूर्य में समानता का स्पष्ट बोध होता है। यजुर्वेद सूर्य और भगवान में फर्क नहीं करता। कपिला तंत्र में, सूर्य को ब्रह्माण्ड में मूलभूत पंचतत्वों में से वायु का अधिपति घोषित किया गया है। हठ योग के अंतर्गत श्वास (वायु) को प्राण माना गया है। और सूर्य इन प्राणों का मूलाधार है। अतः आदित्यो वै प्राणः कहा गया है। योग साधना में प्रतिपादित मणि पूरक चक्र को सूर्य चक्र भी कहते हैं। हमारा नाभिकेंद्र (सूर्यचक्र) प्राणों का उद्गम स्थल ही नहीं, अपितु अचेतन मन के संस्कारों तथा चेतना का संप्रेषण केन्द्र भी है। सूर्यदेव इस चराचर जगत में प्राणों का प्रबल संचार करते हैं-"प्राणः प्रजानामुदयप्येषंषम सूर्यः"। सूर्य भगवान को मार्तंड भी कहते हैं, क्योंकि ये जगत को अपनी ऊष्मा और प्रकाश से ओत-प्रोत कर जीवन प्रदान करते हैं। सूर्यदेव कल्याण के उद्गम स्थान होने के कारण शम्भु भी कहलाते हैं। भक्तों का दुःख दूर करने अथवा जगत का संहार करने के कारण इन्हें त्वष्टा भी कहते हैं। किरण को धारण करने वाले सूर्यदेव अन्शुमान भी जाने जाते हैं। योग शास्त्र में पतंजलि उल्लेख करते हैं कि "भुवनज्ञानं सूर्य संयमात्" अर्थात् सूर्य के ध्यान एवं उपासना से समस्त संसार को ज्ञान प्राप्त हो जाता है।
बिहार के एक गाँव में पारम्परिक छठ-पर्व का दृश्य
सूर्य कालचक्र के महाप्रणेता हैं। सूर्य से ही दिन-रात्रि, मास, अयन एवं संवत्सर का निर्माण होता है। भारतीय संस्कृति में किसी वार का प्रारम्भ सूर्योदय से ही होता है। भारतीय सुर्योपासना के मूल में आध्यात्मिक लाभ के आलावा शारीरिक स्वास्थ्य एवं भौतिक लाभ का भाव निहित होता है। यह कई प्रकार के रोगों से रक्षा करता है। सूर्य की दिव्य किरणों में कुष्ठ तथ अन्य प्रकार के चर्म रोगों के किटाणुओं को नष्ट करने की अपार क्षमता एवं शक्ति सन्निहित है। इसी करण ऋग्वेद में कहा गया है " आदित्योऽसौजगप्स्याद् देवा विश्वस्य भुवनस्य गौपाः" अर्थात् सूर्य की किरणें सारे चराचर संसार की रक्षा करती हैं। ऋग्वेद में सूर्य की रश्मियों को हृदय रोग तथा पीलिया की चिकित्सा में लाभकारी बताया गया है। कुष्ठ रोग का शमन भी सूर्यदेव की कृपा से हो जाता है। श्री कृष्ण एवं जाबवंती के पुत्र सांब सूर्यदेव की उपासना से ही रोगमुक्त हुए थे। कृष्ण यजुर्वेदीय चाक्षुषोपनिषद् में सभी प्रकार के नेत्र रोगों से मुक्ति का उपाय सूर्य को बताया गया है।
तंत्र शास्त्र की मान्यता है कि नित्य सूर्य नमस्कार करने से सात पीढ़ियों से चली आ रही महा दरिद्रता दूर हो जाती है। सूर्य नमस्कार स्वयं में सूर्य आराधना भी है और स्वास्थ्य का व्यायाम भी। इसमें अनेक प्रकार की बीमारियों एवं विकृतियों का शमन होता है। इन्हीं कारणों से सूर्य को आरोग्य का देवता कहा गया है और उसकी किरणों को पवित्र, तेजस्वी एवं अक्षत माना गया है। सूर्य रश्मियाँ नदी की निर्मल धारा के सामान पावन हैं, जो अपने सानिध्य में आने वाले हर एक व्यक्ति को तेजस्विता, प्रखरता एवं पवित्रता से भर देती हैं। सूर्योपासना आरोग्य की रक्षा करने के आलावा अंतःकरण की चट्टानी मलिनता एवं कषाय-कलभषों को धोकर रख देती हैं। आरोग्य भास्करादिच्छेत् से स्वतः ही विदित होता है की सूर्य आरोग्य प्रदान करने वाले देवता है। यह आरोग्य केवल शरीर के धरातल तक ही सीमित नहीं है, वरन् मानसिक एवं आत्मिक स्तर पर प्रभाव छोड़ने में समर्थ एवं सक्षम है। अतः सूर्योपासना सभी रूपों में अनादिकाल से भारतवर्ष में ही नहीं, बल्कि समस्त विश्व के विभिन्न भागों में श्रद्धापूर्वक सूर्य की भक्ति की जाती रही है।

