रविवार, 31 जनवरी 2021

राग भैरवी में "सुन ले बापू ये पैग़ाम" : SWARGOSHTHI – 499 : RAG BHAIRAVI

    




स्वरगोष्ठी – 499 में आज 

देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग – 4 

"सुन ले बापू ये पैग़ाम", गांधीजी के आदर्शों की धज्जियाँ उड़ाते समाज की दशा, राग भैरवी के सुरों में




“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर मैं सुजॉय चटर्जी, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, जनवरी का महीना देशभक्ति पर्वों का महीना है - 11 जनवरी को लाल बहादुर शास्त्री जी की पुण्यतिथि, 12 जनवरी को मास्टरदा सूर्य सेन का शहीदी दिवस, 23 जनवरी को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जयन्ती, 26 जनवरी को राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस, 28 जनवरी को लाला लाजपत राय जयन्ती और 30 जनवरी को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि व शहीद दिवस। इन सब को ध्यान में रखते हुए इन दिनों ’स्वरगोष्ठी’ पर जारी है श्रृंखला ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’। अब तक प्रकाशित इस श्रृंखला की तीन कड़ियों में तीन अलग गीतकारों (कवि प्रदीप, आनन्द बक्शी, साहिर लुधियानवी), तीन अलग संगीतकारों (सी रामचन्द्र, कल्याणजी-आनन्दजी, एन. दत्ता) और तीन अलग गायकों (लता, रफ़ी, आशा) के फ़िल्मी देशभक्ति गीतों की चर्चा हुई है। ये गाने हैं "ऐ मेरे वतन के लोगों", "वतन पे जो फ़िदा होगा" और "सारे जहाँ से अच्छा"। आज इस श्रृंखला की चौथी कड़ी में 30-जनवरी को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के अवसर पर एक ऐसे गीत की चर्चा जिसमें उनके आदर्शों और मूल्यों की धज्जियाँ उड़ाते समाज का चित्रण किया गया है।  यह गीत है राग भैरवी पर आधारित फ़िल्म ’बालक’ का गीत "सुन ले बापू ये पैग़ाम, मेरी चिट्ठी तेरे नाम"। गीतकार भरत व्यास, संगीतकार दत्ताराम, गायिका सुमन कल्याणपुर। साथ ही आनन्द लीजिए पंडित रामभाउ बीजापुरे का हारमोनियम पर बजाया राग भैरवी।


शंकर-जयकिशन
के पसन्दीदा रागों में एक महत्वपूर्ण राग रहा है भैरवी। उनके सहायक रह चुके दत्ताराम जब स्वतंत्र रूप से संगीत देने लगे, तब उन्होंने भी राग भैरवी का अपने गीतों में ख़ूब प्रयोग किया। 60 के दशक के अन्त तक आते-आते फ़िल्म संगीत की धारा काफ़ी बदल चुकी थी। पाश्चात्य संगीत काफ़ी हद तक इसमें अपने लिए जगह बना चुका था। 50-60 के दशकों के दिग्गज संगीतकार ढलान पर थे, और कल्याणजी-आनन्दजी, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल और राहुल देव बर्मन के गाने सर चढ़ कर बोलने लगे थे। ऐसे में ना केवल पिछले दौर के बड़े संगीतकार पीछे लुढ़कते गए बल्कि उस दौर के अन्य कमचर्चित संगीतकारों को भी बी और सी-ग्रेड फ़िल्मों से ही गुज़ारा करना पड़ा। और इनमें एक नाम दत्ताराम का है। 1969 में ’कला मण्डल’ के बैनर तले बी. के. आदर्श निर्देशित एक कम बजट की फ़िल्म आयी थी ’बालक’, जिसमें ’बालक’ की भूमिका में परदे पर नज़र आयीं बेबी सारिका। ये वोही बेबी सारिका हैं जो आगे चल कर सारिका के नाम से नायिका बनीं। पर फ़िल्म में उनका किरदार एक बालक का होने की वजह से उनका नाम फ़िल्म की नामावली में बेबी सारिका के बजाय मास्टर सूरज लिखा गया। फ़िल्म के गीतकार थे पंडित भरत व्यास और संगीतकार दत्ताराम। फ़िल्म में बस चार ही गीत थे, चारों एकल गीत और चार अलग-अलग आवाज़ों में - मोहम्मद रफ़ी, आशा भोसले, सुमन कल्याणपुर और शान्ति माथुर। इनमें से जो देशभक्ति गीत है, वह सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में है। फ़िल्म के ना चलने से इन गीतों पर किसी का ख़ास ध्यान नहीं गया, पर प्रस्तुत गीत बड़ा प्रभावशाली गीत है, जिसके बोल है "सुन ले बापू ये पैग़ाम, मेरी चिट्ठी तेरे नाम"। गीत में तीन अन्तरे हैं जिनमें वर्तमान समाज की दयनीय स्थिति का वर्णन किया गया है। बालक महात्मा गांधी जी को पत्र लिख कर दु:ख व्यक्त कर रहा है कि किस तरह से उनके मूल्यों और आदर्शों की दज्जियाँ उड़ायी जा रही हैं। काला धन, काला बाज़ार, रिश्वतखोरी, हिंसा, घेराव, प्रान्तीयता, विदेशी चीज़ों में आसक्ति, चोरी-जमाखोरी, नेताओं की अनैतिकता, बच्चों का तोड़-फोड़, युवाओं का नशे में मत्त होना, इन सब का ज़िक्र है इस गीत में। तीसरे अन्तरे का समापन बड़ा सशक्त है जब गीतकार इस बात की ओर इशारा करते हैं कि एक तरफ़ जहाँ बापू के आदर्शों को ख़ाक में मिलाया जा रहा हैं, वहीं दूसरी तरफ़ उनके समाधि स्थल राजघाट में सुबह-शाम फूल चढ़ाये जा रहे हैं। इस विरोधाभास को बड़ी सुन्दरता से व्यक्त किया गया है गीत में।

