Sunday, May 17, 2015

मारवा थाट के राग : SWARGOSHTHI – 219 : MARAVA THAAT



स्वरगोष्ठी – 219 में आज

दस थाट, दस राग और दस गीत – 6 : मारवा थाट

संगीत रचनाएँ राग मारवा और सोहनी की



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ की छठें अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के रागों का वर्गीकरण करने में समर्थ मेल अथवा थाट व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग किया जाता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 में से कम से कम पाँच स्वरों की उपस्थिति आवश्यक होती है। भारतीय संगीत में ‘थाट’, रागों के वर्गीकरण करने की एक व्यवस्था है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार सात मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते है। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल का प्रचलन है, जबकि उत्तर भारतीय संगीत में दस थाट का प्रयोग किया जाता है। इन दस थाट का प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं दस थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को वर्गीकृत किया जाता है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे मारवा थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग मारवा में निबद्ध दो खयाल रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। साथ ही मारवा थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत राग सोहनी के स्वरों में निबद्ध एक फिल्मी गीत का उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे।



धुनिक उत्तर भारतीय संगीत में राग-वर्गीकरण के लिए प्रचलित दस थाट प्रणाली पर केन्द्रित इस श्रृंखला में अब तक आप कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव और पूर्वी थाट का परिचय प्राप्त कर चुके हैं। आज की कड़ी में हम ‘मारवा’ थाट पर चर्चा करेंगे। हमारा भारतीय संगीत एक सुदृढ़ और समृद्ध आधार पर विकसित हुआ है। समय-समय पर इसका वैज्ञानिक दृष्टि से मूल्यांकन होता रहा है। यह परिवर्द्धन वर्तमान थाट प्रणाली पर भी लागू है। आधुनिक संगीत में प्राचीन मुर्च्छनाओं के स्थान पर मेल अथवा थाट प्रणाली का उपयोग किया जाता है। सभी छोटे-बड़े अन्तराल, जो रागों के लिए आवश्यक हैं, सप्तक की सीमाओं के अन्तर्गत रखे गए और मुर्च्छना की प्राचीन प्रणाली का परित्याग किया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि यह परिवर्तन चार-पाँच सौ वर्ष पूर्व हुआ। आज ऋषभ, गान्धार, मध्यम, धैवत और निषाद स्वरों के प्रत्येक स्वर की एक या दो श्रुतियों को ग्रहण कर नवीन थाट का निर्माण करते हैं, जबकि षडज और पंचम अचल स्वर माने जाते हैं। जिस प्रकार प्राचीन मुर्च्छनाएँ प्राचीन जातियों के लिए स्रोत रही हैं, उसी प्रकार मेल अथवा थाट हमारे रागों के लिए स्रोत हैं।

आइए, अब हम ‘मारवा’ थाट के विषय में कुछ चर्चा करते हैं। इस थाट में प्रयोग होने वाले स्वर हैं- सा, रे॒, ग, म॑, प, ध, नि। अर्थात ‘मारवा’ थाट में ऋषभ कोमल, मध्यम तीव्र तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। राग मारवा, ‘मारवा’ थाट का आश्रय राग है, जिसमे ऋषभ कोमल और मध्यम तीव्र होता है किन्तु पंचम वर्जित होता है। यह षाड़व-षाड़व जाति का राग है। अर्थात आरोह और अवरोह में छः स्वरों के प्रयोग होते हैं। राग मारवा के आरोह स्वर हैं, सारे, ग, म॑ध, निध, सां  तथा अवरोह के स्वर हैं, सांनिध, म॑गरे, सा होता है। इसका वादी स्वर ऋषभ तथा संवादी स्वर धैवत होता है। इस राग का गायन-वादन दिन के चौथे प्रहर में उपयुक्त माना जाता है। अब हम आपको राग मारवा में निबद्ध दो खयाल सुनवा रहे हैं। उस्ताद अमीर खाँ ने इसे प्रस्तुत किया है। राग मारवा उदासी भाव का राग होता है। विलम्बित खयाल के बोल हैं- ‘पिया मोरा अनत देश...’ और द्रुत खयाल की बन्दिश है- ‘गुरु बिन ज्ञान न पावे...’। इस श्रृंखला में अब तक हमने आपको उस्ताद अमीर खाँ द्वारा प्रस्तुत कई रचनाएँ सुनवाई है और आगे भी सुनवाएँगे। लीजिए, इस बार भी राग मारवा की दो रचनाएँ उस्ताद अमीर खाँ की आवाज़ में सुनिए।


