Wednesday, September 14, 2016

"दिल से अपने ख्वाब को सच करने का प्रयास करते रहो, कमियाबी ज़रूरी मिलेगी" - अरविन्द तिवारी : एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है (28)

Arvind Tiwari 
देश से दूर बचपन बीता, मगर एक चीज़ जिसने हमेशा दिल को अपने वतन से बाँध के रखा वो था संगीत, अपने इसी संगीत में कुछ नया करने की चाह ले आई हमारे आज के फनकार, अरविन्द तिवारी को अपने स्वदेश, एक बिजनेस केन्द्रित, बैंकोक स्तिथ परिवार से हैं अरविन्द, जिनकी जड़ें जुडी हैं बनारस के घाटों से. अरविन्द की पहली संगीत एल्बम "रंग तेरा" आज सभी संगीत प्लेत्फोर्म्स पर उपलब्ध है. आईये मिलें इसी उभरते हुए गायक अरविन्द तिवारी से आज 'एक मुलाकात ज़रूरी है' के इस ताज़ा एपिसोड में....



एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें 

Sunday, September 11, 2016

सूर मल्हार : SWARGOSHTHI – 283 : SUR MALHAR




स्वरगोष्ठी – 283 में आज


पावस ऋतु के राग – 4 : पण्डित भीमसेन जोशी से सुनिए सूर मल्हार


“बादरवा गरजत आए...” और “बादरवा बरसन लागी...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पावस ऋतु के राग” की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की चौथी कड़ी में आज हम राग गौड़ मल्हार पर चर्चा करेंगे। आज की कड़ी में हम आपको पहले फिल्म संगीतकार वसन्त देसाई का स्वरबद्ध किया, राग सूर मल्हार पर आधारित फिल्म ‘रामराज्य’ का एक गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे। इसके बाद राग का वास्तविक स्वरूप उपस्थित करने के लिए सुविख्यात गायक पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में हम इस राग के दो खयाल रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे, जिसके बोल हैं- ‘बादरवा गरजत आए...’ और ‘बादरवा बरसन लागी...’।


ल्हार अंग के रागों की श्रृंखला में कुछ राग अपने युग के महान संगीतज्ञों, कवियों के नाम पर प्रचलित है। ऐसा ही एक उल्लेखनीय राग है- सूर मल्हार। ऐसी मान्यता है कि इस राग की रचना हिन्दी के भक्त कवि सूरदास ने की थी। इस ऋतु प्रधान राग में निबद्ध रचनाओं में पावस के सजीव चित्रण का गुण तो होता ही है, नायिका के विरह के भाव को सम्प्रेषित करने की क्षमता भी होती है। राग सूर मल्हार काफी थाट का राग माना जाता है। इसकी जाति औडव-षाडव होती है, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में छः स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इसका वादी मध्यम और संवादी षडज होता है। यह उत्तरांग प्रधान राग है। राग सूर मल्हार में दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। आरोह में गान्धार और धैवत स्वरों का तथा अवरोह में गान्धार स्वर का प्रयोग वर्जित होता है।

फिल्मी संगीतकारों ने वर्षा ऋतु के इस राग सूर मल्हार पर आधारित एकाध गीत ही रचे हैं, जिसमें वर्षा ऋतु के अनुकूल भावों की अभिव्यक्ति हो। संगीतकार वसन्त देसाई का संगीतबद्ध किया एक कर्णप्रिय गीत हमे अवश्य उपलब्ध हुआ। फिल्म संगीतकारों में वसन्त देसाई एक ऐसे संगीतकार रहे हैं जिनकी रचनाओं में रागदारी संगीत के प्रति लगाव और उनकी प्रतिबद्धता के स्पष्ट दर्शन होते हैं। मल्हार अंग के रागों के प्रति उनका लगाव उनकी अन्तिम फिल्म ‘शक’ तक निरन्तर बना रहा। मल्हार अंग के रागों पर संगीतकार वसन्त देसाई ने अनेक फिल्मी गीतों की रचना की है। उनके द्वारा संगीतबद्ध राग मियाँ मल्हार में स्वरबद्ध ‘गुड्डी’ का गीत -'बोले रे पपीहरा...' तो बेहद लोकप्रिय है। आज के अंक में हम राग सूर मल्हार के स्वरों में पिरोया उनका एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। 1967 में प्रदर्शित फिल्म ‘रामराज्य’ का यह गीत है, जिसे भरत व्यास ने लिखा, वसन्त देसाई ने संगीतबद्ध किया और लता मंगेशकर ने स्वर दिया है।