दत्ताराम ने "सुन ले बापू ये पैग़ाम" को राग भैरवी के सुरों में ढाला है, जिसके कोमल ऋषभ स्वर में करुणा, दया और संवेदनशीलता का भाव है तो कोमल गान्धार स्वर में आशा का भाव महसूस होता है। कोमल धैवत में जागृति भाव तो कोमल निषाद में स्फूर्ति का सृजन होता है। और भैरवी का शुद्ध मध्यम इन सभी भावों को गाम्भीर्य प्रदान करता है। इस तरह से प्रस्तुत गीत का जो भाव है, उसे और अधिक प्रभावशाली बनाने में भैरवी का महत्वपूर्ण योगदान है। कहरवा ताल में निबद्ध इस गीत में दत्ताराम ने साज़ों की निरर्थक भीड़ नहीं लगायी है, बल्कि एक बहुत ही सादे-सरल कम्पोज़िशन के माध्यम से भरत व्यास के प्रभावशाली शब्दों को प्रस्तुत किया है ताकि भारी-भरकम वाद्यों में ये महत्वपूर्ण बोल कहीं खो ना जाएँ। सुमन कल्याणपुर ने बहुत सी फ़िल्मों में बाल-कलाकारों के लिए प्लेबैक किया है और यह गीत भी उन्हीं में से एक है। तो लीजिए अब आप यह गीत सुनिए।





गीत : “सुन ले बापू ये पैग़ाम...” : फ़िल्म: बालक, गायिका: सुमन कल्याणपुर 



पंडित रामभाउ बीजापुरे
अभी आपने जो गीत सुना, उसमें राग भैरवी के स्वर लगे हैं। स्वरों के माध्यम से प्रत्येक रस का सृजन करने में राग भैरवी सर्वाधिक उपयुक्त राग है। संगीतज्ञ इसे ‘सदा सुहागिन राग’ तथा ‘सदाबहार’ राग के विशेषण से अलंकृत करते हैं। सम्पूर्ण जाति का यह राग भैरवी थाट का आश्रय राग माना जाता है। राग भैरवी में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद सभी कोमल स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां  तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, म ग (कोमल), रे॒ (कोमल), सा  होते हैं। यूँ तो इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला है, किन्तु आमतौर पर इसका गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। राग भैरवी मानसिक शान्ति प्रदान करता है। इसकी अनुपस्थिति से मनुष्य डिप्रेशन, उलझन, तनाव जैसी असामान्य मनःस्थितियों का शिकार हो सकता है। प्रातःकाल सूर्योदय का परिवेश परमशान्ति का सूचक होता है। ऐसी स्थिति में भैरवी के कोमल स्वर- ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद, मस्तिष्क की संवेदना तंत्र को सहज ढंग से ग्राह्य होते है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। भैरवी के स्वरों की सार्थक अनुभूति कराने के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं पंडित रामभाउ बीजापुरे द्वारा हारमोनियम पर बजाया हुआ राग भैरवी। तबले पर उनके साथ संगत की है नारायण गणचारी ने और तानपुरे पर हैं श्रीधर कुलकर्णी। इस रचना के माध्यम से राग भैरवी के मिठास का अनुभव कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। ’स्वरगोष्ठी’ का अगला अंक 500-वाँ अंक है। यह एक विशेषांक होगा जिसमें हम वर्ष 2020 के महाविजेताओं की घोषणा के साथ-साथ उनकी प्रस्तुतियाँ शामिल करेंगे। ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’ श्रृंखला 501-वीं कड़ी से जारी रहेगी।




