Showing posts with label Kishor Kumar. Show all posts
Showing posts with label Kishor Kumar. Show all posts

Saturday, May 7, 2016

"गाता रहे मेरा दिल...", क्यों फ़िल्म के बन जाने के बाद इस गीत को जोड़ा गया?


एक गीत सौ कहानियाँ - 81
 

'गाता रहे मेरा दिल...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 81-वीं कड़ी में आज जानिए 1966 की मशहूर फ़िल्म ’गाइड’ के मशहूर गीत "गाता रहे मेरा दिल..." के बारे में जिसे किशोर कुमार और लता मंगेशकर ने गाया था। बोल शैलेन्द्र के और संगीत सचिन देव बर्मन का। 
  

फ़िल्मों को बहुत ध्यान से देखने और फ़िल्म के हर पहलु पर गम्भीरता से सोच विचार करने वाले लोग अक्सर
किशोर और देव
फ़िल्मकारों की त्रुटियों, या फिर यूं कहिए चालाकियों, को पकड़ ही लेते हैं। कई कारणों से फ़िल्म निर्माण के दौरान फ़िल्म की स्क्रिप्ट, पात्र, कहानी, गीत-संगीत आदि क्षेत्रों में फेर-बदल करने के निर्णय लिए जाते हैं, कुछ जोड़े जाते हैं, कुछ हटाए जाते हैं, या कुछ फेर बदल किए जाते हैं। लक्ष्य बस एक ही होता है कि ये बदलाव फ़िल्म के लिए शुभ सिद्ध हों, फ़िल्म लोगों को पसन्द आए, फ़िल्म सफलता की सीढ़ियाँ चढ़े। ऐसा ही कुछ हुआ फ़िल्म ’गाइड’ के एक गीत के साथ। ’गाइड’ विजय आनन्द की महत्वाकांक्षी फ़िल्म थी जिसके लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की। फ़िल्म के गीत-संगीत का पक्ष बेहद मज़बूत रहा। शैलेन्द्र, सचिन देव बर्मन, लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी ने मिल कर इस फ़िल्म के गीतों को वो मुकाम दिलवाया कि आज तक ये गीत उतने ही लोकप्रिय हैं जितने उस ज़माने में हुआ करते थे। आप यह सोच रहे होंगे कि मैं किशोर कुमार का नाम कैसे भूल गया, आख़िर उन्होंने भी तो अपनी आवाज़ दी है इस फ़िल्म के सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "गाता रहे मेरा दिल..." में! किशोर कुमार का उल्लेख इसलिए नहीं किया क्योंकि फ़िल्म बन कर पूरी होने तक यह गीत फ़िल्म में था ही नहीं। जब एक बार फ़िल्म पत्रकार पीयुष शर्मा ने विजय आनन्द से यह सवाल पूछा कि मुझे हमेशा ऐसा लगा है कि "गाता रहे मेरा दिल..." गीत फ़िल्म में बाद में जोड़ा गया है एक ’पैच-वर्क’ के रूप में, तब विजय आनन्द ने जवाब दिया - "लगता है आपने मेरी चोरी पकड़ ली, तब तो मैं अपने प्रयास में व्यर्थ हो गया!" "बिल्कुल नहीं, आपका काम फिर भी उच्चस्तरीय है", पीयुष ने कहा। विजय आनन्द ने फिर खुलास करते हुए इस गीत के बनने की कहानी को विस्तार से बताया। 


"गाता रहे मेरा दिल..." फ़िल्म पूरी होने के बाद जोड़ा गया था जिसकी एक ख़ास वजह थी। बात यह थी कि एक
(बायें से) - पंचम, देव और दादा बर्मन
अरसे से किशोर कुमार ने देव आनन्द और सचिन देव बर्मन के साथ कोई गीत नहीं गाया था। इसकी कोई ख़ास वजह तो नहीं थी, बस नहीं हो पाया था। मधुबाला की बीमारी एक मुख्य कारण रहा किशोर कुमार के रिहर्सल और रेकॉर्डिंग्स के लिए समय ना दे पाने का। दूसरी तरफ़ रफ़ी साहब के साथ नवकेतन का तालमेल बहुत अच्छा चल रहा था। पर कहीं ना कहीं देव साहब को किशोर की कमी खटक रही थी। और एक दिन वो चले गए किशोर से मिलने। और एक तरह से उनको घसीटते हुए दादा बर्मन के घर ले गए। किशोर कुमार को देख कर बर्मन दादा ख़ुशी से उन्हें गले लगाया और पूछा कि इतने दिन कहाँ रह गए थे? दो चार बातों के बाद बर्मन दादा ने कहा कि चलो रोहर्सल शुरू करते हैं, एक गाना रेकॉर्ड करना है। और वो लग गए "ख़्वाब हो तुम या कोई हक़ीक़त कौन हो तुम बतलाओ..." को कम्पोज़ करने में। उस दिन वहाँ दादा बर्मन के साथ देव आनन्द, किशोर कुमार और पंचम शामिल थे। एक अरसे के बाद देव-किशोर-दादा बर्मन की तिकड़ी का यह गीत बना। किशोर ने जिस तरह से गीत को गाया, दादा बर्मन ने उनका माथा चूम लिया। यही चीज़ देव और विजय आनन्द मिस कर रहे थे किशोर की अनुपस्थिति में। और तभी देव आनन्द के दिमाग़ में यह ख़याल आया कि फ़िल्म ’गाइड’ तो ’तीन देवियाँ’ से पहले रिलीज़ होने वाली है क्योंकि ’तीन देवियाँ’ में कुछ काम अभी और बाक़ी है। और तो और ’तीन देवियाँ’ एक छोटे कैनवस पर बनने वाली श्याम-श्वेत फ़िल्म है जिससे लोगों को बहुत ज़्यादा उम्मीदें नहीं है। पर ’गाइड’ को बड़ी फ़िल्म है और रंगीन भी। तो क्यों ना एक गीत किशोर कुमार का ’गाइड’ में भी डाल दिया जाए! और तब काफ़ी दिमाग़ लगाने के बाद "गाता रहे मेरा दिल..." के लिए ज़बरदस्ती का सिचुएशन निकाला गया। और इत्तेफ़ाक़ देखिए कि यही गीत फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत बन कर उभरा।



"गाता रहे मेरा दिल..." गीत को ग़ौर से सुनने पर पता चलता है कि इस गीत में किशोर कुमार का हिस्सा लता
लता, देव, बर्मन दादा, किशोर
मंगेशकर के हिस्से से थोड़ा अधिक है। इसके पीछे कारण यही है कि यह किशोर का गाया फ़िल्म का एकमात्र गीत है, इसलिए उन्हें इस गीत में ज़्यादा प्रॉमिनेन्स दिया गया। अब अगला सवाल यह उठता है कि माना कि किशोर कुमार का यह गीत बाद में जोड़ा गया था, तो फिर ’तीन देवियाँ, ’ज्वेल थीफ़’ जैसी फ़िल्मों में किशोर कुमार से सारे गाने क्यों नहीं गवाए गए, वहाँ भी तो रफ़ी साहब मौजूद थे? इस सवाल के जवाब में विजय आनन्द ने बताया कि किसी की हिम्मत नहीं थी जो बर्मन दादा को यह निर्देश दे सके कि कौन सा गाना कौन गाएगा। उनका अपना तरीक़ा था यह विचार करने का कि किस गीत के लिए कौन सी आवाज़ सटीक होगा। एक बार उन्होंने यह तय कर लिया कि फ़लाना गीत फ़लाना गायक गाएगा तो किसी कि क्या मजाल जो उनके निर्णय को चुनौती दे! अगर उनका सुझाया गायक किसी कारण से नहीं मिल पाया तो कई बार तो वो उस गीत को ही रद्द कर देते, पर किसी और से नहीं गवाते। और फिर नया गाना बनाने में जुट जाते। उन्हें अपनी सोच पर दृढ़ विश्वास था। ख़ैर, "गाता रहे मेरा दिल..." को उस वर्ष ’बिनाका गीत माला’ के वार्षिक कार्यक्रम में दूसरा स्थान मिला था। पहला स्थान मिला था फ़िल्म ’सूरज’ के रफ़ी साहब के गाए "बहारों फूल बरसाओ..." को। उस वार्षिक कार्यक्रम में फ़िल्म ’गाइड’ के जिस अन्य गीत को स्थान मिला, वह था दादा बर्मन का गाया "वहाँ कौन है तेरा मुसाफ़िर जाएगा कहाँ..."। इस गीत को 25-वाँ पायदान मिला था कुल 32 पायदानों में। 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Saturday, February 20, 2016

"सदियों से दुनिया में यही तो क़िस्सा है....", इस गीत के बनने की कहानी से श्रद्धांजलि स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली को!


