रविवार, 8 अप्रैल 2018

राग खमाज और तिलक कामोद : SWARGOSHTHI – 364 : RAG KHAMAJ & TILAK KAMOD




स्वरगोष्ठी – 364 में आज

दस थाट, बीस राग और बीस गीत – 3 : खमाज थाट

राग खमाज की बन्दिश -‘कोयलिया कूक सुनावे...’ और तिलक कामोद का गीत -‘तुम्हारे बिन जी ना लगे...’




उस्ताद  निसार हुसेन खाँ
प्रीति सागर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘दस थाट, बीस राग और बीस गीत’ की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रचलन लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। दस थाटों की आधुनिक प्रणाली का सूत्रपात भातखण्डे जी ने ही किया था। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से तीसरा थाट खमाज है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे खमाज थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग खमाज में निबद्ध एक खयाल प्रस्तुत करेंगे। साथ ही खमाज थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत जन्य राग तिलक कामोद के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे।



इन दिनों हम भारतीय संगीत के दस थाटों पर चर्चा कर रहे हैं। पिछले अंकों में हम यह चर्चा कर चुके हैं कि संगीत के रागों के वर्गीकरण के लिए थाट प्रणाली को अपनाया गया। थाट और राग के विषय में कभी-कभी यह भ्रम हो जाता है कि पहले थाट और फिर उससे राग की उत्पत्ति हुई होगी। दरअसल ऐसा नहीं है। रागों की संरचना अत्यन्त प्राचीन है। रागों में प्रयुक्त स्वरों के अनुकूल मिलते स्वर जिस थाट के स्वरों में मौजूद होते हैं, राग को उस थाट विशेष से उत्पन्न माना गया है। मध्य काल में राग-रागिनी प्रणाली प्रचलन में थी। बाद में इस प्रणाली की अवैज्ञानिकता सिद्ध हो जाने पर थाट-वर्गीकरण के अन्तर्गत समस्त रागों को विभाजित किया गया। हमारे शास्त्रकारों ने थाट के नामकरण के लिए ऐसे रागों का चयन किया, जिसके स्वर थाट के स्वरों से मेल खाते हों। थाट के नामकरण के उपरान्त सम्बन्धित राग को उस थाट का आश्रय राग कहा गया। आज का थाट खमाज है। खमाज थाट के स्वर होते हैं- सा, रे ग, म, प ध, नि॒। अर्थात इस थाट में निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस थाट का आश्रय राग ‘खमाज’ कहलाता है। ‘खमाज’ राग में थाट के अनुकूल निषाद कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। यह षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात राग के आरोह में छः स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। खमाज के आरोह में सा, ग, म, प, ध, नि, सां और अवरोह में सां, नि, ध, प, म, ग, रे, सा स्वरों का प्रयोग होता है। आरोह में ऋषभ स्वर नहीं लगता। राग में दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद लगाया जाता है। वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन-वादन का समय रात्रि का दूसरा प्रहर होता है।

राग खमाज का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए हमने रामपुर सहसवान घराने के प्रमुख स्तम्भ उस्ताद निसार हुसेन खाँ (1909-1993) द्वारा प्रस्तुत एक दुर्लभ बन्दिश का चुनाव किया है। राग खमाज की यह अनमोल रचना 1929 में रिकार्ड की गई थी। उस्ताद निसार हुसेन खाँ को अपने पिता और गुरु उस्ताद फिदा हुसेन खाँ से संगीत विरासत में प्राप्त हुआ था। बहुत छोटी आयु में उन्हें बड़ौदा के महाराज सयाजी राव गायकवाड़ के दरबारी संगीतज्ञ होने का गौरव प्राप्त हुआ था। आगे चलकर खाँ साहब ‘आकाशवाणी’ से भी जुड़े। 1977 में उन्हें आई.टी.सी. संगीत रिसर्च अकादमी, कोलकाता में प्रधान गुरु नियुक्त किया गया। यहाँ रह कर उन्होने उस्ताद राशिद खाँ सहित अनेक योग्य शिष्यो को तैयार किया। भारत सरकार द्वारा 1970 में उन्हें ‘पद्मभूषण’ सम्मान से विभूषित किया गया। इसके अलावा खाँ साहब को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, तानसेन सम्मान सहित गन्धर्व महाविद्यालय से डाक्टरेट की उपाधि से भी नवाजा गया था। आइए गायकी के इस शिखर-पुरुष की आवाज़ में सुनते हैं, राग खमाज की यह बन्दिश।

