शनिवार, 11 जुलाई 2015

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 04 - सुधा चन्द्रन्


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 04

 
सुधा चन्द्रन्



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक समर्पित है मशहूर नृत्यांगना व अभिनेत्री सुधा चन्द्रन् को। 


21 सितंबर 1964 को सुधा का जन्म हुआ था। सुधा जब मात्र पाँच वर्ष की थी, तभी से नृत्य सीखना शुरू कर दिया था बम्बई के कला सदन में। पढ़ाई और नृत्य दोनो साथ-साथ करती गईं और 17 वर्ष की आयु होते होते वो लगभग 75 स्टेज शोज़ कर चुकी थीं। अन्य पुरस्कारों के साथ-साथ दो मुख्य पुरस्कार ’नृत्य मयूरी’ और ’नवज्योति’ प्राप्त कर चुकी थीं। नृत्य में ही अपना करीअर बनाने का निर्णय ले चुकी थीं सुधा अन्द इस राह पर वो निरन्तर अग्रसर होती चली जा रही थीं बहुत लगन और निष्ठा के साथ। पर भाग्य ने एक बहुत भयानक और गंदा मज़ाक कर दिया उनके साथ। 2 मई 1981 की बात है। सुधा अपने माता-पिता के साथ तमिलनाडु के एक मन्दिर में जा रही थीं एक बस में। और वह बस दुर्घटनाग्रस्त हो गई। दुर्घटना इतनी घातक थी कि सुधा के पैरों को गहरी चोट लगी। दायें पैर का चोट बहुत ज़्यादा था, उस पर शुरुआती डॉक्टर ने इलाज में गड़बड़ी कर दी जिसकी वजह से गैंगरीन हो गया, और उनकी दायीं टांग को शरीर से अलग कर देना पड़ा उनकी जान को बचाने के लिए। एक नृत्यांगना के लिए पैर की क्या अहमियत होती है, यह शायद अलग से बताने की ज़रूरत नहीं। पलक झपकते सबकुछ मानो ख़त्म हो गया, सब तहस-नहस हो गया। एक नृत्यांगना बनने का सपना मानो पल भर में दम तोड़ दिया। जान बच गई, बस यही एक अच्छी बात थी।


कुछ दिनों के इलाज के बाद सुधा को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। सुधा अब भी यह स्वीकार करने को तैयार नहीं थीं कि उनका एक पैर उनसे अलग हो गया है। यहाँ तक कि वो व्हील-चेअर पर भी बैठने के लिए तैयार नहीं हुईं और सामान्य रूप से चलने-फिरने की हर संभव कोशिशें करने लगीं। ऐम्प्युटेशन के 6 महीने बाद सुधा ने एक मैगज़ीन में ’रमन मैगससे अवार्ड’ विजेता, जयपुर के डॉ. सेठी के बारे में पढ़ा जो कृत्रिम अंग विशेषज्ञ थे। उनसे बात करने के बाद सुधा में फिर से आत्मविश्वास के अंकुर फूटने लगे, उन्हें आभास होने लगा कि शायद वो फिर से नृत्य कर सकती हैं। डॉ. सेठी ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी और उनके नृत्य के लिए प्रयोग करने लायक एक कृत्रिम पैर की रचना की। 28 जनवरी 1984 को सुधा चन्द्रन् ने बम्बई में एक स्टेज शो किया जो बेहद सफल रहा और रातों रात सुधा एक स्टार बन गईं। उस नृत्य प्रदर्शन को देखने वालों में निर्माता रामोजी राव भी थे जिन्होंने सुधा के जीवन की कहानी को लेकर एक फ़िल्म बनाने का निर्णय भी ले लिया। ’मयूरी’ नामक इस तेलुगू फ़िल्म में नायिका की भूमिका सुधा चन्द्रन् ने ही निभाई और इसके लिए राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह से ’सिल्वर लोटस’ का राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। 1986 में इस फ़िल्म को हिन्दी में ’नाचे मयूरी’ के नाम से बनाया गया और इसमें भी सुधा चन्द्रन् ही नज़र आईं। फिर इसके बाद सुधा चन्द्रन् ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। फ़िल्मों और नृत्य मंचों के अलावा सुधा चन्द्रन् छोटे परदे पर भी बेहद कामयाब रहीं। सुधा चन्द्रन् के जीवन की कहानी को पढ़ने के बाद उन्हें झुक कर सलाम करने को जी चाहता है। ज़िन्दगी ने उन्हें हताश करने की कोई कसर नहीं छोड़ी थी, पर उन्होंने ज़िन्दगी को ही जैसे जीना सिखा दिया, और ज़िन्दगी ख़ुद उनसे जैसे कह रही हो कि सुधा, तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी!! 

आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



रविवार, 5 जुलाई 2015

गौड़ मल्हार : SWARGOSHTHI – 226 : GAUD MALHAR


स्वरगोष्ठी – 226 में आज


रंग मल्हार के – 3 : राग गौड़ मल्हार


‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’। श्रृंखला के तीसरे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा कर रहे हैं। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। श्रृंखला की इस तीसरी कड़ी में आज हम आपसे राग गौड़ मल्हार के बारे में चर्चा करेंगे। आज के अंक में सुविख्यात गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में हम इस राग की एक मोहक बन्दिश प्रस्तुत करेंगे, जिसके बोल हैं- ‘गरजत बरसत भीजत आई लो…’। इसके साथ ही फिल्म संगीतकार रोशन का स्वरबद्ध किया इस राग पर आधारित दो गीत भी सुनवाएँगे।



ल्हार अंग के रागों की श्रृंखला में पिछले दो अंकों में आपने मेघ मल्हार और मियाँ मल्हार रागों की स्वर-वर्षा का आनन्द प्राप्त किया। इस श्रृंखला में आज हम आपके लिए लेकर आए है, राग गौड़ मल्हार। पावस ऋतु का यह एक ऐसा राग है जिसके गायन-वादन से सावन मास की प्रकृति का सजीव चित्रण तो किया ही जा सकता है, साथ ही ऐसे परिवेश में उपजने वाली मानवीय संवेदनाओं की सार्थक अभिव्यक्ति भी इस राग के माध्यम से की जा सकती है। आकाश पर कभी मेघ छा जाते हैं तो कभी आकाश मेघरहित हो जाता है। इस राग के स्वर-समूह उल्लास, प्रसन्नता, शान्ति और मिलन की लालसा का भाव जागृत करते हैं। मिलन की आतुरता को उत्प्रेरित करने में यह राग समर्थ होता है। राग गौड़ मल्हार में गौड़ और मल्हार अंग का अत्यन्त आकर्षक मेल होता है। वक्र सम्पूर्ण जाति के इस राग में दोनों निषाद स्वरों का प्रयोग किया जाता है। अन्य सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस राग में गान्धार स्वर का अत्यन्त विशिष्ट प्रयोग किया जाता है। राग गौड़ मल्हार को कुछ गायक-वादक खमाज थाट के अन्तर्गत, तो अधिकतर इसे काफी थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित रामाश्रय झा इस राग को विलावल थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते थे।

राग गौड़ मल्हार की कुछ विशेषताओं की चर्चा करते हुए संगीत-शिक्षक और संगीत विषयक कई पुस्तकों के लेखक पण्डित मिलन देवनाथ जी ने बताया कि इस राग के आरोह में शुद्ध गान्धार के साथ शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। जो गायक-वादक कोमल गान्धार का प्रयोग करते हैं वे इस राग को काफी थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। श्री देवनाथ ने बताया कि इस राग में मध्यम पर न्यास करना और ऋषभ-पंचम की संगति आवश्यक होती है। यह प्रयोग मल्हार अंग का परिचायक होता है। उन्होने बताया कि गौड़ मल्हार में पण्डित विद्याधर व्यास और विदुषी किशोरी अमोनकर ने नि(कोमल),ध,नि,सा (मियाँ मल्हार) का जैसा मोहक परम्परागत प्रयोग किया है, वह सुनने योग्य है। आइए अब हम आपको राग गौड़ मल्हार की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध गायिका मालिनी राजुरकर के स्वरों में सुनवाते हैं। उन्होने द्रुत तीनताल में इसे एक अलग ही रस-रंग में प्रस्तुत किया है।


राग गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : विदुषी मालिनी राजुरकर