एक गीत सौ कहानियाँ - 76
 

'सदियों से दुनिया में यही तो क़िस्सा है...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 76-वीं कड़ी में आज श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं जानेमाने शायर और फ़िल्मी गीतकार निदा फ़ाज़ली को जिनका 8 फ़रवरी 2016 को निधन हो गया। बताने जा रहे हैं उनके लिखे वर्ष 1981 की फ़िल्म ’बीवी ओ बीवी’ के लोकप्रिय गीत "सदियों से दुनिया में यही तो क़िस्सा है..." के बारे में जिसे किशोर कुमार ने गाया था। संगीत राहुल देव बर्मन का। 

8 फ़रवरी चले गए निदा फ़ाज़ली अपनी अन्तिम यात्रा पर। और पीछे रह गईं उनकी लिखी ग़ज़लें, गीत, शायरी
Nida Fazli
जो किसी धरोहर से कम नहीं। जब एक बार किसी रेडियो कार्यक्रम के उद्‍घोषक ने निदा साहब से मुलाक़ात के सवालात शुरू करना चाहा, तब निदा साहब ने अपनी शायराना अंदाज़ में कहा, "एक साथ बहुत सारे सवालात, और उन सब सवालातों का जवाब एक शेर - अब जहाँ भी हैं वहीं तक लिखो रुदाद-ए-सफ़र, हम तो निकले थे कहीं और ही जाने के लिए। किसी मंज़र पर बहुत देर तक आँख को ठहरने की इजाज़त वक़्त ने नहीं दी, इनमें मंज़रों का क़सूर नहीं है, क़सूर उस सुलूग का है जो ज़िन्दगी ने मेरे साथ किया।" आज निदा साहब के गुज़र जाने के बाद उनकी कही ये बातें याद आ गईं। यूं तो निदा साहब ने एक से एक अच्छा गीत लिखा है हिन्दी फ़िल्मों के लिए, जिस गीत के बनने की कहानी आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं, वह है कमचर्चित हास्य फ़िल्म ’बीवी ओ बीवी’ से। यह फ़िल्म इस बात के लिए महत्वपूर्ण थी कि इसे निर्माता थे शोमैन राज कपूर। हालाँकि फ़िल्म को निर्देशित उन्होंने नहीं बल्कि राहुल रवैल ने किया था। संजीव कुमार, रणधीर कपूर, पूनम ढिल्लों अभिनीत यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर बुरी तरह से असफल रही। फ़िल्म के गीतों की वजह से फिर कुछ हद तक राज कपूर की मान बची रही। किशोर कुमार की एकल आवाज़ में "गोरी हो काली हो या नख़रेवाली हो...", "वक़्त से पहले क़िस्मत से ज़्यादा..." और "सदियों से दुनिया में यही तो क़िस्सा है..." जैसे गीत उस दौर युवाओं के होठों पर चढ़ गया था। "मेरी बुलबुल यूं ना हो गुल इस क़दर..." (किशोर - लता) और "पैसे का खेल निराला..." (रफ़ी - आशा) फ़िल्म के दो युगल गीत थे जो लोगों के दिलों को छू नहीं सके। राज कपूर की फ़िल्मों में संगीत का क्या महत्व और स्तर होता है, इससे हम वाक़िफ़ हैं, पर इस फ़िल्म के गीत-संगीत को सुन कर राज कपूर की उपस्थिति नज़र नहीं आती।


ख़ैर, हम याद कर रहे हैं निदा फ़ाज़ली साहब को। इस फ़िल्म में उनका लिखा "सदियों से दुनिया में..." गीत ख़ूब
The Musical Team of 'Biwi O Biwi' (Photo Courtesy: K C Pingle)
लोकप्रिय हुआ था। इसी गीत के बनने की कहानी उन्हीं की ज़ुबानी पढ़िए। "मुझे याद है कि मैं राहुल देव बर्मन के साथ एक गाना लिख रहा था। गाना तैयार हो चुका था और फ़िल्म का नम था ’बीवी ओ बीवी’। फ़ाइनल रिहर्सल हो रहा था और अगले ही दिन गाना रेकॉर्ड होने वाला था। तो क्या देखते हैं कि दोपहर के दो बजे राज कपूर साहब हाथ में भेजपुरी लेकर अन्दर दाख़िल हुए और अपने स्टाइल में बैठ कर गाने की तारिफ़ की। जब रिहर्सल ख़त्म हो गया तो उन्होंने मुझे अपने क़रीब बुलाया। पूछा कि आपको यह सिचुएशन किसने बताई थी? मैंने कहा रणधीर कपूर ने। कहने लगे कि बहुत अच्छे! फिर कहने लगे कि कल अगर आपको फ़ुरसत हो तो हमारे कॉटेज में आ जाइए चेम्बुर में, मैं आपको एक सिचुएशन सुनाना चाहता हूँ। आर. डी. ने मुझे आँख मारी, बताना चाहा कि यह गाना ख़त्म हो गया, ट्युन तुम्हारे ज़हन में है और तुम जा रहे हो कल। अगर तुम वहाँ पर एक्स्टेम्पोर गाना लिख दो तो यह गाना रेकॉर्ड होगा वरना नहीं होगा। राज कपूर ने कम से कम आधा घंटा तो अपने नॉस्टल्जिया में सर्च किया कि व्यजयन्तीमाला ये थीं, और नरगिस ये थीं, फ़लानी ये थीं और उनसे ये हुआ वो हुआ, वगेरह वगेरह वगेरह वगेरह। और फिर आख़िर में तीन लाइन उन्होंने बोली, कि भाई सिचुएशन तो इतनी सी है, अंग्रेज़ी में बोलने लगे कि there is a girl, there is a boy, there will be a girl, there will be a boy, there was a girl, there was a boy, and that is the whole life। मेरे ज़हन में ट्युन थी, मैंने बोला कि राज साहब, आपने तो पूरा गाना ही बोल दिया! बोले, "वो कैसे जी?" मैंने कहा "सदियों से दुनिया में यही तो क़िस्सा है, एक ही तो लड़की है, एक ही तो लड़का है, जब भी ये मिल गए प्यार हो गया"। कहने लगे "यही हमें चाहिए था जी!" उसी दिन यह गाना पूरा होकर रेकॉर्ड हुआ और सभी को पसन्द आया।" लीजिए, अब आप इसी गीत का वीडियो देखिए। 


फिल्म - बीवी ओ बीवी : "सदियों से दुनिया में..." : किशोर कुमार : गीतकार - निदा फाजली


अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, February 7, 2016

राग श्यामकल्याण : SWARGOSHTHI – 256 : RAG SHYAM KALYAN




स्वरगोष्ठी – 256 में आज

दोनों मध्यम स्वर वाले राग – 4 : राग श्यामकल्याण

उस्ताद अमजद अली खाँ और किशोर कुमार से सुनिए श्यामकल्याण की प्रस्तुतियाँ



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों की चर्चा कर रहे हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। संगीत के सात स्वरों में ‘मध्यम’ एक महत्त्वपूर्ण स्वर होता है। हमारे संगीत में मध्यम स्वर के दो रूप प्रयोग किये जाते हैं। स्वर का पहला रूप शुद्ध मध्यम कहलाता है। 22 श्रुतियों में दसवाँ श्रुति स्थान शुद्ध मध्यम का होता है। मध्यम का दूसरा रूप तीव्र या विकृत मध्यम कहलाता है, जिसका स्थान बारहवीं श्रुति पर होता है। शास्त्रकारों ने रागों के समय-निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किये हैं। इन्हीं में से एक सिद्धान्त है, “अध्वदर्शक स्वर”। इस सिद्धान्त के अनुसार राग का मध्यम स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार राग में यदि तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति हो तो वह राग दिन और रात्रि के पूर्वार्द्ध में गाया-बजाया जाएगा। अर्थात, तीव्र मध्यम स्वर वाले राग 12 बजे दिन से रात्रि 12 बजे के बीच ही गाये-बजाए जा सकते हैं। इसी प्रकार राग में यदि शुद्ध मध्यम स्वर हो तो वह राग रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच का अर्थात उत्तरार्द्ध का राग माना गया। कुछ राग ऐसे भी हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वर प्रयोग होते हैं। इस श्रृंखला में हम ऐसे ही रागों की चर्चा करेंगे। श्रृंखला की चौथी कड़ी में आज हम राग श्यामकल्याण के स्वरूप की चर्चा करेंगे। साथ ही इस राग में पहले सरोद वाद्य पर उस्ताद अमजद अली खाँ की एक रचना प्रस्तुत करेंगे और इसी राग पर आधारित फिल्म ‘दर्द का रिश्ता’ का एक गीत गायक किशोर कुमार की आवाज़ में सुनवाएँगे।


चढ़ते धैवत त्याग कर, दोनों मध्यम मान,
स-म वादी-संवादी सों, क़हत श्यामकल्याण।

दोनों मध्यम स्वरों से युक्त राग श्यामकल्याण हमारी श्रृंखला, ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ की चौथी कड़ी का राग है। तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति के कारण इस राग को कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाता है। आरोह में गान्धार और धैवत स्वर वर्जित होता है तथा अवरोह में सभी सातो स्वर प्रयोग किये जाते हैं। दोनों मध्यम के अलावा शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाने के कारण राग श्यामकल्याण की जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। राग के आरोह में तीव्र मध्यम और अवरोह में दोनों मध्यम स्वरो का प्रयोग किया जाता है। इसका वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। श्रृंखला के पिछले रागों की तरह राग श्यामकल्याण का गायन-वादन भी पाँचवें प्रहर अर्थात रात्रि के प्रथम प्रहर में किया जाता है।

उस्ताद अमजद अली खाँ
अब हम आपको राग श्यामकल्याण का उदाहरण सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद अमजद अली खाँ द्वारा सरोद पर बजाया यही राग सुनवाते हैं। विश्वविख्यात संगीतज्ञ और सरोद-वादक उस्ताद अमजद अली खाँ का जन्म 9 अक्टूबर, 1945 को ग्वालियर में संगीत के सेनिया बंगश घराने की छठी पीढ़ी में हुआ था। संगीत इन्हें विरासत में प्राप्त हुआ था। इनके पिता उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ ग्वालियर राज-दरबार में प्रतिष्ठित संगीतज्ञ थे। इस घराने के संगीतज्ञों ने ही ईरान के लोकवाद्य ‘रबाब’ को भारतीय संगीत के अनुकूल परिवर्द्धित कर ‘सरोद’ नामकरण किया था। अमजद अली अपने पिता हाफ़िज़ अली के सबसे छोटे पुत्र हैं। उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ ने परिवार के सबसे छोटे और सर्वप्रिय सन्तान को बहुत छोटी उम्र में ही संगीत-शिक्षा देना आरम्भ कर दिया था। मात्र बारह वर्ष की आयु में एकल सरोद-वादन का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया था। एक छोटे से बालक की सरोद पर अनूठी लयकारी और तंत्रकारी सुन कर दिग्गज संगीतज्ञ दंग रह गए। उस्ताद अमजद अली खाँ को बचपन में ही सरोद से ऐसा लगाव हुआ कि युवावस्था तक आते-आते एक श्रेष्ठ सरोद-वादक के रूप में पहचाने जाने लगे। उन्होने सरोद-वादन की शैली में विकास के लिए कई प्रयोग किये। उनका एक महत्त्वपूर्ण प्रयोग यह है कि सरोद के तारों को उँगलियों के सिरे से बजाने के स्थान पर नाखून से बजाना। सितार की भाँति सरोद में स्वरों के पर्दे नहीं होते, इसीलिए जब उँगलियों के सिरे के स्थान पर नाखूनों से इसे बजाया जाता है तब स्वरों की स्पष्टता और मधुरता बढ़ जाती है। अब आप सरोद पर बजाया राग श्यामकल्याण सुनिए। रचना के आरम्भ में आप राग का समृद्ध आलाप और फिर तीनताल में एक आकर्षक गत सुनेगे।


राग श्यामकल्याण : सरोद पर आलाप और तीनताल की गत : उस्ताद अमजद अली खाँ



राहुलदेव बर्मन और किशोर कुमार
राग श्यामकल्याण, राग कल्याण का ही एक प्रकार है, यह इसके नाम से ही स्पष्ट है। राग के नाम से ऐसा प्रतीत होता है, मानो यह दो रागों- श्याम और कल्याण के मेल से बना है। किन्तु ऐसा नहीं है। दरअसल इस राग में राग कामोद और कल्याण का सुन्दर मिश्रण होता है। राग के अवरोह में गान्धार का अल्प और वक्र प्रयोग किया जाता है। पूर्वांग में कामोद अंग कम करने के लिए गान्धार का अल्प प्रयोग किया जाता है। प्रत्येक आलाप के अन्त में ग म रे स्वरो का प्रयोग होता है। इस राग में निषाद स्वर का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। यद्यपि धैवत वर्जित माना जाता है, किन्तु निषाद पर धैवत का कण दिया जाता है। यह कण कल्याण रागांग का सूचक है। वादी स्वर पंचम होने से यह उत्तरांग प्रधान राग होना चाहिए, किन्तु वास्तव में यह पूर्वांग प्रधान होता है। इसीलिए कुछ विद्वान राग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम तथा कुछ विद्वान ऋषभ स्वर को वादी और पंचम को संवादी मानते हैं। राग को शुद्ध सारंग से बचाने के लिए अवरोह में गान्धार का प्रयोग तथा कामोद से बचाने के लिए निषाद स्वर को बढ़ाते है। आज हमने राग श्यामकल्याण पर आधारित फिल्मी गीत के रूप में 1983 में प्रदर्शित फिल्म ‘दर्द का रिश्ता’ से एक गीत का चुनाव किया है। इस गीत के संगीतकार राहुलदेव बर्मन हैं और इसे हरफनमौला पार्श्वगायक किशोर कुमार ने स्वर दिया है। दादरा ताल में निबद्ध इस गीत के बोल हैं- ‘यूँ नींद से वो जान-ए-चमन जाग उठी है...’। आप यह गीत सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। और हाँ, नीचे की पहेली को सुलझाना न भूलिएगा।


राग श्यामकल्याण : ‘यूँ नींद से वो जान-ए-चमन...’ : किशोर कुमार : फिल्म - दर्द का रिश्ता 




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 256वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग पर आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 260वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आभास हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत के गायक का नाम हमे बता सकते हैं?

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 13 फरवरी, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 258वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 254 की संगीत पहेली में हमने आपको 1969 में प्रदर्शित फिल्म ‘तलाश’ से राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग छायानट, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल सितारखानी अथवा पंजाबी ठेका और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक – मन्ना डे

इस बार की पहेली में कुल चार प्रतिभागियों ने सही उत्तर दिया है। हमारे नियमित प्रतिभागी विजेता हैं- जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इससे पूर्व पहेली क्रमांक 253 के विजेताओं की सूची में औरंगाबाद, महाराष्ट्र के नारायण सिंह हजारी के नाम की घोषणा पहेली की औपचारिकता पूर्ण न होने से हम नहीं कर सके थे। नारायण जी संगीत पहेली में पहली बार प्रतिभागी बने और विजयी हुए। हम उनका हार्दिक अभिनन्दन करते हैं और आशा करते हैं कि भविष्य में भी अपनी सहभागिता निभाएंगे।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी श्रृंखला ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ का रसास्वादन कर रहे हैं। श्रृंखला के चौथे अंक में हमने आपसे राग श्यामकल्याण पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। इस बार हम अपने दो पाठको, जेसिका मेनेजेस और विश्वनाथ ओक ने हमें सन्देश भेजा है, जिसे हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे है।

JESSICA MENEZES - Thanks so much for your wonderful posts explaining about the various Ragas with beautiful examples. itni khoobsoorti se hamari jaankaari badhaane ke liye bahut bahut dhanywaad.

