Tuesday, November 28, 2017

यारी है ईमान - अनुराग शर्मा

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको नई-पुरानी, प्रसिद्ध-अल्पज्ञात, मौलिक-अनूदित, हर प्रकार की हिंदी कहानियाँ सुनवाते रहे हैं। पिछले सप्ताह आपने उषा छाबड़ा की आवाज़ में उन्हीं की बालकथा "खेल" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं अनुराग शर्मा की लघुकथा "यारी है ईमान", उन्हीं के स्वर में।

इस बालकथा का टेक्स्ट अनुराग शर्मा के ब्लॉग बर्ग वार्ता पर उपलब्ध है। इस कथा का कुल प्रसारण समय 6 मिनट 29 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



संजो के रक्खो इसे हाथ से न जाने दो
बात निकलेगी तो बेकार चली जायेगी
 ~ अनुराग शर्मा

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"कितनी ही यादें जुड़ी हैं उस रहस्यमयी दुनिया से जो तब बन ही रही थी। जंगली फूलों की नशीली गंध से सराबोर पथरीली चट्टानों को काटकर बहती तवी नदी, और रणबीर नहर में तैरने जाना हो या पुराने पहाड़ी नगर के इर्दगिर्द बन रहे उपनगरीय क्षेत्रों में तलहटी में जाकर स्वादिष्ट लाल गरने चुनकर लाना।”
 (अनुराग शर्मा की लघुकथा "यारी है ईमान" से एक अंश)



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यारी है ईमान MP3

#20th Story, Yaari Hai Imaan: Anurag Sharma/Hindi Audio Book/2017/20. Voice: Anurag Sharma

Monday, November 27, 2017

फिल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड 16 || आर डी बर्मन

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 16
R D Burman


फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के 16 वें एपिसोड में सुनिए कहानी पंचम यानी आर डी बर्मन की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....



फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -

Sunday, November 26, 2017

ठुमरी पीलू : SWARGOSHTHI – 345 : THUMARI PILU : लता जी का पहला पार्श्वगीत




स्वरगोष्ठी – 345 में आज

फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व – 2 : लता जी का पहला पार्श्वगीत

राग पीलू में मान मनुहार की ठुमरी में श्याम से होली न खेलने का आग्रह – “पा लागूँ कर जोरी रे...”




लता मंगेशकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की इस दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला में हमने आपके लिए फिल्मों में पारम्परिक ठुमरी के साथ-साथ उसके फिल्मी प्रयोग को भी रेखांकित किया था। इस श्रृंखला में भी हम फिल्मी ठुमरियों की चर्चा कर रहे हैं, किन्तु ये ठुमरियाँ पारम्परिक नहीं हैं। इन ठुमरी गीतों को फिल्मों के प्रसिद्ध गीतकारों ने लिखा है और संगीतकारों ने इन्हें विभिन्न रागों में बाँध कर ठुमरी गायकी के तत्वों से अभिसिंचित किया है। हमारी इस श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल किये गए ऐसे गीत हैं जिनमे राग, भाव और रस की दृष्टि से उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी के तत्वों का उपयोग हुआ है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे ऐसी ही कुछ गैर-पारम्परिक चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज हमने आपके लिए 1947 में प्रदर्शित फिल्म “आपकी सेवा में” से एक फिल्मी ठुमरी गीत का चयन किया है। गीतकार महिपाल के गीत को संगीतकार दत्ता दावजेकर ने इसे राग पीलू के स्वर में बाँधा है और इस गीत को गायिका लता मंगेशकर ने गाया है। यह लता मंगेशकर के स्वर में गाया गया पहला पार्श्वगीत है।


ह मान्यता है कि नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में 'ठुमरी' एक शैली के रूप में विकसित हुई थी। अपने प्रारम्भिक रूप में यह एक प्रकार से नृत्य-गीत ही रहा है। राधा-कृष्ण की केलि-क्रीड़ा से प्रारम्भ होकर सामान्य नायक-नायिका के रसपूर्ण श्रृंगार तक की अभिव्यक्ति इसमें होती रही है। शब्दों की कोमलता और स्वरों की नजाकत इस शैली की प्रमुख विशेषता तब भी थी और आज भी है। कथक नृत्य के भाव अंग में ठुमरी की उपस्थिति से नर्तक / नृत्यांगना की अभिव्यक्ति मुखर हो जाती है। ठुमरी का आरम्भ चूँकि कथक नृत्य के साथ हुआ था, अतः ठुमरी के स्वर और शब्द भी भाव प्रधान होते गए। राज-दरबार के श्रृंगारपूर्ण वातावरण में ठुमरी का पोषण हुआ था। तत्कालीन काव्य-जगत में प्रचलित रीतिकालीन श्रृंगार रस से भी यह शैली पूरी तरह प्रभावित हुई। नवाब वाजिद अली शाह स्वयं उच्चकोटि के रसिक और नर्तक थे। ऊन्होने राधा-कृष्ण के संयोग-वियोग पर कई ठुमरी गीतों की रचना करवाई। ठुमरी और कथक के अन्तर्सम्बन्ध नवाबी काल में ही स्थापित हुए थे। वाजिद अली शाह के दरबार की एक बड़ी रोचक घटना है; जिसने आगे चल कर नृत्य के साथ ठुमरी गायन की धारा को समृद्ध किया।

एक बार नवाब के दरबार में अपने समय के श्रेष्ठतम पखावज-वादक कुदऊ सिंह आए। दरबार में उनका भव्य सत्कार हुआ और उनसे पखावज वादन का अनुरोध किया गया। कुदऊ सिंह ने वादन शुरू किया। उन्होंने ऐसी-ऐसी क्लिष्ट और दुर्लभ तालों और पर्णों का प्रदर्शन किया कि नवाब सहित सारे दरबारी दंग रह गए। कुदऊ सिंह को पता था कि नवाब के दरबार में कथक नृत्य का बेहतर विकास हो रहा है। उन्होंने ऐसी तालों का वादन शुरू किया जो नृत्य के लिए उपयोगी थे। उनकी यह भी अपेक्षा थी कि कोई नर्तक उनके पखावज वादन में साथ दे। कुदऊ सिंह की विद्वता के सामने किसी का साहस नहीं हुआ। उस समय दरबार में कथक गुरु ठाकुर प्रसाद अपने नौ वर्षीय पुत्र के साथ उपस्थित थे। ठाकुर प्रसाद, नवाब वाजिद अली शाह को नृत्य की शिक्षा दिया करते थे। कुदऊ सिंह की चुनौती उनके कानों में बार-बार खटकती रही। अन्ततः उन्होंने अपने नौ वर्षीय पुत्र बिन्दादीन को महफ़िल में खड़े होने का आदेश दिया। फिर शुरू हुई एक ऐसी प्रतियोगिता, जिसमें एक ओर एक नन्हा बालक और दूसरी ओर अपने समय का प्रौढ़ एवं विख्यात पखावज वादक था। कुदऊ सिंह एक से एक क्लिष्ट तालों का वादन करते और वह बालक पूरी सफाई से पदसंचालन कर सबको चकित कर देता था। अन्ततः पखावज के महापण्डित ने उस बालक की प्रतिभा का लोहा माना और उसे अपना आशीर्वाद दिया। यही बालक आगे चलकर बिन्दादीन महाराज के रूप कथक के लखनऊ घराने का संस्थापक हुआ। बिन्दादीन और उनके भाई कालिका प्रसाद ने कथक नृत्य को नई ऊँचाई पर पहुँचाया। बिन्दादीन महाराज ने कथक नृत्य पर भाव प्रदर्शन के लिए 1500 से अधिक ठुमरियों की रचना की थी, जिनका प्रयोग आज भी कथक नर्तक / नृत्यांगना करते हैं।

इस श्रृंखला की पिछली कड़ी में आपने अमीरबाई कर्नाटकी के स्वरों में 1944 की फिल्म "भर्तृहरि" से राग हेमन्त की ठुमरी सुनी थी। आज हम आपको जो ठुमरी गीत सुनवाने जा रहे हैं, वह सुविख्यात गायिका लता मंगेशकर के स्वरों में है। 1947 की फिल्म "आपकी सेवा में" से यह ठुमरी ली गई है। यह ठुमरीनुमा गीत दरअसल एक होलीगीत है, जिसमें नायिका श्याम से होली न खेलने का अनुरोध कर रही है। यह ठुमरी गीत लता मंगेशकर के स्वर में गाया गया पहला पार्श्वगीत है। इसके गीतकार, महिपाल और संगीतकार, दत्ता डावजेकर हैं। संगीतकार दत्ता दवाजेकर ने इस ठुमरी को राग पीलू के स्वर में ढाला है। राग पीलू काफी थाट का अत्यन्त लोकप्रिय राग है। इस राग के आरोह में ऋषभ और धैवत वर्जित होता है और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद है। ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वरों का दोनों रूप प्रयोग किया जाता है। इस राग को गाने-बजाने के समय प्रायः अनेक रागों की छाया दिखाई पड़ती है, इसीलिए इसे संकीर्ण जाति का राग कहा जाता है। यह चंचल और श्रृंगार प्रकृति का राग है, अतः इस राग में ठुमरी, टप्पा, भजन और फिल्मी गीत अधिक प्रचलित हैं। लता मंगेशकर की आवाज़ में प्रस्तुत इस ठुमरी गीत का रसास्वादन अब आप भी कीजिए।

राग पीलू : “पा लागूँ कर जोरी रे...” : लता मंगेशकर : फिल्म – आपकी सेवा में



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 345वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको 1949 में निर्मित एक फिल्म से एक ठुमरीनुमा गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही प्रश्न का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष के अन्तिम अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस सुप्रसिद्ध गायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 2 दिसम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 347वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 343वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1944 में प्रदर्शित फिल्म “भर्तृहरि” के एक ठुमरीनुमा गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग हेमन्त, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – अमीरबाई कर्नाटकी

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे प्रतिभागी हैं – चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की आज की कड़ी में आपने 1947 में प्रदर्शित फिल्म “आपकी सेवा में” के ठुमरी गीत का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे फिल्मी गीतों पर चर्चा करेंगे जिसमें आपको ठुमरी शैली के दर्शन होंगे। आज आपने जो गीत सुना, उसमें राग पीलू का स्पर्श है। इस श्रृंखला में भी हम आपसे फिल्मी ठुमरियों पर चर्चा कर रहे हैं और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा भी करेंगे। हमारी वर्तमान और आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