राग खमाज : ‘कोयलिया कूक सुनावे...’ : उस्ताद निसार हुसेन खाँ


खमाज थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ प्रमुख राग है- झिंझोटी, कलावती, दुर्गा, देस, तिलंग, रागेश्वरी, गारा, देस, जैजैवन्ती, तिलक कामोद आदि। खमाज थाट का ही एक प्रचलित और लोकप्रिय राग तिलक कामोद है। श्रृंगार रस की रचनाएँ इस राग में खूब मुखर होती हैं। राग तिलक कामोद षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह में छः स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में धैवत स्वर वर्जित होता है। इस राग में सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। आरोह के स्वर हैं- सा, रे, ग, सा, रे, म, प, ध, म,प, नि, सां तथा अवरोह के स्वर हैं- सां, प, ध, म, ग, सा, रे, ग, सा, नि। राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। रात्रि के दूसरे प्रहर में इस राग का गायन-वादन खूब खिल उठता है। अब हम आपको राग तिलककामोद के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1977 में प्रदर्शित फिल्म ‘भूमिका’ से लिया है। फिल्म ‘भूमिका’ 1940 के दशक में मराठी रंगमंच और फिल्मों की बहुचर्चित अभिनेत्री हंसा वाडकर की आत्मकथा ‘सांगत्ये आइका’ पर आधारित थी, जिसका निर्देशन प्रख्यात फ़िल्मकार श्याम बेनेगल ने किया था। फिल्म में अभिनय के प्रमुख कलाकार थे- अमोल पालेकर, स्मिता पाटील, नासीरुद्दीन शाह, अमरीश पुरी आदि। फिल्म को दो राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, सर्वश्रेष्ठ पटकथा लेखन का और स्मिता पाटील को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का। इसके अलावा इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म का फिल्मफेयर पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था। फिल्म में कुल छः गीत हैं, जिनमे ‘तुम्हारे बिन जी ना लगे घर में...’ सहित पाँच गीत बसन्त देव ने और एक गीत (‘सावन के दिन आए...’) मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा है। बसन्त देव रचित गीत- ‘तुम्हारे बिन जी ना लगे...’ में संगीतकार वनराज भाटिया ने राग तिलककामोद के स्वरों का स्पर्श किया है। सितारखानी अर्थात पंजाबी ताल के इस गीत को प्रीति सागर ने बेहद आकर्षक रूप में गाया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग तिलक कामोद : ‘तुम्हारे बिन जी ना लगे घर में...’ : प्रीति सागर : फिल्म – भूमिका




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 364वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 370वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में मुख्य स्वर किस पार्श्वगायिका के है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 14 अप्रैल 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 366वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 362वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1959 में प्रदर्शित फिल्म “गूँज उठी शहनाई” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – बिहाग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

“स्वरगोष्ठी” की पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। हमारी एक नई प्रतिभागी श्वेता शुक्ला ने अपना उत्तर फेसबुक पर भेजा है। हम उनका भी उत्तर शामिल करते हुए अनुरोध करते हैं कि कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। उपरोक्त सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “दस थाट, बीस राग और बीस गीत” की तीसरी कड़ी में आपने खमाज थाट का परिचय प्राप्त किया और इस थाट के आश्रय राग खमाज में पिरोया एक खयाल सुविख्यात गायक उस्ताद निसार हुसेन खाँ के स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही खमाज थाट के जन्य राग तिलक कामोद पर आधारित एक फिल्मी गीत पार्श्वगायिका प्रीति सागर की आवाज़ में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक से हम इस श्रृंखला का अगला अंक प्रस्तुत करेंगे। इस नई श्रृंखला अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

बुधवार, 4 अप्रैल 2018

चित्रकथा - 62: हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार (भाग-1)

अंक - 62

हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार (भाग-1)

"अंबर की एक पाक सुराही..." 




’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! फ़िल्म जगत एक ऐसा उद्योग है जो पुरुष-प्रधान है। अभिनेत्रियों और पार्श्वगायिकाओं को कुछ देर के लिए अगर भूल जाएँ तो पायेंगे कि फ़िल्म निर्माण के हर विभाग में महिलाएँ पुरुषों की तुलना में ना के बराबर रही हैं। जहाँ तक फ़िल्मी गीतकारों और संगीतकारों का सवाल है, इन विधाओं में तो महिला कलाकारों की संख्या की गिनती उंगलियों पर की जा सकती है। आज ’चित्रकथा’ में हम एक शोधालेख लेकर आए हैं जिसमें हम बातें करेंगे हिन्दी फ़िल्म जगत के महिला गीतकारों की, और उनके द्वारा लिखे गए यादगार गीतों की। आज का यह अंक समर्पित है महिला फ़िल्म गीतकारों को! 