VISHWANATH OKE - Must apprteciate your dedication in regularly sharing these posts every Sunday. Very useful ones. Keep it up.

‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें शीघ्र भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Saturday, February 7, 2015

"हर कोई चाहता है एक मुट्ठी आसमाँ..." - जानिये, किस भागमभाग में रेकॉर्ड हुआ था यह गाना


एक गीत सौ कहानियाँ - 52
 

हर कोई चाहता है एक मुट्ठी आसमाँ...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ- 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 52वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'एक मुट्ठी आसमाँ' के शीर्षक गीत "हर कोई चाहता है एक मुट्ठी आसमाँ..." के बारे में जिसे किशोर कुमार ने गाया था।


1973 की एक ऑफ़-बीट फ़िल्म थी 'एक मुठी आसमाँ'। निर्माता, निर्देशक व लेखक विरेन्द्र सिन्हा निर्मित व निर्देशित यह एक कम बजट की फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे विजय अरोड़ा, योगिता बाली, प्राण, राधा सलूजा, महमूद आदि। वीरेन्द्र सिन्हा मूलत: एक संवाद लेखक थे जिन्होंने 'हिमालय की गोद में', 'दो बदन', 'मिलन', 'कल आज और कल' और 'ज़हरीला इन्सान' जैसी चर्चित फ़िल्मों के संवाद लिखे हैं। बतौर निर्माता उनकी केवल तीन फ़िल्में आयीं - 'बुनियाद', 'ज़हरीला इन्सान' और 'एक मुट्ठी आसमाँ'। किशोर कुमार की आवाज़ के प्रति अत्यधिक लगाव के कारण वीरेन्द्र सिन्हा ने अपनी इन तीनों फ़िल्मों में उन्हें गवाया। 1972 की फ़िल्म 'बुनियाद' के बुरी तरह असफल होने के बाद, 'एक मुट्ठी आसमाँ' के लिए उनका बजट और कम हो गया। इतनी तंग हालत थी कि सोच विचार के बाद यह निर्णय लिया गया कि फ़िल्म में केवल एक ही गीत रखा जायेगा, जो फ़िल्म का शीर्षक गीत भी होगा और किशोर कुमार की आवाज़ में ही होगा। इस गीत के अलग अलग अन्तरे पूरे फ़िल्म में कई बार आते रहेंगे तो गीत की कमी पूरी होती रहेगी। इस एक गीत के लिए गीतकार इन्दीवर और संगीतकार मदन मोहन को कार्यभार सौंपा गया। फ़िल्म की कहानी और अलग-अलग सिचुएशन के हिसाब से इन्दीवर ने गीत के सारे अन्तरे लिखे और जब सारे अन्तरे और इन्टरल्यूड म्युज़िक को जोड़ा गया तो गीत की कुल अवधि बनी करीब करीब 9 मिनट और 25 सेकण्ड। गीत का एक हिस्सा प्राण पर फ़िल्माया गया और बाक़ी नायक विजय अरोड़ा पर। यह गीत बन कर तैयार हो गया, पर इस फ़िल्म से जुड़े सभी को केवल एक गीत वाली बात खटक रही थी। सभी को कम से कम एक डुएट गीत की ज़रूरत महसूस हो रही थी क्योंकि फ़िल्म में एक नहीं दो दो नायिका मौजूद थीं। ऐसे में जब इन्दीवर और मदन मोहन ने "प्यार कभी कम ना करना सनम" जैसा एक श्योर-शॉट हिट गीत बना डाले तो वीरेन्द्र सिन्हा भी इसे रेकॉर्ड और पिक्चराइज़ेशन  करने का फ़ैसला लिया। किशोर दा तो थे ही, पर इस युगल गीत के लिए लता मंगेशकर को गवाने का बजट विरेन्द्र सिन्हा के पास नहीं था। इसलिए वाणी जयराम को इस गीत के लिए चुन लिया गया जिन्होंने हाल ही में 'गुड्डी' में गीत गा कर हिन्दी फ़िल्म इण्डस्ट्री में हलचल पैदा कर दी थी। और यह डुएट फ़िल्माया गया विजय अरोड़ा और राधा सलूजा पर। तो इस तरह से 'एक मुट्ठी आसमाँ' में दो गीत रखे गये।