राग भैरवी : हारमोनियम : कलाकार - पंडित रामभाउ बीजापुरे


संगीत पहेली के महाविजेताओं के लिए सूचना 

वर्ष 2020 में ’स्वरगोष्ठी’ में पूछे गए पहेलियों में भाग लेकर पाँच प्रतियोगी महाविजेता बने हैं। स्वर्गीय कृष्णमोहन जी के निधन के बाद हमने उन पाँच महाविजेताओं की पहचान तो कर ली है जिसकी घोषणा हम अपने 500-वें अंक में करेंगे जो एक विशेषांक होगा महाविजेताओं की प्रस्तुतियों से सजा हुआ। हमने पाँचों महाविजेताओ को ई-मेल के माध्यम से सूचित किया है कि उन्होंने अपनी जो भी प्रस्तुति या मनपसन्द रचना कृष्णमोहन जी को भेजी थी, उन्हें कृपया एक बार फिर से हमें प्रेषित करें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर ताकि हम उन्हें 500-वें अंक में शामिल कर सकें। इस राह में हमें अब तक केवल दो प्रतियोगियों से जवाब मिला है। बाकी तीन प्रतियोगियों से सविनय निवेदन है कि शीघ्रातिशीघ्र हमें वह ईमेल प्रेषित कर दें।

संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। देश के कुछ स्थानों पर अचानक इस वायरस का प्रकोप इन दिनों बढ़ गया है। अप सब सतर्कता बरतें। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें soojoi_india@yahoo.co.in अथवा sajeevsarathie@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


कृष्णमोहन मिश्र जी की पुण्य स्मृति को समर्पित
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग भैरवी में "सुन ले बापू ये पैग़ाम" : SWARGOSHTHI – 499 : RAG BHAIRAVI: 31 जनवरी, 2021



रविवार, 24 जनवरी 2021

राग पीलू और पहाड़ी में "सारे जहाँ से अच्छा" : SWARGOSHTHI – 498 : RAG PILU & PAHADI

   




स्वरगोष्ठी – 498 में आज 

देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग – 3 

"सारे जहाँ से अच्छा", पं रविशंकर ने बांधा पीलू में तो एन. दत्ता ने पहनाया फ़िल्मी जामा पहाड़ी का




“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर मैं सुजॉय चटर्जी, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, जनवरी का महीना देशभक्ति पर्वों का महीना है - 11 जनवरी को लाल बहादुर शास्त्री जी की पुण्यतिथि, 12 जनवरी को मास्टर सूर्य सेन का शहीदी दिवस, 23 जनवरी को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जयन्ती, 26 जनवरी को राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस, 28 जनवरी को लाला लाजपत राय जयन्ती और 30 जनवरी को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि व शहीद दिवस। इन सब को ध्यान में रखते हुए इन दिनों ’स्वरगोष्ठी’ पर जारी है श्रृंखला ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’। अब तक प्रकाशित इस श्रृंखला की दो कड़ियों में "ऐ मेरे वतन के लोगों" और वतन पे जो फ़िदा होगा" गीतों की चर्चा हुई है। आज इस श्रृंखला की तीसरी कड़ी में ज़िक्र एक और बेहद महत्वपूर्ण देशभक्ति गीत का - "सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा"। इस गीत के तमाम संस्करणों में से हम चुन कर लाए हैं दो महत्वपूर्ण संस्करण। पहला, पंडित रविशंकर द्वारा रचा राग मिश्र पीलू में सितार पर बजाया हुआ सन् 1945 का महत्वपूर्ण IPTA संस्करण, और दूसरा, 1959 की फ़िल्म ’भाई बहन’ के लिए संगीतकार एन. दत्ता के निर्देशन में आशा भोसले का गाया गीत जो आधारित है राग पहाड़ी पर।