अनुराधा पौडवाल के स्वर में छठ गीत


यद्यपि कालचक्र के दुष्प्रभाव से वर्त्तमान समय में सूर्योपासना कि परम्परा का अत्यन्त ह्रास हो गया है, परन्तु फिर भी धर्म प्रधान भारतवर्ष में सनातन धर्मोजनता आज भी किसी न किसी रूप में सूर्य को देवता मानकर उनकी पूजा-आराधना करती है। इसी क्रम में सूर्यषष्ठी व्रत को मनाया जाता है। बिहार एवं झारखण्ड की जनता इस पावन तिथि को छठ पूजा के रूप में अत्यन्त श्रद्धा, उत्साह एवं उमंग के साथ मनाती है। वाराणसी एवं पूर्वांचल में इसे डालछठ कहा जाता है। कार्तिक शुल्क चतुर्थी के दिन नियम-स्नानादि से निवृत हो कर फलाहार किया जाता है। पंचमी में दिन भर उपवास करके किसी नदी या सरोवर में स्नान करके अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इसके पश्चात् अस्वाद भोजन किया जाता है। गायत्री महामंत्र का भाव भरा उच्चारण कर विविध पूजोपहार वस्तुओं से सूर्य अर्घ्यदान दिया जाता है। तथा मनोकामना की जाती है। छठ, पुत्र प्राप्ति की कामना को पूर्ति करता है। अतः इसका सम्बन्ध षष्ठी माता से जोड़ दिया गया है। षष्ठी देवी दुर्गा की ही प्रतिरूप हैं। इसीलिए छठ व्रत के अवसर पर सूर्यदेव और षष्ठी माता के प्रति समान भक्ति भावना के दर्शन होते हैं।
इस व्रत को सर्वप्रथम यवन मुनि की पुत्नी सुकन्या ने अपने जराजीर्ण अधिपति के आरोग्य के निमित्त किया था। व्रत के सफल अनुष्ठान के सुप्रभाव से ऋषि को नेत्र ज्योति प्राप्त हुई और वे जराजीर्ण वृद्ध से युवा हो गये। ऐसी मान्यता है कि आज भी गायत्री महामंत्र का जप करते हुए नियमपूर्वक १२ वर्षों तक जो भी यह व्रत करता है, उसकी इच्छित मनोकामना की पूर्ति होती है। सूर्य षष्ठी में गायत्री मन्त्र के जप एवं सुर्यध्यान करने से सहज ही आतंरिक चेतना परिष्कृत होती है, साथ ही पवित्रता, प्रखरता में अभिवृद्धि होती है।

लेखक- सिद्धार्थ शंकर (साभार 'साधना-पथः नवम्बर २००८ अंक)
प्रस्तुति- शैलेश भारतवासी
प्रस्तुति- दीपाली मिश्रा और अमिताभ मीत


कविता पौडवाल के स्वर में छठ गीत
पटना के हाट पर नरियर कीनबे जरूर
छठी मैया हसिया पूरन हो
रखी सभी छठ के बरात मनावो
अगना में पोखरी खानिब



छठ का एक एल्बम बहुत मशहूर हुआ जिसे भोजपुरी लोकगीत गायकों में सबसे अधिक लोकप्रिय गायक-संगीतकार भरत शर्मा 'व्यास' ने अनुराधा पौडवाल से साथ आवाज़ दी थी और संगीत भी दिया था।
एल्बम- आहो दीनानाथ
स्वर- अनुराधा पौडवाल और भरत शर्मा 'व्यास'
बोल- आलोक शिवपुरी
संगीत- भरत शर्मा 'व्यास'
पटना के घाट पर देलू अरगवा केकरा
कार्तिक में ऐहू परदेसी बलम घर
फलवा से भरल दौरिया उसपे पियरी
नैहरे में करबो परब हम
साँझ भईल सूरज डुबिहे चल
आहो दीनानाथ दरसन दीजिए
बाझीन पर बैठ बाघिन बन छठ
चैती के छठवा तो हल्का बुझाला
रोजे-रोजे उगेला फजिराही आधी



एक और एल्बम के गीत हम आपके लिए लेकर आये हैं जिसे भोजपुरी और अंगिका लोकगीतों के मशहूर गायक सुनील छैला बिहारी, अपने पहले ही एल्बम 'कभी राम बनके, कभी श्याम बनके' से पूरे उत्तर भारत में प्रसिद्ध हुईं गायिका तृप्ति शाक्या तथा ९० के दशक में हिन्दी पार्श्व गीतों में अपना विशेष स्थान बनाने वाली गायिका अनुराधा पौडवाल ने आवाज़ दी है।
एल्बम- उगऽहो सूरज देब हमार
स्वर- सुनील छैला बिहारी, अनुराधा पौडवाल, तृप्ति शाक्या
बोल- राम मौसम, बिनय बिहारी, सुनील छैला बिहारी तथा कुछ पारम्परिक गीत
संगीत- सुनील छैला बिहारी

छठी मैया आही जइयो मोर अंगना
छठी मैया के महिमा छे भारी
छठी माई के दौरा रखे रे बबुआ
चारी ओ घाट के तलैया जलवा उमरत
कखनो रवि बन के कखनो आदित
दलिइवा कबूल करअ गगन बिहारी
भूऊल माफ करियअ हे छठी मैया
कहवाँ तोहार नहिरा गे धोबिन कहवाँ
कहवाँ-कहवाँ के सुरजधाम छै नामी
दोहरी कल सुपने सविता अरग देबे
काहे लगे सेवें तुलसी-खरना गीत

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