Saturday, November 18, 2017

चित्रकथा - 45: इस दशक के नवोदित नायक (भाग - 7)

अंक - 45

इस दशक के नवोदित नायक (भाग - 7)


"हम भी हैं जोश में..." 




हर रोज़ देश के कोने कोने से न जाने कितने युवक युवतियाँ आँखों में सपने लिए माया नगरी मुंबई के रेल्वे स्टेशन पर उतरते हैं। फ़िल्मी दुनिया की चमक-दमक से प्रभावित होकर स्टार बनने का सपना लिए छोटे बड़े शहरों, कसबों और गाँवों से मुंबई की धरती पर क़दम रखते हैं। और फिर शुरु होता है संघर्ष। मेहनत, बुद्धि, प्रतिभा और क़िस्मत, इन सभी के सही मेल-जोल से इन लाखों युवक युवतियों में से कुछ गिने चुने लोग ही ग्लैमर की इस दुनिया में मुकाम बना पाते हैं। और कुछ फ़िल्मी घरानों से ताल्लुख रखते हैं जिनके लिए फ़िल्मों में क़दम रखना तो कुछ आसान होता है लेकिन आगे वही बढ़ता है जिसमें कुछ बात होती है। हर दशक की तरह वर्तमान दशक में भी ऐसे कई युवक फ़िल्मी दुनिया में क़दम जमाए हैं जिनमें से कुछ बेहद कामयाब हुए तो कुछ कामयाबी की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं। कुल मिला कर फ़िल्मी दुनिया में आने के बाद भी उनका संघर्ष जारी है यहाँ टिके रहने के लिए। ’चित्रकथा’ में आज से हम शुरु कर रहे हैं इस दशक के नवोदित नायकों पर केन्द्रित एक लघु श्रॄंखला जिसमें हम बातें करेंगे वर्तमान दशक में अपना करीअर शुरु करने वाले शताधिक नायकों की। प्रस्तुत है ’इस दशक के नवोदित नायक’ श्रॄंखला की सातवीं कड़ी।




स श्रॄंखला की सातवीं कड़ी में आज जिस नायक का ज़िक्र सबसे पहले करने जा रहे हैं, उन्होंने अपने आप को बहुत ही कम समय में ना केवल सिद्ध किया बल्कि बड़ी तेज़ रफ़्तार से सफलता की सीढ़ियाँ चढते चले जा रहे हैं। सुशान्त सिंह राजपुत का जन्म बिहार की राजधानी पटना में हुआ और पुर्णिया ज़िला उनके पूर्वजों का ज़िला है। वर्ष 2002 में जब सुशान्त मात्र 16 वर्ष के थे, तब उनके माँ के दुनिया से चले जाने से उन्हें बहुत बड़ा धक्का लगा और उसी साल उनका पूरा परिवार पटना से दिल्ली स्थानान्तरित हो गया। पढ़ाई-लिखाई में अच्छे सुशान्त को Delhi College of Engineering में इंजिनीयरिंग् पढ़ने का मौक़ा मिला। भौतिक विज्ञान में सुशान्त National Olympiad Winner रह चुके हैं। यही नहीं उन्होंने कुल ग्यारह इंजिनीयरिंग् एन्ट्रान्स की परीक्षाएँ उत्तीर्ण हुए थे। इतने मेधावी होने के बावजूद सुशान्त ने इंजिनीयरिंग् की पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर अभिनय के क्षेत्र में क़दम रख दिया। पढ़ाई के दिनों में ही उन्होंने शियामक दावर के डान्स क्लासेस में दाख़िला ले लिया था और एक अच्छे डान्सर बन गए थे। डान्स क्लास में कुछ अन्य साथियों के फ़िल्मों के प्रति रुझान का असर उन पर भी हुआ और वो भी बैरी जॉन के ड्रामा क्लासेस जॉइन कर ली। जल्दी ही सुशान्त को शियामक ने अपने डान्स ट्रूप में शामिल कर लिया और वर्ष 2005 में उन्हें ’फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार’ समारोह में बतौर पार्श्व नर्तक के रूप में नृत्य करने का मौका मिल गया। इसके बाद उन्हें और भी कई महत्वपूर्ण फ़ंकशनों में डान्स के मौके मिले और एक में तो उन्होंने ऐश्वर्या राय को भी अपने कंधे पर उठाया था। फ़िल्मों में ब्रेक की उम्मीद से सुशान्त मुंबई चले आए और नादिरा बब्बर की ’एकजुट थिएटर’ में भर्ती हो गए जहाँ पे वो ढाई साल तक रहे और इस दौरान उन्हें कई टीवी विज्ञापनों में अभिनय के मौके मिले। 2008 में ’बालाजी टेलीफ़िल्म्स’ की नज़र सुशान्त पर पड़ी और उनकी प्रतिभा को परखते हुए उन्हें ’किस देश में है मेरा दिल’ धारावाहिक में प्रीत जुनेजा का किरदार निभाने का अवसर दे दिया। कहानी के अनुसार उनके किरदार को जल्दी ही मरना था, लेकिन तब तक वो उस धारावाहिक में इतने लोकप्रिय हो चुके थे कि उनकी मौत को दर्शकों ने ग्रहण नहीं किया और पब्लिक डिमान्ड पर उन्हें शो में वापस लाना पड़ा। इसके बाद 2009 में ’पवित्र रिश्ता’ और 2010 में ’ज़रा नचके दिखा’ और ’झलक दिखला जा’ में उन्हें ख़ूब प्रसिद्धी हासिल हुई। ’पवित्र रिश्ता’ की अपार सफलता के बावजूद सुशान्त ने फ़िल्मों में अपनी क़िस्मत आज़माने के लिए टीवी को अल्विदा कह दिया और विदेश जाकर एक फ़िल्म मेकिंग् कोर्स में भर्ती हो गए। वर्ष 2013 में सुशान्त सिंह राजपुत ने अभिषेक कपूर के ’काइ पो चे’ फ़िल्म के लिए ऑडिशन दिया और उनका निर्वाचन हो गया तीन नायकों में से एक नायक के किरदार के लिए। बाकी के दो नायक थे अमित साध और राजकुमार राव। चेतन भगत के मशहूर उपन्यास ’The 3 Mistakes of My Life’ पर आधारित इस फ़िल्म को अपार सफलता मिली और सुशान्त अपनी पहली फ़िल्म में ही एक सफल अभिनेता के रूप में उभरे। इस फ़िल्म के लिए उनकी भूरी-भूरी प्रशंसा हुई। उनकी दूसरी फ़िल्म थी परिनीति चोपड़ा के साथ ’शुद्ध देसी रोमान्स’, जिसने एक बार बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाबी के झंडे दाढ़ दिए और सुशान्त बन गए हर फ़िल्म प्रोड्युसर के चहेते नायक। 2014 में राजकुमार हिरानी ने अपनी महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’पीके’ में सुशान्त को एक छोटा सा पर सुन्दर किरदार निभाने का मौका दिया और इस तरह से सुशान्त को आमिर ख़ान और अनुष्का शर्मा के साथ काम करने का मौक़ा मिला। 2015 में दिबाकर बनर्जी की फ़िल्म ’डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी’ के लिए सुशान्त को ही चुना गया ब्योमकेश के चरित्र के लिए। रजत कपूर के रूप में ब्योमकेश की जो छवि दर्शकों के दिलों में बरसों से बैठी है, उसे किसी और से प्रतिस्थापित करना आसान नहीं। लेकिन सुशान्त के जानदार और शानदार अभिनय को लोगों ने ख़ूब सराहा। ब्योमकेश एक बाद सुशान्त नज़र आए क्रिकेट कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी के किरदार में। 2016 की फ़िल्म ’एम. एस. धोनी’ को ना केवल व्यावसायिक सफलता मिली बल्कि आलोचनात्मक सफलता भी मिली। इस फ़िल्म के लिए सुशान्त को फ़िल्मफ़ेअर के तहत सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के पुरस्कार के लिए नामांकन मिला। हाल ही में सुशान्त नज़र आए कृति सानोन के साथ फ़िल्म ’राबता’ में। यह फ़िल्म ख़ास नहीं चली। अभी 2017-18 में सुशान्त सिंह राजपुत की कई महत्वपूर्ण फ़िल्में आने वाली हैं; इसमें कोई सन्देह नहीं कि इन सभी फ़िल्मों में सुशान्त अपने अभिनय के जल्वों से सबका दिल जीत लेंगे।

