शनिवार, 12 मई 2018

चित्रकथा - 68: इस दशक के नवोदित नायक (भाग - 10)

अंक - 68

इस दशक के नवोदित नायक (भाग - 10)

"नहीं समझे हैं वो हमें, तो क्या जाता है..." 




हर रोज़ देश के कोने कोने से न जाने कितने युवक युवतियाँ आँखों में सपने लिए माया नगरी मुंबई के रेल्वे स्टेशन पर उतरते हैं। फ़िल्मी दुनिया की चमक-दमक से प्रभावित होकर स्टार बनने का सपना लिए छोटे बड़े शहरों, कसबों और गाँवों से मुंबई की धरती पर क़दम रखते हैं। और फिर शुरु होता है संघर्ष। मेहनत, बुद्धि, प्रतिभा और क़िस्मत, इन सभी के सही मेल-जोल से इन लाखों युवक युवतियों में से कुछ गिने चुने लोग ही ग्लैमर की इस दुनिया में मुकाम बना पाते हैं। और कुछ फ़िल्मी घरानों से ताल्लुख रखते हैं जिनके लिए फ़िल्मों में क़दम रखना तो कुछ आसान होता है लेकिन आगे वही बढ़ता है जिसमें कुछ बात होती है। हर दशक की तरह वर्तमान दशक में भी ऐसे कई युवक फ़िल्मी दुनिया में क़दम जमाए हैं जिनमें से कुछ बेहद कामयाब हुए तो कुछ कामयाबी की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं। कुल मिला कर फ़िल्मी दुनिया में आने के बाद भी उनका संघर्ष जारी है यहाँ टिके रहने के लिए। ’चित्रकथा’ के अन्तर्गत पिछले कुछ समय से हम चला रहे हैं इस दशक के नवोदित नायकों पर केन्द्रित यह लघु श्रॄंखला जिसमें हम बातें करते हैं वर्तमान दशक में अपना करीअर शुरु करने वाले नायकों की। प्रस्तुत है ’इस दशक के नवोदित नायक’ श्रॄंखला की दसवीं कड़ी।



Johny Baweja, Kanan Gill
छोटे-बड़े शहरों से नवयुवकों का मायानगरी मुंबई आ कर फ़िल्म जगत में नायक बनने का सपना कोई नई बात नहीं है। यह सिलसिला शुरू से ही चली आ रही है। लेकिन वर्तमान दशक में नवागंतुकों की संख्या में बहुत बड़ी वृद्धि हुई है। इस श्रॄंखला में अब तक इस दशक के नवोदित कुल 97 अभिनेता नायकों की बात हम कर चुके हैं और सूची अभी भी काफ़ी लम्बी है। आज शुरू करते हैं जॉनी बवेजा से। पंजाब के लुधियाना में जन्में जॉनी बवेजा फ़िल्म निर्माता व वितरक तरलोचन (त्रिलोचन) एस. बवेजा के सुपुत्र हैं और जानेमाने अभिनेता हरमन बवेजा के चचेरे भाई भी। उनका असली नाम है गुरजोत सिंह बवेजा। लुधियाना के गुरु नानक पब्लिक स्कूल से पढ़ाई करने के बाद गुरजोत जलंधर जा कर Apeejay Institute of Management से BCA की डिग्री ली। बचपन से ही ग्लैमर जगत में नाम कमाने की तमन्ना रखने वाले गुरजोत चंडीगढ़ जा कर दो साल तक थिएटर में अभिनय किया और इस तरह से अपने अभिनय क्षमता का आंकलन किया। गुरजोत ने अपना नाम बदल कर जॉनी रख लिया और मुंबई का रुख़ किया। सुन्दर चेहरे और सुडौल कदकाठी के चलते उन्हें मॉडलिंग् के काम मिलने लगे। साथ ही उन्होंने रोशन तनेजा स्कूल ऑफ़ ऐक्टिंग् में अभिनय की बारीकियाँ सीखने के लिए भर्ती हो गए। वर्ष 2006 में जॉनी बवेजा ने 'Grasim Mr. India' प्रतियोगिता में भाग लिया और फ़ाइन राउण्ड तक पहुँचे। इससे उनका आत्मविश्वास बहुत बढ़ गया। लेकिन फ़िल्मों में ब्रेक के लिए उन्हें और छह साल का इन्तज़ार करना पड़ा। 2012 में जॉनी बवेजा और उनकी दोस्त रीत मजुमदार ने मिल कर एक फ़िल्म में पैसा लगाया और इन दोनों के लिए यह फ़िल्म एक तरह से लौंच पैड बनी। ’SWEN’ (short form of South West East North) नामक इस फ़िल्म की कहानी चार अलग तरह की लड़कियों और उन चारों का एक लड़के अभय से रिश्ते की कहानी थी। अभय की भूमिका में जॉनी ने अच्छा काम तो किया, लेकिन लो बजट की इस फ़िल्म में वह बात नहीं थी जो दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करती। चार साल बाद जॉनी और रीत ने मिल कर फिर एक बार एक फ़िल्म का निर्माण किया। ’A Scandall' नामक यह फ़िल्म चर्चा में रही विवादों की वजह से। इस फ़िल्म में जॉनी और रीत के कुछ ऐसे अन्तरंग दृश्य दिखाए गए जो इससे पहले कभी किसी हिन्दी फ़िल्म में नहीं देखा गया था। साथ ही फ़िल्म के निर्माण के दौरान उन दोनों का एक आपत्तिजनक MMS लीक हो जाने पर विवाद खड़ा हो गया था क्योंकि कुछ लोगों का यह मानना था कि उस MMS को जान बूझ कर फ़िल्म की पब्लिसिटी के लिए लीक किया गया था। लेकिन ये तमाम स्कैन्डल ’A Scandall' को डूबने से बचा ना सके। जॉनी बवेजा ने हार नहीं मानी और अपनी तीसरी फ़िल्म ’अमीरा’ का निर्माण शुरू कर दिया। 2017 में आई इस फ़िल्म में जॉनी ने रीत को अपने से अलग करते हुए अमरीकी अभिनेत्री Candace McAdams के साथ मिल कर इस फ़िल्म का निर्माण किया और उन्हें फ़िल्म की नायिका के रूप में भी कास्ट किया। जॉनी बवेजा की ख़ास बात यह है कि वो अपने तीनों फ़िल्मों में अलग अलग भूमिकाओं में नज़र आए और हर बार कुछ नया करने की कोशिश की है। हम उम्मीद करते हैं कि भविष्य में कामयाबी उनके क़दम चूमे। अगर यह पूछा जाए कि एक ऐसे हास्य कलाकार का नाम बताएँ जो आगे चल कर फ़िल्मी नायक बने हैं, तो शायद सबसे पहले कपिल शर्मा का नाम याद आए। लेकिन इस सवाल का एक जवाब कानन गिल भी है। कानन गिल भी एक स्टैंड-अप कमीडियन हैं जिन्होंने हाल ही में फ़िल्म जगत में पदार्पण किया है। बरेली में जन्में कानन के पिता एक आर्मी अफ़सर रहे। कानन की शिक्षा Ahlcon Public School और Frank Anthony Public School में हुई। Computer Science में B.E. करने के बाद वो software engineer की नौकरी तीन सालों तक करते रहे। इसी दौरान उन्होंने Punchline Bangalore नामक हास्य प्रतियोगिता में भाग लेकर प्रथम स्थान प्राप्त किया। फिर मुंबई में Comedy Store प्रतियोगिता भी जीता। इसके बाद उन्होंने कॉमेडी में अपना करीअर बनाने की सोची। उन्होंने एक म्युज़िक बैण्ड बनाई जिसके वो मुख्य गायक बने और मज़ेदार गीतों की रचना करने लगे। Youtube पर उनकी सीरीज़ Pretentious Movie Reviews को काफ़ी प्रसिद्धी मिली। 2017 में सुनील सिप्पी की हास्य-ड्रामा फ़िल्म ’नूर’ में उन्हें कास्ट किया गया। फ़िल्म की नायिका और शीर्षक चरित्र की भूमिका में सोनाक्षी सिंहा थीं। साद सहगल की भूमिका में कानन गिल ने अपने अभिनय से दर्शकों को गुदगुदाया। फ़िल्म की कहानी आम फ़िल्मी कहानियों से अलग हट कर होने के बावजूद कुछ ख़ास नहीं चली। अब देखना यह है कि क्या कानन फ़िल्मों में बने रहते हैं या फिर वो केवल हास्य कार्यक्रमों का ही हिस्सा बनते हैं। 