किशोर कुमार और मदन मोहन
अब ज़िक्र 'एक मुट्ठी आसमाँ' के शीर्षक गीत के रेकॉर्डिंग की। मदन मोहन ने किशोर कुमार से रेकॉर्डिंग की बात की, उन्हें रेकॉर्डिंग की तारीख़ बतायी और किशोर कुमार ने उन्हें हाँ भी कर दी। जब रेकॉर्डिंग की तारीख़ करीब आयी तो किशोर कुमार बड़े धर्मसंकट में फँस गये। दरअसल बात यह थी कि रेकॉर्डिंग की जो तारीख़ तय हुई थी, उसी दिन किशोर कुमार को शाम चार बजे की फ़्लाइट से विदेश यात्रा पर जाना था। उन्हें शोज़ के लिए एक ओवरसीस ट्रिप पर जाना था। सिर्फ़ यही बात होती तो सुबह रेकॉर्डिंग ख़त्म करके वो शाम की फ़्लाइट पकड़ सकते थे, पर बात यह थी कि उसी दिन उन्होंने राहुल देव बर्मन को भी रेकॉर्डिंग के लिए सुबह का समय दे रखा था। इतनी बड़ी गड़बड़ किशोर दा ने कैसे की, यह अब बताना मुश्किल है। इतनी टाइट शिड्यूल के बावजूद उन्होंने ना तो मदन मोहन की रेकॉर्डिंग कैंसिल की और ना ही पंचम की। वो किसी को भी निराश नहीं करना चाहते थे और उन्हें पता था कि रेकॉर्डिंग कैंसिल करने का मतलब निर्माता के पैसों की बरबादी करना है, जो वो नहीं चाहते थे। ख़ैर, रेकॉर्डिंग का वह दिन आ गया। मदन मोहन के गाने की रेकॉर्डिंग 'फ़ेमस स्टुडियो' में होनी थी, और पंचम की रेकॉर्डिंग 'फ़िल्म सेन्टर' में। दोनों जगह एक दूसरे से काफ़ी दूर थे। किशोर कुमार को सुबह 11 बजे तक पंचम के साथ रेकोर्डिंग करनी थी और उसके बाद उन्हें मदन जी के रेकॉर्डिंग पर पहुँच जाना था। एयरपोर्ट पर विशेष सन्देश पहुँचाया भी गया था कि उन्हें 'चेक-इन' करने में विलम्ब हो सकता है, तो यह बात ध्यान में रखी जाये। 2 बजे तक रेकॉर्डिंग ख़त्म करके उन्हें सीधे एयरपोर्ट की तरफ़ निकलना था, ऐसी तैयारी के साथ किशोर दा घर से निकले थे। पर सब कुछ योजना के अनुसार कहाँ हो पाता है भला? पंचम की रेकॉर्डिंग शुरू तो समय पर ही हुई थी पर समय लम्बा खींच गया, और किशोर दा भी उसमें ऐसे मगन हो गए कि 11 कब बज गये उन्हें पता ही नहीं चला। नतीजा यह हुआ कि उन्हें मदन मोहन की रेकॉर्डिंग में जाने का ख़याल ही नहीं आया। उधर 'फ़ेमस स्टुडियो' में मदन मोहन रेकॉर्डिंग की सारी तैयारी कर किशोर का इन्तज़ार कर रहे थे। दो घन्टे तक इन्तज़ार करने पर जब किशोर कुमार नहीं आये तो मदन जी का पारा थोड़ा खिसकने लगा। अपने एक सहायक को बुलवाने भेजा। वो शख्स वहाँ पहुँचकर किशोर कुमार को जब बताया कि मदन साहब उनका स्टुडियो में इन्तज़ार कर रहे हैं गुस्से में, तो किशोर कुमार के होश ठिकाने आ गये। दोपहर हो चुकी थी। शाम को फ़्लाइट भी पकड़नी थी। और इधर गाने का कुछ काम बचा हुआ था। अब करें तो क्या करें! तब किशोर कुमार ने सोचा कि पंचम तो दोस्त है, उसे तो वो किसी न किसी तरह सम्भाल ही लेंगे, मगर मदन मोहन को सम्भालना भारी पड़ जायेगा। इसलिए वो पंचम के इधर-उधर होते ही चुपचाप पीछे के दरवाज़े से भागे और सीधे 'फ़ेमस स्टुडियो' पहुँच गये। वहाँ पहुँच कर मदन मोहन जी से माफ़ी माँगी, और रेकॉर्डिंग शुरू की। अब इधर जब पंचम को पता चला कि किशोर स्टुडियो में दिख नहीं रहे हैं तो उन्होंने किशोर की तलाश शुरू कर दी। काफ़ी देर खोजने के बाद पंचम को पता चला कि मदन जी का एक सहायक वहाँ आया था और उन्हें 'फ़ेमस स्टुडियो' ले गये हैं। अब पंचम भागे 'फ़ेमस स्टुडियो'। पहुँच कर देखा कि किशोर कुमार मदन जी का गाना रेकॉर्ड कर रहे थे। अब दोनो म्युज़िक डिरेक्टर्स को एक साथ देख कर किशोर कुमार डर गये। वो तुरन्त पंचम के पास आये और उनसे नुरोध किया कि उन्हें थोड़ा समय दे दो, बस इनका गाना पूरा करते ही तुम्हारे पास आता हूँ और तुम्हारा गाना पूरा करके ही मैं फ़्लाइट पकड़ूंगा। तो इस तरह किशोर ने पंचम को किसी तरह शान्त करके वापस भेज दिया, और मदन मोहन के पास जाकर बोले कि माफ़ कीजिये मैं आपकी रेकॉर्डिंग के बारे में भूल ही गया था और उधर पंचम का गाना भी अधूरा छोड़ कर आया हूँ; अगर हो सके तो थोड़ा जल्दी कर लीजिये ताकि विदेश जाने से पहले उसका गाना भी रेकॉर्ड हो जाये वरना वो अटक जायेगा। तब मदन मोहन ने फ़टाफ़ट रेकॉर्डिंग शुरू की और एक टेक में ही यह इतना लम्बा गीत रेकॉर्ड हो गया, और बन गया किशोर कुमार का एक मास्टरपीस गीत। किशोर वहाँ से फ़टाफ़ट पंचम के पास भागे और उनका गाना भी कम्प्लीट किया। और इस तरह भागमभाग में रेकॉर्ड हुए दो गीत। एक तो था "हर कोई चाहता है एक मुट्ठी आसमाँ", पर पंचम का वह कौन सा गीत था यह मैं नहीं खोज पाया। क्या आप में से किसी को पता है कि वह दूसरा गीत कौन सा था जो उस दिन पंचम के वहाँ रेकॉर्ड हुआ था? आपको यदि राहुलदेव बर्मन के उस गीत की जानकारी हो तो नीचे दिये गए ई-मेल आई.डी. पर अवश्य सूचित करें। और अब आप 'एक मुट्ठी आसमाँ' का वह गीत सुनिए।

फिल्म एक मुट्ठी आसमाँ : 'हर कोई चाहता है एक मुट्ठी आसमाँ...' : किशोर कुमार : संगीत मदन मोहन : गीत इन्दीवर 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, December 7, 2014

‘छेड़ दिये मेरे दिल के तार क्यों...’ : SWARGOSHTHI – 197 : RAG KAMOD



स्वरगोष्ठी – 197 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 6 : राग कामोद


पार्श्वगायक किशोर कुमार के लिए जब उस्ताद अमानत अली खाँ ने स्वर दिया




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला, ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। फिल्म संगीत के क्षेत्र में चौथे से लेकर आठवें दशक के बीच शास्त्रीय संगीत के कई विद्वानों और विदुषियों ने अपना योगदान किया है। छठें दशक के फिल्म संगीत में इस प्रकार के गीतों की संख्या अधिक थी। इस श्रृंखला में हमने कुछ ऐसे ही फिल्मी गीतों का चुनाव किया है, जिन्हें रागदारी संगीत के प्रयोक्ताओं और विशेषज्ञों ने रचा है। इन रचनाओं में राग के स्पष्ट स्वरूप की उपस्थिति मिलती है। श्रृंखला के छठें अंक में आज हम आपसे 1958 में प्रदर्शित नृत्य प्रधान फिल्म ‘रागिनी’ के एक गीत पर चर्चा करेंगे। फिल्म का यह गीत राग कामोद के स्वरों में गूँथा गया है। पटियाला घराने के युगल गायक उस्ताद अमानत अली खाँ और फतेह अली खाँ ने इस गीत को स्वर दिया है। फिल्म के संगीतकार ओ.पी. नैयर ने इस गीत का प्रयोग मंच पर अभिनेत्री-नृत्यांगना पद्मिनी द्वारा प्रदर्शित किये जाने वाले नृत्य के लिए किया था। इस गीत के साथ ही राग कामोद के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए सुप्रसिद्ध युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वरों में इस राग की एक मोहक बन्दिश भी प्रस्तुत कर रहे हैं।



उस्ताद अमानत अली व फतेह अली खाँ
ओ.पी. नैयर 
फिल्म संगीत के क्षेत्र में सफलतम संगीतकारों की सूची ओ.पी. नैयर के नाम के बिना अधूरी रहेगी। उनके सांगीतिक जीवन से जुड़े कई अनोखे तथ्य रहे हैं, जिनकी चर्चा समय-समय पर होती रही है। इनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि नैयर साहब ने अपने लम्बे सांगीतिक जीवन में लता मंगेशकर से कभी भी, कोई भी गीत नहीं गवाया। उनके अधिकतर गीतों को शमशाद बेगम, गीता दत्त और आशा भोसले ने अपना स्वर देकर लोकप्रिय बनाया। नैयर के स्वरबद्ध अधिकतर गीत पंजाब के लोक संगीत की धुनों और तालों पर ही आधारित रहे हैं। ओ.पी. नैयर का जन्म 16 जनवरी 1926 को लाहौर में हुआ था। उन्हें विधिवत संगीत शिक्षा प्राप्त नहीं हुई थी, परन्तु अपनी सीखने-समझने की अनूठी क्षमता के कारण बचपन से ही रेडियो पर बाल कार्यक्रमों में गाने लगे थे। फिल्मों में उनका प्रवेश पंजाबी फिल्म ‘दूल्हा भट्ठी’ से हुआ, जिसमें उन्होने संगीतकार गोविन्दराम के निर्देशन में गीत गाये थे। कुछ समय के लिए उन्होने एच.एम.वी. के लिए गायन भी किया और संगीत भी रचे। इस दौर का सबसे लोकप्रिय गीत प्रसिद्ध गायक सी.एच. आत्मा की आवाज़ मे गैर फिल्मी गीत ‘प्रीतम आन मिलो...’ था। इस गीत की संगीत रचना ओ.पी. नैयर ने की थी। विभाजन के बाद नैयर लाहौर छोड़ कर पहले पटियाला और फिर तत्कालीन बम्बई आ गए। 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘आसमान’ में उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला। इसी फिल्म के एक गीत को गाने के प्रश्न पर उनका लता मंगेशकर से मतभेद हुआ और आजीवन उन्होने लता से कोई गीत नहीं गवाया।

