रविवार, 5 मार्च 2017

मध्यरात्रि बाद के राग : SWARGOSHTHI – 307 : RAGAS AFTER MIDNIGHT





स्वरगोष्ठी – 307 में आज

राग और गाने-बजाने का समय – 7 : रात के तीसरे प्रहर के राग

राग मालकौंस - “नन्द के छैला ढीठ लंगरवा...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला – “राग और गाने-बजाने का समय” की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीतानुरागियों का स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि उत्तर भारतीय संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं अथवा प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों के प्रयोग का एक निर्धारित समय होता है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में आज हम आपसे सातवें प्रहर अर्थात रात्रि के तीसरे प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के प्रमुख राग मालकौंस की मध्यलय की एक खयाल रचना सुविख्यात गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही 1955 में प्रदर्शित फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ से इसी प्रहर के राग अड़ाना पर आधारित एक गीत उस्ताद अमीर खाँ के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।



भारतीय संगीत के रागों का समय निर्धारण करने के लिए शास्त्रकारों ने कुछ नियम बनाए हैं। श्रृंखला की पिछली कड़ियों में हमने कुछ नियमों का उल्लेख किया था। आज हम आपसे ऋषभ और गान्धार स्वरों के आधार पर रागों के समय निर्धारण की प्रक्रिया पर बात करेंगे और सातवें प्रहर अर्थात रात के तीसरे प्रहर के कुछ रागों की रचनाएँ भी सुनवाएँगे। ऋषभ और गान्धार स्वरों वाले रागों के तीन वर्ग होते हैं। प्रथम वर्ग के रागों में कोमल ऋषभ और शुद्ध गान्धार स्वर उपस्थित होते हैं। इस वर्ग के रागों का गायन-वादन दिन और रात के अन्तिम प्रहर में किया जाता है। इस वर्ग के राग भैरव, पूर्वी और मारवा थाट के अन्तर्गत आते हैं। दूसरे वर्ग के रागों में शुद्ध ऋषभ और शुद्ध गान्धार स्वर होते हैं। इस वर्ग के रागों के गायन-वादन प्रथम प्रहर में किया जाता है। बिलावल, खमाज और कल्याण थाट के राग इसी श्रेणी में आते हैं। तीसरा वर्ग कोमल गान्धार स्वर का होता है। इस वर्ग के राग दूसरे, तीसरे और चौथे प्रहर में गाये-बजाए जाते हैं। तीसरे वर्ग में काफी, आसावरी, भैरवी तोड़ी थाट के सभी राग आते हैं। इस कड़ी में हम रात्रि के तीसरे प्रहर के रागों पर चर्चा कर रहे हैं। तीसरे प्रहर के दो प्रमुख राग, मालकौंस और अड़ाना में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल होते हैं। भैरवी थाट का एक प्रमुख राग मालकौस है। राग मालकौंस औडव-औडव जाति का राग है, अर्थात आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग किया जाता है। राग मालकौंस में ऋषभ और पंचम स्वरों का प्रयोग नहीं होता। गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। राग के आरोह में नि(कोमल) सा (कोमल) म (कोमल) नि(कोमल) सां और अवरोह में सां नि(कोमल) (कोमल) म (कोमल) म (कोमल) सा स्वर लगते हैं। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस राग का चलन तीनों सप्तकों में समान रूप किया जाता है। गम्भीर और शान्त प्रकृति का राग होने के कारण यह मींड़ प्रधान होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में इस राग का सौन्दर्य खूब निखर उठता है।

विदुषी अश्विनी  भिड़े  देशपांडे 
अब हम आपको राग मालकौंस के मध्यलय में खयाल की एक मोहक रचना का रसास्वादन कराते हैं। इसे प्रस्तुत कर रही है, सुप्रसिद्ध गायिका डॉ. अश्विनी भिड़े देशपाण्डे। डॉ. अश्विनी भिड़े जयपुर अतरौली खयाल गायकी परम्परा की एक सर्वप्रिय गायिका हैं। मुख्यतः खयाल गायिका के रूप में विख्यात अश्विनी जी ठुमरी, दादरा, भजन और अभंग गायन में भी समान रूप से दक्ष हैं। उनकी प्रारम्भिक संगीत शिक्षा गन्धर्व महाविद्यालय से और पारम्परिक संगीत की शिक्षा पण्डित नारायण राव दातार से पलुस्कर परम्परा में हुई। बाद में उन्हें अपनी माँ श्रीमती माणिक भिड़े और गुरु पण्डित रत्नाकर पै से जयपुर अतरौली परम्परा में मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। अश्विनी जी ने भारतीय संगीत के व्यावहारिक पक्ष के साथ-साथ सैद्धान्तिक पक्ष को भी आत्मसात किया है। एक कुशल गायिका होने के साथ ही उन्होने ‘रागरचनांजलि’ नामक पुस्तक की रचना भी की है। इस पुस्तक के पहले भाग का प्रकाशन वर्ष 2004 में और दूसरे भाग का प्रकाशन वर्ष 2010 में किया गया था। वर्तमान में अश्विनी जी संगीत के मंचों पर जितनी लोकप्रिय हैं उतनी ही निष्ठा से नई पीढ़ी को पारम्परिक संगीत की दीक्षा भी दे रही हैं। आज की कड़ी में हम उनकी आवाज़ में राग मालकौंस का एक मध्यलय खयाल प्रस्तुत कर रहे हैं। यह तीनताल की मोहक रचना है।

राग मालकौंस : “नन्द के छैला ढीठ लंगरवा...” : डॉ. अश्विनी भिड़े देशपाण्डे


रात्रि के तीसरे प्रहर के कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- आनन्द भैरवी, शहाना, धवलश्री, मधुकंस, मंजरी, यशरंजनी, नागनंदिनी, नवरसकान्हड़ा, नायकी, बागेश्रीकान्हड़ा, मियाँकान्हड़ा, नन्दकौंस, अड़ाना आदि। अब हम आपको राग अड़ाना में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाएँगे। राग अड़ाना, आसावरी थाट का राग है। यह षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग होता है, जिसमें कोमल गान्धार और कोमल धैवत तथा दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध गान्धार और अवरोह में शुद्ध धैवत का प्रयोग वर्जित होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में गाने-बजाने वाले राग अड़ाना का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है।