गर यह पूछा जाए कि किस महिला गीतकार की रचनाएँ सबसे ज़्यादा फ़िल्मों में सुनाई दी हैं, तो
शायद इसका सही जवाब होगा मीराबाई। एक तरफ़ जहाँ यह एक सुन्दर और मन को शान्ति प्रदान करने वाली बात है, वहीं दूसरी ओर यह एक दुर्भाग्यजनक बात भी है कि जिस देश में मीराबाई जैसी कवयित्री हुईं हैं, उस देश में महिला गीतकारों की इतनी कमी है। हिन्दी सिने संगीत जगत की पहली महिला जिन्होंने गीतकारिता के लिए कलम उठाया था, वो हैं जद्दनबाई, जो फ़िल्म निर्माण के पहले दौर की एक गायिका, संगीतकार, अदाकारा और फ़िल्मकार रही हैं। 1892 में जन्मीं जद्दनबाई को भारतीय सिनेमा के अग्रदूतों में गिना जाता है। वो अभिनेत्री नरगिस की माँ थीं। 1935 की फ़िल्म ’तलाश-ए-हक़’ में संगीत देकर वो फ़िल्म जगत की पहली महिला संगीतकार बनीं। लेकिन इस फ़िल्म के गीतों के रिकॉर्ड के उपलब्ध ना होने की वजह से सरस्वती देवी को प्रथम महिला संगीतकार होने का गौरव मिला। इसके अगले ही साल 1936 में फ़िल्म ’मैडम फ़ैशन’ में एक गीत लिख कर जद्दनबाई बन गईं फ़िल्म जगत की प्रथम महिला गीतकार। गायक जुगल-किशोर की आवाज़ में जद्दनबाई की लिखी व स्वरबद्ध की हुई यह ग़ज़ल थी "यही आरज़ू थी दिल की कि क़रीब यार होता, और हज़ार जाँ से क़ुरबाँ मैं हज़ार बार होता"। इस फ़िल्म का निर्माण व निर्देशन भी उन्होंने ही किया था। इसके बाद उनकी कुछ और फ़िल्में आईं जैसे कि ’हृदय मंथन’, ’मोती का हार’ और ’जीवन स्वप्न’, लेकिन उनका लिखा कोई गीत इनमें नहीं था। 

