शनिवार, 14 मार्च 2015

फ़िल्मों में क्रिकेट खिलाड़ी - वर्ल्ड कप स्पेशल


वर्ल्ड कप स्पेशल 
 

फ़िल्मों में क्रिकेट खिलाड़ी




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, आजकल क्रिकेट का बुखार हर छोटे-बड़े पर सवार है। विश्वकप क्रिकेट टूर्नामेण्ट, जो कि क्रिकेट का सबसे लोकप्रिय टूर्नामेण्ट होता है, इन दिनों खेला जा रहा है। और भारत की पाकिस्तान, दक्षिन अफ़्रीका, वेस्ट इंडीज़, आयरलैण्ड और संयुक्त अरब अमीरात पर शानदार जीत के बाद भारतीयों के लिए यह टूर्नामेण्ट अब और भी ज़्यादा रोचक और रोमांचक हो उठा है। यूं तो ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ साहित्य, संगीत और सिनेमा की पत्रिका है, पर क्रिकेट के इस बुखार से हम भी नहीं बच सके हैं। तो आइए टीम इण्डिया को विजय की शुभकामनाएँ देते हुए आज के इस विशेष प्रस्तुति में जाने कि भारत के किन किन क्रिकेट खिलाड़ियों ने फ़िल्म जगत में अपना हाथ आज़माया है। 



सिनेमा एक ऐसा माध्यम है जिससे हर कोई आकर्षित होता है। सिनेमा जहाँ एक तरफ़ आम दर्शकों को एक मायाबी संसार में ले जाता है, वहीं दूसरी ओर विभिन्न व्यावसायों के प्रसिद्ध लोग इस क्षेत्र में अपनी किस्मत आज़ामाने को तत्पर रहते हैं। खेल जगत की अगर बात करें तो क्रिकेट एक ऐसा खेल है जिसकी चमक फ़िल्म-जगत की चमक को काँटे का टक्कर देती आई है। फिर भी अनेक बार यह देखा गया है कि क्रिकेट खिलाड़ी फ़िल्मों की ओर आकृष्ट होकर इस क्षेत्र में अपनी किस्मत आज़माने पहुँचे हैं। शुरुआत करते हैं सुनिल गावस्कर से। टेस्ट क्रिकेट के इतिहास के सफल बल्लेबाज़ों में शुमार होता है गावस्कर का नाम। हमारे देश का गौरव हैं वो। क्रिकेट से सन्यास लेने के बाद पता नहीं उन्हें क्या सूझा कि वो चले आए फ़िल्मों की ओर। मराठी फ़िल्म ’सावली प्रेमाची’ में मुख्य किरदार उन्होंने निभाया, जो बुरी तरह से फ़्लॉप रही। इस फ़िल्म की असफलता से ना घबराते हुए गावस्कर ने एक बार फिर साहस जुटाया और इस बार नज़र आए हिन्दी फ़िल्म ’मालामाल’ में नसीरुद्दीन शाह के साथ। हालाँकि यह फ़िल्म उतनी बुरी तरीके से नहीं पिटी, पर सुनिल गावस्कर को यह अहसास ज़रूर हो गया कि अभिनय उनके बस की बात नहीं।