उस्ताद अमीर  खाँ 
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्मों की गणना ‘मील के पत्थर’ के रूप में की जाती है। ऐसी ही एक उल्लेखनीय फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ थी जिसका प्रदर्शन 1955 में हुआ था। इस फिल्म में कथक नृत्य शैली का और राग आधारित गीत-संगीत का कलात्मक उपयोग किया गया था। फिल्म का निर्देशन वी. शान्ताराम ने और संगीत निर्देशन वसन्त देसाई ने किया था। वी. शान्ताराम के फिल्मों की सदैव यह विशेषता रही है कि उसके विषय नैतिक मूल्यों रक्षा करते प्रतीत होते है। साथ ही उनकी फिल्मों में रूढ़ियों का विरोध भी नज़र आता है। फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ में उन्होने भारतीय शास्त्रीय नृत्य और संगीत की महत्ता को रेखांकित किया था। फिल्म को इस लक्ष्य तक ले जाने में संगीतकार वसन्त देसाई का उल्लेखनीय योगदान रहा। जाने-माने कथक नर्तक गोपीकृष्ण फिल्म की प्रमुख भूमिका में थे। इसके अलावा संगीत के ताल पक्ष को निखारने के लिए सुप्रसिद्ध तबलावादक गुदई महाराज (पण्डित सामता प्रसाद) का उल्लेखनीय योगदान था। वसन्त देसाई ने सारंगीनवाज़ पण्डित रामनारायन और सन्तूरवादक पण्डित शिवकुमार शर्मा का सहयोग भी प्राप्त किया था। संगीतकार वसन्त देसाई की सफलता का दौर फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ से ही आरम्भ हुआ था। वसन्त देसाई की प्रतिभा का सही मूल्यांकन वी. शान्ताराम ने ही किया था। प्रभात कम्पनी में एक साधारण कर्मचारी के रूप में उनकी नियुक्ति हुई थी। यहीं रह कर उन्होने अपनी कलात्मक प्रतिभा का विकास किया था। आगे चलकर वसन्त देसाई, शान्ताराम की फिल्मों के मुख्य संगीतकार बने। शान्ताराम जी ने 1955 में फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ का निर्माण किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई ने इस फिल्म में कई राग आधारित स्तरीय गीतों की रचना की थी। फिल्म का शीर्षक गीत ‘झनक झनक पायल बाजे...’ राग अड़ाना का एक मोहक उदाहरण है। इस गीत को स्वर प्रदान किया, सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ ने। आइए, सुनते हैं, राग अड़ाना पर आधारित यह गीत। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग अड़ाना : ‘झनक झनक पायल बाजे...’ : फिल्म झनक झनक पायल बाजे : उस्ताद अमीर खाँ और साथी


संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 307वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको छठे दशक की फिल्म के राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 310वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के प्रथम सत्र की पहेली-श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गीतांश में गायक और गायिका के स्वरों को पहचानिए और हमे उनके नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 11 मार्च, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 309वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 305 की संगीत पहेली में हमने 1955 में प्रदर्शित फिल्म ‘सीमा’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जयजयवन्ती, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल एकताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका लता मंगेशकर। इस बार की पहेली में हमारे एक नये पाठक आशीष पँवार शामिल हुए हैं। आशीष जी का हार्दिक स्वागत है। उन्होने तीन में से दो प्रश्नों के सही उत्तर दिये है। इनके अलावा हमारी नियमित प्रतिभागी पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने भी सही उत्तर दिये हैं। सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला “राग और गाने-बजाने का समय” का यह सातवाँ अंक था। अगले अंक में हम रात के अन्तिम प्रहर के रागों पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शनिवार, 4 मार्च 2017

चित्रकथा - 8: 2017 के प्रथम दो महीनों की फ़िल्मों का संगीत


अंक - 8

2017 के प्रथम दो महीनों की फ़िल्मों का संगीत

साजन आयो रे, सावन लायो रे...



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आ रहे हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के पहले अंक में आपका हार्दिक स्वागत है। 

देखते ही देखते वर्ष 2017 के दो महीने बीत चुके हैं। फ़िल्म-संगीत की धारा, जो 1931 में शुरु हुई थी, निरन्तर बहती चली जा रही है, और इस वर्ष भी यह सुरीली धारा रसिकों के दिलों से गुज़रती हुई, उथल-पुथल करती हुई बहे जा रही है। आइए आज ’चित्रकथा’ में आज चर्चा करें इन दो महीनों, यानी जनवरी और फ़रवरी 2017, में प्रदर्शित हुई फ़िल्मों के गीत-संगीत की। आज ’चित्रकथा’ में प्रस्तुत है यह संगीत समीक्षा। 