Kashyap, Ankur Verma
2017 में ’लव यू फ़ैमिली’ और ’सल्लु की शादी’ जैसी फ़िल्मों के ज़रिए फ़िल्म जगत में पदार्पण करने वाले नवोदित नायक हैं कश्यप। सुन्दर चेहरा, प्रतिभा और मेहनत करने की क्षमता व इच्छा के धनी कश्यप ने 2017 में इन दो फ़िल्मों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। ख़ास तौर से ’लव यू फ़मिली’ में उनके अभिनय की प्रशंसा फ़िल्म समालोचकों ने की है। महानगरों में भले ये दोनों फ़िल्में ख़ास ना चली हों, लेकिन मध्यम और छोटे शहरों में प्रदर्शन अच्छा रहा। कश्यप बताते हैं कि वो अभिनेता सलमान ख़ान के बहुत बड़े फ़ैन हैं, और इसी वजह से ’सल्लु की शादी’ फ़िल्म में उनके द्वारा निभाए चरित्र में पूरी तरह से ढल गए, और इसी वजह से उनकी तारीफ़ें हुईं। कश्यप फ़िल्म जगत के जाने-माने टेक्निकल स्पेशलिस्ट व फ़ैशन फ़ोटोग्राफ़र महेश जॉली के सुपुत्र हैं। बचपन से अपने पिता को फ़िल्म जगत से जुड़ा देख कर बड़े होने वाले कश्यप के मन में भी बचपन से ही फ़िल्मी क्षेत्र में कुछ करने का मन था। युवावस्था में उनकी रुचि अभिनय में हुई और इस तरह से वो अपने सपनों और इच्छाओं को रूप प्रदान करने इस क्षेत्र में कूद पड़े हैं। जॉनी बवेजा की तरह कश्यप ने भी रोशन तनेजा से अभिनय की बारीकियाँ सीखी और ऐनिमेशन में डिग्री कोर्स भी किया। मार्शल आर्ट्स और नृत्य में भी उनकी गहरी रुचि है, जो उन्हें बहुमुखी प्रतिभा के धनी बनाते हैं। उनकी शुरुआती दो फ़िल्मों में उनके अभिनय से प्रभावित होकर कई फ़िल्मकारों ने उन्हें आनेवाली फ़िल्मों के लिए न्योता दिया है, जिनमें वरिष्ठ अभिनेता अनुपम खेर के साथ एक फ़िल्म भी शामिल है। कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि युवा अभिनेता कश्यप फ़िल्म जगत में अपने क़दम जमाने शुरु कर दिए हैं और यकीनन वो एक लम्बी रेस दौड़ने वाले हैं। 2018 में अपना फ़िल्मी सफ़र शुरू करने वाले
Arpit Soni
अभिनेताओं में एक नाम है
मोहित अरोड़ा का। फ़िल्म थी ’हसीना’। इस फ़िल्म में उन्होंने राजन का किरदार निभाया था। विक्की राणावत द्वारा निर्मित व निर्देशित यह फ़िल्म युवाओं की फ़िल्म है जिसमें तीन युवक हैं जो एक सुन्दर हसीना को पाने के लिए अपने अपने तरीके इख़्तियार करते हैं। ये तीन युवक हैं रोहित, राहुल और राजन। रोहित की भूमिका में अर्पित सोनी, राहुल की भूमिका में अंकुर वर्मा और राजन की भूमिका में मोहित अरोड़ा हसीना (लीना कपूर) को रिझाने की कोशिश करते हैं। 5 जनवरी 2018 को प्रदर्शित यह फ़िल्म अपनी कमज़ोर कहानी की वजह से असफल सिद्ध हुई, और मोहित अरोड़ा के साथ-साथ अन्य दो अभिनेता भी नज़रंदाज़ हो गए। 28-वर्षीय अंकुर वर्मा रोहतक, हरियाणा से ताल्लुख रखते हैं। उन्होंने टेलीविज़न से अपना करिअर शुरू किया, धारावाहिक का नाम - ’जमुना पार’। उन्हें प्रसिद्धी मिली ’सुहानी सी एक लड़की’ में कृष्णा के किरदार से। उनके सुन्दर मुखमंडल और सुन्दर आँखों की वजह से उन्हें पौराणिक धारावाहिक ’संकटमोचन महाबली हनुमान’ में लक्ष्मण का चरित्र निभाने का अवसर मिला। 2016 में ’हमको तुमसे हो गया है प्यार क्या करें’ धारावाहिक में भी वो लोकप्रिय रहे। फ़िल्मों में उनका आगमन ’हसीना’ में हुआ, और अब आने वाले समय में उनके अभिनय से सजी और भी फ़िल्मों का इन्तज़ार उनके चाहनेवालों को रहेगा। इसी फ़िल्म से अपना फ़िल्मी शुरू करने वाले तीसरे अभिनेता अर्पित सोनी भी अपने कॉलेज के दिनों से ही तरह तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों व प्रतियोगिताओं में भाग लिया करते थे, जिनमें स्टेज ड्रामा भी शामिल थे। पढ़ाई के दौरान ही अर्पित थिएटर से जुड़े और दो सालों तक पूरी शिद्दत के साथ नाटकों में हिस्सा लिया। पढ़ाई ख़त्म होते ही उन्होंने मुंबई का रुख़ किया और अभिनय के कोर्स में भर्ती हो गए। टेलीविज़न पर उन्हें मौका मिला ’लव बाइ चान्स’ और ’गुमराह’ जैसे शोज़ में। फ़िल्म ’हसीना’ के लिए जब विक्की राणावत नए चेहरों की तलाश कर रहे थे तब बहुत से नए युवाओं के साथ साथ इन तीनों ने भी ऑडिशन दिया, और फ़िल्म के तीनों चरित्रों के लिए इन तीनों का नाम आख़िर में फ़ाइनल किया गया। फ़िल्म के निर्माण के संबंध में लिए गए साक्षात्कार में अर्पित, अंकुर और मोहित बताते हैं कि साथ में अभिनय करते हुए उनकी आपस में बहुत अच्छी दोस्ती हो गई है और फ़िल्म पूरी हो जाने के बाद भी वो तीनों एक दूसरे के सम्पर्क में हैं और जब भी मौका मिलता है, वो एक दूसरे से मिलते हैं या फ़ोन पर बातें करते हैं। एक ही फ़िल्म से शुरुआत करने वाले इन तीनों अभिनेताओं के भविष्य में क्या लिखा है, यह कोई नहीं बता सकता। इस वक़्त तीनों एक ही पायदान पर खड़े हैं, और यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि अर्पित, अंकुर और मोहित में कौन कितना कामयाब हो पाता है।