क्रिकेट खिलाड़ियों के फ़िल्मों में अभिनय करने का सिलसिला शुरू हुआ था आज से चार दशक पहले जब हार्ड-हिटिंग् बैट्समैन सलीम दुर्रानी ने परवीन बाबी के साथ बी. आर. इशारा निर्देशित फ़िल्म ’चरित्र’ में अभिनय किया था। ’अर्जुन पुरस्कार’ से सम्मानित होने वाले पहले क्रिकेटर सलीम दुर्रानी क्रिकेट के मैदान में जितने सफल थे, वही सफलता फ़िल्मों में उन्हें नहीं मिली। ’चरित्र’ के बुरी तरह फ़्लॉप होने पर उन्होंने दोबारा इस तरफ़ अपने क़दम नहीं रखे। स्टाइलिश मिज़ाज के बैट्समैन अजय जडेजा ने अपने क्रिकेट करीअर में बहुत सी कामयाबियाँ देखी, पर अपनी सफलता और शोहरत को वो काबू में ना रख सके और अज़हरुद्दीन और मनोज प्रभाकर के साथ मिल कर मैच-फ़िक्सिंग् में जुड़ कर अपने क्रिकेट करीअर का अन्त बुला लिया। जब पाँच वर्षों के लिए उन्हें क्रिकेट जगत से निष्कासित कर दिया गया, तो उन्होंने फ़िल्म-जगत का द्वार खटखटाया और बन गए अभिनेता फ़िल्म ’खेल’ में। सुनिल शेट्टी, सनी देओल और सेलिना जेटली इस फ़िल्म के अन्य मुख्य कलाकार थे। फ़िल्म बुरी तरह असफल रही। दुर्भाग्यवश अजय जडेजा ना तो फिर दोबारा किसी फ़िल्म में अभिनय कर पाये और ना ही क्रिकेट जगत में उनकी वापसी हो सकी। अब बस एक क्रिकेट समीक्षक और कमेन्टेटर के रूप में वो नज़र आते हैं। सचिन तेन्दुलकर के समसामयिक खिलाड़ियों में एक नाम है विनोद काम्बली का। उनका क्रिकेट करीअर सफल ज़रूर रहा पर अवधि कम ही रही। टेस्ट मैचों में दो दोहरे-शतक और दो शतक बनाने वाले विनोद काम्बली ने साल 2002 में संजय दत्त और सुनील शेट्टी के साथ फ़िल्म ’अनर्थ’ में नज़र आये, पर फ़िल्म के रिलीज़ होते ही उन्हें यह समझ आ गया कि ’अनर्थ’ करने का कोई अर्थ नहीं था। ऐसा सुना जाता है कि विनोद काम्बली के दोस्तों ने उन्हें यह चेतावनी दी थी कि यह क़दम मत उठाओ काम्बली, वरना अनर्थ हो जाएगा, पर काम्बली के सर पे हीरो बनने का भूत सवार हो चुका था। नतीजा जल्द ही उन्हें मिल गया।

एक क्रिकेटर जो क्रिकेट से ज़्यादा अभिनय जगत में नाम कमाया, वो हैं सलिल अंकोला।सुन्दर कद-काठी और ख़ूबसूरत चेहरे के धनी सलिल क्रिकेट में ज़्यादा कामयाब नहीं हुए। मुम्बई से ताल्लुक रखने वाले सलिल को भारत के लिए खेलने का मौका तो मिला पर केवल एक टेस्ट मैच में और चन्द एक दिवसीय मैचों में। उनका प्रदर्शन उस स्तर का नहीं था कि नैशनल टीम में उनकी जगह पक्की हो जाती। वो उतने फ़ॉर्म में भी नहीं थे और ना ही उनकी किस्मत ने उनका साथ दिया। इस बात को उन्होंने समझा और बजाय क्रिकेट में अपने आप को घसीटने के उन्होंने अभिनय जगत में क़दम रखने में अपनी भलाई समझी। हिन्दी की तीन फ़िल्मों में उन्होंने अभिनय किया, ये फ़िल्में थीं ’कुरुक्षेत्र’, ’पिता’ और ’चुरा लिया है तुमने’। ये तीनों फ़िल्में ठीक-ठाक चली, पर हिन्दी फ़िल्मों में नायक का जो रूप होता है उसमें फ़िट ना बैठने की वजह से उन्होंने फ़िल्मों को भी अलविदा कर दिया, और रुख़ किया छोटे परदे यानि टेलीविज़न की ओर। और इस बार किस्मत ने उनका पूरा-पूरा साथ दिया। उनके अभिनय से सजे ’करम अपना अपना’, ’कोरा कागज़’, ’नफ़रत’ और ’खाकी’ जैसे धारावाहिक बहुत लोकप्रिय हुए और सलिल अंकोला पहुँच गए घर-घर में।