22 अक्टुबर 2015 के दिन गायक लाभ जंजुआ की असमय मृत्यु ने फ़िल्म-संगीत जगत को एक बड़ा
लाभ जंजुआ
झटका दिया। "सोनी दे नख़रे सोनी लगदे", "लंदन ठुमकदा", "जी करदा भई जी करदा" जैसे सुअपर हिट गीतों को गा कर लाभ जंजुआ तेज़ी से सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते जा रहे थे। पर यह सिलसिला देर तक चल नहीं सका। पर वर्ष 2017 की शुरुआत लाभ जंजुआ के गाए गीत "इश्क़ दा करेण्ट" से ही हुई। फ़िल्म का नाम ’प्रकाश इलेक्ट्रॉनिक्स’ जो प्रदर्शित हुई 6 जनवरी के दिन।  गीतकार-संगीतकार प्रवीण भारद्वाज ने उनसे यह गीत पहले ही रेकॉर्ड करवा लिया था। इस फ़िल्म में कुल चार गीत हैं, चार अलग रंगों के। लाभ जंजुआ के गाए इस थिरकाने वाले डान्स नंबर के बाद दूसरा गीत है गायक के.के की आवाज़ में "इश्क़ जो भी करे वो पागल"। हमेशा अपना लो-प्रोफ़ाइल इमेज रखने वाले के.के अपने गीतों से बोलते हैं। के.के. की आवाज़ में एक ताज़गी है, एक युवा-अपील है, एक आकर्षण है जो दिल को छू जाती है। वैसे तो इस तरह के गीत उन्होंने पहले भी बहुत गाए हैं, पर एक अन्तराल के बाद उनकी आवाज़ में इस गीत को सुनना एक सुखद अनुभव ही रहा। एक और गायक जो एक लम्बे अरसे के बाद सुनाई दिए, वो हैं कमाल ख़ान, जी हाँ, "अ ओ जानेजाना" वाले कमाल ख़ान। उनकी आवाज़ में "इश्क़ तेरी लीला न्यारी" में 90 के दशक की सुगन्ध है। जुदाई के दर्द से भीगा इस तरह का गीत आजकल फ़िल्मों में सुनाई नहीं देती। इसके लिए प्रवीण भारद्वाज का शुक्रिया। और फ़िल्म का अन्तिम गीत है "हबीबी" सुनिधि चौहान की आवाज़ में जिसके कम्पोज़िशन में अरबी रंग है और ऑरकेस्ट्रेशन में रॉक शैली भी है और बीच-बीच में अंग्रेज़ी रैप भी है। सुनिधि के इस तरह के गीत अनगिनत सुनने को मिले हैं, किसी और गायिका से गवाया जाना चाहिए था इसे।


13 जनवरी को प्रदर्शित हुई ’ओके जानु’। आदित्य रॉय कपूर और श्रद्धा कपूर के अन्तरंग केमिस्ट्री की
ए. आर. रहमान
वजह से चर्चा में बनी रहने वाली इस फ़िल्म में गुलज़ार साहब के लिखे गीत हैं और संगीतकार ए. आर. रहमान। इसलिए निस्संदेह इस फ़िल्म के गीतों से लोगों को बड़ी उम्मीदें थीं। इस फ़िल्म में कुल आठ गीत हैं पर तीन गीतों को छोड़ कर बाकी गीतों की धुनें रहमान ने अपनी तमिल फ़िल्म ’ओ कादल कनमनी’ के गीतों से उठाया। उन्होंने इस फ़िल्म के लिए दो नए गीत बनाए जो "ऐ सिनामिका" और "मलर्गल काएत्तें" के हिन्दी संस्करण हैं। ’ओके जानु’ ऐल्बम का पहला गीत फ़िल्म का शीर्षक गीत है जिसे ए. आर. रहमान और श्रीनिधि वेंकटेश ने गाया है। दूसरा गीत "परंधु सेला वा" के मशहूर हिन्दी संस्करण "हम्मा हम्मा" का कवर वर्ज़न है। मूल शब्द मेहबूब के हैं जिस पर रैपिंग् की है बादशाह ने। इस कवर वर्ज़न में आवाज़ रेमो फ़र्नन्दे की नहीं, बल्कि जुबिन नौटियाल, शाशा तिरुपति, बादशाह, तनिश्क बागची और ए. आर. रहमान की है। यह वर्ज़न ठीक ठाक बना है, पर रेमो वाले मूल गीत की बात ही अलग है। अरिजीत सिंह की आवाज़ में "इन्ना सोणा क्यों रब ने बनाया" गुलज़ार साहब की रचना है। वैसे तो इसे नुसरत फ़तेह अली ख़ाँ साहब की मूल रचना कही सकती है, समय-समय पर कई गीतकारों और संगीतकारों ने अपने हिसाब से इसे अपने गीतों में ढाल लिया है। अरिजीत सिंह की आवाज़ में यह संस्करण बहुत ज़्यादा दिल को नहीं छूती। अगला गीत है "जी लें ज़रा" जो शायद इस ऐल्बम का सबसे अलग हटके गीत है। नीति मोहन, अर्जुन चंडी, सावित्री आर. पृथ्वी और ए. आर. रहमान की आवाज़ों में इस गीत में पुरुष आवाज़ों को धीमा रखा गया है, इसकी वजह है पुरुष आवाज़ों का स्वरमान मुलायम होने की वजह से इससे एक प्रतिध्वनित अंग दिया जा सका है। यह गीत हमें ’रॉकस्टार’ के "फिर से उड़ चला" और ’तमाशा’ के "सफ़रनामा" गीतों की याद दिला जाता है। अगला गीत "कारा फ़नकारा कब आए रे" गुलज़ार साहब का लिखा हुआ नहीं है, बल्कि इसे नवनीत विर्क, कैली, हार्ड कौर और एडीके ने लिखा है। रैप शैली का यह गीत कैली, हार्ड कौर, दिनेश कनगारत्नम, शाशा तिरुपति, अशिमा महाजन और पारोमिता दासगुप्ता ने गाया है। पाश्चात्य बीट्स और साज़ों पर आधारित यह गीत लिरिकल हिप-हॉप जौनर का गीत है और इस तरह के गीत साधारणत: हिन्दी फ़िल्मों में सुनाई नहीं देते। जोनिता गांधी और नकश अज़ीज़ की आवाज़ों में "साजन आयो रे, सावन लायो रे" एक अद्‍भुत शास्त्रीय संगीत आधारित वर्षाकालीन रचना है। गुलज़ार साहब को इसमें बहुत कुछ लिखने का मौका तो नहीं मिला, पर दो पंक्तियों का यह गीत इससे जुड़े सभी कलाकारों की प्रतिभा के बारे में बहुत कुछ कह जाता है। इसी तरह से गुलज़ार साहब का ही लिखा और शाशा तिरुपति का गाया "सुन भँवरा" भी एक शास्त्रीय संगीत आधारित रचना है, जो लेखन, संगीत और गायकी की दृष्टि से एक उत्कृष्ट रचना है। इन दो गीतों को सुन कर जैसे एक उम्मीद जाग उठा है कि अच्छे गीत-संगीत का दौर अभी समाप्त नहीं हुआ है। और ऐल्बम का अन्तिम गीत एक पारम्परिक रचना है "मौला वा सलीम" जिसे ए. आर. अमीन और ए. आर. रहमान ने गाया है।