Mohit Marwah, Namit Khanna, Nishant Dahiya
फ़िल्मी परिवार से ताल्लुख़ रखने वाले नवोदित नायकों में एक नाम मोहित मारवाह का है। 1984 में जन्में 34-वर्षीय मोहित मारवाह नोएडा फ़िल्म सिटी के संस्थापक संदीप मारवाह के सुपुत्र हैं। उनकी माँ रीना मारवाह सुरिन्दर कपूर की सुपुत्री अर्थात् बोनी कपूर, अनिल कपूर और संजय कपूर की बहन हैं। मोहित का विवाह टिना मुनीम की भांजी अन्तरा मोतीवाला से हाल ही में सम्पन्न हुई। इसी समारोह में सम्मिलित होने के लिए मोहित की मामी श्रीदेवी दुब‍ई गईं थीं जहाँ उनका निधन हुआ। Don Bosco School और दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने के बाद मोहित Asian Academy of Film & Television में दाख़िल हुए जहाँ उन्होंने फ़िल्म निर्माण के विभिन्न पक्षों के बारे में जाना, सीखा। इसके बाद वो विक्रम भट्ट के सहायक निर्देशक बने और फ़िल्म निर्माण के वास्तविक रूप को क़रीब से देखा। फ़िल्म निर्माण से जुड़े तमाम अनुभवों को अपने में समा कर मोहित मारवाह अपने अभिनय क्षमता को और भी ज़्यादा निखारने के लिए अमरीका के न्यु यॉर्क स्थित Lee Strasberg Acting School में भर्ती हो गए। उनके इस रुझान और मेहनत करने की चाह से उनके परिवार के सभी सदस्य प्रभावित हुए। विक्रम भट्ट के साथ काम करते समय उन्होंने वर्ष 2005 की कई फ़िल्मों की निर्माण प्रक्रिया को क़रीब से देखा जिनमें शामिल हैं ’ऐलान’, 'जुर्म’, और ’दीवाने हुए पागल’। मोहित के छोटे भाई अक्षय मारवाह द्वारा निर्मित लघु फ़िल्म ’The Audition’ में अभिनय से उनका अभिनय सफ़र शुरु हुआ। आगे चल कर करण जोहर की एक लघु फ़िल्म ’Strangers in the Night’ में भी उन्होंने अभिनय किया। बॉलीवूड में उन्हें पहला ब्रेक मिला 2014 में जब अक्ष्य कुमार ने अपनी फ़िल्म ’फ़गली’ के लिए उन्हें चुना। इस फ़िल्म के बाद मोहित मारवाह को लोग पहचानने लगे और 2014 में ही GQ India ने उन्हें Best Dressed Men in Bollywood के ख़िताब से सम्मानित किया। कई बड़े फ़ैशन डिज़ाइनरों की पहली पसंद रह चुके मोहित मारवाह कई कंपनियों और उत्पादों के ब्रैंड ऐम्बासैडर भी रहे हैं। 2017 में टिग्मांशु धुलिया निर्देशित उल्लेखनीय फ़िल्म आई थी ’राग देश’। यह पीरियड फ़िल्म भारतीय सेना के तीन अफ़सरों के कोर्ट मार्शल की कहानी थी। ये आर्मी अफ़सर थे कर्नल प्रेम सहगल, कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों और मेजर शाह अनाव ख़ाँ। क्रम से इन तीन चरित्रों को निभाया मोहित मारवाह, अमित साध और कुणाल कपूर ने। यह फ़िल्म व्यावसायिक फ़िल्म नहीं थी, इसलिए आम जनता में ख़ास चर्चित नहीं हुई, लेकिन ’राज्य सभा टीवी’ द्वारा निर्मित इस फ़िल्म को "क्रिटिकल अक्लेम" मिला। मोहित मारवाह का सफ़र जारी है, उनके अगले फ़िल्म की प्रतीक्षा सभी को है। लंदन में जन्में नमित खन्ना मॉडलिंग् की दुनिया का एक जानामाना नाम रहे हैं। 24-वर्षीय नमित के पसंदीदा नायक रहे हैं शाहरुख़ ख़ान, इरफ़ान ख़ान और आमिर ख़ान। निर्देशकों में वो मीरा नायर और ज़ोया अख़्तर की फ़िल्मों से प्रभावित हुए हैं। फ़ैशन जगत में अपना मुकाम बना चुके नमित खन्ना वर्ष 2013 में फ़िल्म जगत के मैदान में उतरे फ़िल्म ’बैंग् बैंग् बैंकॉक’ से। इस फ़िल्म में उनके अभिनय को काफ़ी सराहा गया था, लेकिन फ़िल्म के ना चलने से उनकी तरफ़ दर्शकों का ध्यान कम ही गया। इस फ़िल्म के बाद अभी तक वो किसी अन्य फ़िल्म में नज़र तो नहीं आए, लेकिन एक वेब-सीरीज़ में उनका काफ़ी नाम हुआ। ’ट्विस्टेड’ नामक इस कामुक व रहस्य आधारित वेब सीरीज़ के लिए इसके निर्देशकों को एक ऐसे नायक की तलाश थी जो अपने शरीर, चेहरे, आँखों और अभिनय से इस सीरीज़ में जान फूंक सके। ये तमाम बातें उन्हें नमित में दिखीं। यह सीरीज़ हिट साबित हुई। इन दिनों नमित खन्ना छोटे परदे पर नज़र आ रहे हैं नई धारावाहिक ’ये प्यार नहीं तो क्या है’ में। सिद्धांत के चरित्र में नमित अपने आप को बख़ूबी ढाल लिया है, जिस वजह से बहुत ही कम समय में इस धारावाहिक की TRP काफ़ी उपर जा चुकी है। जहाँ तक फ़िल्मों की बात है, यह वक़्त ही बताएगा कि नमित कितने सफल हो पाते हैं। मध्यप्रदेश के मऊ में जन्में निशान्त दहिया आर्मी अफ़सर राजेन्द्र दहिया के सुपुत्र हैं। मूलत: सोनीपत हरियाणा के, पर बचपन में कई जगहों पर रह चुके निशान्त अन्त में दिल्ली आकर बसे। हाइ स्कूल के बाद मेधावी छात्र निशान्त हरियाणा के कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से कम्प्युटर साइन्स में इंजिनीयरिंग् (B.Tech) की। लेकिन इसके तुरन्त बाद उन्होंने यूंही Grasim Mr. India प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और दूसरे स्थान पर विराजमान हुए। उनकी मुस्कान को श्रेष्ठ मुस्कान का पुरस्कार भी मिला। यह 2006 की बात थी। कई और ग्लैमर पुरस्कारों के विजेता रह चुके निशान्त दहिया के लिए मॉडलिंग् का द्वार खुल गया। बहुत से विज्ञापनों में नज़र आने के बाद ’यश राज फ़िल्म्स’ की नज़र उन पर पड़ी और 2011 में उन्हें कास्ट किया गया ’मुझसे फ़्रेन्डशिप करोगे’ फ़िल्म में। इस फ़िल्म में निशान्त के अभिनय की प्रशंसा हुई। दो नायकों वाली इस फ़िल्म से शुरुआत करने की वजह से निशान्त को फ़िल्म के मुख्य नायक साक़ीब सलीम से अभिनय का टक्कर लेना पड़ा, जिसमें वो खरे उतरे।  इसके बाद 2014 में ’टिटू एम.बी.ए’ में वो फिर एक बार नज़र आए और इस बार वो एकल नायक के रूप में फ़िल्म की बागडोर संभाली। फ़िल्म में उनका चरित्र मिला-जुला था। फ़िल्म के शीर्षक में MBA को MBA की डिग्री ना समझा जाए, MBA का अर्थ है ’married but available'। इससे आप टिटू के चरित्र की कल्पना कर सकते हैं। इस तरह के चरित्र के साथ निशान्त ने पूरा-पूरा न्याय किया जो इस फ़िल्म को देख कर पता चलता है। निशान्त दहिया की तीसरी फ़िल्म 2017 में प्रदर्शित हुई - ’मेरी प्यारी बिंदू’ जिसमें आयुष्मान खुराना और परिनीति चोपड़ा मुख्य किरदारों में दिखे। इस फ़िल्म में निशान्त की एक छोटी सी भूमिका रही। निशान्त की कदकाठी, शख्सियत और अभिनय क्षमता को देखते हुए लगता है कि आने वाले समय में वो और भी कई फ़िल्मों में नज़र आएंगे, बाक़ी क़िस्मत की बात क़िस्मत ही जाने!