वर्तमान लोकप्रिय क्रिकेटर युवराज सिंह के पिता योगराज सिंह जो ख़ुद एक ऑल-राउन्डर थे और जिन्होंने एक टेस्ट और छह एक दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय मैच खेले हैं, 70 और 80 के दशकों में पंजाबी फ़िल्मों से जुड़े। योगराज सिंह ने 30 से भी ज़्यादा पंजाबी तथा लगभग 10 हिन्दी फ़िल्मों में अभिनय किया है। हाल ही में फ़रहान अख़्तर की फ़िल्म ’भाग मिलखा भाग’ में उन्होंने मिलखा सिंह के कोच की भूमिका निभाई है। उनके अभिनय से सजी कुछ फ़िल्में हैं - बँटवारा, जट ते ज़मीन, जोर, जट दा, पगरी सम्भाल जट्टा, जिगरा जट दा, इंसाफ़ पंजाब दा, विछोरा, कब्ज़ा, पंचायत, वेस्ट इज़ वेस्ट, माहौल ठीक है, लव यू बॉबी, हीर ऐण्ड हीरो, रोमियो रांझा, बाज़ वगेरह। 80 के दशक में दो क्रिकेटर ऐसे थे जो एक ही फ़िल्म में बाक़ायदा अभिनय करते हुए नज़र आए। ये हैं संदीप पाटिल और सैयद किरमानी। संदीप जहाँ फ़िल्म के मुख्य नायक बनें, वहीं दूसरी ओर विकेट-कीपर किरमानी ने उसी फ़िल्म में खलनायक की भूमिका निभाई। फिल्म में किरमानी और संदीप पाटिल के बीच मारपीट का दृश्य भी था। यह फ़िल्म थी 1985 की ’कभी अजनबी थे’, जिसमें पूनम ढिल्लों और देबश्री रॉय अभिनेत्रियाँ थीं। यह फ़िल्म बुरी तरह से पिट गई, पर फ़िल्म के गीतों ने कमाल ज़रूर किया। फ़िल्म का शीर्षक गीत "कभी अजनबी थे ज़मीं आसमाँ ये, तेरा हाथ थामा जो हुए मेहरबाँ ये" बहुत लोकप्रिय हुआ था और कई वर्षों तक रेडियो के अनुरोध गीतों के कार्यक्रमों में बजता रहा। अन्य गीतों में "दिल की इस दहलीज़ तक", "गीत मेरे होठों को दे गया कोई" भी लोकप्रिय हुए थे और ये सभी कर्णप्रिय गीत हैं।

हिन्दी फ़िल्मों में बाक़ायदा नायक की भूमिका में अभिनय करने वाले क्रिकेटरों में एक नाम है पाक़िस्तानी क्रिकेटर मोहसिन ख़ान का। मशहूर शुरुआती बल्लेबाज़ मोहसिन ख़ान पाक़िस्तानी क्रिकेट के महत्वपूर्ण खिलाड़ियों में से एक रहे। पर अपने क्रिकेट करीअर की चोटी पर रहते समय ही मोहसिन आकृष्ट हुए फ़िल्मी दुनिया की चमक-दमक की ओर, और अपने क्रिकेट करीअर को दाँव पर लगा दिया। फ़िल्मों में उनका पदार्पण हुआ जे. पी. दत्ता की 1987 की फ़िल्म ’बँटवारा’ में। आगे चलकर 90 के दशक में उन्होंने कुछ और फ़िल्में की जैसे कि ’साथी’, ’फ़तेह’ और ’मैडम एक्स’। फ़िल्म ’साथी’ के गाने बहुत मशहूर थे जैसे कि "आज हम तुम ओ सनम मिल के यह वादा करे", "हुई आँख नम और यह दिल मुस्कुराया", पर फ़िल्म असफल ही रही। इन तमाम फ़िल्मों के ना चलने से मोहसिन ख़ान को भी कोई बड़ा मौका नसीब नहीं हुआ, और क्रिकेट के साथ साथ फ़िल्मों का सफ़र भी उनका समाप्त हो गया। अभिनेत्री रीना रॉय के साथ मोहसिन ख़ान का प्रेम-संबंध हुआ, दोनों ने विवाह कर लिया, पर दुर्भाग्यवश आगे चलकर दोनों अलग भी हो गए एक दूसरे से।

प्रसिद्ध गेंदबाज़ बिशन सिंह बेदी के पुत्र अंगद बेदी भी क्रिकेट के मैदान में उतरे, पर अपने पिता की तरह वो एक कामयाब क्रिकेटर नहीं बन सके। उन्होंने दिल्ली के लिए कई मैच खेले, पर राष्ट्रीय टीम में उनका सीलेक्शन कभी नहीं हो पाया। जब उन्हें यह लगा कि क्रिकेट में ऊँचे मकाम तक पहुँच पाना उनके लिए अब संभव नहीं, अंगद ने रुख़ किया मॉडेलिंग् की तरफ़। अच्छे कद-काठी और आकर्षक चेहरे के धनी अंगद को मॉडेलिंग् की दुनिया ने अपने पास बुला लिया। रैम्प शोज़ और कई विज्ञापनों में काम करने के बाद उन्हें टेलीविज़न में ब्रेक मिला ’कूक ना कहो’ और ’ईमोशनल अत्याचार’ जैसे लोकप्रिय शोज़ के होस्ट बनने का। फ़िल्मी परदे पर उनका पदार्पण हुआ फ़िल्म ’फ़ालतू’ में, जिसमें उनका अभिनय सराहा गया। हाल की फ़िल्म ’उंगली’ में भी अंगद अभिनय करते दिखे गए। आने वाले समय में अंगद और फ़िल्मों में नज़र आएँगे और अपने अभिनय का जादू चलाएँगे ऐसी उम्मीद की जा सकती है।