राग सूर मल्हार : ‘डर लागे गरजे बदरवा..’ : लता मंगेशकर : फिल्म रामराज्य



इस राग की कुछ अन्य विशेषताओं को रेखांकित करते हुए जाने-माने इसराज और मयूर वीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने बताया कि सूर मल्हार का मुख्य अंग है- सा [म]रे प म, नी(कोमल) म प, नी(कोमल)ध प, म रे सा होता है। राग के गायन-वादन में यदि सारंग झलकने लगे तो नी(कोमल) ध s म प नी(कोमल) ध s प स्वरों का प्रयोग करने से सारंग तिरोहित हो जाता है। श्री मिश्र के अनुसार सारंग के भाव में मेघ मल्हारांश उद्वेग के चपल और गम्भीर ओज से युक्त भाव में राग देस के अंश के विरह भाव के मिश्रण से कसक-युक्त उल्लास में वेदना के मिश्रण से नये रस-भाव का सृजन होता है। अब आप पण्डित भीमसेन जोशी से सुनिए, राग सूर मल्हार में निबद्ध दो मोहक खयाल रचनाएँ। मध्यलय की रचना एकताल में है, जिसके बोल हैं- ‘बादरवा गरजत आए...’ और इसके बाद द्रुत तीनताल की बन्दिश के बोल हैं- ‘बादरवा बरसन लागी...’। आप इन खयाल रचनाओं को सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग सूर मल्हार : ‘बादरवा गरजत आए...’ और ‘बादरवा बरसन लागी...’ : पण्डित भीमसेन जोशी





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 283वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको लगभग चार दशक की फिल्म से लिये गए एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 290वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें गायिका का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 17 सितम्बर, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम ‘स्वरगोष्ठी’ के 285वें अंक में प्रकाशित किया जाएगा। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 281 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1951 में प्रदर्शित फिल्म ‘मल्हार’ से राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – गौड़ मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायिका – लता मंगेशकर

इस बार की संगीत पहेली में पाँच प्रतिभागियों ने प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। इस बार की पहेली में हमारे नियमित विजेता प्रतिभागी हैं - हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी। आप सभी पाँच विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


तीसरे सत्र के विजेता


इस वर्ष की तीसरे सत्र की पहेली (271 से 280वें अंक) में प्राप्तांकों की गणना के बाद सर्वाधिक 20 अंक अर्जित कर तीन प्रतिभागियों - पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी ने प्रथम स्थान प्राप्त किया है। 18 अंक प्राप्त कर चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल ने दूसरा, और 16 अंक अर्जित कर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने इस सत्र में तीसरा स्थान प्राप्त किया है। सत्र के सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में जारी हमारी श्रृंखला ‘पावस ऋतु के राग’ की आज यह दूसरी कड़ी है। आज की कड़ी में आपने राग सूर मल्हार का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में हम वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले मल्हार अंग के कुछ रागों को चुन कर आपके लिए हम प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी, हमें लिखिए। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी कड़ी में वर्षा ऋतु का ही एक राग प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव या फरमाइश ऊपर दिये गए ई-मेल पते पर शीघ्र भेजिए। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


 


Saturday, September 10, 2016

"आज भी जब वहाँ से गुज़रता हूँ तो फ़ूटपाथ को चूम लेता हूँ, कभी मैं वहाँ सोता था साहब!"


