मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

अनुराग शर्मा की लघुकथा खिलखिलाहट

रेडियो प्लेबैक इंडिया के साप्ताहिक स्तम्भ 'बोलती कहानियाँ' के अंतर्गत हम आपको सुनवाते हैं हिन्दी की नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक असगर वजाहत की लघुकथा "चार सूफी और एक कंबल" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं अनुराग शर्मा की एक लघुकथा "खिलखिलाहट", उन्हीं के स्वर में।

कहानी "खिलखिलाहट" एक दादा-दादी के वार्तालाप पर आधारित है। इसका कुल प्रसारण समय 1 मिनट 7 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

इस कथा "खिलखिलाहट" का टेक्स्ट बर्ग वार्ता पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



मैं भारत से बाहर भारत मुझ में रहता है
मेरी सब सीमाएं राष्ट्र असीमित सहता है
~ अनुराग शर्मा

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी कहानी

"हाँ, उछलना को ठीक बोलने में क्या खास है।"
(अनुराग शर्मा की "खिलखिलाहट" से एक अंश)



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खिलखिलाहट MP3

#Twentieth Story, Khilkhilahat: Anurag Sharma/Hindi Audio Book/2015/20. Voice: Anurag Sharma

रविवार, 11 अक्तूबर 2015

अन्तिम प्रहर के राग : SWARGOSHTHI – 239 : RAGAS OF LAST QUARTER



स्वरगोष्ठी – 239 में आज


रागों का समय प्रबन्धन – 8 : रात के चौथे प्रहर के राग

पण्डित मल्लिकार्जुन मंसूर से सुनिए राग परज  

“अँखियाँ मोरी लागि रही...”


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला- ‘रागों का समय प्रबन्धन’ की आठवीं और समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीतानुरागियों का स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि उत्तर भारतीय संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं अथवा प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों के प्रयोग का एक निर्धारित समय होता है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में आज हम आपसे आठवें प्रहर अर्थात रात्रि के चौथे प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के प्रमुख राग परज में एक दुर्लभ खयाल रचना सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित मल्लिकार्जुन मंसूर के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ हे 1959 में प्रदर्शित फिल्म ‘चाचा जिंदाबाद’ से इसी प्रहर के राग ललित पर आधारित एक गीत मन्ना डे और लता मंगेशकर के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।


भारतीय संगीत के प्रायः सभी राग पूर्वनिर्धारित समय पर ही गाने-बजाने की परम्परा है। कुछ राग सार्वकालिक माने गए हैं। जैसे धानी, पहाड़ी आदि। इन्हें किसी भी समय प्रस्तुत किया जा सकता है। श्रृंखला की समापन कड़ी में आज हम रात्रि के चौथे प्रहर अर्थात अन्तिम प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे। इस प्रहर के रागों में से पहले हम प्रस्तुत करेंगे राग ‘परज’ और फिर राग ‘ललित’। इन दोनों रागों में कोमल ऋषभ और दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। अध्वदर्शक स्वर के नियमानुसार तीव्र मध्यम स्वर वाले राग दिन के पूर्वार्द्ध में, अर्थात 12 बजे दिन से मध्यरात्रि 12 बजे तक तथा शुद्ध मध्यम स्वर वाले राग उत्तरार्द्ध में, अर्थात मध्यरात्रि से लेकर 12 बजे मध्याह्न के किए जा सकते हैं। परन्तु राग परज और ललित में दोनों मध्यम लगते हैं और ये राग रात्रि के चौथे प्रहर में प्रस्तुत किये जाते हैं। एक और सिद्धान्त के अनुसार कोमल ऋषभ और शुद्ध गान्धार स्वर वाले राग सन्धिप्रकाश काल में प्रस्तुत किये जा सकते हैं। इन दोनों रागों में कोमल ऋषभ और शुद्ध गान्धार स्वर उपस्थित है और चौथे प्रहर का समापन सन्धिप्रकाश काल से होता है। इन दोनों नियमों का पालन करते हुए राग परज और ललित को अन्तिम प्रहर के रगों की श्रेणी में रखा गया है। राग परज पूर्वी थाट और सम्पूर्ण जाति का राग है। इसमें कोमल ऋषभ, कोमल धैवत व दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग होता है। अब हम आपको वरिष्ठतम संगीतज्ञ पण्डित मल्लिकार्जुन मंसूर द्वारा प्रस्तुत राग परज की एक मोहक रचना सुनवा रहे हैं। इस रचना पर टिप्पणी करते हुए वरिष्ठ संगीत समीक्षक डॉ. मुकेश गर्ग लिखते हैं–