1980 में जम्मु में जन्मे विद्युत जामवाल एक आर्मी अफ़सर के बेटे हैं। इस वजह से वो भारत के कई प्रान्तों में रह चुके हैं। तीन वर्ष की आयु से उन्होंने केरल के पलक्कड के एक आश्रम में कलरिपयट्टु का प्रशिक्षण लिया जो उनकी माँ चलाती थीं। दुनिया भर में घूम कर विद्युत ने अलग अलग तरह के मार्शल आर्टिस्ट्स को ट्रेन किया है और इन सभी का मूल कलरिपयट्टु में ही है। मार्शल आर्ट्स में दुनिया भर में अपनी पहचान बनाने के बाद विद्युत 2008 में मुंबई आए फ़िल्मों में अपनी क़िस्मत आज़माने। शुरुआत उन्होंने मॉडेलिंग् से की। जल्दी ही इंडस्ट्री की नज़र उनकी आकर्षक कदकाठी पर पड़ी और तेलुगू फ़िल्म ’शक्ति’ में अभिनय का मौका मिल गया। इसके बाद निशिकान्त कामत की हिन्दी फ़िल्म ’फ़ोर्स’ में विष्णु के किरदार के लिए चुन लिया गया जिसके लिए हज़ारों युवकों ने ऑडिशन दिया था। ’फ़ोर्स’ में जॉन एब्रहम भी थे, लेकिन दर्शकों को विद्युत जामवाल के ऐक्शन सीन्स ने मन्त्रमुग्ध कर दिया। इस फ़िल्म ने 2012 के लगभग सभी पुरस्कार समारोहों में Most Promising Debut का पुरस्कार विद्युत को दिलवाया। इस फ़िल्म के बाद विद्युत जामवाल कई तेलुगू और तमिल फ़िल्मों में अभिनय किया और दक्षिण में भी उन्हें ख़ूब पसन्द किया गया। हिन्दी में उनकी अगली फ़िल्म आई ’कमांडो’ जिसमें उन्होंने अपने सारे ऐक्शन ख़ुद ही निभाए और दर्शकों को अद्भुत ऐक्शन्स के ज़रिए अचम्भित किया। फ़िल्म के रिलीज़ से पहले केवल प्रोमोज़ के द्वारा ही दर्शकों में खलबली मचा दी और ट्रेलर लौन्च के एक सप्ताह के भीतर दस लाख से ज़्यादा हिट्स आए यूट्युब पर। हालाँकि फ़िल्म को बहुत अधिक सफलता नहीं मिल पायी लेकिन विद्युत के ऐक्शन के चर्चे ख़ूब हुए। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी विद्युत के ऐक्शन की ख़ूब तारीफ़ें हुईं और उनकी तुलना ब्रुस ली और टोनी जा से होने लगी। उनकी कामुकता के आधार पर उन्हें Most Desirable, Fittest Men with Best Bodies, और Sexiest Men Alive जैसे ख़िताब प्राप्त हुए। ’कमांडो’ की सफलता के बाद विद्युत नज़र आए टिग्मांशु धुलिया की फ़िल्म ’बुलेट राजा’ में। टिग्मांशु ने अपनी अगली फ़िल्म ’यारा’ में भी विद्युत को ही चुना है जो बहुत जल्दी रिलीज़ होने वाली है। इस फ़िल्म के अलावा भी विद्युत कई और प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं और आने वाले समय में उनकी कई फ़िल्में रिलीज़ होने वाली हैं। देखना यह है कि वो सफलता की कितनी सीढ़ियाँ चढ़ पाते हैं।