Saturday, November 25, 2017

चित्रकथा - 46: पार्श्वगायिका मीना कपूर को श्रद्धांजलि, ’रसिकेषु’ के निर्माण की कहानी के साथ

अंक - 46

पार्श्वगायिका मीना कपूर को श्रद्धांजलि, ’रसिकेषु’ के निर्माण की कहानी के साथ


मेरे भाई श्यामल के अनुसार "कुछ और ज़माना कहता है" अब तक का बेस्ट फ़िल्मी गीत है... - तुषार भाटिया




फ़िल्म जगत के सुनहरे दौर की जानी-मानी पार्श्वगायिका मीना कपूर का 23 नवंबर को कोलकाता में निधन हो गया। ख़ुद एक सुरीली गायिका होने के साथ-साथ मीना जी संगीतकार अनिल बिसवास जी की पत्नी  भी थीं। मीना कपूर के गाए गीत हमें जिन फ़िल्मों में सुनने को मिली, उनमें प्रमुख हैं शहनाई’ ’छोटी छोटी बातें’, ’अनोखा प्यार’, ’परदेसी’, ’आग़ोश’, ’दुखियारी’, ’हरिदर्शन’, ’गोपीनाथ’, ’आकाश’, ’नैना’, ’उषा किरण’, ’दूर चलें’, ’चलते चलते’, ’घायल’, ’आधी रात’, ’घर की इज़्ज़त’ और ’नई रीत’। बरसों पहले ’विविध भारती’ के लोकप्रिय कार्यक्रम ’संगीत सरिता’ के लिए अनिल दा और मीना जी की सितार वादक व संगीतकार श्री तुषार भाटिया से लम्बी बातचीत रेकॉर्ड की गई थी। इस बातचीत को ’रसिकेषु’ नामक श्रूंखला के रूप में प्रसारित किया गया था, और आगे भी इसका कई कई बार दोहराव हुआ है। आइए आज ’चित्रकथा’ में मीना जी को याद करते हुए इसी ’रसिकेषु’ के बनने की कहानी सुनते हैं तुषार जी से, जिनसे आपका यह दोस्त सुजॉय चटर्जी मुख़ातिब हुआ था। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंख समर्पित है मीना जी की पुण्य स्मृति को।


मीना कपूर (निधन: 23 नवंबर 2017)




तुषार जी, नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है आपका 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' में।

नमस्कार!

तुषार जी, सब से पहले तो आपका आभार व्यक्त करूँगा जो आपने हमें समय दिया। महान संगीतकार अनिल बिस्वास जी और मीना कपूर जी के बारे में आज हम आपसे जानेंगे इस बातचेत के दौरान।

मुझे बहुत ख़ुशी होगी अनिल दा और मीना जी के बारे में बताते हुए।

मैंने आपकी अनिल दा से की हुई बातचीत पर आधारित विविध भारती की शृंखला 'रसिकेशु' कई बार सुनी है, और जितनी बार भी इसे सुने, उतना ही अच्छा लगता है हर बार।

धन्यवाद! 'रसिकेशु' के बनने की भी एक लम्बी कहानी है, अगर बताने लगूँ तो बहुत समय निकल जाएगा आपका।

कोई बात नहीं, मैं जानना चाहूँगा, बहुत अच्छा लगेगा मुझे अनिल दा के बारे में जानकर। और सिर्फ़ मुझे ही क्यों, हमें पूरा यकीन है कि गुज़रे ज़माने के सभी संगीत रसिकों को अनिल दा के बारे में जानकर बेहद ख़ुशी होगी। क्या वो आपके फ़ेवरीट संगीतकार रहे हैं?

फ़ेवरीट अनिल दा थे और होने ही चाहिए। वो सर्वश्रेष्ठ और सर्वोपरी संगीतकार थे। ऐसा एक बार पंडित नरेन्द्र शर्मा जी ने ही कहा था। और परम आदरणीय आर. सी. बोराल साहब व पंकज मल्लिक साहब के बाद अनिल दा ही तो थे। ऐसी विलक्षण बुद्धि कभी कभार ही पैदा होती है। 

अमीन सायानी साहब ने अनिल दा पर केन्द्रित एक रेडियो कार्यक्रम में उन्हें फ़िल्म संगीतकारों के भीष्म-पितामह कह कर संबोधित किया था?

जी, लेकिन अनिल दा अपने आप को 'अंकल ऑफ़ फ़िल्म म्युज़िक' कहते थे; 'फ़ादर ऑफ़ फ़िल्म म्युज़िक' का ख़िताब उन्होंने आर. सी. बोराल साहब तथा पंकज मल्लिक साहब को दे रखा था। 

अच्छा तुषार जी, बताइए कि आप रेडियो से पहली बार कब जुड़े थे?

ऐसा हुआ था कि पंडित पन्नालाल घोष पर 'संगीत सरिता' में एक सीरीज़ हुया था एक हफ़्ते का, जिसके आख़िर के दो एपिसोड्स मैंने किए थे। इस कार्यक्रम की प्रोड्युसर छाया गांगुली जी थीं जिन्होंने मुझे इस सीरीज़ को करने की दर्ख्वास्त की। इस सीरीज़ का विषय था 'पंडित पन्नालाल घोष का फ़िल्म संगीत में योगदान'। उस समय मुझे रेडियो का कोई अनुभव नहीं था, रेडियो में कैसे बोलते हैं, किस तरह की भाषा होती है, कुछ पता नहीं था। फिर भी ज़्यादा परेशानी नहीं हुई क्योंकि पढ़के बोलना था| उस सीरीज़ का बहुत अच्छा रेसपॉन्स मिला, बहुत सारे श्रोताओं के पत्र भी मिले। 

'रसिकेशु' किस तरह से प्लैन हुई और इस सीरीज़ के लिए आपको कैसे चुना गया, इसकी कहानी हम बाद में आप से पूछेंगे, पहले बताइए कि आपका ने अनिल दा से, मेरा मतलब है उनके गीतों से रु-ब-रु किस उम्र में और किस तरह से हुए थे, और किस तरह से आप अनिल दा के गीतों को सुनने लगे?

'बसंत', 'क़िस्मत', और 'तराना' जैसी फ़िल्मों के गानें मुझे आते थे, और मुझे ये गानें बहुत पसंद थे। लेकिन ज़्यादा गानें सुनने का मौक़ा नहीं मिलता था, इसलिए मै उनके काम से ज़्यादा वाक़िफ़ नहीं था। लेकिन जितना भी सुना था, वो बेहद पसंद था। मेरे मामाजी के घर में दो रेकॊर्ड्स थे, और मैं छुट्टियों में उनके घर जाया करता था; और उन रेकॉर्ड्स को अपने साथ लेकर आता था कैसेट में रेकॉर्ड करने के लिए। एक रेकॉर्ड में "बलमा जा जा जा" गीत था जिसमें खयाल और दादरे का क्या सुंदर मिश्रण था। दूसरे रेकॉर्ड में 'तराना' के दो गीत थे, एक तरफ़ "सीने में सुलगते हैं अरमान" और दूसरी तरफ़ "नैन मिले नैन हुए बावरे", और यह दूसरा गीत मुझे बेहद पसंद था। उन दिनों गानें रेडियो पर ही सुन सकते थे, विविध भारती या रेडियो सीलोन, दूसरा कोई ज़रिया नहीं था। या फिर टीवी पर जो पुरानी फ़िल्में आती थीं, उनमें गानें सुन सकते थे। 'छोटी छोटी बातें', 'तराना, 'आराम', 'परदेसी', 'स्वयमसिद्धा' जैसी फ़िल्मों के गानें मैं टी.वी से रेकॉर्ड कर लिया करता था। फिर 1979 में एक एल.पी रेकॉर्ड निकला 'Songs to Remember' जिसमें अनिल दा के कुल 12 गानें थे। 1974-75 तक मैं नौशाद साहब, ओ.पी.नय्यर साहब, रोशन साहब और सलिल दा का बहुत बड़ा भक्त बन चुका था। लेकिन जब मैंने उस एल.पी रेकॊर्ड में शामिल "पी बिन सूना" सुना जो राग जोगिया पर आधारित था, तो मैं चमत्कृत हो गया। फिर और भी गानें जैसे कि "रूठ के तुम तो चल दिए", "ज़माने का दस्तूर है ये पुराना", "आ मोहब्बत की बस्ती बसाएँगे हम", "मोहब्बत तर्क की मैंने" जैसे गानें सुना, तो जैसे वो इंद्रासन डोल गया जिसमें मैंने बाक़ी सब दिग्गज संगीतकारों को बिठा रखा था। इसलिए मैंने उस रेकॉर्ड को कहीं छुपा दिया। 

यानी कि आपके दिल को यह गवारा न था कि नौशाद साहब, नय्यर साहब, सलिल दा, इनसे भी ज़्यादा कोई पसंद आ रहा है!

बिल्कुल! फिर एक दिन मेरी माताजी ने मुझसे कहा कि तुम उस रेकॉर्ड को क्यों नहीं बजाते? "दूर पपीहा बोला", "बरस बरस बदली" वगेरह? तब मैंने उस रेकॉर्ड को दुबारा बजाना शुरु किया। और उसका आनंद दुगुना हो गया। और वह रेकॉर्ड मेरे जीवन की बहुत ही आनंदायक एक सम्पत्ति बन गई। मैं रोक नहीं पाता था अपने आप को उसे बजाने से। मैं घण्टों उस रेकॉर्ड की मुख्यपृष्ठ पर अनिल दा की तस्वीर को तकता रहता था, कि एक आदमी इतना दिव्य संगीत कैसे दे सकता है, इतना पर्फ़ेक्ट कैसे हो सकता है। हर गाना कमाल का और पंकज बाबू की तरह कोई फ़िल्मीपन नहीं था उनके संगीत में, ऐसा मुझे लगता था।

वाह!

कभी कभी मुझे ऐसा लगता है कि अनिल दा के कम्पोज़िशन्स सुनके दूसरे संगीतकारों ने सारे हथियार डाल दिये होंगे। और उनका संगीत भी क्या है! "बेइमान तोरे नैनवा", "रसिया रे मनबसिया रे", और 'अनोखा प्यार' के गानें, 'गजरे' के गानें।

जी हाँ!