सरोज मोहिनी नय्यर
1936 में जद्दनबाई के लिखे उस गीत के बाद एक लम्बे समय तक किसी महिला गीतकार की रचना सुनाई नहीं दी। 50 के दशक के शुरू शुरू में संगीतकार ओ.पी. नय्यर की धर्मपत्नी सरोज मोहिनी नय्यर ने एक गीत लिखा "प्रीतम आन मिलो" जो एक प्राइवेट गीत था। सी. एच. आत्मा की आवाज़ में ओ. पी. नय्यर द्वारा स्वरबद्ध यह गीत इतना कामयाब हुआ कि नय्यर साहब की गाड़ी चल पड़ी। लेकिन इस गीत की मक़बूलियत से सी. एच. आत्मा को जितनी प्रसिद्धी मिली, सरोज मोहिनी नय्यर और उनके पति ओ. पी. नय्यर को नहीं मिली। अपनी पत्नी के लिखे इस गीत को उसका हक़ दिलाने के लिए नय्यर साहब ने ’Mr. and Mrs. 55’ फ़िल्म में इस गीत को रखने का निश्चय किया। इस फ़िल्मी संस्करण को गीता दत्त ने गाया था। आगे चल कर इस गीत का एक पैरोडी संस्करण गुलज़ार ने अपनी फ़िल्म ’अंगूर’ में रखा जिसे सपन चक्रवर्ती ने गाया था। जानीमानी अभिनेत्री और माँ की भूमिका में सर्वाधिक चर्चित अभिनेत्री निरुपा रॉय ने भी अपने करियर में कम से कम एक गीत ज़रूर लिखा था। 
निरुपा रॉय
1958 की फ़िल्म ’सम्राट चन्द्रगुप्त’, जो संगीतकार कल्याणजी वीरजी शाह की शुरुआती फ़िल्मों में से थी, में एक गीत लिखा "मुझे देख चाँद शरमाए, घटा थम जाए..."। लता मंगेशकर ने इसे गाया था। फ़िल्म के बाकी गीत भरत व्यास, इंदीवर और हसरत जयपुरी ने लिखे। निरुपा रॉय ने इस फ़िल्म में नायिका के किरदार में थीं और इस तरह से संभव है कि उन्होंने कोई गीत लिखा हो और फ़िल्म के निर्माता/निर्देशक/संगीतकार को वह पसंद आ गया हो और फ़िल्म में रख लिया गया हो। 1969 में एक ’शतरंज’ नाम की फ़िल्म आई जिसमें शंकर जयकिशन का संगीत था। हसरत जयपुरी, इंदीवर और एस. एच. बिहारी जैसे नामी गीतकारों के साथ साथ एक गीत किरण कल्याणी का लिखा हुआ भी फ़िल्म में सुनाई दिया, और सबसे महत्वपूर्ण बात कि यह गीत ज़बरदस्त हिट हुआ। मोहम्मद रफ़ी, शारदा और महमूद की आवाज़ों में "बदकम्मा बदकम्मा..." अपने ज़माने का सुपरहिट गीत रहा है। किरण कल्याणी ने आगे चल कर भी जितना काम किया, शंकर जयकिशन के लिए ही किया। 1971 की फ़िल्म ’एक नारी एक ब्रह्मचारी’ में रफ़ी साहब की आवाज़ में उनका लिखा गीत था "चिराग़ किस के घर का है तू, लाल किस के घर का है, कमल है कौन ताल का, तू किस चमन का फूल है"। किशोर कुमार - शंकर जयकिशन - किरण कल्याणी का कॉम्बिनेशन अजीब-ओ-ग़रीब कॉम्बिनेशन सा प्रतीत होता है, लेकिन 1974 की फ़िल्म ’वचन’ में यह तिकड़ी एक साथ आकर एक मस्ती भरे गीत की रचना की थी "ऐ हबीबा ख़ुशनसीबा, यार के दिल के क़रीब आ..."। मध्य-एशियाई संगीत के अंदाज़ में रचा यह गीत एक आइटम गीत होने की वजह से और फ़िल्म के पिट जाने से इस गीत को सफलता नहीं मिली। किरण कल्याणी फिर इसके बाद किसी फ़िल्म में गीतकार के रूप में नज़र नहीं आईं। 