फिल्मों में राग गौड़ मल्हार का प्रयोग बहुत कम किया गया है। रोशन और बसन्त देसाई, दो ऐसे फिल्म संगीतकार हुए हैं, जिन्होने इस राग का बेहतर इस्तेमाल अपनी फिल्मों में किया है। पार्श्वगायक मुकेश ने 1951 में फिल्म ‘मल्हार’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के संगीतकार रोशन थे। फिल्म के शीर्षक संगीत के रूप में रोशन ने राग गौड़ मल्हार की उसी बन्दिश का चुनाव किया, जिसे अभी आपने विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में सुना है। लता मंगेशकर ने फिल्म में शामिल इस बन्दिश को स्वर दिया था। अच्छे संगीत के बावजूद फिल्म ‘मल्हार’ व्यावसायिक रूप से असफल रही और गीत भी अनसुने रह गए। लगभग एक दशक बाद रोशन ने इसी धुन का 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘बरसात की रात’ में थोड़े शाब्दिक फेर-बदल के साथ दोबारा प्रयोग किया। फिल्म के गीतकार साहिर लुधियानवी ने स्थायी और अन्तरे के शब्दों में बदलाव किये थे। जबकि फिल्म ‘मल्हार’ में गीत के शब्द पारम्परिक बन्दिश के अनुकूल थे। फिल्म ‘मल्हार’ और ‘बरसात की रात’ में शामिल राग गौड़ मल्हार के स्वरों में पिरोये दोनों गीतों का प्रयोग फिल्मों के शीर्षक संगीत के रूप में किया गया था। लगभग एक दशक बाद फिल्म ‘बरसात की रात’ और उसका संगीत, दोनों व्यावसायिक दृष्ठि से बेहद सफल सिद्ध हुआ। आपको हम दोनों फिल्मों के गीत सुनवाते है। पहले आप लता मंगेशकर की आवाज़ में फिल्म ‘मल्हार’ का और फिर सुमन कल्याणपुर और कमल बरोट के युगल स्वरों में फिल्म ‘बरसात की रात’ का गीत सुनिए, जिसमें रोशन ने राग गौड़ मल्हार के स्वरों का प्रयोग कर गीत को सदाबहार बना दिया। आप इन गीतों को सुनिए और मुझे आज के अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : लता मंगेशकर : फिल्म - मल्हार




राग गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत सावन...’ : सुमन कल्याणपुर व कमल बरोट : फिल्म -बरसात की रात





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 226वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको सुप्रसिद्ध गायक की आवाज़ में प्रस्तुत खयाल का एक अंश सुनवा रहे हैं। इस गीत के अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 230वें अंक के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में किस राग की झलक है?

2 – गीत के अंश में प्रयोग किये गए ताल को ध्यान से सुनिए और हमें ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत के गायक को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 11 जुलाई, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 228वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 224 की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद राशिद खाँ की आवाज़ में प्रस्तुत राग मियाँ की मल्हार की एक बन्दिश का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा गया था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मियाँ की मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक उस्ताद राशिद खाँ। 

 इस बार पहेली में हमारी नियमित प्रतिभागियों में से वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया ने एक प्रश्न का सही उत्तर दिया है। उन्हें एक अंक दिया जा रहा है। अन्य प्रतिभागियों में पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने तीनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये हैं। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’ जारी है। आज के अंक में आपने राग गौड़ मल्हार का रसास्वादन किया। श्रृंखला के आगामी अंकों में हम आपको मल्हार अंग के अन्य रागों को सुनवाएँगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी पिछली श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



शनिवार, 4 जुलाई 2015

"मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है" - क्यों दो बार रेकॉर्ड हुआ था यह गीत?


एक गीत सौ कहानियाँ - 62

 

मेरी आँखों से कोई नींद लिये  जाता है...’ 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 62-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म ’पूजा के फूल’ के सदाबहार गीत "मेरी आँखों से कोई नींद लिये जाता है..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर ने गाया था और राजेन्द्र कृष्ण ने लिखा था।

14 जुलाई 1975 को संगीतकार मदन मोहन इस दुनिया से चले गए थे। उनके गए 40 वर्ष बीत गए हैं, पर जब भी जुलाई का यह भीगा महीना आता है, तो उनकी यादें भी झम झम बरसने लगती हैं। मदन मोहन, लता मंगेशकर और सितार वादक उस्ताद रईस ख़ान की तिकड़ी के सुरीले संगम से बनी ग़ज़ल "रस्म-ए-उल्फ़त को निभाएँ तो निभाएँ कैसे" की विस्तृत चर्चा हमने इसी स्तंभ में की है। आज इसी तिकड़ी का एक और अनमोल गीत का ज़िक्र कर रहे हैं। गीत का उल्लेख करने से पहले आपको याद दिलाना चाहूँगा कि "रस्म-ए-उल्फ़त..." के अंक में मदन मोहन और रईस ख़ान का ज़िक्र करते हुए हमने यह जानकारी दी थी कि दोनों के बीच में मनमुटाव हो जाने के बाद दोनों ने न केवल एक दूसरे के साथ काम करना बन्द कर दिया, बल्कि मदन मोहन ने फिर कभी अपने गीतों में सितार का प्रयोग ही नहीं किया। हाल ही में मदन मोहन की पुत्री संगीता जी ने मुझे बताया कि बाद में मदन मोहन जी ने उस्ताद शमीम अहमद से सितार सीखा और अपनी आख़िर की कुछ फ़िल्मों में अहमद साहब से बजाया। आज आपको बताएँगे कि ऐसा क्या हुआ था कि उस्ताद रईस ख़ान के साथ कि उनकी बरसों की जोड़ी, बरसों की दोस्ती टूट गई! 