13 जनवरी को एक और फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी - ’हरामखोर’। श्लोक शर्मा निर्देशित और नवाज़ुद्दीन
अनु मलिक
सिद्दिक़ी - श्रेता त्रिपाठी अभिनीत इस फ़िल्म को 15-वें न्यु यॉर्क इन्डियन फ़िल्म फ़ेस्टिवल और इन्डियन फ़िल्म फ़ेस्टिवल ऑफ़ लॉस ऐन्जेलिस में प्रदर्शित किया गया, और नवाज़ुद्दीन को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार भी मिला था। केवल 16 दिनों में तैयार इस फ़िल्म के संगीतकार हैं जसलीन रॉयल, जो एक गायिका हैं। उन्होंने इस फ़िल्म के लिए एक गीत कम्पोज़ किया और गाया, जिसके बोल हैं "किदरे जावाँ"। फ़ेस्टिवल फ़िल्म होने की वजह से आदित्य शर्मा के लिखे इस गीत को व्यावसायिक सफलता नहीं मिलेगी, पर संगीतकार के रूप में उभरने के लिए जसलीन को शुभकामनाएँ। 20 जनवरी को प्रदर्शित हुई ’कॉफ़ी विथ डी’। इस कमचर्चित और कम बजट की फ़िल्म में गीत लिखे समीर ने और संगीत दिया सुपरबिया ने। फ़िल्म का शीर्षक गीत अनु मलिक की आवाज़ में है। "एक गरम चाय की प्याली" से वो अब कॉफ़ी की तरफ़ रुख़ कर चुके हैं जब वो गाते हैं "बोलो क्या करूँ पीछे ख़ौफ़ है आगे मौत है खड़ी, तेरा काम है चक्का जाम है अपनी है फ़टी पड़ी, मैंने सोच ली, तू भी सोच ले, जी में दम है तो पी, कॉफ़ी विथ डी"। मस्ती भरे बोलों, मस्ती भरे संगीत और अनु मलिक के अंदाज़ की वजह से गीत झूमने पर मजबूर ज़रूर करता है। दूसरा गीत शबाब साबरी का गाया हुआ है; गीत नहीं बल्कि यह एक क़व्वाली है "अली अली हाजी अली"। बहुत सुन्दर कम्पोज़िशन और गायकी की तो बात ही कुछ है। तीसरा गीत शान का गाया हुआ है, "नेशन वान्ट्स टू नो", गीत आज के दौर की प्रवृत्तियों पर व्यंग का निशाना साधता है। अरनब गोस्वामी के मशहूर जुमले "दि नेशन वान्ट्स टू नो" का पंच लाइन लेकर देश में चल रहे मुद्दों को उजागर करता है यह गीत। और फ़िल्म का अन्तिम गीत एक सॉफ़्ट रोमान्टिक डुएट है शान और आकांक्षा शर्मा की आवाज़ों में "तुम्हारी मोहब्बत"। गीत कर्णप्रिय है पर इसमें कोई नई बात या एक्स-फ़ैक्टर नहीं है कि गीत एक लम्बे समय तक याद रहे।


गणतंत्र दिवस के सप्ताह दो महत्वपूर्ण फ़िल्में प्रदर्शित हुईं। एक राकेश रोशन की ’काबिल’ और दूसरा
राजेश रोशन
शाहरुख़ ख़ान का ’रईस’। फ़िल्म के रिलीज़ डेट को लेकर विवाद खड़ा हुआ जब शाहरुख़ ख़ान ने जान बूझ कर इसे ’काबिल’ के साथ रिलीज़ करने का फ़ैसला लिया। इस वजह से राकेश रोशन ने अपनी फ़िल्म को 26 की जगह 25 को रिलीज़ करने का निर्णय लिया, पर शाहरुख़ ने भी फिर अपनी फ़िल्म को 25 में रिलीज़ करने की घोषणा कर दी। इस वजह से रोशन और ख़ान में एक द्वन्द छिड़ गया। ख़ैर, दोनों फ़िल्में 25 जनवरी को रिलीज़ हुईं। पहले करते हैं ’काबिल’ के गीतों की चर्चा। जब भी राकेश रोशन, राजेश रोशन और हृतिक रोशन की तिकड़ी साथ में आए हैं, हमें कुछ मधुर कर्णप्रिय गाने सुनने को मिले हैं। ’काबिल’ के गाने भी हमें निराश नहीं करते। इस फ़िल्म में तीन मौलिक गीत हैं और दो पुराने गीतों के कवर। फ़िल्म का शीर्षक गीत "मैं तेरे काबिल हूँ या तेरे काबिल नहीं"। नासिर फ़राज़ के लिखे तथा जुबिन नौटियाल व पलक मुछाल के गाए इस गीत में मेलडी है, सुन्दर बोल हैं, और राजेश रोशन का स्टाम्प भी है। गीत का संयोजन और बीट्स कुछ हद तक "आओ सुनाऊँ प्यार की एक कहानी" गीत जैसा है। हृतिक पर जुबिन नौटियाल की आवाज़ सुन्दर बन पड़ा है। इस गीत का एक सैड वर्ज़न भी है जुबिन की आवाज़ में। जुबिन नौटियाल की एकल आवाज़ में "कुछ दिन से मुझे तेरी आदत हो गई है" मनोज मुन्तशिर का लिखा गीत है। गीत का भाव ’कहो ना प्यार है’ के "क्यों चलती है पवन" गीत से मेल खाता है। हृतिक रोशन की फ़िल्म हो और उनका कोई धमाकेदार डान्स सीक्वेन्स ना हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। ’काबिल’ में भी "मोन आमोर" गीत को रखने का यही मक़सद था। विशाल ददलानी के गाए मनोज मुन्तशिर के लिखे इस थिरकते गीत को सुनते हुए हृतिक की तसवीर आँखों के सामने आ ही जाती है। यह गीत अगर हिट हुआ तो गीत की दृष्टि से नहीं बल्कि हृतिक के नृत्य की वजह से होगा। बाक़ी के दो गीत राजेश रोशन द्वारा स्वरबद्ध 70 के दशक के दो गीतों का रिवाइवल है। पहला है "सारा ज़माना हसीनों का दीवाना", ’याराना’ फ़िल्म का गीत। अनजान के मूल बोलों में गीतकार कुमार ने नए बोल डाले हैं। गौरव-रोशिन ने इस संस्करण का संगीत तैयार किया है। ख़ास बात यह कि किशोर कुमार के गाए मूल गीत के इस संस्करण के लिए किसी पुरुष गायक नहीं बल्कि गायिका पायल देव को चुना गया। हाँ, रैपिंग् ज़रूर रफ़्तार ने किया है। मूल गीत से इस संस्करण की तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि यह संस्करण एक क्लब रीमिक्स संस्करण है और दोनों अपनी अपनी जगह है। दूसरा गीत है ’जुली’ फ़िल्म का किशोर कुमार का गाया "दिल क्या करे जब किसी से किसी को प्यार हो जाए"। आनन्द बक्शी - राजेश रोशन के रचे मूल गीत को एक बार फिर कुमार और गौरव-रोशिन ने रीक्रिएट किया है। गायक जुबिन नौटियाल ने अच्छा निभाया है यह नया संस्करण है। 70 के दशक के गीत का 2010 के दशक में जो लिबास होना चाहिए, वैसा ही किया है पूरी टीम ने।