पंडित रवि शंकर
मशहूर 
शाइर मोहम्मद इक़बाल ने वर्ष 1904 में ग़ज़ल शैली में लिखा था "सारे जहाँ से अच्छा हिदोस्तां हमारा, हम बुलबुले हैं इसकी ये गुलिस्तां हमारा"। इस देशभक्ति ग़ज़ल को ख़ूब पसन्द किया गया जिसे देश के सर्वाधिक लोकप्रिय व महत्वपूर्ण देशभक्ति गीतों में गिना जाता है। इक़बाल जिस अंदाज़ में इसे गाते/ पढ़ते/ सुनाते थे, वह उनका अपना शाइराना अंदाज़ था। यह अंदाज़ आम शाइरों वाला था, जिसमें ठहराव था, शेर-ओ-शाइरी वाला रंग-ढंग था। वर्ष 1945 में सुप्रसिद्ध सितार वादक पंडित रवि शंकर ने राग मिश्र पीलू को आधार बना कर "सारे जहाँ से अच्छा" की एक नई धुन तैयार की। उन्हें लगा कि इस गीत की जो तत्कालीन धुन थी, उसमें जोश कुछ कम था। उनके अनुसार ऐसे देशभक्ति गीत का लय तोड़ा तीव्र होना चाहिए, इसे एक Marching Song के रूप में बजाया जा सके। 1946 में जब वे IPTA के आधिकारिक संगीतकार बने, तब IPTA के अनुरोध पर उन्होंने "सारे जहाँ से अच्छा" की उनकी बनाई धुन को सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया जिसे सुन कर सभी मन्त्रमुग्ध हो गए। यह धुन IPTA के सदस्यों को इतनी पसन्द आयी कि उसके बाद से IPTA के सभी कार्यक्रमों की शुरुआत इसी से हुआ करने लगी। आगे चल कर वर्ष 1976 में दूरदर्शन के सिग्नेचर ट्युन के रूप में पंडित रवि शंकर और उस्ताद अली अहमद हुसैन ने मिल कर जिस धुन की रचना की, वह पंडित रवि शंकर के इसी "सारे जहाँ से अच्छा" की धुन पर आधारित थी। ज़रा दूरदर्शन की उस प्रचलित सिग्नेचर ट्युन को गुनगुना कर देखिए, आपको उसमें इसी "सारे जहाँ से अच्छा" की धुन की झलक मिलेगी।

अब कुछ बातें राग पीलू से सम्बन्धित। राग पीलू का सम्बन्ध काफी थाट से जोड़ा जाता है। आमतौर पर इस राग के आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित किया जाता है। अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इसलिए राग की जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर प्रयोग होते हैं। इस राग में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वर के कोमल और शुद्ध, दोनों रूप का प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन-वादन का समय दिन का तीसरा प्रहर माना गया है। इस राग के प्रयोग करते समय प्रायः अन्य कई रागों की छाया दिखाई देती है, इसीलिए राग पीलू को संकीर्ण जाति का राग कहा जाता है। यह चंचल प्रकृति का और श्रृंगार रस की सृष्टि करने वाला राग है। इस राग में अधिकतर ठुमरी, दादरा, टप्पा, गीत, भजन आदि का गायन बेहद लोकप्रिय है। क्योंकि इस राग के स्वरूप को कलाकार की शैली और व्याख्या पर छोड़ दिया जाता है, इसलिए इसे कई बार मिश्र पीलू के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। तो आइए इसी मिश्र पीलू पर आधारित सितार पर पंडित रवि शंकर द्वारा संगीतबद्ध किया हुआ "सारे जहाँ से अच्छा" की धुन सुनते हैं जिसे प्रस्तुत किया है प्रसिद्ध सितार वादक गौरव मजुमदार ने। उनके साथ संगत किया है चेलो पर बैरी फ़िलिप्स्, शहनाई पर अश्वनी शंकर और तबले पर अरुप चट्टोपाध्याय ने।  