अंगद बेदी की तरह एक और क्रिकेटर जो रणजी क्रिकेट में उत्तर प्रदेश के लिए कई मैच खेले, पर आगे चलकर मॉडलिंग् और अभिनय की दुनिया से जुड़ गए, वो हैं सजिल खण्डेलवाल। सजिल के पिता चाहते थे कि वो एक बहुत बड़ा क्रिकेटर बने। सजिल उसी राह पर चल भी निकले थे और क्रिकेट में कामयाबी की सीढ़ियाँ चढ़ते भी जा रहे थे। पर उनके पिता की आकस्मिक मृत्यु हो जाने पर सजिल का मन क्रिकेट से भर गया। उनके पिता के चले जाने के बाद जैसे वो सारा प्रोत्साहन ही ख़त्म हो गया, और क्रिकेट के प्रति उनका लगाव भी यकायक ख़त्म हो गया। मॉडेलिंग जगत में सजिल ने बहुत काम किया है और उनके अभिनय से सजी एक फ़िल्म भी बनी है ’Confessions of a Rapist' जो सेन्सर बोर्ड के सर्टिफ़िकेशन की अपेक्षा कर रही है। सजिल खण्डेलवाल से विस्तारित बातचीत ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मासिक स्तम्भ ’बातों बातों में’ में कुछ महीने पहले प्रकाशित हुई थी जिसे आप यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

और अब ज़िक्र कुछ ऐसे क्रिकेटरों और उनकी फ़िल्मों की जिनमें वो किसी अन्य चरित्र को नहीं बल्कि अपने आप के रूप में नज़र आए, यानी कि 'as self'। विश्वकप विजयी कप्तान कपिल देव भी कई बार फ़िल्मों में नज़र आये हैं, पर औरों की तरह वो फ़िल्मी चरित्र के रूप में ना आकर अपनी ख़ुद की भूमिका, अर्थात् कपिल देव की भूमिका में ही रूपहले परदे पर उतरे। ’Stumped', 'इक़बाल’, ’आर्यन’, ’चेन कुली कि मेन कुली’ जैसी फ़िल्मों में कपिल देव दिखे गए। राहुल बोस अभिनीत ’चेन कुली कि मेन कुली’ में तो कहानी का अधिकांश भाग कपिल देव की प्रसिद्ध वर्ल्ड-कप विनिंग् बैट के इर्द-गिर्द घूमती है। साजिद नडियाडवाला की फ़िल्म ’मुझसे शादी करोगी’ के क्लाइमैक्स शॉट में कपिल देव और नवजोत सिंह सिद्धु सहित कई भारतीय क्रिकेटर नज़र आए जैसे कि इरफ़ान पठान, हरभजन सिंह, पार्थिव पटेल, मोहम्मद कैफ़, जवगल श्रीनाथ और आशिष नेहरा। हरमन बवेजा अभिनीत फ़िल्म ’विक्ट्री’ में आर. पी. सिंह, प्रवीण कुमार, दिनेश कार्तिक तो नज़र आए ही, साथ में कई ऑस्ट्रेलियन क्रिकेटर भी दिखे जैसे कि ब्रेट ली, ब्रैड हॉग, स्टुआर्ट क्लार्क, सायमन कैटिच।





खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

शनिवार, 7 मार्च 2015

"हैंगोवर तेरी यादों का..." - क्यों सोनू निगम नहीं गा सके इस गीत को?