शाहरुख़ ख़ान की महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’रईस’ के गीत-संगीत की अब बात की जाए। ऐल्बम शुरु होता है
जावेद अख़्तर
सनी लियोन के आइटम नंबर से। इन्दीवर के लिखे और कल्याणजी-आनन्दजी के संगीतबद्ध किए फ़िल्म ’कुर्बानी’ के मशहूर गीत "लैला मैं लैला" गीत को रीक्रिएट किया गया है। पावनी पाण्डे की आवाज़ में संगीतकार राम सम्पथ और गीतकार जावेद अख़्तर ने इस गीत को नया जामा पहनाया है। जनता-जनार्दन को यह संस्करण पसन्द आई है। दूसरा गीत है "ओ ज़ालिमा" जिसे अरिजीत सिंह और हर्षदीप कौर ने गाया है। "गेरुआ" के बाद अरिजीत फिर एक बार शाहरुख़ की आवाज़ बने हैं। JAM8 के संगीत में बोल लिखे हैं अमिताभ भट्टाचार्य ने। इस गीत की ख़ास बात यह कि इसमें हारमोनियम का प्रयोग हुआ है और साथ ही अरिजीत सिंह ने ख़ुद इसमें अकोस्टिक गीटार बजाया है। तीसरे गीत "उड़ी उड़ी जाए दिल की पतंग" में आवाज़ें हैं सुखविन्दर सिंह, भूमि त्रिवेदी और करसन सर्गठिया की। जावेद अख़्तर के लिखे और राम सम्पथ के स्वरबद्ध किए इस गीत में गुजरात की लोक शैली है, और फ़िल्म ’हम दिल दे चुके सनम’ के "ढील दे ढील दे रे भैया" की याद दिला जाता है। करसन सर्गठिया के इन्टरल्युड में गुजराती बोल गीत को और भी ज़्यादा आकर्षक बनाते हैं। कुल मिलाकर एक सुन्दर लोक आधारित गीत। इस गीत में तापस रॉय का मैन्डोलिन सुनाई दिया। मिका सिंह की आवाज़ में मयूर पुरी का लिखा और अहीर का संगीतबद्ध गीत "धिंगाना धिंगाना" मस्ती भरा गीत है मिका के पहले के गीतों की ही तरह। फ़िल्म के बाहर इस गीत की क्या वजूद रह जाएगी कह नहीं सकते। राम सम्पथ और तरन्नुम मलिक की आवाज़ों में ’रईस’ का शीर्षक गीत "एनु नाम छे रईस" भी फ़िल्म की कहानी के अनुसार है जो फ़िल्म के बाहर शायद बहुत ज़्यादा ना सुना जाए । राम सम्पथ और हिरल ब्रह्मभट्ट ने गीत लिखा है। इस गीत के संगीत संयोजन में उइलियन पाइप का प्रयोग किया गया है जिसे बजाया है उलिक नेवेल ने। के.के. की आवाज़ में "साँसों के किसी एक मोड़ पर मिली थी तू ज़िन्दगी मेरी दोस्त बनके" एक संजीदा गीत है जिसे मनोज मुन्तशिर ने ख़ूबसूरत बोलों से सजाया है और अहीर ने भी सुन्दर कम्पोज़ किया है। के.के की इन्टेन्स गायकी ने गीत को अपने अंजाम तक पहुँचाया है। और फ़िल्म का अन्तिम गीत एक गुजराती पारम्परिक रचना है "घम्मर घम्मर" जिसे राम सम्पथ के संगीत संयोजन में रोशन राठौड़ ने गाया है। लोक शैली के फ़िल्मी गीतों में यह गीत एक लम्बे समय तक याद रहेगा।