राग मारवा : विलम्बित- ‘पिया मोरा...’ और द्रुत खयाल- ‘गुरु बिन ज्ञान...’ : उस्ताद अमीर खाँ




‘मारवा’ थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- पूरिया, साजगिरी, ललित, सोहनी, भटियार, विभास आदि। राग सोहनी इस थाट का बेहद लोकप्रिय राग है। सुप्रसिद्ध मयूरवीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने राग सोहनी के बारे में बताया कि राग सोहनी का प्रयोग खयाल और ठुमरी, दोनों प्रकार की गायकी में किया जाता है। ठुमरी अंग में इस राग का प्रयोग अधिक होता है। इस राग का प्रयोग दो प्रकार से किया जाता है। पहले प्रकार, औडव-षाड़व जाति के अन्तर्गत आरोह में ऋषभ और पंचम तथा अवरोह में पंचम का प्रयोग नहीं किया जाता। राग के दूसरे स्वरूप के आरोह में ऋषभ और अवरोह में पंचम का प्रयोग नहीं होता। राग सोहनी में उन्हीं स्वरों का प्रयोग होता है, जिनका राग पूरिया और मारवा में भी किया जाता है। किन्तु इसके प्रभाव और भावाभिव्यक्ति में पर्याप्त अन्तर हो जाता है। राग सोहनी का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। धैवत पीड़ा की अभिव्यक्ति करने में समर्थ होता है। ‘नी सां रें (कोमल) सां’ की स्वर संगति से तीव्र पुकार का वातावरण निर्मित होता है। संवादी गान्धार कुछ देर के लिए इस उत्तेजना को शान्त कर सुकून देता है। वास्तव में वादी और संवादी स्वर राग के प्राणतत्त्व होते हैं, जिनसे रागों के भावों का सृजन होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में राग सोहनी के भाव अधिक स्पष्ट होते हैं। इस राग में मींड़ एवं गमक को कसे हुए ढंग से मध्यलय में प्रस्तुत करने से राग का भाव अधिक मुखरित होता है। यह चंचल प्रवृत्ति का राग है। श्रृंगार के विरह पक्ष की सार्थक अनुभूति कराने में यह राग समर्थ है। राग सोहनी, कर्नाटक संगीत के राग हंसनन्दी के समतुल्य है। यदि राग हंसनन्दी में शुद्ध ऋषभ का प्रयोग किया जाए तो यह ठुमरी अंग के राग सोहनी की अनुभूति कराता है। तंत्रवाद्य पर राग मारवा, पूरिया और सोहनी का वादन अपेक्षाकृत कम किया जाता है।