पाक़िस्तानी अभिनेता इमरान अब्बास मूलत: एक पाक़िस्तानी टेलीविज़न अभिनेता हैं और मॉडल रह चुके हैं। ’मेरी ज़ात ज़र्रा-ए-बेनिशान’, ’ख़ुदा और मोहब्बत’, ’मेरा नसीब’, ’पिया के घर जाना है’, ’दिल-ए-मुज़तर’, ’शादी और तुम से?’, ’अलविदा’, और ’मेरा नाम यूसुफ़ है’ जैसी पाकिस्तानी धारावाहिकों में अभिनय करते हुए इमरान बहुत मशहूर हो चुके थे। साल 2013 में उन्हें पाक़िस्तानी फ़िल्म ’अंजुमन’ में बतौर नायक ब्रेक मिला जो एक रोमान्टिक ड्रामा फ़िल्म थी। इमरान अब्बास की ख़ूबसूरती और अभिनय का ज़िक्र सरहद के इस पार भी आ पहुँचा और अगले ही साल उन्हें बॉलीवूड की हॉरर फ़िल्म ’Creature 3D' में बिपाशा बासु के विपरीत नायक का रोल मिल गया। इस फ़िल्म के लिए उन्हें Best Male Debut का फ़िल्मफ़ेअर का नामांकन मिला था। इस फ़िल्म में "मोहब्बत बरसा देना तू सावन आया" गीत ख़ूब लोकप्रिय हुआ था और इमरान व बिपाशा की केमिस्ट्री की भी चर्चा हुई थी। साथ ही फ़िल्म के कामोत्तेजक सीन्स भी सुर्ख़ियों में रही। इमरान अब्बास ने लाहौर के National College of Arts से architecture की पढ़ाई की और वो उर्दू शायरी भी लिखते हैं। 1947 में बटवारे के बाद उनका परिवार लाहौर में ही बस गया था। ’Creature 3D' के बाद इमरान अगली फ़िल्म ’जानिसार’ में नज़र आए जो मुज़फ़्फ़र अली निर्देशित फ़िल्म थी। 2015 में इमरान ’Abdullah: The Final Witness’ में सादिया ख़ान के साथ नज़र आए। इस फ़िल्म को कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल में दिखाया गया था जो 2016 में प्रदर्शित हुआ। इसी वर्ष करण जोहर की फ़िल्म ’ऐ दिल है मुश्किल’ में भी इमरान अब्बास को एक किरदार निभाने का मौका मिला। इमरान अब्बास ने बहुत कम उम्र में ही काफ़ी सफलता हासिल कर ली है। अभी तो उनके सामने एक बहुत लम्बी पारी इन्तज़ार कर रही है। टेलीविज़न और फ़िल्मों के बीच सही ताल मेल बनाए रखते हुए वो निरन्तर अपनी मंज़िल की ओर अग्रसर होते चले जा रहे हैं। हाल में भारत और पाक़िस्तान के बीच संबंध में कड़वाहट की वजह से पाक़िस्तानी कलाकार बॉलीवूड में दाख़िल नहीं हो पा रहे हैं। इस वजह से क्या इमरान अब्बास को फिर कभी किसी बॉलीवूड फ़िल्म में बतौर नायक काम करने को नहीं मिलेगा? कह नहीं सकते। लेकिन अभिनेता तो अभिनेता होता है। चाहे भारत हो या पाक़िस्तान, अपने अभिनय के जादू से वो दर्शकों के दिलों पर यूंही राज करते रहेंगे जैसे कि अब तक करते आए हैं।

तमिल, तेलुगू और हिन्दी सिनेमा में समान रूप से छाने वाले राना डग्गुबाती का जन्म चेन्नई में हुआ था। उनके पिता डग्गुबाती सुरेश बाबू तेलुगू फ़िल्मों के निर्माता रहे हैं। उनके दादा तमिल फ़िल्म इंडस्ट्री के जानेमाने निर्माता डी. रामानयडु हैं। राना के चाचा वेंकटेश और चचेरे भाई नागा चैतन्य भी फ़िल्मों के अभिनेता हैं। हैदराबाद पब्लिक स्कूल से शिक्षा प्राप्त करने के बाद राना ने तेलुगू फ़िल्म जगत में क़दम रखा। बॉलीवूड में राना के पहले क़दम पड़े ’दम मारो दम’ फ़िल्म में जो 2011 में बनी थी। उनके इस हिन्दी डेब्यु को "धमाकेदार" माना गया, इतना ज़्यादा कि उन्हें उस साल का ’The Most Promising Newcomer of 2011' का ख़िताब दिया गया ’दि टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ की तरफ़ से। 2012 में राना डग्गुबाती को ’10th Most Desirable Man of India' का ख़िताब मिला। इसके बाद तेलुगू और कुछ तमिल फ़िल्मों में अभिनय के बाद उनकी अगली हिन्दी फ़िल्म आई 2016 की ’बाहूबली’ जो बहुत कामयाब रही। इस फ़िल्म में राना ने ’भल्लालदेव’ का किरदार निभाया था। इस चरित्र में उनकी भूमिका कुछ हद तक खलनायक की थी। लेकिन उन्हें फ़िल्म समीक्षकों की भूरी भूरी प्रशंसा मिली। 2017 में ’बाहूबली 2’ भी ख़ूब चली। राना डग्गुबाती के अभिनय से सजी कुछ और हिन्दी फ़िल्में हैं - ’डिपार्टमेण्ट’, ’ये जवानी है दीवानी’, ’बेबी’, और ’दि ग़ाज़ी अटैक’। राना डग्गुबाती को ’दम मारो दम’ के लिए ’ज़ी सिने अवार्ड्स’ के अन्तर्गत Best Male Debut और IIFA Awards के अन्तर्गत ’बाहूबली’ के लिए सर्वश्रेष्ठ खलनायक का पुरस्कार मिला है। राना दक्षिण में जितने लोकप्रिय हैं, उतनी ही तेज़ी से वो हिन्दी फ़िल्म जगत में भी नाम कमा रहे हैं। देखना यह है कि क्या भविष्य में वो इन तीनों इंडस्ट्री पर एक समान राज कर पाते हैं या नहीं। राष्ट्रीय पुरस्कार और फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड से समानित राजकुमार राव भी इस पीढ़ी के एक तेज़ी से सफलता की पायदान चढ़ने वाले अभिनेता हैं। राजकुमार राव का असली नाम है राजकुमार यादव। अहिरवाल, गुड़गाँव, हरियाणा के एक अहिरवाल परिवार में जन्मे और पले बढ़े राजकुमार ने दिल्ली विश्वविद्यालय से आर्ट्स में स्नातक की डिग्री प्राप्त की अन्द फिर अभिनय सीखने के लिए Film and Television Institute of India में भर्ती हो गए। यहाँ की पढ़ाई पूरी करते ही उन्होंने मुंबई का रुख़ किया फ़िल्मों में करीयर बनाने के लिए। 2010 में उनका यह सपना पूरा हुआ जब उन्हें ’लव, सेक्स और धोखा’ फ़िल्म में अभिनय करने का मौका मिला। इस फ़िल्म में उनका रोल बड़ा नहीं था। इसके बाद और भी कई फ़िल्मों में छोटे-मोटे किरदार निभाते हुए इन्डस्ट्री में उन्होंने दो साल गुज़ार दिए। 2013 की जिस फ़िल्म से उन्हें प्रसिद्धी मिली, वह थी ’काई पो चे’, जिसके लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कारों के तहत ’श्रेष्ठ सह-अभिनेता’ के पुरस्कार का नामांकन मिला था। उपर हम बता चुके हैं कि यह फ़िल्म सुशान्त सिंह राजपुत के करीअर की भी पहली महत्वपूर्ण फ़िल्म थी। 2013 का वर्ष राजकुमार राव के लिए बहुत अच्छा रहा। ’काई पो चे’ के बाद इसी वर्ष ’शाहिद’ फ़िल्म में शाहिद आज़्मी की भूमिका अदा करते हुए उन्हें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का और साथ ही फ़िल्मफ़ेअर के अन्तर्गत Critics Best Actor का पुरस्कार भी। 2014 में राजकुमार राव ने रोमान्टिक कॉमेडी ’क्वीन’ और ड्रामा ’सिटीलाइट्स’ में मुख्य नायक का किरदार निभाया। 2016 की फ़िल्म ’अलीगढ़’ में एक पत्रकार की सशक्त भूमिका बख़ूबी निभाने की वजह से फ़िल्मफ़ेअर के तहत सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता के पुरस्कार के लिए दूसरी बार नामांकन मिला। राजकुमार राव की कुछ और महत्वपूर्ण फ़िल्मों के नाम हैं ’रागिनी एम एम एस’, ’गैंग्स ऑफ़ वासेपुर 2’, ’चिट्टागौंग’, ’तलाश’, ’डॉली की डोली’, ’हमारी अधूरी कहानी’, ’राबता’, ’बहन होगी तेरी’, ’बरेली की बरफ़ी’। राजकुमार राव अपने हर चरित्र में सही तरीके से उतर जाने के लिए मशहूर हैं। इसके लिए उन्हें कई बार अपने शारीरिक गठन को भी बदला है। उदाहरण के तौर पर ’ट्रैप्ड’ फ़िल्म के लिए उन्होंने 22 दिनों के अन्दर 7 किलो वज़न कम किया है, जबकि ’बोस: डेड ऑर अलाइव’ में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की भूमिका के लिए उन्होंने 11 किलो वज़न बढ़ाया है। सुना जा रहा है कि उनकी आने वाली फ़िल्म में ऐश्वर्या राय बच्चन से उम्र में अधिक दिखने के लिए वो अपनी दाढ़ी बढ़ा रहे हैं।