जनवरी के बाद अब हम आ पहुँचे हैं फ़रवरी में। 10 फ़रवरी को ’जॉली एल एल बी 2’ प्रदर्शित हुई। 2013
सुखविन्दर सिंह
में आई ’जॉली एल एल बी’ कामयाब फ़िल्म थी जिसे बहुत से पुरस्कार मिले। अब इसके सीक्वील में अक्षय कुमार के आ जाने से इससे उम्मीदें और भी ज़्यादा बढ़ गईं। इस फ़िल्म में कुल चार गीत हैं और चारों गीत अलग अलग श्रेणी के हैं। पहला गीत "गो पागल" एक होली गीत है। फ़िल्म-संगीत के अन्य गीतों की तरह होली गीतों का अंदाज़ भी अब बदल चुका है। रफ़्तार, निन्दी कौर, गिरिश नाकोड और मंझ म्युज़िक के गाए इस गीत को लिखा है मंज म्युज़िक और रफ़्तार ने तथा इसमें संगीत दिया है मंज म्युज़िक और नीलेश पटेल ने। दूसरा गीत है "बावरा मन राह ताके तरसे से", जुबिन नौटियाल, नीति मोहन और रीक चक्रवर्ती की आवाज़ों में। जुनैद वसी के बोल और चिरन्तन भट्ट का संगीत। निस्सन्देह यह ऐल्बम का श्रेष्ठ गीत है। चिरन्तन भट्ट के कीज़ और स्ट्रिंग्स अरेंजमेण्ट ने गीत को ख़ूबसूरत जामा पहनाया है। इस गीत ने अक्षय कुमार और हुमा क़ुरेशी के बीच की केमिस्ट्री को उजागर करने में मदद की है। तीसरा गीत है मीत ब्रदर्स का गाया व कम्पोज़ किया हुआ "जॉली गूड फ़ेलो"। मूल गीत "For He's A Jolly Good Fellow" का देसीकरण किया है गीतकार शब्बीर अहमद ने। कहा जाता है कि अक्षय कुमार ने अपनी बेटी को यह राइम गाते सुना और फिर उन्होंने फ़िल्म के निर्माता/निर्देशक को इस तरह का एक गीत तैयार करने का परामर्श दिया जो फ़िल्म के प्रोमोशन के लिए इस्तमाल में लाया जा सके। यह गीत फ़िल्म के मुख्य नायक के चरित्र और स्वभाव को उजागर करता है। और ऐल्बम का अन्तिम गीत एक भक्तिमूलक क़व्वाली है "ओ रे रंगरेज़ा" जिसे सुखविन्दर सिंह, मुतज़ा मुस्तफ़ा और क़ादिर मुस्तफ़ा ने गाया है। बहुत ही सुन्दर रचना और सुखविन्दर सिंह तो अपने हर गीत में चार चाँद लगाते ही हैं और यह क़व्वाली कोई व्यतिक्रम नहीं। 


17 फ़रवरी को कुल चार फ़िल्में प्रद्रशित हुईं, लेकिन एक भी बॉक ऑफ़िस पर टिक नहीं सकी। पहली
बप्पी लाहिड़ी
फ़िल्म है ’रनिंग् शादी डॉट कॉम’। अमित साध - तापसी पन्नु अभिनीत इस रोमान्टिक कॉमेडी फ़िल्म के मिजाज़ के मुताबिक गाने बनाए गए। ऐल्बम की शुरुआत होती है अभिषेक-अक्षय के संगीत में "प्यार का टेस्ट" गीत से जिसे बप्पी लाहिड़ी और कल्पना पटवारी ने गाया है। डिस्को बीट्स, बप्पी दा की आवाज़, कुल मिला कर जैसे 80 के दशक में पहुँच गए हम। कुछ मज़ेदार बोल हैं इस गीत में जैसे कि "तुम हमारे लुडो हो, हम तुम्हारे हैं चेस"। "मैनरलेस मजनूं" के स्ट्रिंग्स प्रील्युड हमें गीत की तरफ़ आकर्षित करता है और सुकन्या पुरकायस्थ अपनी शालीन गायकी से गीत को आगे बढ़ाती है। इन्हीं की आवाज़ थी "पानी दा रंग वेख के" में। "डिम्पी दे नाम भागे बंटी" एक मस्ती भरा शादी वाला पंजाबी बीट वाला गीत है, शेली के मज़ेदार बोल और एक बार फिर लाभ जंजुआ की जोशीली गायकी से गीत हमारे अन्दर थिरकन पैदा करती है। इस गीत को सुनते हुए यह अनुभव करना मुश्किल है कि अब लाभ हमारे बीच नहीं रहे। सनम पुरी और सोनू कक्कर का गाया "भाग मिल्की भाग" फ़िल्म के भाव से मिलता जुलता गीत है जिसे कीगन पिन्टो ने कम्पोज़ किया है। पिन्टो का अगला गीत "फ़रार" बेहतर है जिसमें जुबिन नौटियाल अपनी मोहक आवाज़ से इस आशावादी गीत को सुरीला अंजाम देते हैं। सॉफ़्ट रॉक का रंग भी इस गीत में सुनने को मिलता है। अनुपम रॉय और हंसिका अय्यर का गाया नर्मो नाज़ुक युगल गीत "मैं फ़रार सा" एक ताज़े हवा के झोंके की तरह आता है जिसमें इन दो गायकों की आवाज़ ही गीत का मुख्य आकर्षण है। साथ ही रिदमिक बीट्स, गीटार और बंसुरी का सुन्दर संयोजन गीत की शोभा बढ़ाते हैं। जुबिन की आवाज़ में "कुछ तो है" का स्ट्रिंग्-सैक्सोफ़ोन संयोजन ने भी कमाल किया। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि यह ऐल्बम देसी बीट्स और पाश्चात्य प्रभाव का कॉकटेल है।