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 16
 
नौशाद-2



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक केन्द्रित है सुप्रसिद्ध संगीतकार नौशाद पर। आज प्रस्तुत है नौशाद के संघर्ष की कहानी का दूसरा और अन्तिम भाग।
  

मैंने माजिद साहब को लिखा था कि मेरा ऐसा ऐसा हाल हो गया है, क्या करूँ? तो माजिद साहब ने एक मनी ऑर्डर भेजा, नामी साहब के मार्फ़त। रेस्तोराँ में मेरे साथ, रात को बैठे मेरे साथ खाना खाने नामी साहब, बोले, अरे भाई, तुम्हारा एक मनी ऑर्डर आया है। भाई तुम्हें ज़रूरत पड़ गई थी तो मुझसे क्यों नहीं कहा? आदिल साहब क्या सोचेंगे कि मैं इस क़ाबिल भी नहीं था कि मैं तुम्हारी कोई मदद करता। मैंने कहा कि मैंने यह सोचा कि जो सर छुपाने की जगह भी मिली है शायद यह भी खो दूँ। अगर आपसे यह मैं दर्ख़्वास्त करूँगा तो आपके नज़रों से गिर जाऊँगा! बोले, तुम्हारे पास डायरी रहती थी, जेब में रखते हो? अभी है? मैंने कहा, जी हाँ। कहने लगे, लिखो जो मैं लिखाता हूँ। मैंने कहा, फ़रमाइए। उन्होंने कहा, लिखो, तुम जिस मक़सद के लिए आए हो, एक दिन इसमें कामयाबी हासिल करोगे, मैं अगर ज़िन्दा रहा तो तुमको सलाम करने आऊँगा। मैंने कहा, नामी साहब, किस उम्मीद पर आपने यह जुमला लिखवाया मुझसे? मुझमें कोई ख़ूबी नहीं है, आपने क्या देखा? कुछ तो मैं जानता भी नहीं हूँ मौसीक़ी के बारे में भी। कह रहे, देखो, तुम दो महीने से पैदल आते-जाते हो, यह मई-जून का महीना है, गरमियों में, और तुमने उफ़ तक नहीं की। मुझसे कभी सवाल नहीं किया। तो जो तुम्हारी लगन है, वो तुम्हें ले कर जाएगी मंज़िल तक!

एक दिन गफ़ूर साहब से फिर मुलाक़ात हुई फ़िल्म सिटी के गेट पर और वो मुझे ले गए, मुश्ताक़ हुसैन साहब से मिलवाया। और मुश्ताक़ साहब ने मुझसे कुछ सुना। उसके बाद उन्होंने कहा कि अच्छा, तुम कल से आओ, मेरे साथ काम करो। तो मैं कभी पेटी बजाऊँ, कभी पियानो बजाऊँ, जो साज़ वो दे दें, तीस रुपये महीने पर वहाँ नौकरी मिली। यह पहला इत्तेफ़ाक़ था। फिर उसके बाद एक इश्तिहार मैंने पढ़ा कि खेतवाड़े में एक ऑफ़िस है, यह पता है, यह टेलीफ़ोन नंबर है, और उसमें म्युज़िशियनों की ज़रूरत है। एक फ़िल्म कंपनी बन रही है ’न्यु पिक्चर्स’ के नाम से। सलमान साहब एक थे बनारस के, वो उसके मैनेजर थे। तो उनको सब ऐप्लिकेशन देते थे। मैंने भी अर्ज़ी डाल दी। गया वहाँ। म्युज़िक जो दे रहे थे उस्ताद झंडे ख़ाँ साहब। तो उस्ताद झंडे ख़ाँ साहब का थिएटर की दुनिया से मैं नाम सुनता आ रहा था। कि थिएटर में उस ज़माने में जो स्टेज प्ले होते थे उसमें सब क्लासिकल म्युज़िक का इस्तमाल होता था। बंदिशें सब ख़याल की, और स्थायी, अन्तरे और ठुमरी। तो साहब वहाँ अन्दर ट्रायल हो रहा था। सब लोग जो ट्रायल देने आए म्युज़िशियन बहुत अच्छा अच्छा वो सुना रहे थे। तो मैंने कहा कि मेरी तो  इसमें कोई जगह ही नहीं हो सकती, मैं तो कुछ भी नहीं हूँ, इतना अच्छा लोग सुना रहे हैं उस्ताद झंडे ख़ाँ साहब को, मैं क्या सुनाऊँ! फिर जब मेरा नंबर आने लगा तो मैं वहाँ से भाग खड़ा हुआ। उपर से सलमान साहब ने आवाज़ दी, अरे अरे इधर आइए, वो ज़बरदस्ती ले गए उपर और मुझे वो रूम में धकेल दिया उन्होंने। उस्ताद झंडे ख़ाँ साहब बैठे हुए थे। कहा कि कुछ सुनाओ। मैंने कहा, उस्ताद मुझे कुछ नहीं मालूम, इतना अच्छा-अच्छा लोगों ने सुनाया। उनके आगे मेरी कोई झैसियत ही नहीं। मैं आपको क्या सुनाऊँ हुज़ूर, बस आपके दीदार हो गए, यही मेरे लिए बहुत है!