1958 में नैयर के संगीत निर्देशन में फिल्म ‘रागिनी’ का निर्माण हुआ था। फिल्म में किशोर कुमार शास्त्रीय गायक और अभिनेत्री पद्मिनी शास्त्रीय नृत्यांगना के चरित्र में प्रस्तुत किये गए थे। ऐसे चरित्रों के लिए संगीत में रागों का आधार अनिवार्य था। फिल्म के लिए ओ.पी. नैयर ने लीक से हट कर संगीत तैयार किया। एक प्रसंग में अभिनेत्री पद्मिनी को मंच पर भाव प्रदर्शन के साथ शुद्ध नृत्य के कुछ टुकड़े प्रस्तुत करने थे। गायन संगतकार के रूप में किशोर कुमार अपने एक सहयोगी गायक के साथ थे। नैयर ने इस प्रसंग के लिए राग कामोद का सहारा लेकर गीत रचा था। किशोर कुमार स्वयं एक पार्श्वगायक थे, किन्तु यह गीत उनसे न गवा कर पटियाला घराने के सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद अमानत अली खाँ और फतेह अली खाँ से गवाया गया। फिल्म का यह गीत तीनताल में निबद्ध है। लीजिए, पहले आप यह गीत सुनिए।


राग कामोद : ‘छेड़ दिये मेरे दिल के तार क्यों...’ : उस्ताद अमानत अली खाँ और फतेह अली खाँ : फिल्म – रागिनी : संगीत - ओ.पी. नैयर




कल्याणहिं के थाट में दोनों मध्यम लाय,

प-रि वादी-संवादि कर, तब कामोद सुहाय।

पण्डित राजन व साजन मिश्र 
संगीत के विद्यार्थियों को राग के ढाँचे का परिचय देने के उद्देश्य से उपरोक्त दोहे का प्रयोग किया जाता है। इसके साथ ही राग के स्वरों की जानकारी ‘लक्षण गीत’ के माध्यम से भी दी जाती है। आज के अंक में हम आपसे राग कामोद पर चर्चा करेंगे। कल्याण थाट और कल्याण अंग से संचालित होने वाले इस राग को कुछ विद्वान काफी थाट के अन्तर्गत भी मानते हैं। औड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। अवरोह में दोनों मध्यम का प्रयोग और शेष सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग कामोद के आरोह के स्वर हैं- सा रे प म(तीव्र) प ध प नि ध सां तथा अवरोह के स्वर हैं- सां नि ध प म(तीव्र) प ध प ग म(शुद्ध) रे सा। राग वर्गीकरण के प्राचीन सिद्धान्तों के अनुसार राग कामोद को राग दीपक की पत्नी माना जाता है। इस राग का गायन-वादन पाँचवें प्रहर अर्थात रात्रि के प्रथम प्रहर में किया जाता है। अब आपको इस राग की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध युगल गायक पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र की आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। राग कामोद की यह अत्यन्त प्रचलित परम्परागत रचना है, जिसके बोल हैं- ‘एरी जाने न दूँगी...’। श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए यह आदर्श राग है। इस बन्दिश का उपयोग फिल्म में भी हुआ है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा के चर्चित कथानक ‘चित्रलेखा’ पर आधारित 1964 में इसी नाम से फिल्म बनी थी, जिसमें यह बन्दिश शामिल की गई थी। फिल्म में यह गीत लता मंगेशकर ने रोशन के संगीत निर्देशन में गाया था। यह गीत हम किसी अन्य अवसर पर आपको सुनवाएँगे। अभी आप पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र के स्वरों में आप राग कामोद की यह खयाल रचना सुनिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग – कामोद : ‘एरी जाने न दूँगी...’ : पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र : तबला संगति – सुधीर पाण्डेय : हारमोनियम संगति – महमूद धौलपुरी





आज की पहेली


 ‘स्वरगोष्ठी’ के 197वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक गैर हिन्दी भाषा की भारतीय फिल्म का गीतांश सुनवा रहे हैं। फिल्म में उत्तर भारतीय संगीत शैली में रचे-बसे गीत-संगीत का वर्चस्व था। इस राग रचना को सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 200वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का और सभी पाँच श्रृंखलाओं में सर्वाधिक अंक पाने वाले प्रतिभागी को वर्ष 2014 का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – यह रचना किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 13 दिसम्बर, 2014 को मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 199वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 195वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1955 में प्रदर्शित फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग अड़ाना और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल द्रुत तीनताल। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर पूर्व की भाँति जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम भारतीय शास्त्रीय संगीत के विद्वानों द्वारा फिल्मों के लिए गाये गए गीतों पर चर्चा कर रहे हैं। वर्ष 2015 से ‘स्वरगोष्ठी’ की श्रृंखलाओं के बारे में हमे अनेक पाठकों और श्रोताओ के बहुमूल्य सुझाव प्राप्त हो रहे हैं। इन सभी सुझाव पर विचार-विमर्श कर हम नये वर्ष से अपनी प्रस्तुतियों में आवश्यक संशोधन करने जा रहे हैं। यदि आपने अभी तक अपने सुझाव और फरमाइश नहीं भेजी हैं तो आविलम्ब हमें भेज दें। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 


Saturday, October 11, 2014

किशोर कुमार को याद करती हुईं फ़िल्म-जगत की तीन देवियाँ



स्मृतियों के स्वर - 11


किशोर कुमार को याद करती हुईं फ़िल्म-जगत की तीन देवियाँ






'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों के साक्षात्कार प्रस्तुत किये जाते थे, जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत की तमाम हस्तियों की कलात्मक ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकिया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ हमारे इस स्तम्भ के लिए, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर। इस स्तम्भ में हम और आप, साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। आज के इस अंक में प्रस्तुत है, हरफ़नमौला किशोर कुमार के बारे में फ़िल्म जगत की तीन अभिनेत्रियों द्वारा कहे हुए शब्द और किशोर दा से जुड़ी उनकी स्मृतियाँ। 13 अक्तुबर को किशोर कुमार की पुण्यतिथि है; किशोर दा को नमन करती है आज की यह प्रस्तुति। 
 

सूत्र : 'विविध भारती' के अलग-अलग कार्यक्रमों से संकलित


माला सिन्हा



"वो सबसे अच्छे कॉमेडियन, और एक बहुत अच्छे इंसान थे। मैंने उनके साथ दो हिन्दी फ़िल्मों में काम किया। एक था आइ. एस. जौहर का 'बेवकूफ़' और दूसरा एस. डी. नारंग का 'बम्बई का ठग'। सेट पे वो एक मिनट चुप नहीं बैठते थे। जैसे कोई स्प्रिंग लगा हो। हर डिरेक्टर की नकल करना, एस. डी. नारंग कैसे बात करते हैं, के. एन. सिंह की इतनी अच्छी नकल करते थे वो। टैप डान्स, मैंने उन जैसा किसी को करते हुए नहीं देखा। किशोर दा असली जीनियस थे। He was a great actor, वो जो दादा गये, सो गये, उन जैसा अब कोई नहीं आ सकता, कोई आनेवाला नहीं। उनका गाना, गाना जैसे नहीं लगता, जैसे कि वो बात कर रहे हैं, very very expressive। मुझे गाने के रेकॉर्डिंग्‍स पर जाने का शौक था। जब भी मुझे पता चलता कि कहीं पे रेकॉर्डिंग चल रही है, मैं वहाँ पहुँच जाती थी। एक बार 'महबून स्टुडियोस' में किशोर दा के किसी गाने की रेकॉर्डिंग में मैं पहुँच गई। रेकॉर्डिंग से पहले कोई भी सिंगर कुछ चीज़ों से परहेज़ करते हैं, जैसे कि ठंडा पानी, इमली वगेरह। तो किशोर दा ने कहा कि मेरे लिए लेमन सोडा ले आओ, वह भी बरफ़ डाल कर। मैंने उनसे जाके पूछा, "दादा, आप रेकॉर्डिंग्‍ के समय ठंडा पीने की ज़िद कर रहे हैं, गला ख़राब नहीं हो जायेगा?" तो उन्होंने कहा कि अरे ये सब वहम है, जिसको उपरवाले का देन है, उसे कुछ नहीं होता। इतना ज़िंदादिल इंसान मैंने कहीं और नहीं देखा।"