प्रभा ठाकुर
किरण कल्याणी की तरह एक और महिला गीतकार जिन्होंने शंकर जयकिशन के साथ काम किया, वो हैं प्रभा ठाकुर। प्रभा ठाकुर ना केवल एक गीतकार हैं बल्कि एक जानीमानी कवयित्री भी हैं और साथ ही गायिका के रूप में भी उन्होंने गीत गाए हैं। प्रभा ठाकुर ने फ़िल्मी गीत लेखन 1974 में शुरू की कल्याणजी-आनन्दजी के संगीतबद्ध फ़िल्म ’अलबेली’ से। सुमन कल्याणपुर और कंचन का गाया वह गीत है "तनिक तुम हमरी नजर पहचानो"। कम बजट की फ़िल्म, उस पर फ़्लॉप, कुल मिला कर गीत कहीं खो गया और प्रभा ठाकुर भी। इस फ़िल्म के तीन साल बाद 1977 में शंकर जयकिशन के संगीत में फ़िल्म ’दुनियादारी’ में उन्होंने एक गीत लिखा जिसे लता मंगेशकर और किशोर कुमार ने गाया। "प्यार करने से पहले ज़रूरी है ये, मैं तुझे जान लूँ, तू मुझे जान ले" गीत सुनने में बहुत मामूली लगता है, लेकिन ध्यान से पूरा गीत सुनने पर अहसास होता है कि कितने सीधे सरल शब्दों में प्रभा जी ने पते की बात बतायी हैं इस गीत में। और इस गीत से ख़ुश होकर ही तो शंकर जयकिशन की अगली फ़िल्म ’आत्माराम’ में भी उनसे एक और गीत लिखवाया गया। 1979 की इस फ़िल्म में प्रभा ठाकुर का लिखा गीत किशोर कुमार ने गाया - "चलते चलते इन राहों पर ऐसा भी कुछ हो जाता है, कोई अनचाहा मिल जाता है और मनचाहा खो जाता है..."। उनके अब तक के लिखे गीतों में यह सबसे अर्थपूर्ण गीत रहा है। शंकर-जयकिशन की एक और फ़िल्म ’पापी पेट का सवाल है’ (1984) में प्रभा ठाकुर ने एक गीत लिखा और उसे अपनी आवाज़ भी दी। लोक शैली में निबद्ध और हास्य रस लिए जया प्रदा पर फ़िल्माया यह गीत है "मोसे चटणी पिसावे, कैसा बेदर्दी समझे ना मेरे जी की बात..."। यह वह दौर था जब जयकिशन के बिना शंकर अकेले ही संगीत दे रहे थे। फ़िल्मों और फ़िल्म-संगीत के बदलते मिज़ाज की गति के आगे वो क्रमश: पीछे होते चले जा रहे थे और उनकी फ़िल्मों का संगीत उन कम बजट की फ़िल्मों की असफलता की वजह से ठंडे बस्ते में घुसते चले जा रहे थे। इसी दौरान 1983 में प्रभा ठाकुर ने उस दौर में अपना अन्तिम फ़िल्मी गीत लिखा कल्याणजी-आनन्दजी के लिए, फ़िल्म थी ’घुंघरू’। आशा भोसले की आवाज़ में यह मुजरा गीत है "तुम सलामत रहो यह है मेरी दुआ, मेरे दामन में है भी क्या दुआ के सिवा..."। प्रभा ठाकुर के लिखे इन सारे गीतों को ध्यान दें तो पता चलता है कि उनका लिखा हर गीत उनके लिखे पहले गीत से अलग है। उन्होंने कभी अपने गीतों को एक ही निर्दिष्ट शैली में बांधने की कोशिशें नहीं की। करीब 22 सालों तक फ़िल्म-संगीत से दूर रहने के बाद वर्ष 2006 में प्रभा ठाकुर के लिखे तीन गीत सुनाई दिए उत्तम सिंह के संगीतबद्ध फ़िल्म ’कच्ची सड़क’ में। पहला गीत है उदित नारायण और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में "इक तुमसे बात पूछूँ, बुरा नहीं मानो, पर यह बात जानो..."; और दूसरा गीत है उदित नारायण और विनोद राठौड़ की आवाज़ों में "हंगामा हंगामा"। तीसरे गीत के रूप में अदनान सामी की गायी मज़हबी क़व्वाली "ख्वाजा मेरे ख्वाजा" इन तीनों में से श्रेष्ठ रचना मानी जाएगी।