ये सब जो मैं अपनी बातें बता रहा हूँ ये उस दौर की हैं जब आर.डी. बर्मन का ज़माना था। और मैं कॉलेज में था उस वक़्त। यह वह दौर था जब हम लोग राजेश खन्ना, आर. डी. बर्मन और किशोर दा की तिकड़ी का, यानी इनके गानों का मज़ा लेते थे। लेकिन मैं साथ ही साथ पुराने गानों का भी मज़ा लेता था, और ऐसा मुझे फ़ील होता था कि पुराने गानों में जो गहराई थी, वो नये गानों में कम थी। मैंने एक कैसेट में अनिल दा के कई गानें रेकॉर्ड किए टीवी से, रेडियो से। उसमें 'फ़रेब' के लता जी के गाए दो गीत थे। उनमें एक था "जाओगे ठेस लगाके" और दूसरा था एक लोरी, "रात गुनगुनाती है लोरियाँ सुनाती है"। मेरी मौसी के घर पे यह रेकॉर्ड मुझे मिला, और मैं उसे रेकॉर्ड करने के लिए ले आया था। वह कैसेट कोई ले गया और वापस नहीं किया। और 1982 के बाद मैंने ये गानें फिर कभी नहीं सुनें। फिर अनिल दा का 'हमलोग' सीरियल का म्युज़िक आया, आपने सुना होगा, जिसमें मीना कपूर जी ने टाइटल गीत गाया था, "आइए हाथ उठाएँ हम भी"।

जी! मीना जी भी कमाल की गायिका रही हैं।

मेरे भाई श्यामल के अनुसार "कुछ और ज़माना कहता है" अब तक का बेस्ट फ़िल्मी गीत है।

वाह!

फिर एक दिन फ़िल्म 'सौतेला भाई' टीवी पे दिखाई गई जिसका "जा मैं तोसे नाही बोलूँ" मैंने रेकॉर्ड कर लिया। 'सौतेला भाई' के दूसरे या तीसरे हफ़्ते ही 'छोटी छोटी बातें' भी दिखाई गई, जिसका वह गाना था "कुछ और ज़माना कहता है"। इसी फ़िल्म का एक अन्य गीत "मोरी बाली री उमरिया, अब कैसे बीते राम" मैंने पहली बार सुना और सुनते ही रोंगटे खड़े हो गए। यह गीत राग पीलू पर आधारित होते हुए भी जिस तरह से अनिल दा ने इसमें कोमल निशाद का प्रयोग किया है, वह क़ाबिल-ए-तारीफ़ है। पीलू राग में आमतौर से शुद्ध निशाद बहुत प्रबल होता है, जैसे फ़िल्मी गीतों में आपने सुना होगा। कानन देवी का "प्रभुजी प्रभुजी तुम राखो लाज हमारी" (हॉस्पिटल), सहगल साहब का "काहे गुमान करे" (तानसेन), नौशाद साहब का बनाया हुआ "ओ चंदन का पलना" (शबाब), और "मोरे सैंयाजी उतरेंगे पार हो नदिया धीरे बहो" (उडन खटोला), इत्यादि इसके उदाहरण हैं। लेकिन अनिल दा के इस गीत में, "अब कैसे बीते राम, रो रो के बोली राधा मोहे तज के गयो श्याम", यह सांगीतिक वाक्य कोमल निशाद पे रुकता है। अनिल दा ने कैसे सोचा होगा इसको। और भी बहुत से संगीतकार हुए जिन्होंने शास्त्रीय संगीत पर गानें बनाये, लेकिन अनिल दा की बात ही अलग थी। उनके काम में एक नया दृष्टिकोण मुझे नज़र आता था। तो मैं एक एकलव्य की तरह अनिल दा को मन ही मन पूजता था। संगीत सृजन की रुचि होने की वजह से मेरा दृष्टिकोण एक विद्यार्थी की तरह होता था और मैं सोचता रहता था उनके बारे में। फिर 1984 में जब मैंने सुना "लूटा है ज़माने ने क़िस्मत ने रुलाया है" (दोराहा), वहाँ भी पाया कि कोमल धैवत का प्रयोग अनोखा है। मुझे अनिल दा और नौशाद साहब के कम्पोज़िशन्स के हर पहलू में सिर्फ़ पर्फ़ेक्शन ही नज़र आता। क्या ग़ज़ब की पकड़ थी इनकी अपने फ़न पर! 

वाह! बहुत ही अच्छी तरह से आपने बताया कि किस तरह से आप अनिल दा के भक्त बनें। ये तो थी कि किस तरह से आपने अनिल दा के गीतों को सुनना शुरु किया, सुनते गये, उन्हें और उनके संगीत को खोजते गये, लेकिन उनसे आपकी पहली मुलाक़ात कब और कहाँ हुई थी? किस तरह की बातचीत होती थी आप में?

मैं उस वक़्त HMV में था और अनिल दा दिल्ली से बम्बई आये थे किसी भजन के रेकॉर्डिंग्‍ के लिए। और तब मैंने पहली बार उनसे मिला। यह बात 1986 की है। उस समय मैं HMV में उन्हीं के गीतों का एक ऐल्बम कम्पाइल कर रहा था, जिसका शीर्षक था 'Vintage Favourites - Anil Biswas'। 

ज़रूर!

बाद में भी जब भी वो बम्बई आते थे, तब भी मिलता था, लेकिन मैं उनका लिहाज़ करता था, इसलिए उनसे ज़्यादा बात़चीत या सवाल नहीं पूछता था। मैं सोचता रहता था कि कैसे रहे होंगे अनिल बिस्वास! ये कैसे संभव है कि संगीत की कोई विधा ऐसी नहीं जिसे उन्होंने छोड़ा हो, अनिल दा का तो मामला ही कुछ अलग है! वो जो कुछ भी बोलते थे, वो बड़ा मार्मिक होता था, और उनके बोलने की छटा भी कमाल की थी। पाँचों भाषाओं में उनकी ज़बरदस्त पकड़ थी - हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी, बांगला और बृज भाषा। और इन भाषाओं में अच्छा काव्य लिखते भी थे। और ज़बान भी इतनी साफ़ कि सामने वाला दंग रह जाए! बहुत ही गहरा अध्ययन था काव्य का। और हिंदी से लेके उर्दू के बड़े बड़े कवियों, शायरों के साथ हुए उनके काम से मैं अच्छी तरह वाक़ीफ़ था, जैसे कि आरज़ू लखनवी, सफ़दार आह, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, पंडित नरेन्द्र शर्मा, कवि प्रदीप। साथ ही कबीर, मीरा, तुल्सीदास के काव्य की भी उतनी ही गहरी जानकारी थी उनको। 'रसिकेशु' में भी उन्होंने एक दोहा कहा था अगर आपको याद है तो, "खरी बात कबीरा कहीगा, अंधाउ कहे अनूठी, बची खुची सो गुसैया कहीगा, बाकी सब बाता झूठी"।

बहुत ख़ूब। यानी कबीरदास, सूरदास और तुल्सीदास, बाकी सब बकवास! अच्छा, 'रसिकेशु' के लिए अनिल दा से आपकी किस साल मुलाक़ात हुई थी और किस तरह से 'रसिकेशु' प्लैन हुई थी?

'रसिकेशु' के लिए अनिल दा से हमारी मुलाक़ात हुई 1996 में। पंडित पन्नालाल घोष के उस प्रोग्राम का इतना अच्छा रेस्पॊन्स मिला कि उसके बाद छाया जी ने मुझसे कहा कि वो अनिल दा पर भी प्रोग्राम करने की इच्छुक हैं। छाया जी जानती थीं कि अनिल दा से मेरी मुलाक़ातें होती थीं, और उन्होंने मुझसे उनसे मिलवाने को कहा। तो अगली बार जब अनिल दा बम्बई आये और हर साल की तरह उस बार भी उनके सम्मान में एक लंच का आयोजन हुआ था डॉ. जोशी के घर पे, तो मैं छाया जी को लेकर वहाँ गया। 

तुषार जी, माफ़ी चाहूँगा टोकने के लिए, आगे बढ़ने से पहले यह बताइए कि छाया गांगुली जी को आप पहले से ही जानते थे?

जी हाँ, महादेवी वर्मा जी और पंडित नरेन्द्र शर्मा के कुछ गानें मैंने कम्पोज़ किए थे जिन्हें छाया जी गा चुकी थीं। हमारा एक दूसरे के घर आना जाना था। और पन्ना बाबू पर उस प्रोग्राम के लिए भी छाया जी ने ही मुझसे आग्रह किया था।