कुछ दिनों बाद मुझे ऑफ़र लेटर मिला कि मुझे 40 रुपये महीने की तनख्वाह पर रख लिया गया है। उस्ताद झंडे ख़ाँ साहब के साथ काम करना गर्व की बात थी। वो जिस फ़िल्म में काम कर रहे थे, वो एक रशियन हेनरी साहब की फ़िल्म थी। स्टुडियो चेम्बुर में था, उस वक़्त चेम्बुर जंगलों से घिरा होता था। हम लोग दादर से कुरला और फिर कुरला से मानखुर्द जाते। हमने अपनी रेल्वे पास बना ली। ग़ुलाम मोहम्मद तबला बजा रहे थे उस फ़िल्म में, वो भी हमारे साथ जाते थे। जहाँ मैं काम करने जाता था उसके पास ही में एक ’ब्रॉडवे सिनेमा’ हुआ करती थी। एक दिन वहाँ मुझे लखनऊ का रहने वाला एक आदमी मिला। जब उन्होंने सुना कि मैं रोज़ कोलाबा से इतनी दूर आता हूँ, तो उन्होंने मुझे उनके साथ उनकी दुकान के पीछे खोली में रहने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि गरमियों में वो लोग फ़ूटपाथ पर सोते हैं, ब्रॉडवे सिनेमा के ठीक ऑपोज़िट में। फ़ूटपाथ के उस साइड ब्रॉडवे थिएटर थी जिसकी रोशनी फ़ूटपाथ पर पड़ती थी। मैंने नामी साहब से इजाज़त ली और वहाँ आ गया रहने। आज भी जब वहाँ से गुज़रता हूँ तो फ़ूटपाथ को चूम लेता हूँ, कभी मैं वहाँ सोता था साहब! और एक बार उसी थिएटर में मेरी फ़िल्म की जुबिली हुई। मैं उस थिएटर की बैल्कनी से उस फ़ूटपाथ को देख रहा था कि मेरी आँखों में पानी  आ गए। विजय भट्ट ने पूछा कि क्या हुआ, आप रो क्यों रहे हैं? मैंने कहा कि उस फ़ूटपाथ को देख कर आँखें भर आईं, आख़िर 16 साल लगे इस फ़ूटपाथ को पार करने में!

सूत्र: नौशादनामा, विविध भारती




आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 

प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



Thursday, September 8, 2016

चाहा था एक शख़्स को... कहकशाँ-ए-तलबगार में आशा की गुहार



कहकशाँ - 18
आशा भोसले की तरसती आँखों के ज़रिये प्रेम की अनबुझ कहानी 
"आँखों को इंतज़ार का देके हुनर चला गया..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है आशा भोसले की आवाज़ में एक ग़ज़ल, मौसिकार हैं ख़य्याम और कलाम है हसन कमाल का।