सितार : “सारे जहाँ से अच्छा...” : वादक: गौरव मजुमदार, संगीत : पंडित रवि शंकर



आशा भोसले और एन. दत्ता
"सारे जहाँ से अच्छा" गीत के फ़िल्मी संस्करणों की अगर बात करें तो सबसे लोकप्रिय संस्करण 1959 की फ़िल्म ’भाई बहन’ में सुनने को मिलता है। संगीतकर दत्ता नाइक, जिन्हे हम एन. दत्ता के नाम से जानते हैं, ने राग पहाड़ी में इस गीत को एक नया जामा पहनाया, और आशा भोसले की सुरीली आवाज़ में ढल कर यह गीत सीधे श्रोताओं के कानों से होते हुए दिल में उतर गया। वैसे इस संस्करण में "सारे जहाँ से अच्छा" मूल गीत का केवल मुखड़ा ही लिया गया है। अन्तरे लिखे हैं फ़िल्म के गीतकार साहिर लुधियानवी ने। इसलिए इस गीत में गीतकार का नाम इक़बाल नहीं बल्कि साहिर लुधियानवी दिया गया है। फ़िल्मांकन में बेबी नाज़ नज़र आते हैं स्कूली छात्र-छात्राओं के साथ, और उनमें डेज़ी इरानी भी शामिल हैं।  भारतीय संगीत के कई रागों का उद्गम लोक संगीत से हुआ है। इन्हीं में से एक है राग पहाड़ी, जिसकी उत्पत्ति भारत के पर्वतीय अंचल में प्रचलित लोक संगीत से हुई है। यह राग बिलावल थाट के अन्तर्गत माना जाता है। राग पहाड़ी में मध्यम और निषाद स्वर बहुत अल्प प्रयोग किया जाता है। इसीलिए राग की जाति का निर्धारण करने में इन स्वरों की गणना नहीं की जाती और इसीलिए इस राग को औड़व-औड़व जाति का मान लिया जाता है। राग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। इसका चलन चंचल है और इसे क्षुद्र प्रकृति का राग माना जाता है। इस राग में ठुमरी, दादरा, गीत, ग़ज़ल आदि रचनाएँ खूब मिलती हैं। आम तौर पर गायक या वादक इस राग को निभाते समय रचना का सौन्दर्य बढ़ाने के लिए विवादी स्वरों का उपयोग भी कर लेते हैं। मध्यम और निषाद स्वर रहित राग भूपाली से बचाने के लिए राग पहाड़ी के अवरोह में शुद्ध मध्यम स्वर का प्रयोग किया जाता है। मन्द्र धैवत पर न्यास करने से राग पहाड़ी स्पष्ट होता है। इस राग के गाने-बजाने का सर्वाधिक उपयुक्त समय रात्रि का पहला प्रहर माना जाता है। राग पहाड़ी के स्वरूप को स्पष्ट रूप से अनुभव करने के लिए अब आप इसी राग पर आधारित फ़िल्म ’भाई बहन’ की वह रचना सुनिए आशा भोसले की आवाज़ में।





गीत : "सारे जहाँ से अच्छा...", फ़िल्म: भाई बहन  (1959), गायक: आशा भोसले


संगीत पहेली के महाविजेताओं के लिए सूचना 

वर्ष 2020 में ’स्वरगोष्ठी’ में पूछे गए पहेलियों में भाग लेकर पाँच प्रतियोगी महाविजेता बने हैं। स्वर्गीय कृष्णमोहन जी के अचानक निधन से हम उन पाँच महाविजेताओं की पहचान पूरी तरह से कर पाने में अब तक असमर्थ रहे हैं। परन्तु हमें पता चला है कृष्णमोहन जी ने उन सभी पाँच प्रतियोगियों को ई-मेल द्वारा उनके प्रथम पाँच विजेताओं में होने की सूचना दी थी। इनमें से कुछ नामों की जानकारी हमें पिछले दिनों प्राप्त हुई है, पर अब भी कुछ नामों की जानकारी हमें नहीं मिल पायी है। हम चाहते हैं कि ’स्वरगोष्ठी’ के 500-वें अंक में हम पाँचों महाविजेताओं के नामों की घोषणा एक साथ करें जिसके लिए हम आप से सहयोग की आशा करते हैं। आपसे अनुरोध है कि कृष्णमोहन जी द्वारा आपको भेजे गए उस ईमेल को आप हमें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर भेज दें। इस तरह से 500-वें अंक में हम पाँचों महाविजेताओं की घोषणा कर सकेंगे।  