Chirag Malhotra, Pranay Pachauri
वर्ष 2015 में समलैंगिक्ता पर रिखिल बहादुर ने एक फ़िल्म बनाई थी - ’टाइम आउट’। जिस तरह से युवराज पराशर और कपिल शर्मा ने ’Dunno Y...' जैसी समलैंगिक फ़िल्म से अपनी पारी की शुरुआत की थी, वैसे ही ’टाइम आउट’ में दो नवयुवक मुख्य भूमिकाओं में नज़र आए - प्रणय पचौरी और चिराग मल्होत्रा। इस तरह की ऑफ़बीट फ़िल्म से अपना करिअर शुरू करना ख़तरे से ख़ाली नहीं, यह जानते हुए भी ये दोनों अभिनेता ने इस चुनौती को स्वीकारा। प्रणय पचौरी ने एक साक्षात्कार में बताया कि उनके माता-पिता इस फ़िल्म को करने के उनके फ़ैसले से ख़ुश नहीं थे, पर प्रणय का यह मानना था कि एक अभिनेता के लिए यह कोई मायने नहीं रखता कि वो कौन सा किरदार निभा रहा है। अलग अलग तरह के किरदार निभाने की लालसा के चलते उन्होंने यह फ़िल्म साइन कर ली। आमतौर पर फ़िल्मों में समलैंगिक चरित्र को हास्य का पात्र बना दिया जाता है, लेकिन कुछ फ़िल्मकार हैं जो समलैंगिकता को बहुत समझदारी से चित्रित करते हैं। ’टाइम आउट’ एक ऐसी ही फ़िल्म है जिसमें प्रणय द्वारा निभाया चरित्र अपनी समलैंगिक्ता को दुनिया के सामने बताने में झिझकता है। दिल्ली में पले बढ़े प्रणय 2014 में मुंबई स्थानान्तरित हुए थे। दिल्ली के ’शहीद भगत सिंह कॉलेज’ से स्नातक करने के बाद उनके पिता चाहते थे कि वो CA बने, लेकिन अभिनय में गहरी दिलचस्पी रखने वाले प्रणय ने मुंबई का रास्ता इख़्तियार किया। कुछ दिन रहने के बाद पंकज की एक दोस्त ने उन्हें बताया कि रिखिल बहादुर एक नए चेहरे की तलाश कर रहे हैं अपनी समलैंगिक्ता विषय की फ़िल्म के लिए जिसे बास्केटबॉल खेलना आता हो। प्रणय ने ऑडिशन दिया, पास हुए पर इस शर्त से कि वो एक महीने के अन्दर 13 किलो वज़न घटा लेंगे। प्रणय ने चुनौती स्वीकारा और कर दिखाया। प्रणय पचौरी कहानियाँ भी लिखते हैं और उनकी मनोकामना है कि एक दिन उनकी लिखी कहानी पर फ़िल्म बने। शाहरुख़ ख़ान और रॉबर्ट डी नीरो से प्रेरणा लेने वाले प्रणय पचौरी आने वाले समय में अयन मुखर्जी, आशुतोष गोवारिकर, राकेश ओमप्रकाश मेहरा और यश राज फ़िल्म के साथ काम करना चाहते हैं। 2015 में ही प्रणय ’अलिशा’ और 2018 में ’पी.एम. सेल्फ़ीवाले’ जैसे टीवी शोज़ में नज़र आए हैं। फ़िल्मों में उनके क़िस्मत का सितारा कितना बुलंद रहता है, यह आने वाला समय ही बताएगा। ’टाइम आउट’ के दूसरे नायक चिराग मल्होत्रा की भी यह पहली फ़िल्म थी। बचपन से चिराग अपने स्कूल के नाटकों में हिस्सा लिया करते थे और वहीं पर अभिनय की बीज उनके अन्दर अंकुरित हुई। आगे चल कर जब उन्होंने अभिनय को अपना करिअर बनाने का निर्णय लिया, तब मुंबई आ कर ऐक्टिंग् की कोर्स में भर्ती हो गए। बास्केटबॉल खेल पाने की काबिलियत की वजह से उन्हें भी इस फ़िल्म के लिए रिखिल ने चुन लिया। फ़िल्म की व्यावसायिक तौर पर ना चलने की वजह से चिराग के अभिनय की तरफ़ लोगों का ध्यान नहीं गया और वो आज अपनी दूसरी फ़िल्म का इन्तज़ार कर रहे हैं। फ़िल्म जगत एक ऐसी जगह है जहाँ कई युवक बड़े-बड़े सपने लेकर तो आए, लेकिन सफलता के लिए न जाने कितने सालों तक के संघर्ष का सफ़र तय करना पड़ा। एक ऐसे ही युवक हैं राहुल शर्मा जो पहली बार 2015 में रिखिल बहादुर की फ़िल्म ’टाइम आउट’ में ही एक छोटी सी भूमिका में नज़र आए थे। पंकज और चिराग तो फ़िल्म के नायक थे, बास्केटबॉल के कोच पी.के की भूमिका में नज़र आए राहुल शर्मा। इस फ़िल्म के बाद 2016 में ’मिस टीचर’ फ़िल्म में वो बतौर नायक नज़र आए। उनके एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि इस फ़िल्म में अभिनय करने के लिए उन्हें बहुत अफ़सोस है। फ़िल्म जगत में नए नए आने की वजह से उन्हें इस बात का अहसास नहीं था कि वो किस तरह की फ़िल्म में काम करने जा रहे हैं। जब तक उन्हें पता चला कि ’मिस टीचर’ दरसल एक सी-ग्रेड घटिया कामुक फ़िल्म है, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अनिच्छा के बावजूद आउटडोर शूटिंग् पर पहुँच जाने के बाद उन्हें पता चला कि किस तरह के सीन उन्हें करने हैं। उस समय ना कहने की कोई गुंजाइश नहीं थी। इस फ़िल्म को वो एक बुरा सपना समझ कर भूल जाना चाहते हैं और आने वाले समय में एक दायित्वशील अभिनेता के रूप में उभरना चाहते हैं। राहुल शर्मा की तरह हर संघर्षरत अभिनेता को ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ की तरफ़ से ढेरों शुभकामनाएँ।