शशिकला 


"'करोड़पति' हमारे घर की फ़िल्म थी। इसमें मैं थी, और हमारे किशोर कुमार थे। म्युज़िक था शंकर-जयकिशन का। लेकिन फ़िल्म बिल्कुल नहीं चली। गाने भी नहीं चले। शंकर-जयकिशन के होने के बावजूद नहीं चले। हम कहते थे कि 'करोड़पति' बनाते-बनाते हम कंगालपति बन गये। किशोर दा, उन दिनों में, मेरा ख़याल है सिर्फ़ तीन या चार आर्टिस्ट टॉप में थे - दिलीप कुमार, राज कपूर, देव आनन्द और किशोर कुमार। उनसे मिलना बहुत मुश्किल का काम था। टाइम देते थे, पर मिलते नहीं थे। टाइम देते थे, पर कभी नहीं आते थे। बिल्कुल शैतान बच्चे की तरह। आपको मैं उनका आख़िरी क़िस्सा सुनाती हूँ। फ़िल्म तो बन गई, फ़्लॉप भी हो गई, चली नहीं, ये सब हुआ, एक दिन मुझे फ़ोन आता है उनका कि शशि, तुम मुझे मिलने आओ। तो मैं गई अपने फ़्रेन्ड के साथ मिलने के लिए। तो बात कर रहे हैं, मुझे हार्ट-अटैक हो गया, ऐसा हुआ, वैसा हुआ, और अचानक मुझे आवाज़ आती है, 'टाइम अप, टाइम अप, टाइम अप'। मैं तो घबरा गई, मैंने कहा कि अरे यह आवाज़ कहाँ से आ रही है? हँसने लगे, हा हा हा, पता है मैं हार्ट का पेशण्ट हूँ न, इसलिए यहाँ पे एक रेकॉर्डिंग करके रखी है, पाँच मिनट से ज़्यादा किसी से बात नहीं करनी है। मैंने कहा कि किशोर दा, आपने मुझे डरा ही दिया बिल्कुल, और बहुत ईमोशनल थे। मेरा ख़याल है, very emotional person। उनके तो कितने क़िस्से हैं, जितना सुनाये तो कम है, पर बहुत ही अच्छे, बहुत ही कमाल के आर्टिस्ट, जीनियस भी कहना चाहिए, देखिये गाने भी उन्होंने कितने अच्छे लिखे, म्युज़िक भी कितना अच्छा दिया, गाते तो अच्छा थे ही।"


लीना चन्दावरकर



"किशोर जी में जो एक बच्चा था, वह बच्चा उनके साथ ही रहता था, और वह आख़िर तक था। आशा जी को भी आप पूछिये कि किस तरह से वो... मैं शुरू शुरू में थोड़ा डर गई थी क्योंकि ये क्या करते हैं हरकतें न! और ऐसे डराते थे! मैंने उनके बारे में बहुत कुछ सुन रखा था, जब मैं फ़िल्मों में काम कर रही थी। कहीं न कहीं से उनका ज़िक्र आ ही जाता था। रवैल साहब, 'महबूब की मेहन्दी' के सेट पे, सब उनकी बातें कर रहे थे। किशोर जी के बारे में तो सबसे दिलचस्प टॉपिक होता था। तो 'शराफ़त' फ़िल्म में उन्होंने काम किया था रवैल साहब के साथ। राजकुमार जी, मीना जी। तो मैं वहाँ पे नयी थी तो सुनती थी इंटरेस्ट लेके कि क्या बातें हो रही हैं और ये सब सीनियर आर्टिस्ट्स हैं। तो बाद में (उनसे शादी होने के बाद) मुझे मालूम हुआ कि सब बढ़ा-चढ़ा कर बोलते थे। किशोर जी को मैंने ऐसा कभी नहीं देखा। बहुत ही बैलेन्स्ड इंसान थे, उनको थोड़ा सा था कि लोगों को दिखाये कि मैं पागलपन करता हूँ। उनको मज़ा आता था। दादामुनि थे न, अशोक कुमार जी, दादामुनि को वो कहते थे कि दादामुनि, तुम सयाने बन के फँस जाते हो, मैं पागल बन के बच जाता हूँ। क्योंकि एक दिन बर्थडे था उनका और उन्होंने किसी को इनवाइट नहीं किया था, और पता भी नहीं था कि खाना बनाना है कि क्या करना है! हम लोग गये थे, हमको तो पता था कि दादामुनि का बर्थडे है। भाभी ने हमारे लिए पूरी-तरकारी, उनको मालूम था कि इनकी क्या पसन्द है। बुलाने की क्या ज़रूरत है, सबको पता था कि दादामुनि का बर्थडे है तो करीबी लोग आने लगे। एक एक करके आने लगे और बैठ गये। किशोर जी भी बैठे हैं और एक दम, गाना भी गा रहे हैं। सुनाये जा रहे हैं, सबको मज़ा आ रहा है। तो खाने का वक़्त आ गया, डिनर। खाना भी बनाया था। लेकिन इतने लोग आ गये कि इतने लोगों का खाना है नहीं घर में। भाभी परेशान, बाद में कैसे भी करके मैनेज किया, होटल वगेरह से मँगवा के। हम इतने परेशान थे कि अभी ऑर्डर करेंगे, फिर दस लोग आ जायेंगे तो क्या होगा? क्योंकि रात हो चली थी। तो दादामुनि ने अन्दर आके मुझसे कहा कि अब क्या होगा, मैंने इतने लोगों को इनवाइट तो नहीं किया था, तेरी भाभी इतने लोगों का कैसे खाना बनायेगी? तो किशोर दा बड़ा मज़ा ले रहे थे। बोले कि तुम बड़े सयाने हो ना, इसलिये फँस जाते हो, मैं तो पागल हूँ, मैं बच जाता हूँ। दादामुनि ने कहा कि तू तो कंजूस है। तो किशोर जी ने कहा कि नहीं नहीं मैं कंजूस नहीं हूँ, लेकिन तुमको करना पड़ेगा, इस तरह से कोई उनको बोले तो अच्छा नहीं लगता था, कहते हैं न 'rules and regulations', उनको लगता था कि हर एक को आज़ादी मिलनी चाहिये। कोई ऐबनॉर्मल बीहेव नहीं करेंगे, लेकिन अगर कोई उनसे कहे तो ये करना पड़ेगा।"


कॉपीराइट: विविध भारती



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Saturday, April 12, 2014

"बजाओ रे बजाओ, इमानदारी से बजाओ, पचास हज़ार खर्च कर दिये..."


एक गीत सौ कहानियाँ - 27
 

जय जय शिवशंकर, काँटा लगे न कंकड़...’



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कप्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह साप्ताहिक स्तंभ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 27-वीं कड़ी में आज हम आपके लिए लेकर आये हैं फ़िल्म 'आपकी कसम' के मशहूर गीत "जय जय शिवशंकर, काँटा लगे न कंकड़" से संबंधित कुछ दिलचस्प तथ्यों की जानकारियाँ।