जलंधर पंजाब के एक बिज़नेस फ़ैमिली में जन्में करण कुन्द्रा घर के सबसे छोटे बेटे हैं। तीन बड़ी बहनों का प्यार-दुलार पा कर बड़े हुए करण ने अपनी स्कूलिंग् राजस्थान के अजमेर के मायो कॉलेज से पूरी की और आगे चल कर अमरीका से MBA किया। वापस आकर वो टेलीविज़न जगत से जुड़े और एकता कपूर की ’कितनी मोहब्बत है’ धारावाहिक में अर्जुन पुंज की भूमिका अदा करते हुए घर घर में चर्चित हो उठे। एक मॉडल और अभिनेता होने के साथ साथ करण एक बिज़नेसमैन भी हैं और उनका एक अन्तराष्ट्रीय कॉल सेन्टर भी है। जलंधर का 'Insignia Shopping Mall' भी उनका ही है। 2008 में ’कितनी मोहब्बत है’ से अभिनय सफ़र शुरु करते हुए करण ने 2009 में एक और धारावाहिक ’दिल की तमन्ना है’ में भी अभिनय किया औए 2010 में ’झलक दिखला जा’ में नज़र आए। फ़िल्म जगत में करण कुन्द्रा का पदार्पण हुआ 2011 की फ़िल्म ’प्योर पंजाबी’ में जिसमें उन्होंने प्रेम की भूमिका निभाई। 2012 की फ़िल्म ’हॉरर स्टोरी’ में नील की भूमिका को लोगों ने सराहा। फिर उसके बाद ’जट रोमान्टिक’, ’मेरे यार कमीने’, ’कंट्रोल भाजी कंट्रोल’ जैसी हास्य फ़िल्मों में अभिनय करने के बाद 2017 में ’मुबारकाँ’ में उन्होंने मनप्रीत संधु की यादगार भूमिका निभाई। 2018 में उनकी अगली फ़िल्म '1921' बन कर तैयार होने जा रही है। करण कुन्द्रा को फ़िल्मों में अभी तक वो कामयाबी नहीं मिली है जो कामयाबी उन्हें टेलीविज़न पर मिली। लेकिन उनकी लगन और मेहनत आगे चल कर फ़िल्मों में रंग लाएगी और उन्हें छोटे परदे के साथ-साथ बड़े परदे पर भी शोहरत हासिल होगी, कुछ ऐसी ही उम्मीद हर करते हैं। विवान शाह नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक के छोटे बेटे हैं। देहरादून के ’दून स्कूल’ से 2009 में स्नातक करने के बाद विवान ने अपना फ़िल्मी सफ़र शुरु किया 2011 की फ़िल्म ’सात ख़ून माफ़’ से जिसमें उन्होंने अरुण कुमार की भूमिका अदा की। उस समय वो मात्र 21 वर्ष के थे। इस फ़िल्म के बाद विवान ने फ़िल्मकार विशाल भारद्वाज के साथ तीन फ़िल्मों में साइन किया। ये फ़िल्में अभी बन नहीं पायी हैं। 2014 में फ़राह ख़ान ने अपनी बड़ी फ़िल्म ’हैप्पी न्यु यीअर’ में विवान को एक अच्छा रोल दिया। रोहन की भूमिका में विवान को इस फ़िल्म में शाहरुख़ ख़ान, दीपिका पडुकोणे, अभिषेक बच्चन, सोनू सूद, बोमन इरानी और जैकी श्रॉफ़ जैसे मंझे हुए अभिनेताओं के साथ काम करने का मौका मिला और उन्हें बहुत कुछ सीखने को मिला। 2015 की फ़िल्म ’बॉम्बे वेल्वेट’ में टोनी की भूमिका में और 2017 की फ़िल्म ’लाली की शादी में लड्डू दीवाना’ में लड्डू की भूमिका में विवान शाह को लोगों ने पसन्द किया। उनके अभिनय क्षमता की प्रशंसा हुई, और अभिनय क्षमता हो ना कैसे जब वो नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक जैसे दिग्गज अदाकारों के बेटे हैं। देखना यह है कि भविष्य में विवान किस तरह से अपनी अलग पहचान इस इंडस्ट्री में बना पाते हैं।