भारतीय फिल्मों के इतिहास में 1960 में प्रदर्शित, बेहद महत्त्वाकांक्षी फिल्म- ‘मुगल-ए-आजम’, एक भव्य कृति थी। इसके निर्माता-निर्देशक के. आसिफ ने फिल्म की गुणबत्ता से कोई समझौता नहीं किया था। फिल्म के संगीत के लिए उन्होने पहले गोविन्द राम और फिर अनिल विश्वास को दायित्व दिया, परन्तु फिल्म-निर्माण में लगने वाले सम्भावित अधिक समय के कारण बात बनी नहीं। अन्ततः संगीतकार नौशाद तैयार हुए। नौशाद ने फिल्म में मुगल-सल्तनत के वैभव को उभारने के लिए तत्कालीन दरबारी संगीत की झलक दिखाने का हर सम्भव प्रयत्न किया। नौशाद और के. आसिफ ने तय किया कि अकबर के नवरत्न तानसेन की मौजूदगी का अनुभव भी फिल्म में कराया जाए। नौशाद की दृष्टि विख्यात गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ पर थी, किन्तु फिल्म में गाने के लिए उन्हें मनाना सरल नहीं था। पहले तो खाँ साहब ने फिल्म में गाने से साफ मना कर दिया, परन्तु जब दबाव बढ़ा तो टालने के इरादे से, एक गीत के लिए 25 हजार रुपये की माँग की। खाँ साहब ने सोचा कि एक गीत के लिए इतनी बड़ी धनराशि देने के लिए निर्माता तैयार नहीं होंगे। यह उस समय की एक बड़ी धनराशि थी, परन्तु के. आसिफ ने तत्काल हामी भर दी। नौशाद ने शकील बदायूनी से प्रसंग के अनुकूल गीत लिखने को कहा। गीत तैयार हो जाने पर नौशाद ने खाँ साहब को गीत सौंप दिया। उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ ने ठुमरी अंग की गायकी में अधिक प्रयोग किये जाने वाले राग सोहनी और दीपचन्दी ताल में निबद्ध कर गीत- ‘प्रेम जोगन बन के...’ को रिकार्ड कराया। रिकार्डिंग से पहले खाँ साहब ने वह दृश्य देखने की इच्छा भी जताई, जिस पर इस गीत को शामिल करना था। मधुबाला और दिलीप कुमार के उन प्रसंगों को देख कर उन्होने गायन में कुछ परिवर्तन भी किये। इस प्रकार भारतीय फिल्म-संगीत-इतिहास में राग सोहनी के स्वरों में ढला एक अनूठा गीत शामिल हुआ। उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ द्वारा राग सोहनी के स्वरों में पिरोया यह गीत के. आसिफ को इतना पसन्द आया कि उन्होने खाँ साहब को दोबारा 25 हजार रुपये भेंट करते हुए एक और गीत गाने का अनुरोध किया। खाँ साहब का फिल्म में गाया राग रागेश्री, तीनताल में निबद्ध दूसरा गीत है- ‘शुभ दिन आयो राजदुलारा...’। ये दोनों गीत फिल्म संगीत के इतिहास के सर्वाधिक उल्लेखनीय किन्तु सबसे खर्चीले गीत सिद्ध हुए। लीजिए, आप उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ द्वारा राग सोहनी के स्वरों में ढला यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग सोहनी : ‘प्रेम जोगन बन के...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ : फिल्म – मुगल-ए-आजम





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 219वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको पचपन साल पुरानी एक भारतीय फिल्म के गीत का अंश एक उस्ताद गायक की आवाज में सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 220 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।
 

1 – गीत के इस अंश में किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।
 
2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।
 
3 - क्या आप गायक की आवाज़ को पहचान रहे है? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।  

आप इन प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 23 मई, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 221वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 217वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘बैजू बावरा’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग पूरिया धनाश्री, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- एकताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक उस्ताद अमीर खाँ। इस बार की पहेली में हमारी एक नई श्रोता/पाठक रायपुर, छत्तीसगढ़ से राजश्री श्रीवास्तव ने भाग लिया और पहले और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर देकर पूरे दो अंक अर्जित कर लिया। इसके साथ ही जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका की विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने सही उत्तर दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ जारी है। श्रृंखला के आज के अंक में हमने आपसे मारवा थाट और और उसके रागों पर सोदाहरण चर्चा की। अगले अंक से हम एक और थाट के साथ उपस्थित होंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों के अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फर्माइशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




Saturday, May 16, 2015

"छू कर मेरे मन को...", क्यों राजेश रोशन को अपने पैसे से इस गीत को रेकॉर्ड करना पड़ा?


एक गीत सौ कहानियाँ - 59

 

छू कर मेरे मन को...’ 





रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 59-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म ’याराना’ के मशहूर गीत "छू कर मेरे मन को, किया तूने क्या इशारा..." के बारे में जिसे किशोर कुमार ने गाया था। 

रबीन्द्र संगीत की धुनों पर आधारित हिन्दी फ़िल्मी गीतों की परम्परा बहुत पुरानी है। 30 के दशक से ही संगीतकार, ख़ास कर बंगाली संगीतकार, रबीन्द्र संगीत से प्ररणा लेकर फ़िल्मी गीत रचते रहे हैं। पंकज मल्लिक, कमल दासगुप्ता, अनिल बिस्वास, सचिन देव बर्मन, हेमन्त कुमार से लेकर बप्पी लाहिड़ी तक यह परम्परा जारी रही है। ये सभी बंगाली संगीतकारों के नाम हमने गिनाए। एक और संगीतकार हैं जिन्हें 100% बंगाली तो नहीं कह सकते, पर हाँ 50% ज़रूर बंगाली हैं। राजेश रोशन वह नाम है, उनकी माँ इरा रोशन बंगाली थीं और इस तरह से बंगाल के सुरीले संगीत की धारा उनके नसों में भी बही है। राजेश रोशन ने भी कई बार रबीन्द्र संगीत को आधार बना कर फ़िल्मी गीत रचे हैं। इनमें से सबसे प्रमुख गीत रहा है 1981 की फ़िल्म ’याराना’ का, "छू कर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा..." जो आधारित है "तोमार होलो शुरू, आमा होलो शारा" पर। निस्सन्देह यह गीत बेहद कामयाब रहा और आज भी अक्सर रेडियो पर सुनाई दे जाता है, पर राजेश रोशन से एक बड़ी भूल हो गई थी। दरअसल बात ऐसी थी कि रबीन्द्र संगीत का अधिकार शान्तिनिकेतन के विश्वभारती विश्वविद्यालय के पास सुरक्षित थी, जिसका अर्थ यह है कि किसी भी कलाकार को रबीन्द्र संगीत का इस्तेमाल करने के लिए विश्वभारती से अनुमति लेनी पड़ती थी। पर प्रस्तुत गीत के लिए ना राजेश रोशन ने अनुमति ली और ना ही ’याराना’ फ़िल्म के निर्माता ने। नतीजा यह हुआ कि फ़िल्म के रिलीज़ होने तक किसी को भनक तक नहीं पड़ी कि ऐसा कोई गीत बन रहा है। जैसे ही फ़िल्म रिलीज़ हुई और कलकत्ता के थिएटर में लोग इसे देखने पहुँचे, इस गीत को सुनते ही लोग भड़क उठे। बंगाल में कविगुरू की क्या अहमियत और सम्मान है यह हम सभी जानते हैं। कविगुरु की धुन का बिना अनुमति के हिन्दी फ़िल्मी गीत में सुनाई दे जाना बंगाल के लोगों को अच्छा नहीं लगा, और इसका विरोध प्रदर्शन हुआ। कई सिनेमाघरों में तोड़-फोड़ भे हुए जिससे फ़िल्म को थिएटरों से उतारना पड़ा। मामला ज़रूरत से ज़्यादा बिगड़ता देख ’याराना’ फ़िल्म के निर्माता और राजेश रोशन ने माफ़ी माँगी और विश्वभारती को क्षमा याचना का पत्र भेज कर विवाद को ख़त्म किया। राजेश रोशन के हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी कि इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी बिल्कुल इसी धुन और मीटर का इस्तेमाल कर कुछ वर्षों बाद (1986 में) एक और गीत बनाया फ़िल्म ’मक्कार’ के लिए। किशोर कुमार की ही आवाज़ में यह गीत था "तू ही मेरा सपना, तू ही मेरी मंज़िल"। 1998 में फ़िल्म ’युगपुरुष’ फ़िल्म में एक बार राजेश रोशन ने रबीन्द्र संगीत "पागला हावा बादोल दिने" पर आधारित गीत बनाया "बंधन खुला पंछी उड़ा"।

