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Sunday, July 14, 2019

राग तिलक कामोद : SWARGOSHTHI – 426 : RAG TILAK KAMOD






स्वरगोष्ठी – 426 में आज

खमाज थाट के राग – 7 : राग तिलक कामोद

पण्डित पलुस्कर से राग तिलक कामोद में एक खयाल और प्रीति सागर से फिल्मी गीत सुनिए




पण्डित  दत्तात्रेय विष्णु पलूस्कर
प्रीति  सागर
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “खमाज थाट के राग” की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से तीसरा थाट खमाज है। इस श्रृंखला में हम खमाज थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आज के अंक में खमाज थाट के जन्य राग “तिलक कामोद” पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में हम आपको सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर के स्वरों में प्रस्तुत राग तिलक कामोद के द्रुत खयाल के माध्यम से हम राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। राग तिलक कामोद के स्वरों का फिल्मी गीतों में अधिक उपयोग किया गया है। इस राग के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1977 में प्रदर्शित फिल्म “भूमिका” से वनराज भाटिया का स्वरबद्ध किया एक गीत – “तुम्हारे बिन जी ना लगे...” पार्श्वगायिका प्रीति सागर के स्वर में सुनवा रहे हैं।



राग तिलक कामोद का सम्बन्ध खमाज थाट से माना जाता है। इस राग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। इसके गायन-वादन का उपयुक्त समय रात्रि का दूसरा प्रहर होता है। आरोह में गान्धार और धैवत स्वर तथा अवरोह में ऋषभ स्वर वर्जित होता है। यह औड़व-औड़व जाति का राग होता है। कुछ विद्वान इस राग में केवल शुद्ध निषाद स्वर का प्रयोग करते हैं। उनका मत है कि कोमल निषाद स्वर के प्रयोग राग बिहारी की छाया आती है। वैसे प्रचार में दोनों निषाद का प्रयोग होता है। कुछ विद्वान राग तिलक कामोद में ऋषभ स्वर को वादी और पंचम स्वर को संवादी मानते हैं। “राग परिचय” पुस्तक के लेखक हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव के अनुसार ऋषभ स्वर को किसी भी दशा में वादी स्वर मानना ठीक नहीं है, क्योंकि वादी स्वर पर न्यास किया जाना आवश्यक होता है। राग तिलक कामोद में ऋषभ स्वर पर न्यास करने से राग देश हो जाएगा। अतः इसमें षडज स्वर को वादी मानना अधिक न्याय-संगत है। पंचम स्वर को संवादी स्वर मानने में कोई मतभेद नहीं है। इस राग के आरोह की जाति के विषय में विद्वानों में मतभेद है। कुछ औड़व, कुछ षाड़व तो कुछ वक्र सम्पूर्ण जाति का आरोह मानते हैं। औड़व प्रकार में गान्धार और धैवत तथा षाड़व प्रकार में धैवत स्वर वर्जित होता है। वास्तव में इस राग के आरोह को या तो औड़व या वक्र सम्पूर्ण जाति का माना जाना चाहिए। किसी भी दशा में षाड़व जाति का नहीं हो सकता, क्योकि आरोह में जो दशा धैवत की है, ठीक वही गान्धार की है। इसलिए धैवत स्वर को ही क्यों आरोह में वर्ज्य माना जाए। क्योंकि इस राग में गान्धार और धैवत स्वर का प्रयोग ऊपर जाते समय इस प्रकार होता है कि उन्हें अवरोह में सरलता से रखा जा सके। इस राग की प्रकृति चपल होने के कारण इसमें अधिकतर छोटा खयाल तथा ठुमरी गायी जाती है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपको पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर के स्वर में राग तिलक कामोद की एक बन्दिश सुनवा रहे हैं।

राग तिलक कामोद : “कोयलिया बोले अमवा की डार पर...” : पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर



खमाज थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ प्रमुख राग है- झिंझोटी, कलावती, दुर्गा, देस, तिलंग, रागेश्वरी, गारा, देस, जयजयवन्ती, तिलक कामोद आदि। खमाज थाट का ही एक प्रचलित और लोकप्रिय राग तिलक कामोद है। श्रृंगार रस की रचनाएँ इस राग में खूब मुखर होती हैं। राग तिलक कामोद षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह में छः स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में धैवत स्वर वर्जित होता है। इस राग में सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। आरोह के स्वर हैं- सारेगसा रेमपध मप सां तथा अवरोह के स्वर हैं- सांपधमग सारेग। राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। रात्रि के दूसरे प्रहर में इस राग का गायन-वादन खूब खिल उठता है। अब हम आपको राग तिलक कामोद के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1977 में प्रदर्शित फिल्म ‘भूमिका’ से लिया है। फिल्म ‘भूमिका’ 1940 के दशक में मराठी रंगमंच और फिल्मों की बहुचर्चित अभिनेत्री हंसा वाडकर की आत्मकथा ‘सांगत्ये आइका’ पर आधारित थी, जिसका निर्देशन प्रख्यात फ़िल्मकार श्याम बेनेगल ने किया था। फिल्म में अभिनय के प्रमुख कलाकार थे- अमोल पालेकर, स्मिता पाटील, नसीरुद्दीन शाह, अमरीश पुरी आदि। फिल्म को दो राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, सर्वश्रेष्ठ पटकथा लेखन का और स्मिता पाटिल को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का। इसके अलावा इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म का फिल्मफेयर पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था। फिल्म में कुल छः गीत हैं, जिनमे ‘तुम्हारे बिन जी ना लगे घर में...’ सहित पाँच गीत बसन्त देव ने और एक गीत (‘सावन के दिन आए...’) मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा है। बसन्त देव रचित गीत- ‘तुम्हारे बिन जी ना लगे...’ में संगीतकार वनराज भाटिया ने राग तिलक कामोद के स्वरों का स्पर्श किया है। पंजाबी ताल के इस गीत को प्रीति सागर बेहद आकर्षक रूप में गाया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग तिलक कामोद : ‘तुम्हारे बिन जी ना लगे घर में...’ : प्रीति सागर : फिल्म – भूमिका



संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 426वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1942 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 430वें अंक की पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका की आवाज़ हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 20 जुलाई, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 428 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 424वें अंक की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1959 में प्रदर्शित फिल्म “छोटी बहन” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – झिंझोटी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मुकेश

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर श्रृंखला “खमाज थाट के राग” की सातवीं कड़ी में आज आपने खमाज थाट के जन्य राग “तिलक कामोद” का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलूस्कर के स्वरों में प्रस्तुत एक द्रुत खयाल का रसास्वादन किया। इसके बाद इसी राग पर आधारित फिल्म “भूमिका” से एक मनमोहक गीत पार्श्वगायिका प्रीति सागर के स्वरों में सुनवाया गया। संगीतकार वनराज भाटिया ने इस गीत को राग तिलक कामोद के स्वरों में पिरोया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग तिलक कामोद : SWARGOSHTHI – 426 : RAG TILAK KAMOD : 14 जुलाई, 2019


Sunday, November 18, 2018

राग तिलक कामोद : SWARGOSHTHI – 394 : RAG TILAK KAMOD






स्वरगोष्ठी – 394 में आज

पूर्वांग और उत्तरांग राग – 9 : राग तिलक कामोद

प्रीति सागर से फिल्म का एक गीत और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर से राग तिलक कामोद सुनिए





दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर
प्रीति सागर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की नौवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। रागों को पूर्वांग और उत्तरांग में विभाजित करने के लिए सप्तक के सात स्वरों के साथ तार सप्तक के षडज स्वर को मिला कर आठ स्वरों के संयोजन को दो भागों में बाँट दिया जाता है। प्रथम भाग षडज से मध्यम तक पूर्वांग और दूसरे भाग पंचम से तार षडज तक उत्तरांग कहा जाता है। इसी प्रकार जो राग दिन के पहले भाग (पूर्वार्द्ध) अर्थात दिन के 12 बजे से रात्रि के 12 बजे के बीच में गाया-बजाया जाता हो उन्हें पूर्व राग और जो राग दिन के दूसरे भाग (उत्तरार्द्ध) अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता हो उन्हें उत्तर राग कहा जाता है। भारतीय संगीत का यह नियम है कि जिन रागों में वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में हो तो उन्हें दिन के पूर्वार्द्ध में और जिन रागों को वादी स्वर सप्तक उत्तरांग में हो उन्हे दिन के उत्तरार्द्ध में गाया-बजाया जाना चाहिए। राग का वादी स्वर यदि सप्तक के प्रथम भाग में है संवादी स्वर निश्चित रूप से सप्तक के दूसरे भाग में होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर सप्तक के दूसरे भाग में हो तो संवादी स्वर सप्तक के पूर्व में होगा। वादी और संवादी स्वरों में सदैव तीन अथवा चार स्वरों का अन्तर होता है। इसलिए यदि वादी स्वर ऋषभ है तो संवादी स्वर पंचम या धैवत होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर धैवत हो तो संवादी स्वर गान्धार अथवा ऋषभ होगा। भीमपलासी, बसन्त और भैरवी जैसे कुछ राग इस नियम के अपवाद होते हैं। इस कठनाई को दूर करने के लिए सप्तक के पूर्वांग और उत्तरांग का क्षेत्र बढ़ा दिया जाता है। पूर्वांग का क्षेत्र षडज से पंचम तक और उत्तरांग का क्षेत्र मध्यम से तार सप्तक के षडज तक माना जाता है। इस प्रकार वादी-संवादी में से यदि एक स्वर पूर्वांग में हो तो दूसरा स्वर उत्तरांग में हो जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ पूर्वांग और उत्तरांग प्रधान रागों पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए चुने गए अधिकतर रागों में वादी स्वर षडज अथवा ऋषभ होता है और संवादी स्वर पंचम अथवा मध्यम होता है। श्रृंखला की नौवीं कड़ी में आज हमने राग तिलक कामोद चुना है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम पार्श्वगायिका प्रीति सागर के स्वर में 1977 में प्रदर्शित फिल्म “भूमिका” से राग तिलक कामोद पर आधारित एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात गायक पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर के स्वर में राग तिलक कामोद में निबद्ध द्रुत लय की एक बन्दिश भी हम प्रस्तुत कर रहे हैं।