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Tuesday, November 14, 2017

बोलती कहानियाँ: खेल (ऑडियो)

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको नई-पुरानी, प्रसिद्ध-अल्पज्ञात, मौलिक-अनूदित, हर प्रकार की हिंदी कहानियाँ सुनवाते रहे हैं। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में सुदर्शन रत्नाकर की लघुकथा "विश्वसनीय" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं उषा छाबड़ा की बालकथा "खेल", उन्हीं के स्वर में।

इस बालकथा का टेक्स्ट उनके ब्लॉग अनोखी पाठशाला पर उपलब्ध है। इस बालकथा का कुल प्रसारण समय 3 मिनट 8 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



इंसानियत की मशाल सब मिलकर उठाएँ
जश्न मानवता का एक जुट हों मनाएँ
चलो सब एक हो नया गीत गुनगुनाएँ
प्रेम के संदेश को जन जन में फैलाएँ
~ उषा छाबड़ा

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी कहानी


"बड़ी हुई तो क्या हुआ। मैं तो उससे बात भी नहीं करूंगा।"
(उषा छाबड़ा की "खेल" से एक अंश)



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#Nineteenth Story, Khel: Usha Chhabra/Hindi Audio Book/2017/19. Voice: Usha Chhabra

Monday, November 13, 2017

फिल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड 14 || गीता दत्त

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 14
Geeta Dutt


फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के चौदहवें एपिसोड में सुनिए कहानी गीता दत्त की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....



फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -

Sunday, November 12, 2017

ठुमरी भैरवी : SWARGOSHTHI – 343 : THUMARI BHAIRAVI




स्वरगोष्ठी – 343 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 10 : ठुमरी भैरवी

नारी-कण्ठ पर सुशोभित ठुमरी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’



विदुषी गिरिजा देवी
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की दसवीं और समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला की भाँति इस श्रृंखला में भी हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हमारे सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन ने प्रस्तुत किया है। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। दरअसल यह श्रृंखला पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित की गई थी। हमारे पाठकों / श्रोताओं को यह श्रृंखला सम्भवतः कुछ अधिक रुचिकर प्रतीत हुई थी। अनेक संगीत-प्रेमियों ने इसके पुनर्प्रसारण का आग्रह किया है। सभी सम्मानित पाठकों / श्रोताओं के अनुरोध का सम्मान करते हुए और पूर्वप्रकाशित श्रृंखला में थोड़ा परिमार्जन करते हुए यह श्रृंखला हम पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारी नई लघु श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल की गई उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे ऐसी ही कुछ चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज की ठुमरी में नायक की आँखों के आकर्षण का रसपूर्ण चित्रण किया गया है। आज हम जिस ठुमरी पर चर्चा करेंगे, वह है- ‘आ जा साँवरिया तोहे गरवा लगा लूँ, रस के भरे तोरे नैन...’। प्रत्यक्ष रूप से तो यह ठुमरी श्रृंगार रस प्रधान है किन्तु कुछ समर्थ गायक-गायिकाओं ने इसे कृष्णभक्ति से तो कुछ ने नायिका के विरह भाव से जोड़ा है। इन सभी भावों की अभिव्यक्ति के लिए राग भैरवी के अलावा भला और कौन सा राग हो सकता है? इस श्रृंखला में हमने आपके लिए पारम्परिक ठुमरी के एक या दो उदाहरण तथा उसके फिल्मी संस्करण का एक उदाहरण प्रस्तुत किया है, किन्तु श्रृंखला की इस समापन कड़ी में आज की ठुमरी- ‘रस के भरे तोरे नैन...’ के परम्परागत स्वरूप के हम चार उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। दरअसल 1905 में गौहर जान की गायकी से लेकर आधुनिक काल में गिरिजा देवी की गायकी के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए हम पिछली पूरी एक शताब्दी के दौरान ठुमरी गायकी की यात्रा को रेखांकित भी कर रहे हैं। आप इस ठुमरी का रसास्वादन गौहर जान, रसूलन बाई, सिद्धेश्वरी देवी, गिरिजा देवी और 1978 की फिल्म "गमन" में शामिल यही ठुमरी हीरादेवी मिश्र की आवाज़ों में करेंगे।

(बाएँ से) गौहर जान, रसूलन बाई, सिद्धेश्वरी देवी और हीरादेवी मिश्र 




ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’ : गायिका गौहर जान
ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’ : गायिका रसूलन बाई
ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’ : गायिका सिद्धेश्वरी देवी
ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’ : विदुषी गिरिजा देवी
ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’ : हीरादेवी मिश्र : फिल्म - गमन





संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 343वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको 1944 में प्रदर्शित एक पुरानी फिल्म से एक ठुमरिनुमा गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही प्रश्न का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष के अन्तिम अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में पाँचवें दशक की किस अभिनेत्री और गायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 18 नवम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 345वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 341वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको वर्ष 1977 में प्रदर्शित फिल्म – “स्वामी” से ली गई ठुमरी का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग किरवानी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – के.जे. येशुदास

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में तीनों प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे प्रतिभागी हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस समापन कड़ी में आपने राग भैरवी की पारम्परिक ठुमरी को पाँच वरिष्ठ गायिकाओं की आवाज़ में रसास्वादन किया। इन ठुमरियों के माध्यम से आपने ठुमरी गीतों की लगभग एक शताब्दी की यात्रा को महसूस किया। आपके अनुरोध पर पुनर्प्रसारित इस श्रृंखला को अब हम यहीं विराम देते हैं। अगले अंक से हम एक नई श्रृंखला आरम्भ करेंगे। नई श्रृंखला में भी हम आपसे फिल्मी ठुमरियों पर चर्चा करेंगे और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा करेंगे और सम्बन्धित रागों तथा इस संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, November 11, 2017

चित्रकथा - 44: फ़िल्म-संगीत में मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लें

अंक - 44

फ़िल्म-संगीत में मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लें


"आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक..." 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आ रहे हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के पहले अंक में आपका हार्दिक स्वागत है। 