एक गीत सौ कहानियाँ - 54
 

हैंगओवर  तेरी यादों का...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तंभ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 54 वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'किक' के मशहूर गीत "हैंगओवर तेरी यादों का" से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें। 



"चांदी की डाल पर सोने का मोर..."
किसी फ़िल्मी गीत की सफलता में केवल गायक, गीतकार और संगीतकार की सफलता ही छुपी नहीं होती, बल्कि उस अभिनेता की सफलता भी छुपी होती है जिन पर वह गीत फ़िल्माया गया होता है। और यही कारण है कि कई अभिनेता अपने उपर फ़िल्माये जाने वाले गीतों को लेकर बहुत सचेतन होते हैं। गुज़रे ज़माने के नायकों में दो नाम हैं शम्मी कपूर और राजेश खन्ना, जो अपने फ़िल्मों के गीतों को लेकर बहुत सीरियस हुआ करते थे। सुनने में आता है कि ये दोनों अभिनेता गीतों के सिटिंग्पर पहुँच जाया करते थे और गीत की रचना प्रक्रिया में पूर्ण रूप से भाग भी लेते थे, अपने सुझाव देते थे। और यही वजह है कि शम्मी कपूर और राजेश खन्ना की फ़िल्मों के गाने सदा हिट हो जाया करते। फ़िल्म भले चले न चले, गानें ज़रूर चल पड़ते थे। नए ज़माने में एक नाम है सलमान ख़ान का जो अपनी फ़िल्मों के गीत-संगीत में गहन रुचि रखते हैं। 1990 और 2000 के दशकों में उनकी फ़िल्मों के गानें अपनी मेलडी के लिए लोगों में बेहद पॉपुलर हुआ करते थे, पर इस नए दशक में उनकी जितनी फ़िल्में आईं, उनके गीतों में मेलडी से ज़्यादा मसाला पाया जाने लगा है। इससे यह अहसास होता है कि अब सलमान ख़ान चाहते हैं कि ये गानें पब्लिक और यंग्जेनरेशन की ज़ुबाँ पर तुरन्त चढ़ जाये और डान्स पार्टियों की शान बनें। इस होड़ में मेलडी को शायद कम महत्व दिया जाने लगा है उनकी फ़िल्मों के गीतों में आजकल। ख़ैर, हाल में उनकी फ़िल्म आई 'किक' जिसके गाने इन दिनों धूम मचा रहे हैं उनकी पिछली फ़िल्मों ही की तरह। मिका सिंह का गाया "जुम्मे की रात है" नंबर वन पर है तो सलमान ख़ान का गाया "हैंगोवर तेरी यादों का" भी अपना जादू चला रहा है। यह सलमान ख़ान का गाया पहला गाना नहीं है। उन्होंने इससे पहले साल 1999 में फ़िल्म 'हेलो ब्रदर' में "चांदी की डाल पर सोने का मोर" गाया था। उस बार भले उनका उस गीत को गाना पूर्वनिर्धारित था, पर 'किक' का यह गीत उनकी झोली में अचानक ही आ गया।