यह तो थी "छू कर मेरे मन को" के संगीत की दास्तान। अब आते हैं इसके बोलों पर। गीतकार अंजान के बेटे समीर उस समय अपने पिता के साथ मौजूद थे जब यह गीत लिखा जा रहा था। विविध भारती के एक साक्षात्कार में समीर ने इस गीत के बारे में कुछ ऐसा बताया था - "छूकर मेरे मन को...", अब देखिए इस गाने के पीछे भी एक बड़ी अजीब सी कहानी है, और मुझे याद है, मैं और पापा गाँव जा रहे थे; तो उनकी कैसेट पे दो गानों की ट्यून, एक तो उस फ़िल्म का टाइटल गाना "तेरे जैसा यार कहाँ..." और यह दूसरा गाना। टाइटल गाना तो उन्होंने रास्ते में ही कम्प्लीट कर लिया था पर यह गाना, उनको लग रहा था कि बहुत अच्छा ट्यून राजू ने दिया है, मैं कुछ अच्छा करना चाह रह हूँ। और उन्होंने मुखड़ा मुझे सुनाया "छू कर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा", मुझे लगा कि बहुत ख़ूबसूरत गाना बनेगा। मगर जब हम गाँव से आए और सिटिंग् हुई और रेकॉर्डिंग् पर जब गाना पहुँचा तो संजोग की बात थी कि रेकॉर्डिंग् में जाने से पहले तक प्रोड्युसर ने वह गाना नहीं सुना था। और रेकॉर्डिंग में जब प्रोड्युसर आया और उन्होंने जैसे ही गाना सुना तो बोले कि रेकॉर्डिंग् कैन्सल करो, मुझे यह गाना रेकॉर्ड नहीं करना है। उन्होंने कहा कि इतना बेकार गाना मैंने अपनी ज़िन्दगी में नहीं सुना, इतना ख़राब गाना राजू तुमने हमारी फ़िल्म के लिए बनाया है, मुझे यह गाना रेकॉर्ड नहीं करना है। अब राजेश रोशन का दिमाग़ उस ज़माने में, उनको ग़ुस्सा बहुत आता था, उन्होंने कहा कि गफ़्फ़ार भाई, उनका नाम था गफ़्फार नडियाडवाला, सोरज नडियाडवाला, हमीद नडियाडवाला, हमीद उसके प्रोड्युसर थे, हमीद यह फ़िल्म बना रहे थे, यह गाना रहे ना रहे, लेकिन यह गान मैं रेकॉर्ड करने जा रहा हूँ और तुम अभी इसी वक़्त इस रेकॉर्डिंग् स्टुडियो से निकल जाओ, मुझे तुम्हारी शकल नहीं देखनी है, तुमको यह गाना नहीं समझ में आएगा, मैं यह गाना रेकॉर्ड करूँगा, तुमको इसका पैसा भी नहीं देना है, मैं अपने पैसे से रेकॉर्ड करूँगा। और उस आदमी ने अपने पैसे से वह गाना रेकॉर्ड किया और गाना रेकॉर्ड होकर जब अमिताभ बच्चन तक पहुँचा तो उन्होंने यह बात कही कि अगर यह गाना नहीं होगा फ़िल्म में तो मैं यह फ़िल्म नहीं करूँगा। और वह गाना माइलस्टोन बना।" लीजिए, अब आप भी यह गाना सुन लीजिए।

फिल्म याराना : 'छूकर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा...' : किशोर कुमार : राजेश रोशन



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, May 10, 2015

पूर्वी थाट के राग : SWARGOSHTHI – 218 : PURVI THAAT



स्वरगोष्ठी – 218 में आज

दस थाट, दस राग और दस गीत – 5 : पूर्वी थाट

राग पूर्वी की मनोहारी रचना - 'कर कपाल लोचन त्रय...'  