कुछ कड़ियाँ पहले मैंने मन्ना डे साहब का वास्तविक नाम देकर लोगों को संशय में डाल दिया था। पूरा का पूरा एक पैराग्राफ़ इसी पर था कि दिए गए नाम से फ़नकार को पहचानें। आज सोच रहा हूँ कि वैसा कुछ फिर से करूँ। अहा... आप तो ख़ुश हो गए होंगे कि मैंने तो इस आलेख का शीर्षक ही "आशा की गुहार" दिया है तो चाहे कोई भी नाम क्यों न दूँ फ़नकार तो आशा भोसले ही हैं। लेकिन पहेली अगर इतनी आसान हो तो पहेली काहे की। तो भाई पहेली यह है कि आज के फ़नकार एक संगीतकार हैं और उनका वास्तविक नाम है "मोहम्मद ज़हुर हाशमी"। अब पहचानिए कि मैं किस संगीतकार के बारे में बात कर रहा हूँ। आपकी सहूलियत के लिए दो हिंट देता हूँ- क) इस आलेख के शीर्षक को सही से पढें। हम जिस ग़ज़ल की आज बात कर रहे हैं, उसका नाम इस शीर्षक में है और उस ग़ज़ल के एलबम के नाम में इन संगीतकार का नाम भी है। ख) १९७६ में बनी एक फ़िल्म में दो नायक और एक नायिका ऐसे त्रिकोण में उलझे कि एक बार मुकेश को तो एक बार लता जी को कहना पड़ा -"...दिल में ख़्याल आता है"। यह ख़्याल किसी और का नहीं, इन्हीं का था। अब आप लोग अपने दिमागी नसों पर जोर दें और हमारे आज के फ़नकार को पहचानें और उनका एहतराम करें।

मुझे मालूम है कि सारे हिंट आसान थे, इसलिए "ख़य्याम" साहब को पहचानने में कोई तकलीफ़ नहीं हुई होगी। ख़य्याम साहब ने हिंदी फ़िल्मी-संगीत को एक से बढ़कर एक नगमें दिए हैं। वही अगर गैर-फ़िल्मी गानों या ग़ज़लों की बात करें तो इस क्षेत्र में भी ख़य्याम साहब का ख़ासा नाम है। जहाँ एक ओर इन्होंने मिर्ज़ा ग़ालिब, दाग़ दहलवी, वली साहब, अली सरदार जाफ़री, मज़रूह सुल्तानपुरी, साहिर लु्धियानवी, कैफ़ी आज़मी जैसे पुराने और मंझे हुए गीतकारों और गज़लकारों के लिए संगीत दिया है, वहीं निदा फ़ाज़ली, नक्श ल्यालपुरी, अहमद वसी जैसे नए गज़लगो की गज़लों को भी अपने सुरों से सजाया है। इस तरह ख़य्याम किसी एक दौर के फ़नकार नहीं कहे जा सकते, उनका संगीत तो सदाबहार है। अब हम आज की ग़ज़ल की ओर बढते हैं। ’कहकशाँ’ की चौथी कड़ी में हमने इसी एलबम के एक गज़ल को सुनाया था- "लोग मुझे पागल कहते हैं"। मुझे उम्मीद है कि आप अभी तक उस गज़ल में आशा ताई की मखमली आवाज़ को नहीं भूले होंगे। उस गज़ल में जैसा सुरूर था, मैं दावा करता हूँ कि आपको आज की गज़ल में भी वैसा ही सुरूर सुनाई देगा, वैसा ही दर्द महसूस होगा। यह तो सबको पता होगा कि ख़य्याम साहब और आशा ताई ने बहुत सारे फ़िल्मी गानों में साथ काम किया है। इसी साथ का असर था कि "इन आँखों की मस्ती के", "ये क्या जगह है दोस्तों" जैसे गानें बनकर तैयार हुए। इस जोड़ी की एक ग़ज़लों की एलबम भी आई थी, जिसका नाम था "आशा और ख़य्याम"। आज की ग़ज़ल "चाहा था एक शख़्स को" इसी मकबूल एलबम से है।