17 फ़रवरी की दूसरी फ़िल्म थी ’दि ग़ाज़ी अटैक’, पर इस फ़िल्म में कोई गीत नहीं था। तीसरी फ़िल्म थी
सुरेश वाडकर, साधना सरगम
’इरादा’। इस फ़िल्म में कुछ सुन्दर रचनाएँ हैं। गायक नीरज श्रीधर ने संगीतकार के रूप में फ़िल्म के चारों गीतों को स्वरबद्ध किया है। उनके बैण्ड ’बॉम्बे वाइकिंग्स’ ने इन्हें गाया है। ऐल्बम की शुरुआत "माही" से होती है; यह एक ऐसा गीत है जो दिल के करीब रहने वाले किसी के खो जाने के दर्द को साकार करता है। हर्षदीप कौर और शबद साबरी ने समीर अनजान के बोलों को सजीव कर देते हैं। लोक वाद्यों के प्रयोग से यह सूफ़ीयाना गीत और भी कर्णप्रिय बन पड़ा है और निस्संदेह यह ऐल्बम का सवश्रेष्ठ गीत है। दूसरा गीत फ़िल्म का शीर्षक गीत है जो बिल्कुल नीरज श्रीधर का फ़ोर्टे है। निखिल उज़गरे की सशक्त आवाज़ और रॉक शैली आधारित यह गीत एक प्रेरणादायक गीत है जो दृढ़ संकल्प के शक्ति को उजागर करता है। लेकिन इस गीत को बार-बार सुनने का मन नहीं होता। तीसरा गीत एक लोरी है; पापोन की आवाज़ में "चाँद रजाई ओढ़े" सुन कर आश्वस्त हुए कि फ़िल्मों से अभी पूरी तरह से लोरियाँ ग़ायब नहीं हुई हैं। यह लोरी सुनते हुए जैसे इससे जुड़ने लगते हैं। चौथा व अन्तिम गीत है "मित्रान दे" जो भंगड़ा बीट्स से शुरु तो होता है पर दिल को छू नहीं पाता। मास्टर सलीम, कौर बी और अर्ल एडगर का गाया यह गीत केवल क्लब्स में डान्स करने के लिए सटीक है। कुल मिला कर ’इरादा’ का ऐल्बम लम्बी रेस का घोड़ा नहीं है। 17 फ़रवरी की चौथी फ़िल्म थी ’चौहर’। कम बजट की फ़िल्म थी, कब आई कब गई पता भी नहीं चला। इस फ़िल्म में कुल चार गीत थे और उल्लेखनीय बात यह कि इनमें से दो गीतों में साधना सरगम और सुरेश वाडकर की आवाज़ें थीं। अश्विनी कुमार के संगीत में साधना सरगम का गाया गीत है "तुम जो मिले तो मिला सवेरा, किस्मत मेरी चमक उठी"। बिना अनर्थक साज़ों के कुंभ के यह सुरीला गीत हमें सुरीले दौर की याद दिलाते हैं। पर साधना सरगम की आवाज़ में कुछ कमी सी सुनाई दी है। दूसरा गीत सुरेश वाडकर की आवाज़ में है "पाप पराजित करे पुण्य को झूठ से हारे सच्चाई, न्याय पराजित अन्याय से कलयुग की यह सच्चाई, धर्म अधर्म से हारे, कोई माने या ना माने, राम जाने राम जाने"। सुधीर-सरबजीत के सुन्दर बोल और सुरेश जी की मोहक आवाज़ से गीत सुकून देता है। फ़िल्म के बाकी दो गीत "मुन्नी बदनाम हुई" के गायक ऐश्वर्य निगम की आवाज़ में है - "यार मिला है ऐसा दिलदार मिला है ऐसा" और "हम हैं भैया कमाल के"।


फ़रवरी के अन्तिम सप्ताह तीन फ़िल्में रिलीज़ हुईं - ’वेडिंग् ऐनिवर्सरी’, ’मोना डारलिंग्’ और ’रंगून’।
राशिद ख़ाँ
’वेडिंग् ऐनिवर्सरी’ के संगीतकार अभिषेक राय ने अच्छा काम किया है। राशिद ख़ाँ की आवाज़ में "आए बिदेसिया मोरे द्वारे, हम तो अपनी सुध-बुध हारे" शास्त्रीय संगीत आधारित गीत होते हुए भी पाश्चात्य संगीत का फ़्युज़न है। मानवेन्द्र का लिखा यह गीत इस कमचर्चित फ़िल्म का एक मुख्य आकर्षण है। उस पर नाना पाटेकर का अभिनय। गीत के इन्टरल्युड में अंग्रेज़ी बोल "द स्ट्रेन्जर कम्स नॉकिंग् ऑन द डोर" फ़्युज़न ईफ़ेक्ट को सहारा देते हैं। भूमि त्रिवेदी का गाया "आए सैयां मोरे द्वारे" की धुन "आए बिदेसिया" वाली ही है। भूमि ने एक बार फिर इस शास्त्रीय रचना में कमाल करती हैं। तीसरा गीत है "इत्तेफ़ाक़न जो मिले हैं हम यहाँ" अभिषेक राय और अमिका शैल की आवाज़ों में। एक नयापन है इस युगल गीत में। फ़िल्म हिट होती तो निस्सन्देह गीत चलता, पर अफ़सोस की बात! अभिषेक और भूमि की आवाज़ों में "द रेनबो सॉंग्’ एक जोशीला पाश्चात्य रीदम युक्त गीत है, पर "इत्तेफ़ाक़न" को यकीनन ज़्यादा अंक मिलते हैं। वैसे अभिषेक की आवाज़ को सुन कर इसे लम्बी रेस का घोड़ा जैसा लगता है। अन्तिम गीत है "धिनचक" अभिनन्दा सरकार की आवाज़ में। यह एक आइटम गीत है और इस तरह के अरबी शैली के आइटम गीत हम अनेकों बार सुन चुके हैं, कोई ख़ास बात नही! ’मोना डारलिंग्’ एक हॉरर-थ्रिलर फ़िल्म है, इसलिए गीतों की गुंजाइश नहीं। फ़िल्म का एकमात्र गीत "एक तलाश है ज़िन्दगी" सकीना ख़ान और वसुधा शर्मा ने गाया है। मनीष जे. टिपु का संगीत और समीर सतीजा के बोल। पार्टी नंबर, बस कुछ और नहीं!