मिर्ज़ा ग़ालिब की लोकप्रियता जितनी है शायद और किसी शायर की नहीं। हिन्दी फ़िल्मों और फ़िल्मी गीतों में भी ग़ालिब हर दौर में आते रहे हैं और आगे भी आते रहेंगे। आज ’चित्रकथा' में हम चर्चा करने जा रहे हैं उन हिन्दी फ़िल्मी गीतों की जो या तो मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लें हैं या फिर जिनमें ग़ालिब की ग़ज़लों या शेरों का असर है।



27 दिसंबर 1797 को जन्मे मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग़ ख़ान ’ग़ालिब’ मुग़ल साम्राज्य के आख़िर के बरसों के जानेमाने उर्दू और फ़ारसी के शायर थे। ’असद’ और ’ग़ालिब’ के तख़ल्लुस से उन्होंने लिखा तथा ’दाबिर-उल-मुल्क’ और ’नज्म-उद-दौला’ जैसी उपाधि उन्हें बतौर इज़्ज़त दी गई। मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लें इतनी मशहूर हुईं कि उस ज़माने से लेकर आज तक न जाने कितने गुलाकारों ने इन्हें गाया है और न जाने कब तक गाते रहेंगे। आज ग़ालिब केवल भारत और पाक़िस्तान में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में ज़िन्दा हैं। ग़ालिब शायद एक अकेले ऐसे मुग़ल कालीन अदबी शायर हैं जिनकी ग़ज़लों ने हिन्दी फ़िल्मों में भी अपना असर छोड़ा है। ऐसी ही ग़ज़लों पर एक नज़र अब हम डालने जा रहे हैं। 1931 में 'इम्पीरियल मूवीटोन' ने पहली बोलती फ़िल्म ‘आलम आरा’ का निर्माण कर इतिहास रच दिया था। इसी कम्पनी की 1931 की एक और फ़िल्म थी 'अनंग सेना' जिसमें मास्टर विट्ठल, ज़ोहरा, ज़िल्लो, एलिज़र, हाडी, जगदीश और बमन ईरानी ने काम किया। फ़िल्म में अनंग सेना की भूमिका में ज़ोहरा और सुनन्दन की भूमिका में हाडी ने अभिनय व गायन किया। फ़िल्म में दो ग़ालिब की ग़ज़लें शामिल थीं – “दिले नादां तुझे हुआ क्या है, आख़िर इस दर्द की दवा क्या है” और “दिल ही तो है न संगो-ख़िश्त, दर्द से भर न आए क्यूं”। इस तरह से ग़ालिब की ग़ज़लें बोलती फ़िल्मों के पहले साल ही फ़िल्मों में प्रवेश कर गईं थीं। हाडी अभिनेता और गायक होने के साथ साथ एक संगीतकार भी थे और ग़ालिब की इन ग़ज़लों को उन्होंने ही कम्पोज़ किया था। 1943 की 'बसन्त पिक्चर्स' की फ़िल्म ‘हण्टरवाली की बेटी’ में छन्नालाल नाइक का संगीत था, इस फ़िल्म में ख़ान मस्ताना ने ग़ालिब की मशहूर ग़ज़ल “दिले नादां तुझे हुआ क्या है” को गाया जिसे ख़ूब मक़बूलियत मिली थी। हाल ही में 2015 की फ़िल्म ’हवाईज़ादा’ में आयुष्मान खुराना ने इसी ग़ज़ल को एक बड़े ही आधुनिक अंदाज़ में गाया जिसे कम्पोज़ भी उन्होंने ही किया। इसी का एक रिप्राइज़ वर्ज़न भी है जिसे आयुष्मान और श्वेता सुब्रम ने गाया है और इसमें मूल ग़ज़ल पर अतिरिक्त बोल लिखे हैं विभु पुरी ने। दोनों संस्करण सॉफ़्ट रॉक शैली में निबद्ध है। इस तरह से ग़ालिब की ग़ज़ल का रॉक के साथ फ़्युज़न एक बड़ा ही अनोखा और नया प्रयोग रहा।

जद्दनबाई ने 1935 में ‘संगीत फ़िल्म्स’ की स्थापना कर अपनी बेटी नरगिस (बेबी रानी) को 'तलाश-ए-हक़’ में लॉन्च किया था। 1936 में इस बैनर तले दो फ़िल्में आईं - ‘हृदय मंथन’ और ‘मैडम फ़ैशन’। जद्दनबाई निर्मित, निर्देशित, अभिनीत और स्वरबद्ध ‘हृदय मंथन’ में उन्हीं के गाये तमाम गीतों में मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल “दिल ही तो है न संगो ख़िश्त, दर्द से भर न आये क्यों” को भी शामिल किया गया था। इसी ग़ज़ल को 1940 में फिर एक बार फ़िल्म-संगीत में जगह मिली जब कलकत्ता के ‘फ़िल्म कॉर्पोरेशन ऑफ़ इण्डिया’ की फ़िल्म ‘क़ैदी’ में संगीतकार भीष्मदेव चटर्जी ने इसे फिर एक बार कम्पोज़ किया। बल्कि इस फ़िल्म में ग़ालिब की दो ग़ज़लों शामिल हुईं; दूसरी ग़ज़ल थी “रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो, हमसुखन कोई न हो और हमज़बां कोई न हो”। संगीतकार रामचन्द्र पाल के भतीजे सूर्यकान्त पाल ने भी अपने चाचा की तरह फ़िल्म-संगीत के क्षेत्र में क़दम रखते हुए एस. के. पाल नाम से संगीतकार बने और पहली बार 1942 में ‘शालीमार पिक्चर्स’ की फ़िल्म ‘एक रात’ में संगीत दिया। इस फ़िल्म की अभिनेत्री नीना गाने में कमज़ोर थीं, और उनका पार्श्वगायन ताराबाई उर्फ़ सितारा (कानपुर) ने किया। पर रेकॉर्ड पर नीना का ही नाम छपा था। ‘हमराज़’ के ‘गीत कोश’ में भी नीना का ही नाम दिया गया है। कुछ गीत राजकुमारी ने भी गाए। ग़ालिब की ग़ज़ल “दिल ही तो है न संगो ख़िश्त, दर्द से भर न आए क्यूं” को इस फ़िल्म के लिए नीना (सितारा) ने गाया था। 