"आँखों को इंतज़ार का देके हुनर चला गया"- यह हुनर भी एक "कमाल" है, यह कभी एक कशिश है तो कभी एक ख़लिश है। प्यार में डूबी निगाहें इस इंतज़ार का अनुभव नहीं करना चाहतीं, वहीं जिन निगाहों को प्यार नसीब नहीं, उनके लिए यह इंतज़ार भी दुर्लभ होता है और वे इस मज़े के लिए तरसती हैं। तो फिर यह इंतज़ार है ना कमाल की चीज? कभी इस इंतज़ार का सही मतलब जानना हो तो उनसे पूछिये जिनका प्यार अब उनका नहीं रहा। उन लोगों ने इस इंतज़ार के तीन रूप देखे हैं- पहला: जब प्यार नहीं था तब इंतज़ार की चाह, दूसरा: जब प्यार उनकी पनाहों में था तब अनचाहे इंतज़ार का लुत्फ़ और तीसरा: अब जब प्यार उनका नहीं रहा तब इंतज़ार का दर्द। मेरे अनुसार अगर तीसरे इंतज़ार को छोड़ दें तो बाकी दो का अपना ही एक मज़ा है। लेकिन तीसरा इंतज़ार इन दोनों पर कई गुणा भारी पड़ता है। अगर मालूम हो कि आप जिसकी राह देख रहे हों वह नहीं आने वाला लेकिन फिर भी आप उसकी राह तकने पर मजबूर हों तो इस पीड़ा को क्या नाम देंगे...किस्मत के सिवा.....!!!

आज की ग़ज़ल की ओर बढने से पहले मैं अपना कुछ सुनाना चाहता हूँ। मुलाहजा फरमाईयेगा:

वो दूर गया अपनों की तरह,
फिर ग़ैर हुआ सपनों की तरह।

यह तो हुआ मेरा शेर, अब हम आशा भोसले की तरसती आँखों के ज़रिये प्रेम की अनबुझ कहानी का रसास्वादन करते हैं। आप ख़ुद देखिये कि "कमाल" साहब ने अपने शब्दों से क्या कमाल किया है:

आँखों को इंतज़ार का देके हुनर चला गया,
चाहा था एक शख़्स को जाने किधर चला गया।

दिन की वो महफ़िलें गईं रातों के रतजगे गए,
कोई समेट कर मेरे शाम-ओ-सहर चला गया।

झोंका है एक बहार का रंग-ए-ख़्याल-ए-यार भी,
हरसू बिखर बिखर गई खुशबू, जिधर चला गया।

उसके ही दम से दिल में आज धूप भी चाँदनी भी है,
देके वो अपनी याद के शम्स-ओ-क़मर चला गया।

कूँचा-ब-कूँचा दर-ब-दर कब से भटक रहा है दिल,
हमको भु्लाके राह वो अपनी डगर चला गया।




’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Wednesday, September 7, 2016

"फिल्म संगीत से इतर जो संगीत है उसके श्रोता कम हैं, पर हैं ज़रूर"- भारती विश्वनाथन : एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है (27)

एक मुलाकात ज़रूरी है के २७ वें यानी इस एपिसोड और अगले एपिसोड में हम आपका परिचय करवाएगें दो ऐसे फनकारों से जो फिल्म संगीत से इतर अपने खुद के चुने हुए संगीत जोनर में रहकर मधुर संगीत की रचना कर रहे हैं, आज मिलिए मशहूर ग़ज़ल गायिका भारती विश्वनाथन से, जिनकी ताज़ा एल्बम "एक इशारा " जल्द ही बाज़ार में आने वाला है. 



एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें 

Tuesday, September 6, 2016

बोलती कहानियाँ: शहतूत पक गये हैं

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में अजय नावरिया की सामाजिक परिवर्तन को दर्शाती कथा "इतिहास" का वाचन सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं, संतोष श्रीवास्तव की मर्मस्पर्शी कथा शहतूत पक गये हैं, पूजा अनिल के मधुर स्वर में।

इस कहानी शहतूत पक गये हैं का मूल गद्य द्वैभाषिक मासिक पत्रिका सेतु पर उपलब्ध है। कथा का कुल प्रसारण समय 25 मिनट 47 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



जबलपुर में जन्मी संतोष श्रीवास्तव हिंदी साहित्य का एक पहचाना हस्ताक्षर हैं। वे कालिदास पुरस्कार, महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी पुरस्कार, साहित्य शिरोमणि पुरस्कार, प्रियदर्शनी अकादमी पुरस्कार, महाराष्ट्र दलित साहित्य अकादमी पुरस्कार, बसंतराव नाईक लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड, कथाबिंब पुरस्कार, तथा कामलेश्वर स्मृति पुरस्कार सम्मान पा चुकी हैं।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी कहानी


‘‘मैंने उनके बर्फ से ठंडे हाथ पकड़कर उन्हें झँझोड़ डाला था, लेकिन ...’’
 (संतोष श्रीवास्तव की कथा "शहतूत पक गये हैं" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


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यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
शहतूत पक गये हैं MP3

#Seventeenth Story, Shahtoot Pak Gaye Hain: Santosh Srivastav /Hindi Audio Book/2016/17. Voice: Pooja Anil

Sunday, September 4, 2016

गौड़ मल्हार : SWARGOSHTHI – 282 : GAUD MALHAR




स्वरगोष्ठी – 282 में आज

पावस ऋतु के राग – 3 : मिलन की आतुरता और गौड़ मल्हार

“गरजत बरसत भीजत आई लो...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पावस ऋतु के राग” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की तीसरी कड़ी में आज हम राग गौड़ मल्हार पर चर्चा करेंगे। इस राग के गायन-वादन से संगीतज्ञ वर्षा ऋतु में उपजने वाले भावों का सृजन करते हैं। आज की कड़ी में हम आपको पहले 1951 में प्रदर्शित फिल्म ‘मल्हार’ का एक गीत सुनवाते हैं। यह गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में है और इसे संगीतकार रोशन ने राग गौड़ मल्हार के स्वरों में पिरोया है। इसके साथ ही राग का वास्तविक स्वरूप उपस्थित करने के लिए सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में राग गौड़ मल्हार में प्रस्तुत एक खयाल रचना सुनवा रहे हैं।


लता मंगेशकर
ल्हार अंग के रागों की श्रृंखला में पिछले दो अंकों में आपने मेघ मल्हार और मियाँ मल्हार रागों की स्वर-वर्षा का आनन्द प्राप्त किया। इस श्रृंखला में आज हम आपके लिए लेकर आए है, राग गौड़ मल्हार। पावस ऋतु का यह एक ऐसा राग है जिसके गायन-वादन से सावन मास की प्रकृति का सजीव चित्रण तो किया ही जा सकता है, साथ ही ऐसे परिवेश में उपजने वाली मानवीय संवेदनाओं की सार्थक अभिव्यक्ति भी इस राग के माध्यम से की जा सकती है। आकाश पर कभी मेघ छा जाते हैं तो कभी आकाश मेघरहित हो जाता है। इस राग के स्वर-समूह उल्लास, प्रसन्नता, शान्ति और मिलन की लालसा का भाव जागृत करते हैं। मिलन की आतुरता को उत्प्रेरित करने में यह राग समर्थ होता है। फिल्मों में राग गौड़ मल्हार का प्रयोग बहुत कम किया गया है। रोशन और बसन्त देसाई, दो ऐसे फिल्म संगीतकार हुए हैं, जिन्होने इस राग का बेहतर इस्तेमाल अपनी फिल्मों में किया है। पार्श्वगायक मुकेश ने 1951 में फिल्म ‘मल्हार’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के संगीतकार रोशन थे। फिल्म के शीर्षक संगीत के रूप में रोशन ने राग गौड़ मल्हार की एक परम्परागत बन्दिश का चुनाव किया। लता मंगेशकर ने फिल्म में शामिल इस बन्दिश को स्वर दिया था। अच्छे संगीत के बावजूद फिल्म ‘मल्हार’ व्यावसायिक रूप से असफल रही और गीत भी अनसुने रह गए। लगभग एक दशक बाद रोशन ने इसी धुन का 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘बरसात की रात’ में थोड़े शाब्दिक फेर-बदल के साथ दोबारा प्रयोग किया। फिल्म ‘मल्हार’ और ‘बरसात की रात’ में शामिल राग गौड़ मल्हार के स्वरों में पिरोये दोनों गीतों का प्रयोग फिल्मों के शीर्षक संगीत के रूप में किया गया था। आइए अब हम आपको हम फिल्म ‘मल्हार का गीत सुनवाते है। लता मंगेशकर की आवाज़ में फिल्म ‘मल्हार’ का गीत सुनिए, जिसमें रोशन ने राग गौड़ मल्हार के स्वरों का प्रयोग कर गीत को मूल बन्दिश के निकट ला दिया।