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। देश के कुछ स्थानों पर अचानक इस वायरस का प्रकोप इन दिनों बढ़ गया है। अप सब सतर्कता बरतें। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें soojoi_india@yahoo.co.in अथवा sajeevsarathie@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


कृष्णमोहन मिश्र जी की पुण्य स्मृति को समर्पित
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग पीलू और पहाड़ी : SWARGOSHTHI – 498 : RAG PILU & PAHADI : 24 जनवरी, 2021 



रविवार, 17 जनवरी 2021

राग गुजरी तोड़ी : SWARGOSHTHI – 497 : RAG GUJARI TODI

  




स्वरगोष्ठी – 497 में आज 

देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग – 2 

"वतन पे जो फ़िदा होगा, अमर वो नौजवाँ होगा"... देशभक्ति के करुण स्वर, राग गुजरी तोड़ी में




“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर मैं सुजॉय चटर्जी, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। जब देशभक्ति गीतों की बात चलती है, तब सबसे पहले ऐसे जोशीले गाने याद आते हैं जो हमारे अन्दर देशभक्ति का जस्बा पैदा करते हैं, जिन्हें सुनते हुए हमारा ख़ून गर्म हो जाता है। पर बहुत से देशभक्ति गीत ऐसे भी हैं जो तीव्र लय वाले जोशीले रंग के नहीं, बल्कि ऐसे दिल को छू लेने वाली धुनों से सजे हैं कि जिन्हें सुनते हुए ना केवल देशभक्ति की लहर हमारी रगों में उमड़ने लगती हैं बल्कि इन गीतों के करुण पक्ष की वजह से ये हमारी आँखें भी नम कर जाती हैं। देशभक्ति के सुमधुर सुरों में ढले ऐसे कई गीत हैं जो शास्त्रीय रागों पर आधारित हैं। और ऐसे ही राग आधारित देशभक्ति गीतों से सजी है ’स्वरगोष्ठी’ की वर्तमान श्रृंखला - ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में हमने चर्चा की थी राग आसावरी पर आधारित गीत "ऐ मेरे वतन के लोगों" की। आज इसकी दूसरी कड़ी में प्रस्तुत है फ़िल्म ’फूल बने अंगारे’ के गीत "वतन पे जो फ़िदा होगा, अमर वो नौजवाँ होगा" से सम्बन्धित जानकारी। यह गीत आधारित है राग गुजरी तोड़ी पर। साथ ही सुनिए राग गुजरी तोड़ी में सारंगी पर उस्ताद सुल्तान ख़ाँ की बजायी हुई एक सुमधुर रचना।