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

रविवार, 6 मई 2018

राग काफी और बागेश्री : SWARGOSHTHI – 368 : RAG KAFI & BAGESHRI




स्वरगोष्ठी – 368 में आज


दस थाट, बीस राग और बीस गीत – 7 : काफी थाट

पण्डित भीमसेन जोशी से राग काफी में खयाल और उस्ताद अमीर खाँ से फिल्मी गीत की रचना सुनिए





उस्ताद अमीर खाँ
पण्डित  भीमसेन जोशी
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘दस थाट, बीस राग और बीस गीत’ की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रचलन लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। दस थाटों की आधुनिक प्रणाली का सूत्रपात भातखण्डे जी ने ही किया था। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे काफी थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग काफी में निबद्ध खयाल रचना पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। साथ ही काफी थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत जन्य राग बागेश्री के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।



आधुनिक भारतीय संगीत में प्रचलित थाटों की श्रृंखला ‘दस थाट, बीस राग और बीस गीत’ की आज की कड़ी में हम ‘काफी’ थाट का परिचय प्राप्त करेंगे और इस थाट के आश्रय राग ‘काफी’ और इसी थाट के अन्तर्गत आने वाले राग बागेश्री में एक फिल्मी गीत का आनन्द भी लेंगे। परन्तु उससे पहले प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में की गई थाट विषयक चर्चा की कुछ जानकारी आपसे बाँटेंगे। थाट को संस्कृत ग्रन्थों में मेल अर्थात स्वरों का मिलाना या इकट्ठा करना कहते हैं। इन ग्रन्थों में थाट अथवा मेल के विषय में जो व्याख्या की गई है, उसके अनुसार ‘वह स्वर-समूह थाट कहलाता है, जो राग-निर्मिति में सक्षम हो’। पण्डित सोमनाथ अपने ‘राग-विवोध’ के तीसरे अध्याय में मेलों को परिभाषित करते हुए लिखते हैं- ‘थाट इति भाषायाम’ अर्थात, मेल को भाषा में थाट कहते हैं। ‘राग-विवोध’ आज से लगभग चार सौ वर्ष पूर्व की रचना है। यह ग्रन्थ ‘थाट’ का प्राचीन आधार भी है। वर्तमान में प्रचलित दस थाटों का निर्धारण पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने किया है। आज हम आपसे थाट ‘काफी’ के विषय में कुछ चर्चा करेंगे। काफी थाट के स्वर हैं- सा, रे, ग॒, म, प, ध, नि॒। इस थाट में गान्धार और निषाद कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। काफी थाट का आश्रय राग ‘काफी’ होता है। राग ‘काफी’ में गान्धार और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। इसके आरोह के स्वर हैं- सारे, म, प, धनिसां तथा अवरोह के स्वर हैं- सां नि ध, प, म, रे, सा । इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है और इसका गायन-वादन समय मध्यरात्रि होता है। राग काफी में होली और रंगोत्सव अर्थात होली से सम्बन्धित रचनाएँ खूब निखरती हैं। आइए, सुप्रसिद्ध गायक पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में राग काफी की एक बन्दिश सुनते हैं।

राग काफी : ‘बावरे गम दे गयो री...’ : पण्डित भीमसेन जोशी


इस थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- भीमपलासी, पीलू, बागेश्री, आभोगी, चन्द्रकौंस, जोग, धानी, नीलाम्बरी, बहार, नायकी कान्हड़ा, गौड़ मल्हार आदि। राग बागेश्री भारतीय संगीत का अत्यन्त मोहक राग है। कुछ विद्वान इस राग को बागेश्वरी नाम से भी पुकारते हैं, किन्तु सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल के मतानुसार इस राग का नाम बागेश्री अधिक उपयुक्त होना चाहिए। इस राग को काफी थाट से अन्तर्गत माना जाता है। राग का एक प्रचलित स्वरूप भी है, जिसके आरोह में ऋषभ स्वर वर्जित होता है और पंचम स्वर का अल्पत्व प्रयोग किया जाता है। अवरोह में सातों स्वर प्रयोग होते हैं। इस प्रकार यह राग षाड़व-सम्पूर्ण जाति का हो जाता है। कुछ विद्वान आरोह में ऋषभ के साथ पंचम स्वर भी वर्जित करते हैं। इस राग में गान्धार और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। कर्नाटक पद्धति में इस राग के समतुल्य राग नटकुरंजी है, जिसमें पंचम स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। राग बागेश्री में यदि पंचम और कोमल निषाद का प्रयोग न किया जाए तो यह राग आभोगी की अनुभूति कराता है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। रात्रि के दूसरे प्रहर, विशेष रूप से मध्यरात्रि में इस राग का सौन्दर्य खूब निखरता है। इस राग में भक्ति और श्रृंगार रस की रचनाएँ भली लगती है। अब हम आपको राग बागेश्री में बँधी एक मोहक फिल्मी गीत का रसास्वादन कराते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद अमीर खाँ। 1960 में प्रदर्शित बाँग्ला फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ से यह गीत हमने लिया है। कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कथा पर विख्यात फिल्म-शिल्पी तपन सिन्हा के निर्देशन में फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ का निर्माण किया गया था। फिल्म की मुख्य भूमिका में सौमित्र चटर्जी और अरुन्धति देवी ने अभिनय किया था। फिल्म की कहानी के केन्द्र में एक शापित हवेली है, जिसमें एक सरकारी कारिन्दा उलझ जाता है। इस फिल्म का सर्वाधिक उललीखनीय पक्ष इसका संगीत है। मैहर परम्परा के उस्ताद अली अकबर खाँ फिल्म के संगीतकार थे। फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ में उन्होने एक गीत एक छोटा खयाल के रूप में शामिल किया था, जिसे उस्ताद अमीर खाँ और प्रतिमा बनर्जी ने राग बागेश्री में गाया था। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग बागेश्री : ‘कैसे कटे रजनी...’ : उस्ताद अमीर खाँ और प्रतिमा बनर्जी : फिल्म - क्षुधित पाषाण