अच्छा अच्छा! अब बताइए आगे उस लंच में फिर क्या हुआ।

उस लंच में तो फिर कुछ बात नहीं हुई, बस एक appointment fix हुआ मेरा और छाया जी का अनिल दा के साथ। फिर हम अगले दिन शाम को उनसे मिलने गए और छाया जी ने उनसे इंटरव्यु की बात छेड़ी। अनिल दा ने पूछा कि इंटरव्यु कौन करेगा? तुषार, तुम सुझाओ। मैंने ब्रॉडकास्टिंग्‍ की दुनिया के दो बहुत मशहूर नाम सुझाये। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। मेरे मन में कहीं न कहीं एक ऐसी इच्छा भी थी कि काश नौशाद साहब यह इंटरव्यु करते। यह बात तो जगविदित है कि नौशाद साहब अनिल दा को अपना गुरु समझते थे। अगर ये दो दिग्गजों की बातचीत रेडियो पर लोग सुनेंगे तो इससे बेहतर तो कोई बात हो ही नहीं सकती थी। वैसे भी आर. सी. बोराल, पंकज मल्लिक और अनिल बिस्वास के बाद नौशाद साहब का ही तो नाम आता है, जिन्हें हम फ़िल्म संगीत के प्रचलित धारा के पायनीयर या युग-प्रवर्तक संगीतकार कह सकते हैं। तो मैं ये सब सोच ही रहा ही था कि काश ऐसा कुछ हो सके कि अचानक फ़ोन बजा। मैंने फ़ोन उठाया। उधर से आवाज़ आई, "क्या वहाँ अनिल बाबू तशरीफ़ रखे हुए हैं? मैंने पूछा कि आप कौन साहब बोल रहे हैं? दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई, "जी मुझ नाचीज़ को नौशाद अली कहते हैं"। उस वक़्त मेरी क्या हालत हुई होगी इसका आप अंदाज़ा लगा सकते हैं। मेरे लिए तो वर्णन के बाहर है। मैंने फ़ोन पे हाथ रख अनिल दा से कहा कि नौशाद साहब का फ़ोन है। तो अनिल दा ने मुझसे सवाल किया कि वो क्या कह रहे हैं? अब मैं नौशाद साहब से ये बात कैसे पूछता? अर्जुन को विश्वरूप दर्शन जो हुए थे, उनके सामने एक भगवान श्री कृष्ण थे, मेरे सामने दो थे। तो मैंने बहुत ही संकोच के साथ यह बात नौशाद साहब से पूछी। उन्होंने अपनी लखनवी तहज़ीब में अर्ज़ किया, "अगर अनिल बाबू फ़ारिक़ हों तो मैं आदाब-ओ-सलाम के लिए हाज़िर हो जाऊँ|" न जाने ये कैसी ग्रहदशा थी! दिल में उस इंटरव्यु की बात थी, और अगर इस वक़्त नौशाद साहब यहाँ आ जाएँ तो कोई बात बन भी जाए क्या पता! जब मैंने अनिल दा से कहा कि नौशाद साहब आकर मिलना चाहते हैं, तो अनिल दा बोले कि "फ़ोन ला"। फिर फ़ोन पर बात करने लगे, मुझे उस तरफ़ की बातें तो सुनाई नहीं दी, इस तरफ़ से दादा कहने लगे 'जीते रहो... आज रहने दो, बच्चे आये हैं, रेडियो पर इंटरव्यु की बात कर रहे हैं....."। छाया जी ने फिर पूछा कि इंटरव्यु किससे करवाना है? अनिल दा ने देर तक मेरी तरफ़ देखा और अचानक बोल उठे कि यह इंटरव्यु तुषार करेगा। मैं चौंक पड़ा। मैंने कहा, "दादा, मुझे तो कोई तजुर्बा नहीं"। तो अनिल दा भड़क उठे, कहने लगे, "तेरी यह मजाल, तू मुझे ना कह रहा है?" मैंने कहा, "दादा, आपको सवालात करने की मेरी क्या औक़ात है।" तो कहने लगे कि तूने जो पंडित पन्नालाल घोष पे प्रोग्राम किया था वो मैंने सुना था, I have heard it, I know about it'। उन्होंने छाया जी से कहा कि अगर तुषार करेगा तो ही मैं इंटरव्यु दूँगा। इसके बाद मेरे पास कोई चारा न था। मैं तो केवल छाया जी को उनसे मिलवाने ले गया था और उन्होंने पूरी ज़िम्मेदारी ही मेरे सर डाल दी। 

कैसा लग रहा था आपको उस वक़्त जब इतना बड़ा मौका आपको मिला?

क्या बताऊँ मैं कि कितना टेन्शन दिया दादा ने मुझे! मेरे सामने तीन मसले थे। एक तो संगीत का महासागर मेरे सामने लहरा रहा था जिसे मुझे दुनिया के सामने पेश करना था। दूसरा मसला था समय का। मेरे पास प्रिपेयर्ड होने का टाइम नहीं था, क्योंकि इंटरव्यु दूसरे-तीसरे दिन ही था। और तीसरा मसला यह था कि दादा न अपने बारे में बोलना चाहते थे और ना मैं उनकी तारीफ़ कर सकता था। अनिल दा को अपनी तारीफ़ से नफ़रत थी। यह उनका तजुर्बा था कि उन्होंने मुझमें कुछ देख लिया था जिसकी वजह से उन्होंने मुझे इस महान कार्य के लिए चुना। अब मेरे लिए मुश्किल की घड़ी थी। दूसरे दिन मेरे घर में शादी थी और उसी दिन शाम को मुझे और छाया जी को उनसे जाकर मिलना था। मुझे यह सोचकर बुखार आ गया था कि दादा का इंटरव्यु कैसे करूँगा, क्योंकि वो कोई ऐसे वैसे कलाकार नहीं थे, वो भारत के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार थे। और उनसे वो सब सवाल नहीं पूछ सकते थे जो किसी भी आम इंटरव्यु में एक जर्नलिस्ट कलाकार को पूछते हैं। मुझे ऐसे सवाल पूछने थे जो उनके बारे में भी ना हो लेकिन उनका साहित्य और संगीत पे जो आधिपत्य है, जो महारथ उन्हें हासिल है, वो सब दुनिया के सामने रख सकूँ। जो विराट दर्शन मुझे हो रहा था, मैं चाहता था कि वही दर्शन लोगों को भी इस कार्यक्रम के ज़रिए हो। और एक बात यह भी थी कि अनिल दा बहुत सालों के बाद रेडियो में आ रहे थे। न जाने उनको मुझ पर इतना भरोसा कैसे हो गया था, यह बात मुझे समझ में नहीं आ रही थी। ख़ैर, छाया जी का प्लैन था कि यह शृंखला तीन से सात एपिसोड्स में पूरी हो जाए। 

लेकिन यह शृंखला तो 26 एपिसोड्स की थी न?

हाँ। तो मैं सोच में पड़ गया कि किस तरह से इंटरव्यु के मामले को आगे बढ़ाया जाये। कौन कौन से विषय चुने जायें, मैंने अनिल दा से पूछा। उन्होंने कहा कि कल आ जाओ। शाम को जब मैं और छाया जी उनके घर गये, तो दादा बहुत ही एक्साइटेड थे। उन्होंने एक लिस्ट बनाई थी संगीतकारों की। बड़े उत्साह से वो कहने लगे कि मैं आर. सी. बोराल साहब से शुरु करूँगा, फिर पंकज मल्लिक साहब से आगे बढ़ाऊँगा, वगेरह वगेरह। मैं और छाया जी एक दूसरे की तरफ़ देखने लगे कि तीन कड़ियों की यह शृंखला तो दादा पर है, पर वो तो दूसरे संगीतकारों की बातें किए जा रहे हैं। आप देखिए, उस वक़्त उनकी उम्र 85 वर्ष थी, फिर भी कितना जोश था उनमें। फिर पूछने लगे, और लिखते गये, सहगल साहब, कानन देवी....। पूछा कि हम पंकज बाबू के कौन से गानें बजाएँगे? शुरुआत तो "मैं क्या जानू क्या जादू है" से ही करूँगा, फिर 'डॉक्टर' फ़िल्म का "गुज़र गया वो ज़माना" आएगा, और फिर मुझसे पूछा कि पंकज दा का और कौन सा गीत रखें। मैंने कहा कि कविगुरु रबीन्द्रनाथ की कविता, पंकज दा की बनाई हुई धुन पे, "दिनेर शेषे घूमेर देशे"। मैं क्या बताऊँ, काश उस वक़्त मेरे पास कैमरा होता, उनके चेहरे पर जो एक्स्प्रेशन आया! बोल पड़े, "लाजवाब! इससे अच्छा तो कुछ हो ही नहीं सकता"। दादा "दिनेर शेषे घूमेर देशे" को गुनगुनाना शुरु किया और धीरे धीरे उनकी आँखें भरने लगीं, और आँसू बहने लगे। मैं और छाया जी बहुत चिंतित हो गये कि इतने भावावेश में कहीं उनकी तबीयत ख़राब ना हो जाये। शाम के 6:30 बज रहे थे, जाड़े का मौसम था। वो रोते गये और गाते गये। मीना दीदी ने दादा को आगे गाने से मना किया। लेकिन अनिल दा ने कहा कि नहीं मैं गाऊँगा, ज़रूर गाऊँगा। वो कहाँ सुनने वाले थे। मीना दी के रोकने के बावजूद अनिल दा ने गाना बंद नहीं किया और मुझसे अंतरे के शब्द पूछे। मैंने कहा, "दादा, रहने दीजिए आज।" कहने लगे, "तू अंतरा बता"। मैंने कहा, "घौरे जारा जाबार तारा कौखोन गैछे घौर पाने...." कहने लगे, "ये तो मेरी ज़िंदगी की कहानी है; क्या अनिल बिस्वास नाम का प्राणी ऐसी धुन बना पाएगा? कदापि नहीं।" उन्होंने इतना ईमोशनल होकर गाया कि क्या बताऊँ। ज़रा सोचिये कि क्या आलम होगा वह, रबीन्द्रनाथ की कविता, पंकज बाबू की धुन, गाने वाले अनिल दा, और शब्द पूछे जा रहे थे तुषार भाटिया से, और सुनने वालों में मीना दी और छाया जी, यानी दो सशक्त गायिकाएँ। यह सोच कर ही जैसे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ख़ैर, आधा घंटा लगा उनको स्वस्थ होने में। छाया जी और मैं सोचने लगे कि यह सीरीज़ दादा पर है लेकिन वो तो अपने बारे में कुछ कह ही नहीं रहे हैं, ना ही अपने गीतों के बारे में। मैंने  हिम्मत करके दादा से पूछा, "दादा, आपके कौन से गानें लें? तो कहने लगे, "मेरे गानों के बारे में मैं क्या बोलूँ, तू ही बोल, तू ही सोच"। तभी मैंने सोच लिया कि मुझे ऐसे सवाल पूछने पड़ेंगे कि जिनमें अनिल बिस्वास नाम के महासागर में छिपा हुआ सर्वश्रेष्ठ संगीतकार, विद्वान, काव्यरसिक तथा संगीत-गुरु लोगों को नज़र आ सके।

वाह!

आर. सी. बोराल साहब से लेकर आर. डी. बर्मन तक उन्होंने एक लिस्ट बनाई थी जिन पर वो बोलना चाहते थे; लेकिन गीतो के चयन की ज़िम्मेदारी उन्होंने मेरे सर पे डाल दी। और उसी शाम को हम बैठ कर गानें सीलेक्ट किए। ये तो थे पहले के 13 एपिसोड्स जो दूसरे संगीतकारों के बारे में थे। ये तो तैयार हो गए। उसी दिन मैंने सोच लिया था कि आर. सी. बोराल, पंकज मल्लिक, कमल दासगुप्ता, खेमचंद प्रकाश और नौशाद पे पूरा पूरा एपिसोड होगा, बाक़ी सब के दो दो कम्बाइन करेंगे, और कम्बिनेशन भी ठीक ठीक बन रहे थे। ये तो थी दूसरों की बातें, मैं तो सोचने लगा कि अब दादा का संगीत कैसे पेश किया जाए! ये सोचते रात बीत गई कि सीरीज़ का स्ट्रक्चर कैसा रखूँ! यह एक बहुत बड़ी चैलेंज थी। आप शायद यकीन नहीं करेंगे कि कुछ भी प्री-प्लैन्ड नहीं था, सबकुछ बिलकुल स्पॊण्टेनियसली हुआ। अलग अलग विषयों पर उनसे सवाल पूछा; संगीत के अलग अलग प्रकार, शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत, जिनके माध्यम से दादा की सोच को बाहर निकालने की कोशिश करता रहा। हर विधा की चर्चा के बाद उसी विधा में दादा का बनाया हुआ गीत पेश करता था। कुछ बातें ज़रूर रह गईं जैसे कि बंदिश की ठुमरी के बारे में चर्चा। मैंने छाया जी से यह कहा भी था कि दादा से पूरी बातचीत रेकॉर्ड कर लेते हैं क्योंकि ऐसा मौक़ा बार बार नहीं आयेगा, बाद में एडिटिंग में बैठेंगे तो सबकुछ देखा जाएगा। और छाया जी भी इसी मत से सहमत थीं। 

अच्छा तुषार जी, कितने दिनों में रेकॉडिंग्‍ पूरी हुई थी?