कल्याणजी-आनन्दजी के साथ मोहम्मद रफ़ी
1962
 में भारत-चीन युद्ध के समाप्त होने पर हमारे कई फ़िल्मकारों ने युद्ध की पार्श्वभूमि पर फ़िल्में बनाईं। ’स्वरगोष्ठी’ के पिछले अंक में "ऐ मेरे वतन के लोगों" गीत की जो हमने चर्चा की थी, यह गीत पहली बार 27 जनवरी 1963 को गाया गया था। और इसी वर्ष फ़िल्म आयी ’फूल बने अंगारे’ जो देशभक्ति के रंग से रंगी हुई थी। गीतकार आनन्द बक्शी ने फ़िल्म के लिए ऐसा कोई शीर्षक गीत तो नहीं लिखा कि जिसके मुखड़े में फ़िल्म का शीर्षक आता हो, पर इस फ़िल्म के लिए लिखे देशभक्ति गीत "वतन पे जो फ़िदा होगा" के एक अन्तरे में बड़ी ख़ूबसूरती से उन्होंने लिखा है - "चमन वालों की ग़ैरत को है सय्यादों ने ललकारा, उठो हर फूल से कहदो के बन जाए वो अंगारा..."। सरल शब्दों में गहरीबात कहने की कला में माहिर थे आनन्द बक्शी। बक्शी साहब कभी फ़ौज में रहे थे और एक सिपाही की कर्मठता और उसके देश प्रेम को बहुत करीब से जाना था उन्होंने। और जब कभी उन्हें देशभक्तिपूर्ण गीत लिखने का मौका मिला, उन्होंने इस जस्बे को भी बहुत प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया। और यह गीत मिसाल है इसी जस्बे का। एक रेडियो कार्यक्रम में बक्शी साहब फ़ौजियों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं, "साथियों, यह तो होने वाली बात थी कि आज बजाय संगीन के मेरे हाथ में कलम है। इस फ़िल्मी दुनिया में भी आप (फ़ौजियों) का सिखाया हुआ सबक भुलाया नहीं है।
मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में, संगीतकार कल्याणजी-आनन्दजी की धुनों में पिरो कर जब आनन्द बक्शी के ये दिल को छू लेने वाले बोल गूंज उठे तो जैसे सुनने वालों की रगों में देशप्रेम की लहरें मचलने लगीं। फ़िल्म में भले छ: गीत रहे हों, पर इनमें से बस दो गीत ही सही मायनों में लोकप्रिय हुए। मुकेश की आवाज़ में "चाँद आहें भरेगा, फूल दिल थाम लेंगे" और दूसरा आज का प्रस्तुत देशभक्ति गीत। जहाँ एक ओर "चाँद आहें भरेगा" गीत को कल्याणजी-आनन्दजी ने राग भैरवी के स्वरों से सजाया, वहीं दूसरी तरफ़ शहीदों को सलाम करता, बल्कि देश के नौजवनों को शहादत के लिए प्रोत्साहित करता गीत "वतन पे जो फ़िदा होगा" को उन्होंने सजाया राग गुजरी तोड़ी में। गुजरी तोड़ी राग एक गम्भीर राग है और इस गीत की गम्भीरता और करुण रस को ध्यान में रखते हुए इस राग का प्रयोग सार्थक बन पड़ा है। इसी तरह से एक और प्रचलित गम्भीर रचना है 1968 की फ़िल्म ’आशीर्वाद’ में, "एक था बचपन, बचपन के एक बाबूजी थे..."। संगीतकार वसन्त देसाई ने इस गीत को इसी राग पर आधारित किया था। "वतन पे जो..." और "एक था बचपन..." गीतों के बीच एक और समानता यह भी है कि दोनों गीत दादरा ताल में निबद्ध है।  यूं तो राग तोड़ी पर आधारित हिन्दी फ़िल्मी गीत बहुत से हैं, राग गुजरी तोड़ी पर आधारित फ़िल्मी गीतों की संख्या अधिक नहीं है।


1963 में ’फूल बने अंगारे’ के बाद दो वर्ष के ही अन्दर, 1965 की फ़िल्म ’हिमालय की गोद में’ में भी कल्याणजी-आनन्दजी ने राग गुजरी तोड़ी पर आधारित एक गीत की रचना की थी जिसे ख़ूब सुना गया और आज भी रेडियो पर अक्सर सुनने को मिल जाता है। मुकेश की दर्द भरी आवाज़ में यह गीत है "मैं तो इक ख़्वाब हूँ, इस ख़्वाब से तू प्यार ना कर"। जैसा कि हमने ऊपर कहा है कि गुजरी तोड़ी एक गम्भीर प्रकृति का राग है, इसलिए इस राग में दर्द और भक्ति रस के गाने अधिक निखर कर सामने आते हैं। "मैं तो इक ख़्वाब हूँ" में जहाँ दर्द छुपा हुआ है, वहीं दूसरी तरफ़ इसी राग पर आधारित अनुप जलोटा के गाये प्रसिद्ध भजन "वो काला एक बांसुरी वाला" भक्ति रस से ओतप्रोत है। और जब दर्द और भक्ति, दोनों को एक साथ पिरोने की बात आती है, तब कल्याणजी-आनन्दजी की रचनात्मकता जन्म देती है "वतन पे जो फ़िदा होगा" जैसे गीत को, जिसमें शहादत का "दर्द" भी है और देश के प्रति "भक्ति" भी। निस्संदेह इस फ़िल्म के सिचुएशन में इस गीत के माध्यम से जिस भाव को उजागर करने की कोशिश की गई है, वह भाव गुजरी तोड़ी में ढल कर और भी सशक्त हो गया है। लीजिए नीचे दिए हुए लिंक पर क्लिक करके इस गीत को सुनिए और फ़िल्मांकन को देखते हुए महसूस कीजिए कि किस तरह से राग गुजरी तोड़ी के सुरों ने गीत में छुपे देशभक्ति और दर्द के भावों को उजागर किया है। एक तरफ़ फ़ौजी युद्ध पर जाने को तैयार है, उसके अन्दर देशभक्ति मचल रही है, और दूसरी तरफ़ उसकी पत्नी उसे विदा कर रही हैं। फ़ौजी की देशभक्ति और उसकी पत्नी का दर्द, ये ही दो भाव यह गीत उजागर कर रहा है। यह गीत आज के दौर के गायकों को भी प्रेरित करता है। जानेमाने गायक जावेद अली कहते हैं, "मुझे अगर कहा जाए कि देशभक्ति गाना गाओ, तो सबसे पहले यह गाना गाता हूँ। यह गाना मुझे इतना पसन्द है। और इतनी ख़ूबसूरते के साथ इसे गाया है रफ़ी साहबने कि तारीफ़ के लायक शब्द नहीं है मेरे पास, और उतना ही ख़ूबसूरत म्युज़िक है कल्याणजी-आनन्दजी भाई का इसमें।"