ग़ालिब की मशूर ग़ज़ल “नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाए न बने, क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने” कई बार फ़िल्मों में सुनाई दी है। संगीतकार बी. आर. देवधर ने पहली बार 1933 की फ़िल्म 'ज़हर-ए-इश्क़' के लिए इसे कम्पोज़ किया था। मज़ेदार बात यह है कि इसी साल, यानी 1933 में फ़िल्म ‘यहूदी की लड़की’ में 'न्यु थिएटर्स' में संगीतकार पंकज मल्लिक ने इसी ग़ज़ल को कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ में रेकॉर्ड किया। राग भीमपलासी में स्वरबद्ध यह ग़ज़ल सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। इम्पीरियल के अनुबंधित संगीतकारों में एक नाम अन्नासाहब माइनकर का भी था जिन्होंने 1935 के वर्ष में ‘अनारकली’ और ‘चलता पुतला’ जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया था। ‘अनारकली’ में ग़ालिब की इसी ग़ज़ल “नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल” को एक अन्य अंदाज़ में प्रस्तुत किया था। 1934 की फ़िल्म ‘ख़ाक का पुतला’ में मास्टर मोहम्मद ने ग़ालिब की एक मशहूर ग़ज़ल “कोई उम्मीदबर नहीं आती, कोई सूरत नज़र नहीं आती, मौत का एक दिन मुइयाँ है, नींद क्यों रात भर नहीं आती” को कम्पोज़ किया था जिसे अच्छी सराहना मिली थी। 1935 में महबूब ख़ान निर्देशित फ़िल्म ‘जजमेण्ट ऑफ़ अल्लाह’ में संगीतकार प्राणसुख नायक का संगीत था। अन्य गीतों के साथ ग़ालिब की इसी मशहूर ग़ज़ल “कोई उम्मीदबर नहीं आती” को उन्होंने भी स्वरबद्ध किया था। 1949 की फ़िल्म 'अपना देश' में भी यही ग़ज़ल सुनने को मिली जिसके संगीतकार थे पुरुषोत्तम और गायिका थीं पुष्पा हंस। 1942 की ‘फ़ज़ली ब्रदर्स’ की फ़िल्म ‘चौरंगी’ (अंग्रेज़ी में Chauringhee) में काजी नज़रूल इस्लाम और हनुमान प्रसाद शर्मा संगीतकार थे। हनुमान प्रसाद की यह पहली फ़िल्म थी। इस फ़िल्म के लिए प्रसाद ने इस ग़ज़ल को कम्पोज़ किया था। दशकों बाद 2013 की फ़िल्म ’राजधानी एक्स्प्रेस’ में इसी ग़ज़ल को एक आधुनिक अंदाज़ में पेश किया गया शाहिद माल्या की आवाज़ में। संगीतकार थे लालू माधव। ग़ज़ल के शुरु में ग़ालिब का एक दूसरा शेर कहा है - "काबाँ किस मुंह से जाओगे ग़ालिब, शर्म तुमको मगर नहीं आती"। शाहिद की ताज़ी आवाज़ में "कोई उम्मीद बर नहीं आती" को आज के नौजवानों ने भी ख़ूब पसन्द किया और यह साबित हुआ कि आज की पीढ़ी में भी ग़ालिब ज़िन्दा है।

1941 में ‘फ़ज़ली ब्रदर्स कलकत्ता’ ने मुन्शी मुबारक हुसैन को संगीतकार लेकर फ़िल्म बनाई ‘मासूम’। अन्य गीतों के अलावा ग़ालिब की मशहूर ग़ज़ल “आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक, कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक” को इस फ़िल्म के लिए कम्पोज़ किया गया था। 1954 में मिर्ज़ा ग़ालिब पर इसी शीर्षक से फ़िल्म बनी, जिसमें भारत भूषण ने ग़ालिब का रोल अदा किया। साथ में थीं सुरैया। फ़िल्म में संगीत था मास्टर ग़ुलाम मुहम्मद का, और कहने की ज़रूरत नहीं, सभी ग़ज़लें ग़ालिब की लिखी हुई थीं। फ़िल्म में ग़ालिब की इन ग़ज़लों को शामिल किया गया था -

1. आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक (सुरैया)
2. दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है (तलत-सुरैया)
3. है बस कि हर एक उनके इशारे में निशां और करते हैं मुहब्बत (रफ़ी)
4. इश्क़ मुझको न सही वहशत ही सही (तलत)
5. नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल (सुरैया)
6. फिर मुझे दीद-ए-तर याद आया (तलत)
7. रहिए अब ऐसी जगह चलकर (सुरैया)
8. ये न थी हमारी क़िस्मत (सुरैया)

"ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता", इस ग़ज़ल को उषा मंगेशकर ने शंकर जयकिशन की धुन पर फ़िल्म 'मैं नशे में हूँ' में गाया था। उधर गुलज़ार ने ग़ालिब का एक शेर लिया "दिल ढूंढ़ता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन, बैठे रहें तसव्वुरे जाना किए हुए", और इसी को आधार बना कर फ़िल्म 'मौसम' का वह ख़ूबसूरत गीत लिख डाला। नए दौर में ग़ालिब की जिस ग़ज़ल को फ़िल्म में जगह मिली, वह थी "हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले, निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले"। फ़िल्म का नाम भी था 'हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी' जो आई थी साल 2003 में। संगीतकार शान्तनु मोइत्रा ने शुभा मुदगल से इस ग़ज़ल को गवाया था इस फ़िल्म के लिए। ग़ालिब की एक बेहद मशहूर शेर है "इश्क़ पर ज़ोर नहीं, है यह वह आतिश ग़ालिब, कि लगाये ना लगे और बुझाये ना बने"। इस शेर का सहारा समय-समय पर फ़िल्मी गीतकारों ने लिया है अपने गीतों को सजाने-सँवारने के लिए। मसलन, 1981 की फ़िल्म ’एक दूजे के लिए’ के मज़ेदार गीत "हम बने तुम बने एक दूजे के लिए" में एक पंक्ति है "इश्क़ पर ज़ोर नहीं ग़ालिब ने कहा है इसीलिए, उसको क़सम लगे जो बिछड़ के एक पल भी जिये..."। इसके गीतकार थे आनन्द बक्शी। वैसे बक्शी साहब ने इस गीत से 10 साल पहले, 1970 में, फ़िल्म ’इश्क़ पर ज़ोर नहीं’ के शीर्षक गीत में भी इस जुमले का इस्तमाल किया और ख़ूबसूरत गीत बना "सच कहती है दुनिया इसक पे जोर नहीं, यह पक्का धागा है यह कच्ची डोर नहीं, कह दे कोई और है तू मेरा चितचोर नहीं, जो थम जाए वो ये घटा घनघोर नहीं, इस रोग की दुनिया में दवा कुछ और नहीं..."। 1995 की फ़िल्म ’तीन मोती’ में नवाब आरज़ू के कलम से निकले "इश्क़ पे कोई ज़ोर चले ना ना कोई मनमानी, फँस गई मैं तो प्रेम भँवर में अब क्या होगा जानी"। 