“मल्लिकार्जुन मंसूर की गायकी में आन्तरिक बेचैनी, साँस-सुर की अविश्वसनीय मजबूती और राग-दृढ़ता का विरल संयोग सदा चमत्कृत करता है। वह भी बिना किसी औपचारिक तामझाम के। ऐसे उस्ताद आज दुर्लभ हैं, जो पूर्वी से बचाते हुए परज का खालिस रूप सामने रख सकें।“


राग परज : “अँखियाँ मोरी लागि रही...” : पण्डित मल्लिकार्जुन मंसूर




रात्रि के चौथे प्रहर में राग परज के अलावा अन्य प्रमुख राग हैं- वसन्त, भटियार, भंखार, मनोहर, मेघरंजनी, ललित पंचम, सोहनी, जयन्त, हेवित्री, नेत्ररंजनी और ललित। अब हम आपसे राग ललित की संरचना पर कुछ चर्चा करेंगे और इस राग पर आधारित एक फिल्मी गीत प्रस्तुत करेंगे। राग ललित पूर्वी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग में कोमल ऋषभ, कोमल धैवत तथा दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। आरोह और अवरोह दोनों में पंचम स्वर पूर्णतः वर्जित होता है। इसीलिए इस राग की जाति षाड़व-षाड़व होती है। राग का वादी स्वर शुद्ध मध्यम और संवादी स्वर षडज है। फिल्म संगीत के क्षेत्र में मदनमोहन का का नाम एक ऐसे संगीतकार के रूप में लिया जाता है, जिनकी रचनाएँ सभ्रान्त और संगीत के शौकीनों के बीच सुनी जाती है। उनका संगीत जटिलताओं से मुक्त होते हुए भी हमेशा सतहीपन से दूर ही रहा। फिल्मों में गजल गायकी का एक मानक स्थापित करने में मदनमोहन का योगदान प्रशंसनीय रहा है। उनके अनेक गीतों में रागों की विविधता के दर्शन भी होते हैं। फिल्म संगीत को रागों के परिष्कृत और सरलीकृत रूप प्रदान करने की प्रेरणा उन्हें उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ और लखनऊ के तत्कालीन समृद्ध सांगीतिक परिवेश से ही मिली थी।

1951 में बनी देवेंद्र गोयल की फिल्म ‘अदा’ में मदनमोहन और लता मंगेशकर का साथ हुआ और यह साथ लम्बी अवधि तक जारी रहा। इसी प्रकार पुरुष कण्ठ में राग आधारित गीतों के लिए उनकी पहली पसन्द मन्ना डे हुआ करते थे। मन्ना डे और लता मंगेशकर ने मदनमोहन के संगीत निर्देशन में अनेक उच्चकोटि के गीत गाये। मदनमोहन के संगीत से सजा गीत, जो हम प्रस्तुत कर रहे हैं, वह राग ललित पर आधारित एक युगल गीत है। 1959 में प्रदर्शित फिल्म ‘चाचा जिन्दाबाद’ में मदनमोहन का संगीत था। इस फिल्म के गीतों में उन्होने रागों का आधार लिया और आकर्षक संगीत रचनाओं का सृजन किया। फिल्म में राग ललित के स्वरों में पिरोया एक मधुर गीत- ‘प्रीतम दरश दिखाओ...’ था, जिसे मन्ना डे और लता मंगेशकर ने स्वर दिया। आइए, सुनते हैं यह गीत। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक और श्रृंखला को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग ललित : ‘प्रीतम दरश दिखाओ...’ : मन्ना डे और लता मंगेशकर : फिल्म – चाचा ज़िन्दाबाद





संगीत पहेली 



‘स्वरगोष्ठी’ के 239वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक वाद्य संगीत रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इस संगीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 240 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस अंश में किस राग का स्पर्श है?