हुआ यूं कि एक मोड़ पर मदन मोहन को यह लगने लगा कि उनकी महफ़िलों में रईस ख़ान का सिर्फ़ दोस्ती की ख़ातिर सितार बजाना ठीक नहीं है। रईस ख़ान को वो इस तरह बुला कर, सितार बजवा कर दोस्ती का ग़लत फ़ायदा उठा रहे हैं। इसलिए उन्होंने रईस ख़ान को उनका वाजिब मेहनताना देने की सोची। मगर परेशानी यह थी कि अपने दोस्त से पैसों की बात कैसे करे? सो उन्होंने 1973 की एक महफ़िल के बाद अपने मैनेजर से कहा कि वो ख़ान साहब से उनकी फ़ीस के बारे में पूछेंगे। मैनेजर ने रईस ख़ान से पूछा। रईस ख़ान ने उस वक़्त तो कुछ नहीं कहा, मगर उन्हें यह बात बहुत चुभ गई और उन्होंने इसे अपना अपमान मान लिया। अपने दोस्त मदन मोहन से वो इस तरह की उम्मीद नहीं कर रहे थे। रईस ख़ान जितने बेहतरीन कलाकार थे उतने ही तुनकमिज़ाज भी थे। वो चुपचाप बैठने वाले नहीं थे। बात चुभ गई थी। उन्होंने कुछ दिन बाद मदन मोहन को फ़ोन किया और कहा कि उनके एक दोस्त के घर में एक शादी है और शादी के जलसे में गाने के लिए आपको बुलाया है। "तो मदन भाई, आप कितने पैसे लेंगे?" अब चौंकने की बारी मदन मोहन की थी। बहुत अजीब लगा मदन मोहन को कि रईस ख़ान ने उन जैसे कलाकार को शादी में गाने के लिए कह कर उनकी तौहीन कर रहा है। यह तौहीन अब मदन मोहन बर्दाश्त नहीं कर सके। बस यहीं से दोनो के मन में ऐसी खटास पड़ी कि इन दोनों अज़ीम फ़नकारों का साथ सदा के लिए ख़त्म हो गया।

और अब आज के गीत "मेरी आँखों से कोई नींद लिये जाता है..." की कहानी। गाना रेकॉर्ड हो चुका था और मदन मोहन इस गाने से बहुत ख़ुश भी थे। फिर ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने इस गाने को दोबारा रेकॉर्ड करने का फ़ैसला ले लिया? इस गीत में छोटे-छोटे इन्टरल्यूड्स रईस ख़ान ने बजाए। पर मुख्य रूप से पंडित शिव कुमार शर्मा के सन्तूर को बहुत प्रॉमिनेन्टली इस्तेमाल किया गया। रेकॉर्डिंग् हो गई, सबकुछ सही हो गया। अब हुआ यूं कि एक दिन मदन मोहन ने यह गाना रईस ख़ान को दोबारा सुनवाया। गाने का टेप बज रहा था, तभी रईस ख़ान ने अपना सितार उठाया, और गाने के साथ सितार छेड़ने लगे। इस बार नए नए इन्टरल्यूड्स बजने लगे। नई सुर, नई तरकीबें। रईस ख़ान के सितार से इस तरह के सुर सुन कर मदन मोहन का दिल हो गया बाग़-बाग़। उन्होंने फ़ौरन AVM Productions को फ़ोन लगाया और कहा कि वो इस गाने को दोबारा रेकॉर्ड करना चाहते हैं। मदन मोहन रईस ख़ान के बजाए सितार के पीसेस से इतना मुतासिर हो गए कि जिस गाने को रेकॉर्ड करके मुतमइन थे, उस गाने को एक बार फिर से रेकॉर्ड करने की ठान ली। लीजिए, अब आप वही गीत सुनिए।



फिल्म पूजा के फूल : 'मेरी आँखों से कोई नींद लिये जाता है...' : लता मंगेशकर : मदन मोहन : राजेन्द्र कृष्ण




आभार: सुहाना सफ़र विथ अन्नु कपूर

अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 





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