बस दो ही दिनों में, एक दिन चार घण्टे और एक दिन 6-7 घण्टे। लेकिन पूरी एडिटिंग्‍ में 4 महीने लग गये। कई जगहों पर बाद में मैंने डब भी किया, जैसे कि सॊंग्‍ डिटैल्स, और कुछ कुछ चीज़ें जो इंटरव्यु के दौरान बतानी रह गयी थी। संगीत और साहित्य विषयक चर्चाएँ काफ़ी हमें काट देनी पड़ी क्योंकि समय की पाबंदी थी। रेकॊर्डिंग्‍ के दौरान दादा में इतना जोश था कि वो रुकते ही नहीं थे, हमने बस एक आध ब्रेक ही लिया चाय पीने के लिए। इस इंटवयु में मैंने पन्ना बाबू वाले प्रोग्राम जैसी भाषा का इस्तमाल नहीं किया जो पढ़के बोलना था। इसमें तो कुछ भी तय नहीं था। और दादा ने मुझसे कुछ भी नहीं पूछा कि तुम क्या क्या पूछोगे। दादा इंटरव्यु के दौरान ख़ुद तो गाते ही थे, मुझे भी गाने को कहते थे। 

अच्छा एक बात बताइए तुषार जी, यह जो शीर्षक है 'रसिकेशु', क्या यह छाया जी या आप ने रखी थी?

बिल्कुल नहीं, यह शीर्षक भी दादा का ही दिया हुआ था, जिसका अर्थ भी उन्होंने बताया था; 'रसिकेशु' यानी रसिकों को समर्पित।

वाह, क्या बात है! अच्छा, इस शृंखला में कुछ एपिसोड्स के बाद से मीना कपूर जी को भी शामिल किया गया था। यह किस तरह से हुआ? क्या यह प्री-प्लैन्ड था या यह भी अकस्मात? कहीं ऐसा तो नहीं कि जिन दो दिनों में रेकॊर्डिंग्‍ हुई थी, उनमें दूसरे दिन मीना जी भी साथ आईं होंगी?

नहीं, मीना दी हमेशा दादा के साथ ही रहती थीं और दोनों दिन वो भी स्टुडियो में तशरीफ़ लायी थीं। मीना दी बहुत ही इंट्रोवर्ट हैं, शाइ हैं। हम लोगों ने उनसे निवेदन किया कि आप भी बातचीत में शामिल हो जाइए। आपने देखा होगा कि उनके इस बातचीत में शामिल हो जाने से पूरी शृंखला में एक अलग रंग आ गया। 

जी हाँ!

दीदी के आने से ऐसी बहुत सारी बातें थीं जो मैं ईज़ीली कर सकता था क्योंकि दादा और दीदी, दोनों ही गा गा के, जो भी विषय होता था, उदाहरण देते थे। दोनों के कुशाग्रता की जितनी भी तारीफ़ की जाये कम है। किसी भी विषय पर उनसे दिलचस्प चर्चा हो सकती थी। और हर विषय में उनके पास उदाहरण देने के लिए गानें मौजूद होते थे। दादा के साथ इतने वर्षों की जो औपचारिकता थी, उन्होंने ख़त्म कर दी। इस शृंखला के ज़रिए मैं उनके और भी बहुत करीब आ गया। इस तरह से 'रसिकेशु' पूरी हुई और जब इसका ब्रॉडकास्ट शुरु होने ही वाला था, उसके पिछले दिन मेरा बहुत बड़ा ऑपरेशन था। और दूसरे दिन से मैं रोज़ सुबह अस्पताल में पड़े पड़े 'रसिकेशु' सुना करता था। 

इस शृंखला के प्रसारण को अनिल दा और मीना दी ने भी रेडियो पर सुना होगा। क्या उन्होंने अपनी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त की?

मुझे उनका लिखा हुआ एक लेटर आया, जिसमें लिखा हुआ था - "MY DEAR PAGLA, YOUR DIDI SAYS THAT THE EDITING IS PERFECT."

वाह! मीना जी के नाम से उन्होंने ही आपकी तारीफ़ की।

जी हाँ, यही तो उनकी ख़ासीयत थी जो दूसरों में मैंने नहीं देखा। और जब 'रसिकेशु' ब्रॉडकास्ट हुई, तब मुझे भी और रेडियो स्टेशन को भी बहुत सारे लेटर्स आये दुनिया भर से, अमेरिका से, कनाडा से, कई लोगों ने लिखा कि उन्होंने इसे रेकॉर्ड कर अपने पास रखा हुआ है। मुझे इस बात की ख़ुशी हुई कि सब जगह अनिल दा की इस शृंखला के चर्चे होने लगे। और इसके बाद दादा टीवी पर भी आना शुरु हो गए। लोगों को उनके बारे में जानकारी हो गई कि वो कहाँ हैं। गजेन्द्र सिंह जी ने मुझसे दादा का फ़ोन नंबर लेकर उन्हें 'सा रे गा मा' में निमंत्रण दिया। इस बात का गर्व है मुझे कि 'रसिकेशु' करने का मौका मिला और मेरे जीवन की एक बहुत ही अविस्मरणीय घटना है। इसके लिए मैं छाया गांगुली जी को और विविध भारती को जितना धन्यवाद दूँ, कम है। लोगों को यह शृंखला पसंद आई और हर साल यह ब्रॉडकास्ट होती चली आ रही है पिछले 13 सालों से, और यह हमारी सफलता का ही चिन्ह है, इसका मुझे आनंद है।

तुषार जी, आपका मैं किन शब्दों में शुक्रिया अदा करूँ समझ नहीं आ रहा है; जिस विस्तार से और प्यार से आपने अनिल दा और मीना कपूर जी  के बारे में हमें बताया, 'रसिकेशु' के बारे में बताया, हमें यकीन है कि हमारे पाठकों को यह बातचीत बहुत पसंद आई होगी। एक बार फिर आपका बहुत बहुत धन्यवाद! 

बहुत बहुत धन्यवाद!


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Monday, November 20, 2017

फिल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड 15 || चित्रगुप्त

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 15
Chitragupt


फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के १५ वें एपिसोड में सुनिए कहानी सुरों के चितेरे चित्रगुप्त की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....



फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -

Sunday, November 19, 2017

ठुमरी हेमन्त : SWARGOSHTHI – 344 : THUMARI HEMANT




स्वरगोष्ठी – 344 में आज

फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व – 1 : ठुमरी हेमन्त

विरह व्यथा की अभिव्यक्ति के लिए चाँद-दूत की परिकल्पना – “चन्दा देश पिया के जा...”




अमीरबाई कर्नाटकी
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ हो रही हमारी नई श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की इस पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला में हमने आपके लिए फिल्मों में पारम्परिक ठुमरी के साथ-साथ उसके फिल्मी प्रयोग को भी रेखांकित किया था। इस श्रृंखला में भी हम फिल्मी ठुमरियों की चर्चा कर रहे हैं, किन्तु ये ठुमरियाँ पारम्परिक नहीं हैं। इन ठुमरी गीतों को फिल्मों के प्रसिद्ध गीतकारों ने लिखा है और संगीतकारों ने इन्हें विभिन्न रागों में बाँध कर ठुमरी गायकी के तत्वों से अभिसिंचित किया है। हमारी इस श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल किये गए ऐसे गीत हैं जिनमे राग, भाव और रस की दृष्टि से उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी के तत्वों का उपयोग हुआ है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे पाँचवें और छठे दशक की फिल्मों में शामिल ऐसी ही कुछ गैर-पारम्परिक चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज हमने आपके लिए 1944 में प्रदर्शित फिल्म “भर्तृहरि” से एक फिल्मी ठुमरी का चयन किया है। इस ठुमरीनुमा गीत को पण्डित इन्द्र ने लिखा है, संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश ने इसे राग हेमन्त के स्वर में बाँधा है और इसे गायिका-अभिनेत्री अमीरबाई कर्नाटकी ने गाया है।


ठुमरी गीतों में “रस निष्पत्ति” एक प्रमुख तत्व होता है। नौ रसों में “श्रृंगार रस” ठुमरी गीतों में प्रमुख रूप से उकेरा जाता है। श्रृंगार रस के दो पक्ष; संयोग और वियोग होते हैं। आज के ठुमरी गीत में श्रृंगार रस के वियोग पक्ष को रेखांकित किया गया है। नायिका अपनी विरह-व्यथा को नायक तक पहुँचाने के लिए वही मार्ग अपनाती है, जैसा कालिदास के "मेघदूत" में अपनाया गया है। "मेघदूत" का यक्ष जहाँ अपनी विरह वेदना की अभिव्यक्ति के लिए मेघ को सन्देश-वाहक बनाता है, वहीं आज के ठुमरी गीत की नायिका अपनी विरह व्यथा की अभिव्यक्ति के लिए चाँद को दूत बनने का अनुरोध कर रही है।

ठुमरी एक भाव-प्रधान, चपल-चाल वाला गीत है। मुख्यतः यह श्रृंगार प्रधान गीत है; जिसमें लौकिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार का श्रृंगार मौजूद होता है। इसीलिए ठुमरी में लोकगीत जैसी कोमल शब्दावली और अपेक्षाकृत हलके रागों का ही प्रयोग होता है। अधिकतर ठुमरियों के बोल अवधी, भोजपुरी अथवा ब्रज भाषा में होते हैं। नृत्य में प्रयोग की जाने वाली अधिकतर ठुमरी कृष्णलीला प्रधान होती हैं। शान्त, गम्भीर अथवा वैराग्य भावों की सृष्टि करने वाले रागों के बजाय चंचल रागों; जैसे पीलू, काफी, जोगिया, खमाज, भैरवी, तिलक कामोद, गारा, पहाड़ी, तिलंग आदि में ठुमरी गीतों को निबद्ध किया जाता है। सम्भवतः हलके या कोमल रागों में निबद्ध होने के कारण ही पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने अपनी पुस्तक "क्रमिक पुस्तक मालिका" में ठुमरी को "क्षुद्र गायन शैली" कहा है। आज की ठुमरी में राग हेमन्त की झलक है। ठुमरी गायन में त्रिताल, चाँचर, दीपचन्दी, जत, दादरा, कहरवा आदि तालों का प्रयोग होता है।