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – यह कौन सा संगीत वाद्य है? वाद्ययंत्र का नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 17 अक्टूबर 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 241वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 237वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1955 में प्रदर्शित फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ के शीर्षक गीत का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – अड़ाना, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक – उस्ताद अमीर खाँ

इस बार की पहेली में तीनों प्रश्नों का सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और जबलपुर से क्षिति तिवारी। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 



मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी लघु श्रृंखला ‘रागों का समय प्रबन्धन’ का यह समापन अंक था। इस श्रृंखला को हमारे अनेक नये पाठकों ने पसन्द किया है। हम उन सबके प्रति आभार व्यक्त कराते हैं। अगले अंक में हम एक नई श्रृंखला शुरू करेंगे। आप अपनी पसन्द के गीत, संगीत और राग की फरमाइश कर सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



शनिवार, 10 अक्तूबर 2015

‘मन की आँखें हज़ार होती हैं...!’ - रवीन्द्र जैन को श्रद्धांजलि

रवीन्द्र जैन को श्रद्धांजलि

’तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी’ विशेष

"मन की आँखें हज़ार होती हैं"



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी। आज का यह अंक समर्पित है गीतकार, संगीतकार, कवि और गायक रवीन्द्र जैन की स्मृति को जिनका कल 9 अक्टुबर को मुंबई के लीलावती अस्पताल में निधन हो गया।


28 फ़रवरी 1944 के दिन पंडित इन्द्रमणि ज्ञान प्रसाद जी के घर एक बच्चे का जन्म हुआ। परिवार में ख़ुशी का ठिकाना ना रहा। पर जल्द ही यह पता चला कि उस बच्चे की आँखें बन्द हैं। डॉ. मोहनलाल ने जन्म के अगले दिन एक ऑपरेशन किया, उन्होंने उस बच्चे की आँखें खोली। पर जाँच करने के बाद उन्होंने ज्ञान प्रसाद जी को यह कठोर सत्य बता ही दिया कि भले आँखों की रोशनी धीरे धीरे आ सकती है, पर पढ़ना मुनासिब नहीं रहेगा क्योंकि ऐसा करने पर नुकसान होगा। परिवार में जैसे अन्धेरा छा गया। इस नवजात शिशु का नाम रखा गया रवीन्द्र। उनके पिता ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए यह निर्णय लिया था कि अपने पुत्र के जीवन का लक्ष्य संगीत ही होगा और संगीत में ही उसकी पहचान बनेगी। और यही हुआ। अपनी इस कमी को रवीन्द्र जैन ने भी कभी अपने उपर हावी नहीं होने दिया और अपनी लगन और बुद्धि के सहारे वो ना केवल एक गायक-संगीतकार बने बल्कि काव्य और साहित्य के भी विद्‍वान बने। 80 के व्यावसायिक दशक में भी उन्होंने अर्थपूर्ण गीत लिखे और कभी पैसे के पीछे भाग कर सस्ते गीत नहीं लिखे। रवीन्द्र जैन का नाम सुनते ही दिल श्रद्धा से भर जाता है, उन्हें प्रणाम करने को जी चाहता है।

रवीन्द्र जैन ने एक साक्षात्कार में बताया था कि उन्हें कभी भी अपने नेत्रहीनता पर अफ़सोस नहीं हुआ। उन्हीं के शब्दों में, "मैं जानता हूँ कि दुनिया में हर आदमी किसी ना किसी पहलू से विकलांग है, चाहे वो शरीर से हो, मानसिक रूप से हो या कोई अभाव जीवन में हो। विकलांगता का मतलब यह नहीं कि शारीरिक असुविधा है, कहीं ना कहीं लोग मोहताज हैं, अपाहिज हैं, और उसी पर विजय पाना है। उससे निराश होने की ज़रूरत नहीं है। disability can be your ability also, उससे आपकी क्षमता दुगुनी हो जाती है।"

और यही संदेश उन्होंने एक बार अंध-विद्यालय के छात्रों को भी दिया। उन्हें एक बार एक ब्लाइन्ड स्कूल में मुख्य अतिथि के रूप में आमन्त्रित किया गया। जब उन्हें बच्चों को संबोधित करने को कहा गया, तो उन्होंने संदेश के रूप में यह कविता पढ़ी...

तन की आँखें तो दो ही होती हैं
मन की आँखें हज़ार होती हैं
तन की आँखें तो सो ही जाती हैं
मन की आँखें कभी ना सोती हैं।

चाँद सूरज के हैं जो मोहताज
भीख ना माँगो उन उजालों से,
बन्द आँखों से तुम वो काम करो
आँख खुल जाए आँख वालों की।

हैं अन्धेरे बहुत सितारे बनो
दूसरों के लिए किनारे बनो,
है ज़माने में बेसहारे बहुत
तुम सहारे ना लो, सहारे बनो।

’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ रवीन्द्र जैन जी को दिल से करती है सलाम और उन्हें देती है अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि! रवीन्द्र जैन के अर्थपूर्ण गीत और पवित्र रचनाएँ  हमेशा हमेशा लोगों के मन को शुद्ध करती रहेंगी।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

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