बात कुछ इस तरह की थी कि "हैंगोवर" गीत के लिए सबसे पहले सोनू निगम को मौका दिया गया था। संगीतकार मीत ब्रदर्स अनजान और गीतकार कुमार ने निर्माता निर्देशक साजिद नडियाडवाला को सोनू निगम और श्रेया घोषाल का नाम सुझाया। साजिद ने हामी भी भर दी। गाना रिहर्स होकर सोनू की आवाज़ में रेकॉर्ड भी हो गया। पर होनी को कुछ और ही मंज़ूर था। साजिद ने किस वजह से सोनू के गाये गीत को रद्द करने का फ़ैसला लिया यह स्पष्ट होता है सोनू निगम के Times of India' दिए हुए एक साक्षात्कार में। सोनू कहते हैं, "amendment के महीनों बीत जाने के बाद भी लोग अब तक यह नहीं समझ पाए हैं कि Copyright Act में हम किस चीज़ के लिए लड़ाई लड़ रहे थे। सब मुझसे पूछते हैं, "तो आप म्युज़िक डिरेक्टर्स से रॉयल्टी ले रहे हैं?" जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था। कोई भी गायक किसी प्रोड्युसर या कम्पोज़र से रॉयल्टी नहीं ले सकता। 2012 में जो नया अमेन्डमेन्ट आया उसके अनुसार अगर किसी गायक का गाया गीत किसी सार्वजनिक स्थान पर बजाया जाता है जैसे कि रेस्तोराँ, लिफ़्ट, प्लेन आदि, तो उस गायक को 'पर्फ़ॉर्मैन्स रॉयल्टी' मिलनी चाहिए। यह रॉयल्टी गायक को सीधे नहीं बल्कि India Singers Rights Association (ISRA) को दी जायेगी, जो गायक तक पहुँचायेगी। अगर म्युज़िक कम्पोज़र का पैसा है, उसे रखो तुम अपने पास। मैं किसी और से ले रहा हूँ और कम्पोज़र को उससे भी प्रॉबलेम है। अब यह मेरी समझ नहीं आती। यह बस एक ईगो इश्यु बन गया है। हर कोई कॉनट्रैक्ट के नियमों और कानूनी मसलों से डरते हैं। कोई न कोई क्लॉज़ डाल देंगे जिसकी वजह से हम सिंगर्स, कम्पोज़र्स और लिरिसिस्ट्स जाल में फँस जाते हैं। इस बात पर बहस हर किसी ने किया पर मैं टारगेट बना क्योंकि मैं चुप नहीं रहा। और इस वजह से मेरे गाने डब होने शुरु हो गए। मेरे गाये हुए गाने दूसरे गायकों से दोबारा डब करवाये जाने लगे। ये "हैंगोवर" जो सलमान ने गाया है, वह पहले मैंने गाया था। मुझे इससे कोई प्रॉब्लेम नहीं, पर मैं ऐसा कोई कॉनट्रैक्ट साइन नहीं करना चाहता जो ग़ैर-कानूनी हो और जिसका कोई मतलब न बनता हो। पर एक कॉनट्रैक्ट्स बदल रहे हैं, और हाल में मैंने दो गीत गाये हैं।" इस तरह से सोनू का गाया "हैंगोवर" दोबारा सलमान की आवाज़ में रेकॉर्ड हुआ, और इसी तरह से फ़िल्म 'मैं तेरा हीरो' में भी सोनू का गाया "ग़लत बात है" री-डब किया गया जावेद अली की आवाज़ में।

मीत ब्रदर्स अनजान
अब सवाल यह उठता है कि "हैंगोवर" के लिए अगर सोनू नहीं तो फिर सलमान ही क्यों? क्यों नहीं किसी और प्रतिष्ठित गायक से गवाया गया यह गीत? बात दरसल ऐसी हुई कि सोनू के गाये गीत को शामिल ना किए जाने के बाद नए गायक की तलाश शुरू हुई, ऐसे में एक दिन सलमान ख़ान युंही इस गीत को गा रहे थे। उन्हें यह गीत गाता देख साजिद नडियाडवाला के मन में यह विचार आया कि क्यों न इसे सल्लु मियाँ से ही गवा लिया जाए। जैसे ही जनता को यह पता चलेगा कि सलमान ने इस गीत को गाया है, तो वह गीत तो वैसे ही हिट हो जाएगा। साजिद ने जब यह बात संगीतकार मीत ब्रदर्स अनजान को बताई तो मीत ब्रदर्स को भी सुझाव सही लगा। फिर शुरू हुआ सलमान को मनाने का काम। सलमान ने साफ़ कह दिया कि उन्हें कोई गाना-वाना नहीं आता और अगर सोनू नहीं तो किसी और गायक से इसे गवा लिया जाए। पर सब के समझाने पर और यह विश्वास दिलाने पर कि Melodyn और Antares जैसे सॉफ़्टवेर के द्वारा उनके गाए गीत को बिल्कुल सुरीला बनाया जा सकता है, सलमान मान गए। श्रेया घोषाल तो अपना हिस्सा पहले गा ही चुकी थीं, सलमान ख़ान ने भी गाया, और जब पूरा गाना बन कर मार्केट में आया तो तुरन्त हिट हो गया। Melodyn और Antares के ज़रिए अब कोई भी गाना गा सकता है। यहाँ तक कि गायक सिर्फ़ बोलों को पढ़ भी दे तो भी वो इनके ज़रिए सुरों में ढाल दिया जा सकता है। अत: अब प्रश्न यह उठता है कि क्या भविष्य में फ़िल्मी पार्श्वगायन के लिए गायकों की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी? अगर आवाज़ अच्छी है तो कोई भी पार्श्वगायक बन सकता है। पता नहीं यह अच्छा हो रहा है या ग़लत! पर सोनू निगम के साथ जो हुआ वह अच्छा नहीं था, इतना हम ज़रूर कह सकते हैं। बस इतनी सी है इस गीत के पीछे की दास्तान। लीजिए, अब आप वही गीत सुनिए।