अमृता प्रीतम 
पंजाबी की पहली प्रसिद्ध महिला उपन्यासकार, लेखिका, कवयित्री और गीतकार के रूप में जो नाम सबसे पहले ध्यान में आता है, वह है अमृता प्रीतम का। पंजाबी भाषा की बीसवीं सदी की इस सशक्त कवयित्री को सरहद के दोनों तरफ़ से भरपूर मोहब्बत मिली। छह दशकों के करिअर में अमृता प्रीतम ने सौ से भी अधिक किताबें लिखीं, जिनमें पंजाबी लोक गीतों का संग्रह और उनकी आत्मकथा भी शामिल है जिसे कई भारतीय व विदेशी भाषाओं में अनुवाद किया गया है। उनकी लिखी कविता ’अज्ज आखां वारिस शाह नु’ (Today I invoke Waris Shah – "Ode to Waris Shah") कालजयी बन गई है जिसमें 1947 के बटवारे के मंज़र का मार्मिक वर्णन मिलता है। एक उपन्यासकार के रूप में ’पिंजर’ उनकी लिखी सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यास रही जो उन्होंने 1950 में प्रकाशित की थीं। इस उपन्यास में बटवारे के समय औरतों के साथ होने वाले अत्याचारों का वर्णन मिलता है। इसी उपन्यास पर 2003 में फ़िल्म बन चुकी है। इसकी चर्चा हम आगे करेंगे। बटवारे के बाद अमृता प्रीतम लाहौर से भारत आ गईं, लेकिन वो ता-उम्र पाक़िस्तान में ज़्यादा लोकप्रिय रहीं अपने समकालीन मोहन सिंह और शिव कुमार बटालवी की तुलना में। ’साहित्य अकादमी पुरस्कार’, ’ज्ञानपीठ पुरस्कार’, ’पद्मश्री’, ’पद्मविभूशण’ और ’साहित्य अकादमी फ़ेलोशिप’ जैसे उच्चस्तरीय पुरस्कारों से सम्मानित अमृता प्रीतम की लेखनी कुछ एक बार फ़िल्मों में भी सुनाई दी गीतों के रूप में। पहली बार उनका लिखा गीत आया 1975 की फ़िल्म ’डाकू’ में। बासु भट्टाचार्य निर्देशित इस फ़िल्म में संगीत था श्यामजी-घन्श्यामजी का। फ़िल्म के गीतों के लिए हसरत जयपुरी, चमन लाहोरी, रमेश्वर त्यागी, साजन दहल्वी और अमृता प्रीतम को चुना गया। अमृता प्रीतम के लिखे पहले गीत को गाया लता मंगेशकर ने - "तू आज अपने हाथ से कुछ बिगडई संवार दे, ऐ ख़ुदा मेरे जिस्म से मेरा साया उतार दे"। बच्चे के जन्म के बाद माँ के दिल की पुकार है इस गीत के शब्द। और गीत को सुन कर अहसास हो जाता है कि एक बहुत अच्छा लेखक ही ऐसा गीत लिख सकता/सकती हैं। इस फ़िल्म में अमृता प्रीतम का लिखा एक और गीत था रफ़ी साहब की आवाज़ में - "ये दुनिया थी दिल की जो हमने बसाई, ये दुनिया है दिल की जो हमने लुटाई..."। 1976 में एक फ़िल्म आई थी ’कादम्बरी’ जिसमें उस्ताद विलायत ख़ाँ का संगीत था। इसमें अमृता प्रीतम का लिखा आशा भोसले का गाया गीत "अंबर की एक पाक सुराही बादल का एक जाम उठा कर..." एक कालजयी रचना है। इस तरह की काव्यात्मक रचना हिन्दी फ़िल्मों में बहुत कम ही सुना दी है। इन दो फ़िल्मों के बाद अमृता प्रीतम ने फिर किसी हिन्दी फ़िल्म के लिए गीत नहीं लिखे। 2003 में जब उनकी उपन्यास ’पिंजर’ पर फ़िल्म बनी तो इसमें उनका लिखा एक गीत रखा गया "चरखा चलाती माँ, धागा बनाती माँ, बुनती है सपनों की केसरी..."। उत्तम सिंह के संगीत में इसे गाया प्रीति उत्तम ने। यह एक बेहद मार्मिक लोरी है जिसका एक एक शब्द सीधे कलेजे को चीर के रख देती है। अमृता प्रीतम की ही लिखी मशहूर कविता "अज्ज आखां वारिश शाह नु" को भी इस फ़िल्म में शामिल किया गया जिसे वडाली ब्रदर्स और प्रीति उत्तम ने गाया। "वारिस शाह, बजा अखा वाले शाह नू कितो करा विचो बोले, आज अखा वाले शाह नु वाह दिसाऊ, कित्तो कब्रा विचो बोले, थी आज किताबे इश्क़ दा कोई अगला वर्ग फूल..."। 

फ़िल्म ’कादम्बरी’ में अमृता प्रीतम के अलावा एक और महिला गीतकार का लिखा गीत शामिल था। ये हैं गीतांजलि सिंह। संगीतकार अजीत सिंह के संगीत में पत्नी गीतांजलि ने यह गीत लिखा जिसे अजीत सिंह ने ही गाया। "क्यों हम तुम रहें अकेले, क्यों ना बाहों में बाहें ले ले, देखो ज़िंदगी के मेले..."। यह एक नशे से भरा क्लब सॉंग् है, अमृता प्रीतम के लिखे "अंबर की एक पाक सुराही" से बिल्कुल विपरीत। अजीत सिंह ने इसके बाद कई फ़िल्मों में संगीत दिया है, लेकिन गीतांजलि सिंह के लिखे गीत इसके बाद सिर्फ़ एक ही फ़िल्म में सुनाई दी, और वह फ़िल्म है 1999 की ’होश’। दरसल फ़िल्म ’होश’ में दो गीतकार थे, दोनों महिलाएँ - एक तो गीतांजलि सिंह थीं ही, दूसरी थीं आशा रानी। संगीतकार अजीत सिंह के संगीत में इन दो गीतकारों ने मिला-जुला कर कुल आठ गीत लिखे जिन्हें अजीत सिंह और तान्या सिंह ने गाए। तान्या सिंह अजीत सिंह की बेटी हैं। गीतकार आशा रानी ने भी अजीत सिंह के संगीत में एक और फ़िल्म में गाने लिखीं। यह फ़िल्म है 1989 की ’पुरानी हवेली’। अनुराधा पौडवाल की आवाज़ में "कैसे मैं भुलाऊँ तेरा प्यार", सुरेश वाडकर की आवाज़ में "आता है मुझको याद तेरा प्यार" और "संगमर्मर सा था उसका बदन" आशा रानी की लिखी रचनाएँ हैं इस फ़िल्म की। 