आपके लिए आज हमने जो ठुमरी गीत चुना है; वह 1944 की फिल्म "भर्तृहरि" से है। यह फिल्म उत्तर भारत में बहुप्रचलित 'लोकगाथा' पर आधारित है। इस लोकगाथा के नायक ईसापूर्व पहली शताब्दी में उज्जयिनी (वर्तमान उज्जैन) के राजा भर्तृहरि हैं। यह लोकगाथा भी फिल्म निर्माताओं का प्रिय विषय रहा है। इस लोकगाथा पर पहली बार 1922 में मूक फिल्म बनी थी। इसके बाद 1932, 1944 और 1954 में हिन्दी में तथा 1973 में गुजराती में भी इस लोकगाथा पर फ़िल्में बन चुकी हैं। 1944 में बनी फिल्म "भर्तृहरि" की नायिका सुप्रसिद्ध अभिनेत्री मुमताज शान्ति थीं और इस फिल्म के संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश थे; जिन्होंने उस समय तेजी से उभर रहीं पार्श्वगायिका अमीरबाई कर्नाटकी को इस ठुमरी गीत को गाने के लिए चुना। 1906 में बीजापुर, कर्नाटक में जन्मीं अमीरबाई कर्नाटकी ने 1934 में अपनी बड़ी बहन और प्रसिद्ध अभिनेत्री गौहरबाई के सहयोग से फिल्मों में प्रवेश किया था। इसी वर्ष उन्हें पहली बार फिल्म "विष्णुभक्ति" में अभिनय करने का अवसर मिला। 1934 से 1943 के बीच अमीरबाई ने अभिनय और गायन के क्षेत्र में कड़ा संघर्ष किया। अन्ततः 1943 में उनकी किस्मत तब खुली जब उन्हें 'बोम्बे टाकीज' की फिल्म "किस्मत" में गाने का अवसर मिला। इस फिल्म के गीतों से अमीरबाई को खूब प्रसिद्धि मिली। उन्हें प्रसिद्ध करने में फिल्म के संगीतकार अनिल विश्वास का बहुत बड़ा योगदान था। अमीरबाई कर्नाटकी ने फिल्मों में अभिनय और पार्श्वगायन के अलावा संगीत निर्देशन भी किया था। 1948 में बहाव पिक्चर्स की सफल फिल्म "शाहनाज़" में अमीरबाई ने संगीत निर्देशन किया था। अमीरबाई कर्नाटकी के स्वरों में जो ठुमरी गीत हम आपके लिए प्रस्तुत करने जा रहे हैं; वह ऋतु प्रधान राग "हेमन्त" और कहरवा ताल में निबद्ध है। राग हेमन्त पूर्वी थाट का राग है। इस राग के आरोह में पाँच और अवरोह में सात प्रयोग होते हैं। इस प्रकार यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। आरोह में गान्धार और धैवत स्वर वर्जित होता है। इस राग में ऋषभ, गान्धार और धैवत स्वर कोमल और मध्यम स्वर तीव्र प्रयोग होता है। राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम है। यह ऋतु प्रधान राग होता है, अतः हेमन्त ऋतु में किसी भी समय और अन्य समय में सूर्यास्त के समय (सन्धिप्रकाश के समय) गाया-बजाया जा सकता है। इस राग में श्रृंगार का विरह पक्ष और तड़प का भाव खूब उभरता है। गायिका अमीरबाई कर्नाटकी ने नायिका की विरह-व्यथा को अपने स्वरों के माध्यम से किस खूबी से अभिव्यक्त किया है; यह आप यह ठुमरी गीत सुन कर सहज ही अनुभव कर सकते हैं। यह परम्परागत ठुमरी नहीं है; इसके गीतकार हैं पं. इन्द्र; जिनकी 'चाँद-दूत' परिकल्पना को अमीरबाई कर्नाटकी के स्वरों ने सार्थक किया है।


राग हेमन्त : “चन्दा देश पिया के जा...” : अमीरबाई कर्नाटकी : फिल्म – भर्तृहरि





संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 344वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको 1947 में प्रदर्शित एक पुरानी फिल्म से एक ठुमरीनुमा गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही प्रश्न का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष के अन्तिम अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस सुप्रसिद्ध गायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 25 नवम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 346वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 342वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको एक ठुमरी का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – दीपचन्दी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – विदुषी गिरिजा देवी

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ हमारी नई श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की पहली कड़ी में आपने 1944 में प्रदर्शित फिल्म “भर्तृहरि” के ठुमरीनुमा गीत का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे फिल्मी गीतों पर चर्चा करेंगे जिसमें ठुमरी शैली के दर्शन होंगे। आज आपने जो गीत सुना, उसमें राग हेमन्त की छाया है। इस नई श्रृंखला में भी हम आपसे फिल्मी ठुमरियों पर चर्चा करेंगे और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर भी चर्चा करेंगे तथा सम्बन्धित रागों तथा इस संगीत शैली पर आधारित रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी वर्तमान और आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, November 18, 2017

चित्रकथा - 45: इस दशक के नवोदित नायक (भाग - 7)

अंक - 45

इस दशक के नवोदित नायक (भाग - 7)


"हम भी हैं जोश में..." 




हर रोज़ देश के कोने कोने से न जाने कितने युवक युवतियाँ आँखों में सपने लिए माया नगरी मुंबई के रेल्वे स्टेशन पर उतरते हैं। फ़िल्मी दुनिया की चमक-दमक से प्रभावित होकर स्टार बनने का सपना लिए छोटे बड़े शहरों, कसबों और गाँवों से मुंबई की धरती पर क़दम रखते हैं। और फिर शुरु होता है संघर्ष। मेहनत, बुद्धि, प्रतिभा और क़िस्मत, इन सभी के सही मेल-जोल से इन लाखों युवक युवतियों में से कुछ गिने चुने लोग ही ग्लैमर की इस दुनिया में मुकाम बना पाते हैं। और कुछ फ़िल्मी घरानों से ताल्लुख रखते हैं जिनके लिए फ़िल्मों में क़दम रखना तो कुछ आसान होता है लेकिन आगे वही बढ़ता है जिसमें कुछ बात होती है। हर दशक की तरह वर्तमान दशक में भी ऐसे कई युवक फ़िल्मी दुनिया में क़दम जमाए हैं जिनमें से कुछ बेहद कामयाब हुए तो कुछ कामयाबी की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं। कुल मिला कर फ़िल्मी दुनिया में आने के बाद भी उनका संघर्ष जारी है यहाँ टिके रहने के लिए। ’चित्रकथा’ में आज से हम शुरु कर रहे हैं इस दशक के नवोदित नायकों पर केन्द्रित एक लघु श्रॄंखला जिसमें हम बातें करेंगे वर्तमान दशक में अपना करीअर शुरु करने वाले शताधिक नायकों की। प्रस्तुत है ’इस दशक के नवोदित नायक’ श्रॄंखला की सातवीं कड़ी।