राग तिलक कामोद का सम्बन्ध खमाज थाट से माना जाता है। इस राग के सर्वाधिक प्रचलित स्वरूप में वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। इसके गायन-वादन का उपयुक्त समय रात्रि का दूसरा प्रहर होता है। आरोह में गान्धार और धैवत स्वर तथा अवरोह में ऋषभ स्वर वर्जित होता है। यह औड़व-औड़व जाति का राग होता है। कुछ विद्वान इस राग में केवल शुद्ध निषाद स्वर का प्रयोग करते हैं। उनका मत है कि कोमल निषाद स्वर के प्रयोग राग बिहारी की छाया आती है। वैसे प्रचार में दोनों निषाद का प्रयोग होता है। कुछ विद्वान राग तिलक कामोद में ऋषभ स्वर को वादी और पंचम स्वर को संवादी मानते हैं। “राग परिचय” पुस्तक के लेखक हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव के अनुसार ऋषभ स्वर को किसी भी दशा में वादी स्वर मानना ठीक नहीं है, क्योंकि वादी स्वर पर न्यास किया जाना आवश्यक होता है। राग तिलक कामोद में ऋषभ स्वर पर न्यास करने से राग देश हो जाएगा। अतः इसमें षडज स्वर को वादी मानना अधिक न्याय-संगत है। पंचम स्वर को संवादी स्वर मानने में कोई मतभेद नहीं है। इस राग के आरोह की जाति के विषय में विद्वानों में मतभेद है। कुछ औड़व, कुछ षाड़व तो कुछ वक्र सम्पूर्ण जाति का आरोह मानते हैं। औड़व प्रकार में गान्धार और धैवत तथा षाड़व प्रकार में धैवत स्वर वर्जित होता है। वास्तव में इस राग के आरोह को या तो औड़व या वक्र सम्पूर्ण जाति का माना जाना चाहिए। किसी भी दशा में षाड़व जाति का नहीं हो सकता, क्योकि आरोह में जो दशा धैवत की है, ठीक वही गान्धार की है। इसलिए धैवत स्वर को ही क्यों आरोह में वर्ज्य माना जाए। क्योंकि इस राग में गान्धार और धैवत स्वर का प्रयोग ऊपर जाते समय इस प्रकार होता है कि उन्हें अवरोह में सरलता से रखा जा सके। इस राग की प्रकृति चपल होने के कारण इसमें अधिकतर छोटा खयाल तथा ठुमरी गायी जाती है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपको पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर के स्वर में राग तिलक कामोद की एक बन्दिश सुनवा रहे हैं।

राग तिलक कामोद : “कोयलिया बोले अमवा की डार पर...” : पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर


खमाज थाट का ही एक प्रचलित और लोकप्रिय राग तिलक कामोद है। श्रृंगार रस की रचनाएँ इस राग में खूब मुखर होती हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार राग तिलक कामोद षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह में छः स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में धैवत स्वर वर्जित होता है। इस राग में सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। आरोह के स्वर हैं- सा, रे, ग, सा, रे, म, प, ध, म, प, सां तथा अवरोह के स्वर हैं- सां, प, ध, म, ग, सा, रे, ग। राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। रात्रि के दूसरे प्रहर में इस राग का गायन-वादन खूब खिल उठता है। पहले हम आपको राग तिलक कामोद के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1977 में प्रदर्शित फिल्म ‘भूमिका’ से लिया है। फिल्म ‘भूमिका’ 1940 के दशक में मराठी रंगमंच और फिल्मों की बहुचर्चित अभिनेत्री हंसा वाडकर की आत्मकथा ‘सांगत्ये आइका’ पर आधारित थी, जिसका निर्देशन प्रख्यात फ़िल्मकार श्याम बेनेगल ने किया था। फिल्म में अभिनय के प्रमुख कलाकार थे- अमोल पालेकर, स्मिता पाटील, नासीरुद्दीन शाह, अमरीश पुरी आदि। फिल्म को दो राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, सर्वश्रेष्ठ पटकथा लेखन का और स्मिता पाटील को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का। इसके अलावा इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म का फिल्मफेयर पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था। फिल्म में कुल छः गीत हैं, जिनमे ‘तुम्हारे बिन जी ना लगे घर में...’ सहित पाँच गीत बसन्त देव ने और एक गीत (‘सावन के दिन आए...’) मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा है। बसन्त देव रचित गीत- ‘तुम्हारे बिन जी ना लगे...’ में संगीतकार वनराज भाटिया ने राग तिलक कामोद के स्वरों का स्पर्श किया है। सितारखानी अर्थात पंजाबी ताल के इस गीत को प्रीति सागर ने बेहद आकर्षक रूप में गाया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग तिलक कामोद : ‘तुम्हारे बिन जी ना लगे घर में...’ : प्रीति सागर : फिल्म – भूमिका



संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 394वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1965 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष की अन्तिम पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायिका के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 24 नवम्बर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 396वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 392वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1975 में प्रदर्शित फिल्म “कागज की नाव” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – आभोगी कान्हड़ा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दीपचन्दी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – आशा भोसले

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, मेरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, फीनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की नौवीं कड़ी में आपने राग तिलक कामोद का परिचय प्राप्त किया। इस राग में आपने सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर के स्वर में तीनताल में निबद्ध एक बन्दिश का रसास्वादन किया। साथ ही आपने इस राग पर आधारित संगीतकार वनराज भाटिया द्वारा संगीतबद्ध फिल्म “भूमिका” का एक गीत प्रीति सागर की आवाज़ में सुना। आज के अंक में हम आपको एक शुभ सूचना देना चाहते हैं। हैदराबाद निवासी, संगीत शिक्षिका, “स्वरगोष्ठी” की नियमित पाठक और पहेली का नियमित उत्तर देने वाली सुश्री डी. हरिणा माधवी ने अपने शिक्षण-कार्य के दौरान अनेक स्वरचित बन्दिशों का एक संकलन तैयार किया है, जिसके पुस्तक रूप में प्रकाशन की हमें सूचना मिली है। इस प्रकाशन का विस्तृत विवरण अपने पाठकों को हम शीघ्र ही उपलब्ध कराएंगे। आप प्रतीक्षा कीजिए। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे। 



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

राग तिलक कामोद : SWARGOSHTHI – 394 : RAG TILAK KAMOD : 18 नवम्बर, 2018

Sunday, April 8, 2018

राग खमाज और तिलक कामोद : SWARGOSHTHI – 364 : RAG KHAMAJ & TILAK KAMOD




स्वरगोष्ठी – 364 में आज

दस थाट, बीस राग और बीस गीत – 3 : खमाज थाट

राग खमाज की बन्दिश -‘कोयलिया कूक सुनावे...’ और तिलक कामोद का गीत -‘तुम्हारे बिन जी ना लगे...’




उस्ताद  निसार हुसेन खाँ
प्रीति सागर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘दस थाट, बीस राग और बीस गीत’ की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रचलन लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। दस थाटों की आधुनिक प्रणाली का सूत्रपात भातखण्डे जी ने ही किया था। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से तीसरा थाट खमाज है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे खमाज थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग खमाज में निबद्ध एक खयाल प्रस्तुत करेंगे। साथ ही खमाज थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत जन्य राग तिलक कामोद के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे।



इन दिनों हम भारतीय संगीत के दस थाटों पर चर्चा कर रहे हैं। पिछले अंकों में हम यह चर्चा कर चुके हैं कि संगीत के रागों के वर्गीकरण के लिए थाट प्रणाली को अपनाया गया। थाट और राग के विषय में कभी-कभी यह भ्रम हो जाता है कि पहले थाट और फिर उससे राग की उत्पत्ति हुई होगी। दरअसल ऐसा नहीं है। रागों की संरचना अत्यन्त प्राचीन है। रागों में प्रयुक्त स्वरों के अनुकूल मिलते स्वर जिस थाट के स्वरों में मौजूद होते हैं, राग को उस थाट विशेष से उत्पन्न माना गया है। मध्य काल में राग-रागिनी प्रणाली प्रचलन में थी। बाद में इस प्रणाली की अवैज्ञानिकता सिद्ध हो जाने पर थाट-वर्गीकरण के अन्तर्गत समस्त रागों को विभाजित किया गया। हमारे शास्त्रकारों ने थाट के नामकरण के लिए ऐसे रागों का चयन किया, जिसके स्वर थाट के स्वरों से मेल खाते हों। थाट के नामकरण के उपरान्त सम्बन्धित राग को उस थाट का आश्रय राग कहा गया। आज का थाट खमाज है। खमाज थाट के स्वर होते हैं- सा, रे ग, म, प ध, नि॒। अर्थात इस थाट में निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस थाट का आश्रय राग ‘खमाज’ कहलाता है। ‘खमाज’ राग में थाट के अनुकूल निषाद कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। यह षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात राग के आरोह में छः स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। खमाज के आरोह में सा, ग, म, प, ध, नि, सां और अवरोह में सां, नि, ध, प, म, ग, रे, सा स्वरों का प्रयोग होता है। आरोह में ऋषभ स्वर नहीं लगता। राग में दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद लगाया जाता है। वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन-वादन का समय रात्रि का दूसरा प्रहर होता है।