महिला संगीतकारों में एक नाम शारदा राजन का रहा है। उनके द्वारा संगीतबद्ध 1976 की फ़िल्म ’ज़माने से पूछो’ में एक गीत शबनम करवारी का लिखा हुआ था। रफ़ी साहब की आवाज़ में यह गीत है "कहीं चमन खिला दिया, कहीं धुंआ उड़ा दिया, दिल में जो आय अपने किया पाप किया या पुण्य किया, हमसे ना पूछो, ज़माने से पूछो..."। इस तरह से फ़िल्म के शीर्षक गीत के गीतकार के रूप में शुरु हुई थी पारी महिला गीतकार शबनम करवारी की। 1979 में एक फ़िल्म बनी थी ’अरब का सोना: अबु कालिया’। जतिन-श्याम के संगीत निर्देशन में इस फ़िल्म के गीत ऐश कंवल और शबनम ने लिखे थे। फ़िल्म के गीतों में आवाज़ें थीं मोहम्मद रफ़ी, दिलराज कौर और नितिन मुकेश की। शबनम करवारी का लिखा और नितिन मुकेश का गाया एक गीत है "नेकी और बदी सब की एक दिन तोली जाएगी, पाप और पुण्य के पुस्तक सबकी एक दिन खोली जाएगी..."। इस सुंदर दार्शनिक गीत की ही तरह न जाने कितने गीत लोगों तक पहुँचने से वंचित रह गए होंगे सिर्फ़ इस वजह से कि ये फ़िल्में या तो सही तरीके से बन नहीं सकीं या फिर इन्हें प्रोमोट करने के लिए अर्थ का अभाव था।

यहाँ आकर पूरी होती है ’हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार’ का पहला भाग जिसमें हमने बातें की जद्दन बाई, सरोज मोहिनी नय्यर, निरुपा रॉय, किरण कल्याणी, प्रभा ठाकुर, अमृता प्रीतम, गीतांजलि सिंह, आशा रानी और शबनम करवारी की। इस लेख के दूसरे भाग में हम कुछ और महिला गीतकारों और उनके लिखे गीतों की जानकारी लेकर उपस्थित होंगे। तब तक के लिए अपने दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार!

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

रविवार, 1 अप्रैल 2018

राग बिलावल और बिहाग : SWARGOSHTHI – 363 : RAG BILAWAL & BIHAG




स्वरगोष्ठी – 363 में आज

दस थाट, बीस राग और बीस गीत – 2 : बिलावल थाट

उस्ताद अब्दुल करीम खाँ से राग बिलावल और लता मंगेशकर से बिहाग पर आधारित फिल्मी गीत 





उस्ताद अब्दुल करीम खाँ
लता मंगेशकर
'रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला ‘दस थाट, बीस राग और बीस गीत’ के दूसरे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रचलन लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। दस थाटों की आधुनिक प्रणाली का सूत्रपात भातखण्डे जी ने ही किया था। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से दूसरा थाट बिलावल है। आज के अंक में बिलावल थाट के आश्रय राग बिलावल और इस थाट के जन्य राग बिहाग पर चर्चा करेंगे।



भारतीय संगीत के रागों को उनमें लगने वाले स्वरों के अनुसार वर्गीकृत करने की प्रणाली को थाट कहा जाता है। पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने कुल दस थाट के अन्तर्गत सभी रागों का वर्गीकरण किया था। उन्होने थाट के कुछ लक्षण बताए हैं। किसी भी थाट में कम से कम सात स्वरों का प्रयोग ज़रूरी है। थाट में ये सात स्वर स्वाभाविक क्रम में रहने चाहिये। अर्थात सा के बाद रे, रे के बाद ग आदि। थाट को गाया-बजाया नहीं जा सकता। इसके स्वरों के अनुकूल किसी राग की रचना की जा सकती है, जिसे गाया बजाया जा सकता है। एक थाट से कई रागों की रचना हो सकती है। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में हमने आपको ‘कल्याण’ थाट का परिचय दिया था। आज का दूसरा थाट है- ‘बिलावल’। इस थाट में प्रयोग होने वाले स्वर हैं- सा, रे, ग, म, प, ध, नि अर्थात सभी शुद्ध स्वर का प्रयोग होता है। पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे कृत ‘क्रमिक पुस्तक मालिका’ (भाग-1) के अनुसार ‘बिलावल’ थाट का आश्रय राग ‘बिलावल’ ही है। इस थाट के अन्तर्गत आने वाले अन्य प्रमुख राग हैं- अल्हैया बिलावल, बिहाग, देशकार, हेमकल्याण, दुर्गा, शंकरा, पहाड़ी, भिन्न षडज, हंसध्वनि, माँड़ आदि।