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के रागों का वर्गीकरण करने में समर्थ मेल अथवा थाट व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को वर्गीकृत किया जाता है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे पूर्वी थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग पूर्वी में निबद्ध एक खयाल रचना प्रस्तुत करेंगे। साथ ही पूर्वी थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत राग पूरिया धनाश्री के स्वरों में निबद्ध एक फिल्मी गीत का उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे।



धुनिक भारतीय संगीत में प्रचलित थाट पद्धति पर केन्द्रित श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ में हम पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा प्रवर्तित उन दस थाटों की चर्चा कर रहे हैं, जिनके माध्यम से रागों का वर्गीकरण किया जाता है। उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत की दोनों पद्धतियों में संगीत के सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र, अर्थात कुल बारह स्वरों के प्रयोग में समानता है। दक्षिण भारत के ग्रन्थकार पण्डित व्यंकटमखी ने सप्तक में 12 स्वरों को आधार मान कर 72 थाटों की रचना गणित के सिद्धान्तों पर की थी। भातखण्डे जी ने इन 72 थाटों में से केवल उतने ही थाट चुन लिये, जिनमें उत्तर भारतीय संगीत के प्रचलित सभी रागों का वर्गीकरण होना सम्भव हो। इस विधि से वर्तमान उत्तर भारतीय संगीत को उन्होने पक्की नींव पर प्रतिस्थापित किया। साथ ही उन सभी विशेषताओं को भी, जिनके आधार पर दक्षिण और उत्तर भारतीय संगीत पद्धति पृथक होती है, उन्होने कायम किया। भातखण्डे जी ने पं॰ व्यंकटमखी के 72 थाटों में से 10 थाट चुन कर प्रचलित सभी रागों का वर्गीकरण किया। थाट सिद्धान्त पर भातखण्डे जी ने ‘लक्ष्य-संगीत’ नामक एक ग्रन्थ की रचना भी की थी।

पण्डित अजय चक्रवर्ती 
आइए, अब हम आज के थाट ‘पूर्वी’ के विषय में थोड़ी जानकारी प्राप्त करते हैं। इस थाट में प्रयोग होने वाले स्वर हैं- सा, रे॒, ग, म॑, प ध॒, नि। इस थाट में मध्यम स्वर तीव्र और ऋषभ तथा धैवत स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। शेष सभी शुद्ध स्वर होते हैं। पूर्वी थाट का आश्रय राग पूर्वी है। यह सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। राग पूर्वी के आरोह के स्वर- सारे, ग, म॑प, , निसां और अवरोह के स्वर- सांनिप, म॑ ग, रेसा होते हैं। इस राग में कोई भी स्वर वर्जित नहीं होता। ऋषभ और धैवत कोमल तथा मध्यम के दोनों प्रकार प्रयोग किये जाते हैं। राग ‘पूर्वी’ का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है तथा इसे दिन के अन्तिम प्रहर में गाया-बजाया जाता है। आज हमारी चर्चा में थाट और राग पूर्वी है। इस राग का प्रत्यक्ष अनुभव कराने के लिए अब हम आपके समक्ष एक रचना प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे पंडित अजय चक्रवर्ती ने प्रस्तुत किया है। वर्तमान में भारतीय संगीत की हर शैली पर समान रूप से अधिकार रखने वाले संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती ने राग पूर्वी की इस रचना को ध्रुपद के अन्दाज में प्रस्तुत किया है। अजय जी को पटियाला, कसूर घराने की संगीत-शिक्षा उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के सुपुत्र उस्ताद मुनव्वर अली खाँ से प्राप्त हुई है। आइए, सुनते है, पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वरों में राग पूर्वी की यह रचना। इस प्रस्तुति में सारंगी पर भारतभूषण गोस्वामी ने और पखावज पर माणिक मुंडे ने संगति की है। कुछ विद्वान इस ध्रुपद को तानसेन की रचना मानते हैं।