राग खमाज का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए हमने रामपुर सहसवान घराने के प्रमुख स्तम्भ उस्ताद निसार हुसेन खाँ (1909-1993) द्वारा प्रस्तुत एक दुर्लभ बन्दिश का चुनाव किया है। राग खमाज की यह अनमोल रचना 1929 में रिकार्ड की गई थी। उस्ताद निसार हुसेन खाँ को अपने पिता और गुरु उस्ताद फिदा हुसेन खाँ से संगीत विरासत में प्राप्त हुआ था। बहुत छोटी आयु में उन्हें बड़ौदा के महाराज सयाजी राव गायकवाड़ के दरबारी संगीतज्ञ होने का गौरव प्राप्त हुआ था। आगे चलकर खाँ साहब ‘आकाशवाणी’ से भी जुड़े। 1977 में उन्हें आई.टी.सी. संगीत रिसर्च अकादमी, कोलकाता में प्रधान गुरु नियुक्त किया गया। यहाँ रह कर उन्होने उस्ताद राशिद खाँ सहित अनेक योग्य शिष्यो को तैयार किया। भारत सरकार द्वारा 1970 में उन्हें ‘पद्मभूषण’ सम्मान से विभूषित किया गया। इसके अलावा खाँ साहब को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, तानसेन सम्मान सहित गन्धर्व महाविद्यालय से डाक्टरेट की उपाधि से भी नवाजा गया था। आइए गायकी के इस शिखर-पुरुष की आवाज़ में सुनते हैं, राग खमाज की यह बन्दिश।

राग खमाज : ‘कोयलिया कूक सुनावे...’ : उस्ताद निसार हुसेन खाँ


खमाज थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ प्रमुख राग है- झिंझोटी, कलावती, दुर्गा, देस, तिलंग, रागेश्वरी, गारा, देस, जैजैवन्ती, तिलक कामोद आदि। खमाज थाट का ही एक प्रचलित और लोकप्रिय राग तिलक कामोद है। श्रृंगार रस की रचनाएँ इस राग में खूब मुखर होती हैं। राग तिलक कामोद षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह में छः स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में धैवत स्वर वर्जित होता है। इस राग में सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। आरोह के स्वर हैं- सा, रे, ग, सा, रे, म, प, ध, म,प, नि, सां तथा अवरोह के स्वर हैं- सां, प, ध, म, ग, सा, रे, ग, सा, नि। राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। रात्रि के दूसरे प्रहर में इस राग का गायन-वादन खूब खिल उठता है। अब हम आपको राग तिलककामोद के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1977 में प्रदर्शित फिल्म ‘भूमिका’ से लिया है। फिल्म ‘भूमिका’ 1940 के दशक में मराठी रंगमंच और फिल्मों की बहुचर्चित अभिनेत्री हंसा वाडकर की आत्मकथा ‘सांगत्ये आइका’ पर आधारित थी, जिसका निर्देशन प्रख्यात फ़िल्मकार श्याम बेनेगल ने किया था। फिल्म में अभिनय के प्रमुख कलाकार थे- अमोल पालेकर, स्मिता पाटील, नासीरुद्दीन शाह, अमरीश पुरी आदि। फिल्म को दो राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, सर्वश्रेष्ठ पटकथा लेखन का और स्मिता पाटील को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का। इसके अलावा इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म का फिल्मफेयर पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था। फिल्म में कुल छः गीत हैं, जिनमे ‘तुम्हारे बिन जी ना लगे घर में...’ सहित पाँच गीत बसन्त देव ने और एक गीत (‘सावन के दिन आए...’) मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा है। बसन्त देव रचित गीत- ‘तुम्हारे बिन जी ना लगे...’ में संगीतकार वनराज भाटिया ने राग तिलककामोद के स्वरों का स्पर्श किया है। सितारखानी अर्थात पंजाबी ताल के इस गीत को प्रीति सागर ने बेहद आकर्षक रूप में गाया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग तिलक कामोद : ‘तुम्हारे बिन जी ना लगे घर में...’ : प्रीति सागर : फिल्म – भूमिका




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 364वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 370वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में मुख्य स्वर किस पार्श्वगायिका के है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 14 अप्रैल 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 366वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 362वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1959 में प्रदर्शित फिल्म “गूँज उठी शहनाई” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – बिहाग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