स श्रॄंखला की सातवीं कड़ी में आज जिस नायक का ज़िक्र सबसे पहले करने जा रहे हैं, उन्होंने अपने आप को बहुत ही कम समय में ना केवल सिद्ध किया बल्कि बड़ी तेज़ रफ़्तार से सफलता की सीढ़ियाँ चढते चले जा रहे हैं। सुशान्त सिंह राजपुत का जन्म बिहार की राजधानी पटना में हुआ और पुर्णिया ज़िला उनके पूर्वजों का ज़िला है। वर्ष 2002 में जब सुशान्त मात्र 16 वर्ष के थे, तब उनके माँ के दुनिया से चले जाने से उन्हें बहुत बड़ा धक्का लगा और उसी साल उनका पूरा परिवार पटना से दिल्ली स्थानान्तरित हो गया। पढ़ाई-लिखाई में अच्छे सुशान्त को Delhi College of Engineering में इंजिनीयरिंग् पढ़ने का मौक़ा मिला। भौतिक विज्ञान में सुशान्त National Olympiad Winner रह चुके हैं। यही नहीं उन्होंने कुल ग्यारह इंजिनीयरिंग् एन्ट्रान्स की परीक्षाएँ उत्तीर्ण हुए थे। इतने मेधावी होने के बावजूद सुशान्त ने इंजिनीयरिंग् की पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर अभिनय के क्षेत्र में क़दम रख दिया। पढ़ाई के दिनों में ही उन्होंने शियामक दावर के डान्स क्लासेस में दाख़िला ले लिया था और एक अच्छे डान्सर बन गए थे। डान्स क्लास में कुछ अन्य साथियों के फ़िल्मों के प्रति रुझान का असर उन पर भी हुआ और वो भी बैरी जॉन के ड्रामा क्लासेस जॉइन कर ली। जल्दी ही सुशान्त को शियामक ने अपने डान्स ट्रूप में शामिल कर लिया और वर्ष 2005 में उन्हें ’फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार’ समारोह में बतौर पार्श्व नर्तक के रूप में नृत्य करने का मौका मिल गया। इसके बाद उन्हें और भी कई महत्वपूर्ण फ़ंकशनों में डान्स के मौके मिले और एक में तो उन्होंने ऐश्वर्या राय को भी अपने कंधे पर उठाया था। फ़िल्मों में ब्रेक की उम्मीद से सुशान्त मुंबई चले आए और नादिरा बब्बर की ’एकजुट थिएटर’ में भर्ती हो गए जहाँ पे वो ढाई साल तक रहे और इस दौरान उन्हें कई टीवी विज्ञापनों में अभिनय के मौके मिले। 2008 में ’बालाजी टेलीफ़िल्म्स’ की नज़र सुशान्त पर पड़ी और उनकी प्रतिभा को परखते हुए उन्हें ’किस देश में है मेरा दिल’ धारावाहिक में प्रीत जुनेजा का किरदार निभाने का अवसर दे दिया। कहानी के अनुसार उनके किरदार को जल्दी ही मरना था, लेकिन तब तक वो उस धारावाहिक में इतने लोकप्रिय हो चुके थे कि उनकी मौत को दर्शकों ने ग्रहण नहीं किया और पब्लिक डिमान्ड पर उन्हें शो में वापस लाना पड़ा। इसके बाद 2009 में ’पवित्र रिश्ता’ और 2010 में ’ज़रा नचके दिखा’ और ’झलक दिखला जा’ में उन्हें ख़ूब प्रसिद्धी हासिल हुई। ’पवित्र रिश्ता’ की अपार सफलता के बावजूद सुशान्त ने फ़िल्मों में अपनी क़िस्मत आज़माने के लिए टीवी को अल्विदा कह दिया और विदेश जाकर एक फ़िल्म मेकिंग् कोर्स में भर्ती हो गए। वर्ष 2013 में सुशान्त सिंह राजपुत ने अभिषेक कपूर के ’काइ पो चे’ फ़िल्म के लिए ऑडिशन दिया और उनका निर्वाचन हो गया तीन नायकों में से एक नायक के किरदार के लिए। बाकी के दो नायक थे अमित साध और राजकुमार राव। चेतन भगत के मशहूर उपन्यास ’The 3 Mistakes of My Life’ पर आधारित इस फ़िल्म को अपार सफलता मिली और सुशान्त अपनी पहली फ़िल्म में ही एक सफल अभिनेता के रूप में उभरे। इस फ़िल्म के लिए उनकी भूरी-भूरी प्रशंसा हुई। उनकी दूसरी फ़िल्म थी परिनीति चोपड़ा के साथ ’शुद्ध देसी रोमान्स’, जिसने एक बार बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाबी के झंडे दाढ़ दिए और सुशान्त बन गए हर फ़िल्म प्रोड्युसर के चहेते नायक। 2014 में राजकुमार हिरानी ने अपनी महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’पीके’ में सुशान्त को एक छोटा सा पर सुन्दर किरदार निभाने का मौका दिया और इस तरह से सुशान्त को आमिर ख़ान और अनुष्का शर्मा के साथ काम करने का मौक़ा मिला। 2015 में दिबाकर बनर्जी की फ़िल्म ’डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी’ के लिए सुशान्त को ही चुना गया ब्योमकेश के चरित्र के लिए। रजत कपूर के रूप में ब्योमकेश की जो छवि दर्शकों के दिलों में बरसों से बैठी है, उसे किसी और से प्रतिस्थापित करना आसान नहीं। लेकिन सुशान्त के जानदार और शानदार अभिनय को लोगों ने ख़ूब सराहा। ब्योमकेश एक बाद सुशान्त नज़र आए क्रिकेट कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी के किरदार में। 2016 की फ़िल्म ’एम. एस. धोनी’ को ना केवल व्यावसायिक सफलता मिली बल्कि आलोचनात्मक सफलता भी मिली। इस फ़िल्म के लिए सुशान्त को फ़िल्मफ़ेअर के तहत सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के पुरस्कार के लिए नामांकन मिला। हाल ही में सुशान्त नज़र आए कृति सानोन के साथ फ़िल्म ’राबता’ में। यह फ़िल्म ख़ास नहीं चली। अभी 2017-18 में सुशान्त सिंह राजपुत की कई महत्वपूर्ण फ़िल्में आने वाली हैं; इसमें कोई सन्देह नहीं कि इन सभी फ़िल्मों में सुशान्त अपने अभिनय के जल्वों से सबका दिल जीत लेंगे।

1980 में जम्मु में जन्मे विद्युत जामवाल एक आर्मी अफ़सर के बेटे हैं। इस वजह से वो भारत के कई प्रान्तों में रह चुके हैं। तीन वर्ष की आयु से उन्होंने केरल के पलक्कड के एक आश्रम में कलरिपयट्टु का प्रशिक्षण लिया जो उनकी माँ चलाती थीं। दुनिया भर में घूम कर विद्युत ने अलग अलग तरह के मार्शल आर्टिस्ट्स को ट्रेन किया है और इन सभी का मूल कलरिपयट्टु में ही है। मार्शल आर्ट्स में दुनिया भर में अपनी पहचान बनाने के बाद विद्युत 2008 में मुंबई आए फ़िल्मों में अपनी क़िस्मत आज़माने। शुरुआत उन्होंने मॉडेलिंग् से की। जल्दी ही इंडस्ट्री की नज़र उनकी आकर्षक कदकाठी पर पड़ी और तेलुगू फ़िल्म ’शक्ति’ में अभिनय का मौका मिल गया। इसके बाद निशिकान्त कामत की हिन्दी फ़िल्म ’फ़ोर्स’ में विष्णु के किरदार के लिए चुन लिया गया जिसके लिए हज़ारों युवकों ने ऑडिशन दिया था। ’फ़ोर्स’ में जॉन एब्रहम भी थे, लेकिन दर्शकों को विद्युत जामवाल के ऐक्शन सीन्स ने मन्त्रमुग्ध कर दिया। इस फ़िल्म ने 2012 के लगभग सभी पुरस्कार समारोहों में Most Promising Debut का पुरस्कार विद्युत को दिलवाया। इस फ़िल्म के बाद विद्युत जामवाल कई तेलुगू और तमिल फ़िल्मों में अभिनय किया और दक्षिण में भी उन्हें ख़ूब पसन्द किया गया। हिन्दी में उनकी अगली फ़िल्म आई ’कमांडो’ जिसमें उन्होंने अपने सारे ऐक्शन ख़ुद ही निभाए और दर्शकों को अद्भुत ऐक्शन्स के ज़रिए अचम्भित किया। फ़िल्म के रिलीज़ से पहले केवल प्रोमोज़ के द्वारा ही दर्शकों में खलबली मचा दी और ट्रेलर लौन्च के एक सप्ताह के भीतर दस लाख से ज़्यादा हिट्स आए यूट्युब पर। हालाँकि फ़िल्म को बहुत अधिक सफलता नहीं मिल पायी लेकिन विद्युत के ऐक्शन के चर्चे ख़ूब हुए। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी विद्युत के ऐक्शन की ख़ूब तारीफ़ें हुईं और उनकी तुलना ब्रुस ली और टोनी जा से होने लगी। उनकी कामुकता के आधार पर उन्हें Most Desirable, Fittest Men with Best Bodies, और Sexiest Men Alive जैसे ख़िताब प्राप्त हुए। ’कमांडो’ की सफलता के बाद विद्युत नज़र आए टिग्मांशु धुलिया की फ़िल्म ’बुलेट राजा’ में। टिग्मांशु ने अपनी अगली फ़िल्म ’यारा’ में भी विद्युत को ही चुना है जो बहुत जल्दी रिलीज़ होने वाली है। इस फ़िल्म के अलावा भी विद्युत कई और प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं और आने वाले समय में उनकी कई फ़िल्में रिलीज़ होने वाली हैं। देखना यह है कि वो सफलता की कितनी सीढ़ियाँ चढ़ पाते हैं।

पाक़िस्तानी अभिनेता इमरान अब्बास मूलत: एक पाक़िस्तानी टेलीविज़न अभिनेता हैं और मॉडल रह चुके हैं। ’मेरी ज़ात ज़र्रा-ए-बेनिशान’, ’ख़ुदा और मोहब्बत’, ’मेरा नसीब’, ’पिया के घर जाना है’, ’दिल-ए-मुज़तर’, ’शादी और तुम से?’, ’अलविदा’, और ’मेरा नाम यूसुफ़ है’ जैसी पाकिस्तानी धारावाहिकों में अभिनय करते हुए इमरान बहुत मशहूर हो चुके थे। साल 2013 में उन्हें पाक़िस्तानी फ़िल्म ’अंजुमन’ में बतौर नायक ब्रेक मिला जो एक रोमान्टिक ड्रामा फ़िल्म थी। इमरान अब्बास की ख़ूबसूरती और अभिनय का ज़िक्र सरहद के इस पार भी आ पहुँचा और अगले ही साल उन्हें बॉलीवूड की हॉरर फ़िल्म ’Creature 3D' में बिपाशा बासु के विपरीत नायक का रोल मिल गया। इस फ़िल्म के लिए उन्हें Best Male Debut का फ़िल्मफ़ेअर का नामांकन मिला था। इस फ़िल्म में "मोहब्बत बरसा देना तू सावन आया" गीत ख़ूब लोकप्रिय हुआ था और इमरान व बिपाशा की केमिस्ट्री की भी चर्चा हुई थी। साथ ही फ़िल्म के कामोत्तेजक सीन्स भी सुर्ख़ियों में रही। इमरान अब्बास ने लाहौर के National College of Arts से architecture की पढ़ाई की और वो उर्दू शायरी भी लिखते हैं। 1947 में बटवारे के बाद उनका परिवार लाहौर में ही बस गया था। ’Creature 3D' के बाद इमरान अगली फ़िल्म ’जानिसार’ में नज़र आए जो मुज़फ़्फ़र अली निर्देशित फ़िल्म थी। 2015 में इमरान ’Abdullah: The Final Witness’ में सादिया ख़ान के साथ नज़र आए। इस फ़िल्म को कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल में दिखाया गया था जो 2016 में प्रदर्शित हुआ। इसी वर्ष करण जोहर की फ़िल्म ’ऐ दिल है मुश्किल’ में भी इमरान अब्बास को एक किरदार निभाने का मौका मिला। इमरान अब्बास ने बहुत कम उम्र में ही काफ़ी सफलता हासिल कर ली है। अभी तो उनके सामने एक बहुत लम्बी पारी इन्तज़ार कर रही है। टेलीविज़न और फ़िल्मों के बीच सही ताल मेल बनाए रखते हुए वो निरन्तर अपनी मंज़िल की ओर अग्रसर होते चले जा रहे हैं। हाल में भारत और पाक़िस्तान के बीच संबंध में कड़वाहट की वजह से पाक़िस्तानी कलाकार बॉलीवूड में दाख़िल नहीं हो पा रहे हैं। इस वजह से क्या इमरान अब्बास को फिर कभी किसी बॉलीवूड फ़िल्म में बतौर नायक काम करने को नहीं मिलेगा? कह नहीं सकते। लेकिन अभिनेता तो अभिनेता होता है। चाहे भारत हो या पाक़िस्तान, अपने अभिनय के जादू से वो दर्शकों के दिलों पर यूंही राज करते रहेंगे जैसे कि अब तक करते आए हैं।