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 367वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक पुरानी फिल्म से रागबद्ध हिन्दी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 370वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस उस्ताद गायक के मुख्य स्वर है।?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 12 मई, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 370वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 366वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1960 में प्रदर्शित ऐतिहासिक फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा गया था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग - सोहनी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल - दीपचन्दी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, गायक - उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया कोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “दस थाट, बीस राग और बीस गीत” की सातवीं कड़ी में आपने काफी थाट का परिचय प्राप्त किया और इस थाट के आश्रय राग काफी में पिरोया एक खयाल सुविख्यात गायक पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही काफी थाट के जन्य राग बागेश्री में निबद्ध बाँग्ला फिल्म “क्षुधित पाषाण” का एक फिल्मी गीत उस्ताद अमीर खाँ और प्रतिमा बनर्जी के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी अगली श्रृंखला में आपको विभिन्न रागों से रोगों के उपचार का तरीका बताया जाएगा। हमारी नई श्रृंखला अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग काफी और बागेश्री : SWARGOSHTHI – 368 : RAG KAFI & BAGESHRI : 6 मई, 2018 


शनिवार, 5 मई 2018

चित्रकथा - 67: हिन्दी फ़िल्मी गीतों में रबीन्द्र संगीत की छाया

अंक - 67

हिन्दी फ़िल्मी गीतों में रबीन्द्र संगीत की छाया

"कोई जैसे मेरे दिल का दर खटकाए..." 




जहाँ एक तरफ़ फ़िल्म-संगीत का अपना अलग अस्तित्व है, वहीं दूसरी तरफ़ फ़िल्म-संगीत अन्य कई तरह के संगीत पर भी आधारित रही है। शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत और पाश्चात्य संगीत का प्रभाव फ़िल्म-संगीत पर हमेशा से रहा है। उधर बंगाल की संस्कृति में रबीन्द्र संगीत एक अहम धारा है; गुरुदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर की रचनाओं के बिना बांगला संगीत, नृत्य और साहित्य अधूरा है। समय-समय पर हिन्दी सिने संगीत जगत के संगीतकारों ने भी रबीन्द्र-संगीत को अपने फ़िल्मी गीतों का आधार बनाया है। आगामी 7 मई को कविगुरु रबीन्द्रनाथ ठाकुर के जन्म-जयंती के उपलक्ष्य में आइए आज ’चित्रकथा’ में हम उन हिन्दी फ़िल्मी गीतों पर एक नज़र डालें जो रबीन्द्र संगीत की धुनों से प्रेरित हैं। आज का यह अंक कविगुरु को समर्पित है।



(7 May 1861 – 7 August 1941)

विगुरु रबीन्द्रनाथ ठाकुर के लिखे गीतों का, जिन्हें हम "रबीन्द्र-संगीत" के नाम से जानते हैं, बंगाल के साहित्य, कला और संगीत पर जो प्रभाव पड़ा है, वैसा बहुत कम साहित्यकारों के साथ होता है। ऐसा कहा जाता है कि टैगोर के गीत दरसल बंगाल के 500 वर्ष के साहित्यिक और सांस्कृतिक मंथन का निचोड़ है। धन गोपाल मुखर्जी ने अपनी किताब 'Caste and Outcaste' में लिखा है कि रबीन्द्र-संगीत मानव मन के हर भाव को प्रकट करने में सक्षम हैं। कविगुरु ने छोटे से बड़ा, ग़रीब से धनी, हर किसी के मनोभाव को, हर किसी की जीवन शैली को आवाज़ प्रदान की है। गंगा में विचरण करते ग़रीब से ग़रीब नाविक से लेकर अर्थवान ज़मीनदारों तक, हर किसी को जगह मिली है रबीन्द्र-संगीत में। समय के साथ साथ रबीन्द्र-संगीत एक म्युज़िक स्कूल के रूप में उभरकर सामने आया है। रबीन्द्र-संगीत को एक तरह से हम उपशास्त्रीय संगीत की श्रेणी में डाल सकते हैं। अपने लिखे गीतों को स्वरबद्ध करते समय कविगुरु ने शास्त्रीय संगीत, बांगला लोक-संगीत और कभी-कभी तो पाश्चात्य संगीत का भी सहारा लिया है। रबीन्द्र-संगीत पर रबीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा स्थापित "विश्वभारती विश्वविद्यालय" का एक लम्बे समय तक नियंत्रण था। इस विश्वविद्यालय की अनुमति के बिना कोई रबीन्द्र-संगीत को गा या इस्तमाल नहीं कर सकता था। फ़िल्मों में रबीन्द्र-संगीत की धारा को लाने में पहला क़दम उठाया था संगीतकार-गायक पंकज मल्लिक ने। 1937 की फ़िल्म 'मुक्ति' के बांगला संस्करण में मल्लिक बाबू ने कविगुरु की रचनाओं का व्यापक स्तर पर इस्तमाल किया। अधिकांश धुनें कविगुरु की थीं, पर सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "दिनेर शेषे घूमेर देशे" की धुन मल्लिक बाबू ने ख़ुद बनाई थी। इस फ़िल्म के बाद भी पंकज मल्लिक रबीन्द्र-संगीत का इस्तमाल व्यापक रूप से करते रहे और कविगुरु की रचनाओं को बंगाल के बाहर पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे। 'मुक्ति' के हिंदी संसकरण में कानन देवी के स्वर में "सांवरिया मन भाया रे..." गीत रबीन्द्र-संगीत की छाया लिए हुए था जो न केवल बहुत लोकप्रिय हुआ बल्कि कानन देवी का गाया लोकप्रियतम गीतों में से एक है। 1949 की फ़िल्म 'अंजानगढ़' में पंकज मल्लिक और उत्पला सेन का गाया एक गीत था "संसार के आधार पर दया हम पे दिखाओ..." जो रबीन्द्रनाथ रचित ""सर्बा खर्बा तार दाहे" गीत पर आधारित था। यूं तो इस फ़िल्म के संगीतकार थे रायचन्द बोराल, पर इस गीत का संगीत-संयोजन पंकज मल्लिक ने किया था। फ़िल्म के बांगला संस्करण में इस गीत को हेमन्त मुखर्जी और उत्पला सेन ने गाया है। रायचन्द बोराल ने 1945 की फ़िल्म 'हमराही' (जो बिमल राय निर्देशित प्रथम हिन्दी फ़िल्म थी) में रबीन्द्रनाथ रचित "मधुगंधे भरा मधु स्निग्ध छाया" को उसके मूल बांगला रूप में प्रस्तुत कर सुनने वालों को चमत्कृत कर दिया था। 