“स्वरगोष्ठी” की पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। हमारी एक नई प्रतिभागी श्वेता शुक्ला ने अपना उत्तर फेसबुक पर भेजा है। हम उनका भी उत्तर शामिल करते हुए अनुरोध करते हैं कि कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। उपरोक्त सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “दस थाट, बीस राग और बीस गीत” की तीसरी कड़ी में आपने खमाज थाट का परिचय प्राप्त किया और इस थाट के आश्रय राग खमाज में पिरोया एक खयाल सुविख्यात गायक उस्ताद निसार हुसेन खाँ के स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही खमाज थाट के जन्य राग तिलक कामोद पर आधारित एक फिल्मी गीत पार्श्वगायिका प्रीति सागर की आवाज़ में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक से हम इस श्रृंखला का अगला अंक प्रस्तुत करेंगे। इस नई श्रृंखला अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, October 4, 2014

"मेरो गाम काठा पारे...", सफ़ेद-क्रान्ति की ही तरह यह गीत भी पहुँचा था देश के कोने कोने तक


एक गीत सौ कहानियाँ - 42
 

‘मेरो गाम काठा पारे...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ से, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ - 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 42-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'मंथन' के यादगार गीत "मेरो गाम काठा पारे..." के बारे में।


80 का दशक कलात्मक फ़िल्मों का स्वर्ण-युग रहा। जिन फ़िल्मकारों ने इस जौनर को अपनी अर्थपूर्ण फ़िल्मों से समृद्ध किया, उनमें से एक नाम है श्याम बेनेगल का। उनकी 1977 की फ़िल्म 'मंथन' सफ़ेद-क्रान्ति (Operation Flood - The White Revolution) पर बनी थी। देश के कोने-कोने तक हर घर में रोज़ दूध पहुँचे, हर बच्चे को दूध नसीब हो, समूचे देश भर में दूध की नदियाँ बहने लगे, दूध की प्रचुरता हो, यही उद्देश्य था सफ़ेद-क्रान्ति का। फ़िल्म की कहानी डॉ. वर्गिस कुरिएन और श्याम बेनेगल ने संयुक्त रूप से लिखी थी। बताना ज़रूरी है कि कुरिएन भारत के सफ़ेद-क्रान्ति के जनक माने जाते हैं। फ़िल्म की पृष्ठभूमि कुछ इस तरह से थी कि गुजरात के खेड़ा ज़िले के कुछ गरीब कृषकों की सोच को सामाजिक कार्यकर्ता त्रिभुवनदास पटेल ने अंजाम दिया और स्थापित हुआ Kaira District Co-operative Milk Producers' Union और जल्दी ही यह गुजरात के अन्य ज़िलों में भी शुरू हो गया जिसने एक आन्दोलन का रूप ले लिया। इसी शुरुआत से आगे चल कर स्थापना हुई डेरी कौपरेटिव 'अमूल' की, गुजरात के आनन्द इलाके में। साल था 1946, और आगे चल कर इस कौपरेटिव में करीब 26 लाख लोगों की भागीदारी हुई। 1970 में इसने 'सफ़ेद-क्रान्ति' की शुरुआत कर दी अपना राष्ट्रव्यापी दूध-ग्रिड बनाकर, और 1973 में बनी ‘Gujarat Co-operative Milk Marketing Federation Ltd.(GCMMF)। इसी संस्था के कुल 5,00,000 सदस्यों ने 2 रुपये प्रति सदस्य योगदान देकर 'मंथन' फ़िल्म को प्रोड्यूस किया, और जब यह फ़िल्म रिलीज़ हुई तो ट्रक भर भर कर गाँव वाले आये "अपनी" इस फ़िल्म को देखने के लिए। एक कलात्मक और ग़ैर-व्यावसायिक फ़िल्म होते हुए भी इस फ़िल्म ने बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाबी के झंडे गाड़ दिये, जो फ़िल्म इतिहास में एक मिसाल है। स्मिता पाटिल, गिरीश करनाड, नसीरुद्दीन शाह, कुलभूषण खरबन्दा, अमरीश पुरी प्रमुख अभिनीत 'मंथन' को 1978 में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला; साथ ही सर्वश्रेष्ठ पटकथा का राष्ट्रीय पुरस्कार भी इस फ़िल्म के लिए विजय तेन्दुलकर को ही मिला। भारत की तरफ़ से ऑस्कर के लिए भी यही फ़िल्म मनोनीत हुआ। फ़िल्म के लोकप्रिय गीत "मेरो गाम काठा पारे..." के लिए गायिका प्रीति सागर को सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार दिया गया। इस गीत को बाद में 'अमूल' कम्पनी ने अपने विज्ञापन के लिए प्रयोग किया। गुजराती लोक-धुन की छाया लिये इस गीत में एक महिला के अपने प्रेमी को देखने की आस को दर्शाया गया है। 'अमूल' के विज्ञापन में इस गीत के साथ-साथ स्मिता पाटिल भी नज़र आती हैं और साथ ही स्क्रीन पर नज़र आते हैं ये शब्द - “Every morning 17 lac women across 9,000 villages, bringing in milk worth Rs.4 crores, are now celebrating their economic independence. Thanks to the co-operative movement called Amul.”