फिल्म किक : 'हैंगओवर तेरी यादों का...' : सलमान खाँ और श्रेया घोषाल : गीतकार - कुमार 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

रविवार, 1 मार्च 2015

रंगोत्सव पर सुनिए चतुरंग : SWARGOSHTHI – 209 : CHATURANG



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी पाठकों / श्रोताओं को रंगोत्सव के पर्व पर हार्दिक मंगलकामना



 
स्वरगोष्ठी – 209 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : 7 : चतुरंग

संगीत के चार अलंकरणों से सुसज्जित चतुरंग






‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की एक और नवीन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धान्तों के अनुकूल जो धाराएँ थीं उन्हें स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। पिछली कड़ी से हमने भारतीय संगीत की प्रचलित खयाल शैली के अन्तर्गत ‘तराना’ गायकी का सोदाहरण परिचय प्रस्तुत किया था। आज के अंक में हम खयाल शैली के अन्तर्गत गाये जाने वाले ‘चतुरंग’ गीतों पर चर्चा करेंगे। सुप्रसिद्ध गायक पण्डित जसराज का राग श्याम कल्याण में निबद्ध एक चतुरंग हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके अलावा वर्ष 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘दिल ही तो है’ का राग भैरवी पर आधारित एक गीत भी सुनवा रहे हैं, जिसमें पार्श्वगायक मन्ना डे ने तराना और चतुरंग का आकर्षक प्रयोग किया था। 


ठारहवीं शताब्दी में सुल्तान मुहम्मद शाह रँगीले के दरबारी संगीतज्ञ नियामत खाँ ‘सदारंग’ द्वारा शास्त्रीय संगीत की एक शैली के रूप में विकसित और स्थापित खयाल शैली आज की सर्वाधिक लोकप्रिय शैली है। सदारंग की खयाल रचनाएँ अनेक पीढ़ियों से हस्तान्तरित होते हुए आज भी प्रचलित हैं। सदारंग तानसेन के वंशज थे। उनकी और उनके वंशजों की गायकी ध्रुपद शैली की थी। खयाल शैली पर ध्रुपद का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। खयाल शैली की तुलना जब ध्रुपद से की जाती है तो पहला अन्तर इसके साहित्य में परिलक्षित होता है। अधिकतर ध्रुपद रचनाओं के साहित्य में आध्यात्मिक भाव प्रमुख होता है, जबकि खयाल रचनाओं में श्रृंगार रस और लौकिक भाव की प्रधानता होती है। खयाल और ध्रुपद के साहित्य की भाषा में भी यह अन्तर स्पष्ट हो जाता है। श्रृंगार रस की अधिकता और चमत्कारपूर्ण दरबारी गायकी के कारण खयाल को अनेक अलंकारों से सजाया जाता है। खयाल शैली में विभिन्न प्रकार के तानों का प्रयोग किया जाता है। इस शैली में विविध अलंकरणों की प्रवृत्ति के कारण तराना, रागमाला, तालमाला, चतुरंग, त्रिवट आदि गायकी का विकास हुआ। पिछले अंक में हमने तराना शैली पर चर्चा की थी। आज के अंक में हम ‘चतुरंग’ की चर्चा करेंगे। चतुरंग गायकी का वह रागबद्ध और तालबद्ध प्रकार है, जिसमें संगीत के चार अंग एक ही रचना में शामिल होते हैं। मध्यकाल के संगीत विद्वान मतंग द्वारा एक ऐसे प्रबन्ध गायन का प्रतिपादन किया गया था, जिसके अन्तर्गत एक रचना में चार खण्डों को चार रागों, चार ताल और चार भिन्न भाषाओं के पदों में गायन किया जाता था। वर्तमान में प्रचलित रागमाला, तालमाला और चतुरंग की गायकी इसी शैली के विकसित रूप हैं। वर्तमान चतुरंग में राग और ताल एक-एक प्रकार के ही होते हैं। इसके साथ ही चतुरंग में पद का साहित्य, तराने के बोल, सरगम और तबला या मृदंग के बोलों का एक क्रम में संयोजन होता है। ‘संगीत रत्नाकर’ नामक ग्रन्थ में भी एक ऐसी ही गायकी का उल्लेख है। संगीतज्ञ पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने भी अनेक उत्कृष्ट चतुरंग रचनाएँ की थी। अब हम आपको वरिष्ठ संगीतज्ञ पण्डित जसराज के स्वरों में राग श्याम कल्याण में निबद्ध चतुरंग सुनवा रहे हैं।