राग पूर्वी : ‘कर कपाल लोचन त्रय...’ : पण्डित अजय चक्रवर्ती 



उस्ताद अमीर खाँ 
इस थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ प्रमुख राग हैं- ‘पूरिया धनाश्री’, ‘जैतश्री’, ‘परज’, ‘श्री’, ‘गौरी’, ‘वसन्त’ आदि। पूर्वी थाट के विभिन्न रागों में राग पूरिया धनाश्री एक अत्यन्त लोकप्रिय राग है। राग पूर्वी की तरह राग पूरिया धनाश्री भी सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इस राग के आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर इस्तेमाल किये जाते हैं। इसका ऋषभ और धैवत स्वर कोमल होता है तथा मध्यम स्वर तीव्र होता है। आरोह के स्वर- निरे गम॑प प निसां और अवरोह के स्वर- रे निप म॑ग म॑रेगरेसा होते हैं। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग पूरिया धनाश्री के गायन-वादन का समय सायंकाल माना जाता है। आइए, अब आप राग पूरिया धनाश्री पर केन्द्रित एक गीत सुनिए। यह गीत हमने फिल्म ‘बैजू बावरा’ से लिया है। अकबर के समकालीन कुछ ऐतिहासिक तथ्यों और कुछ दन्तकथाओं के मिश्रण से बुनी 1952 में फिल्म- ‘बैजू बावरा’ प्रदर्शित हुई थी। ऐतिहासिक कथानक और उच्चस्तर के संगीत से युक्त अपने समय की यह एक सफलतम फिल्म थी। इस फिल्म को आज छह दशक बाद भी केवल इसलिए याद किया जाता है कि इसका गीत-संगीत भारतीय संगीत के रागों पर केन्द्रित था। फिल्म के कथानक के अनुसार अकबर के समकालीन सन्त-संगीतज्ञ स्वामी हरिदास के शिष्य तानसेन सर्वश्रेष्ठ थे। परन्तु उनके संगीत पर दरबारी प्रभाव आ चुका था। उन्हीं के समकालीन स्वामी हरिदास के ही शिष्य माने जाने वाले बैजू अथवा बैजनाथ थे, जिसका संगीत मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण था। फिल्म के कथानक का निष्कर्ष यह था कि संगीत जब राज दरबार की दीवारों से घिर जाता है, तो उसका लक्ष्य अपने स्वामी की प्रशस्ति तक सीमित हो जाता है, जबकि मुक्त प्राकृतिक परिवेश में पनपने वाला संगीत ईश्वरीय शक्ति से परिपूर्ण होता है। राग पूरिया धनाश्री के स्वरों से पगा जो गीत आज हमारी चर्चा में है, उसका फिल्मांकन अकबर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन को अपने महल में रियाज़ करते दिखाया गया था। यह फिल्म का शुरुआती प्रसंग है। इसी गीत पर फिल्म की नामावली प्रस्तुत की गई है। राग पूरिया धनाश्री में निबद्ध यह गीत सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद अमीर खाँ ने गाया है। फिल्म के संगीतकार नौशाद थे। इस रचना में भी तानसेन का नाम आया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग पूरिया धनाश्री : ‘तोरी जय जय करतार...’ : उस्ताद अमीर खाँ : फिल्म बैजू बावरा





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 218वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको पाँच दशक से भी अधिक पुरानी ऐतिहासिक हिन्दी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस गीत के अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 220वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में किस राग की झलक है।

2 – गीत के अंश में प्रयोग किये गए ताल को ध्यान से सुनिए और हमें ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत के पार्श्वगायक के स्वर को पहचानिए और उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 16 मई, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 218वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 216वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा गया था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जोगिया, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल खेमटा (6 मात्रा) और कहरवा (8 मात्रा) तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका कमल बारोट (और महेन्द्र कपूर)। इस बार पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने दिया हैं। तीन में से दो प्रश्न के सही उत्तर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ जारी है। इसके अन्तर्गत हम प्रत्येक अंक में भारतीय संगीत के प्रचलित दस थाट और उनके आश्रय रागों की चर्चा कर रहे हैं। साथ ही थाट से जुड़े अन्य रागों पर आधारित फिल्मी गीत भी प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें अवश्य लिखिएगा। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आगामी लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के रागों’ पर केन्द्रित होगा। यदि आपने वर्षा ऋतु के रागों पर कोई आलेख तैयार किया है या इन रागों की कोई रचना आपको पसन्द है, तो हमें swargoshthi@gmail.com पर शीघ्र भेजें। हम उसे आपके नाम और परिचय के साथ प्रकाशित / प्रसारित करेंगे। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

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