तमिल, तेलुगू और हिन्दी सिनेमा में समान रूप से छाने वाले राना डग्गुबाती का जन्म चेन्नई में हुआ था। उनके पिता डग्गुबाती सुरेश बाबू तेलुगू फ़िल्मों के निर्माता रहे हैं। उनके दादा तमिल फ़िल्म इंडस्ट्री के जानेमाने निर्माता डी. रामानयडु हैं। राना के चाचा वेंकटेश और चचेरे भाई नागा चैतन्य भी फ़िल्मों के अभिनेता हैं। हैदराबाद पब्लिक स्कूल से शिक्षा प्राप्त करने के बाद राना ने तेलुगू फ़िल्म जगत में क़दम रखा। बॉलीवूड में राना के पहले क़दम पड़े ’दम मारो दम’ फ़िल्म में जो 2011 में बनी थी। उनके इस हिन्दी डेब्यु को "धमाकेदार" माना गया, इतना ज़्यादा कि उन्हें उस साल का ’The Most Promising Newcomer of 2011' का ख़िताब दिया गया ’दि टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ की तरफ़ से। 2012 में राना डग्गुबाती को ’10th Most Desirable Man of India' का ख़िताब मिला। इसके बाद तेलुगू और कुछ तमिल फ़िल्मों में अभिनय के बाद उनकी अगली हिन्दी फ़िल्म आई 2016 की ’बाहूबली’ जो बहुत कामयाब रही। इस फ़िल्म में राना ने ’भल्लालदेव’ का किरदार निभाया था। इस चरित्र में उनकी भूमिका कुछ हद तक खलनायक की थी। लेकिन उन्हें फ़िल्म समीक्षकों की भूरी भूरी प्रशंसा मिली। 2017 में ’बाहूबली 2’ भी ख़ूब चली। राना डग्गुबाती के अभिनय से सजी कुछ और हिन्दी फ़िल्में हैं - ’डिपार्टमेण्ट’, ’ये जवानी है दीवानी’, ’बेबी’, और ’दि ग़ाज़ी अटैक’। राना डग्गुबाती को ’दम मारो दम’ के लिए ’ज़ी सिने अवार्ड्स’ के अन्तर्गत Best Male Debut और IIFA Awards के अन्तर्गत ’बाहूबली’ के लिए सर्वश्रेष्ठ खलनायक का पुरस्कार मिला है। राना दक्षिण में जितने लोकप्रिय हैं, उतनी ही तेज़ी से वो हिन्दी फ़िल्म जगत में भी नाम कमा रहे हैं। देखना यह है कि क्या भविष्य में वो इन तीनों इंडस्ट्री पर एक समान राज कर पाते हैं या नहीं। राष्ट्रीय पुरस्कार और फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड से समानित राजकुमार राव भी इस पीढ़ी के एक तेज़ी से सफलता की पायदान चढ़ने वाले अभिनेता हैं। राजकुमार राव का असली नाम है राजकुमार यादव। अहिरवाल, गुड़गाँव, हरियाणा के एक अहिरवाल परिवार में जन्मे और पले बढ़े राजकुमार ने दिल्ली विश्वविद्यालय से आर्ट्स में स्नातक की डिग्री प्राप्त की अन्द फिर अभिनय सीखने के लिए Film and Television Institute of India में भर्ती हो गए। यहाँ की पढ़ाई पूरी करते ही उन्होंने मुंबई का रुख़ किया फ़िल्मों में करीयर बनाने के लिए। 2010 में उनका यह सपना पूरा हुआ जब उन्हें ’लव, सेक्स और धोखा’ फ़िल्म में अभिनय करने का मौका मिला। इस फ़िल्म में उनका रोल बड़ा नहीं था। इसके बाद और भी कई फ़िल्मों में छोटे-मोटे किरदार निभाते हुए इन्डस्ट्री में उन्होंने दो साल गुज़ार दिए। 2013 की जिस फ़िल्म से उन्हें प्रसिद्धी मिली, वह थी ’काई पो चे’, जिसके लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कारों के तहत ’श्रेष्ठ सह-अभिनेता’ के पुरस्कार का नामांकन मिला था। उपर हम बता चुके हैं कि यह फ़िल्म सुशान्त सिंह राजपुत के करीअर की भी पहली महत्वपूर्ण फ़िल्म थी। 2013 का वर्ष राजकुमार राव के लिए बहुत अच्छा रहा। ’काई पो चे’ के बाद इसी वर्ष ’शाहिद’ फ़िल्म में शाहिद आज़्मी की भूमिका अदा करते हुए उन्हें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का और साथ ही फ़िल्मफ़ेअर के अन्तर्गत Critics Best Actor का पुरस्कार भी। 2014 में राजकुमार राव ने रोमान्टिक कॉमेडी ’क्वीन’ और ड्रामा ’सिटीलाइट्स’ में मुख्य नायक का किरदार निभाया। 2016 की फ़िल्म ’अलीगढ़’ में एक पत्रकार की सशक्त भूमिका बख़ूबी निभाने की वजह से फ़िल्मफ़ेअर के तहत सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता के पुरस्कार के लिए दूसरी बार नामांकन मिला। राजकुमार राव की कुछ और महत्वपूर्ण फ़िल्मों के नाम हैं ’रागिनी एम एम एस’, ’गैंग्स ऑफ़ वासेपुर 2’, ’चिट्टागौंग’, ’तलाश’, ’डॉली की डोली’, ’हमारी अधूरी कहानी’, ’राबता’, ’बहन होगी तेरी’, ’बरेली की बरफ़ी’। राजकुमार राव अपने हर चरित्र में सही तरीके से उतर जाने के लिए मशहूर हैं। इसके लिए उन्हें कई बार अपने शारीरिक गठन को भी बदला है। उदाहरण के तौर पर ’ट्रैप्ड’ फ़िल्म के लिए उन्होंने 22 दिनों के अन्दर 7 किलो वज़न कम किया है, जबकि ’बोस: डेड ऑर अलाइव’ में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की भूमिका के लिए उन्होंने 11 किलो वज़न बढ़ाया है। सुना जा रहा है कि उनकी आने वाली फ़िल्म में ऐश्वर्या राय बच्चन से उम्र में अधिक दिखने के लिए वो अपनी दाढ़ी बढ़ा रहे हैं।


जलंधर पंजाब के एक बिज़नेस फ़ैमिली में जन्में करण कुन्द्रा घर के सबसे छोटे बेटे हैं। तीन बड़ी बहनों का प्यार-दुलार पा कर बड़े हुए करण ने अपनी स्कूलिंग् राजस्थान के अजमेर के मायो कॉलेज से पूरी की और आगे चल कर अमरीका से MBA किया। वापस आकर वो टेलीविज़न जगत से जुड़े और एकता कपूर की ’कितनी मोहब्बत है’ धारावाहिक में अर्जुन पुंज की भूमिका अदा करते हुए घर घर में चर्चित हो उठे। एक मॉडल और अभिनेता होने के साथ साथ करण एक बिज़नेसमैन भी हैं और उनका एक अन्तराष्ट्रीय कॉल सेन्टर भी है। जलंधर का 'Insignia Shopping Mall' भी उनका ही है। 2008 में ’कितनी मोहब्बत है’ से अभिनय सफ़र शुरु करते हुए करण ने 2009 में एक और धारावाहिक ’दिल की तमन्ना है’ में भी अभिनय किया औए 2010 में ’झलक दिखला जा’ में नज़र आए। फ़िल्म जगत में करण कुन्द्रा का पदार्पण हुआ 2011 की फ़िल्म ’प्योर पंजाबी’ में जिसमें उन्होंने प्रेम की भूमिका निभाई। 2012 की फ़िल्म ’हॉरर स्टोरी’ में नील की भूमिका को लोगों ने सराहा। फिर उसके बाद ’जट रोमान्टिक’, ’मेरे यार कमीने’, ’कंट्रोल भाजी कंट्रोल’ जैसी हास्य फ़िल्मों में अभिनय करने के बाद 2017 में ’मुबारकाँ’ में उन्होंने मनप्रीत संधु की यादगार भूमिका निभाई। 2018 में उनकी अगली फ़िल्म '1921' बन कर तैयार होने जा रही है। करण कुन्द्रा को फ़िल्मों में अभी तक वो कामयाबी नहीं मिली है जो कामयाबी उन्हें टेलीविज़न पर मिली। लेकिन उनकी लगन और मेहनत आगे चल कर फ़िल्मों में रंग लाएगी और उन्हें छोटे परदे के साथ-साथ बड़े परदे पर भी शोहरत हासिल होगी, कुछ ऐसी ही उम्मीद हर करते हैं। विवान शाह नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक के छोटे बेटे हैं। देहरादून के ’दून स्कूल’ से 2009 में स्नातक करने के बाद विवान ने अपना फ़िल्मी सफ़र शुरु किया 2011 की फ़िल्म ’सात ख़ून माफ़’ से जिसमें उन्होंने अरुण कुमार की भूमिका अदा की। उस समय वो मात्र 21 वर्ष के थे। इस फ़िल्म के बाद विवान ने फ़िल्मकार विशाल भारद्वाज के साथ तीन फ़िल्मों में साइन किया। ये फ़िल्में अभी बन नहीं पायी हैं। 2014 में फ़राह ख़ान ने अपनी बड़ी फ़िल्म ’हैप्पी न्यु यीअर’ में विवान को एक अच्छा रोल दिया। रोहन की भूमिका में विवान को इस फ़िल्म में शाहरुख़ ख़ान, दीपिका पडुकोणे, अभिषेक बच्चन, सोनू सूद, बोमन इरानी और जैकी श्रॉफ़ जैसे मंझे हुए अभिनेताओं के साथ काम करने का मौका मिला और उन्हें बहुत कुछ सीखने को मिला। 2015 की फ़िल्म ’बॉम्बे वेल्वेट’ में टोनी की भूमिका में और 2017 की फ़िल्म ’लाली की शादी में लड्डू दीवाना’ में लड्डू की भूमिका में विवान शाह को लोगों ने पसन्द किया। उनके अभिनय क्षमता की प्रशंसा हुई, और अभिनय क्षमता हो ना कैसे जब वो नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक जैसे दिग्गज अदाकारों के बेटे हैं। देखना यह है कि भविष्य में विवान किस तरह से अपनी अलग पहचान इस इंडस्ट्री में बना पाते हैं।

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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