चतुरंग : राग श्याम कल्याण : पण्डित जसराज : द्रुत तीनताल





फिल्मों में चतुरंग का प्रयोग कुछेक संगीतकारों ने ही किया है। 1963 में संगीतकार रोशन को एक अवसर मिला, अपना श्रेष्ठतम संगीत देने का। फिल्म थी 'दिल ही तो है', जिसमे राज कपूर और नूतन नायक-नायिका थे। यह गीत राज कपूर पर फिल्माया गया था। फिल्म के प्रसंग के अनुसार एक संगीत मंच पर एक नृत्यांगना के साथ बहुत बड़े उस्ताद को गायन संगति करनी थी। अचानक उस्ताद के न आ पाने की सूचना मिलती है। आनन-फानन में चाँद (राज कपूर) को दाढ़ी-मूंछ लगा कर मंच पर बैठा दिया जाता है। रोशन ने इस प्रसंग के लिए गीत का जो संगीत रचा, उसमे उपशास्त्रीय संगीत की इतनी सारी शैलियाँ डाल दीं कि उस समय के किसी फ़िल्मी पार्श्वगायक के लिए बेहद मुश्किल काम था। मन्ना डे ने इस चुनौती को स्वीकार किया और गीत ‘लागा चुनरी में दाग, छुपाऊं कैसे....’ को अपना स्वर देकर गीत को अमर बना दिया। इस गीत के उत्तरार्द्ध में राग भैरवी का तराना शामिल किया गया है। इसी तराना के बीच में 'पखावज के बोल', 'सरगम', नृत्य के बोल', 'कवित्त', 'टुकड़े', यहाँ तक कि तराना के बीच में हल्का सा ध्रुवपद का अंश भी इस गीत में शामिल है। संगीत के इतने सारे अंग मात्र सवा पाँच मिनट के गीत में डाले गए हैं। जिस गीत में संगीत के तीन अंग होते हैं, उन्हें 'त्रिवट' और जिनमें चार अंग होते हैं, उन्हें 'चतुरंग' कहा जाता है। मन्ना डे के गाये इस गीत को फिल्म संगीत में चतुरंग के प्रयोग का एक श्रेष्ठ उदाहरण माना जा सकता है। यह गीत भारतीय संगीत में 'सदासुहागिन राग' के विशेषण से पहचाने जाने वाले राग -"भैरवी" पर आधारित है। कुछ विद्वान् इसे राग "सिन्धु भैरवी" पर आधारित मानते हैं, किन्तु जाने-माने संगीतज्ञ पं. रामनारायण ने इस गीत को "भैरवी" आधारित माना है। गीत की एक विशेषता यह भी है कि गीतकार साहिर लुधियानवी ने कबीर के एक निर्गुण पद की भावभूमि पर इसे लिखा है। आइए इस कालजयी गीत को सुनते हैं। आप यह गीत सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति 


राग भैरवी : ‘लागा चुनरी में दाग छुपाऊँ कैसे...’ : मन्ना डे : फिल्म – दिल ही तो है







संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 209वें अंक की पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन प्रश्नों में से कोई दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 210 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – भारतीय संगीत की किस वरिष्ठ गायिका की आवाज़ है? विदुषी गायिका का नाम बताइए।

2 – संगीत के इस अंश में किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

3 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 7 मार्च, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 211वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता



‘स्वरगोष्ठी’ की 207वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको विदुषी परवीन सुलताना की आवाज़ में राग हंसध्वनि के तराना का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछे थे। आपको इनमे से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। यह हमारे लिए अत्यन्त सुखद था कि सभी प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- तराना, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग हंसध्वनि और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- द्रुत तीनताल। इस बार की पहेली में पूछे गए प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ जारी है। श्रृंखला के आज के अंक से हमने आपसे चतुरंग गीत पर चर्चा की। इस श्रृंखला में आप भी योगदान कर सकते हैं। भारतीय संगीत की किसी शैली पर अपना परिचयात्मक आलेख अपने नाम और परिचय के साथ हमारे ई-मेल पते पर भेज दें। आप अपनी फरमाइश या अपनी पसन्द का आडियो क्लिप भी हमें भेज सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 



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