राजेश खन्ना और पंचम
राजेश खन्ना, मुमताज़ और संजीव कुमार अभिनीत 1974 की फ़िल्म 'आप की कसम' की सफलता के पीछे सबसे बड़ा हाथ उसके गीतों का रहा है, इसमें कोई संदेह नहीं है। लता-किशोर की युगल आवाज़ों में "करवटें बदलते रहे सारी रात हम", "सुनो कहो कहा सुना" और "पास नहीं आना भूल नहीं जाना", किशोर की आवाज़ में "ज़िन्दगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मुकाम", तथा लता के एकल स्वर में शास्त्रीय संगीत की छाया लिए "चोरी-चोरी चुपके चुपके" जैसे गानें ख़ूब चले। इन पाँच गीतों के अलावा छ्ठा गीत था इस ऐल्बम का मुख्य आकर्षण - "जय जय शिव शंकर काँटा लगे न कंकड़", जिसे लता, किशोर और साथियों ने गाया था। अपने आप में यह अनूठा गीत था यह, फिर इसके बाद कई फ़िल्मकारों ने इस तरह के गानें बनाने की कोशिशें तो की पर ऐसा दूसरा नहीं बना सके। साल 2009 में पंचम की 15-वीं पुण्यतिथि के मौके पर अभिनेता राजेश खन्ना ने इस गीत के बारे में बताया था, "हम लोग कश्मीर में किसी शिव जी के मंदिर के दर्शन के लिए गये थे। वहाँ आरती के समय मंदिर के घंटियों के बजने की आवाज़ों को सुनते हुए हम बाहर निकल रहे थे, और पंचम ने तुरन्त लोकशैली में एक भक्ति-मूलक हूक लाइन गुनगुनाया, और मुझसे कहा कि यह धुन वो मुझे उपहार में देंगे। और वह गीत एक लम्बे समय के बाद "जय जय शिव शंकर" के रूप में रेकॉर्ड हुआ।" पंचम के साथ राजेश खन्ना का ताल-मेल बहुत अच्छा था। लंदन के विख्यात प्रिन्सेस ग्रेस अस्पताल' में अपने बाइपास सर्जरी के बाद पंचम ने डॉ मुकेश हरियावाला के सामने स्वीकार किया कि अमिताभ बच्चन की तुलना में वो राजेश खन्ना को ज़्यादा पसन्द करते थे और इसलिए अच्छी धुनें वो काका के लिए ही सहेज कर रखते थे। डॉ साहब ने बताया कि पंचम यह मानते थे कि अमिताभ 'बॉलीवूड लीजेन्ड' के रूप में हमेशा याद किये जायेंगे, पर राजेश खन्ना अगली कई पीढ़ियों तक एक 'पर्मनेण्ट सुपरस्टार' बने रहेंगे।

लता, किशोर व आनन्द बक्शी
"जय जय शिव शंकर" गीत जितना मज़ेदार है, उससे भी मज़ेदार हैं इस गीत के निर्माण से जुड़े दो किस्से। पहला किस्सा है गीत की गायिका लता मंगेशकर को लेकर। उस दौर में लता जी नायिका के लिए पार्श्वगायन करती थीं जबकि फ़िल्म के अन्य चरित्र या खलनायिका के लिए आशा भोसले गाया करतीं। "जय जय शिव शंकर" गीत को लेकर मुश्किल यह आन पड़ी कि यह लता जी के स्टाइल का गीत नहीं था। उपर से भंग का नशा, उछल-कूद, मौज मस्ती - लता जी के लिए बिल्कुल बेमानी। लता जी की आवाज़ तो एक आदर्श भारतीय नारी की आवाज़ थी। और ऐसे मस्ती-भरे गीतों के लिए आशा जी की आवाज़ और अन्दाज़ बेहतर सिद्ध होती। पर क्योंकि यह गीत फ़िल्म की नायिका मुमताज़ पर ही फ़िल्माया जाना था, इसलिए लता जी को राज़ी करवाना ज़रूरी हो गया। लता जी के सामने जब इस गीत का प्रस्ताव रखा गया तो वो हिचकिचायीं। पर साथ में गये गीतकार आनन्द बक्शी ने लता जी को समझाया कि वो लता जी द्वारा गाये जाने वाले पंक्तियों को कुछ इस तरह से लिखेंगे कि न तो उनमें भंग पीने या नशे से संबंधित कोई भी ज़िक्र आयेगा, और न ही कोई बेहुदा या अशोभनीय शब्द का उल्लेख होगा। बक्शी साहब के इस वादे को देख कर लता जी मान गईं इस गीत को गाने के लिए। अब हम जब इस गीत के बोलों पर ग़ौर करते हैं तो सही में अहसास होता है कि बक्शी साहब ने अपना वादा बहुत ही इमानदारी के साथ निभाया।

जे. ओम प्रकाश
अब इस गीत से जुड़ा एक और मज़ेदार किस्सा। 'आप की कसम' के निर्माता थे जे. ओम प्रकाश। फ़िल्म के कुल 6 गीतों के लिए उनका बजट था 1,50,000 रुपये, यानी कि औसतन 25,000 रुपये प्रति गीत। अब हुआ यह कि "जय जय शिव शंकर" गीत के लिए राहुल देव बर्मन ने काफ़ी ताम-झाम का बन्दोबस्त किया हुआ था। बहुत बड़ा कोरस और ज़रूरत से ज़्यादा साज़िन्दे बुला लिए, क्योंकि वो चाहते थे कि इस गीत का जो मूड है, इस गीत को जिस तरह का ट्रीटमेण्ट चाहिए, उसके साथ पूरा-पूरा न्याय हो। इसमें कितना खर्चा आयेगा, इस बारे में सोचना या जे. ओम प्रकाश जी की सहमती लेना उनके दिमाग़ में ही नहीं आया। पंचम अपने तरीके से गीत को तैयार कर रहे थे। एक दिन शाम को जब गीत की रिहर्सल चल रही थी, तब ओम प्रकाश जी किसी कारण से वहाँ पहुँचे। स्टुडियो में घुसते ही उनकी आँखें बड़ी-बड़ी हो गईं। उनको अन्दर आते देख पंचम ने उन्हें पास बुलाया और पूछा कि कैसा लग रहा है यह गीत? ओम प्रकाश जी के चेहरे पर मुस्कुराहट तो दूर, हिचकिचाते हुए पंचम से कहा कि इतना बड़ा आयोजन, इसमें तो बहुत पैसे लग जायेंगे! इतने सारे साज़िन्दों के लिए तो पचास हज़ार रुपये लग जायेंगे! फिर बोले कि गीत में कुछ मज़ा नहीं आ रहा है। जे. ओम प्रकाश जी के बार-बार इस तरह से "मज़ा नहीं आ रहा है" और "पैसे बहुत लग जायेंगे" सुनते-सुनते राहुल देव बर्मन को भी बुरा लग गया और गुमसुम से हो गये। जिस जोश और उत्साह के साथ वो इस गीत को बना रहे थे, वह उत्साह कम पड़ गया था। उन्हें उदास देख किशोर कुमार ने पूछा कि क्या बात है। पहले-पहले तो पंचम किशोर को मसला बताना नहीं चाहते थे पर किशोर के ज़िद के आगे किसका चला है। जब पंचम ने किशोर को मसला बताया कि किशोर मुस्कुराये और जे. ओम प्रकाश को जाकर इस तरह से समझाया कि वो भी ख़ुश हो गये। गीत रिहर्सल से निकल कर रेकॉर्डिंग्‍ स्टुडियो तक जा पहुँचा। फ़ाइनल रिहर्सल में जैसा-जैसा तय हुआ था, सभी ने वैसा-वैसा किया; पर गीत के बिल्कुल अन्त में जहाँ गीत का रीदम बढ़ता चला जाता है, वहाँ पर किशोर दा सभी को हैरान करते हुए बोल पड़े "बजाओ रे बजाओ इमानदारी से बजाओ, पचास हज़ार खर्च कर दिये"। और इस तरह से किशोर दा ने जे. ओम प्रकाश की चुटकी ली। आप ने इस गीत को सुनते हुए "पचास हज़ार खर्च कर दिये" वाले अंश पर शायद कभी ग़ौर नहीं किया होगा क्योंकि किशोर दा ने बड़े ही हल्की आवाज़ में इसे कहा है, पर ग़ौर से गीत को सुनने पर बिल्कुल साफ़ सुनाई देते हैं ये शब्द। वाक़ई किशोर दा तो किशोर दा थे। यह कोई दूसरा नहीं कर सकता था। इस तरह से इस गीत की रेकॉर्डिंग्‍ पूरी हुई और गीत की सफलता को देख कर जे. ओम प्रकाश ने पंचम से हार मान ली।


फिल्म ‘आप की कसम’ : ‘जय जय शिवशंकर...’ : किशोर कुमार और लता मंगेशकर : संगीत – आर.डी. बर्मन : गीत – आनन्द बक्शी




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