वनराज भाटिया
फ़िल्म 'मंथन' के संगीतकार थे कलात्मक फ़िल्मों में संगीत देने के लिए मशहूर वनराज भाटिया। गायिका प्रीति सागर भी उन्हीं की खोज थी। विविध भारती के एक साक्षात्कार में जब उनसे पूछा गया कि प्रीति सागर को उन्होंने कैसे खोजा, तो उन्होंने बताया कि प्रीति की माँ ऐन्जेला वनराज जी की क्लासमेट हुआ करती थीं 'न्यू ईरा स्कूल' में। उसके बाद कॉलेज में भी, यहाँ तक कि एम.ए तक दोनो क्लासमेट रहे। इस तरह से वो प्रीति के सम्पर्क में आये। कम बजट की फ़िल्में होने की वजह से वनराज भाटिया ने प्रीति सागर से कई गीत गवाये और प्रीति की अलग हट कर आवाज़ ने हर गीत में एक अलग ही चमक पैदा की। 'मंथन' के इस गीत के बारे में भी वनराज भाटिया ने उस साक्षात्कार में बताया था। "शुरू-शुरू में इस फ़िल्म के लिए किसी गीत की योजना नहीं थी। केवल पार्श्व-संगीत की ही योजना था। पर फ़िल्म के स्क्रिप्ट राइटर सत्यदेव दुबे ने कहा कि कम से कम एक गीत ज़रूर होना चाहिये फ़िल्म में। तब जाकर मैंने एक गीत कम्पोज़ की। यह एक प्रेरित गीत था, an inspired song। मैं, प्रीति और उसकी बहन नीति एक दिन दोपहर को बैठ गये और इस गीत की रचना शुरु हुई। हम तीनो ने मिल कर इस गीत के बोल भी लिखे और गीत को डेवेलप करते गये। नीति ने बोलों को पॉलिश किया। जब गीत बन कर बाहर आया तो मध्यप्रदेश के लोगों ने कहा कि यह उनकी भाषा है, गुजरातियों ने कहा कि यह उनकी भाषा है, राजस्थानियों ने कहा कि यह उनकी भाषा है। पर सच्चाई यही है कि यह स्टुडियो की भाषा थी। जब हमने यह गीत बनाया तो इसका इस्तेमाल फ़िल्म में बतौर पार्श्वसंगीत के रूप में होना था। यह गीत फ़िल्म में कुल सात बार बजता है। ओपेनिंग सीक्वेन्स में 1.5 मिनट के लिए जिसमें नामावली दिखाई जाती है। मैंने पूछा कि टाइटल म्युज़िक 1.5 मिनट का कैसे हो सकता है क्योंकि श्याम बेनेगल उसमें एक अन्तरा भी चाहते थे। मैंने कहा कि अन्तरा कैसे फ़िट होगा इधर? उन्होंने मुझसे गीत का लय बढ़ाकर अन्तरा शामिल करने का सुझाव दिया। और यही वजह है कि इस शुरुआती संस्करण में गीत की रफ़्तार थोड़ी तेज़ है। और फ़िल्मांकन में तेज़ रफ़्तार से जाती हुई ट्रेन के सीन से मैच भी हो गया। उसके बाद स्पीड स्वाभाविक कर दिया जाता है जब गिरिश करनाड जाने लगते हैं और नायिका दौड़ती हुई आती है, उस वक़्त पूरा गीत सही स्पीड में आ जाता है।" वनराज भाटिया ने आगे बताया कि यह किसी लोक गीत की धुन नहीं है, बल्कि उन्होंने ही इसे लोक गीत जैसा कम्पोज़ किया है। उन्हें यह बिल्कुल आभास नहीं था कि यह गीत इतना बड़ा हिट सिद्ध होगा। इस गीत में उन्होंने केवल चार सारंगियों का इस्तेमाल किया था बस।