राग गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : लता मंगेशकर : फिल्म - मल्हार



मालिनी राजुरकर
राग गौड़ मल्हार में गौड़ और मल्हार अंग का अत्यन्त आकर्षक मेल होता है। वक्र सम्पूर्ण जाति के इस राग में दोनों निषाद स्वरों का प्रयोग किया जाता है। अन्य सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस राग में गान्धार स्वर का अत्यन्त विशिष्ट प्रयोग किया जाता है। राग गौड़ मल्हार को कुछ गायक-वादक खमाज थाट के अन्तर्गत, तो अधिकतर इसे काफी थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित रामाश्रय झा इस राग को विलावल थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते थे। राग गौड़ मल्हार की कुछ विशेषताओं की चर्चा करते हुए संगीत-शिक्षक और संगीत विषयक कई पुस्तकों के लेखक पण्डित मिलन देवनाथ जी ने बताया कि इस राग के आरोह में शुद्ध गान्धार के साथ शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। जो गायक-वादक कोमल गान्धार का प्रयोग करते हैं वे इस राग को काफी थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। श्री देवनाथ ने बताया कि इस राग में मध्यम पर न्यास करना और ऋषभ-पंचम की संगति आवश्यक होती है। यह प्रयोग मल्हार अंग का परिचायक होता है। उन्होने बताया कि गौड़ मल्हार में पण्डित विद्याधर व्यास और विदुषी किशोरी अमोनकर ने नि(कोमल),ध,नि,सा (मियाँ मल्हार) का जैसा मोहक परम्परागत प्रयोग किया है, वह सुनने योग्य है। आइए अब हम आपको राग गौड़ मल्हार की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध गायिका मालिनी राजुरकर के स्वरों में सुनवाते हैं। उन्होने द्रुत तीनताल में इसे एक अलग ही रस-रंग में प्रस्तुत किया है।


राग गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : विदुषी मालिनी राजुरकर





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 282वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 290वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन का आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में कण्ठ-स्वर को पहचानिए और हमे इस गायिका का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 10 सितम्बर, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 284वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 280 की संगीत पहेली में हमने आपको 1998 में प्रदर्शित फिल्म ‘साज’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – मियाँ की मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है – ताल – तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का उत्तर है- स्वर – सुरेश वाडकर

इस बार की पहेली में पाँच प्रतिभागियों ने सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। पहेली का सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं - चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और पेंसिलवेनिया और अमेरिका से विजया राजकोटिया। इन सभी विजेताओं ने दो-दो अंक अर्जित किये है। सभी विजेता प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में हमारी श्रृंखला ‘पावस ऋतु के राग’ जारी है। आज के अंक में आपने राग गौड़ मल्हार का रसास्वादन किया। श्रृंखला के अगले अंक में हम पावस ऋतु के एक अन्य राग का परिचय प्राप्त करेंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। हमारी अगली श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव हमे भेज सकते हैं। श्रृंखला “पावस ऋतु के राग” के लिए आप अपने सुझाव या फरमाइश ऊपर दिये गए ई-मेल पते पर शीघ्र भेजिए। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



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