फ़रवरी के अन्तिम सप्ताह, 24 तारीख को प्रदर्शित हुई विशाल भारद्वाज की ’रंगून’। जब जब गुलज़ार
गुलज़ार, विशाल भारद्वाज
और विशाल साथ में आए हैं, फ़िल्म और उसके गीतों में कमाल हुआ है। ’रंगून’ के साथ भी वही हुआ। इस फ़िल्म की कहानी और पार्श्व के अनुसार गाने स्वाधीनता-पूर्व समय के होने चाहिए। पहला गीत है "ब्लडी हेल", सुनिधि चौहान की आवाज़। यह एक पेप्पी ट्रैक है जिसमें कंगना रनौत नज़र आती हैं उस ज़माने की अभिनेत्री जुलिया के किरदार में। इस जौनर के बहुत गीत हैं पर जब भी ऐसे गीत पर गुलज़ार साहब के कलम चलते हैं, तब कुछ और ही कमाल होता है। इस गीत के बारे में कुछ न लिख कर बस इसे सुना जाना चाहिए। दूसरा गीत है "मेरे मियाँ गए इंगलैण्ड" जो "मेरे पिया गए रंगून" की धुन पर आधारित है। रेखा भारद्वाज ने अपनी आवाज़ को शमशाद बेगम की तरह नैज़ल कर लिया है इस गीत में। गीत में ऐडोल्फ़ हिटलर और विन्स्टन चर्चिल का उल्लेख है। तीसरा गीत है "जुलिया" जिसके साथ फ़िल्म में कंगना रनौत उर्फ़ जुलिया की एन्ट्री होती है। सुखविन्दर सिंह, के.के, कुणाल गांजावाला और विशाल भारद्वाज का गाया यह गीत सिचुएशनल गीत है। फ़िल्म के बाहर शायद इस गीत को ज़्यादा सुना ना जाए! एक लम्बे समय के बाद कुणाल की आवाज़ सुन कर अच्छा लगा। रेखा की आवाज़ में "एक दूनी दो, दो दूनी चार" भी एक मस्ती भरा गीत है। अभी तक इस फ़िल्म के जितने गीतों का ज़िक्र हमने किया, वो सब पेप्पी या सिचुएशनल गाने थे। इस फ़िल्म में कुछ कर्णप्रिय रोमान्टिक गाने भी हैं। अरिजीत सिंह की आवाज़ में "ये इश्क़ है" शाहिद कपूर और कंगना पर फ़िल्माया एक कामुक अभिव्यक्ति भरा गीत है। गीत के बोल शायद आम जनता को समझ ना आए क्योंकि गुलज़ार साहब ने इसमें भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग किया है। इसी गीत का रेखा भारद्वाज का गाया एक एकल संस्करण भी है। दोनों संस्करण अपनी अपनी जगह अपना कमाल दिखाता है। रेखा भारद्वाज, सुखविन्दर सिंह, सुनिधि चौहान और ओ.एस. अर्जुन का गाया "टिप्पा" को बस इसके बोलों की वजह से सुना जाना चाहिए। गुलज़ार साहब आख़िर गुलज़ार साहब हैं। आज भी वो साबित करते हैं कि उनका किसी से मुक़ाबला नहीं। "टप टप टोपी टोपी" वाला गीत याद है जो आपने कभी दूरदर्शन पर सुना होगा? यकीन मानिए यह गीत आपको उस बीते युग में ले जायेगी। दूसरी तरफ़ अरिजीत की आवाज़ में "अलविदा अलविदा तो नहीं" एक संजीदा व दर्द भरा गीत है। अरिजीत की आवाज़ में दो तरह के गीत ख़ूब उभरते हैं, एक कामुक, दूसरा दर्द भरा। हालाँकि इस तरह के गीत अब वो बहुत गा चुके हैं, यह गीत यक़ीनन उनके लिए ख़ास है क्योंकि यह गुलज़ार की रचना है। क्योंकि यह फ़िल्म 40 के दशक के पार्श्व की फ़िल्म है, इसके गीतों में उस ज़माने के ब्रिटिश प्रभाव से भरे संगीत का असर है। ऐल्बम के बाकी तीन गीत "बी स्टिल" और "शिमी शेक" उस दौर के रेट्रो शैली के अंग्रेज़ी गीत हैं।



आपकी बात


’चित्रकथा’ के पिछले अंक में हमने आपको गुज़रे ज़माने की अभिनेत्री आशालता बिस्वास पर उनकी पुत्री शिखा वोहरा से की गई बातचीत पेश की थी। इसके संदर्भ में हमारे पाठक श्रीदास गुरजर ने हमसे पूछा कि "हमीनस्तु" और "हमीनस्तो" में क्या अन्तर है और अगर अन्तर है तो इन दोनों शब्दों का क्या मतलब है। श्रीदास जी, सबसे पहले तो हम आपको यह बता दें कि "हमीनस्तो" और "हमीनस्तु" का एक ही अर्थ है। और यही नहीं इसे "हमीं अस्तु", "हमीं अस्तो", "हमीं अस्त" और "हमीनस्त" भी कहा जाता है। यह दरसल फ़ारसी (परशियन) शब्दावली है जिसका अर्थ है "यहीं है"। इसे लोकप्रियता मिली अमीर ख़ुसरौ के मशहूर शेर "गर फ़िरदौस बर रुए ज़मीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त" से जो उन्होंने कशमीर के लिए कही थी। इसका अर्थ यह है कि अगर ज़मीं पर स्वर्ग कहीं है, तो वह यहीं है, यहीं है, यहीं है।



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

गीत अतीत 02 || हर गीत की एक कहानी होती है || मैनरलेस मजनूँ || रंनिंग शादी डॉट कॉम || सुकन्या पुरकायस्थ


Geet Ateet 02
Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
Mannerless Majnu
Sukanya Purkayastha- Singer

आज सुनिए फिल्म रंनिंग शादी डॉट कॉम के गीत मैनर -लेस मजनूँ के बनने की कहानी, गीत की गायिका सुकन्या पुरकायस्थ की जुबानी. गीत के बोल लिखे हैं मनोज यादव ने, और धुन के ढाला है अभिषेक अक्षय ने. छेड़ छाड़ और मस्ती से भरपूर इस गीत का आनंद लें, सुरीली सुकन्या के साथ आज के एपिसोड में, प्ले का बट्टन दबाएँ और आनंन्द लें... 



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सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -
ओ रे रंगरेज़ा (जॉली एल एल बी)

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