न्यू थिएटर्स के संगीतकार पंकज मल्लिक और रायचन्द बोराल की जब बात चल ही रही है, तो वहाँ के तीसरे संगीतकार अर्थात्‍ तिमिर बरन का उल्लेख भी आवश्यक हो जाता है। पंकज मल्लिक की तरह तिमिर बरन ने रबीन्द्र संगीत का प्रयोग ज़्यादा तो नहीं किया पर 1954 की 'बादबान' (एस. के. पाल के साथ) फ़िल्म में "कैसे कोई जिए, ज़हर है ज़िन्दगी... आया तूफ़ान" (हेमन्त कुमार - गीता दत्त) को रबीन्द्र-संगीत ("तारे ना जानी...") पर आधारित कर ऐसा कम्पोज़ किया कि जिसे ख़ूब सराहना मिली। यह गीत तिमिर बरन के यादगार गीतों में से एक है जो आज भी रेडियो पर सुनाई दे जाता है। रबीन्द्र-संगीत का इस्तमाल करने वाले न्यू थिएटर्स के बाहर के संगीतकारों में पहला नाम है अनिल बिस्वास का। अनिल दा ने मूल गीत के शब्दों को नहीं, बल्कि उनकी धुनों का प्रयोग किया। और उनके बाद भी तमाम संगीतकारों ने केवल रबीन्द्र-संगीत के धुनों का ही सहारा लिया। उपर्युक्त "मधुगंधे भरा..." गीत की धुन का प्रयोग अनिल बिस्वास ने अपनी 1960 की फ़िल्म 'अंगुलिमाल' में किया था मीना कपूर और साथियों के गाये "मेरे चंचल नैना मधुरस के भरे..." गीत में। अनिल बिस्वास द्वारा स्वरबद्ध रबीन्द्र-संगीत पर आधारित सबसे लोकप्रिय रचना है 1954 की फ़िल्म 'वारिस' का "राही मतवाले, तू छेड़ एक बार मन का सितार..." गीत। तलत महमूद और सुरैया की आवाज़ों में यह गीत बहुत ज़्यादा लोकप्रिय तो हुआ पर बंगाल के बाहर जनसाधारण को यह पता भी नहीं चला कि दरसल इस गीत की धुन कविगुरु रचित "ओ रे गृहोबाशी..." पर आधारित है जो मूलत: एक होली गीत है। यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि कविगुरु होली के त्योहार को एक विशेष उत्सव की तरह गीत-संगीत-नृत्य के माध्यमों से मनाते थे और आज भी यह परम्परा ’विश्वभारती’ में जारी है। 

संगीतकार सचिन देव बर्मन ने रबीन्द्र-संगीत का हू-ब-हू प्रयोग ज़्यादा गीतों में नहीं किया। यह ज़रूर है कि उनके द्वारा स्वरबद्ध कई गीतों में रबीन्द्र-संगीत की छाया मिलती है। रबीन्द्र-संगीत पर आधारित दादा बर्मन का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत है 1973 की फ़िल्म 'अभिमान' का "तेरे मेरे मिलन की ये रैना..." जो रबीन्द्रनाथ रचित "जोदी तारे नाइ चिनी गो..." गीत पर आधारित है। 1950 की देव आनन्द-सुरैया अभिनीत फ़िल्म 'अफ़सर' में सुरैया का गाया लोकप्रिय गीत "नैन दीवाने एक नहीं माने..." भी एक रबीन्द्र-रचना "शेदिन दुजोने दुलेछिलो बोने..." पर आधारित है जिसकी धुन दादा बर्मन ने बनाई है। रबीन्द्र-संगीत की छाया लिए दादा बर्मन द्वारा स्वरबद्ध कुछ और गीत हैं "जायें तो जायें कहाँ" (टैक्सी ड्राइवर), "मेरा सुंदर सपना बीत गया" (दो भाई), "मेघा छाये आधी रात बैरन बन गई निन्दिया" (शर्मीली)। सचिन दा के बेटे राहुल देव बर्मन ने बंगाल और नेपाल के लोक-संगीत का ख़ूब प्रयोग किया है अपने गीतों में, पर एक-आध बार रबीन्द्र-संगीत की तरफ़ भी झुके हैं। फ़िल्म 'जुर्माना' का लता के गाये "छोटी सी एक कली खिली थी एक दिन बाग़ में..." गीत के लिए पंचम ने जिस रबीन्द्र-रचना को आधार बनाया, उसके बोल हैं "बसन्ते फूल गांथलो आमार जयेर माला..."। इस मूल रबीन्द्र-रचना को 1944 की बांगला फ़िल्म 'उदयेर पथे' में शामिल किया गया था। 'उदयेर पथे' दरसल बांगला-हिन्दी द्विभाषी फ़िल्म थी, जिसका हिन्दी में 'हमराही' के नाम से निर्माण हुआ था। इस फ़िल्म के एक गीत की चर्चा हम उपर कर चुके हैं। राहुल देव बर्मन ने 1982 की फ़िल्म 'शौकीन' में आशा-किशोर से "जब भी कोई कंगना बोले..." गीत गवाया था जो रबीन्द्रनाथ रचित "ग्राम छाड़ा ओइ रांगा माटीर पथ..." की धुन पर आधारित था। '1942 - A Love Story' में कविता कृष्णमूर्ति का गाया "क्यों नए लग रहे हैं ये धरती गगन..." को भी रबीन्द्र-संगीत से प्रेरित पंचम ने ही एक साक्षात्कार में बताया था पर मूल रबीन्द्र-रचना की पहचान नहीं हो पायी है। इसी अंश का प्रयोग पंचम ने बरसों पहले 'हीरा-पन्ना' के शीर्षक गीत "पन्ना की तमन्ना..." के अंतरे की पंक्ति "हीरा तो पहले ही किसी और का हो गया" में किया था। हेमन्त कुमार की आवाज़ में एक अत्यन्त लोकप्रिय रबीन्द्र-रचना है "मोन मोर मेघेरो शोंगी उड़े चोले दिग दिगन्तेरो पाने..."। हेमन्त कुमार ने ही इस गीत की धुन पर 1964 की हिन्दी फ़िल्म 'माँ बेटा' में एक गीत कम्पोज़ किया था "मन मेरा उड़ता जाए बादल के संग दूर गगन में, आज नशे में गाता गीत मिलन के रे, रिमझिम रिमझिम रिमझिम..."। लता मंगेशकर का गाया यह गीत ज़्यादा सुनाई तो नहीं दिया पर यह एक अत्यन्त कर्णप्रिय रचना है जिसे जितनी बार भी सुनें, अच्छा ही लगता है। इस गीत के फ़िल्मांकन में निरुपा रॉय सितार हाथ में लिए गीत गाती हैं और एक नर्तकी इस पर नृत्य कर रही हैं। इस बात का उल्लेख हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इस नृत्य शैली को "रबीन्द्र-नृत्य" के नाम से जाना जाता है (रबीन्द्र संगीत पर किए जाने वाले नृत्य की विशेष शैली को रबीन्द्र-नृत्य कहते हैं)। 