अब हम आपको राग ‘बिलावल’ पर आधारित एक खयाल रचना सुनवाते हैं। यह रचना एक ऐसे महान संगीतज्ञ की आवाज़ में है, जो उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत के बीच एक सेतु थे। किराना घराने के इस महान कलासाधक को हम उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के नाम से जानते हैं। इस महान संगीतज्ञ का जन्म उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुजफ्फरनगर जिले में स्थित कैराना नामक कस्बे में वर्ष 1884 में हुआ था। आज जिसे हम संगीत के किराना घराने के नाम से जानते हैं वह इसी कस्बे के नाम पर पड़ा था। एक संगीतकार परिवार में जन्में अब्दुल करीम खाँ के पिता का नाम काले खाँ था। खाँ साहब के तीन भाई क्रमशः अब्दुल लतीफ़ खाँ, अब्दुल मजीद खाँ और अब्दुल हक़ खाँ थे। सुप्रसिद्ध गायिका रोशन आरा बेग़म सबसे छोटे भाई अब्दुल हक़ की सुपुत्री थीं। जन्म से ही सुरीले कण्ठ के धनी अब्दुल करीम खाँ की सीखने की रफ्तार इतनी तेज थी कि मात्र छः वर्ष की आयु में ही संगीत की सभाओं गाने लगे थे। उनकी प्रतिभा इतनी विलक्षण थी कि पन्द्रह वर्ष की आयु में बड़ौदा दरबार में गायक के रूप में नियुक्त हो गए थे। वहाँ वे 1899 से 1902 तक रहे और उसके बाद मिरज चले गए। आइए, खाँ साहब की आवाज़ में सुनते हैं, राग बिलावल की एक दुर्लभ रिकार्डिंग।

राग बिलावल : ‘चारा नज़र नहीं आवे...’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ


बिलावल थाट के अन्तर्गत आने वाले रागों में एक प्रमुख राग बिहाग भी है, जिसमे सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग होता है। बिहाग, औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात इसके आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वरों का प्रयोग होता है। इस राग के आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। राग बिहाग के आरोह के स्वर हैं- सा, ग, म, प, नि, सां और अवरोह के स्वर हैं- सां, नि, ध, प, म, ग, रे, सा। यह राग रात्रि के दूसरे प्रहर में गाया-बजाया जाता है। अब हम आपको राग बिहाग में पिरोया एक आकर्षक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1959 में प्रदर्शित संगीत-प्रधान फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ से लिया है। भरत व्यास के लिखे गीत को संगीतकार बसन्त देसाई ने राग बिहाग के स्वरों में संगीतबद्ध किया है। गीत के बोल हैं- ‘तेरे सुर और मेरे गीत, दोनों मिल कर बनेगे प्रीत...’ जिसे लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। लीजिए, अब आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग बिहाग : ‘तेरे सुर और मेरे गीत...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – गूँज उठी शहनाई


संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 363वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 370वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 7 अप्रैल 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 365वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 361वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1961 में प्रदर्शित फिल्म “संजोग” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – कल्याण अथवा यमन, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मुकेश

“स्वरगोष्ठी” की पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, धनबाद, झारखण्ड से जॉय शंकर, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी नई श्रृंखला “दस थाट, बीस राग और बीस गीत” की दूसरी कड़ी में आपने बिलावल थाट का परिचय प्राप्त किया और इस थाट के आश्रय राग बिलावल में पिरोया एक खयाल सुविख्यात गायक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही बिलावल थाट के जन्य राग बिहाग पर आधारित एक फिल्मी गीत पार्श्वगायिका लता मंगेशकर की आवाज़ में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक से हम इस श्रृंखला का अगला अंक प्रस्तुत करेंगे। इस नई श्रृंखला अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 


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