गीत : “वतन पे जो फ़िदा होगा...” : फ़िल्म: फूल बने अंगारे, गायक : मोहम्मद रफ़ी


उस्ताद सुल्तान ख़ाँ
राग गुजरी तोड़ी को गुर्जरी तोड़ी भी कहा जाता है। इसकी शुरूआत गुजरात में होने की वजह से ऐसा नाम पड़ा है। ऐसी भी मान्यता है कि ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर की गूजरी रानी मृगनयनी ने इस राग की रचना की थी जिस वजह से इसका नाम गुर्जरी तोड़ी पड़ा। 
राग तोड़ी की अपेक्षा इस राग में कोमल रिषभ को दीर्घ रूप में प्रयुक्त किया जाता है। इसमें र, ग, ध कोमल और म स्वर तीव्र लगता है। इस राग में प नहीं लगता। इस राग का विस्तार तीनों सप्तकों में किया जा सकता है। इस राग का गायन व वादन समय दिन का दूसरा प्रहर है। अगर अन्य रागों से गुजरी तोड़ी की समानता की बात करें तो यह राग मियां की तोड़ी और बहादुरी तोड़ी के करीब है। राग गुजरी तोड़ी एक प्राचीन राग है जिसे समय-समय पर बहुत से दिग्गजों ने गाया है, बजाया है। उदाहरण स्वरूप, मेवाती घराने के वरिष्ठतम कलाकार पंडित जसराज, जयपुर अतरौली घराने की बेहद सम्मानीय कलाकार अश्विनी भीड़े देशपांडे और भारत रत्न से सम्मानित शहनाई सम्राट उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का राग गुर्जरी तोड़ी प्रसिद्ध है। पर आज हम यहाँ आपको गुजरी तोड़ी का जो रूप सुनवा रहे हैं, उसे सारंगी पर बजाया गया है। कलाकार हैं उस्ताद सुल्तान ख़ाँ। तो आप यह सुमधुर रचना सुनिए और हमें आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 




राग  गुजरी तोड़ी : सारंगी : उस्ताद सुल्तान ख़ाँ


संगीत पहेली के महाविजेताओं से क्षमा याचना

"स्वरगोष्ठी" के 495 और 496 वें अंक में वर्ष 2020 के महाविजेताओं के नामों की घोषणा के साथ-साथ महाविजेताओं की प्रस्तुतियाँ सम्मिलित की जानी थीं। अंक 495 में चौथे और पाँचवें महाविजेताओं की घोषणा भी हो चुकी थी। परन्तु कृष्णमोहन मिश्र जी के अचानक निधन की वजह से पहले, दूसरे और तीसरे महाविजेताओं के नाम अज्ञात् ही रह गए। पूरे वर्ष में पूछी गईं पहेलियों के सही उत्तर देने वाले प्रतिभागियों की तालिका और आंकड़ें कृष्णमोहन जी के कम्प्युटर पर होने की वजह से ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ टीम इन्हें प्राप्त नहीं कर पायी है। अत: हमें खेद है कि हम वर्ष 2020 के प्रथम तीन महाविजेताओं के नामों की घोषणा कर पाने में असमर्थ हैं। आशा है आप सभी हमारी विवशता को समझेंगे और हमें इस बात के लिए क्षमा करेंगे। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। देश के कुछ स्थानों पर अचानक इस वायरस का प्रकोप इन दिनों बढ़ गया है। अप सब सतर्कता बरतें। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

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कृष्णमोहन मिश्र जी की पुण्य स्मृति को समर्पित
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग गुजरी तोड़ी : SWARGOSHTHI – 49े7 : RAG GUJARI TODI : 17 जनवरी, 2021 



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