बंगाल से ताल्लुख रखने वाले संगीतकारों में एक नाम बप्पी लाहिड़ी का भी है। यूं तो बप्पी दा 'डिस्को किंग्‍' के नाम से जाने जाते हैं, पर उन्होंने भी कई शास्त्रीय और लोक संगीत आधारित गीत रचे हैं। रबीन्द्र-संगीत का प्रयोग उन्होंने कम से कम दो बार किया है। 1985 की फ़िल्म 'झूठी' में उन्होंने "चंदा देखे चंदा तो वो चंदा शर्माये..." को उसी "जोदी तारे नाइ गो चीनी..." पर आधारित किया जिस पर सचिन दा ने "तेरे मेरे मिलन की यह रैना" को कम्पोज़ किया था। दोनों ही गीत लता-किशोर के गाए हुए हैं, और दोनों ही फ़िल्मों के निर्देशक हैं ॠषीकेश मुखर्जी। क्या पता वो 'झूठी' के गीत में 'अभिमान' के उस गीत को पुनर्जीवित करना चाहते होंगे! 1984 की फ़िल्म 'हम रहे न हम' में बप्पी दा ने एक अत्यन्त लोकप्रिय रबीन्द्र-रचना "पुरानो शेइ दिनेर कथा भूलबो की रे..." के शुरुआती अंश का प्रयोग कर एक सुन्दर गीत कम्पोज़ किया "रोशन रोशन रातें अपनी, दिन भी रोशन, जब से जीवन में तुम आये, तब से ऐसा जीवन..."। आशा-किशोर की युगल आवाज़ों में यह गीत था। वैसे यह भी एक रोचक तथ्य है कि मूल रबीन्द्रनाथ रचित "पुरानो शेइ दिनेर कथा" भी अपने आप में कविगुरु की मौलिक रचना नहीं है। इसकी धुन प्रेरित है स्कॉटलैण्ड की एक धुन "Auld Lang Syne" से। बप्पी लाहिड़ी के संगीत में 1986 की फ़िल्म 'अधिकार' में किशोर कुमार का गाया "मैं दिल तू धड़कन, तुझसे मेरा जीवन..." गीत भी रबीन्द्र-संगीत शैली में ही स्वरबद्ध एक रचना है। 

अब तक हिन्दी फ़िल्म-संगीत में रबीन्द्र-संगीत के प्रयोग की जितनी चर्चा हमने की है, उसमें जितने भी संगीतकारों का नाम आया है, वो सब बंगाल से ताल्लुख रखने वाले थे। बंगाल के बाहर केवल राजेश रोशन ही एक ऐसे संगीतकार हुए जिन्होंने रबीन्द्र-संगीत का प्रयोग कई बार अपने गीतों में किया। वैसे राजेश रोशन का बंगाल से रिश्ता तो ज़रूर है। उनकी माँ इरा रोशन बंगाली थीं। 1981 की फ़िल्म 'याराना' में राजेश रोशन द्वारा स्वरबद्ध गीत "छू कर मेरे मन को, किया तूने क्या इशारा" का मुखड़ा रबीन्द्रनाथ रचित "तोमार होलो शुरू, आमार होलो शाड़ा..." से प्रेरित था। यूं तो इस रबीन्द्र-रचना को कई गायकों ने गाया, पर किशोर कुमार का गाया संस्करण सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ था, और राजेश रोशन ने भी अपने गीत को किशोर दा से ही गवाया। भले राजेश रोशन ने केवल मुखड़े की धुन को ही प्रयोग में लाया, पर कलकत्ते की जनता को क्रोधित करने में यही काफ़ी था। दरसल राजेश रोशन ने इस धुन के इस्तमाल के लिए विश्वभारती से अनुमति नहीं ली थी, जिस वजह से बंगाल में यह हंगामा हुआ। पर बंगाल के बाहर इस गीत ने इतनी लोकप्रियता हासिल की कि राजेश रोशन को कोई फ़र्क नहीं पड़ा। इतना ही नहीं, उन्होंने 1984 की फ़िल्म 'इंतहा' में फिर एक बार इसी धुन की छाया तले कम्पोज़ किया एक और गीत "तू ही मेरा सपना, तू ही मेरी मंज़िल...", और इसे भी किशोर कुमार से ही गवाया। 1997 की फ़िल्म 'युगपुरूष' में राजेश रोशन ने दो गीतों में रबीन्द्र-संगीत की छटा बिखेरी। इनमें एक था आशा भोसले का गाया "कोई जैसे मेरे दिल का दर खटकाए..." (मूल रबीन्द्र रचना - "तुमि केमोन कोरे गान कोरो हे गुणी...") और दूसरा गीत था प्रीति उत्तम का गाया "बंधन खुला पंछी उड़ा, आगे सुनो अजी फिर क्या हुआ" (मूल रबीन्द्र रचना - "पागला हावा बादल दिने पागोल आमार मोन नेचे ओठे...")। "पगला हावार..." एक अत्यन्त लोकप्रिय रबीन्द्र-रचना है और बंगाल के बहुत सारे कलाकारों ने समय समय पर इसे गाया है। 

कहते हैं कि नौशाद द्वारा स्वरबद्ध लता-शमशाद का गाया "बचपन के दिन भुला न देना" भी किसी रबीन्द्र-संगीत से प्रेरित है, ऐसा विश्वभारती दावा करते हैं, पर वह कौन सा गीत है इसकी पुष्टि नहीं हो पायी है। ऐसे कई गानें हैं जिन्हें रबीन्द्र-संगीत शैली में कम्पोज़ किया गया है, पर सही-सही कहा नहीं जा सकता कि मूल रचना कौन सी है। फ़िल्म 'सुजाता' का "जलते हैं जिसके लिए, मेरी आँखों के दिये" को भी रबीन्द्र-संगीत पर आधारित होने का दावा विश्वभारती ने किया है। इस तरह से हिन्दी फ़िल्मी गीतों में रबीन्द्र-संगीत की महक हमें बार बार मिली है। इस बात से शायद ही कोई इंकार करे कि जब जब रबीन्द्र-संगीत की धुनें हिन्दी फ़िल्मी गीतों में सुनाई दी है, वो सभी गीत बेहद मधुर व कर्णप्रिय बने हैं। रबीन्द्र-संगीत इस देश की अनमोल धरोहर है जिसे हमें सहेज कर रखना है। जिन जिन संगीतकारों ने रबीन्द्र-संगीत का प्रयोग अपने गीतों में प्रयोग कर इसे बंगाल के बाहर पहुँचाने का महत्वपूर्ण काम किया है, उन्हें हमारा सलाम।



आख़िरी बात

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शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



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