प्रीति सागर
गायिका प्रीति सागर यह मानती हैं कि यह गीत आज भी उनकी पहचान है और इस गीत ने ही उन्हें अपने चाहनेवालों का बेशुमार प्यार दिया है। "जब हम इस गीत को रेकॉर्ड कर रहे थे, उस समय हमें इतना सा भी अनुमान नहीं था कि यह इतना पॉपुलर होगा। मुझे याद है कि मैं स्टुडियो में 'मंथन' के निर्देशक श्याम बेनेगल और संगीतकार वनराज भाटिया के साथ थी। गीत के बोल कुछ ठीक नहीं जम रहे थे, वनराज जी को अच्छा नहीं लग रहा था। तब मेरी बहन नीति, जो अब अमरीका में है और उस वक़्त वो केवल 15 साल की थी, वो भी हमारे साथ स्टुडियो में बैठी थी। श्याम बाबू ने नीति को गीत के बोलों को लिखने के लिए कहा। इस तरह से नीति ने अपना पहला फ़िल्मी गीत लिखा गुजराती और हिन्दी में, और उस साल फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड्स में भी मनोनित हुई, आनन्द बक्शी और गुलज़ार जैसे स्तम्भ गीतकारों के साथ", प्रीति सागर ने एक साक्षात्कार में बताया। पुरस्कार गुलज़ार साहब को मिला था "दो दीवाने शहर में" गीत के लिए। प्रीति सागर के लिए इस गीत से जुड़ा सबसे ज़्यादा गर्व करने का मुहूर्त वह था जब उन्होंने इस गीत को प्रिन्स चार्ल्स के लिए गाया था। इस घटना को याद करते हुए उन्होंने कहा, "जब प्रिन्स चार्ल्स भारत आये थे 1982 में, उन्होंने 'मंथन' देखी और मेरा गीत उन्हें बहुत पसन्द आया। वो आनन्द गाँव में डॉ. कुरिएन के फ़ार्म में गये और वहीं कुरिएन साहब ने मुझे बुलाया था इस गीत को प्रिन्स चार्ल्स के सामने बैठ कर गाने के लिए। मैं वहाँ गई और गीत गाया, और प्रिन्स चार्ल्स ने मेरी काफ़ी सराहना की।" मिट्टी की ख़ुशबू लिये यह गीत आज भी उतना ही ताज़ा है जितना उस ज़माने में था। क्या है वजह, इसका आप ही कीजिये मंथन। सुनिए, यही उल्लेखनीय गीत-

फिल्म - मन्थन : 'मेरो गाम काठा पारे...'  : गायिका - प्रीति सागर : संगीत - वनराज भाटिया 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Saturday, June 4, 2011

शेखर जोशी की कहानी दाज्यू

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने गिरिजेश राव की संस्मरणात्मक कहानी "सुजान साँप" का पॉडकास्ट अनुराग शर्मा की आवाज़ में सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं शेखर जोशी की कहानी "दाज्यू", जिसको स्वर दिया है प्रीति सागर ने। कहानी "दाज्यू" का कुल प्रसारण समय 10 मिनट 34 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।


शेखर जोशी (जन्म: सितम्बर 1932)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी
"वह कुछ बोला नहीं। हाँ, नम्रता प्रदर्शन
के लिए थोड़ा झुका और मुस्कराया-भर था, पर उसके इसी मौन में जैसे सारा
‘मीनू’ समाहित था।"
(शेखर जोशी की कहानी "दाज्यू" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3
#131th Story, Dajyu: Shekhar Joshi/Hindi Audio Book/2011/13. Voice: Priti Sagar

Saturday, April 30, 2011

सुनो कहानी: अल्ताफ़ फ़ातिमा की गैर मुल्की लडकी

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में जयशंकर प्रसाद की कहानी 'ममता' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं अल्ताफ़ फ़ातिमा की कहानी "ग़ैर-मुल्की लडकी", जिसको स्वर दिया है प्रीति सागर ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 17 मिनट 20 सेकंड।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

अल्ताफ़ फ़ातिमा
जन्म 1929 में लखनऊ में।
माता-पिता: जहाँ मुम्ताज़ और फज़ले मुहम्मद अमीन
वर्तमान निवास: लाहौर पाकिस्तान

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए एक नयी कहानी

"अब कैसी चुप्पी साधी है बडी बी ने।"
(अल्ताफ़ फ़ातिमा की "गैर मुल्की लड़की" से एक अंश)


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#127th Story, Gair Mulki Ladki: Altaf Fatima/Hindi Audio Book/2011/10. Voice: Priti Sagar

Saturday, December 4, 2010

मृणाल पाण्डेय की कहानी 'लड़कियाँ'

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की संस्मरणात्मक कहानी "नसीब अपना अपना" का पॉडकास्ट उन्हीं की आवाज़ में सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं मृणाल पाण्डेय की कहानी "लड़कियाँ", जिसको स्वर दिया है प्रीति सागर ने। कहानी "लड़कियाँ" का कुल प्रसारण समय 18 मिनट 23 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

"अगर प्रोफेशनल दुराचरण साबित होने पर एक डॉक्टर या चार्टर्ड अकाउंटेंट नप सकता है, तो एक गैरजिम्मेदार पत्रकार क्यों नहीं?"
~ मृणाल पाण्डेय

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी
"जब तुम लोग लड़कियों को प्यार नहीं करते तो झूठ मूठ में दिखावा क्यों करते हो?"
(मृणाल पाण्डेय की कहानी 'लड़कियाँ' से एक अंश)


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#114th Story, Ladkiyan: Mrinal Pandey/Hindi Audio Book/2010/46. Voice: Priti Sagar

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