ग़ालिब की एक मशहूर ग़ज़ल है "असूम मोहब्बत का बस इतना फ़साना है, काग़ज़ की हवेली है बारिश का ज़माना है"। इस ग़ज़ल की अन्तिम शेर है "ये इश्क़ नहीं आसाँ बस इतना समझ लीजिए, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है"। इस आख़िरी शेर पर 1983 में एक फ़िल्म बनी थी ’ये इश्क़ नहीं आसान’ जिसमें ॠषी कपूर और पद्मिनी कोल्हापुरे थे। आनन्द बक्शी ने फ़िल्म का शीर्षक गीत लिखा जो एक क़व्वाली की शक्ल में थी - "ये इश्क़ नहीं आसाँ, ये काम है बस दीवानों का"। इसे महेन्द्र कपूर, सुरेश वाडकर, शब्बीर कुमार और साथियों ने गाया है और संगीतकार हैं लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल। उधर 1993 की फ़िल्म ’साहिबाँ’ में बक्शी साहब ने ग़ालिब के उसी शेर की दूसरी लाइन के जुमले को लेकर गीत लिखा "तू क्या प्यार करेगा प्यार मैंने किया, आग के इस दरिया को पार मैंने किया"। 2013 की फ़िल्म ’इस्सक’ में इसी शेर को आधार बना कर गीतकार नीलेश मिश्र ने गीत लिखा था "ये आग का दरिया है, डूब के जाना है"। सचिन-जिगर के संगीत में हार्ड रॉक शैली में कम्पोज़ किया हुआ यह गीत अंकित तिवारी ने गाया था। इसी का एक ’अनप्लग्ड वर्ज़न’ भी है जिसे सचिन-जिगर के सचिन गुप्ता के गाया है। इस तरह से ग़ालिब की ग़ज़लें हर दौर में फ़िल्मों में आती रही हैं। कुछ तो है इन ग़ज़लों में कि इतने पुराने होते हुए भी आज की पीढ़ी को पसन्द आ रही हैं। दरसल ये कालजयी रचनाएँ हैं जिन पर उम्र का कोई असर नहीं। ग़ालिब ने जैसे लिखा था कि "आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक", ठीक वैसे ही इन ग़ज़लों का असर सदियों तक यूंही बनी रहेगी। 


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Monday, November 6, 2017

फिल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड 13 || जयकिशन

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 13
Jaikishan


फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के तेरहवें एपिसोड में सुनिए कहानी सुरों के बाज़ीगर जयकिशन की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....



फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -

Sunday, November 5, 2017

ठुमरी सिन्धु भैरवी और किरवानी : SWARGOSHTHI – 342 : THUMARI SINDHU BHAIRAVI & KIRVANI




स्वरगोष्ठी – 342 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 9 : ठुमरी सिन्धु भैरवी और किरवानी

विरहिणी नायिका की व्यथा – “का करूँ सजनी आए न बालम...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की नौवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला की भाँति इस श्रृंखला में भी हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हमारे सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन ने प्रस्तुत किया है। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। दरअसल यह श्रृंखला पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित की गई थी। हमारे पाठकों / श्रोताओं को यह श्रृंखला सम्भवतः कुछ अधिक रुचिकर प्रतीत हुई थी। अनेक संगीत-प्रेमियों ने इसके पुनर्प्रसारण का आग्रह किया है। सभी सम्मानित पाठकों / श्रोताओं के अनुरोध का सम्मान करते हुए और पूर्वप्रकाशित श्रृंखला में थोड़ा परिमार्जन करते हुए यह श्रृंखला हम पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारी नई लघु श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल की गई उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे ऐसी ही कुछ चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज के अंक हम आपको राग सिन्धु भैरवी की एक पारम्परिक ठुमरी पहले सुविख्यात गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वर में, और फिर इसी ठुमरी का फिल्मी संस्करण सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक येशुदास की आवाज़ में सुनवाएँगे। यह ठुमरी वर्ष 1977 में प्रदर्शित फिल्म ‘स्वामी’ में शामिल की गई थी। इस फिल्मी रूप में आपको राग किरवानी की झलक मिलेगी।




ठुमरी सिंधु भैरवी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ
ठुमरी किरवानी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : के.जे. येशुदास : फिल्म – स्वामी




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 342वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक पारम्परिक ठुमरी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही प्रश्न का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष के अन्तिम अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – इस ठुमरी रचना का अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – इस ठुमरी गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस ठुमरी में किस प्रख्यात गायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 11 नवम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 344वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 340वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको वर्ष 1964 में प्रदर्शित फिल्म – “मैं सुहागन हूँ” से ली गई ठुमरी का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग देश, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – मोहम्मद रफी और आशा भोसले

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में तीनों प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। इसके साथ ही इस बार हमारे एक नए प्रतिभागी, संजीव स्वरानन्द ने भी तीनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये हैं। हम उनका हार्दिक स्वागत करते हैं। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस नौवीं कड़ी में आपने राग सिन्धु भैरवी की पारम्परिक ठुमरी उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ की आवाज़ में और इसी ठुमरी का फिल्मी संस्करण येशुदास की आवाज़ में रसास्वादन किया। ठुमरी के फिल्मी रूप में कई रागों की झलक मिलती है, किन्तु राग किरवानी के स्वर प्रमुख रूप से उभरते हैं। आपके अनुरोध पर पुनर्प्रसारित इस श्रृंखला के अगले अंक में भी हम आपसे एक और पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी रूप पर चर्चा करेंगे और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा करेंगे और सम्बन्धित रागों तथा इस संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
ठुमरी सिन्धु भैरवी और किरवानी : SWARGOSHTHI – 342 : THUMARI SINDHU BHAIRAVI & KIRVANI : 5 नवम्बर, 2017

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